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श्रद्धा, संस्कृति और संगीत के संगम के साथ सिरपुर महोत्सव का भव्य समापन

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सिरपुर महोत्सव हमारी गौरवशाली परंपराओं, सभ्यता और संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम- सांसद रूपकुमारी चौधरी

सिरपुर हमारी आस्था,संस्कृति और इतिहास का जीवंत प्रतीक- विधायक योगेश्वर राजू सिन्हा

महासमुंद- सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक नगरी सिरपुर में आयोजित तीन दिवसीय सिरपुर महोत्सव का आज भव्य एवं गरिमामयी समापन समारोह सम्पन्न हुआ। समापन अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में सांसद रूपकुमारी चौधरी शामिल हुए। इस अवसर पर विधायक महासमुंद श्री योगेश्वर राजू सिन्हा, छत्तीसगढ़ राज्य बीज निगम के अध्यक्ष चन्द्रहास चन्द्राकर, भारत स्काउट एवं गाइड संघ के अध्यक्ष येतराम साहू, सिरपुर सरपंच पुष्पा के माली, डीलेश्वरी चंद्राकर, जितेंद्र सिंह, ओमप्रकाश चौधरी, महेंद्र सिक्का, कलेक्टर विनय कुमार लंगेह, पुलिस अधीक्षक प्रभात कुमार सहित स्थानीय जनप्रतिनिधि, प्रशासनिक अधिकारी, गणमान्य नागरिक एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं पर्यटक मौजूद रहे। इस अवसर पर मुख्य अतिथि सांसद  रूपकुमारी चौधरी ने विभागीय स्टॉल का अवलोकन किया। साथ ही अतिथियों द्वारा कॉफी टेबल बुक एवं महासमुंद जिले की दो वर्षों की उपलब्धियों पर आधारित कैलेंडर का विमोचन किया गया। 

मुख्य अतिथि सांसद रूपकुमारी चौधरी ने समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि सिरपुर छत्तीसगढ़ सहित पूरे देश की सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक धरोहर है। सिरपुर की प्राचीन विरासत, बौद्ध विहारों, मंदिरों और ऐतिहासिक धरोहरों ने इसे विश्व पटल पर विशेष स्थान दिलाया है। यहां आयोजित सिरपुर महोत्सव हमारी गौरवशाली परंपराओं, सभ्यता और संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम है। जो युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य करते हैं। उन्होंने कहा कि राज्य एवं केंद्र सरकार द्वारा संस्कृति, पर्यटन एवं विरासत संरक्षण के क्षेत्र में निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार द्वारा एक भारत-श्रेष्ठ भारत जैसी योजनाओं के माध्यम से धार्मिक एवं पर्यटन स्थलों के विकास को नई दिशा दी जा रही है। वहीं छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा भी ऐतिहासिक स्थलों के संरक्षण, सौंदर्यीकरण एवं आधारभूत सुविधाओं के विस्तार पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

सांसद चौधरी ने कहा कि प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत योजना, जल जीवन मिशन एवं ग्रामीण सड़क योजना जैसी जनकल्याणकारी योजनाओं से आमजन के जीवन स्तर में सुधार हो रहा है। उन्होंने कहा कि राज्य एवं केंद्र सरकार के संयुक्त प्रयासों से सिरपुर को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर एक नई पहचान मिलेगी, जिससे स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे और क्षेत्र की आर्थिक प्रगति को गति मिलेगी। उन्होंने इस भव्य आयोजन के लिए जिला प्रशासन, आयोजन समिति एवं सभी सहयोगी संस्थाओं की सराहना की।

विधायक योगेश्वर राजू सिन्हा ने अपने उद्बोधन में कहा कि सिरपुर हमारी आस्था, संस्कृति और इतिहास का जीवंत प्रतीक है। यह भूमि हमें हमारी गौरवशाली विरासत से जोड़ती है। सिरपुर महोत्सव के माध्यम से हमारी लोक कला, लोक संस्कृति और परंपराओं को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल रही है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में प्रदेश सरकार सिरपुर के विकास एवं पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए निरंतर कार्य कर रही है। आने वाले समय में सिरपुर को अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाएगा।

छत्तीसगढ़ बीज निगम के अध्यक्ष चंद्रहास चंद्राकर ने कहा कि सिरपुर महोत्सव से क्षेत्र के पर्यटन, रोजगार एवं स्थानीय कला को नई पहचान मिली है। ऐसे आयोजनों से युवाओं को अपनी संस्कृति से जुड़ने का अवसर मिलता है।

स्काउट एवं गाइड संघ के जिलाध्यक्ष येतराम साहू ने कहा कि सिरपुर केवल एक ऐतिहासिक नगरी नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान और गौरव का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि सिरपुर महोत्सव के माध्यम से इस गौरवशाली धरोहर को जन-जन तक पहुँचाने का सराहनीय प्रयास किया जा रहा है। यह महोत्सव हमारी संस्कृति, परंपरा, कला और इतिहास को नई पीढ़ी से जोड़ने का माध्यम बन चुका है।

कलेक्टर विनय कुमार लंगेह ने तीन दिवसीय सिरपुर महोत्सव के सफल आयोजन पर शासन, जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक टीम, कलाकारों एवं आमजन का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यह महोत्सव हमारी सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का सार्थक प्रयास है। सभी के सहयोग, अनुशासन एवं उत्साह से यह आयोजन सफल एवं यादगार बना।

समापन अवसर पर महोत्सव में आकर्षक प्रस्तुतिया देने वाले कलाकारों, सांस्कृतिक दलों एवं आयोजन से जुड़े प्रमुख आयोजकों को मंच पर सम्मानित किया गया। अतिथियों द्वारा उन्हें स्मृति चिन्ह, शॉल एवं प्रशस्ति पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। तीन दिवसीय सिरपुर महोत्सव के दौरान धार्मिक अनुष्ठान, सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ, लोकनृत्य, शास्त्रीय संगीत, भजन-कीर्तन एवं आधुनिक संगीत कार्यक्रमों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। साथ ही विभागीय प्रदर्शनी एवं एलईडी छायाचित्र प्रदर्शनी लोगों के लिए आकर्षण बना रहा। देश-प्रदेश से आए पर्यटकों ने सिरपुर की ऐतिहासिक धरोहरों, मंदिरों एवं विहारों का अवलोकन कर इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने 37वीं फेडरेशन कप व्हॉलीबॉल चैंपियनशिप का किया उद्घाटन

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अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों से सजी 16 टीमें ले रही हिस्सा

छत्तीसगढ़ व्हॉलीबॉल एसोशिएशन द्वारा 3-8 फरवरी तक रायपुर में आयोजन

मुख्यमंत्री साय ने तमिलनाडू और सर्विसेस के बीच हुए उद्घाटन मैच को पूरा देखा, कांटे के मुकाबले वाले मैच के समाप्त होने के बाद ही इंडोर स्टेडियम से निकले

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने आज रायपुर के सरदार बलबीर सिंह जुनेजा इंडोर स्टेडियम में 37वीं फेडरेशन कप व्हॉलीबॉल चैंपियनशिप का उद्घाटन किया। छत्तीसगढ़ राज्य व्हॉलीबॉल एसोशिएशन द्वारा 3 फरवरी से 8 फरवरी तक इसका आयोजन किया गया है। चैंपियनशिप में भारत के लिए खेल चुके कई अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के साथ कुल 16 टीमें भाग ले रही हैं। रेलवे, सर्विसेस और इंडियन यूनिवर्सिटी सहित कई राज्यों की टीमें इसमें भागीदारी कर रही हैं। पुरुष वर्ग में 10 टीमें और महिला वर्ग में 6 टीमें हिस्सा ले रही हैं। 

मुख्यमंत्री साय ने फेडरेशन कप के उद्घाटन के बाद इंडोर स्टेडियम में रुककर तमिलनाडू और सर्विसेस के बीच हुए उद्घाटन मैच को पूरा देखा। वे कांटे के मुकाबले वाले इस मैच के समाप्त होने के बाद ही स्टेडियम से निकले। विधायक सुनील सोनी भी उद्घाटन कार्यक्रम में शामिल हुए।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने 37वीं फेडरेशन कप व्हॉलीबॉल चैंपियनशिप का उद्घाटन करते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ की धरती पर मैं देशभर से आए खिलाड़ियों का स्वागत करता हूं। व्हॉलीबॉल हमें टीमवर्क, सहयोग और समन्वय सिखाता है। छत्तीसगढ़ के खिलाड़ियों ने इसमें प्रदेश का काफी नाम रोशन किया है। छत्तीसगढ़ के खिलाड़ी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी प्रतिभा और कौशल का पूरी क्षमता से प्रदर्शन कर सके, इसके लिए जरूरी अधोसंरचना और प्रशिक्षण पर हम लगातार जोर दे रहे हैं। 

