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ममता बनर्जी की ECI के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, TMC के नाम-चुनाव चिन्ह विवाद पर मांगा समयसीमा

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नई दिल्ली- पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (TMC) प्रमुख ममता बनर्जी की ओर से चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। मामला TMC के पार्टी नाम और पारंपरिक ‘फूल और घास’ चुनाव चिन्ह से जुड़ा है। 

क्या है पूरा मामला?

चुनाव आयोग ने 17 सितंबर को TMC के भीतर दो गुटों के बीच चल रहे विवाद को देखते हुए पार्टी के मूल नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर अंतरिम व्यवस्था की थी। आयोग ने आगामी पश्चिम बंगाल उपचुनावों के लिए दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिन्ह आवंटित किए हैं। 

ममता बनर्जी ने 18 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हुए चुनाव आयोग के इस अंतरिम फैसले को चुनौती दी थी। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने मामले की जल्द सुनवाई की मांग की थी।

सुप्रीम कोर्ट ने ECI से क्या कहा?

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने चुनाव आयोग से पूछा कि TMC के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर चल रहे मूल विवाद पर अंतिम फैसला लेने में उसे कितना समय लगेगा। अदालत ने आयोग को एक उचित समयसीमा बताने के लिए कहा है और मामले को सोमवार को फिर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है। 

अदालत ने यह भी कहा कि विवाद का जल्द निपटारा जरूरी है। पीठ ने पिछले शिवसेना विवाद का उदाहरण देते हुए देरी के प्रभाव का उल्लेख किया। 

उपचुनाव के बीच फैसला बना मुद्दा

यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम और रेजीनगर में 6 अक्टूबर को उपचुनाव होने हैं। चुनाव आयोग की अंतरिम व्यवस्था इन उपचुनावों पर लागू है। अदालत ने संकेत दिया कि चुनाव कार्यक्रम जारी हो जाने के बाद मौजूदा उपचुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप करना आसान नहीं होगा। 

दोनों गुटों को मिले अलग नाम और चिन्ह

अंतरिम व्यवस्था के तहत ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को ‘Mamata All India Trinamool Congress’ नाम और ‘Football Player’ चुनाव चिन्ह दिया गया है। दूसरे गुट को ‘Democratic Trinamool Congress’ नाम और ‘Envelope’ चिन्ह आवंटित किया गया है। चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि यह व्यवस्था अंतिम फैसला नहीं है; मूल नाम और चिन्ह पर अंतिम निर्णय अलग से होना है।

अब आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से विवाद के निपटारे की समयसीमा पर जानकारी मांगी है। अगली सुनवाई में आयोग की ओर से यह बताया जाएगा कि दोनों पक्षों को उचित अवसर देते हुए अंतिम निर्णय लेने में कितना समय लगेगा। इसके बाद अदालत आगे की दिशा तय कर सकती है। 

CEC को लेकर विपक्ष का विरोध तेज, कांग्रेस-TMC-AAP-DMK ने उठाए सवाल

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नई दिल्ली- मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर विपक्षी दलों का विरोध तेज हो गया है। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस (TMC), आम आदमी पार्टी (AAP), DMK समेत कई विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग के कामकाज और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े फैसलों पर सवाल उठाए हैं। विपक्षी दलों ने CEC को हटाने, SIR की प्रक्रिया पर रोक लगाने और चुनाव आयोग के कामकाज की जांच की मांग की है।

विवाद की शुरुआत कहां से हुई?

यह विवाद उस रिपोर्ट के बाद तेज हुआ जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयोग के दो अन्य आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने पिछले 10 महीनों में SIR समेत कई मामलों में आयोग के फैसलों पर कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट में मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और बहाल करने की प्रक्रिया तथा मतदाता डेटा से जुड़े कुछ मुद्दों पर मतभेद का उल्लेख किया गया है। 

विपक्ष की प्रमुख मांगें

कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने CEC ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने, चुनाव आयोग के कामकाज की सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच कराने और SIR प्रक्रिया को रोकने की मांग की है। कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल ने CEC को हटाने की मांग की, जबकि TMC और DMK नेताओं ने भी चुनाव आयोग के भीतर सामने आए मतभेदों की जांच की मांग उठाई। 

चुनाव आयोग का क्या कहना है?

विपक्ष के आरोपों के बीच चुनाव आयोग ने कहा है कि आयोग के भीतर अलग-अलग विचार सामने आना उसकी आंतरिक विचार-विमर्श प्रक्रिया का हिस्सा है और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं। इसलिए विपक्ष द्वारा उठाए गए आरोपों और आयोग के स्पष्टीकरण को अलग-अलग समझना जरूरी है।

संसद में हटाने की प्रक्रिया को लेकर भी चर्चा

रिपोर्टों के अनुसार, CEC को हटाने को लेकर विपक्ष पहले भी नोटिस दे चुका है। अप्रैल 2026 में राज्यसभा में एक नया नोटिस दिए जाने की बात सामने आई थी, जो अभी लंबित बताया गया है। CEC को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया संसद के माध्यम से होती है और इसके लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है।

SIR बना राजनीतिक विवाद का केंद्र

मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) को लेकर पहले से ही राजनीतिक विवाद चल रहा है। विपक्षी दलों का कहना है कि इस प्रक्रिया से मतदाताओं के अधिकार और चुनावी प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है। वहीं चुनाव आयोग का पक्ष है कि मतदाता सूची को अपडेट और सत्यापित करना चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा है। इस पूरे विवाद के कानूनी और प्रशासनिक पहलुओं पर न्यायिक स्तर पर भी कार्यवाही चल रही है।

