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CEC को लेकर विपक्ष का विरोध तेज, कांग्रेस-TMC-AAP-DMK ने उठाए सवाल

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नई दिल्ली- मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर विपक्षी दलों का विरोध तेज हो गया है। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस (TMC), आम आदमी पार्टी (AAP), DMK समेत कई विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग के कामकाज और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े फैसलों पर सवाल उठाए हैं। विपक्षी दलों ने CEC को हटाने, SIR की प्रक्रिया पर रोक लगाने और चुनाव आयोग के कामकाज की जांच की मांग की है।

विवाद की शुरुआत कहां से हुई?

यह विवाद उस रिपोर्ट के बाद तेज हुआ जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयोग के दो अन्य आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने पिछले 10 महीनों में SIR समेत कई मामलों में आयोग के फैसलों पर कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट में मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और बहाल करने की प्रक्रिया तथा मतदाता डेटा से जुड़े कुछ मुद्दों पर मतभेद का उल्लेख किया गया है। 

विपक्ष की प्रमुख मांगें

कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने CEC ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने, चुनाव आयोग के कामकाज की सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच कराने और SIR प्रक्रिया को रोकने की मांग की है। कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल ने CEC को हटाने की मांग की, जबकि TMC और DMK नेताओं ने भी चुनाव आयोग के भीतर सामने आए मतभेदों की जांच की मांग उठाई। 

चुनाव आयोग का क्या कहना है?

विपक्ष के आरोपों के बीच चुनाव आयोग ने कहा है कि आयोग के भीतर अलग-अलग विचार सामने आना उसकी आंतरिक विचार-विमर्श प्रक्रिया का हिस्सा है और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं। इसलिए विपक्ष द्वारा उठाए गए आरोपों और आयोग के स्पष्टीकरण को अलग-अलग समझना जरूरी है।

संसद में हटाने की प्रक्रिया को लेकर भी चर्चा

रिपोर्टों के अनुसार, CEC को हटाने को लेकर विपक्ष पहले भी नोटिस दे चुका है। अप्रैल 2026 में राज्यसभा में एक नया नोटिस दिए जाने की बात सामने आई थी, जो अभी लंबित बताया गया है। CEC को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया संसद के माध्यम से होती है और इसके लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है।

SIR बना राजनीतिक विवाद का केंद्र

मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) को लेकर पहले से ही राजनीतिक विवाद चल रहा है। विपक्षी दलों का कहना है कि इस प्रक्रिया से मतदाताओं के अधिकार और चुनावी प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है। वहीं चुनाव आयोग का पक्ष है कि मतदाता सूची को अपडेट और सत्यापित करना चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा है। इस पूरे विवाद के कानूनी और प्रशासनिक पहलुओं पर न्यायिक स्तर पर भी कार्यवाही चल रही है।

फिलहाल मामला राजनीतिक और न्यायिक दोनों स्तरों पर चर्चा में है। CEC को हटाने की विपक्ष की मांग और चुनाव आयोग की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण के बीच आगे की कार्रवाई पर नजर बनी हुई है।

चुनाव आयोग के भीतर मतभेद की रिपोर्ट

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10 महीनों में 14 बार दर्ज हुई आपत्ति, मतदाता सूची और एसआईआर प्रक्रिया को लेकर उठे सवाल

नई दिल्ली- देश की चुनावी व्यवस्था से जुड़ी एक महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयोग के दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने पिछले करीब 10 महीनों में कम-से-कम 14 बार आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर औपचारिक रूप से आपत्ति दर्ज की।

रिपोर्ट के अनुसार, इन आपत्तियों का संबंध मुख्य रूप से मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाताओं के नाम जोड़ने-हटाने और मतदाता डेटा के डिजिटल प्रबंधन से है।

मामला क्या है?

चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ दो चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी हैं।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, संधू और जोशी ने कई मौकों पर यह आपत्ति दर्ज की कि आयोग के नाम पर कुछ फैसले या आदेश उनकी जानकारी अथवा मंजूरी के बिना लिए गए।

रिपोर्ट के अनुसार, चार आपत्तियां एक ही दिन दर्ज की गई थीं। दोनों आयुक्तों की आपत्तियां चुनावी प्रक्रिया के बेहद महत्वपूर्ण हिस्सों से जुड़ी थीं।

एसआईआर बना विवाद का मुख्य केंद्र

इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा एसआईआर यानी Special Intensive Revision है।

एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण करना है। इसमें मतदाता रिकॉर्ड की जांच की जाती है और पात्रता से संबंधित रिकॉर्ड को अपडेट किया जाता है।

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, बिहार से शुरू हुई यह प्रक्रिया बाद में देश के कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों तक पहुंची और इसके दौरान 13 करोड़ से अधिक नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची से हटाए गए। यह संख्या व्यापक मतदाता रिकॉर्ड की प्रारंभिक छंटाई से संबंधित है; इसे अंतिम रूप से मताधिकार खो चुके लोगों की संख्या के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए।

फॉर्म-6 में बदलाव पर आपत्ति

रिपोर्ट के मुताबिक, फॉर्म-6 में किए गए बदलाव को लेकर भी दोनों चुनाव आयुक्तों ने सवाल उठाए।

फॉर्म-6 का इस्तेमाल नए मतदाता के रूप में नाम दर्ज कराने के लिए किया जाता है।

रिपोर्ट के अनुसार, नए फॉर्म में आवेदक से यह जानकारी मांगी गई कि उसका, उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली एसआईआर की मतदाता सूची में था या नहीं।

सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कथित तौर पर इस बदलाव की वैधानिक प्रक्रिया पर आपत्ति जताई। संधू ने बाद में इसे “अनधिकृत और गैरकानूनी” बताते हुए हटाने की मांग की।

मतदाता डेटा के केंद्रीकरण पर भी सवाल

दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों में मतदाता सूची के डिजिटल सिस्टम का मुद्दा भी सामने आया।

रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग के डिजिटल सिस्टम ईसीआईनेट (ECINet) में मतदाता डेटा के प्रबंधन और राज्य स्तर के अधिकारियों की पहुंच को लेकर सवाल उठाए गए।

आयुक्तों ने कथित तौर पर चिंता जताई कि मतदाता सूची के डेटाबेस का संचालन धीरे-धीरे केंद्र स्तर पर अधिक केंद्रीकृत हो रहा है और इससे स्थानीय स्तर पर मतदाता सूची संभालने वाले अधिकारियों की भूमिका प्रभावित हो सकती है।

गोवा में 97 मतदाताओं का मामला

रिपोर्ट में गोवा का एक उदाहरण भी दिया गया है।

इसके अनुसार, 97 मतदाताओं के मामलों में स्थानीय चुनाव अधिकारियों ने दस्तावेजों की जांच के बाद उन्हें पात्र पाया, लेकिन संबंधित डिजिटल सिस्टम में उनके नाम बहाल करने की प्रक्रिया समय पर उपलब्ध नहीं हो सकी।

नतीजतन, ये 97 पात्र मतदाता अंतिम मतदाता सूची में शामिल नहीं हो सके।

यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे सवाल उठता है कि यदि जमीनी स्तर का अधिकारी किसी व्यक्ति को पात्र मानता है, तो डिजिटल प्रणाली में उस निर्णय को दर्ज और लागू करने की प्रक्रिया कितनी प्रभावी है।

चुनाव आयोग ने क्या कहा?

इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों ने आंतरिक मतभेद या विभाजन की धारणा को खारिज किया।

डेक्कन क्रॉनिकल की रिपोर्ट के मुताबिक, आयोग से जुड़े सूत्रों ने कहा कि एसआईआर सहित आयोग के सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं और दोनों चुनाव आयुक्तों तथा मुख्य चुनाव आयुक्त की मंजूरी से लिए गए हैं।

इसलिए इस खबर को समझते समय दोनों पक्षों को अलग-अलग देखना जरूरी है:

रिपोर्ट का दावा:
दो चुनाव आयुक्तों ने कई फैसलों पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं।

चुनाव आयोग का पक्ष:
आयोग के सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं।

इसका संवैधानिक महत्व क्या है?

चुनाव आयोग भारत की संवैधानिक संस्था है और इसका आधार संविधान का अनुच्छेद 324 है।

चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त शामिल होते हैं। 2023 के कानून के तहत आयोग के कामकाज में जहां तक संभव हो सर्वसम्मति से निर्णय लेने का प्रावधान है। यदि सदस्यों के बीच मतभेद हो तो कानून के अनुसार बहुमत से निर्णय लिया जा सकता है।

इसी वजह से दो चुनाव आयुक्तों द्वारा बार-बार लिखित आपत्ति दर्ज किए जाने की रिपोर्ट को चुनावी प्रशासन की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

निष्कर्ष

चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेद की यह रिपोर्ट इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि विवाद सीधे मतदाता सूची, नए मतदाताओं के पंजीकरण और चुनावी डेटा के प्रबंधन जैसे मूल चुनावी कार्यों से जुड़ा है। फिलहाल सार्वजनिक चर्चा में एक तरफ इंडियन एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट है, जबकि दूसरी तरफ चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों का यह कहना है कि उसके फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं।

ओडिशा की वोटर लिस्ट में बड़ा बदलाव—SIR के बाद 20.56 लाख नाम हटे, 2.90 लाख नए मतदाता जुड़े

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ओडिशा की वोटर लिस्ट में बड़ा बदलाव, 20.56 लाख नाम हटाए गए

भुवनेश्वर: ओडिशा में मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) की प्रक्रिया पूरी हो गई है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी एस. गोपालन के अनुसार, अंतिम मतदाता सूची में 20.56 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। 

अधिकारियों के मुताबिक, SIR की शुरुआत 30 मई 2026 को हुई थी। उस समय ओडिशा की मतदाता सूची में करीब 3.14 करोड़ मतदाता दर्ज थे। सत्यापन प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में ऐसे नाम सामने आए जिनमें मतदाता की मृत्यु हो चुकी थी, वे स्थायी रूप से दूसरे स्थान पर जा चुके थे या एक ही व्यक्ति के एक से अधिक रिकॉर्ड मौजूद थे। 

हटाए गए करीब 20.12 लाख नामों में लगभग 8.32 लाख मृत मतदाता, 8.08 लाख स्थायी रूप से स्थानांतरित मतदाता, करीब 2 लाख अनुपस्थित मतदाता और लगभग 1.58 लाख डुप्लीकेट प्रविष्टियां शामिल थीं।

इसके बाद ड्राफ्ट मतदाता सूची पर दावे और आपत्तियां मांगी गईं। अधिकारियों के अनुसार, इस चरण में कुछ और नाम हटाए गए, जबकि नए पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल भी किया गया। करीब 2.90 लाख नए नाम जोड़े गए, जिसके बाद अंतिम मतदाता सूची में कुल 3,16,32,754 मतदाता दर्ज हैं। 

निर्वाचन अधिकारी ने बताया कि अब SIR की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और मतदाता सूची का सामान्य अपडेट जारी रहेगा। जिन लोगों का नाम छूट गया है या जिन्हें अपने विवरण में सुधार कराना है, वे निर्धारित Form 6, Form 7 या Form 8 के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं। 

खास बात: 20.56 लाख नाम हटाए जाने का मतलब यह नहीं है कि सभी हटाए गए मतदाता गलत तरीके से सूची में थे; आधिकारिक विवरण में मृत्यु, स्थायी स्थानांतरण, अनुपस्थिति और डुप्लीकेट रिकॉर्ड जैसे अलग-अलग कारण बताए गए हैं।


UCC को लेकर बड़ा अपडेट, 2029 से पहले NDA शासित सभी 21 राज्यों में लागू करने का लक्ष्य

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नई दिल्ली- समान नागरिक संहिता यानी UCC (Uniform Civil Code) को लेकर बड़ी खबर सामने आई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले NDA शासित सभी 21 राज्यों में UCC लागू किया जाएगा। उनके इस बयान के बाद देश की राजनीति में UCC को लेकर चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है।

अमित शाह के मुताबिक, UCC का उद्देश्य नागरिकों के लिए विवाह, तलाक और विरासत जैसे व्यक्तिगत मामलों में समान कानूनी व्यवस्था सुनिश्चित करना है। उन्होंने कहा कि इस दिशा में NDA सरकारें आगे काम करेंगी।

कई राज्यों में पहले से चल रही प्रक्रिया

UCC को लेकर कुछ राज्यों में पहले ही कदम उठाए जा चुके हैं। उत्तराखंड में इसे लागू किया जा चुका है, जबकि अन्य NDA शासित राज्यों में भी इसे लेकर प्रक्रिया और चर्चा आगे बढ़ रही है। अब 2029 से पहले सभी 21 NDA शासित राज्यों में इसे लागू करने का लक्ष्य सामने रखा गया है।

क्यों महत्वपूर्ण है UCC?

समान नागरिक संहिता का मकसद व्यक्तिगत कानूनों के अलग-अलग प्रावधानों की जगह एक समान नागरिक कानून व्यवस्था लाना है। इसके दायरे में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे विषय शामिल हो सकते हैं।

अमित शाह के ताजा बयान के बाद अब नजर इस बात पर रहेगी कि अलग-अलग NDA शासित राज्यों में UCC को लागू करने के लिए सरकारें किस तरह की विधायी और प्रशासनिक प्रक्रिया आगे बढ़ाती हैं।

UCC का मुद्दा आने वाले समय में देश की राजनीति और कानून व्यवस्था से जुड़ी बहस का एक बड़ा केंद्र बन सकता है।

2029 में 22 राज्यों के साथ विधानसभा चुनाव? NDA के One Nation, One Election प्लान की पूरी कहानी

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नई दिल्ली- भारत में चुनावी व्यवस्था को लेकर एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र में सत्तारूढ़ NDA 2029 के लोकसभा चुनाव के साथ 22 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में विधानसभा चुनाव कराने के विकल्प पर विचार कर रहा है।

यह प्रस्ताव “One Nation, One Election” यानी “एक देश, एक चुनाव” की दिशा में मौजूदा योजना से भी पहले कदम बढ़ाने की कोशिश माना जा रहा है। अभी इस पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है और मामला राजनीतिक तथा संवैधानिक चर्चा के दौर में है।

क्या है पूरा मामला?

भारत में फिलहाल लोकसभा और अलग-अलग राज्यों की विधानसभा के चुनाव अलग-अलग समय पर होते हैं। इसका मतलब है कि देश में लगभग हर साल कहीं न कहीं चुनावी प्रक्रिया चलती रहती है।

One Nation, One Election का विचार यह है कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ या एक समन्वित चुनाव चक्र में कराया जाए।

अब NDA के सामने जो विकल्प बताया जा रहा है, उसके अनुसार 2029 के लोकसभा चुनाव के साथ 22 NDA-शासित/समर्थित राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में भी विधानसभा चुनाव कराए जा सकते हैं।

22 राज्यों में चुनाव क्यों?