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि खिलाड़ियों के प्रोत्साहन के लिए कई वर्षों से बंद राज्य खेल अंलकरण सम्मान को हमने पुनः प्रारंभ किया है। ओलंपिक खेलों में राज्य के खिलाड़ी की भागीदारी पर शासन की ओर से 21 लाख रुपए की प्रोत्साहन राशि दी जाएगी। वहीं स्वर्ण पदक जीतने पर 3 करोड़ रुपए, रजत पदक जीतने पर 2 करोड़ रुपए और कांस्य पदक जीतने पर एक करोड़ रुपए दिए जाएंगे। साय ने कहा कि खेलों के माध्यम से छत्तीसगढ़ की नई पहचान अब देश-दुनिया के सामने है। पिछले दो सालों से राज्य में बस्तर ओलंपिक का आयोजन किया जा रहा है। इसमें पहले साल एक लाख 65 हजार और दूसरे साल करीब 4 लाख लोगों ने हिस्सा लिया है। 

छत्तीसगढ़ व्हॉलीबॉल एसोशिएशन के अध्यक्ष महेश गागड़ा ने अपने स्वागत भाषण में फेडरेशन कप के आयोजन की रूपरेखा और कार्यक्रमों की जानकारी दी। रायपुर जिला पंचायत के अध्यक्ष नवीन अग्रवाल, छत्तीसगढ़ ओलंपिक संघ के सचिव विक्रम सिसोदिया, भारतीय व्हॉलीबॉल संघ के महासचिव रामानंद चौधरी, मध्यप्रदेश व्हॉलीबॉल संघ के अध्यक्ष रूद्रप्रताप सिंह, छत्तीसगढ़ व्हॉलीबॉल एसोशिएशन के सचिव हेमप्रकाश नायक, रायपुर नगर निगम के सभापति सूर्यकांत राठौर, राहुल कौशिक और विनोद नायर सहित विभिन्न व्हॉलीबॉल संघों के पदाधिकारी, सदस्यगण, खिलाड़ी और खेलप्रेमी बड़ी संख्या में फेडरेशन कप के उद्घाटन के दौरान मौजूद थे।

इन राज्यों की टीम ले रही हिस्सा

रायपुर में हो रहे 37वें फेडरेशन कप व्हॉलीबॉल चैंपियनशिप में पुरूष वर्ग में रेलवे, सर्विसेस, इंडियन यूनिवर्सिटी, केरल, तमिलनाडू, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, झारखंड और छत्तीसगढ़ की टीमें भाग ले रही हैं। वहीं महिला वर्ग में रेलवे, इंडियन यूनिवर्सिटी, केरल, हरियाणा, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की टीमें हिस्सा ले रही हैं। इनमें से कई टीमों में भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेल चुके खिलाड़ी शामिल हैं।

केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (CZA) की 43वीं बैठक: पशु संरक्षण और चिड़ियाघरों के प्रबंधन पर महत्वपूर्ण निर्णय

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पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने मंगलवार को नई दिल्ली के राष्ट्रीय चिड़ियाघर में केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (CZA) की 43वीं बैठक की अध्यक्षता की। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर साझा किए गए संदेश में मंत्री ने बताया कि बैठक में देशभर के चिड़ियाघरों के एक्स-सिटू संरक्षण और प्रबंधन से संबंधित मुद्दों पर विस्तृत विचार-विमर्श किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि देशभर के चिड़ियाघरों की दूसरी बार प्रबंधन प्रभावशीलता मूल्यांकन (MEE) पूर्ण करने के निर्देश दिए गए हैं।

बैठक में लिए गए महत्वपूर्ण निर्णयों में शामिल हैं:

  • CSR योगदान के माध्यम से चिड़ियाघरों के लिए संभावनाओं की समीक्षा करने हेतु उप-समिति का गठन।

  • अब से CZA की बैठकों की आवृत्ति बढ़ाना, जो राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति की बैठकों के अनुरूप होगी।

भूपेंद्र यादव ने बैठक में यह भी रेखांकित किया कि चिड़ियाघरों का MEE एक साक्ष्य-आधारित, व्यापक, समग्र और स्वतंत्र प्रक्रिया है, जो देशभर के चिड़ियाघरों में उच्चतम मानकों के पालन को प्रोत्साहित करती है।

बैठक में यह भी उल्लेख किया गया कि राष्ट्रीय चिड़ियाघर नीति का एक उद्देश्य है कि आगंतुकों में वन्यजीवों के प्रति सहानुभूति पैदा की जाए और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता को समझाया जाए। इसके लिए यह सुनिश्चित किया गया कि चिड़ियाघरों की आउटरीच गतिविधियों को बढ़ाया जाए, जैसे कि महत्वपूर्ण दिवसों के लिए वार्षिक कैलेंडर और क्रियान्वयन योजना तैयार करना, तथा विभिन्न प्रजातियों के लिए जिम्मेदारी निर्धारित करना।

साथ ही, केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण ने मंगलवार को 34वां स्थापना दिवस भी मनाया। यह अवसर मुख्य वन्यजीव संरक्षक और चिड़ियाघर निदेशकों की कॉन्फ्रेंस के साथ संपन्न हुआ, जो चिड़ियाघर प्रबंधन और वन्यजीव संरक्षण से संबंधित चर्चाओं का साझा मंच प्रदान करता है।

उद्घाटन सत्र में केंद्रीय राज्य मंत्री (पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन) किर्ति वर्धन सिंह ने कहा कि चिड़ियाघर केवल जानवरों को देखने का स्थान नहीं है, बल्कि यह शोधकर्ताओं और वैज्ञानिकों के लिए जानवरों के व्यवहार, देखभाल और चिकित्सा विधियों को बेहतर बनाने का एक महत्वपूर्ण अवसर है। उन्होंने जोर देकर कहा, “हम यहां कमजोर और असहाय जानवरों की देखभाल कर रहे हैं, इसलिए हमें संवेदनशील रहना चाहिए कि और क्या किया जा सकता है।”

सत्र में उन्होंने अधिकारियों से यह भी कहा कि वे विश्व के सर्वोत्तम प्रथाओं और अन्य चिड़ियाघरों से सीखने को ध्यान में रखें। उन्होंने उल्लेख किया कि युवा पीढ़ी अब मोबाइल और वर्चुअल रियलिटी पर अधिक केंद्रित है और प्राकृतिक चमत्कारों के प्रति उनकी संवेदनशीलता घट रही है। इस संदर्भ में, चिड़ियाघरों की भूमिका विशेष रूप से शहरी निवासियों में प्राकृतिक जगत के प्रति जागरूकता बढ़ाने में अहम है।

प्रौद्योगिकी के तेजी से विकास के संदर्भ में किर्ति वर्धन सिंह ने चर्चा की कि कैसे तकनीक का उपयोग बेहतर चिड़ियाघर प्रबंधन, जानवरों की देखभाल और आगंतुक अनुभव को सुधारने में किया जा सकता है। उन्होंने राज्य सरकारों, अनुसंधान संस्थानों, हितधारकों और NGOs के साथ अधिक सहयोग की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

वन निदेशक और विशेष सचिव सुशील कुमार अवस्थी ने कहा कि CZA का स्थापना दिवस भारत में नैतिक और संरक्षण-उन्मुख चिड़ियाघर प्रबंधन की दिशा में मील का पत्थर है। अतिरिक्त वन निदेशक (MoEFCC) रमेश कुमार पांडेय ने कहा कि भारत चिड़ियाघर प्रबंधन में विशेष स्थान रखता है, क्योंकि देश के 150 से अधिक चिड़ियाघरों में अधिकांश वन विभाग द्वारा संचालित हैं। CZA के सदस्य सचिव V. क्लेमेंट बेन ने कहा कि CZA ने भारतीय चिड़ियाघरों को पारंपरिक प्रदर्शन केंद्रों से पेशेवर रूप से प्रबंधित संरक्षण संस्थानों में बदलने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

पूरा दिन चलने वाला सम्मेलन नीति, प्रैक्टिस, विज्ञान और प्रशासन के दृष्टिकोण को एक साथ लाया। इसमें आधुनिक चिड़ियाघर प्रबंधन, संरक्षण प्रजनन, पशु चिकित्सा देखभाल, पोषण, स्थिरता और वन्य-स्वास्थ्य (One Health) दृष्टिकोण जैसे समकालीन मुद्दों और अवसरों पर ध्यान केंद्रित किया गया। यह चर्चा जानवरों, पारिस्थितिकी तंत्र और मानव समुदायों की आपसी भलाई को मजबूती प्रदान करने वाली थी।

