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भारत की पारंपरिक चिकित्सा विरासत के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल

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राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा विरासत संस्थान (NIIMH), हैदराबाद ने केंद्रीय आयुर्वेदीय विज्ञान अनुसंधान परिषद (CCRAS), आयुष मंत्रालय, भारत सरकार के तहत सेवाधि म्यूजियम एंड इंडोलॉजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (SEMIRI), कुमारनल्लूर, कोट्टायम, केरल के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं। इस सहयोग का उद्देश्य SEMIRI में संरक्षित चिकित्सा पांडुलिपियों का व्यवस्थित डिजिटलीकरण और विस्तृत विवरणात्मक कैटलॉग तैयार करना है।

SEMIRI के पास 30,000 से अधिक पांडुलिपियों का विशाल संग्रह है, जिसमें मंदिर से संबंधित अभिलेख भी शामिल हैं। इस संग्रह में आयुर्वेद और भारतीय पारंपरिक ज्ञान से जुड़ी कई दुर्लभ एवं ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण पांडुलिपियां मौजूद हैं।

इन पांडुलिपियों में चिकित्सा विचारों के विकास, उपचार पद्धतियों, औषधीय द्रव्यों, निदान संबंधी अवधारणाओं और भारतीय ज्ञान परंपरा की विद्वत परंपराओं से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध है।

MoU के तहत CCRAS-NIIMH तकनीकी एवं शोध विशेषज्ञता उपलब्ध कराएगा। सैकड़ों चिकित्सा पांडुलिपियों का उच्च गुणवत्ता वाला डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा, जिससे इन ऐतिहासिक दस्तावेजों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी और नाजुक पांडुलिपियों को बार-बार संभालने की आवश्यकता भी कम होगी।

तैयार होगा विस्तृत विवरणात्मक कैटलॉग

इस पहल के तहत पांडुलिपियों का एक व्यापक Descriptive Catalogue भी तैयार किया जाएगा। इसमें उपलब्ध जानकारी के आधार पर शीर्षक, लेखक, विषय, लिपि, भाषा, सामग्री, आकार, फोलियो विवरण, स्थिति, स्रोत एवं अन्य महत्वपूर्ण विवरण दर्ज किए जाएंगे।

यह कार्य AYUSH Manuscripts Advanced Repository के निर्धारित प्रारूप के अनुसार किया जाएगा। इससे शोधकर्ताओं और विद्वानों को संबंधित पांडुलिपियों की पहचान करने तथा भविष्य के शोध के लिए प्राथमिक स्रोतों तक पहुंच बनाने में सुविधा होगी।

यह पहल ज्ञान भारतम मिशन और भारत सरकार द्वारा देश की पांडुलिपि विरासत के संरक्षण, डिजिटलीकरण एवं व्यापक प्रसार के प्रयासों के अनुरूप है। चिकित्सा संबंधी पांडुलिपियां भारत की बौद्धिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जिनमें पीढ़ियों से संरक्षित पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान समाहित है।

CCRAS के महानिदेशक प्रो. वैद्य रबिनारायण आचार्य ने कहा कि चिकित्सा पांडुलिपियों का संरक्षण केवल अभिलेखीय कार्य नहीं, बल्कि भारत की बौद्धिक विरासत को सुरक्षित रखने का महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने कहा कि व्यवस्थित डिजिटलीकरण और वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण से दुर्लभ चिकित्सा ज्ञान भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और सुलभ रहेगा।

वहीं, SEMIRI के अध्यक्ष डॉ. सी.एस. उन्नी ने कुमारनल्लूर और कोट्टायम क्षेत्र की समृद्ध विरासत को सामने लाने में इस सहयोग को महत्वपूर्ण बताया। CCRAS-NIIMH के प्रमुख डॉ. गोली पेंचला प्रसाद ने आयुर्वेदिक पांडुलिपियों के संरक्षण और अध्ययन से जुड़ी चुनौतियों एवं आगे की रणनीति पर प्रकाश डाला।

इस अवसर पर SEMIRI के क्यूरेटर डॉ. एस. राजेंदु, CCRAS के रिसर्च ऑफिसर (आयुर्वेद) डॉ. संतोष एस. माने, डॉ. राकेश नारायणन सहित कई अधिकारी और विशेषज्ञ मौजूद रहे।

CCRAS-NIIMH की विशेषज्ञ टीम ने संस्थान की Collection, Digitization and Cataloguing of AYUSH Manuscripts and Rare Books परियोजना के तहत पांडुलिपियों का मौके पर ही व्यवस्थित डिजिटलीकरण भी शुरू कर दिया है।

यह सहयोग भारत की पारंपरिक चिकित्सा एवं पांडुलिपि विरासत को डिजिटल, संरक्षित और शोध के लिए अधिक सुलभ बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे भविष्य में शोधकर्ताओं, इतिहासकारों, शिक्षाविदों और आयुर्वेद एवं भारतीय ज्ञान परंपरा के विशेषज्ञों को महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत उपलब्ध हो सकेंगे।


तिगलारी एवं पुरानी कन्नड़ लिपियों में आयुर्वेद पांडुलिपियों के लिप्यंतरण हेतु राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ

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भारत की पारंपरिक ज्ञान-संपदा के संरक्षण के निरंतर प्रयासों के अंतर्गत, तिगलारी और पुरानी कन्नड़ लिपियों में लिखित आयुर्वेद पांडुलिपियों के लिप्यंतरण पर एक क्षमता-विकास कार्यशाला का आज उडुपी स्थित श्री पुत्तिगे नरसिंह सभाभवन, गीता मंदिर में शुभारंभ किया गया।

इस कार्यशाला का संयुक्त आयोजन भारत सरकार के आयुष मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत केंद्रीय आयुर्वेदीय विज्ञान अनुसंधान परिषद (CCRAS) तथा शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय (CSU) द्वारा श्री वादिराज अनुसंधान फाउंडेशन के सहयोग से किया जा रहा है।

