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सभी समाजों के सहयोग से ही विकसित छत्तीसगढ़ का सपना होगा साकार – मुख्यमंत्री साय

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रायगढ़ में उत्कल दिवस एवं वार्षिकोत्सव स्नेह सम्मेलन में शामिल हुए मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णु देव साय आज रायगढ़ के बाबा प्रियदर्शी राम ऑडिटोरियम, पंजरी प्लांट में उत्कल सांस्कृतिक सेवा समिति द्वारा आयोजित ‘उत्कल दिवस एवं वार्षिकोत्सव स्नेह सम्मेलन’ में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ मुख्यमंत्री साय द्वारा भगवान जगन्नाथ स्वामी की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलन एवं ‘वंदे उत्कल जननी’ के मधुर गायन के साथ हुआ।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने इस अवसर पर उपस्थित जनसमूह को आत्मीयतापूर्वक संबोधित करते हुए  कहा कि वे यहां अतिथि के रूप में नहीं, बल्कि अपने परिवार के बीच आए हैं। उन्होंने कहा कि रायगढ़ की जनता ने उन्हें 20 वर्षों तक सांसद के रूप में अपना भरपूर आशीर्वाद दिया है और वही स्नेह एवं अपनापन उन्हें आज भी प्राप्त हो रहा है।

मुख्यमंत्री साय ने ओडिशा और छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक संबंधों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि दोनों राज्यों के बीच ‘रोटी-बेटी’ का अटूट रिश्ता है। उन्होंने कहा कि जशपुर के कुनकुरी से लेकर छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती क्षेत्रों तक बड़ी संख्या में लोग उड़िया भाषा बोलते हैं। देवभोग-गरियाबंद क्षेत्र में आज भी महाप्रसाद के रूप में भात मिलता है और छत्तीसगढ़ के कोने-कोने में रथ यात्रा का आयोजन होता है। 

मुख्यमंत्री साय ने समाज की  पत्रिका ‘सुविधा’ का विमोचन किया, जिसमें समाज के रीति-रिवाज, उपलब्धियां एवं संपर्क विवरण संकलित किए गए हैं। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने जगन्नाथ रथ यात्रा के आयोजन हेतु 5 लाख रुपये की राशि प्रदान करने की घोषणा की। 

मुख्यमंत्री साय ने अपने संबोधन में राज्य सरकार की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गारंटी के अनुरूप छत्तीसगढ़ में ऐतिहासिक कार्य किए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि 18 लाख प्रधानमंत्री आवासों की स्वीकृति दी गई है, जिनमें से 8 लाख आवास रिकॉर्ड समय में पूर्ण किए जा चुके हैं। किसानों से 3100 रुपये प्रति क्विंटल की दर से धान खरीदी की जा रही है तथा लगभग 70 लाख महिलाओं को महतारी वंदन योजना का लाभ मिल रहा है, जिससे प्रदेश खुशहाली की ओर अग्रसर है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार द्वारा रामलला दर्शन योजना प्रारंभ की गई है, जिसके अंतर्गत अब तक लगभग 42 हजार श्रद्धालु अयोध्या पहुंचकर भगवान रामलला के दर्शन कर चुके हैं। इस योजना के माध्यम से आम नागरिकों को सुगम एवं व्यवस्थित रूप से तीर्थ दर्शन का अवसर प्राप्त हो रहा है। इसके साथ ही मुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन योजना को भी पुनः प्रारंभ किया गया है, जिसके अंतर्गत विभिन्न धार्मिक स्थलों के दर्शन हेतु श्रद्धालुओं को सुविधाएं प्रदान की जा रही हैं। 

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि धर्मांतरण कराने वालों के विरुद्ध कठोर कानून पारित किया गया है, जिसमें कड़ी सजा एवं जुर्माने का प्रावधान है। उन्होंने कहा कि इससे अवैध धर्मांतरण पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित होगा।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह एवं जवानों के अदम्य साहस से नक्सलवाद के प्रभाव को समाप्त करने में सफलता मिली है। उन्होंने कहा कि अब ‘नियद नेल्लानार’ के तहत बस्तर में सड़कों, बिजली, शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाएं तेजी से पहुंचाई जा रही हैं, जिससे क्षेत्र में विकास की नई धारा प्रवाहित हो रही है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि पिछले दो वर्षों में विभिन्न विभागों में 20 से 25 हजार भर्तियां की गई हैं। चयन मंडल का गठन कर पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई जा रही है, जिससे युवाओं को बिना किसी भेदभाव के अवसर मिल रहे हैं। उन्होंने बताया कि पीएससी गड़बड़ी की उच्च स्तरीय जांच कराई गई है तथा ई-ऑफिस प्रणाली के माध्यम से प्रशासन में पारदर्शिता लाते हुए भ्रष्टाचार पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया जा रहा है।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि छत्तीसगढ़ को विकसित राज्य बनाने के लिए सभी समाजों का सहयोग आवश्यक है। उन्होंने कहा कि राज्य वन एवं खनिज संपदा से समृद्ध है और वन उत्पादों के वैल्यू एडिशन के माध्यम से स्वरोजगार के अवसरों को बढ़ावा दिया जा रहा है।उन्होंने आगे कहा कि राज्य सरकार द्वारा बिजली उपभोक्ताओं को राहत देने के उद्देश्य से मुख्यमंत्री बिजली बिल भुगतान समाधान योजना-2026 प्रारंभ की गई है। इस योजना के तहत बकाया बिजली बिलों के भुगतान हेतु आसान किस्तों का विकल्प उपलब्ध कराया गया है तथा सरचार्ज में राहत या छूट दी जा रही है। 

कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने उत्कल समाज की 8 प्रतिभाओं को उनकी विशेष उपलब्धियों के लिए सम्मानित किया।कार्यक्रम के समापन पर मुख्यमंत्री को स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया गया। 

इस अवसर पर झारसुगुड़ा विधायक टंकाधर त्रिपाठी, रायपुर उत्तर विधायक पुरंदर मिश्रा, नगर निगम महापौर जीवर्धन चौहान सहित बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।

NATO पर ट्रंप का बड़ा हमला: ‘कागज़ी शेर’ कहकर अमेरिका के बाहर निकलने के संकेत

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 वॉशिंगटन/नई दिल्ली : पश्चिमी सैन्य गठबंधन नाटो (NATO) के भविष्य पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गठबंधन को लेकर तीखी नाराज़गी जताते हुए संकेत दिया है कि अमेरिका इससे अलग होने पर गंभीरता से विचार कर सकता है।


ब्रिटिश अख़बार टेलीग्राफ को दिए इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा कि वे कभी भी NATO से प्रभावित नहीं रहे और इसे “कागज़ी शेर” मानते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि ईरान से जुड़े मौजूदा तनाव के दौरान सहयोगी देशों ने अमेरिका का साथ नहीं दिया।

होर्मुज जलडमरूमध्य विवाद बना वजह

ट्रंप की नाराज़गी की मुख्य वजह होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर सहयोगी देशों का रुख बताया जा रहा है। यह जलमार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है, जहां से दुनिया के लगभग 30 प्रतिशत तेल का परिवहन होता है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच इस जलडमरूमध्य में बाधा उत्पन्न हुई, जिसके बाद अमेरिका ने NATO देशों से इसे खुलवाने के लिए सैन्य सहयोग मांगा। हालांकि, कई यूरोपीय देशों ने युद्धपोत भेजने से इनकार कर दिया।

