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आयुर्वेदिक विरासत के संरक्षण की दिशा में ऐतिहासिक कदम: सीसीआरएएस और बेरहामपुर विश्वविद्यालय के बीच एमओयू

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भुवनेश्वर- भारत की प्राचीन चिकित्सा विरासत को संरक्षित और प्रचारित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (CCRAS), आयुष मंत्रालय और बेरहामपुर विश्वविद्यालय, ओडिशा के बीच एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए जाएंगे। इस समझौते के तहत दक्षिण ओडिशा सांस्कृतिक अध्ययन केंद्र (SOCSC) में संरक्षित दुर्लभ आयुर्वेदिक पांडुलिपियों और ताड़पत्र दस्तावेजों का डिजिटलीकरण, वर्गीकरण और प्रकाशन किया जाएगा।

यह एमओयू हस्ताक्षर समारोह केंद्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान (CARI), भुवनेश्वर में आयोजित किया जाएगा। इस अवसर पर बेरहामपुर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. गीतांजलि दास, सीसीआरएएस के महानिदेशक प्रो. (वैद्य) रबी नारायण आचार्य, तथा राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा पद्धति परिषद (NCISM) के पूर्व अध्यक्ष प्रो. बी.एस. प्रसाद की गरिमामयी उपस्थिति रहेगी। इस सहयोग का नेतृत्व राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा विरासत संस्थान (NIIMH), हैदराबाद, जो कि सीसीआरएएस की एक परिधीय इकाई है, द्वारा किया जाएगा।

प्राचीन ज्ञान और आधुनिक तकनीक का संगम

बेरहामपुर विश्वविद्यालय के पास 2,000 से अधिक ताड़पत्र पांडुलिपियों का एक समृद्ध संग्रह है, जिनमें से अधिकांश में अमूल्य आयुर्वेदिक ज्ञान निहित है, जो अब तक अप्रकाशित और शोध समुदाय के लिए अप्राप्य रहा है। इस साझेदारी के माध्यम से इन नाज़ुक पांडुलिपियों को आधुनिक डिजिटलीकरण तकनीकों के ज़रिये संरक्षित किया जाएगा।

सहयोग की प्रमुख विशेषताएँ:

  • व्यापक डिजिटलीकरण: दुर्लभ आयुर्वेदिक पुस्तकों, पत्रिकाओं और पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण कर उनकी डिजिटल प्रतियां विश्वविद्यालय को उपलब्ध कराई जाएंगी।

  • वर्णनात्मक सूचीकरण: “SOCSC-बेरहामपुर विश्वविद्यालय, ओडिशा की आयुर्वेद पांडुलिपियों की वर्णनात्मक सूची” नामक विस्तृत कैटलॉग तैयार किया जाएगा, जिसमें शोधकर्ताओं के लिए 44 विशिष्ट डेटा फ़ील्ड शामिल होंगे।

  • वैश्विक पहुँच: यह कैटलॉग AMAR पोर्टल पर होस्ट किया जाएगा, जिससे विश्वभर के शोधकर्ता इन पांडुलिपियों के मेटाडेटा तक पहुँच सकेंगे।

  • अनुसंधान एवं प्रकाशन: चयनित पांडुलिपियों का लिप्यंतरण, लिप्यांतरण (ट्रांसलिटरेशन) और आधुनिक भाषाओं में अनुवाद कर प्राचीन ज्ञान को समकालीन चिकित्सा विमर्श से जोड़ा जाएगा।

संस्थागत प्रतिबद्धता

सीसीआरएएस के महानिदेशक प्रो. (वैद्य) रबी नारायण आचार्य ने कहा कि यह पहल भारत की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों के दस्तावेजीकरण और वैज्ञानिक मान्यता के लिए एक राष्ट्रीय मिशन का हिस्सा है। वहीं, बेरहामपुर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. गीतांजलि दास ने कहा कि यह सहयोग न केवल पांडुलिपियों की भौतिक सुरक्षा सुनिश्चित करेगा, बल्कि विश्वविद्यालय को वैश्विक सांस्कृतिक और चिकित्सा विरासत अध्ययन केंद्र के रूप में भी स्थापित करेगा।

परियोजना अवधि और नैतिक प्रावधान

यह समझौता प्रारंभिक रूप से दो वर्षों के लिए प्रभावी रहेगा। दोनों संस्थानों ने गोपनीयता और बौद्धिक संपदा अधिकारों का पूर्ण पालन करने की प्रतिबद्धता जताई है। पांडुलिपियों का स्वामित्व बेरहामपुर विश्वविद्यालय के पास ही रहेगा, जबकि उनके ज्ञान को जिम्मेदारी के साथ सार्वजनिक किया जाएगा।

इस कार्यक्रम का समन्वय डॉ. एम.एम. राव (निदेशक, CARI भुवनेश्वर), डॉ. शारदा ओटा (सहायक निदेशक, आयु., CARI भुवनेश्वर) और डॉ. संतोष माने (अनुसंधान अधिकारी, NIIMH हैदराबाद) द्वारा किया जा रहा है। समारोह में CARI भुवनेश्वर के अधिकारी एवं कर्मचारी तथा बेरहामपुर विश्वविद्यालय के गणमान्य अधिकारी और अतिथि उपस्थित रहेंगे।


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