यह कार्यक्रम परम पूज्य श्री श्री सुगुणेंद्र तीर्थ श्रीपाद, पीठाधीश्वर, श्री पुत्तिगे मठ, तथा परम पूज्य श्री श्री सुष्रिंद्र तीर्थ श्रीपाद, कनिष्ठ पीठाधीश्वर, श्री पुत्तिगे मठ, के आशीर्वाद से आयोजित किया जा रहा है। इस पहल का उद्देश्य विद्वानों में तिगलारी और पुरानी कन्नड़ लिपियों में संरक्षित आयुर्वेद पांडुलिपियों को पढ़ने, समझने और लिप्यंतरित करने की विशेषज्ञता विकसित करना है। ये पांडुलिपियाँ मुख्यतः कर्नाटक के तटीय क्षेत्रों में पाई जाती हैं।

कार्यशाला का उद्घाटन प्रो. वैद्य रबिनारायण आचार्य, महानिदेशक, CCRAS द्वारा किया गया। उद्घाटन समारोह में श्री नागराज आचार्य, प्रशासक एवं दीवान, श्री पुत्तिगे मठ; डॉ. जी. पी. प्रसाद, सहायक निदेशक, राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा विरासत संस्थान (NIIMH), हैदराबाद; डॉ. टी. महेश्वर, सहायक निदेशक, केंद्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान (CARI), बेंगलुरु; तथा डॉ. सुधीर राज के., निदेशक, भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) केंद्र, निट्टे विश्वविद्यालय, उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समन्वयन विद्वान गोपालाचार्य, निदेशक, श्री वादिराज अनुसंधान फाउंडेशन द्वारा किया गया।

सभा को संबोधित करते हुए प्रो. वैद्य रबिनारायण आचार्य ने आयुर्वेद ज्ञान के संरक्षण, दस्तावेजीकरण और प्रसार के लिए CCRAS द्वारा संचालित विभिन्न पहलों की जानकारी दी। उन्होंने ज्ञान भारतम् मिशन के अंतर्गत भारत सरकार द्वारा देश की समृद्ध ज्ञान परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए किए जा रहे प्रयासों पर भी प्रकाश डाला।

इस अवसर पर डॉ. सुधीर राज के. ने भारत की पांडुलिपि विरासत के संरक्षण के महत्व को रेखांकित करते हुए अनुसंधान और ज्ञान-वितरण को सुदृढ़ करने में भारतीय ज्ञान प्रणालियों की भूमिका पर बल दिया।

यह 15-दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयुर्वेद और संस्कृत पृष्ठभूमि के युवा विद्वानों को विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में अप्रकाशित आयुर्वेद पांडुलिपियों के पाठ-वाचन, लिप्यंतरण, संपादन तथा प्रकाशन-पूर्व तैयारी का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान करेगा।

CCRAS और केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित यह तीसरी कार्यशाला है। इससे पूर्व ओडिशा के पुरी में करणी/देवनागरी लिपियों पर तथा केरल के गुरुवायूर में वट्टेजुत्तु/मलयालम लिपियों पर केंद्रित कार्यशालाओं का आयोजन किया जा चुका है।

इस कार्यशाला में श्री धर्मस्थल मंजुनाथेश्वर आयुर्वेद महाविद्यालय, उडुपी, श्री धर्मस्थल मंजुनाथेश्वर आयुर्वेद महाविद्यालय, हासन, तथा श्री पुत्तिगे मठ के गुरुकुल के संस्कृत विद्यार्थियों और संकाय सदस्यों की सक्रिय भागीदारी है।

कार्यक्रम के दौरान तैयार की गई लिप्यंतरित पांडुलिपियों को बाद में CCRAS और केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित किया जाएगा, जिससे भारत की पारंपरिक ज्ञान-संपदा के संरक्षण और व्यापक प्रसार को और अधिक बल मिलेगा।

आयुर्वेदिक विरासत के संरक्षण की दिशा में ऐतिहासिक कदम: सीसीआरएएस और बेरहामपुर विश्वविद्यालय के बीच एमओयू

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भुवनेश्वर- भारत की प्राचीन चिकित्सा विरासत को संरक्षित और प्रचारित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (CCRAS), आयुष मंत्रालय और बेरहामपुर विश्वविद्यालय, ओडिशा के बीच एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए जाएंगे। इस समझौते के तहत दक्षिण ओडिशा सांस्कृतिक अध्ययन केंद्र (SOCSC) में संरक्षित दुर्लभ आयुर्वेदिक पांडुलिपियों और ताड़पत्र दस्तावेजों का डिजिटलीकरण, वर्गीकरण और प्रकाशन किया जाएगा।

यह एमओयू हस्ताक्षर समारोह केंद्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान (CARI), भुवनेश्वर में आयोजित किया जाएगा। इस अवसर पर बेरहामपुर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. गीतांजलि दास, सीसीआरएएस के महानिदेशक प्रो. (वैद्य) रबी नारायण आचार्य, तथा राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा पद्धति परिषद (NCISM) के पूर्व अध्यक्ष प्रो. बी.एस. प्रसाद की गरिमामयी उपस्थिति रहेगी। इस सहयोग का नेतृत्व राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा विरासत संस्थान (NIIMH), हैदराबाद, जो कि सीसीआरएएस की एक परिधीय इकाई है, द्वारा किया जाएगा।

प्राचीन ज्ञान और आधुनिक तकनीक का संगम

बेरहामपुर विश्वविद्यालय के पास 2,000 से अधिक ताड़पत्र पांडुलिपियों का एक समृद्ध संग्रह है, जिनमें से अधिकांश में अमूल्य आयुर्वेदिक ज्ञान निहित है, जो अब तक अप्रकाशित और शोध समुदाय के लिए अप्राप्य रहा है। इस साझेदारी के माध्यम से इन नाज़ुक पांडुलिपियों को आधुनिक डिजिटलीकरण तकनीकों के ज़रिये संरक्षित किया जाएगा।

सहयोग की प्रमुख विशेषताएँ:

  • व्यापक डिजिटलीकरण: दुर्लभ आयुर्वेदिक पुस्तकों, पत्रिकाओं और पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण कर उनकी डिजिटल प्रतियां विश्वविद्यालय को उपलब्ध कराई जाएंगी।