ट्रंप का NATO पर सीधा हमला

ट्रंप ने कहा,- “मैं NATO से कभी संतुष्ट नहीं था। मैं हमेशा से जानता था कि यह सिर्फ कागज़ी शेर है, और यह बात व्लादिमीर पुतिन भी जानते हैं।”

उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अब अमेरिका के लिए इस रक्षा गठबंधन में बने रहना मुश्किल हो सकता है।

सहयोगी देशों को दी चेतावनी

ट्रंप ने ब्रिटेन समेत अन्य सहयोगी देशों पर निशाना साधते हुए कहा कि उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए खुद आगे आना चाहिए। उन्होंने कहा कि जो देश ईरान के खिलाफ कार्रवाई में शामिल नहीं हुए, उन्हें अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय खुद कदम उठाने चाहिए।

ट्रंप ने कहा,
“आपको खुद के लिए लड़ना सीखना होगा। अमेरिका अब हमेशा आपकी मदद के लिए मौजूद नहीं रहेगा, ठीक वैसे ही जैसे आप हमारी मदद के लिए मौजूद नहीं थे।”

वैश्विक राजनीति पर पड़ सकता है असर

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका NATO से अलग होता है, तो इसका सीधा असर यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था और वैश्विक शक्ति संतुलन पर पड़ेगा। इससे रूस जैसे देशों को रणनीतिक बढ़त मिल सकती है और अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं।

पारसनाथ बने किसान-मजदूर महासंघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष,किसानो में हर्ष की लहर

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आरंग- राष्ट्रीय किसान नेता और समाजसेवी पारसनाथ साहू को किसान मजदूर महासंघ मध्यप्रदेश की संस्था द्वारा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मनोनीत किया गया है। उन्होंने बताया यह  संस्था किसान मजदूर महासंघ मध्यप्रदेश द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर संचालित  है।जिसके राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवकुमार  कक्का ने उनकी सक्रियता और कार्य प्रणाली को देखते हुए नियुक्ति पत्र भेजकर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मनोनीत किये है। ज्ञात हो कि पारसनाथ साहू काफी लंबे समय से मजदूरों और किसानों की समस्याओं, अनाज का उचित लाभकारी समर्थन मूल्य पर खरीदी की कानूनी गारंटी दिलाने, प्रदेश मे धान खरीदी में होने वाली अव्यवस्थाओं और समस्याओं सहित सिंचाई,बिजली,पानी, खाद बीज इत्यादि की उपलब्धता सुनिश्चित कराने लगातार प्रयासरत हैं।

वहीं पारसनाथ को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाये जाने पर क्षेत्र व प्रदेश के किसानों में हर्ष की लहर है। उन्होंने कहा है अब किसानों और मजदूरों की मांग व समस्यायों को राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता से रखते हुए उसके समाधान का प्रयास किया जाएगा। वहीं उनके राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनने पर अंचल के किसान नेता गोविन्द चन्द्राकर, श्रवण चन्द्राकर, झनकराम आवडे, घनाराम साहू, तेजराम विद्रोही, लक्ष्मी पटेल, दीपक चौहान,लल्लू सिंह,जुगनू चन्द्राकर, दूजेराम धीवर, योगेश, ईश्वरी साहू सहित सामाजिक संगठन पीपला वेलफेयर फाउंडेशन ने हर्ष व्यक्त करते हुए बधाई दिए हैं।

दूध बेचने से लेकर पहला करियर गोल्ड जीतने तकः जम्मू-कश्मीर के हमाम हुसैन की प्रेरणादायक कहानी

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28 वर्षीय पहलवान परिवार का गुजारा चलाने के लिए घर-घर दूध पहुंचाते हुए भी कुश्ती का अभ्यास करते रहे

मिट्टी के अखाड़े में अभ्यास के लिए 20 किमी और मैट ट्रेनिंग के लिए जम्मू तक 40 किमी का सफर तय करते हैं

रायपुर-   जब जम्मू-कश्मीर के हमाम हुसैन कुश्ती का अभ्यास नहीं कर रहे होते, तो वे अपने बड़े भाई के साथ घर-घर जाकर दूध पहुंचाने का काम करते हैं। जम्मू के जोरावर गांव के रहने वाले 28 वर्षीय हमाम के लिए जिंदगी और खेल हमेशा साथ-साथ चले हैं। पांच साल पहले पिता के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारी उनके और उनके बड़े भाई के कंधों पर आ गई। दोनों ने मिलकर दूध बेचकर घर चलाया और इसी के साथ हमाम ने अपने कुश्ती के सपने को जिंदा रखा।

यह संघर्ष आखिरकार खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स- 2026 में रंग लाया, जहां हमाम ने पुरुषों के 79 किग्रा फ्रीस्टाइल वर्ग में हिमाचल प्रदेश के मोहित कुमार को हराकर स्वर्ण पदक जीता। यह उनके 14 साल के कुश्ती करियर का पहला राष्ट्रीय स्तर का स्वर्ण पदक है।

हमाम ने साई मीडिया से कहा, “मेरे बड़े भाई भी पहलवान थे और राज्य स्तर पर खेल चुके हैं। पिता के निधन के बाद सारी जिम्मेदारी हम पर आ गई। मेरे भाई को कुश्ती छोड़नी पड़ी और उन्होंने दूध बेचना शुरू कर दिया। मैं भी उनके साथ दूध देने जाता था क्योंकि परिवार चलाना जरूरी था।लेकिन मेरे भाई ने मुझे हमेशा कुश्ती जारी रखने के लिए प्रेरित किया और मुझे दंगलों में लेकर जाते थे।”

हमाम ने बताया कि उनके पिता की छोड़ी हुई भैंसें ही परिवार की आजीविका का साधन बनीं। एक बच्चे के पिता हमाम ने कहा, “मेरे भाई ने दूध बेचकर घर चलाया और मैं उनकी मदद करता था। लेकिन जब मैंने मिट्टी के अखाड़े में कदम रखा, तो इस खेल से मुझे लगाव हो गया।”

सीमित संसाधनों के बावजूद हमाम ने कभी उम्मीद नहीं छोड़ी। वे अपने गांव से करीब 20 किलोमीटर दूर मिट्टी के अखाड़े में अभ्यास करते हैं और मैट पर ट्रेनिंग के लिए लगभग 40 किलोमीटर दूर जम्मू तक का सफर तय करते हैं। वह भी अपने काम की जिम्मेदारियों के साथ। उन्होंने कहा, “साई सेंटर जम्मू में है और हम निचले इलाके में रहते हैं, इसलिए वहां नियमित रूप से जाना मुश्किल होता है। हम आमतौर पर प्रतियोगिताओं के दौरान ही वहां जाते हैं, वरना गांव के अखाड़ों में ही अभ्यास करते हैं।”