पीडीयूएनएएसएस में “सदस्य-प्रथम” दृष्टिकोण पर राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित

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पंडित दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा अकादमी (PDUNASS) ने आज एक रणनीतिक राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया, जो सामाजिक सुरक्षा प्रशासन में “सदस्य-प्रथम” दृष्टिकोण की ओर निर्णायक बदलाव का संकेत देती है। इस सत्र में पेंशनभोगियों की गरिमा और सुविधा को प्राथमिकता देते हुए संचालनात्मक ढांचे को पुन: व्यवस्थित करने पर जोर दिया गया, साथ ही CITES प्रोजेक्ट और कोड ऑन सोशल सेक्यूरिटी के लिए संस्थागत तत्परता सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित किया गया।

मुख्य भाषण वर्चुअल माध्यम से रमेश कृष्णमूर्ति, केंद्रीय भविष्य निधि आयुक्त (CPFC) ने दिया। उन्होंने डिजिटल परिवर्तन को सहानुभूतिपूर्ण सामाजिक सुरक्षा प्रणाली की रीढ़ बताते हुए कहा:

"हमारा परिवर्तन पूरी तरह संस्थागत रूप से संगठित और सदस्य-केंद्रित होना चाहिए। हमारे पेंशनभोगियों के लिए समय पर सेवा सिर्फ एक मापदंड नहीं, बल्कि गरिमा का विषय है।"

उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रक्रियाओं का आधुनिकीकरण तेजी से बढ़ती सदस्य संख्या की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए अनिवार्य है। विशेष रूप से पेंशन जैसी संवेदनशील मामलों में विश्वसनीयता और जवाबदेही अपरिहार्य हैं।

कार्यशाला में पेंशनभोगी अनुभव पर विशेष जोर दिया गया। चंद्रमौली चक्रवर्ती (ACC-HQ), स्म्ति. अपराजिता जग्गी (ACC), और S. K. गुप्ता (RPFC-I) ने पेंशन विभाग की ओर से प्रतिभागियों को संबोधित किया और निम्नलिखित उपायों पर प्रकाश डाला:

  • पेंशन प्रक्रिया को सुव्यवस्थित कर प्रतीक्षा समय कम करना।

  • सभी ज़ोन में प्रक्रियाओं का मानकीकरण कर समान सेवा गुणवत्ता सुनिश्चित करना।

  • वरिष्ठ नागरिकों के लिए संपूर्ण अनुभव को बेहतर बनाना, जिससे पेंशन मामलों को स्पष्टता और गति के साथ निपटाया जा सके।

सलील शंकर (ACC, IS Division) ने CITES प्रोजेक्ट का खाका प्रस्तुत किया और इसे “Ease of Living” के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण बताया। यह प्रोजेक्ट डिजिटल क्षमताओं को बढ़ाने, तेज़ दावा निपटान और अधिक पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

साथ ही,  P. B. वर्मा (ACC, Compliance, Recovery & Legal) ने अनुपालन ढांचे को मजबूत करने की पहलों पर चर्चा की, जबकि कोड ऑन सोशल सेक्यूरिटी में संक्रमण के दौरान व्यापार सुगमता बनाए रखने पर जोर दिया।

स्वागत भाषण में, कुमार रोहित, निदेशक, PDUNASS ने कहा कि अकादमी के क्षमता निर्माण प्रयास अब “सक्रिय शासन” पर केंद्रित हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि कोड ऑन सोशल सेक्यूरिटी के अनुरूप होना, कार्यकर्ताओं और पेंशनभोगियों दोनों को मजबूत सुरक्षा प्रदान करने के लिए आवश्यक है।

कार्यशाला का संचालन कोर्स डायरेक्टर हरीश यादव, RPFC-I के पर्यवेक्षण में सुचारू रूप से किया गया। उनकी सूक्ष्म समन्वय क्षमता ने अधिकारियों को मैदान स्तर के अनुभव और नवाचार साझा करने के लिए एक संरचित और उत्पादक वातावरण प्रदान किया।

कार्यशाला का समापन EPFO की सदस्य-केंद्रित प्रतिबद्धता के संकल्प के साथ हुआ। प्रतिभागियों ने डिजिटल पहलों का उपयोग केवल दक्षता के लिए नहीं, बल्कि देश भर के लाखों पेंशनभोगियों के लिए विश्वसनीय, सुलभ और सहानुभूतिपूर्ण सामाजिक सुरक्षा जाल प्रदान करने के लिए करने का संकल्प लिया।

PDUNASS के बारे में

पंडित दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा अकादमी (PDUNASS) कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) का प्रमुख प्रशिक्षण और अनुसंधान संस्थान है। यह अकादमी कुशल, उत्तरदायी और सहानुभूतिपूर्ण कार्यबल तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जो भारत भर में लाखों हितधारकों को उच्च गुणवत्ता वाली सामाजिक सुरक्षा सेवाएँ प्रदान करने में सक्षम हो।

BREAKING NEWS-किसानों को बड़ी राहत: छत्तीसगढ़ में धान खरीदी की तारीख 5 फरवरी तक बढ़ी

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रायपुर- छत्तीसगढ़ के धान किसानों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। राज्य सरकार ने धान खरीदी की अंतिम तारीख को दो दिन और बढ़ा दिया है। अब किसान 5 फरवरी 2026 तक अपनी धान सरकारी खरीदी केंद्रों में बेच सकेंगे।

  1. अब 4 और 5 फरवरी को खरीदा जाएगा किसानों का धान
  2. प्रदेश में अब तक 140 लाख मीट्रिक टन धान की खरीदी
  3. 25.11 लाख से अधिक किसानों को 33 हजार 149 करोड़ रूपए का भुगतान

VIDEO में सुनिये: मुख्यमंत्री की घोषणा


मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने यह फैसला उन किसानों को राहत देने के उद्देश्य से लिया है, जिनका धान किसी कारणवश तय समय सीमा में नहीं खरीदा जा सका था। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया है कि इस बढ़ाई गई अवधि में केवल उन्हीं किसानों से धान की खरीदी की जाएगी, जो पहले किसी वजह से वंचित रह गए थे।

गौरतलब है कि प्रदेशभर में पिछले करीब दो महीनों से धान खरीदी का काम चल रहा था। इस दौरान बड़ी संख्या में किसानों ने अपनी उपज सरकारी केंद्रों में बेची। कई खरीदी केंद्रों पर भारी भीड़ देखने को मिली और कई जगहों पर 31 जनवरी तक टोकन के आधार पर खरीदी होती रही।

इसके बावजूद कुछ किसान ऐसे रह गए थे, जिनका धान तय समय में नहीं खरीदा जा सका। इन्हीं किसानों की समस्या को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ने धान खरीदी की अवधि बढ़ाने का फैसला लिया है, ताकि कोई भी पात्र किसान अपनी उपज बेचने से वंचित न रहे।

यह निर्णय खासतौर पर उन किसानों के लिए राहत लेकर आया है, जो अब तक किसी कारण से धान नहीं बेच पाए थे।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने छत्तीसगढ़ में किसानों के हित और मांग को ध्यान में रखकर धान खरीदी की तिथि में दो दिवस की वृद्धि का अहम निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री के इस निर्णय पर अब राज्य शासन द्वारा आगामी दो दिवस 4 और 5 फरवरी को राज्य के ऐसे किसान जो पंजीकृत है और जिनका टोकन कट चुके है, उन किसानों का धान खरीदा जाएगा। गौरतलब है कि मुख्यमंत्री साय ने प्रदेश के वास्तविक किसानों को लाभ दिलाने के उद्देश्य से धान खरीदी केन्द्रों में पारदर्शी व्यवस्था शुरू की थी जो सार्थ सिद्ध हुआ है। 

उल्लेखनीय है कि 15 नवम्बर 2025 से शुरू धान खरीदी का महाभियान के तहत 31 जनवरी 2026 तक 25 लाख 11 हजार से अधिक किसानों से लगभग 140 लाख मीट्रिक टन धान की खरीदी की गई है। धान खरीदी के एवज में इन किसानों को 33 हजार 149 करोड़ रूपए का भुगतान बैंक लिकिंग व्यवस्था के तहत किया जा चुका है। सरकार द्वारा धान खरीदी की तिथि बढ़ाये जाने से अब उन छूटे हुए किसान भी सुगमतापूर्वक अपना धान बेच सकेंगे। 