  • वर्णनात्मक सूचीकरण: “SOCSC-बेरहामपुर विश्वविद्यालय, ओडिशा की आयुर्वेद पांडुलिपियों की वर्णनात्मक सूची” नामक विस्तृत कैटलॉग तैयार किया जाएगा, जिसमें शोधकर्ताओं के लिए 44 विशिष्ट डेटा फ़ील्ड शामिल होंगे।

  • वैश्विक पहुँच: यह कैटलॉग AMAR पोर्टल पर होस्ट किया जाएगा, जिससे विश्वभर के शोधकर्ता इन पांडुलिपियों के मेटाडेटा तक पहुँच सकेंगे।

  • अनुसंधान एवं प्रकाशन: चयनित पांडुलिपियों का लिप्यंतरण, लिप्यांतरण (ट्रांसलिटरेशन) और आधुनिक भाषाओं में अनुवाद कर प्राचीन ज्ञान को समकालीन चिकित्सा विमर्श से जोड़ा जाएगा।

संस्थागत प्रतिबद्धता

सीसीआरएएस के महानिदेशक प्रो. (वैद्य) रबी नारायण आचार्य ने कहा कि यह पहल भारत की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों के दस्तावेजीकरण और वैज्ञानिक मान्यता के लिए एक राष्ट्रीय मिशन का हिस्सा है। वहीं, बेरहामपुर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. गीतांजलि दास ने कहा कि यह सहयोग न केवल पांडुलिपियों की भौतिक सुरक्षा सुनिश्चित करेगा, बल्कि विश्वविद्यालय को वैश्विक सांस्कृतिक और चिकित्सा विरासत अध्ययन केंद्र के रूप में भी स्थापित करेगा।

परियोजना अवधि और नैतिक प्रावधान

यह समझौता प्रारंभिक रूप से दो वर्षों के लिए प्रभावी रहेगा। दोनों संस्थानों ने गोपनीयता और बौद्धिक संपदा अधिकारों का पूर्ण पालन करने की प्रतिबद्धता जताई है। पांडुलिपियों का स्वामित्व बेरहामपुर विश्वविद्यालय के पास ही रहेगा, जबकि उनके ज्ञान को जिम्मेदारी के साथ सार्वजनिक किया जाएगा।

इस कार्यक्रम का समन्वय डॉ. एम.एम. राव (निदेशक, CARI भुवनेश्वर), डॉ. शारदा ओटा (सहायक निदेशक, आयु., CARI भुवनेश्वर) और डॉ. संतोष माने (अनुसंधान अधिकारी, NIIMH हैदराबाद) द्वारा किया जा रहा है। समारोह में CARI भुवनेश्वर के अधिकारी एवं कर्मचारी तथा बेरहामपुर विश्वविद्यालय के गणमान्य अधिकारी और अतिथि उपस्थित रहेंगे।


सीसीआरएएस का आयुष में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर इंटर्नशिप कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न

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नई दिल्ली- आयुष मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत कार्यरत केन्द्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (CCRAS) ने आयुष में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) विषय पर आयोजित अपने इंटर्नशिप कार्यक्रम का सफलतापूर्वक समापन 30 जनवरी को किया। यह कार्यक्रम 15 दिसंबर से प्रारंभ हुआ था, जिसका उद्देश्य आयुष अनुसंधान में सूचना प्रौद्योगिकी और डेटा-आधारित दृष्टिकोण को सशक्त बनाना था।

इंटर्नशिप कार्यक्रम के लिए कुल 180 आवेदन प्राप्त हुए, जिनमें से एक सुव्यवस्थित चयन प्रक्रिया के माध्यम से 33 छात्रों का चयन किया गया। चयनित इंटर्न मुख्य रूप से नई दिल्ली और आसपास के इंजीनियरिंग संस्थानों से थे। कार्यक्रम को आयुष प्रणालियों से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में AI के व्यावहारिक अनुप्रयोगों का अनुभव प्रदान करने के उद्देश्य से डिजाइन किया गया था।

इंटर्नशिप के दौरान प्रतिभागियों ने औषधीय पादप अनुसंधान, बायोइन्फॉर्मेटिक्स, प्रकृति मूल्यांकन, मेडिकल इमेजिंग, पोस्टर डिटेक्शन तथा पांडुलिपियों के ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकग्निशन (OCR) जैसे विषयों पर AI आधारित परियोजनाओं पर कार्य किया। ये परियोजनाएं पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों के डिजिटल प्रलेखन, साक्ष्य सृजन और प्रौद्योगिकी आधारित प्रमाणीकरण के CCRAS के व्यापक उद्देश्यों के अनुरूप थीं।

कार्यक्रम के दौरान एक इंटरएक्टिव और अंतर्विषयक सीखने का वातावरण प्रदान किया गया, जिससे इंटर्न आधुनिक संगणकीय उपकरणों के साथ पारंपरिक आयुष अवधारणाओं को एकीकृत कर सके। विषय विशेषज्ञों द्वारा दिए गए मार्गदर्शन ने प्रतिभागियों में नवाचार, आलोचनात्मक सोच और व्यावहारिक समस्या समाधान की क्षमता को बढ़ावा दिया।

यह इंटर्नशिप कार्यक्रम CCRAS की क्षमता निर्माण, नवाचार और संस्थागत सुदृढ़ीकरण के प्रति निरंतर प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह पहल आयुष अनुसंधान एवं विकास में उन्नत प्रौद्योगिकियों के उपयोग को बढ़ावा देकर एक मजबूत अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण में सहायक होगी।

कार्यक्रम का समन्वय डॉ. राकेश नारायण वी., अधिकारी-प्रभारी (आईटी) के नेतृत्व में नमन् गोयल,  साहिल, डॉ. गगनदीप एवं CCRAS मुख्यालय के आईटी सेल के अन्य तकनीकी अधिकारियों द्वारा किया गया।