हमाम आगे कहते हैं, “मेरे पास कोई व्यक्तिगत कोच नहीं है। अखाड़े में सीनियर पहलवान हमें मार्गदर्शन देते हैं। जब हम मैट पर अभ्यास करते हैं, तब वहां कोच होते हैं। गांवों में हमें शहरों जैसी सुविधाएं नहीं मिलतीं। अगर बेहतर सुविधाएं मिलें, तो हमारे क्षेत्र के पहलवान राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अधिक पदक जीत सकते हैंl हमाम के लिए यह स्वर्ण पदक सिर्फ एक जीत नहीं, बल्कि वर्षों के संघर्ष और समर्पण का प्रतीक है। उन्होंने अंत में कहा, “यहां आकर बहुत अच्छा लगा। यहां की सुविधाएं बहुत अच्छी थीं। हम एक पिछड़े इलाके से आते हैं, जहां कुश्ती के लिए ज्यादा समर्थन नहीं है, इसलिए हमें दूर-दूर तक जाना पड़ता है। यह पहली बार है जब हमारे लिए इस तरह की प्रतियोगिता आयोजित की गई है। अगर ऐसे और आयोजन होते रहें, तो हम और पदक जीत सकते हैं।”

जनवरी 2026 में रेस-वॉक शुरू करने वाली शिलांग की युवा एथलीट बेथलीन माकरी ने खुद पर यकीन रखते हुए खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स में जीता कांस्य पदक

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रायपुर- पिछले साल 29 दिसंबर को शिलांग के साई के स्पोर्ट्स ट्रेनिंग सेंटर में बेथलीन ग्रेस माकरी के कोच ने अचानक इस युवा एथलीट में एक रेस-वॉक एथलीट बनने की काबिलियत देखी। मजे की बात यह है कि बेथलीन खुद इस इवेंट के बारे में लगभग कुछ भी नहीं जानती थी और इसकी तकनीकी बारीकियों की तो बात ही छोड़ दें।

पिछले साल तक, मेघालय की यह युवा एथलीट एक मिडिल और लॉन्ग-डिस्टेंस रनर के तौर पर मुकाबला कर रही थीं। लेकिन 2026 की शुरुआत में, उसे अपना खेल बदलने के लिए कहा गया जिसने उसकी शारीरिक और मानसिक, दोनों तरह की ताकत की परीक्षा ली।

खासी ट्राइब से आने वाली बेथलीन के लिए यह बदलाव बेहद चुनौतीपूर्ण रहा। उनके लिए शुरुआती कुछ सप्ताह बहुत कठिन थे, जब वह रेस-वॉक की अनजान तकनीक के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश कर रही थीं और शरीर में तेज दर्द से जूझ रही थीं। इसके चलते कई रातें बिना नींद के बीतीं और मन में आत्म-संदेह भी पैदा होने लगा।

हालांकि, उनके कोच और परिवार के सहयोग ने उन्हें आगे बढ़ने की ताकत दी। तीन भाई-बहनों में सबसे छोटी और इकलौती बेटी होने के नाते, बेथलीन ने इस चुनौती को स्वीकार किया और खेल की तकनीकी बारीकियों को सीखने में खुद को पूरी तरह समर्पित कर दिया। इसके बाद उन्होंने खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स 2026 के पहले एडिशन में भाग लेने के लिए जगदलपुर का रुख किया।

उन्होंने साई मीडिया से कहा, '' पहले दो हफ्ते वाकई बहुत मुश्किल थे, खासकर मेरे शरीर के लिए। रेस-वॉक की तकनीकी बारीकियां मध्यम या लंबी दूरी की दौड़ से बिल्कुल अलग होती हैं, इसलिए मुझे इसे समझने में समय लगा। इसके बाद कई रातों तक नींद नहीं आई, घबराहट के पल आए और आखिरकार मुझे खुद पर शक होने लगा कि क्या मेरा फैसला सही था।'' 

लेकिन बुधवार को उन संघर्षों का भरपूर फल मिला। बेथलीन ने महिलाओं की रेस-वॉक स्पर्धा में 1:05:18 का समय निकालकर कांस्य पदक जीता। वह झारखंड की नेहा ज़ालक्सो (1:04:02) और ओडिशा की एलीश एक्का (1:04:59) के बाद तीसरे स्थान पर रहीं।

पदक जीतने के कुछ ही पलों बाद इस एथलीट ने इसका श्रेय अपने कोच और परिवार को दिया। उन्होंने कहा, ''मेरे कोच और मेरे परिवार ने मेरा पूरा साथ दिया, और मुझे इसे जारी रखने के लिए लगातार प्रेरित करते रहे। मैंने भी इसे आज़माने का सोचा, और आज मैं यहां हूं। मेरे पास अभी भी सुधार की गुंजाइश है, लेकिन यह ठीक वैसी ही शुरुआत थी जिसकी मुझे ज़रूरत थी।'' 

उन्होंने आगे कहा, '' खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स में मिला कांस्य पदक मेरी कड़ी मेहनत, मेरे विश्वास और मेरे कोचों व परिवार के समर्थन का प्रमाण है और यह इस खेल में आगे बढ़ने के लिए मेरे आत्मविश्वास को बढ़ाने का काम करता है।“

शिलांग कॉलेज में बीए की दूसरे वर्ष की छात्रा बेथलीन को इस बात पर बेहद गर्व है कि वह मेघालय की एकमात्र ऐसी 'रेस वॉकर' हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीता है।

उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, '' मेघालय से कोई रेस वॉकर नहीं है और मेरा मानना है कि मेरा 'खेलो इंडिया' पदक युवाओं को इस खेल को पेशेवर तौर पर अपनाने के लिए प्रोत्साहित करेगा। मुझे भी अब यह खेल पसंद आने लगा है।''

आरंग में हर्षोल्लास से मनाया जाएगा हनुमान जन्मोत्सव, जगह-जगह होगा भोग भंडारे का आयोजन

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आरंग- मंदिरों की नगरी आरंग के हर गली मोहल्ले में स्थापित है पवन पुत्र हनुमान। जहां प्रतिदिन श्रद्धालु आते जाते मत्था टेककर कामना करते हैं। खासकर शनिवार और मंगलवार को भक्तगण यहां पहुंचकर सुंदर काण्ड और हनुमान चालीसा का जाप करते हैं। वहीं आज हनुमान जन्मोत्सव के अवसर पर नगर सहित अंचल के गांव-गांव में जगह-जगह भोग भंडारा, हनुमान चालीसा, सुंदर काण्ड पाठ, भजन कीर्तन किया जा रहा है। प्रातः से ही साधक हनुमान मंदिरो में पहुंचकर पूजा आराधना में जुट जाएंगे।

यह नगर में सबसे अधिक हनुमान जी का मंदिर है। जिनमें महामाया पारा में विराजमान उत्तरमुखी नारायणबन हनुमान, जगन्नाथ मंदिर में स्थापित दक्षिणमुखी हनुमान, गुप्ता पारा में स्थापित हनुमान, बागेश्वर मंदिर के सामने स्थापित हनुमान, पुराने सब्जी बाजार में स्थित रेणुक देव हनुमान, बरगुडी पारा का हनुमान, बस स्टैण्ड में स्थापित प्राचीन हनुमान मंदिर व प्रतिमाएं प्रमुख हैं। यही कारण है इस नगर में प्रतिवर्ष हनुमान जन्मोत्सव को बहुत ही हर्षोल्लास से मनाया जाता है।भक्त इस दिन प्रायः सभी हनुमान जी की प्रतिमाओ में सिंदूर का लेप कर विशेष रूप से पूजा अर्चना करते हैं। सुंदर काण्ड और हनुमान चालीसा का पाठ और भजन कीर्तन करते हैं। बहुत हर्षोल्लास से हनुमान जन्मोत्सव को मनाते है।