इस वर्ष  छत्तीसगढ़ सरकार की धान खरीदी की पारदर्शी व्यवस्था और किसान-हितैषी व्यवस्था से किसानों के हितों की रक्षा के साथ ही वास्तविक किसानों को लाभान्वित करने का संकल्प सार्थक हो रहा है। राज्य में इस खरीफ सीजन के लिए 27 लाख 43 हजार 145 किसानों ने पंजीयन कराया है। 

प्रदेशभर में संचालित सभी 2,740 धान उपार्जन केंद्रों के माध्यम से खरीदी की प्रक्रिया सुव्यवस्थित, डिजिटल निगरानीयुक्त और पूर्णतः पारदर्शी ढंग से संचालित की जा रही है। शासन की यह व्यवस्था सुनिश्चित कर रही है कि वास्तविक किसान को ही लाभ मिले और बिचौलियों अथवा फर्जी प्रविष्टियों की कोई गुंजाइश न रहे।

भूटान और भारत के बीच विद्युत क्षेत्र सहयोग को मजबूत करने पर चर्चा

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आज नई दिल्ली में भूटान के ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधन मंत्री,ल्योंपो जेम छेरिंग ने केंद्रीय विद्युत मंत्री और आवास एवं शहरी मामलों के मंत्री, मनोहर लाल तथा राज्य मंत्री (विद्युत और नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा), श्रीपाद नाइक से भेंट की। यह बैठक दोनों देशों के विद्युत क्षेत्र में लंबे समय से चले आ रहे सहयोग को और मजबूत करने पर केंद्रित रही।

भारत-भूटान जलविद्युत सहयोग की शुरुआत 1961 में हुई थी, जिसके बाद 2006 में हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर सहयोग पर समझौता हुआ।

बैठक के दौरान दोनों पक्षों ने पुनत्सांगछू-II हाइड्रोइलेक्ट्रिक परियोजना (1020 मेगावाट) से विद्युत उत्पादन के वाणिज्यिक अनुकूलन पर विचार किया। इसके अलावा पुनत्सांगछू-I हाइड्रोइलेक्ट्रिक परियोजना (1200 मेगावाट) के जल्दी चालू होने पर विशेष जोर दिया गया।

बैठक में सांकॉश हाइड्रोपावर परियोजना के आगे के रास्तों पर भी चर्चा हुई। साथ ही दोनों देशों ने 2040 तक के क्रॉस-बॉर्डर ट्रांसमिशन लिंक का मूल्यांकन किया। इसके अलावा भूटान में कम उत्पादन वाले महीनों में विद्युत की शेड्यूलिंग को सरल बनाने की आवश्यकता पर भी विचार किया गया।

मंत्रियों ने दोनों देशों के बीच मित्रता और सहयोग की सराहना की और इसे और मजबूत करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की।

मुंबई–अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना: पालघर, महाराष्ट्र में दूसरी पर्वतीय सुरंग का ब्रेकथ्रू

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केंद्रीय रेल, सूचना एवं प्रसारण, और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने मुंबई–अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना के तहत महाराष्ट्र के पालघर में दूसरी पर्वतीय सुरंग (Mountain Tunnel) के ब्रेकथ्रू की महत्वपूर्ण उपलब्धि की घोषणा की।

यह सुरंग MT-6 कुल 454 मीटर लंबी और 14.4 मीटर चौड़ी है, जिसमें दोनों दिशाओं के ट्रैक (अप और डाउन) बनाए जाएंगे। यह पालघर जिले में पिछले एक महीने में दूसरी पर्वतीय सुरंग का ब्रेकथ्रू है, पहली MT-5 सफ़पले के पास 2 जनवरी 2026 को प्राप्त हुआ था।

इस सुरंग का उत्खनन New Austrian Tunnelling Method (NATM) द्वारा दोनों सिरों से किया गया। NATM एक अत्याधुनिक ड्रिल और नियंत्रित विस्फोट विधि है। सुरंग का उत्खनन 12 महीनों में पूरा किया गया। पर्वतीय सुरंग का ब्रेकथ्रू तब मानी जाती है जब सुरंग के विपरीत सिरों से उत्खनन कर रहे दल अंततः बीच में मिलते हैं, जिससे पहाड़ के भीतर सतत मार्ग बन जाता है।

केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने उच्च गति रेल टीम को उनके अद्वितीय प्रगति के लिए बधाई दी और कहा कि जिस गति से टीम काम कर रही है, उसने देश में नई उम्मीद और विश्वास पैदा किया है। उन्होंने कहा कि परियोजना में प्रयुक्त कई उन्नत निर्माण तकनीक और बड़ी मशीनें भारत में निर्मित की जा रही हैं।

मंत्री ने बताया कि बुलेट ट्रेन परियोजना का गुजरात सेक्शन अगले साल व्यावसायिक संचालन शुरू करने की संभावना है, जबकि हाई-स्पीड रेल संचालन 2028 तक ठाणे और 2029 तक मुंबई तक पहुंचने की उम्मीद है।

इस अवसर पर लोकसभा सदस्य डॉ. हेमंत विष्णु सवारा (पालघर निर्वाचन क्षेत्र) भी उपस्थित थे। उन्होंने केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव का धन्यवाद किया और जिले में उच्च गति रेल कॉरिडोर, समर्पित माल ढुलाई कॉरिडोर (DFC) और आगामी वाधवन पोर्ट जैसे प्रमुख रेलवे परियोजनाओं के माध्यम से विकास को उजागर किया। उन्होंने कहा कि 2014 के बाद महाराष्ट्र में रेलवे निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिससे परियोजनाओं की तेजी से पूर्णता और बेहतर सेवाएँ सुनिश्चित हुई हैं।

NATM विधि जटिल भौगोलिक परिस्थितियों और असमान सुरंग आकार के लिए अनुकूल है, जहाँ पारंपरिक सुरंग खोदने वाली मशीनें (TBM) उपयुक्त नहीं होतीं। इस प्रक्रिया में बहुत भारी मशीनरी की आवश्यकता नहीं होती और यह रीयल-टाइम अनुकूलन की अनुमति देती है, जैसे कि शॉटक्रीटिंग, रॉक बोल्ट और लैटिस गार्डर का उपयोग।

सुरंग के भीतर श्रमिकों की सुरक्षा भू-तकनीकी उपकरणों, रीयल-टाइम मॉनिटरिंग, प्रभावी अग्नि सुरक्षा, उचित वेंटिलेशन और नियंत्रित प्रवेश व्यवस्था के माध्यम से सुनिश्चित की गई।

महाराष्ट्र में निर्माण कार्य कई मोर्चों पर तेजी से प्रगति कर रहा है। वैतरना नदी पर परियोजना का सबसे लंबा पुल पियर स्तर तक पहुँच चुका है, जबकि उल्हास और जगनी जैसी अन्य प्रमुख नदियों पर नींव कार्य जारी है। सभी चार स्टेशनों, राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों के बड़े क्रॉसिंग, लंबे स्पैन वाले स्टील ब्रिज और बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स से शिलफाटा तक 21 किमी लंबी सुरंग पर काम तेजी से चल रहा है। पालघर जिले में कुल 7 पर्वतीय सुरंगों का निर्माण कार्य प्रगति पर है।

सर्वेक्षण तालिका – पालघर पर्वतीय सुरंगें (Palghar Mountain Tunnels – MAHSR Project)

  • Sr. No.
  • Mountain Tunnel no.
  • Length (km)
  • % Completion
  • Remarks
  • 1
  • MT-1
  • 0.820
  • 16%
  • 2
  • MT-2
  • 0.228
  • तैयारी कार्य प्रगति में
  • 3
  • MT-3
  • 1.403
  • 41%
  • 4
  • MT-4
  • 1.260
  • 32%
  • 5
  • MT-5
  • 1.480
  • 57%
  • ब्रेकथ्रू 02 जनवरी 2026
  • 6
  • MT-6
  • 0.454
  • 47%
  • ब्रेकथ्रू आज प्राप्त
  • 7
  • MT-7
  • 0.417
  • 29%

MAHSR परियोजना लगभग 508 किलोमीटर लंबी है, जिसमें 352 किमी गुजरात और दादरा एवं नगर हवेली, और 156 किमी महाराष्ट्र में फैली हुई है। यह परियोजना आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहित, ज्ञान हस्तांतरण को बढ़ावा और नए औद्योगिक व आईटी हब के विकास में योगदान करेगी। इस कॉरिडोर से प्रमुख शहर जैसे सबरमती, अहमदाबाद, आनंद, वडोदरा, भरूच, सूरत, बिलिमोरा, वापी, बोईसर, विरार, ठाणे और मुंबई जुड़ेंगे, जो भारत के परिवहन बुनियादी ढांचे में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन दर्शाता है।

