Media24Media.com: चुनाव आयोग के भीतर मतभेद की रिपोर्ट

Responsive Ad Slot

Latest

latest


 

चुनाव आयोग के भीतर मतभेद की रिपोर्ट

Document Thumbnail

10 महीनों में 14 बार दर्ज हुई आपत्ति, मतदाता सूची और एसआईआर प्रक्रिया को लेकर उठे सवाल

नई दिल्ली- देश की चुनावी व्यवस्था से जुड़ी एक महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयोग के दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने पिछले करीब 10 महीनों में कम-से-कम 14 बार आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर औपचारिक रूप से आपत्ति दर्ज की।

रिपोर्ट के अनुसार, इन आपत्तियों का संबंध मुख्य रूप से मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाताओं के नाम जोड़ने-हटाने और मतदाता डेटा के डिजिटल प्रबंधन से है।

मामला क्या है?

चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ दो चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी हैं।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, संधू और जोशी ने कई मौकों पर यह आपत्ति दर्ज की कि आयोग के नाम पर कुछ फैसले या आदेश उनकी जानकारी अथवा मंजूरी के बिना लिए गए।

रिपोर्ट के अनुसार, चार आपत्तियां एक ही दिन दर्ज की गई थीं। दोनों आयुक्तों की आपत्तियां चुनावी प्रक्रिया के बेहद महत्वपूर्ण हिस्सों से जुड़ी थीं।

एसआईआर बना विवाद का मुख्य केंद्र

इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा एसआईआर यानी Special Intensive Revision है।

एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण करना है। इसमें मतदाता रिकॉर्ड की जांच की जाती है और पात्रता से संबंधित रिकॉर्ड को अपडेट किया जाता है।

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, बिहार से शुरू हुई यह प्रक्रिया बाद में देश के कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों तक पहुंची और इसके दौरान 13 करोड़ से अधिक नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची से हटाए गए। यह संख्या व्यापक मतदाता रिकॉर्ड की प्रारंभिक छंटाई से संबंधित है; इसे अंतिम रूप से मताधिकार खो चुके लोगों की संख्या के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए।

फॉर्म-6 में बदलाव पर आपत्ति

रिपोर्ट के मुताबिक, फॉर्म-6 में किए गए बदलाव को लेकर भी दोनों चुनाव आयुक्तों ने सवाल उठाए।

फॉर्म-6 का इस्तेमाल नए मतदाता के रूप में नाम दर्ज कराने के लिए किया जाता है।

रिपोर्ट के अनुसार, नए फॉर्म में आवेदक से यह जानकारी मांगी गई कि उसका, उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली एसआईआर की मतदाता सूची में था या नहीं।

सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कथित तौर पर इस बदलाव की वैधानिक प्रक्रिया पर आपत्ति जताई। संधू ने बाद में इसे “अनधिकृत और गैरकानूनी” बताते हुए हटाने की मांग की।

मतदाता डेटा के केंद्रीकरण पर भी सवाल

दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों में मतदाता सूची के डिजिटल सिस्टम का मुद्दा भी सामने आया।

रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग के डिजिटल सिस्टम ईसीआईनेट (ECINet) में मतदाता डेटा के प्रबंधन और राज्य स्तर के अधिकारियों की पहुंच को लेकर सवाल उठाए गए।

आयुक्तों ने कथित तौर पर चिंता जताई कि मतदाता सूची के डेटाबेस का संचालन धीरे-धीरे केंद्र स्तर पर अधिक केंद्रीकृत हो रहा है और इससे स्थानीय स्तर पर मतदाता सूची संभालने वाले अधिकारियों की भूमिका प्रभावित हो सकती है।

गोवा में 97 मतदाताओं का मामला

रिपोर्ट में गोवा का एक उदाहरण भी दिया गया है।

इसके अनुसार, 97 मतदाताओं के मामलों में स्थानीय चुनाव अधिकारियों ने दस्तावेजों की जांच के बाद उन्हें पात्र पाया, लेकिन संबंधित डिजिटल सिस्टम में उनके नाम बहाल करने की प्रक्रिया समय पर उपलब्ध नहीं हो सकी।

नतीजतन, ये 97 पात्र मतदाता अंतिम मतदाता सूची में शामिल नहीं हो सके।

यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे सवाल उठता है कि यदि जमीनी स्तर का अधिकारी किसी व्यक्ति को पात्र मानता है, तो डिजिटल प्रणाली में उस निर्णय को दर्ज और लागू करने की प्रक्रिया कितनी प्रभावी है।

चुनाव आयोग ने क्या कहा?

इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों ने आंतरिक मतभेद या विभाजन की धारणा को खारिज किया।

डेक्कन क्रॉनिकल की रिपोर्ट के मुताबिक, आयोग से जुड़े सूत्रों ने कहा कि एसआईआर सहित आयोग के सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं और दोनों चुनाव आयुक्तों तथा मुख्य चुनाव आयुक्त की मंजूरी से लिए गए हैं।

इसलिए इस खबर को समझते समय दोनों पक्षों को अलग-अलग देखना जरूरी है:

रिपोर्ट का दावा:
दो चुनाव आयुक्तों ने कई फैसलों पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं।

चुनाव आयोग का पक्ष:
आयोग के सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं।

इसका संवैधानिक महत्व क्या है?

चुनाव आयोग भारत की संवैधानिक संस्था है और इसका आधार संविधान का अनुच्छेद 324 है।

चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त शामिल होते हैं। 2023 के कानून के तहत आयोग के कामकाज में जहां तक संभव हो सर्वसम्मति से निर्णय लेने का प्रावधान है। यदि सदस्यों के बीच मतभेद हो तो कानून के अनुसार बहुमत से निर्णय लिया जा सकता है।

इसी वजह से दो चुनाव आयुक्तों द्वारा बार-बार लिखित आपत्ति दर्ज किए जाने की रिपोर्ट को चुनावी प्रशासन की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

निष्कर्ष

चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेद की यह रिपोर्ट इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि विवाद सीधे मतदाता सूची, नए मतदाताओं के पंजीकरण और चुनावी डेटा के प्रबंधन जैसे मूल चुनावी कार्यों से जुड़ा है। फिलहाल सार्वजनिक चर्चा में एक तरफ इंडियन एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट है, जबकि दूसरी तरफ चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों का यह कहना है कि उसके फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं।

Advertisement Sushasan Divas Advertisement Mohan Chandrakar Chhattisgarh Tourism Chhattisgarh Tourism
Don't Miss
© Media24Media | All Rights Reserved | Infowt Information Web Technologies.