जगदलपुर में केंद्रीय मंत्री रक्षा खडसे ने महिला स्व-सहायता समूहों और बस्तर की पारंपरिक कला को सराहा

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केंद्रीय युवा मामले एवं खेल राज्य मंत्री रक्षा खडसे ने आज जगदलपुर में ‘छत्तीस कला’ ब्रांड के अंतर्गत प्रगति महिला स्व-सहायता समूह के ग्रोथ सेंटर और स्टॉल का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने स्थानीय उत्पादों का अवलोकन किया और स्व-सहायता समूहों से जुड़ी महिला उद्यमियों से संवाद किया।

इस दौरे ने छत्तीसगढ़ में महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण और सामुदायिक विकास की दिशा में हो रही उल्लेखनीय प्रगति को उजागर किया। रक्षा खडसे ने कहा कि स्व-सहायता समूह महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक परिवर्तन के प्रेरक के रूप में भी उभर रहे हैं।

उन्होंने राज्य की महिला-केंद्रित योजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि ‘महतारी वंदन योजना’ जैसी पहल महिलाओं को आर्थिक सहायता प्रदान कर रही है। इसके साथ ही ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के माध्यम से उत्पादों की बिक्री, रेडी-टू-ईट खाद्य पदार्थों का निर्माण और ‘लखपति दीदी योजना’ जैसी पहलों से आजीविका के नए अवसर और बाजार तक पहुंच बढ़ रही है।

मंत्री ने कहा कि ये प्रयास न केवल आय सृजन में सहायक हैं, बल्कि पोषण सुरक्षा, रोजगार सृजन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने इसे ‘नारी शक्ति’ के नेतृत्व में आत्मनिर्भर भारत के निर्माण की दिशा में एक मजबूत कदम बताया।

बस्तर जिले के चिलकुटी गांव के दौरे के दौरान रक्षा खडसे ने क्षेत्र की समृद्ध कला और सांस्कृतिक विरासत का भी अवलोकन किया। इस दौरान उन्होंने पारंपरिक ‘ढोकरा कला’ (लॉस्ट-वैक्स तकनीक) को करीब से देखा, जो बस्तर की जनजातीय कला का एक प्रमुख और विशिष्ट रूप है।

उन्होंने इस कला के संरक्षण के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि यह केवल एक कला नहीं, बल्कि स्थानीय जनजातीय समुदायों की जीवित सांस्कृतिक धरोहर और विरासत का प्रतीक है। साथ ही, यह पारंपरिक कला स्थानीय लोगों के लिए स्थायी आजीविका का महत्वपूर्ण साधन भी है।

कार्यक्रम के दौरान रक्षा खडसे ने महिला उद्यमियों और कारीगरों से संवाद किया, उनके कार्यों की सराहना की और उन्हें अपने प्रयासों को और आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया।

इस अवसर पर जिला कलेक्टर आकाश छिकारा (IAS), पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा (IPS), जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी प्रतीक जैन (IAS) और एसडीएम गगन शर्मा उपस्थित थे।

छत्तीसगढ़ में महिला-नेतृत्व वाले स्व-सहायता समूहों और पारंपरिक जनजातीय कलाओं के माध्यम से हो रहा परिवर्तन महिला सशक्तिकरण, ग्रामीण विकास और समावेशी आर्थिक वृद्धि का एक प्रेरक मॉडल बनकर उभर रहा है।


वैज्ञानिकों ने अंगूर में बीजरहितता के आनुवंशिक रहस्यों का किया खुलासा

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वैज्ञानिकों ने अंगूर में बीजरहित (Seedless) होने के पीछे छिपे महत्वपूर्ण आनुवंशिक और विकासात्मक तंत्रों का खुलासा किया है। बीजरहित अंगूर, अपने पतले छिलके, मीठे स्वाद और बेहतर बनावट के कारण उपभोक्ताओं और अंगूर उद्योग में अत्यधिक पसंद किए जाते हैं, जिससे यह गुण प्रजनन कार्यक्रमों में अत्यंत महत्वपूर्ण बन गया है।

अंगूर विश्व की प्रमुख बागवानी फसलों में से एक है, जिसका बड़ा हिस्सा ताजे फल या किशमिश जैसे प्रसंस्कृत उत्पादों के रूप में उपयोग होता है। हालांकि बीजरहित अंगूर की मांग तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इसके पीछे के जैविक तंत्र अभी तक पूरी तरह स्पष्ट नहीं थे।

यह शोध पुणे स्थित आघारकर अनुसंधान संस्थान (ARI), जो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्थान है, तथा सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के सहयोग से किया गया। इस अध्ययन में पराग (पोलन) की निष्क्रियता से बीजरहित अंगूर बनने की आणविक और जीनोमिक प्रक्रियाओं पर नई जानकारी प्राप्त हुई है, जिससे बेहतर गुणवत्ता और अधिक उत्पादन वाली नई किस्में विकसित करने में मदद मिलेगी।

यह अध्ययन हाल ही में ‘BMC Plant Biology’ में प्रकाशित हुआ है, जिसमें संस्थान द्वारा विकसित उच्च उत्पादक अंगूर किस्म ARI-516 से प्राप्त एक बीजरहित म्यूटेंट का विश्लेषण किया गया।

डॉ. रवींद्र पाटिल के नेतृत्व में शोध टीम ने बीज वाले अंगूर (ARI-516) और उसके बीजरहित म्यूटेंट के बीच तुलनात्मक अध्ययन किया। सूक्ष्म परीक्षण में पाया गया कि बीजरहित म्यूटेंट में पराग कणों का आकार असामान्य था, उनकी जीवित रहने की क्षमता बहुत कम थी और वे अंकुरित नहीं हो पाते थे, जिससे पराग की निष्क्रियता बीजरहितता का मुख्य कारण सामने आई।

इसके अलावा, मादा प्रजनन संरचनाएं (मैक्रोगैमेटोफाइट्स) भी सामान्य किस्म की तुलना में छोटी पाई गईं, जिससे निषेचन प्रक्रिया बाधित होती है और अंततः बीजरहित फल बनते हैं।

आणविक स्तर पर, वैज्ञानिकों ने ट्रांसक्रिप्टोमिक विश्लेषण (RNA सीक्वेंसिंग) किया, जिससे पता चला कि पराग विकास, कोशिका विभाजन और हार्मोन सिग्नलिंग से जुड़े कई जीन बीजरहित म्यूटेंट में कम सक्रिय थे। साथ ही, जीनोम सीक्वेंसिंग में कई ‘इन्सर्शन-डिलीशन’ (InDel) म्यूटेशन पाए गए, जो पराग निर्माण और उसके कार्य को प्रभावित करते हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार, यह बीजरहितता ‘पार्थेनोकार्पी’ नामक प्रक्रिया के कारण होती है, जिसमें निषेचन के बिना ही फल का विकास होता है। यह प्रक्रिया पराग निर्माण और प्रजनन में दोष के कारण उत्पन्न होती है।

यह अध्ययन आधुनिक जीनोमिक तकनीकों का उपयोग करते हुए अंगूर में पार्थेनोकार्पिक बीजरहितता को समझने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। इससे जुड़े जीनों की पहचान भविष्य में अंगूर की उन्नत बीजरहित किस्मों के विकास में सहायक होगी, जिससे उत्पादन, गुणवत्ता और अनुकूलन क्षमता में सुधार होगा और बागवानी क्षेत्र को लाभ मिलेगा।