27 जनवरी 2026 तक, लगभग 334 किमी वायडकट, 17 नदी पुल और 12 प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्ग/रेलवे क्रॉसिंग पूरे हो चुके हैं। गुजरात सेक्शन में ट्रैक बिछाने और विद्युतकरण का काम तेजी से जारी है।


डॉ. जितेंद्र सिंह ने AIM SUMVAAD में भारत के स्टार्टअप और नवाचार पर जोर दिया

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आज अटल इनोवेशन मिशन (AIM) वार्षिक इन्क्यूबेटर कॉन्क्लेव "AIM SUMVAAD" में संबोधित करते हुए, केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और पृथ्वी विज्ञान विभाग, और प्रधानमंत्री कार्यालय, परमाणु ऊर्जा विभाग, अंतरिक्ष विभाग, कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन विभाग के मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने “अटल इनोवेशन मिशन” को मोदी सरकार की नवाचार-आधारित विकास और स्केलेबल स्टार्टअप नीति से जोड़ा। उन्होंने इस अवसर पर संघीय बजट 2026 में “Ease of Doing Business” पर भी ध्यान आकर्षित किया।

मंत्री ने कहा कि संघीय बजट 2026–27 भारत के स्टार्टअप और उद्यमिता पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूती प्रदान करता है, जिसमें विशेष रूप से इन्क्यूबेशन, नवाचार और महिलाओं की आर्थिक भागीदारी पर जोर दिया गया है। उन्होंने कहा कि स्टार्टअप, बायोमैन्युफैक्चरिंग और महिलाओं में Self-Help Entrepreneurs (SHE) की अवधारणा जैसे नए सक्षम फ्रेमवर्क इस बात का प्रमाण हैं कि सरकार समावेशी और सतत आर्थिक विकास की दिशा में कदम बढ़ा रही है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने AIM SUMVAAD में मुख्य भाषण दिया, जो Bhim Auditorium, Dr. Ambedkar International Centre, नई दिल्ली में आयोजित किया गया। यह कॉन्क्लेव अटल इनोवेशन मिशन का प्रमुख वार्षिक मंच है, जिसमें 150+ अटल इन्क्यूबेशन सेंटर और अटल कम्युनिटी इनोवेशन सेंटर देशभर से शामिल होते हैं। साथ ही इसमें नीति निर्माता, उद्योग के नेता, CSR प्रमुख, मेंटर्स और पारिस्थितिकी तंत्र के अन्य हितधारक भी भाग लेते हैं।

उद्घाटन सत्र में सुमन बेरी (उपाध्यक्ष, नीति आयोग), प्रो. अजय सूद (प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार), बी. वी. आर. सुब्रह्मण्यम (सीईओ, नीति आयोग), डॉ. राजेश एस. गोखले (सचिव, जैव प्रौद्योगिकी विभाग),  एंजेला लुसिजी (निवासी प्रतिनिधि, UNDP India), दीपक बागला (मिशन डायरेक्टर, AIM) सहित अन्य गणमान्य लोग उपस्थित थे।

मंत्री ने कहा कि भारत के नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र का विचार 2014 के बाद निर्णायक राजनीतिक समर्थन प्राप्त हुआ, जिससे बड़े पैमाने पर अटल टिंकरिंग लैब्स और स्टार्टअप-केंद्रित नीति हस्तक्षेप संभव हुए। उन्होंने कहा कि वर्तमान में लगभग 50,000 अटल टिंकरिंग लैब्स संचालित हो रही हैं, जो छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों सहित सभी जिलों में नवाचार तक व्यापक पहुँच सुनिश्चित करती हैं।

डॉ. सिंह ने कहा कि भारत का स्टार्टअप सफर एक दशक पहले कुछ सैकड़ों स्टार्टअप से बढ़कर अब दो लाख से अधिक स्टार्टअप तक पहुँच गया है, जिससे बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित हुआ और पारंपरिक वेतनभोगी करियर के विकल्प उपलब्ध हुए। इस बदलाव ने युवाओं को उद्यमिता को एक भरोसेमंद और प्रेरणादायक करियर विकल्प के रूप में देखने में मदद की है।

संघीय बजट 2026–27 का हवाला देते हुए मंत्री ने कहा कि बायोमैन्युफैक्चरिंग शक्ति मिशन भारत की बायोटेक्नोलॉजी, बायोफार्मा, प्राकृतिक संसाधन और मानव संसाधन में ताकत के अनुरूप है। उन्होंने कहा कि भारत पहले से ही बायोमैन्युफैक्चरिंग में वैश्विक अग्रणी देशों में शामिल है, और भविष्य में डीप-सी रिसोर्सेज, ओशन इकॉनमी और हिमालयी बायो-रिसोर्सेज जैसे क्षेत्रों पर ध्यान नवाचार के अवसर और बढ़ाएगा।

मंत्री ने नेशनल इन्क्यूबेटर असेसमेंट फ्रेमवर्क का भी उल्लेख किया, जिसे एक केंद्रीकृत डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के रूप में डिज़ाइन किया गया है। यह देश भर के इन्क्यूबेटर के डेटा और प्रदर्शन इनसाइट्स को एकत्र करता है, और राष्ट्रीय स्तर पर बेंचमार्किंग, सहयोग, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और क्षमता निर्माण के लिए मंच प्रदान करता है।

उन्होंने कहा कि AIM SUMVAAD जैसे प्लेटफ़ॉर्म स्टार्टअप, इन्क्यूबेटर, मेंटर्स, उद्योग और नीति निर्माताओं के बीच सहयोग, नेटवर्किंग और दीर्घकालिक साझेदारी के अवसर प्रदान करते हैं, जिनमें स्वास्थ्य, कृषि, ऊर्जा और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्र शामिल हैं।

डॉ. सिंह ने बताया कि स्टार्टअप, इन्क्यूबेशन और महिला-केंद्रित आर्थिक पहल का एकीकृत दृष्टिकोण, जैसे लखपति दीदी और Self-Help Groups से Self-Help Entrepreneurs (SHE) तक का विकास, सरकार की समावेशी उद्यमिता और नवाचार-आधारित विकास में महिलाओं की केंद्रीय भूमिका को दर्शाता है।


असम के काज़ीरंगा नेशनल पार्क में एक सींग वाले गैंडे के निवास और पर्यावरणीय इतिहास पर पेलियोइकोलॉजिकल अध्ययन

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असम के काज़ीरंगा नेशनल पार्क (KNP) के आर्द्रभूमि के नीचे की मिट्टी से यह कहानी सामने आई है कि कैसे एक सींग वाले भारतीय गैंडे का निवास जलवायु परिवर्तन, वनस्पति में बदलाव, विदेशी प्रजातियों का आक्रमण और शाकाहारी गतिविधियों के प्रभाव से विकसित हुआ।

तेजी से बढ़ती शहरीकरण, औद्योगिकीकरण और वनों की कटाई, साथ ही प्राकृतिक आपदाएँ जैसे बाढ़, सूखा, भूकंप और भूस्खलन, वैश्विक पारिस्थितिकी को नुकसान पहुँचा रहे हैं और जैव विविधता की हानि को तेज कर रहे हैं। उत्तर-पूर्व भारत, जो इंडो-बर्मा जैव विविधता हॉटस्पॉट का हिस्सा है, में कई संकटग्रस्त प्रजातियाँ निवास करती हैं, जो विलुप्ति के जोखिम में हैं। लेट क्वाटर्नरी मेगाफॉना का विलुप्त होना आज भी एक वैश्विक चिंता का विषय है, और इसके कारणों पर बहस जारी है। वर्तमान में, दुनिया भर में लगभग 60% बड़े शाकाहारी प्रजातियाँ संकटग्रस्त हैं, और दक्षिण-पूर्व एशिया में सबसे अधिक जोखिम वाली प्रजातियाँ पाई जाती हैं। काज़ीरंगा नेशनल पार्क, जो यूनिस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट है, मेगाहर्बिवोर्स का मुख्य केंद्र है, विशेष रूप से भारतीय एक-सिंग वाला गैंडा।

बिरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ़ पेलियोसाइंसेज (BSIP), जो विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) का स्वायत्त संस्थान है, के वैज्ञानिकों ने KNP की आर्द्रभूमि की मिट्टी में पाए गए परागकणों का उपयोग करते हुए KNP में पेलियोहर्बिवरी (प्राचीन शाकाहारी गतिविधियों) से संबंधित पहले लंबे समय तक के पेलियोइकोलॉजिकल रिकॉर्ड का पता लगाया।