रिपोर्ट के अनुसार इन 22 राज्यों/UTs में NDA या उसके सहयोगी दलों की सरकार/बहुमत है। इनमें से कई राज्यों की विधानसभा का सामान्य कार्यकाल 2029 लोकसभा चुनाव से पहले समाप्त हो जाएगा।

रिपोर्ट में बताया गया है कि इनमें से 11 राज्यों/UTs में अगले दो वर्षों के दौरान चुनाव होने हैं।

इनमें प्रमुख रूप से 2027 और 2028 में चुनाव वाले राज्य शामिल हैं, जैसे:

  • छत्तीसगढ़

  • मध्य प्रदेश

  • मेघालय

  • राजस्थान

  • त्रिपुरा

इसके अलावा हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में 2029 के आसपास चुनाव होने हैं।

एक महत्वपूर्ण तथ्य

ओडिशा, आंध्र प्रदेश, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव पहले से ही लोकसभा चुनाव के साथ होते हैं। इसलिए इन राज्यों को एक साथ चुनाव कराने की प्रक्रिया में अपेक्षाकृत कम समायोजन की जरूरत होगी।

सबसे बड़ा सवाल: कार्यकाल खत्म होने से पहले विधानसभा कैसे भंग होगी?

यही इस प्रस्ताव का सबसे महत्वपूर्ण और विवादित हिस्सा है।

अगर किसी राज्य की विधानसभा का कार्यकाल 2030 या उसके आसपास तक है, लेकिन 2029 में लोकसभा के साथ चुनाव कराना है, तो उस विधानसभा को अपने सामान्य कार्यकाल से पहले समाप्त करना पड़ सकता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, यदि संबंधित राज्यों में NDA सरकारें अगले वर्षों में बनी रहती हैं, तो जनवरी 2029 तक कुछ विधानसभाओं को भंग करने का विकल्प विचाराधीन हो सकता है।

संविधान के अनुच्छेद 174(2)(b) के तहत राज्य विधानसभा को भंग किया जा सकता है। विधानसभा भंग होने के बाद कानून के अनुसार चुनाव निर्धारित अवधि के भीतर कराना होता है।

इसलिए 2029 में एक साथ चुनाव कराने के लिए राजनीतिक सहमति और संवैधानिक प्रक्रिया दोनों महत्वपूर्ण होंगी।

अभी योजना क्या है और बदलाव क्या होगा?

मौजूदा One Nation, One Election से जुड़े प्रस्तावों के अनुसार चुनावों को धीरे-धीरे एक चक्र में लाने की व्यवस्था बनाई जा रही है।

वर्तमान विधायी ढांचे की रिपोर्ट की गई टाइमलाइन में पहला पूर्ण समकालिक चुनाव चक्र 2034 के आसपास दिखाई देता है।

लेकिन NDA के भीतर अब यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या इसे 2029 से ही शुरू किया जा सकता है।

यानी सरल भाषा में:

मौजूदा प्रस्ताव → 2034 के आसपास पूर्ण समन्वय

NDA में विचाराधीन विकल्प → 2029 से बड़ा हिस्सा एक साथ

संसद की संयुक्त समिति क्या कर रही है?

“One Nation, One Election” से संबंधित विधेयकों की जांच के लिए संसद की Joint Parliamentary Committee (JPC) काम कर रही है।

समिति विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों और दूसरे हितधारकों से चर्चा कर रही है। इसमें संवैधानिक विशेषज्ञ, शिक्षाविद, नागरिक समाज और अन्य पक्ष भी शामिल हैं।

समिति के अध्यक्ष पी. पी. चौधरी ने इस मुद्दे पर कहा है कि अगर चुनाव पहले कराए जाने हैं तो यह फैसला मुख्य रूप से NDA के मुख्यमंत्रियों/राज्य सरकारों से संबंधित होगा और यह समिति के मूल अधिकार-क्षेत्र से अलग मुद्दा है।

क्या 2029 में ऐसा करना कानूनी रूप से आसान होगा?

नहीं। यह सिर्फ राजनीतिक फैसला नहीं होगा।

एक साथ चुनाव कराने के लिए संविधान और चुनाव संबंधी कानूनों में बदलाव की जरूरत पड़ सकती है। विधानसभा और लोकसभा के कार्यकाल, विधानसभा भंग होने की स्थिति और चुनावी चक्र को एक साथ लाने जैसे मुद्दे इसमें शामिल हैं।

इसीलिए “One Nation, One Election” सिर्फ चुनाव की तारीख बदलने का मामला नहीं है; यह भारत की चुनावी व्यवस्था में बड़ा संस्थागत बदलाव होगा।

विपक्ष की क्या आपत्ति है?

विपक्षी दलों की मुख्य चिंताओं में से एक यह है कि अगर किसी राज्य की विधानसभा का सामान्य कार्यकाल पूरा होने से पहले चुनाव करा दिए जाते हैं, तो राज्य की लोकतांत्रिक अवधि कम हो सकती है।

विपक्ष यह सवाल भी उठा सकता है कि क्या राष्ट्रीय चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव होने पर स्थानीय मुद्दे राष्ट्रीय मुद्दों के पीछे दब जाएंगे।

कुछ विपक्षी दल इसे संघीय ढांचे के लिए चुनौती के रूप में भी देखते हैं। दूसरी ओर, समर्थकों का तर्क है कि बार-बार चुनावों से होने वाले खर्च और प्रशासनिक व्यवधान को कम किया जा सकता है।

सरकार/NDA के पक्ष में मुख्य तर्क

One Nation, One Election के समर्थकों के अनुसार इसके कई संभावित फायदे हैं:

1. चुनावी खर्च में कमी
बार-बार चुनाव होने से सरकार, राजनीतिक दलों और चुनाव मशीनरी पर लगातार खर्च होता है। एक साथ चुनाव कराने से इसमें कमी आ सकती है।

2. बार-बार Model Code of Conduct से राहत
चुनाव की घोषणा के बाद Model Code of Conduct लागू होता है। लगातार चुनाव होने पर सरकारों के नीतिगत और विकास कार्यों पर असर पड़ने की दलील दी जाती है।

3. प्रशासनिक मशीनरी पर कम दबाव
पुलिस, सुरक्षा बलों और सरकारी कर्मचारियों को बार-बार चुनाव ड्यूटी में लगाने की जरूरत कम हो सकती है।

4. राजनीतिक स्थिरता
समर्थकों का कहना है कि सरकारें लगातार चुनावी तैयारी करने के बजाय लंबे समय की नीतियों पर ध्यान दे सकती हैं।

लेकिन इसके खिलाफ प्रमुख तर्क क्या हैं?

1. राज्यों की स्वायत्तता का सवाल
भारत एक संघीय व्यवस्था है, जहां राज्य सरकारों का अपना राजनीतिक और संवैधानिक महत्व है।

2. विधानसभा का कार्यकाल छोटा करने की समस्या
यदि किसी सरकार का पांच साल का कार्यकाल पूरा होने से पहले विधानसभा भंग होती है, तो इसे लेकर राजनीतिक विवाद हो सकता है।

3. स्थानीय मुद्दों पर असर
लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ होने पर बेरोजगारी, सड़क, बिजली, पानी, कृषि जैसे राज्य-विशिष्ट मुद्दे राष्ट्रीय मुद्दों के पीछे चले जाने की आशंका जताई जाती है।

4. सरकार गिरने की स्थिति
अगर किसी राज्य में चुनाव के बाद सरकार गिर जाती है और नई सरकार नहीं बनती, तो एक साथ चुनाव चक्र को बनाए रखना कठिन हो सकता है।

2029 का प्रस्ताव इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

अगर NDA इस योजना को लागू करने में सफल होता है, तो 2029 का लोकसभा चुनाव भारत के चुनावी इतिहास में एक बड़े बदलाव का शुरुआती बिंदु बन सकता है।

इसका मतलब यह होगा कि देश के बहुत बड़े हिस्से में मतदाता एक ही चुनावी अवधि में:

लोकसभा + विधानसभा

के लिए मतदान कर सकते हैं।

हालांकि यह याद रखना जरूरी है कि 22 राज्यों में 2029 में एक साथ चुनाव कराने की खबर अभी एक विचाराधीन राजनीतिक विकल्प की रिपोर्ट है, अंतिम निर्णय नहीं।

आम जनता के लिए इसका क्या मतलब होगा?