भारतीय वैज्ञानिकों ने बिना बाहरी सहायता के स्वयं-उपचार करने वाले ऑर्गेनिक क्रिस्टल की खोज की

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भारतीय वैज्ञानिकों ने हाल ही में परतदार संरचना वाले ऑर्गेनिक क्रिस्टल में एक अनोखी स्वयं-उपचार (Self-Healing) क्षमता की खोज की है, जिसमें किसी भी बाहरी उत्तेजना की आवश्यकता नहीं होती। यह खोज ऐसे उन्नत पदार्थों के विकास में सहायक हो सकती है, जो तकनीकी उपयोगों में ऊर्ध्वाधर भार (Vertical Load) को सहन कर सकें।

वर्तमान में उपलब्ध अधिकांश स्वयं-उपचार तकनीकें प्रकाश, ताप या किसी रासायनिक माध्यम जैसे बाहरी कारकों पर निर्भर करती हैं, जिससे उनका उपयोग सीमित हो जाता है, विशेषकर उन परिस्थितियों में जहां बाहरी हस्तक्षेप संभव नहीं होता। स्वायत्त (Autonomous) स्वयं-उपचार के लिए आमतौर पर पॉलिमर, हाइड्रोजेल और कॉम्पोजिट्स में क्रॉस-लिंकिंग या हीलिंग एजेंट्स का उपयोग किया जाता है, लेकिन क्रिस्टलीय पदार्थों में यह प्रभावी नहीं होता क्योंकि उपचार के बाद उनकी संरचना (क्रिस्टैलिनिटी) को पुनः स्थापित करना अत्यंत आवश्यक होता है।

आईआईटी इंदौर (भौतिकी विभाग, प्रो. राजेश कुमार के नेतृत्व में), आईआईटी हैदराबाद (रसायन विज्ञान विभाग, प्रो. सी. मल्ला रेड्डी के नेतृत्व में) और विद्युत अभियांत्रिकी विभाग (प्रो. वरुण रघुनाथन के नेतृत्व में) के वैज्ञानिकों की टीम ने पाया कि परतदार संरचना वाले लचीले ऑर्गेनिक क्रिस्टल में माइक्रोन स्तर की बड़ी दरारें कुछ ही मिलीसेकंड में स्वतः ठीक हो सकती हैं। यह प्रक्रिया माइक्रोस्ट्रक्चर स्तर पर “सिमेट्री ब्रेकिंग” नामक एक नई प्रणाली के माध्यम से होती है, जिसकी पुष्टि रमन स्पेक्ट्रो-माइक्रोस्कोपी तकनीक से की गई। यह सुविधा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) की FIST योजना के अंतर्गत समर्थित है।

इस शोध में रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी ने उपचार प्रक्रिया के सटीक तंत्र को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह कार्य डॉ. ईशिता घोष, डॉ. रबीन्द्र बिस्वास, डॉ. मनुश्री तनवर, डॉ. सुरोजित भुनिया, डॉ. कौस्तव दास और डॉ. अमित मोंडल सहित शोधकर्ताओं के सहयोग से किया गया, जिसे वर्ष 2026 में ‘नेचर कम्युनिकेशंस’ में प्रकाशित किया गया है।

यह अध्ययन जीवित ऊतकों में होने वाली स्वयं-उपचार प्रक्रियाओं को समझने और उनके आधार पर स्मार्ट मैटेरियल विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

भारतीय रेल ने 2025–26 में माल ढुलाई का नया रिकॉर्ड बनाया, 1670 मिलियन टन परिवहन के साथ ऐतिहासिक उपलब्धि

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भारतीय रेल ने वर्ष 2025–26 में माल परिवहन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करते हुए नया कीर्तिमान स्थापित किया है, जिससे देश की लॉजिस्टिक्स प्रणाली की रीढ़ के रूप में उसकी भूमिका और मजबूत हुई है। यह उपलब्धि परिचालन दक्षता में सुधार, क्षमता विस्तार और अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्रों द्वारा रेल परिवहन पर बढ़ते भरोसे को दर्शाती है।

माल ढुलाई में वृद्धि से बढ़ती लॉजिस्टिक्स मांग का संकेत

वर्ष 2025–26 के दौरान भारतीय रेल ने रिकॉर्ड 1670 मिलियन टन (MT) माल का परिवहन किया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 3.25% अधिक है। इसके साथ ही, संभाले गए वैगनों की संख्या में भी 4.56% की वृद्धि दर्ज की गई, जो 2024–25 के 2,79,12,271 से बढ़कर 2025–26 में 2,91,86,475 हो गई। यह लगातार बढ़ती माल ढुलाई विश्वसनीय, किफायती और कुशल लॉजिस्टिक्स समाधान की बढ़ती मांग को दर्शाती है, जिससे रेल परिवहन बल्क वस्तुओं के लिए एक पसंदीदा माध्यम बनता जा रहा है।

उर्वरक और इस्पात क्षेत्र से तेज वृद्धि

इस वृद्धि में उर्वरक (13.49%) और ‘पिग आयरन एवं स्टील’ (13.11%) क्षेत्रों का प्रमुख योगदान रहा। यह देशभर में कृषि इनपुट की बढ़ती मांग और इस्पात उद्योग में निरंतर विस्तार को दर्शाता है।

आयरन ओरे और सीमेंट से बुनियादी ढांचे को मजबूती

बुनियादी ढांचा से जुड़े प्रमुख क्षेत्रों ने भी इस गति को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आयरन ओरे का परिवहन 6.74% बढ़कर 190.12 मिलियन टन तक पहुंच गया, जबकि सीमेंट लोडिंग 4.74% बढ़कर 157.17 मिलियन टन हो गई। यह देशभर में जारी निर्माण और आधारभूत ढांचा विकास गतिविधियों को दर्शाता है।

सभी रेलवे जोनों में संतुलित वृद्धि

वर्ष 2025–26 में विभिन्न रेलवे जोनों में संतुलित वृद्धि देखने को मिली। दक्षिण पश्चिम रेलवे (SWR) ने 14.89% की सर्वाधिक वृद्धि दर्ज की। इसके अलावा, उत्तर मध्य रेलवे (12.62%), ईस्ट कोस्ट रेलवे (10.42%) और पश्चिम मध्य रेलवे (10.06%) ने भी दोहरे अंकों की वृद्धि हासिल की। अन्य जोनों—पूर्वी रेलवे, पूर्व मध्य रेलवे, उत्तर पूर्व रेलवे, पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे, उत्तर पश्चिम रेलवे, दक्षिण मध्य रेलवे, दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे, दक्षिणी रेलवे और पश्चिमी रेलवे—ने भी सकारात्मक वृद्धि दर्ज की। यह व्यापक सुधार देशभर में माल ढुलाई क्षमता के सुदृढ़ होने और संतुलित क्षेत्रीय विकास को दर्शाता है।

आर्थिक विकास में रेल की महत्वपूर्ण भूमिका

माल ढुलाई और आय में यह निरंतर वृद्धि भारतीय रेल की भारत के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करती है। किफायती, विश्वसनीय और पर्यावरण के अनुकूल परिवहन माध्यम प्रदान करते हुए रेलवे लॉजिस्टिक्स लागत को कम करने, सड़कों पर भीड़ घटाने और एक हरित एवं कुशल परिवहन प्रणाली के निर्माण में योगदान दे रहा है।