वैज्ञानिकों ने Sohola Swamp, काज़ीरंगा नेशनल पार्क से लगभग एक मीटर लंबा सेडिमेंट कोर निकाला। यह मिट्टी की परत-परत संरचना एक प्राकृतिक अभिलेखागार की तरह कार्य करती है, जिसमें अतीत के सूक्ष्म अवशेष संरक्षित रहते हैं। इन अवशेषों में पौधों के परागकण और प्राणी मल पर उगने वाले फंगी के स्पोर्स शामिल हैं।अध्ययन (Catena, Elsevier में प्रकाशित) से पता चलता है कि काज़ीरंगा का वर्तमान परिदृश्य अतीत से काफी अलग है। यह अध्ययन क्षेत्रीय मेगाहर्बिवोर्स, विशेषकर भारतीय गैंडे की उत्तरी-पश्चिमी भारत में विलुप्ति के कारणों को भी दर्शाता है, जो मुख्य रूप से लेट होलोसीन के दौरान जलवायु सुधार, लिटिल आइस एज और बढ़ती मानव गतिविधियों से संबंधित हैं। इसके विपरीत, उत्तर-पूर्व भारत अपेक्षाकृत जलवायु स्थिर रहा, जिससे गैंडे का पूर्व की ओर प्रवासन और अंततः काज़ीरंगा में उनका एकत्रीकरण संभव हुआ।

अध्ययन से यह भी स्पष्ट हुआ कि फॉसिल साक्ष्यों के आधार पर, भारतीय एक-सिंग वाला गैंडा कभी पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापक रूप से वितरित था, लेकिन होलोसीन काल के बाद इस वितरण में भारी कमी आई। पिछले लगभग 3300 वर्षों में, उत्तर-पूर्व भारत अपेक्षाकृत जलवायु स्थिर और मानव दबाव कम होने के कारण सुरक्षित रहा, जबकि उत्तरी-पश्चिमी क्षेत्रों में आवास ह्रास, जलवायु बिगड़ना और अधिक शिकार ने गैंडे को पूर्व की ओर प्रवास करने और अंततः काज़ीरंगा में केंद्रित होने के लिए मजबूर किया।

यह अध्ययन दर्शाता है कि दीर्घकालिक वनस्पति और जलवायु परिवर्तन ने वन्यजीवन के सुरक्षा, प्रवासन और विलुप्ति को कैसे आकार दिया। यह दीर्घकालिक पारिस्थितिक ज्ञान भविष्य में संरक्षण और वन्यजीवन प्रबंधन के लिए मार्गदर्शन प्रदान कर सकता है, विशेषकर वर्तमान और भविष्य के जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में।

DST और IIT हैदराबाद सहयोग से विकसित हुआ पर्यावरण-हितैषी, सीसा-रहित सेल्फ-पावर्ड फोटोडिटेक्टर

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उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स, औद्योगिक निगरानी, सुरक्षा प्रणालियों और बायोमेडिकल इमेजिंग के लिए एक नवीन, सीसा-रहित और पर्यावरण-हितैषी फोटोडिटेक्टर जो स्वयं-संचालित (Self-Powered) है और मजबूत व स्थिर प्रदर्शन प्रदान करता है, अत्यंत उपयोगी हो सकता है।

आधुनिक कैमरे, पर्यावरण संवेदक और स्मार्ट वियरेबल्स फोटोडिटेक्टरों पर निर्भर करते हैं, जो प्रकाश को विद्युत संकेतों में परिवर्तित करते हैं। वर्तमान में उच्च प्रदर्शन वाले कई फोटोडिटेक्टर सीसा आधारित पेरोव्स्काइट का उपयोग करते हैं, जिनमें विषाक्तता की समस्याएँ होती हैं और ये वास्तविक दुनिया की परिस्थितियों में आसानी से degrade हो जाते हैं।

इस चुनौती का समाधान करते हुए अंतर्राष्ट्रीय उन्नत अनुसंधान केंद्र फॉर पाउडर मेटलर्जी एंड न्यू मटीरियल्स (ARCI, हैदराबाद), जो विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) का स्वायत्त संस्थान है, ने IIT हैदराबाद के सहयोग से डबल पेरोव्स्काइट Cs₂AgBiBr₆ आधारित एक सीसा-रहित, पर्यावरण-हितैषी फोटोडिटेक्टर विकसित किया है, जो मजबूत और स्थिर प्रदर्शन प्रदान करता है।

पारंपरिक डिज़ाइन में अक्सर महंगे धातु संपर्क और अतिरिक्त होल-ट्रांसपोर्ट लेयर (HTL) की आवश्यकता होती है, जिन्हें ग्लोवबॉक्स या वैक्यूम निर्माण उपकरण की मदद से बनाना पड़ता है। इसके विपरीत, यह डिवाइस HTM-फ्री है, कम लागत वाले कार्बन इलेक्ट्रोड का उपयोग करता है और सिर्फ एक चरण वाले कोटिंग मेथड से कमरे के तापमान पर निर्मित किया जाता है। डिवाइस संरचना स्वाभाविक रूप से प्रभावी चार्ज पृथक्करण का समर्थन करती है, जिससे बाहरी वोल्टेज के बिना ही सेल्फ-पावर्ड संचालन संभव होता है।

Cs₂AgBiBr₆ फोटोडिटेक्टर दृश्य प्रकाश के प्रति मजबूत प्रतिक्रिया दिखाता है और वास्तविक संचालन परिस्थितियों में उत्कृष्ट विश्वसनीयता प्रदर्शित करता है। उपकरण 60 दिनों तक संग्रहण के बाद भी अपने प्रदर्शन का 90% से अधिक बनाए रखता है। इन मापों को सामान्य कमरे की स्थितियों (25-35°C और 35-50% सापेक्ष आर्द्रता) में किया गया। प्रदर्शन वक्रों का 60 दिनों बाद भी लगभग समान रहना इसकी दीर्घकालिक पर्यावरणीय स्थिरता की पुष्टि करता है।

सीसा-रहित सामग्री प्रणाली, सरल पर्यावरण-प्रक्रिया निर्माण, कम लागत वाले घटक और मजबूत संचालन स्थिरता का संयोजन इस तकनीक को उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स, औद्योगिक निगरानी, सुरक्षा प्रणाली और बायोमेडिकल इमेजिंग के लिए अत्यंत आकर्षक बनाता है। यह भारत के सतत सामग्री विकास, ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग और अगली पीढ़ी की इलेक्ट्रॉनिक्स में आत्मनिर्भरता के लक्ष्यों के साथ भी संरेखित है।

इस काम का समर्थन विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST), भारत सरकार ने किया है, और यह Solar Energy (Elsevier) में प्रकाशित हुआ है, जिसका शीर्षक है:
“Ambient-processed lead-free Cs2AgBiBr6 photodetector with long-term environmental stability and self-powered operation.”


डॉ. मनसुख मंडाविया ने छह प्रमुख खेल अवसंरचना परियोजनाओं की आधारशिला रखी और दो एथलीट सपोर्ट सुविधाओं का उद्घाटन किया

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माननीय खेल एवं युवा मामले मंत्री, डॉ. मनसुख मंडाविया ने आज वर्चुअल माध्यम से छह प्रमुख खेल अवसंरचना परियोजनाओं की आधारशिला रखी और दो एथलीट सपोर्ट सुविधाओं का उद्घाटन किया, जिनमें कुल निवेश ₹120 करोड़ शामिल है।

यह पहल भारत के खेल पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने और देशभर में विश्व-स्तरीय, एथलीट-केंद्रित अवसंरचना विकसित करने के लिए केंद्रीय सरकार की प्रतिबद्धता को पुनः प्रदर्शित करती है।

छह आधारशिला परियोजनाओं की कुल लागत ₹82 करोड़ है, जो खेलो इंडिया योजना के तहत और स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) के अतिरिक्त सहयोग से लागू की जा रही हैं।

ये परियोजनाएँ देशभर में भौगोलिक रूप से वितरित हैं, जिनमें उत्तर-पूर्व और पूर्वी क्षेत्र भी शामिल हैं, ताकि खेल अवसंरचना का संतुलित और समावेशी विकास सुनिश्चित किया जा सके।

इन परियोजनाओं में शामिल हैं:

  • बैंगलोर में सिंथेटिक हॉकी टर्फ का उन्नयन

  • पटियाला में बहुउद्देशीय हॉल का निर्माण

  • भोपाल, गुवाहाटी और जलपाईगुड़ी में सिंथेटिक एथलेटिक ट्रैक का निर्माण

  • भोपाल में बहुउद्देशीय जूडो हॉल का निर्माण

आधारशिला समारोह के साथ-साथ माननीय मंत्री ने NS NIS, पटियाला में दो पूर्ण हो चुकी एथलीट सपोर्ट सुविधाओं का उद्घाटन भी किया, जिनमें कुल निवेश ₹38 करोड़ है।

इसमें शामिल हैं:

  • सेंट्रलाइज्ड किचन और फूड कोर्ट-कम-डाइनिंग हॉल, जो एथलीट पोषण सेवाओं को मजबूत करेगा

  • अत्याधुनिक इंटीग्रेटेड स्पोर्ट्स साइंस सेंटर और कंडीशनिंग हॉल, जो एलीट एथलीटों के लिए वैज्ञानिक प्रशिक्षण, प्रदर्शन विश्लेषण, पुनर्वास और रिकवरी को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ाएगा

माननीय मंत्री ने सभी संबंधित हितधारकों के प्रयासों की सराहना करते हुए और SAI की संपत्ति प्रबंधन जिम्मेदारी को रेखांकित करते हुए कहा:

“देशभर में कई खेल अवसंरचना परियोजनाएँ विकसित की जा रही हैं, लेकिन SAI के अधीन आने वाली सुविधाएँ हमारी सीधे जिम्मेदारी हैं। इन संपत्तियों का उचित रखरखाव, अधिकतम उपयोग और जहाँ संभव हो, व्यावसायिक रूप से लाभ उठाना आवश्यक है, ताकि सार्वजनिक निवेश दीर्घकालिक मूल्य पैदा करता रहे।”

डॉ. मंडाविया ने जवाबदेही और समयबद्धता पर बल देते हुए कहा कि इन अवसंरचना परियोजनाओं की लगातार निगरानी की जाएगी। उन्होंने बताया कि मासिक समीक्षा SAI स्तर पर और त्रैमासिक समीक्षा स्वयं उनके द्वारा की जाएगी, ताकि परियोजनाओं को तेज़ी से पूरा किया जा सके और बनाए गए ढांचे का एथलीटों के लाभ के लिए अधिकतम उपयोग सुनिश्चित हो।

खेल क्षेत्र की व्यापक नीतिगत रूपरेखा का उल्लेख करते हुए मंत्री ने कहा कि केंद्रीय वित्त मंत्री द्वारा खेलो इंडिया मिशन की घोषणा की गई है, जिसमें भारत के खेल पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने और अवसंरचना विकास को बढ़ावा देने के प्रमुख पहलुओं को रेखांकित किया गया है।

डॉ. मंडाविया ने कहा:

“हमें माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दृष्टिकोण को साकार करने के लिए सामूहिक रूप से कार्य करना चाहिए, जिसमें 2036 तक भारत को शीर्ष 10 खेल राष्ट्रों में और स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होने तक शीर्ष 5 में स्थान दिलाना शामिल है।”

उन्होंने यह भी बताया कि खेल सामग्री निर्माण के लिए ₹500 करोड़ का प्रावधान किया गया है, जो न केवल घरेलू निर्माण क्षमता को मजबूत करेगा, बल्कि आत्मनिर्भर और वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी खेल पारिस्थितिकी तंत्र के विकास में भी मदद करेगा।

डॉ. मंडाविया ने खेल के बदलते स्वरूप पर जोर देते हुए कहा:

“आज खेल एक पेशा बन चुका है। इसलिए प्रतिभा की पहचान और पोषण प्रणाली को मजबूत करना आवश्यक है। सरकार को एक कदम आगे रहकर ऐसे अवसर और प्रणाली बनानी होगी, जो युवा प्रतिभाओं को ग्रासरूट स्तर से एलीट स्तर तक विकसित होने का अवसर दें।”

उन्होंने आगे कहा कि खेल अवसंरचना विकास से पूरे देश के एथलीटों को प्रेरणा मिलेगी, भारत के हाई-परफॉर्मेंस स्पोर्ट्स ईकोसिस्टम को मजबूत करने में मदद मिलेगी और राष्ट्र के दीर्घकालिक खेल लक्ष्यों में महत्वपूर्ण योगदान होगा।



दिवाकर जयंत, INAS ने नौसेना आयुध महानिदेशक (DGONA) का कार्यभार संभाला

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दिवाकर जयंत, INAS ने 02 फरवरी, 2026 को नौसेना मुख्यालय, रक्षा मंत्रालय में नौसेना आयुध महानिदेशक (DGONA) के पद का कार्यभार संभाला। वे पी. उपाध्याय का उत्तराधिकारी बने, जिनका सेवा निवृत्ति दिवस 31 जनवरी, 2026 था।

दिवाकर जयंत 1991 बैच के भारतीय नौसेना आयुध सेवा (INAS) के अधिकारी हैं। उन्होंने 28 दिसंबर, 1992 को भारतीय नौसेना के नौसेना आयुध संगठन में सेवा प्रारंभ की और 33 वर्षों की सेवा में मुंबई, विशाखापट्टनम और अल्वे में नौसेना आयुध डिपो तथा NHQ/MoD में विभिन्न वरिष्ठ पदों पर कार्यभार संभाला। इनमें चीफ जनरल मैनेजर और जनरल मैनेजर/प्रिंसिपल डायरेक्टर जैसे महत्वपूर्ण पद शामिल हैं।

आईआईटी दिल्ली से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक, दिवाकर जयंत टॉरपीडो के जीवन-चक्र प्रबंधन में विशेषज्ञ हैं और विस्फोटक अवसंरचना परियोजनाओं की योजना बनाने में दक्ष हैं। इसके साथ ही उनके पास मानव संसाधन और प्रशासन का व्यापक ज्ञान भी है। अधिकारी ने प्रतिष्ठित APPPA कोर्स (2017–18) भी पूरा किया है।


डीआरडीओ ने सॉलिड फ्यूल डक्टेड रैमजेट (SFDR) तकनीक का सफल प्रदर्शन किया

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रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने 03 फरवरी, 2026 को लगभग 10:45 बजे ओडिशा तट के पास चांदीपुर स्थित एकीकृत परीक्षण रेंज (ITR) से सॉलिड फ्यूल डक्टेड रैमजेट (SFDR) तकनीक का सफल प्रदर्शन किया। इस सफलता के साथ भारत उन चुनिंदा देशों के विशिष्ट समूह में शामिल हो गया है, जिनके पास यह अत्याधुनिक तकनीक उपलब्ध है। यह तकनीक लंबी दूरी की एयर-टू-एयर मिसाइलों के विकास में सक्षम बनाती है, जिससे भारत को अपने प्रतिद्वंद्वियों पर महत्वपूर्ण सामरिक बढ़त प्राप्त होगी।

इस परीक्षण के दौरान सभी उप-प्रणालियों ने अपेक्षा के अनुरूप प्रदर्शन किया। ग्राउंड बूस्टर मोटर द्वारा प्रणाली को वांछित मैक संख्या तक पहुँचाने के बाद नोज़ल-रहित बूस्टर, सॉलिड फ्यूल डक्टेड रैमजेट मोटर तथा फ्यूल फ्लो कंट्रोलर ने सफलतापूर्वक कार्य किया। प्रणाली के प्रदर्शन की पुष्टि उड़ान के दौरान प्राप्त डेटा के माध्यम से की गई, जिसे बंगाल की खाड़ी के तट पर चांदीपुर ITR द्वारा तैनात अनेक ट्रैकिंग उपकरणों ने रिकॉर्ड किया।

इस प्रक्षेपण की निगरानी डीआरडीओ की विभिन्न प्रयोगशालाओं के वरिष्ठ वैज्ञानिकों द्वारा की गई, जिनमें डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट लेबोरेटरी (DRDL), हाई एनर्जी मटीरियल्स रिसर्च लेबोरेटरी (HEMRL), रिसर्च सेंटर इमारत (RCI) तथा ITR, चांदीपुर शामिल हैं।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने SFDR तकनीक के सफल प्रदर्शन पर डीआरडीओ और उद्योग जगत को बधाई दी।
वहीं, रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव एवं डीआरडीओ के अध्यक्ष डॉ. समीर वी. कामत ने भी इस सफल उड़ान परीक्षण में शामिल सभी टीमों को शुभकामनाएँ दीं।


खाद्य तेल क्षेत्र में नियामक निगरानी को सुदृढ़ करने के लिए सरकार के सख्त कदम

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भारत सरकार ने वनस्पति तेल उत्पाद, उत्पादन एवं उपलब्धता (नियमन) संशोधन आदेश, 2025 (VOPPA आदेश, 2025) के माध्यम से खाद्य तेल मूल्य श्रृंखला में नियामक निगरानी को और अधिक मजबूत किया है। संशोधित आदेश के तहत सभी खाद्य तेल निर्माताओं, प्रसंस्करणकर्ताओं, ब्लेंडरों एवं री-पैकर्स के लिए राष्ट्रीय एकल खिड़की प्रणाली (NSWS) तथा VOPPA पोर्टल (https://www.edibleoilindia.in) पर अनिवार्य पंजीकरण और उत्पादन, भंडारण एवं उपलब्धता से संबंधित विस्तृत मासिक विवरण प्रस्तुत करना अनिवार्य किया गया है।