समापन सत्र को प्रो. रवी नारायण आचार्य, महानिदेशक (DG), CCRAS ने संबोधित किया। इस अवसर पर डॉ. एन. श्रीकांत, उप महानिदेशक (DDG), CCRAS, परिषद के वरिष्ठ अधिकारी एवं अनुसंधान अधिकारी उपस्थित रहे। गणमान्य अतिथियों ने इंटर्न्स के प्रयासों की सराहना करते हुए आयुष प्रणालियों में उभरती प्रौद्योगिकियों की बढ़ती भूमिका पर बल दिया।

प्रो. आचार्य ने आयुष क्षेत्र को आगे बढ़ाने में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के रणनीतिक महत्व को रेखांकित किया और बताया कि इंटर्नशिप के दौरान विकसित अनुप्रयोगों को संरचित परियोजना मोड में सत्यापन और विस्तार के लिए आगे बढ़ाया जाना चाहिए।


सीसीआरएएस का अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन: मोटापा व मेटाबॉलिक सिंड्रोम पर आयुर्वेद और एकीकृत चिकित्सा के नए आयाम

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आयुष मंत्रालय के अंतर्गत सेंटरल काउंसिल फॉर रिसर्च इन आयुर्वेदिक साइंसेज़ (CCRAS) तथा सेंट्रल आयुर्वेद रिसर्च इंस्टीट्यूट (CARI), बेंगलुरु की ओर से 1–2 दिसंबर 2025 को बेंगलुरु के आईआईएससी (IISc) स्थित A.V. रामाराव ऑडिटोरियम में “आयुर्वेद एवं मोटापा व मेटाबॉलिक सिंड्रोम के एकीकृत दृष्टिकोण” पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है। यह आयोजन सीसीआरएएस के 57वें स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में किया जा रहा है।

यह सम्मेलन IISc और NIMHANS के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य मोटापा और मेटाबॉलिक सिंड्रोम जैसी वैश्विक स्वास्थ्य चुनौतियों का समाधान आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा के प्रमाण-आधारित एकीकृत दृष्टिकोणों से खोजना है। यह आयुष मंत्रालय की शोध-आधारित एकीकृत स्वास्थ्य सेवा को सुदृढ़ बनाने की सोच को प्रतिबिंबित करता है।

प्रमुख वक्ताओं के विचार

आयुष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) एवं स्वास्थ्य राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने कहा:

“भारत एकीकृत स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत कर रहा है, और इस परिवर्तन में आयुर्वेद केंद्रीय भूमिका निभा रहा है। मोटापा और मेटाबॉलिक विकार आज की सबसे गंभीर स्वास्थ्य चुनौतियों में से हैं। यह सम्मेलन आयुर्वेद के ज्ञान और आधुनिक विज्ञान को जोड़कर प्रमाण-आधारित चिकित्सा को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।”

आयुष मंत्रालय के सचिव ने कहा:

“मेटाबॉलिक रोगों के बढ़ते बोझ के लिए विज्ञान-आधारित सहयोगात्मक समाधान आवश्यक हैं। आयुर्वेद की समग्र, निवारक और व्यक्तिगत उपचार पद्धति आधुनिक बायोमेडिकल प्रगति के साथ मिलकर और प्रभावी बन जाती है। यह सम्मेलन भविष्य की स्वास्थ्य नीतियों और क्लिनिकल शोध को दिशा देगा।”

सीसीआरएएस के महानिदेशक डॉ. रबीनारायण आचार्य ने बताया:

“मेटाबॉलिक रोगों की बढ़ती चुनौती के बीच आयुर्वेद शक्तिशाली और व्यावहारिक समाधान प्रदान करता है। यह सम्मेलन पारंपरिक आयुर्वेदिक ज्ञान और अत्याधुनिक बायोमेडिकल अनुसंधान को एक सेतु पर लाने का प्रयास है, जिससे वैश्विक स्वास्थ्य नीति पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।”

सम्मेलन की आयोजक सचिव डॉ. सुचोलचन भट्ट ने कहा:

“सम्मेलन का उद्देश्य आयुर्वेद और आधुनिक जैव-चिकित्सा विज्ञान के शीर्ष विशेषज्ञों को एक मंच पर लाकर मोटापा और मेटाबॉलिक विकारों की चुनौती का साक्ष्य-आधारित समाधान प्रस्तुत करना है। इस अवसर पर JDRAS के मोटापा एवं मेटाबॉलिक विकारों पर विशेषांक तथा 10 अन्य पुस्तकों का विमोचन भी किया जाएगा।”

सम्मेलन की प्रमुख गतिविधियाँ

  • प्लेनरी सत्र, समानांतर वैज्ञानिक सत्र और ट्रांसलेशनल साइंस एवं टाइप-2 डायबिटीज़, मोटापा और डिसलिपिडेमिया के एकीकृत प्रबंधन पर संगोष्ठी।

  • 2 दिसंबर को IISc के TCS Smart-X Hub में नैनोटेक्नोलॉजी एवं मॉलिक्युलर बायोलॉजी पर विशेष कार्यशाला।

  • सामत्वम्, पाथशोध और CARI द्वारा स्वास्थ्य जांच शिविर (दोनों दिन)।

  • 25–27 नवंबर 2025 को प्री-कॉन्फ्रेंस वर्चुअल वैज्ञानिक सत्र सम्पन्न।

प्रतिभागिता

इस सम्मेलन में 700 से अधिक प्रतिभागियों के शामिल होने की उम्मीद है, जिनमें:

  • 267 मौखिक प्रस्तुतियाँ

  • 120 वर्चुअल पेपर

  • 70 पोस्टर

  • 16 की-नोट व प्लेनरी व्याख्यान

समग्र उद्देश्य

यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन एकीकृत शोध को बढ़ावा देने, वैश्विक सहयोग मजबूत करने, तथा आयुष आधारित नवाचार को सशक्त करने की दिशा में सीसीआरएएस की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह भारत की समग्र, सुलभ और साक्ष्य-आधारित स्वास्थ्य सेवा की दृष्टि को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।