अगर योजना लागू होती है, तो 2029 में कई राज्यों के मतदाताओं को लोकसभा और विधानसभा के लिए एक ही चुनाव अवधि में वोट देना पड़ सकता है।

मतदाता को दो अलग-अलग स्तरों पर सरकार चुननी होगी:

केंद्र के लिए → लोकसभा सांसद

राज्य के लिए → विधायक

इसका मतलब यह नहीं है कि दोनों वोट एक ही पार्टी को देना जरूरी होगा। मतदाता लोकसभा में एक पार्टी और विधानसभा में दूसरी पार्टी को भी वोट दे सकता है।

सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल

अब सबसे बड़ा सवाल यह है:

क्या NDA 2029 में 22 राज्यों/UTs में विधानसभा चुनाव कराने के लिए राजनीतिक और संवैधानिक सहमति जुटा पाएगा?

इसके लिए अगले चरण में राज्य सरकारों की भूमिका, संसद में विधायी प्रक्रिया, संवैधानिक संशोधन और विपक्ष की प्रतिक्रिया बेहद महत्वपूर्ण होगी।

निष्कर्ष

One Nation, One Election को 2029 से बड़े स्तर पर लागू करने की संभावित चर्चा भारत की चुनावी राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम है।

लेकिन अभी इसे “2029 में 22 राज्यों में चुनाव पक्का” कहना सही नहीं होगा।

सही स्थिति यह है कि NDA 2029 में लोकसभा चुनाव के साथ 22 NDA-बहुमत वाले राज्यों/UTs में विधानसभा चुनाव कराने के विकल्प पर विचार कर रहा है, जबकि मौजूदा विधायी टाइमलाइन का पूर्ण समकालिक चक्र 2034 के आसपास बताया गया है। आगे की तस्वीर संसद, राज्य सरकारों और राजनीतिक दलों के बीच होने वाली बातचीत से साफ होगी।

वंदे मातरम् पर कांग्रेस के दो छंद वाले फैसले से भड़की बीजेपी, नेताओं ने कांग्रेस पर बोला चौतरफा हमला

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नई दिल्ली- राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर कांग्रेस और बीजेपी के बीच सियासी घमासान तेज हो गया है। कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) ने स्पष्ट किया है कि पार्टी के कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के केवल शुरुआती दो छंद ही गाए जाएंगे। कांग्रेस ने इसके लिए 1937 में लिए गए अपने ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया है। लेकिन कांग्रेस के इस रुख पर बीजेपी ने तीखा हमला बोलते हुए इसे राष्ट्रविरोधी और तुष्टीकरण की राजनीति से जोड़ दिया है।

कांग्रेस ने क्या फैसला लिया?

कांग्रेस महासचिव के.सी. वेणुगोपाल के मुताबिक पार्टी ‘वंदे मातरम्’ को लेकर 1937 में कांग्रेस द्वारा लिए गए निर्णय का ही पालन करेगी। यानी कांग्रेस के आधिकारिक कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत के पहले दो छंद गाए जाएंगे। पार्टी का कहना है कि यह कोई नया फैसला नहीं बल्कि उसके पुराने रुख की पुनर्पुष्टि है। 

कांग्रेस के अनुसार 1937 में राष्ट्रीय सभाओं और सार्वजनिक कार्यक्रमों के संदर्भ में यह तय किया गया था कि ‘वंदे मातरम्’ के शुरुआती दो छंदों का इस्तेमाल किया जाए। पार्टी इस फैसले को महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल समेत उस दौर के कांग्रेस नेतृत्व की परंपरा से जोड़ रही है।

आखिर दो छंद ही क्यों?

इस विवाद की जड़ ‘वंदे मातरम्’ के इतिहास में है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित इस रचना में शुरुआती दो छंदों के अलावा अन्य छंद भी हैं। कांग्रेस का तर्क है कि शुरुआती दो छंद मातृभूमि की स्तुति पर केंद्रित हैं, जबकि बाद के हिस्सों में धार्मिक और पौराणिक संदर्भ आते हैं।

1937 में इस बात पर भी चर्चा हुई थी कि बहुधार्मिक और विविधता वाले भारत की राष्ट्रीय सभाओं में ऐसा संस्करण इस्तेमाल किया जाए जिसे सभी समुदाय सहजता से स्वीकार कर सकें। इसी संदर्भ में शुरुआती दो छंदों को प्राथमिकता देने का फैसला किया गया था।

अमित शाह ने कांग्रेस पर साधा निशाना

कांग्रेस के फैसले के बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इसे लेकर जोरदार हमला बोला। शाह ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि पार्टी ने ‘वंदे मातरम्’ को दो हिस्सों में बांटने का काम किया और अब उसी पुराने फैसले को आगे बढ़ा रही है।

शाह ने कांग्रेस के फैसले को “राष्ट्रविरोधी” बताते हुए इसे तुष्टीकरण की राजनीति से जोड़ा। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस एक बार फिर वोट बैंक की राजनीति के लिए पुराने रास्ते पर लौट रही है। 

बीजेपी का कहना है कि ‘वंदे मातरम्’ केवल एक राजनीतिक दल का मुद्दा नहीं बल्कि देश की स्वतंत्रता की लड़ाई और राष्ट्रीय भावना से जुड़ा प्रतीक है।

नितिन नबीन का कांग्रेस पर तीखा हमला

बीजेपी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन ने भी कांग्रेस के फैसले पर कड़ा हमला बोला। उन्होंने कांग्रेस को “नई मुस्लिम लीग” तक कह दिया और आरोप लगाया कि पार्टी तुष्टीकरण की राजनीति के कारण राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान से समझौता कर रही है।

नबीन ने कांग्रेस पर देश के स्वाभिमान को गिरवी रखने और अपमान को नीति का रूप देने जैसे गंभीर आरोप लगाए। उनके बयान के बाद विवाद और अधिक राजनीतिक रंग लेता दिखाई दिया।

रविशंकर प्रसाद ने भी कांग्रेस को घेरा

बीजेपी प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने भी कांग्रेस पर निशाना साधते हुए सवाल उठाया कि स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत का दावा करने वाली पार्टी राष्ट्रगीत के सम्मान को लेकर ऐसी स्थिति में क्यों खड़ी है।

बीजेपी ने आरोप लगाया कि स्वतंत्रता दिवस के दौरान कांग्रेस मुख्यालय और बाद में गोवा में भी ‘वंदे मातरम्’ के केवल दो छंद गाए गए।

खरगे ने बीजेपी को दिया करारा जवाब

दूसरी ओर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने बीजेपी के आरोपों को खारिज किया। उनका कहना है कि उन्होंने वही संस्करण गाया जिसे दशकों से कांग्रेस के कार्यक्रमों में गाया जाता रहा है।

खरगे ने बीजेपी पर पलटवार करते हुए कहा कि अगर यह गलत है तो उन ऐतिहासिक नेताओं पर भी सवाल उठाया जाना चाहिए जिन्होंने इसी संस्करण को गाया था। उन्होंने महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और अटल बिहारी वाजपेयी का भी उल्लेख किया। 

