Media24Media.com: तिगलारी एवं पुरानी कन्नड़ लिपियों में आयुर्वेद पांडुलिपियों के लिप्यंतरण हेतु राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ

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तिगलारी एवं पुरानी कन्नड़ लिपियों में आयुर्वेद पांडुलिपियों के लिप्यंतरण हेतु राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ

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भारत की पारंपरिक ज्ञान-संपदा के संरक्षण के निरंतर प्रयासों के अंतर्गत, तिगलारी और पुरानी कन्नड़ लिपियों में लिखित आयुर्वेद पांडुलिपियों के लिप्यंतरण पर एक क्षमता-विकास कार्यशाला का आज उडुपी स्थित श्री पुत्तिगे नरसिंह सभाभवन, गीता मंदिर में शुभारंभ किया गया।

इस कार्यशाला का संयुक्त आयोजन भारत सरकार के आयुष मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत केंद्रीय आयुर्वेदीय विज्ञान अनुसंधान परिषद (CCRAS) तथा शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय (CSU) द्वारा श्री वादिराज अनुसंधान फाउंडेशन के सहयोग से किया जा रहा है।

यह कार्यक्रम परम पूज्य श्री श्री सुगुणेंद्र तीर्थ श्रीपाद, पीठाधीश्वर, श्री पुत्तिगे मठ, तथा परम पूज्य श्री श्री सुष्रिंद्र तीर्थ श्रीपाद, कनिष्ठ पीठाधीश्वर, श्री पुत्तिगे मठ, के आशीर्वाद से आयोजित किया जा रहा है। इस पहल का उद्देश्य विद्वानों में तिगलारी और पुरानी कन्नड़ लिपियों में संरक्षित आयुर्वेद पांडुलिपियों को पढ़ने, समझने और लिप्यंतरित करने की विशेषज्ञता विकसित करना है। ये पांडुलिपियाँ मुख्यतः कर्नाटक के तटीय क्षेत्रों में पाई जाती हैं।

कार्यशाला का उद्घाटन प्रो. वैद्य रबिनारायण आचार्य, महानिदेशक, CCRAS द्वारा किया गया। उद्घाटन समारोह में श्री नागराज आचार्य, प्रशासक एवं दीवान, श्री पुत्तिगे मठ; डॉ. जी. पी. प्रसाद, सहायक निदेशक, राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा विरासत संस्थान (NIIMH), हैदराबाद; डॉ. टी. महेश्वर, सहायक निदेशक, केंद्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान (CARI), बेंगलुरु; तथा डॉ. सुधीर राज के., निदेशक, भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) केंद्र, निट्टे विश्वविद्यालय, उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समन्वयन विद्वान गोपालाचार्य, निदेशक, श्री वादिराज अनुसंधान फाउंडेशन द्वारा किया गया।

सभा को संबोधित करते हुए प्रो. वैद्य रबिनारायण आचार्य ने आयुर्वेद ज्ञान के संरक्षण, दस्तावेजीकरण और प्रसार के लिए CCRAS द्वारा संचालित विभिन्न पहलों की जानकारी दी। उन्होंने ज्ञान भारतम् मिशन के अंतर्गत भारत सरकार द्वारा देश की समृद्ध ज्ञान परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए किए जा रहे प्रयासों पर भी प्रकाश डाला।

इस अवसर पर डॉ. सुधीर राज के. ने भारत की पांडुलिपि विरासत के संरक्षण के महत्व को रेखांकित करते हुए अनुसंधान और ज्ञान-वितरण को सुदृढ़ करने में भारतीय ज्ञान प्रणालियों की भूमिका पर बल दिया।

यह 15-दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयुर्वेद और संस्कृत पृष्ठभूमि के युवा विद्वानों को विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में अप्रकाशित आयुर्वेद पांडुलिपियों के पाठ-वाचन, लिप्यंतरण, संपादन तथा प्रकाशन-पूर्व तैयारी का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान करेगा।

CCRAS और केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित यह तीसरी कार्यशाला है। इससे पूर्व ओडिशा के पुरी में करणी/देवनागरी लिपियों पर तथा केरल के गुरुवायूर में वट्टेजुत्तु/मलयालम लिपियों पर केंद्रित कार्यशालाओं का आयोजन किया जा चुका है।

इस कार्यशाला में श्री धर्मस्थल मंजुनाथेश्वर आयुर्वेद महाविद्यालय, उडुपी, श्री धर्मस्थल मंजुनाथेश्वर आयुर्वेद महाविद्यालय, हासन, तथा श्री पुत्तिगे मठ के गुरुकुल के संस्कृत विद्यार्थियों और संकाय सदस्यों की सक्रिय भागीदारी है।

कार्यक्रम के दौरान तैयार की गई लिप्यंतरित पांडुलिपियों को बाद में CCRAS और केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित किया जाएगा, जिससे भारत की पारंपरिक ज्ञान-संपदा के संरक्षण और व्यापक प्रसार को और अधिक बल मिलेगा।

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