आयुर्वेद नवाचार को नई दिशा: सिद्धि 2.0 राष्ट्रीय सम्मेलन शुरू

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आयुष मंत्रालय के अंतर्गत केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (CCRAS) ने आज विजयवाड़ा में अपने प्रमुख उद्योग–अनुसंधान इंटरफ़ेस कार्यक्रम सिद्धि 2.0 (Scientific Innovation in Drug Development, Healthcare & Integration) का दूसरा संस्करण लॉन्च किया। यह दो-दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन क्षेत्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान (RARI), विजयवाड़ा द्वारा, भारतीय उद्योग परिसंघ (CII), विजयवाड़ा ज़ोन के सहयोग से आयोजित किया गया है।

कार्यक्रम का शुभारंभ एक औपचारिक उद्घाटन सत्र से हुआ, जिसमें प्रो. वैद्य रबीनारायण आचार्य, महानिदेशक, CCRAS;के. दिनेश कुमार, IAS, निदेशक (आयुष), आंध्र प्रदेश सरकार; डॉ. एन. श्रीकांत, उप महानिदेशक, CCRAS; किरण भूपतिराजू, CEO, Laila Nutra Pvt. Ltd. एवं Chemiloids Life Sciences Pvt. Ltd.; डॉ. वी. नागलक्ष्मी, चेयरपर्सन, CII विजयवाड़ा ज़ोन; और डॉ. बी. वेंकटेश्वरलु, सहायक निदेशक (I/c), RARI विजयवाड़ा शामिल थे।

उद्घाटन समारोह में CCRAS ने अपनी औषधि-ऐतिहासिक पुस्तक “Evolution of Ayurveda, Siddha & Unani Drug Regulations in India” तथा Drug Inventory Management System पोर्टल जारी किया। यह सम्मेलन आयुर्वेद के वैज्ञानिक, औद्योगिक और वाणिज्यिक पारिस्थितिकी तंत्र को आगे बढ़ाने के लिए एक प्रमुख राष्ट्रीय मंच के रूप में स्थापित किया गया है।

PRAGATI-2024 (Pharma Research in Ayurgan and Techno-Innovation) की गति को आगे बढ़ाते हुए, सिद्धि 2.0 अनुसंधान-आधारित उत्पाद विकास, स्वदेशी प्रौद्योगिकी उन्नति, तेज़ ट्रांसलेशनल पाथवे और उद्योग साझेदारी की दिशा में एक रणनीतिक कदम है—जो भारत के उभरते हुए आयुष नवाचार एजेंडे के प्रमुख तत्व हैं।


इस अवसर पर बोलते हुए CCRAS के महानिदेशक प्रो. रबीनारायण आचार्य ने बताया कि जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ बढ़ रही हैं और आयुर्वेद का वेलनेस-केंद्रित दृष्टिकोण आज और भी प्रासंगिक है। उन्होंने CII की इस भूमिका की सराहना की कि उसके सहयोग से CCRAS और औषधि उद्योग के बीच सीधे संवाद संभव हो रहे हैं। SPARK, SMART, PDF फेलोशिप और शोध-कार्यक्रमों जैसे CCRAS के विभिन्न उपक्रमों का उल्लेख करते हुए उन्होंने सहयोगात्मक अनुसंधान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई और उद्योग सहभागियों को आश्वासन दिया कि संयुक्त कार्य से उत्पन्न IPR को समान रूप से साझा किया जाएगा।

के. दिनेश कुमार, IAS, निदेशक (आयुष), आंध्र प्रदेश सरकार, ने बताया कि राज्य में आयुर्वेद कॉलेजों और औषधि निर्माण इकाइयों की संख्या अभी भी सीमित है। उन्होंने राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान की स्थापना का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि सिद्धि 2.0 सभी प्रमुख हितधारकों को एक मंच पर लाता है और यह भी जोड़ा कि आधुनिक विज्ञान ने जीवनकाल बढ़ाया है, जबकि आयुर्वेद स्वस्थ जीवनकाल सुनिश्चित कर सकता है।

उप महानिदेशक डॉ. एन. श्रीकांत ने बताया कि परिषद ने 150 से अधिक आयुर्वेदिक औषधीय फ़ॉर्मूलेशन, जिनमें हर्बो-मिनरल तैयारियाँ भी शामिल हैं, का सत्यापन किया है। उन्होंने उद्योग को CCRAS के व्यापक डेटा—गुणवत्ता, सुरक्षा और विषाक्तता अध्ययनों—का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया और संगठन की उद्योग-अनुकूल अनुसंधान नीति, जिसमें IPR साझा करने का प्रावधान है, का उल्लेख किया। उन्होंने आयुर्वेद-आधारित, AI-संचालित और प्रौद्योगिकी-सक्षम स्टार्टअप्स को मिल रहे CCRAS समर्थन को भी रेखांकित किया।

उद्योग परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करते हुए किरण भूपतिराजू (CEO, Laila Nutra Pvt. Ltd. एवं Chemiloids Life Sciences Pvt. Ltd.) ने वैश्विक बाज़ार में मजबूती के लिए आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों और फ़ॉर्मूलेशन के आधुनिकीकरण की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।

CII विजयवाड़ा ज़ोन की चेयरपर्सन डॉ. वी. नागलक्ष्मी ने कहा कि आयुर्वेद की पूरी क्षमता अभी सामने आना बाकी है। उन्होंने अनुसंधान, शिक्षा, निर्माण और उद्योग विकास के समन्वय के महत्व को रेखांकित किया और कहा कि बढ़ी हुई शोध गतिविधि उद्योग के विकास और रोज़गार के बड़े अवसरों को जन्म देगी।

कार्यक्रम में CCRAS विशेषज्ञों तथा Himalaya Wellness Company जैसी प्रमुख संस्थाओं के प्रतिनिधियों द्वारा तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। CCRAS वैज्ञानिकों ने अपनी सुविधाओं, प्रमुख शोध-परिणामों, विकसित उत्पादों एवं प्रौद्योगिकियों तथा विभिन्न स्तरों पर विकसित हो रहे फ़ॉर्मूलेशन प्रस्तुत किए। साथ ही, उद्योगों के साथ सहयोग के संभावित क्षेत्रों पर भी चर्चा की गई। पहले दिन फार्मास्यूटिकल क्षेत्र के विविध हितधारकों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली, जो आयुर्वेद क्षेत्र में सबूत-आधारित विकास को तेज़ करने की दिशा में उपयोगी रही।