खरगे का तर्क है कि बीजेपी को कांग्रेस के ऐतिहासिक प्रस्तावों और राष्ट्रगीत को लेकर लिए गए पुराने फैसलों की जानकारी नहीं है। उनका कहना है कि कांग्रेस पिछले करीब आठ दशक से इसी परंपरा का पालन करती आई है।

अब विवाद सिर्फ गीत तक सीमित नहीं

‘वंदे मातरम्’ को लेकर मौजूदा विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि केंद्र सरकार ने हाल ही में इससे संबंधित कानूनी प्रावधानों में बदलाव किया है। 2026 में संसद ने ‘Prevention of Insults to National Honour’ कानून में संशोधन को मंजूरी दी, जिसके तहत ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गान के समान कानूनी संरक्षण देने का प्रावधान किया गया। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह प्रावधान लागू हुआ। 

इसी वजह से बीजेपी कांग्रेस के दो छंद वाले फैसले को केवल पार्टी की आंतरिक परंपरा नहीं बल्कि राष्ट्रीय सम्मान से जोड़कर देख रही है।

बीजेपी-कांग्रेस आमने-सामने, सियासत और गरमाई

एक तरफ बीजेपी कांग्रेस पर राष्ट्रगीत के अपमान और तुष्टीकरण की राजनीति का आरोप लगा रही है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस इसे अपने 1937 के ऐतिहासिक फैसले की निरंतरता बता रही है।

विवाद के बीच कांग्रेस नेताओं ने बीजेपी पर “फर्जी राष्ट्रवाद” का आरोप लगाया है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने भी बीजेपी के राष्ट्रवाद के दावे पर सवाल उठाए और कहा कि पार्टी इस मुद्दे को राजनीतिक विवाद में बदल रही है।

निष्कर्ष

कुल मिलाकर ‘वंदे मातरम्’ के दो छंदों को लेकर शुरू हुआ विवाद अब इतिहास, राष्ट्रवाद, तुष्टीकरण और राजनीतिक विरासत की बहस में बदल गया है। बीजेपी कांग्रेस के फैसले को देश और राष्ट्रगीत के सम्मान से जोड़ रही है, जबकि कांग्रेस इसे 1937 में तय की गई ऐतिहासिक परंपरा बता रही है।

आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद से लेकर राज्यों की राजनीति तक और ज्यादा गरमाने की संभावना है। खास तौर पर बीजेपी और कांग्रेस के बीच राष्ट्रवाद की राजनीति को लेकर यह नया टकराव 2026 की सियासत में बड़ा मुद्दा बनता दिख रहा है।

भूपेश बघेल के खिलाफ चुनाव याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में बड़ी सुनवाई

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नई दिल्ली- सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से जुड़ी चुनाव याचिका को आगे बढ़ाने की अनुमति दे दी है। अदालत ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें बघेल के चुनाव को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करने से इनकार किया गया था।

इस फैसले के बाद अब चुनाव याचिका पर आगे कानूनी प्रक्रिया जारी रह सकेगी। याचिका में भूपेश बघेल के चुनाव को चुनौती दी गई है।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि बघेल का चुनाव अवैध घोषित कर दिया गया है। फिलहाल मामला केवल याचिका की सुनवाई आगे बढ़ने से जुड़ा है। अब संबंधित आरोपों और दावों पर आगे की न्यायिक प्रक्रिया के दौरान सुनवाई होगी।

इस मामले पर छत्तीसगढ़ की राजनीति में भी नजर बनी हुई है।

बिहार के बैंकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर की ऐतिहासिक जीत

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राजनीतिक रणनीतिकार से जननेता बने प्रशांत किशोर ने बिहार की बैंकीपुर विधानसभा सीट के उपचुनाव में शानदार जीत दर्ज की है। उनकी इस जीत को राज्य की राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। इस परिणाम ने न केवल उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता को मजबूत किया है, बल्कि बिहार के राजनीतिक समीकरणों को भी नई दिशा दी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस जीत के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और विपक्षी दल आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारियों को लेकर अपनी रणनीतियों की समीक्षा और पुनर्गठन में जुट गए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, बैंकीपुर उपचुनाव का यह परिणाम बिहार की भविष्य की राजनीति और चुनावी परिदृश्य पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है।

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान की नई पुस्तक ‘अपनापन’ का ऐलान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ 35 वर्षों के अनुभवों का वर्णन

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केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपनी नई पुस्तक ‘अपनापन’ की घोषणा की है, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपने 35 वर्षों के संबंधों, अनुभवों और कार्यशैली को व्यक्तिगत दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है।

यह पुस्तक 26 मई 2026 को सुबह 10:30 बजे एनएएससी कॉम्प्लेक्स, नई दिल्ली में औपचारिक रूप से लॉन्च की जाएगी। इस अवसर पर पूर्व उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू तथा पूर्व प्रधानमंत्री एच. डी. देवेगौड़ा उपस्थित रहेंगे।

शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि ‘अपनापन’ केवल घटनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री मोदी के व्यक्तित्व, नेतृत्व शैली, संवेदनशीलता, अनुशासन, कार्यनिष्ठा और राष्ट्र निर्माण के दृष्टिकोण का एक आत्मीय दस्तावेज है। उन्होंने बताया कि उनकी और नरेंद्र मोदी की पहचान 1991 की एकता यात्रा से शुरू हुई थी, जो समय के साथ संगठनात्मक कार्य, शासन और सार्वजनिक जीवन की साझी यात्रा में बदल गई।

उन्होंने कहा कि दुनिया नरेंद्र मोदी को एक निर्णायक और प्रभावशाली नेता के रूप में देखती है, लेकिन उन्होंने उन्हें एक कर्मयोगी, राष्ट्रहित के प्रति समर्पित और संवेदनशील व्यक्ति के रूप में करीब से देखा है। चौहान के अनुसार, प्रधानमंत्री देर रात तक काम करने के बावजूद हर नए दिन समान ऊर्जा और स्पष्टता के साथ देशसेवा में जुट जाते हैं।

एकता यात्रा को याद करते हुए शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि जहाँ कुछ लोग इसे केवल राजनीतिक अभियान मानते थे, वहीं नरेंद्र मोदी ने इसे राष्ट्रीय चेतना का आंदोलन बना दिया। उनका उद्देश्य केवल श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराना नहीं था, बल्कि युवाओं में राष्ट्रभक्ति और समर्पण की भावना जगाना था।

उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी की संगठन क्षमता, चुनावी रणनीति, जमीनी स्तर तक विचार पहुँचाने की क्षमता और कार्यकर्ताओं से जुड़ाव को उनकी प्रमुख विशेषताओं में बताया। चौहान ने कहा कि मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने यह भी देखा कि जटिल और लंबे समय से लंबित समस्याओं का समाधान संवाद, स्पष्टता और दृढ़ संकल्प से कैसे किया जा सकता है।

कोविड-19 महामारी के कठिन दौर का उल्लेख करते हुए शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि उस समय प्रधानमंत्री मोदी ने धैर्य, दूरदृष्टि और संतुलित निर्णय क्षमता का परिचय दिया, जिससे देश को दिशा और विश्वास मिला।

उन्होंने कहा कि ‘अपनापन’ विशेष रूप से युवाओं को प्रेरित करेगी और यह संदेश देगी कि राष्ट्र परिवर्तन के लिए केवल बड़ा पद नहीं, बल्कि महान संकल्प, अनुशासन, सेवा भावना और लोगों से आत्मीय जुड़ाव आवश्यक है।