संशोधित VOPPA आदेश, 2025 के अंतर्गत सभी पंजीकृत इकाइयों को कच्चे एवं परिष्कृत वनस्पति तेल, सॉल्वेंट-एक्सट्रैक्टेड तेल, मिश्रित तेल, वनस्पति घी, मार्जरीन तथा अन्य अधिसूचित उत्पादों के उत्पादन, भंडार, आयात, प्रेषण, बिक्री और उपभोग से संबंधित मासिक विवरण अनिवार्य रूप से प्रस्तुत करना होगा। इस ढांचे का उद्देश्य पारदर्शिता को बढ़ावा देना, डेटा-आधारित नीतिगत निर्णयों को सक्षम बनाना तथा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा को सुदृढ़ करना है।

देशव्यापी अनुपालन अभियान के तहत खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग (DFPD) द्वारा हरियाणा के करनाल और राजस्थान के जयपुर सहित विभिन्न स्थानों पर निरीक्षण अभियान चलाए गए। इन अभियानों के दौरान NSWS/VOPPA पंजीकरण की पुष्टि, मासिक विवरणों की समयबद्धता एवं शुद्धता का आकलन किया गया तथा खाद्य तेल उद्योग से जुड़े हितधारकों के साथ संवाद कर अनुपालन को प्रोत्साहित किया गया। यह पहल खाद्य तेल क्षेत्र की प्रभावी निगरानी सुनिश्चित करने के व्यापक प्रयासों का हिस्सा है।

प्रवर्तन के साथ-साथ विभाग द्वारा अनुपालन को सुगम बनाने के लिए क्षमता निर्माण गतिविधियाँ भी की जा रही हैं। इस क्रम में 30 जनवरी 2026 को RIC, जयपुर में एक कार्यशाला आयोजित की गई, जिसमें सटीक डेटा रिपोर्टिंग, NSWS पंजीकरण, VOPPA पोर्टल के उपयोग और समय पर मासिक विवरण दाखिल करने पर जोर दिया गया। इसी प्रकार की कार्यशालाएँ अन्य प्रमुख राज्यों में भी आयोजित की जाएंगी। इस पहल को आगे बढ़ाते हुए 16 फरवरी 2026 को राजकोट, गुजरात में तीसरी जागरूकता कार्यशाला आयोजित करने का प्रस्ताव है, क्योंकि इस क्षेत्र में खाद्य तेल प्रसंस्करण इकाइयों की संख्या अधिक है।

निरीक्षणों और उसके बाद की समीक्षाओं के आधार पर, विभाग ने कुछ बड़ी खाद्य तेल कंपनियों को कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notices) जारी किए हैं, जिन्होंने ईमेल और टेलीफोन के माध्यम से बार-बार स्मरण कराने के बावजूद अनिवार्य मासिक उत्पादन विवरण प्रस्तुत नहीं किए। इस प्रकार की चूक आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 की धारा 3 के अंतर्गत जारी VOPPA आदेश, 2025 का उल्लंघन है।

संबंधित इकाइयों को सूचित किया गया है कि आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 की धारा 6A के अंतर्गत उल्लंघन की स्थिति में निरीक्षण एवं जब्ती जैसी कार्रवाई की जा सकती है। इसके अतिरिक्त, धारा 6B के अनुसार, किसी भी जब्ती आदेश से पूर्व संबंधित पक्ष को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिया जाना अनिवार्य है। इसी क्रम में, संबंधित इकाइयों को यह बताने के लिए सात दिन का समय दिया गया है कि उनके विरुद्ध कार्रवाई क्यों न की जाए।

विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि VOPPA ढांचे के अंतर्गत पंजीकरण न कराने वाली अथवा अनिवार्य विवरण दाखिल न करने वाली सभी इकाइयों को इसी प्रकार के कारण बताओ नोटिस जारी किए जाएंगे, ताकि पूरे क्षेत्र में समान और एकरूप अनुपालन सुनिश्चित किया जा सके। खाद्य तेल प्रसंस्करण इकाइयों में आवश्यकता के आधार पर निरीक्षण अभियान आगे भी जारी रहेंगे।

सरकार ने प्रभावी नीतिगत निर्माण और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के हित में खाद्य तेल क्षेत्र में पारदर्शिता, जवाबदेही और कड़े अनुपालन को सुनिश्चित करने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है।


एयर इंडिया की उड़ान AI-132 (लंदन–बेंगलुरु) से संबंधित ईंधन नियंत्रण स्विच की जांच पर स्पष्टीकरण

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दिनांक 01.02.2026 को एयर इंडिया का B787-8 विमान (VT-ANX) उड़ान संख्या AI-132 (लंदन–बेंगलुरु) का संचालन कर रहा था। लंदन में इंजन स्टार्ट के दौरान, दो अवसरों पर चालक दल ने यह देखा कि फ्यूल कंट्रोल स्विच हल्का ऊर्ध्वाधर दबाव डालने पर “RUN” स्थिति में मजबूती से लॉक (positively latched) नहीं रह रहा था। तीसरे प्रयास में स्विच “RUN” स्थिति में सही ढंग से लॉक हो गया और उसके बाद स्थिर बना रहा।

आगे की प्रक्रिया जारी रखने से पहले, चालक दल द्वारा भौतिक रूप से यह सुनिश्चित किया गया कि स्विच पूरी तरह और मजबूती से “RUN” स्थिति में लॉक है। इंजन स्टार्ट के दौरान या उसके बाद किसी भी समय कोई असामान्य इंजन पैरामीटर, चेतावनी, सावधानी संकेत या संबंधित सिस्टम संदेश नहीं पाया गया। इस अवलोकन की जानकारी ड्यूटी पर मौजूद चालक दल के सदस्य को दी गई, स्विच के अनावश्यक संपर्क से बचा गया तथा शेष उड़ान के दौरान इंजन संकेतों और अलर्टिंग सिस्टम की कड़ी निगरानी की गई। उड़ान सुरक्षित रूप से बिना किसी घटना के पूरी की गई।

बेंगलुरु में लैंडिंग के बाद, चालक दल ने इस दोष को PDR (Pilot Defect Report) में दर्ज किया। एयर इंडिया ने इस विषय को आगे मार्गदर्शन के लिए एम/एस बोइंग के संज्ञान में लाया। बोइंग द्वारा सुझाई गई जांचों के आधार पर, ईंधन नियंत्रण स्विच की सेवा-योग्यता स्थापित करने हेतु एयर इंडिया इंजीनियरिंग द्वारा निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले गए:

“बाएँ और दाएँ दोनों स्विचों की जांच की गई और उन्हें संतोषजनक पाया गया। लॉकिंग टूथ/पॉल पूरी तरह से बैठा हुआ था और RUN से CUTOFF की ओर फिसल नहीं रहा था। बेस प्लेट के समानांतर पूर्ण बल लगाने पर स्विच सुरक्षित बना रहा। हालांकि, यदि बाहरी बल गलत दिशा में लगाया गया, तो कोणीय बेस प्लेट के कारण स्विच RUN से CUTOFF की ओर आसानी से सरक गया, विशेषकर जब उंगली या अंगूठे से अनुचित ढंग से दबाव डाला गया।”

इसके अतिरिक्त, बोइंग के संचार के आधार पर, अनुशंसित प्रक्रिया के अनुसार संबंधित फ्यूल कट-ऑफ स्विच, स्थापित किए जाने वाले फ्यूल कंट्रोल यूनिट तथा एक अन्य विमान के फ्यूल कट-ऑफ स्विच पर पुल-टू-अनलॉक फोर्स की जांच की गई। सभी मामलों में यह बल निर्धारित सीमाओं के भीतर पाया गया। ये सभी निरीक्षण DGCA अधिकारियों की उपस्थिति में किए गए।

सोशल मीडिया पर वर्तमान में प्रसारित वीडियो का भी बोइंग द्वारा अनुशंसित प्रक्रियाओं के संदर्भ में विश्लेषण किया गया। विश्लेषण में यह पाया गया कि वीडियो में दर्शाई गई प्रक्रिया गलत है और बोइंग द्वारा निर्धारित मानक संचालन प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है।

इस परिप्रेक्ष्य में, एयरलाइन को सलाह दी जा रही है कि वह फ्यूल CUT OFF स्विच के संचालन से संबंधित बोइंग द्वारा अनुशंसित प्रक्रिया को अपने सभी चालक दल सदस्यों के बीच प्रसारित करे, ताकि किसी भी प्रकार की गलतफहमी से बचा जा सके।


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