सिद्धि 2.0 में दक्षिण भारत की 25 से अधिक प्रमुख आयुर्वेदिक फार्मास्यूटिकल कंपनियों—जैसे कि Himalaya Wellness Company, Oushadhi, IMPCOPS, Laila Nutra Pvt. Ltd., और Imis Pharmaceuticals—के प्रतिनिधियों सहित 100 से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। इसके अलावा शोधकर्ता, चिकित्सक, शिक्षाविद, राज्य आयुष अधिकारी और डॉ. NRS आयुर्वेदिक कॉलेज, विजयवाड़ा के स्नातकोत्तर छात्र भी उपस्थित रहे।

एक राष्ट्रीय ट्रांसलेशनल एक्सेलेरेटर के रूप में परिकल्पित, सिद्धि 2.0 का उद्देश्य CCRAS तकनीकों को उद्योग में व्यापक अपनाने को बढ़ावा देना, संस्थागत संबंधों को मजबूत करना, गुणवत्ता और नियामक ढाँचे को उन्नत करना और वैश्विक प्रतिस्पर्धी आयुर्वेदिक औषधि उद्योग के विकास का समर्थन करना है। वैज्ञानिक नवाचार और उद्योग सहयोग को एक साथ आगे बढ़ाते हुए, सिद्धि 2.0 आयुर्वेद के लिए एक आधुनिक, साक्ष्य-आधारित और विस्तार योग्य भविष्य की नींव रखता है, जो भारत की समग्र स्वास्थ्य दृष्टि के अनुरूप है।


रजोनिवृत्ति देखभाल में एकीकृत स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ावा: सफदरजंग अस्पताल और सीएआरआई के बीच एमओयू हस्ताक्षर

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महिलाओं के लिए एकीकृत स्वास्थ्य सेवाओं को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज (VMMC) और सफदरजंग अस्पताल ने आज केन्द्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान (CARI), जो केन्द्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (CCRAS), आयुष मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करता है, के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए। इस सहयोग का उद्देश्य रजोनिवृत्ति (Menopause) देखभाल में सुधार के लिए वैज्ञानिक और प्रमाण-आधारित आयुर्वेद अनुसंधान को बढ़ावा देना है।

रजोनिवृत्ति से गुजर रहीं महिलाओं में सामान्यतः गर्माहट के दौरे (Hot Flushes), अनिद्रा, थकान, योनि शुष्कता, मूड में उतार-चढ़ाव, चिंता और स्मरण शक्ति संबंधी समस्याएँ देखी जाती हैं। सुरक्षित और सहयोगी उपचार विकल्पों में बढ़ती रुचि के चलते कई महिलाएँ समग्र (Holistic) चिकित्सा पद्धतियों, विशेषकर आयुर्वेद, की ओर रुख कर रही हैं। यह MoU पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक चिकित्सा को एकीकृत करने वाले प्रमाणित प्रोटोकॉल विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

समारोह के दौरान VMMC एवं सफदरजंग अस्पताल के निदेशक डॉ. संदीप बंसल ने कहा कि आयुर्वेद आधारित उपचार, जब एलोपैथिक तरीकों के साथ सावधानीपूर्वक उपयोग किए जाते हैं, तो रजोनिवृत्ति से गुजर रही महिलाओं के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो सकते हैं। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि धातु युक्त आयुर्वेदिक दवाइयों का सेवन केवल विशेषज्ञ की निगरानी में ही किया जाना चाहिए, ताकि उनकी सुरक्षा और प्रभाव सुनिश्चित हो सके।

CARI के प्रभारी डॉ. हेमंता पाणिग्रही ने बताया कि CCRAS आयुर्वेद के वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए दशकों से कार्यरत है। उन्होंने बताया कि सफदरजंग अस्पताल में आयुर्वेद इकाई वर्ष 1996 से सक्रिय है और मरीजों की देखभाल तथा सहयोगात्मक अनुसंधान में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। उन्होंने कहा, “प्रमाण-आधारित आयुर्वेद को वैश्विक स्वीकृति मिल रही है, और यह साझेदारी एकीकृत अनुसंधान पद्धतियों को और मजबूत करेगी तथा जनसामान्य की स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार लाएगी।”

यह सहयोग रजोनिवृत्ति देखभाल को बेहतर बनाने हेतु वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित, सुरक्षित और प्रभावी आयुर्वेदिक हस्तक्षेप विकसित करने पर केंद्रित है, ताकि आधुनिक चिकित्सा को पूरक समर्थन मिल सके। इस पहल से मरीजों के परिणामों में सुधार, अनुसंधान क्षमता में वृद्धि और समग्र स्वास्थ्य सेवाओं तक व्यापक पहुंच सुनिश्चित होने की उम्मीद है।

कार्यक्रम के दौरान प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर डॉ. शिवशंकर राजपूत और प्रो. उपमा सक्सेना ने परियोजना के विवरण प्रस्तुत किए। इस अवसर पर डॉ. चारु बाम्बा (मेडिकल सुपरिटेंडेंट), डॉ. श्वेता माता और डॉ. असीमा जैन भी उपस्थित रहीं।

यह MoU VMMC–सफदरजंग अस्पताल और आयुष मंत्रालय की ओर से सहयोगात्मक, मरीज-केंद्रित स्वास्थ्य सेवाओं को आगे बढ़ाने और महिलाओं के स्वास्थ्य के क्षेत्र में एकीकृत अनुसंधान के नए मानक स्थापित करने की साझा प्रतिबद्धता को दर्शाता है।


“आयुर्वेद के माध्यम से यकृत-पित्तीय स्वास्थ्य: पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का समन्वय” — भुवनेश्वर में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

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साक्ष्य-आधारित पारंपरिक चिकित्सा को आगे बढ़ाने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए आयुष मंत्रालय अपने अनुसंधान संगठन केंद्रीय आयुर्वेद विज्ञान अनुसंधान परिषद (CCRAS) और उसके केंद्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान (CARI), भुवनेश्वर, के माध्यम से, भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) और उसके क्षेत्रीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान केंद्र (RMRC), भुवनेश्वर के सहयोग से, “आयुर्वेद के माध्यम से यकृत-पित्तीय स्वास्थ्य : पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का समन्वय” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन 25 से 26 अक्टूबर 2025 तक भुवनेश्वर में करने जा रहा है।