लेफ्टिनेंट जनरल वीएमबी कृष्णन ने पूर्वी कमान के जीओसी-इन-सी का संभाला पदभार

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लेफ्टिनेंट जनरल वीएमबी कृष्णन ने पूर्वी कमान के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ का पदभार संभाल लिया है। उन्होंने लेफ्टिनेंट जनरल आरसी तिवारी का स्थान लिया, जो 31 मार्च 2026 को सेवानिवृत्त हुए।

11 जून 1988 को भारतीय सेना में कमीशन प्राप्त करने वाले लेफ्टिनेंट जनरल कृष्णन लगभग चार दशकों के समृद्ध और विविध सैन्य अनुभव के साथ इस महत्वपूर्ण कमान की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। उनके करियर में देश के सबसे चुनौतीपूर्ण परिचालन क्षेत्रों में विभिन्न कमान, स्टाफ और प्रशिक्षण संबंधी नियुक्तियां शामिल रही हैं।

वे प्रमुख सैन्य संस्थानों के पूर्व छात्र हैं और उन्होंने सियाचिन जैसे अत्यंत दुर्गम उच्च हिमालयी क्षेत्र में एक इन्फैंट्री बटालियन और इन्फैंट्री ब्रिगेड की कमान संभाली है। इसके अलावा, उन्होंने एक इन्फैंट्री डिवीजन के जनरल ऑफिसर कमांडिंग के रूप में भी कार्य किया और बाद में प्रतिष्ठित ब्रह्मास्त्र कोर की कमान संभाली।

रणनीतिक और संस्थागत स्तर पर उन्होंने रक्षा मंत्रालय (सेना) के एकीकृत मुख्यालय में महानिदेशक सूचना प्रौद्योगिकी के रूप में कार्य किया तथा लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग में रक्षा सलाहकार के रूप में भी सेवाएं दीं। वर्तमान पदभार संभालने से पहले वे सेना मुख्यालय में क्वार्टर मास्टर जनरल के रूप में कार्यरत थे, जहां उन्होंने आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन और बुनियादी ढांचे में महत्वपूर्ण सुधार करते हुए परिचालन क्षमता और युद्धक तैयारियों को सुदृढ़ किया।

लेफ्टिनेंट जनरल कृष्णन ‘डोगरा रेजिमेंट’ और ‘डोगरा स्काउट्स’ के कर्नल के प्रतिष्ठित पद भी संभाल रहे हैं। काउंटर इंसर्जेंसी एंड जंगल वारफेयर स्कूल के कमांडेंट के रूप में उनके कार्यकाल ने विशेष प्रशिक्षण और सैन्य सिद्धांतों के विकास में उच्च मानक स्थापित किए।

पदभार ग्रहण करते हुए उन्होंने शहीद वीर जवानों को श्रद्धांजलि अर्पित की और पूर्वी कमान के सभी रैंकों से उच्चतम स्तर की परिचालन तत्परता बनाए रखने का आह्वान किया। उन्होंने संयुक्तता को मजबूत करने, तकनीकी एकीकरण को गति देने और सभी हितधारकों के साथ समन्वय बनाए रखने पर जोर दिया, ताकि पूर्वी क्षेत्र में स्थायी शांति और स्थिरता सुनिश्चित की जा सके।

लेफ्टिनेंट जनरल पुष्पेंद्र पाल सिंह ने पश्चिमी कमान के जीओसी-इन-सी का संभाला पदभार

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लेफ्टिनेंट जनरल पुष्पेंद्र पाल सिंह, जो पहले सेना के उप प्रमुख (VCOAS) रह चुके हैं, ने 01 अप्रैल 2026 को पश्चिमी कमान के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ के रूप में पदभार ग्रहण किया। उन्होंने लेफ्टिनेंट जनरल मनोज कुमार कटियार का स्थान लिया, जो 31 मार्च 2026 को सेवानिवृत्त हुए।

पैराशूट रेजिमेंट (स्पेशल फोर्सेस) के अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल पुष्पेंद्र पाल सिंह को दिसंबर 1987 में 4वीं बटालियन, पैराशूट रेजिमेंट (स्पेशल फोर्सेस) में कमीशन मिला था। वे भारतीय सैन्य अकादमी, देहरादून और लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र हैं।

लगभग चार दशकों के करियर में उन्होंने विभिन्न कमान और स्टाफ पदों पर सेवाएं दी हैं। उन्होंने उत्तरी और पश्चिमी सीमाओं पर उच्च ऊंचाई वाले और संवेदनशील क्षेत्रों में सैन्य इकाइयों का नेतृत्व किया है। उनके परिचालन अनुभव में ऑपरेशन पवन में भागीदारी के साथ-साथ नियंत्रण रेखा (LoC) और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर कई बार आतंकवाद-रोधी अभियानों का संचालन शामिल है।

VCOAS बनने से पहले उन्होंने सेना मुख्यालय में महानिदेशक परिचालन लॉजिस्टिक्स (DGOL) के रूप में कार्य किया, जहां उन्होंने परिचालन गतिशीलता, लॉजिस्टिक्स एकीकरण और स्थायित्व क्षमता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। VCOAS के रूप में उन्होंने सेना की संरचना, क्षमता विकास और समग्र परिचालन तैयारी में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

लेफ्टिनेंट जनरल सिंह ने कॉलेज ऑफ डिफेंस मैनेजमेंट, सिकंदराबाद से डिफेंस मैनेजमेंट कोर्स तथा भारतीय लोक प्रशासन संस्थान से एडवांस्ड प्रोफेशनल प्रोग्राम इन पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन किया है। उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में मास्टर डिग्री भी प्राप्त की है। उनके उत्कृष्ट सेवा और वीरता के लिए उन्हें अति विशिष्ट सेवा मेडल और दो सेना मेडल से सम्मानित किया गया है।

पदभार ग्रहण करते हुए उन्होंने उच्च परिचालन तत्परता बनाए रखने, नवाचार को बढ़ावा देने तथा सभी रैंकों के कल्याण और मनोबल को सुनिश्चित करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। यह नेतृत्व परिवर्तन भारतीय सेना की निरंतरता और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

उनके नेतृत्व में पश्चिमी कमान बहु-क्षेत्रीय अभियानों, ड्रोन और काउंटर-ड्रोन जैसी आधुनिक तकनीकों के उपयोग, खुफिया-आधारित अभियानों तथा बुनियादी ढांचे के विकास पर विशेष ध्यान देती रहेगी, साथ ही नागरिक प्रशासन के साथ समन्वय भी बनाए रखेगी।

अमरावती को एकमात्र राजधानी का दर्जा: आंध्र प्रदेश पुनर्गठन संशोधन विधेयक 2026 बना ऐतिहासिक मील का पत्थर

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केंद्रीय संचार एवं ग्रामीण विकास राज्य मंत्री डॉ. पेम्मासानी चंद्र शेखर ने आज लोकसभा में आंध्र प्रदेश पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक, 2026 के पारित होने को राज्य की विकास यात्रा में एक ऐतिहासिक क्षण बताया।

उन्होंने कहा कि इस विधेयक के माध्यम से अमरावती को एकमात्र राजधानी के रूप में कानूनी मान्यता मिलने से लंबे समय से चली आ रही संरचनात्मक अनिश्चितता समाप्त हो गई है, जो शासन, निवेश और विकास को प्रभावित कर रही थी।