चुनाव से पहले AAP को बड़ा झटका, राघव चड्ढा ने छोड़ी पार्टी

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 भारतीय राजनीति में एक बड़ा झटका देखने को मिला है। आम आदमी पार्टी (Aam Aadmi Party) के प्रमुख नेता राघव चड्ढा ने पार्टी से इस्तीफा देकर भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party) का दामन थाम लिया है

यह कदम ऐसे समय पर सामने आया है जब देश में आगामी चुनावों की तैयारियाँ तेज़ हो रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह बदलाव AAP के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि राघव चड्ढा पार्टी के प्रमुख और युवा चेहरों में से एक थे।

उनके इस फैसले से न केवल पार्टी के भीतर हलचल बढ़ी है, बल्कि विपक्ष और सत्ताधारी दल के बीच राजनीतिक समीकरण भी बदल सकते हैं। आने वाले दिनों में इसका असर चुनावी रणनीतियों और गठबंधनों पर भी देखने को मिल सकता है।


प्रख्यात लेखक और विचारक बलबीर पुंज के निधन पर प्रधानमंत्री ने जताया शोक

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नई दिल्ली: नरेंद्र मोदी ने प्रख्यात लेखक, चिंतक और जन बुद्धिजीवी बलबीर पुंज के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि बलबीर पुंज जी एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी लेखक और विचारक थे, जिन्होंने मीडिया जगत में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी लेखनी व्यापक रूप से पढ़ी जाती थी और उसमें राष्ट्र निर्माण के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता झलकती थी।

उन्होंने कहा कि उनके संसदीय हस्तक्षेप तथ्यों और सिद्धांतों से भरपूर होते थे, जो उनकी गहन समझ को दर्शाते थे।

प्रधानमंत्री ने यह भी उल्लेख किया कि बलबीर पुंज जी ने भारतीय जनता पार्टी को मजबूत करने के लिए अथक प्रयास किए और विशेष रूप से विद्यार्थियों, पेशेवरों, विद्वानों और बुद्धिजीवियों को पार्टी से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे गुजरात सहित कई राज्यों के प्रभारी भी रहे।

प्रधानमंत्री मोदी ने उनके साथ हुई मुलाकातों को याद करते हुए कहा कि वे पल उनके लिए अविस्मरणीय रहेंगे।

उन्होंने दिवंगत नेता के परिजनों और मित्रों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि उनके निधन से उन्हें गहरा दुख पहुंचा है।


पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की जयंती पर पीएम मोदी ने दी श्रद्धांजलि

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नई दिल्ली- नरेंद्र मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। इस वर्ष चंद्रशेखर जी की 100वीं जयंती वर्ष की शुरुआत हो रही है, जिसे प्रधानमंत्री ने उनके सपनों के समृद्ध और न्यायपूर्ण भारत को साकार करने के संकल्प को दोहराने का अवसर बताया।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि चंद्रशेखर जी एक जननेता थे, जो साहस, दृढ़ विश्वास और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति गहरी प्रतिबद्धता के लिए जाने जाते हैं। वे भारत की मिट्टी से जुड़े हुए थे और आम लोगों की आकांक्षाओं को भली-भांति समझते थे।

उन्होंने यह भी कहा कि चंद्रशेखर जी ने सार्वजनिक जीवन में सादगी और स्पष्टता का उदाहरण प्रस्तुत किया। प्रधानमंत्री ने उनके साथ हुई मुलाकातों को याद करते हुए बताया कि उन्हें देश के विकास से जुड़े विषयों पर चर्चा करने का अवसर मिला था।

प्रधानमंत्री मोदी ने देश के युवाओं से अपील की कि वे चंद्रशेखर जी के विचारों और भारत के विकास में उनके योगदान के बारे में अधिक से अधिक पढ़ें और उनसे प्रेरणा लें।


अमरावती को एकमात्र राजधानी का दर्जा: आंध्र प्रदेश पुनर्गठन संशोधन विधेयक 2026 बना ऐतिहासिक मील का पत्थर

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केंद्रीय संचार एवं ग्रामीण विकास राज्य मंत्री डॉ. पेम्मासानी चंद्र शेखर ने आज लोकसभा में आंध्र प्रदेश पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक, 2026 के पारित होने को राज्य की विकास यात्रा में एक ऐतिहासिक क्षण बताया।

उन्होंने कहा कि इस विधेयक के माध्यम से अमरावती को एकमात्र राजधानी के रूप में कानूनी मान्यता मिलने से लंबे समय से चली आ रही संरचनात्मक अनिश्चितता समाप्त हो गई है, जो शासन, निवेश और विकास को प्रभावित कर रही थी।

डॉ. पेम्मासानी ने बताया कि पिछले कई वर्षों से स्पष्ट राजधानी के अभाव में प्रशासनिक अस्पष्टता, बुनियादी ढांचे के कार्यों में देरी और निवेशकों का भरोसा कम हुआ था। यह संशोधन एक स्पष्ट, स्थिर और दूरदर्शी ढांचा प्रदान करता है, जो राज्य पुनर्गठन की मूल भावना के अनुरूप एक विश्वस्तरीय राजधानी के दृष्टिकोण को पुनः स्थापित करता है।

उन्होंने अमरावती आंदोलन में किसानों और महिलाओं के असाधारण योगदान को रेखांकित किया। लगभग 29,000 किसानों ने स्वेच्छा से अपनी 34,000 एकड़ से अधिक पैतृक भूमि राज्य को सौंपी और नीतिगत बदलावों के कारण लंबे समय तक अनिश्चितता झेली।

उन्होंने कहा कि महिलाओं और स्थानीय समुदायों ने शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया और कठिन परिस्थितियों का सामना किया। 1,600 से अधिक दिनों तक यह आंदोलन अनुशासित, शांतिपूर्ण और दृढ़ रहा, जो लोकतांत्रिक मजबूती का एक सशक्त उदाहरण बनकर उभरा।

डॉ. पेम्मासानी ने कहा कि यह विधेयक केवल एक कानूनी सुधार नहीं, बल्कि नैतिक पुनर्स्थापन भी है, जो उन लोगों के सम्मान, न्याय और विश्वास को बहाल करता है, जिन्होंने राज्य के भविष्य के लिए असाधारण बलिदान दिए।

उन्होंने अमरावती के लिए परिवर्तनकारी दृष्टिकोण को दोहराते हुए कहा कि इसे एक वैश्विक स्तर के शहर और आंध्र प्रदेश के प्रमुख विकास इंजन के रूप में विकसित किया जा रहा है। 56,000 करोड़ रुपये से अधिक के 91 प्रमुख बुनियादी ढांचा परियोजनाएं पहले से ही प्रगति पर हैं। अमरावती को औपचारिक मान्यता मिलने से निवेश में तेजी, बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन और राज्य की अर्थव्यवस्था को गति मिलने की उम्मीद है।

उन्होंने कहा कि स्वैच्छिक भूमि पूलिंग पर आधारित अमरावती मॉडल सहभागी और समावेशी विकास का एक अनूठा उदाहरण है, जिसमें किसान राज्य के शहरी भविष्य के भागीदार बने हैं। यह मॉडल देशभर में समान विकास के लिए एक प्रेरणादायक ढांचा बन सकता है।

डॉ. पेम्मासानी ने यह भी कहा कि राजधानी शहर राज्य की आर्थिक प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अमरावती के केंद्र में होने से आंध्र प्रदेश शासन, व्यापार और नवाचार का एक प्रमुख केंद्र बनने की दिशा में अग्रसर है।

उन्होंने इस ऐतिहासिक विधेयक के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व और सहयोग की सराहना की।