इस संगोष्ठी का विषय “यकृत सुरक्षा, जीवित रक्षा” (Yakrut Suraksha, Jiveeta Raksha) है, जो यकृत और पित्तीय स्वास्थ्य के क्षेत्र में आयुर्वेद और आधुनिक जैव-चिकित्सा विज्ञान के बीच सहयोगात्मक अनुसंधान को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।

सीसीआरएएस के महानिदेशक प्रो. रबिनारायण आचार्य ने कहा कि “आयुर्वेदिक विज्ञान यकृत-पित्तीय स्वास्थ्य के लिए एक समग्र दृष्टिकोण प्रदान करता है, जो रोकथाम, संतुलन और सतत स्वास्थ्य सेवा पर बल देता है। सहयोगात्मक अनुसंधान के माध्यम से हम आयुर्वेद के सिद्धांतों और औषधियों को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित कर रहे हैं। इस तरह के प्रयास न केवल आयुर्वेद की वैश्विक विश्वसनीयता को मजबूत करते हैं, बल्कि साक्ष्य-आधारित समाधानों के लिए नए मार्ग भी खोलते हैं।”

आईसीएमआर की अतिरिक्त महानिदेशक और आरएमआरसी भुवनेश्वर की निदेशक डॉ. संगमित्रा पाटी ने कहा कि “यकृत-पित्तीय विकार जटिल स्वास्थ्य चुनौतियाँ हैं, जिनके समाधान के लिए अंतःविषय अनुसंधान आवश्यक है। आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के बीच सहयोग रोगों की बेहतर समझ, सुरक्षित उपचार और रोगी देखभाल के नए अवसर प्रदान करता है।”

दो दिवसीय इस संगोष्ठी में पाँच प्रमुख विषयों पर चर्चा होगी, जिसमें यकृत-पित्तीय स्वास्थ्य पर सहयोगात्मक अनुसंधान को बढ़ावा देने पर विशेष बल रहेगा।

  • पहले दिन आयुर्वेदिक आहार, दिनचर्या, ऋतुचर्या, पंचकर्म और डिटॉक्सिफिकेशन थैरेपी जैसे समग्र निवारक और उपचारात्मक दृष्टिकोणों पर विचार-विमर्श होगा। साथ ही NAFLD, हेपेटाइटिस और लिवर सिरोसिस के रोग-विशिष्ट प्रबंधन पर भी सत्र आयोजित किए जाएंगे।

  • दूसरे दिन वैज्ञानिक साक्ष्यों पर आधारित एकीकृत दृष्टिकोण, औषधीय अनुसंधान, और आधुनिक अस्पताल प्रणालियों के साथ आयुर्वेद के समन्वय पर चर्चा होगी।

संगोष्ठी में 58 वैज्ञानिक प्रस्तुतियाँ (22 मौखिक और 36 पोस्टर) शामिल होंगी, जिनमें नैदानिक परिणाम और अनुसंधान के व्यावहारिक पहलुओं को रेखांकित किया जाएगा।

कार्यक्रम में एक विशेष सत्र “हेपेटोबिलियरी विकारों में जनजातीय चिकित्सा” पर भी आयोजित किया जाएगा, जिसमें ओडिशा के विभिन्न हिस्सों से आए 20 जनजातीय वैद्य पारंपरिक उपचार पद्धतियाँ साझा करेंगे।

यह सहयोगात्मक पहल सीसीआरएएस और आईसीएमआर के बीच अंतःविषय अनुसंधान और साक्ष्य-आधारित परिणामों को बढ़ावा देने की दिशा में आयुष मंत्रालय की वैज्ञानिक प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है।

आयुष मंत्रालय के अधीन सीसीआरएएस द्वारा लिवर स्वास्थ्य के लिए विभिन्न आयुर्वेदिक औषधियों पर वैज्ञानिक अनुसंधान किया जा रहा है, जैसे पिक्रोराइज़ा कुरोआ (कुटकी) और आयुष-PTK पर पूर्व-नैदानिक अध्ययन, जो यकृत-संरक्षण में प्रभावी पाए गए हैं। सीएसआईआर-सीडीआरआई लखनऊ के साथ संयुक्त अनुसंधान एटीटी-प्रेरित यकृत विषाक्तता पर भी केंद्रित है। इसके अतिरिक्त, आयोग्यवर्धिनी वटी और पिप्पल्यासव पर बहुकेन्द्रित नैदानिक अध्ययन ने MASLD के प्रबंधन में आशाजनक परिणाम दिए हैं।

संगोष्ठी में देश के प्रमुख विशेषज्ञ और वैज्ञानिक शामिल होंगे, जिनमें एआईआईएमएस भुवनेश्वर के कार्यकारी निदेशक एवं सीईओ प्रो. (डॉ.) अशुतोष बिस्वास, केआईआईएमएस भुवनेश्वर के प्रो-चांसलर प्रो. सुब्रत कुमार आचार्य, फोर्टिस एस्कॉर्ट्स नई दिल्ली के कार्यकारी निदेशक, तथा सीएआरआई भुवनेश्वर की प्रभारी सहायक निदेशक डॉ. सरदा ओटा शामिल हैं।

यह संगोष्ठी आयुर्वेद के माध्यम से यकृत-पित्तीय स्वास्थ्य पर वैज्ञानिक विमर्श को नई दिशा देगी और पारंपरिक चिकित्सा व आधुनिक विज्ञान के समन्वय से भारत को वैश्विक स्तर पर पारंपरिक चिकित्सा अनुसंधान के क्षेत्र में अग्रणी बनाने में मदद करेगी।

आर्कटिक सर्कल असेंबली 2025 में भारत की सक्रिय भागीदारी: प्रो. (वैद्य) रबिनारायण आचार्य ने आर्कटिक में आयुष की संभावनाओं पर किया जोर