डॉ. पेम्मासानी ने बताया कि पिछले कई वर्षों से स्पष्ट राजधानी के अभाव में प्रशासनिक अस्पष्टता, बुनियादी ढांचे के कार्यों में देरी और निवेशकों का भरोसा कम हुआ था। यह संशोधन एक स्पष्ट, स्थिर और दूरदर्शी ढांचा प्रदान करता है, जो राज्य पुनर्गठन की मूल भावना के अनुरूप एक विश्वस्तरीय राजधानी के दृष्टिकोण को पुनः स्थापित करता है।

उन्होंने अमरावती आंदोलन में किसानों और महिलाओं के असाधारण योगदान को रेखांकित किया। लगभग 29,000 किसानों ने स्वेच्छा से अपनी 34,000 एकड़ से अधिक पैतृक भूमि राज्य को सौंपी और नीतिगत बदलावों के कारण लंबे समय तक अनिश्चितता झेली।

उन्होंने कहा कि महिलाओं और स्थानीय समुदायों ने शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया और कठिन परिस्थितियों का सामना किया। 1,600 से अधिक दिनों तक यह आंदोलन अनुशासित, शांतिपूर्ण और दृढ़ रहा, जो लोकतांत्रिक मजबूती का एक सशक्त उदाहरण बनकर उभरा।

डॉ. पेम्मासानी ने कहा कि यह विधेयक केवल एक कानूनी सुधार नहीं, बल्कि नैतिक पुनर्स्थापन भी है, जो उन लोगों के सम्मान, न्याय और विश्वास को बहाल करता है, जिन्होंने राज्य के भविष्य के लिए असाधारण बलिदान दिए।

उन्होंने अमरावती के लिए परिवर्तनकारी दृष्टिकोण को दोहराते हुए कहा कि इसे एक वैश्विक स्तर के शहर और आंध्र प्रदेश के प्रमुख विकास इंजन के रूप में विकसित किया जा रहा है। 56,000 करोड़ रुपये से अधिक के 91 प्रमुख बुनियादी ढांचा परियोजनाएं पहले से ही प्रगति पर हैं। अमरावती को औपचारिक मान्यता मिलने से निवेश में तेजी, बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन और राज्य की अर्थव्यवस्था को गति मिलने की उम्मीद है।

उन्होंने कहा कि स्वैच्छिक भूमि पूलिंग पर आधारित अमरावती मॉडल सहभागी और समावेशी विकास का एक अनूठा उदाहरण है, जिसमें किसान राज्य के शहरी भविष्य के भागीदार बने हैं। यह मॉडल देशभर में समान विकास के लिए एक प्रेरणादायक ढांचा बन सकता है।

डॉ. पेम्मासानी ने यह भी कहा कि राजधानी शहर राज्य की आर्थिक प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अमरावती के केंद्र में होने से आंध्र प्रदेश शासन, व्यापार और नवाचार का एक प्रमुख केंद्र बनने की दिशा में अग्रसर है।

उन्होंने इस ऐतिहासिक विधेयक के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व और सहयोग की सराहना की।

उन्होंने कहा कि यह विधेयक केवल एक नीतिगत निर्णय नहीं, बल्कि एक निर्णायक बदलाव है, जो आंध्र प्रदेश के विकास की दिशा को पुनर्परिभाषित करेगा। प्रशासनिक स्थिरता सुनिश्चित करते हुए, निवेशकों का विश्वास बहाल करते हुए और जनता के बलिदानों का सम्मान करते हुए यह संशोधन अमरावती को आकांक्षा, दृढ़ता और समावेशी विकास के प्रतीक के रूप में स्थापित करता है।

AIIA की आयुर्वेदिक पहल से पुलिस कर्मियों में तनाव प्रबंधन को मिली नई दिशा, 35,000 से अधिक कर्मियों को लाभ

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अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (AIIA), नई दिल्ली ने महामारी के दौरान “पुलिस कर्मियों के लिए आयुर्वेदिक हस्तक्षेप द्वारा तनाव प्रबंधन” शीर्षक से एक जनस्वास्थ्य पहल (PHI) परियोजना शुरू की, जिसने उल्लेखनीय प्रभाव डाला है। अब तक इस परियोजना के माध्यम से 35,704 पुलिस कर्मियों में जागरूकता पैदा की जा चुकी है और इसे संस्थान की एक बड़ी सफलता माना जा रहा है।

AIIA के निदेशक प्रो. (वैद्य) प्रदीप कुमार प्रजापति ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य, शारीरिक स्वास्थ्य जितना ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा मानसिक स्वास्थ्य की परिभाषा का उल्लेख करते हुए कहा कि यह ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति अपनी क्षमताओं को पहचानता है, जीवन के सामान्य तनावों से निपट सकता है, उत्पादक रूप से कार्य कर सकता है और समाज में योगदान देने में सक्षम होता है। इस दृष्टि से मानसिक स्वास्थ्य व्यक्तिगत कल्याण और समाज के प्रभावी संचालन की नींव है।

यह परियोजना प्रो. (डॉ.) मेधा कुलकर्णी (प्रधान अन्वेषक) और प्रो. (डॉ.) मीना देओगड़े (सह-प्रधान अन्वेषक) के नेतृत्व में संचालित हो रही है। इस पहल के अंतर्गत एक विशेष तनाव प्रबंधन मोबाइल एप्लिकेशन भी विकसित किया गया है। दिल्ली पुलिस के विशेष पुलिस आयुक्त (कल्याण प्रभाग) अतुल कटियार, IPS ने आयुर्वेद की भूमिका और महत्व की सराहना करते हुए इसकी शाश्वत ज्ञान परंपरा और समग्र उपचार क्षमता को रेखांकित किया तथा इस परियोजना के लिए संस्थान का आभार व्यक्त किया।

परियोजना के बारे में बताते हुए प्रो. (डॉ.) मीना देओगड़े ने कहा कि पुलिस कर्मी अक्सर अत्यधिक शारीरिक और मानसिक दबाव में कार्य करते हैं, जिससे वे तनाव से संबंधित विकारों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। उन्होंने बताया कि इस परियोजना का उद्देश्य आयुर्वेद पर आधारित समग्र, निवारक और उपचारात्मक दृष्टिकोण के माध्यम से उनके मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य का संरक्षण करना है। इस पहल को मिले सकारात्मक प्रतिसाद और ठोस परिणाम इसकी प्रभावशीलता को दर्शाते हैं।

परियोजना के तहत 206 शिविर आयोजित किए गए, जिनमें 7,752 पुलिस कर्मियों की तनाव, उच्च रक्तचाप और अन्य संबंधित समस्याओं के लिए जांच की गई। इनमें से 1,843 कर्मियों को आयुर्वेदिक उपचार प्रदान किया गया, जिसमें आंतरिक औषधियों के साथ शिरोधारा जैसी चिकित्सा पद्धतियां शामिल थीं। दिल्ली पुलिस के कल्याण विभाग ने दो इकाइयों में स्थल उपलब्ध कराकर इस पहल को सहयोग दिया।

अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान, नई दिल्ली ने 24 मार्च 2026 को इस PHI परियोजना का एक दिवसीय प्रसार कार्यशाला भी आयोजित की। इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में अतुल कटियार, IPS (विशेष पुलिस आयुक्त, कल्याण प्रभाग, दिल्ली पुलिस) उपस्थित रहे। विशिष्ट अतिथि के रूप में आयुष मंत्रालय, भारत सरकार के सलाहकार डॉ. कौस्तुभ उपाध्याय शामिल हुए। कार्यक्रम की अध्यक्षता AIIA के निदेशक प्रो. (वैद्य) प्रदीप कुमार प्रजापति ने की। साथ ही, आयुष मंत्रालय की PHI परियोजना की जनस्वास्थ्य सलाहकार डॉ. सुनीला गर्ग भी उपस्थित रहीं।

कार्यशाला में विशेषज्ञ व्याख्यान आयोजित किए गए। पूर्वोत्तर आयुर्वेद एवं लोक चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (NEIAFMR), पासीघाट, अरुणाचल प्रदेश की सहायक प्रोफेसर डॉ. सजीना ए. ने “स्मृति मेडिटेशन के माध्यम से तनाव प्रबंधन” विषय पर व्याख्यान दिया। वहीं केरल के कोट्टक्कल स्थित VPSV आयुर्वेद कॉलेज की डॉ. अनुपमा कृष्णन ने “जब काम मन को प्रभावित करता है: व्यावसायिक तनाव और उसका आयुर्वेदिक प्रबंधन” विषय पर चर्चा की, जिसमें आयुर्वेद आधारित समग्र और निवारक उपायों पर जोर दिया गया।

यह कार्यशाला अनुसंधान निष्कर्षों के प्रसार और विशेष रूप से पुलिस कर्मियों जैसे उच्च जोखिम वाले पेशों में व्यावसायिक तनाव से निपटने में आयुर्वेद की भूमिका को सुदृढ़ करने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच साबित हुई।

उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने ‘Tides of Time’ पुस्तक का किया विमोचन, संसद के भित्ति चित्रों में भारत की सभ्यतागत यात्रा का वर्णन

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भारत के उपराष्ट्रपति एवं राज्यसभा के सभापति सी. पी. राधाकृष्णन ने आज नई दिल्ली के संविधान सदन में ‘Tides of Time: Bharat’s History through Murals in Parliament’ नामक पुस्तक का विमोचन किया। यह लोकसभा सचिवालय का प्रकाशन है, जिसकी लेखिका राज्यसभा सांसद सुधा मूर्ति हैं।

सभा को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने इस अवसर पर प्रसन्नता व्यक्त की और संसद की भित्ति चित्रों की “शाश्वत सुंदरता और गहन प्रतीकात्मकता” को चित्रित करने तथा इतिहास को पीढ़ियों के लिए सुलभ बनाने के लिए सुधा मूर्ति की सराहना की। उन्होंने कहा कि संविधान सदन में स्थित भित्ति चित्र केवल कला के नमूने नहीं हैं, बल्कि भारत की सभ्यतागत यात्रा को दर्शाने वाले दृश्य कथानक हैं।

उन्होंने कहा कि उत्तर में वैशाली से लेकर दक्षिण में कुडवोलाई प्रणाली तक भारत में लोकतांत्रिक परंपराएं निरंतर, समावेशी और समाज में गहराई से निहित रही हैं। ये परंपराएं संवाद, सहमति और विविध मतों के सम्मान पर आधारित व्यापक सभ्यतागत मूल्यों का हिस्सा हैं, जो भारत को “लोकतंत्र की जननी” बनाते हैं।

महान तमिल कवि सुब्रमण्यम भारती का उद्धरण देते हुए उपराष्ट्रपति ने भारत की बुद्धिमत्ता, गरिमा, उदारता और सांस्कृतिक गहराई की समृद्धि पर प्रकाश डाला और कहा कि ऐसी नींव स्वाभाविक रूप से समावेशिता और सभी मतों के सम्मान को बढ़ावा देती है।

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में संसद भवन में पारंपरिक प्रतीकों के समावेशन की सराहना की। साथ ही, उन्होंने राष्ट्रपति के संयुक्त सत्र संबोधन के दौरान चोल वंश के पवित्र सेंगोल के प्रदर्शन का उल्लेख करते हुए इसे आधुनिक भारत को उसकी सभ्यतागत जड़ों से जोड़ने वाला शक्तिशाली प्रतीक बताया।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि संसद एक जीवंत लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों—संवाद, बहस, असहमति और चर्चा—का प्रतिनिधित्व करती है। उन्होंने जोर दिया कि चर्चा, बहस और असहमति महत्वपूर्ण हैं, लेकिन अंततः उन्हें राष्ट्रीय हित में रचनात्मक निर्णय लेने की दिशा में योगदान देना चाहिए।

उन्होंने इस पुस्तक को भारत की सभ्यतागत यात्रा को समर्पित एक अद्भुत कृति बताया और कहा कि इसमें 124 भित्ति चित्रों के माध्यम से इतिहास को जीवंत रूप दिया गया है। यह पुस्तक सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर महर्षि वाल्मीकि और चाणक्य जैसे महान विचारकों की बुद्धिमत्ता तथा महावीर और गौतम बुद्ध की आध्यात्मिक शिक्षाओं तक की यात्रा को समेटती है। इसमें अशोक और छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे शासकों की उपलब्धियों, कोणार्क सूर्य मंदिर जैसे स्मारकों और भक्ति आंदोलन की सांस्कृतिक समृद्धि को भी दर्शाया गया है।

उन्होंने कहा कि यह पुस्तक भारत के स्वतंत्रता संग्राम को भी श्रद्धांजलि अर्पित करती है, जिसमें दांडी मार्च जैसे आंदोलन और महात्मा गांधी तथा सुभाष चंद्र बोस जैसे महान नेताओं का उल्लेख किया गया है।

प्रधानमंत्री के ‘विकसित भारत @ 2047’ के दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने “विकास भी, विरासत भी” के सिद्धांत को दोहराया और कहा कि विकास और विरासत एक-दूसरे के पूरक हैं। संसद के भित्ति चित्र इस दर्शन को दर्शाते हैं, जो प्रगति को पहचान, मूल्यों और निरंतरता से जोड़ते हैं।

उपराष्ट्रपति ने सुधा मूर्ति की सराहना करते हुए कहा कि वे ज्ञान, विनम्रता और सामाजिक प्रतिबद्धता का अद्वितीय संगम हैं। उन्होंने कॉर्पोरेट जगत से सामाजिक सेवा और संसद तक की उनकी यात्रा को प्रेरणादायक बताया और कहा कि उनके सभी कार्य व्यापक जनहित से प्रेरित होते हैं। उन्होंने इस प्रकाशन को प्रस्तुत करने के लिए लोकसभा सचिवालय के प्रयासों की भी प्रशंसा की।

सुब्रमण्यम भारती का पुनः उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भाषा, क्षेत्र और संस्कृति की विविधता के बावजूद भारत अपने राष्ट्रीय उद्देश्य में एकजुट है और हमेशा एक रहेगा।

“राष्ट्र प्रथम” की भावना को अपनाने का आह्वान करते हुए उपराष्ट्रपति ने सभी नागरिकों से आग्रह किया कि वे प्रतिबद्धता, ईमानदारी और गर्व के साथ राष्ट्र सेवा के लिए स्वयं को समर्पित करें।

इस अवसर पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, केंद्रीय मंत्री जे. पी. नड्डा और मनोहर लाल, राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश, राज्यसभा सांसद एवं पुस्तक की लेखिका सुधा मूर्ति सहित संसद के दोनों सदनों के सदस्य और वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

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