उन्होंने कहा कि यह विधेयक केवल एक नीतिगत निर्णय नहीं, बल्कि एक निर्णायक बदलाव है, जो आंध्र प्रदेश के विकास की दिशा को पुनर्परिभाषित करेगा। प्रशासनिक स्थिरता सुनिश्चित करते हुए, निवेशकों का विश्वास बहाल करते हुए और जनता के बलिदानों का सम्मान करते हुए यह संशोधन अमरावती को आकांक्षा, दृढ़ता और समावेशी विकास के प्रतीक के रूप में स्थापित करता है।

बिहार दिवस पर अमित शाह का संदेश: “समृद्ध संस्कृति और गौरवशाली इतिहास से देश को दिशा देता रहा है बिहार”

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नई दिल्ली/पटना- केंद्रीय गृह मंत्री और सहकारिता मंत्री अमित शाह ने बिहार दिवस के अवसर पर राज्य के सभी भाइयों और बहनों को हार्दिक शुभकामनाएं दी हैं।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपने संदेश में अमित शाह ने कहा कि बिहार अपनी समृद्ध संस्कृति, परंपराओं और अद्वितीय कला रूपों के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। उन्होंने कहा कि यह राज्य हमेशा से देश को सामाजिक न्याय और बौद्धिक जागरूकता के मार्ग पर आगे बढ़ाने में अग्रणी रहा है।

अमित शाह ने बिहार के गौरवशाली इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि नालंदा और विक्रमशिला जैसे विश्वप्रसिद्ध शिक्षा केंद्रों की परंपरा से लेकर स्वतंत्रता संग्राम और आपातकाल तक, बिहार ने हर युग में राष्ट्र निर्माण में अमूल्य योगदान दिया है।

उन्होंने आगे कहा कि आज बिहार अपने समृद्ध विरासत और परंपराओं को संजोते हुए विकास और प्रगति के नए मानक स्थापित कर रहा है, जो पूरे देश के लिए प्रेरणास्रोत है।


राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के अपमान पर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने लिखा ममता बनर्जी को कड़ा पत्र

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संवैधानिक मर्यादाओं का सम्मान जरूरी: आदिवासी समाज और मातृशक्ति का अपमान देश कभी स्वीकार नहीं करेगा : मुख्यमंत्री

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को कड़ा पत्र लिखकर भारत की माननीय राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ हाल ही में हुए व्यवहार पर गहरी आपत्ति जताई है। 

मुख्यमंत्री साय ने कहा है कि जनजातीय समाज से आने वाली देश की प्रथम महिला राष्ट्रपति के साथ किया गया यह व्यवहार केवल एक व्यक्ति का नहीं बल्कि देश की सर्वोच्च संवैधानिक संस्था, आदिवासी समाज और मातृशक्ति का अपमान है।

मुख्यमंत्री साय ने अपने पत्र में कहा है कि भारत की लोकतांत्रिक परंपराएं और शिष्टाचार पूरी दुनिया में सम्मानित रहे हैं। मतभेद को कभी भी मनभेद में न बदलने की हमारी संस्कृति रही है, लेकिन राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च संवैधानिक पद के प्रति न्यूनतम शिष्टाचार का भी पालन न किया जाना लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस से ठीक पहले एक जनजातीय समाज से आने वाली महिला राष्ट्रपति के प्रवास के दौरान कार्यक्रम से जुड़ी व्यवस्थाओं में लापरवाही और उनका अपमान किया जाना अत्यंत निंदनीय और दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि यह घटना देश के करोड़ों आदिवासियों, पिछड़ों, दलितों और मातृशक्ति की भावनाओं को गहराई से आहत करने वाली है।

मुख्यमंत्री साय ने अपने पत्र में यह भी कहा कि यह पहली बार हुआ है जब किसी राज्य सरकार के व्यवहार को लेकर स्वयं राष्ट्रपति जी को अपनी पीड़ा सार्वजनिक करनी पड़ी है। उन्होंने कहा कि यह स्थिति देश के लोकतांत्रिक इतिहास में अत्यंत चिंताजनक है और इससे पश्चिम बंगाल जैसे प्रतिष्ठित राज्य की छवि को भी ठेस पहुंची है।

मुख्यमंत्री साय ने अपने पत्र में संदेशखाली की घटना का भी उल्लेख करते हुए कहा कि वहां भी जनजातीय समाज की महिलाओं के साथ हुई घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर दिया था। उन्होंने कहा कि वंचित और जनजातीय समाज के साथ इस प्रकार का व्यवहार किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने  ममता बनर्जी से आग्रह किया है कि वे इस विषय पर देश और समाज से क्षमा मांगते हुए अपनी भूल स्वीकार करें तथा भविष्य में लोकतांत्रिक संस्थाओं और संवैधानिक पदों के प्रति सम्मान बनाए रखने के लिए देश को आश्वस्त करें।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में राष्ट्रपति देश की सर्वोच्च संवैधानिक संस्था का प्रतीक हैं और उनके सम्मान से ही लोकतंत्र की गरिमा जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि किसी भी राजनीतिक मतभेद से ऊपर उठकर संवैधानिक पदों का सम्मान किया जाना चाहिए।

मुख्यमंत्री साय ने स्पष्ट कहा कि जनजातीय समाज से आने वाली राष्ट्रपति के सम्मान से जुड़ा यह विषय पूरे देश की अस्मिता और स्वाभिमान से जुड़ा हुआ है, इसलिए देश और समाज की भावनाओं का सम्मान करते हुए इस प्रकरण में जिम्मेदारी के साथ कदम उठाए जाना आवश्यक है।

लक्ष्मी वर्मा का राज्यसभा में जाना लगभग तय, भाजपा से उम्मीदवार घोषित

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रायपुर- भारतीय जनता पार्टी ने छत्तीसगढ़ से राज्यसभा चुनाव 2026 के लिए लक्ष्मी वर्मा को उम्मीदवार घोषित किया है। यह फैसला मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की पसंद पर केंद्रीय चुनाव समिति की मुहर लगने के बाद आया।

लक्ष्मी वर्मा का राजनीतिक पृष्ठभूमि 

लक्ष्मी वर्मा 55 वर्षीय वरिष्ठ भाजपा नेत्री हैं, जिन्होंने एमए की डिग्री प्राप्त की है। वे छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग की सदस्य और पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष रह चुकी हैं। 

रायपुर जिला पंचायत की पूर्व अध्यक्ष के रूप में उन्होंने स्थानीय स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, साथ ही कुर्मी समाज और महिला मतदाताओं में मजबूत पकड़ रखती हैं। 

उनका राजनीतिक सफर 1990 से शुरू हुआ, जब उन्होंने भाजपा की प्राथमिक सदस्यता ली और 1994 में रायपुर नगर निगम पार्षद बनीं। 

 चुना जाना लगभग तय 

छत्तीसगढ़ से राज्यसभा की दो सीटें 9 अप्रैल 2026 को खाली हो रही हैं, जहां भाजपा को एक सीट आसानी से मिल सकती है क्योंकि राज्य में 90 विधायक हैं और 31 वोट पर्याप्त हैं। 

प्रदेश संगठन ने सात नामों का पैनल भेजा था, जिसमें से केंद्रीय स्तर पर लक्ष्मी वर्मा का चयन हुआ। यह चयन भाजपा की महिला सशक्तिकरण नीति को मजबूत करता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बालासाहेब ठाकरे की जन्म शताब्दी पर दी श्रद्धांजलि, महाराष्ट्र की राजनीति को आकार देने वाले महान नेता को किया याद