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भारतीय प्रतिनिधिमंडल के हिस्से के रूप में, प्रो. (वैद्य) रबिनारायण आचार्य, महानिदेशक, केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (CCRAS), तथा डॉ. श्रीनिवास राव चिंता, संयुक्त सलाहकार (होम्योपैथी), आयुष मंत्रालय, ने आइसलैंड की राजधानी रेक्जाविक में आयोजित 2025 आर्कटिक सर्कल असेंबली में भाग लिया।

“द रोल एंड इम्पॉर्टेंस ऑफ द ग्लोबल साउथ इन द आर्कटिक” शीर्षक वाले पूर्ण सत्र (प्लेनरी सेशन) के दौरान, प्रो. आचार्य ने भारत की व्यापक आर्कटिक नीति के अंतर्गत आर्कटिक क्षेत्र में उसकी सक्रिय भागीदारी प्रस्तुत की। उन्होंने वैश्विक स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटने में पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों की बढ़ती प्रासंगिकता पर जोर दिया और आर्कटिक जैसे चरम पर्यावरणों में भी स्वास्थ्य और प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में आयुष (AYUSH) पद्धतियों की संभावनाओं को रेखांकित किया।

यह सत्र भारत सरकार द्वारा आयोजित किया गया था और इसमें प्रमुख वक्ताओं के रूप में रियर एडमिरल टी.वी.एन. प्रसन्ना, पोलर कोऑर्डिनेटर, भारत सरकार; मनीष तिवारी, वैज्ञानिक ‘एफ’, राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं महासागरीय अनुसंधान केंद्र (NCPOR); तथा वसीम सईद, स्टीयरिंग कमेटी सदस्य, एमिरेट्स पोलर प्रोग्राम (यूएई) शामिल थे।

प्रो. आचार्य ने पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों और आर्कटिक अनुसंधान के बीच सहयोग को सशक्त करने की एक दूरदर्शी रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने सुझाव दिया कि आर्कटिक क्षेत्रों में अंतरविषयक प्रूफ-ऑफ-कॉन्सेप्ट क्लिनिकल परीक्षण प्रारंभ किए जाएँ, आर्कटिक नीति ढांचे के तहत एक संयुक्त अनुसंधान संघ (कंसोर्टियम) की स्थापना की जाए, तथा क्रॉस-कल्चरल आयुष डिलीवरी और सुरक्षा निगरानी में क्षमता विकास किया जाए। उन्होंने यह भी बल दिया कि पारंपरिक और आधुनिक चिकित्सा के बीच सेतु के रूप में वैज्ञानिक साक्ष्य प्रकाशित करना अत्यंत आवश्यक है और भारत की आर्कटिक कूटनीति में आयुष जागरूकता को समाहित किया जाना चाहिए।

आयुष मंत्रालय के प्रतिनिधिमंडल की यह भागीदारी यह दर्शाती है कि भारत वैश्विक स्थिरता और स्वास्थ्य संवादों में आयुष-आधारित साक्ष्य, नवाचार और कूटनीति को एकीकृत करने के लिए प्रतिबद्ध है। यह सहभागिता भारत की इस भूमिका को पुनः स्थापित करती है कि वह समग्र स्वास्थ्य, वैज्ञानिक सहयोग और जन-से-जन साझेदारी को अपनी आर्कटिक नीति के तहत सक्रिय रूप से बढ़ावा दे रहा है।

आयुष मंत्रालय के CCRAS ने किया SPARK–4.0 (2025–26) का ऐलान: आयुर्वेद के छात्रों में शोध की भावना जगाने की पहल

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केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (CCRAS), आयुष मंत्रालय ने अपने प्रमुख कार्यक्रम “SPARK–4.0 (Studentship Program for Ayurveda Research Ken)” के चौथे संस्करण की घोषणा की है। यह पहल पूरे भारत में स्नातक आयुर्वेद छात्रों में वैज्ञानिक जिज्ञासा और शोध अभिरुचि विकसित करने के उद्देश्य से शुरू की गई है।

इस कार्यक्रम के तहत, राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा प्रणाली आयोग (NCISM) से मान्यता प्राप्त कॉलेजों के 300 बीएएमएस (BAMS) छात्रों को दो महीने की अवधि के लिए ₹50,000 (₹25,000 प्रति माह) की छात्रवृत्ति दी जाएगी। पंजीकरण की प्रक्रिया 15 अक्टूबर 2025 से शुरू होगी और आवेदन की अंतिम तिथि 15 नवंबर 2025 निर्धारित की गई है।

CCRAS के महानिदेशक प्रो. रबी नारायण आचार्य ने बताया कि SPARK कार्यक्रम परिषद की युवाओं के माध्यम से आयुर्वेद को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम अब तक सैकड़ों छात्रों को शोध की दिशा में पहला कदम उठाने के लिए प्रेरित कर चुका है, जो पारंपरिक आयुर्वेदिक ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान से जोड़ने का काम कर रहा है।

अब तक 20 राज्यों के 289 आयुर्वेदिक शैक्षणिक संस्थानों के 591 छात्रों ने SPARK कार्यक्रम से लाभ उठाया है।

SPARK कार्यक्रम एक राष्ट्रीय मंच के रूप में तैयार किया गया है, जो आयुर्वेद में एविडेंस-बेस्ड रिसर्च को प्रोत्साहित करता है। इसके तहत स्नातक छात्र फैकल्टी मेंटर के मार्गदर्शन में लघु अवधि के स्वतंत्र शोध परियोजनाएँ करते हैं, जिससे उन्हें शोध पद्धति, प्रयोगात्मक डिजाइन और डेटा विश्लेषण का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त होता है।

कार्यक्रम का उद्देश्य ऐसे युवा आयुर्वेदिक पेशेवर तैयार करना है जो वैज्ञानिक सोच और शोध-उन्मुख दृष्टिकोण रखते हों। चयनित छात्रों को प्रमाणपत्र भी प्रदान किया जाएगा, जब उनकी अंतिम शोध रिपोर्ट स्वीकृत हो जाएगी।

SPARK–4.0 चक्र आयुष क्षेत्र में शोध की क्षमता बढ़ाने और “Innovation with Heritage” की भावना को आगे बढ़ाने की दिशा में CCRAS की एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि है।


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