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नई दिल्ली- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महान जननेता बालासाहेब ठाकरे की जन्म शताब्दी के अवसर पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। प्रधानमंत्री ने बालासाहेब ठाकरे को महाराष्ट्र के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य को गहराई से प्रभावित करने वाली एक प्रभावशाली और प्रेरणादायक शख्सियत बताया।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि बालासाहेब ठाकरे अपनी तेज़ बुद्धि, ओजस्वी वक्तृत्व कला और अडिग सिद्धांतों के लिए जाने जाते थे। उनके विचारों और व्यक्तित्व का जनता के साथ एक विशेष और सीधा जुड़ाव था, जो उन्हें एक असाधारण जननेता बनाता है।

प्रधानमंत्री ने यह भी उल्लेख किया कि राजनीति के अलावा बालासाहेब ठाकरे को संस्कृति, साहित्य और पत्रकारिता के प्रति गहरा लगाव था। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक कार्टूनिस्ट के रूप में की थी, जहाँ उनके चित्र समाज पर उनकी पैनी नज़र और विभिन्न मुद्दों पर निर्भीक टिप्पणी को दर्शाते थे। उनके कार्टून उस दौर की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों का सशक्त प्रतिबिंब हुआ करते थे।

प्रधानमंत्री ने कहा कि बालासाहेब ठाकरे का संपूर्ण जीवन महाराष्ट्र के विकास और प्रगति के लिए समर्पित रहा। उनके विचार और दृष्टिकोण आज भी शासन, समाज और युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर भी अपने विचार साझा करते हुए लिखा—

“महान बालासाहेब ठाकरे की जन्म शताब्दी पर हम एक ऐसी महान विभूति को नमन करते हैं, जिन्होंने महाराष्ट्र के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य को गहराई से आकार दिया।

अपनी तीक्ष्ण बुद्धि, प्रभावशाली वक्तृत्व और अडिग विचारों के लिए प्रसिद्ध बालासाहेब ठाकरे का जनता से एक अनूठा जुड़ाव था। राजनीति के साथ-साथ उन्हें संस्कृति, साहित्य और पत्रकारिता से गहरा प्रेम था। एक कार्टूनिस्ट के रूप में उनका करियर समाज पर उनकी पैनी दृष्टि और विभिन्न विषयों पर उनकी निर्भीक टिप्पणी को दर्शाता है।

हम महाराष्ट्र की प्रगति के लिए उनके दृष्टिकोण से अत्यंत प्रेरित हैं और उसे साकार करने के लिए सदैव प्रयासरत रहेंगे।”

प्रधानमंत्री के इस संदेश से यह स्पष्ट होता है कि बालासाहेब ठाकरे की विरासत केवल राजनीति तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने समाज, संस्कृति और विचारधारा के स्तर पर भी गहरी छाप छोड़ी है।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कुशाभाऊ ठाकरे की पुण्यतिथि पर दी श्रद्धांजलि

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रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने आज राजधानी रायपुर स्थित मुख्यमंत्री निवास कार्यालय में प्रख्यात जननायक कुशाभाऊ ठाकरे जी की पुण्यतिथि पर उनके छायाचित्र पर पुष्प अर्पित कर भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की। इस अवसर पर सांसद संतोष पाण्डेय, विधायक प्रबोध मिंज, विधायक पुरन्दर मिश्रा सहित अनेक जनप्रतिनिधि उपस्थित थे।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि कुशाभाऊ ठाकरे जी का संपूर्ण जीवन राष्ट्रहितऔर समाज-सेवा के लिए समर्पित रहा। वे सत्ता-प्राप्ति को उद्देश्य नहीं, बल्कि जनसेवा को राजनीति का परम लक्ष्य मानते थे।मूल्य-आधारित राजनीति, चरित्र, अनुशासन और कर्मठता उनके सार्वजनिक जीवन की पहचान रही।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि कुशाभाऊ ठाकरे जी ने भारतीय लोकतंत्र को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। लोकतांत्रिक संस्कारों के प्रसार में उनकी भूमिका सदैव स्मरणीय रहेगी। वे सरलता और आत्मीयता के माध्यम से लोगों के हृदय से जुड़ने वाले विरले नेता थे।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि छत्तीसगढ़ के साथ कुशाभाऊ ठाकरे जी का गहरा और आत्मीय संबंध रहा है। उनके जीवन से यह प्रेरणा मिलती है कि राजनीति का मूल उद्देश्य सेवा, राष्ट्रहित एवं समाज कल्याण ही होना चाहिए।

मुख्यमंत्री ने कहा कि कुशाभाऊ ठाकरे जी की पावन स्मृतियाँ हम सबके लिए प्रेरणास्रोत हैं और हमें जनकल्याण के कार्यों में सदैव सक्रिय रहने की प्रेरणा देती रहेंगी।

प्रधानमंत्री मोदी से मिले आलोक मेहता, ‘Revolutionary Raj: Narendra Modi’s 25 Years’ पुस्तक की पहली प्रति भेंट

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 नई दिल्ली- आलोक मेहता ने आज नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भेंट की। इस अवसर पर उन्होंने अपनी पुस्तक “Revolutionary Raj: Narendra Modi’s 25 Years” की पहली प्रति प्रधानमंत्री को भेंट की।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मुलाकात को लेकर सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए लिखा,
“आलोक मेहता से मिलकर और उनकी पुस्तक की प्रति प्राप्त कर खुशी हुई।”

यह पुस्तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन और नेतृत्व के 25 वर्षों की यात्रा को रेखांकित करती है तथा उनके शासन, विचारों और प्रशासनिक दृष्टिकोण पर प्रकाश डालती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती पर दी श्रद्धांजलि, कहा—सुशासन और राष्ट्रनिर्माण के प्रतीक थे अटल जी

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नई दिल्ली- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज भारत रत्न, पूर्व प्रधानमंत्री श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी की जयंती के अवसर पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। प्रधानमंत्री ने कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी जी ने अपना संपूर्ण जीवन सुशासन, लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्र निर्माण को समर्पित कर दिया। उनका व्यक्तित्व और विचार आज भी देश को दिशा देने का कार्य कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया मंच एक्स (X) पर अपने संदेश में कहा कि अटल जी न केवल एक प्रखर वक्ता और दूरदर्शी नेता थे, बल्कि वे एक ओजस्वी कवि भी थे, जिनकी रचनाओं में राष्ट्रप्रेम, संवेदना और मानवीय मूल्यों की गहरी झलक मिलती है। उनका नेतृत्व देश के चहुंमुखी विकास के लिए सदैव प्रेरणास्रोत बना रहेगा।

अटल बिहारी वाजपेयी जी भारतीय राजनीति के उन विरले नेताओं में से थे, जिन्हें पक्ष और विपक्ष—दोनों में समान सम्मान प्राप्त था। वे तीन बार देश के प्रधानमंत्री रहे और उनके कार्यकाल में भारत ने सुशासन, आर्थिक सुधार, बुनियादी ढांचे के विकास और वैश्विक मंच पर सशक्त पहचान की दिशा में ऐतिहासिक प्रगति की। पोखरण परमाणु परीक्षण, स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना और ग्राम सड़क योजना जैसे निर्णय उनके दूरदर्शी नेतृत्व के उदाहरण हैं।

प्रधानमंत्री ने कहा कि अटल जी का जीवन और विचार आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने रहेंगे और उनका योगदान भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा।

प्रधानमंत्री का संदेश:

“देशवासियों के हृदय में बसे पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी जी को उनकी जयंती पर सादर नमन। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन सुशासन और राष्ट्र निर्माण को समर्पित कर दिया। वे एक प्रखर वक्ता के साथ-साथ ओजस्वी कवि के रूप में भी सदैव स्मरणीय रहेंगे। उनका व्यक्तित्व, कृतित्व और नेतृत्व देश के चहुंमुखी विकास के लिए पथ-प्रदर्शक बना रहेगा।”


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