फिलहाल मामला राजनीतिक और न्यायिक दोनों स्तरों पर चर्चा में है। CEC को हटाने की विपक्ष की मांग और चुनाव आयोग की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण के बीच आगे की कार्रवाई पर नजर बनी हुई है।

चुनाव आयोग के भीतर मतभेद की रिपोर्ट

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10 महीनों में 14 बार दर्ज हुई आपत्ति, मतदाता सूची और एसआईआर प्रक्रिया को लेकर उठे सवाल

नई दिल्ली- देश की चुनावी व्यवस्था से जुड़ी एक महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयोग के दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने पिछले करीब 10 महीनों में कम-से-कम 14 बार आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर औपचारिक रूप से आपत्ति दर्ज की।

रिपोर्ट के अनुसार, इन आपत्तियों का संबंध मुख्य रूप से मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाताओं के नाम जोड़ने-हटाने और मतदाता डेटा के डिजिटल प्रबंधन से है।

मामला क्या है?

चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ दो चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी हैं।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, संधू और जोशी ने कई मौकों पर यह आपत्ति दर्ज की कि आयोग के नाम पर कुछ फैसले या आदेश उनकी जानकारी अथवा मंजूरी के बिना लिए गए।

रिपोर्ट के अनुसार, चार आपत्तियां एक ही दिन दर्ज की गई थीं। दोनों आयुक्तों की आपत्तियां चुनावी प्रक्रिया के बेहद महत्वपूर्ण हिस्सों से जुड़ी थीं।

एसआईआर बना विवाद का मुख्य केंद्र

इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा एसआईआर यानी Special Intensive Revision है।

एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण करना है। इसमें मतदाता रिकॉर्ड की जांच की जाती है और पात्रता से संबंधित रिकॉर्ड को अपडेट किया जाता है।

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, बिहार से शुरू हुई यह प्रक्रिया बाद में देश के कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों तक पहुंची और इसके दौरान 13 करोड़ से अधिक नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची से हटाए गए। यह संख्या व्यापक मतदाता रिकॉर्ड की प्रारंभिक छंटाई से संबंधित है; इसे अंतिम रूप से मताधिकार खो चुके लोगों की संख्या के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए।

फॉर्म-6 में बदलाव पर आपत्ति

रिपोर्ट के मुताबिक, फॉर्म-6 में किए गए बदलाव को लेकर भी दोनों चुनाव आयुक्तों ने सवाल उठाए।

फॉर्म-6 का इस्तेमाल नए मतदाता के रूप में नाम दर्ज कराने के लिए किया जाता है।

रिपोर्ट के अनुसार, नए फॉर्म में आवेदक से यह जानकारी मांगी गई कि उसका, उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली एसआईआर की मतदाता सूची में था या नहीं।

सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कथित तौर पर इस बदलाव की वैधानिक प्रक्रिया पर आपत्ति जताई। संधू ने बाद में इसे “अनधिकृत और गैरकानूनी” बताते हुए हटाने की मांग की।

मतदाता डेटा के केंद्रीकरण पर भी सवाल

दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों में मतदाता सूची के डिजिटल सिस्टम का मुद्दा भी सामने आया।

रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग के डिजिटल सिस्टम ईसीआईनेट (ECINet) में मतदाता डेटा के प्रबंधन और राज्य स्तर के अधिकारियों की पहुंच को लेकर सवाल उठाए गए।

आयुक्तों ने कथित तौर पर चिंता जताई कि मतदाता सूची के डेटाबेस का संचालन धीरे-धीरे केंद्र स्तर पर अधिक केंद्रीकृत हो रहा है और इससे स्थानीय स्तर पर मतदाता सूची संभालने वाले अधिकारियों की भूमिका प्रभावित हो सकती है।

गोवा में 97 मतदाताओं का मामला

रिपोर्ट में गोवा का एक उदाहरण भी दिया गया है।

इसके अनुसार, 97 मतदाताओं के मामलों में स्थानीय चुनाव अधिकारियों ने दस्तावेजों की जांच के बाद उन्हें पात्र पाया, लेकिन संबंधित डिजिटल सिस्टम में उनके नाम बहाल करने की प्रक्रिया समय पर उपलब्ध नहीं हो सकी।

नतीजतन, ये 97 पात्र मतदाता अंतिम मतदाता सूची में शामिल नहीं हो सके।

यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे सवाल उठता है कि यदि जमीनी स्तर का अधिकारी किसी व्यक्ति को पात्र मानता है, तो डिजिटल प्रणाली में उस निर्णय को दर्ज और लागू करने की प्रक्रिया कितनी प्रभावी है।

चुनाव आयोग ने क्या कहा?

इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों ने आंतरिक मतभेद या विभाजन की धारणा को खारिज किया।

डेक्कन क्रॉनिकल की रिपोर्ट के मुताबिक, आयोग से जुड़े सूत्रों ने कहा कि एसआईआर सहित आयोग के सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं और दोनों चुनाव आयुक्तों तथा मुख्य चुनाव आयुक्त की मंजूरी से लिए गए हैं।

इसलिए इस खबर को समझते समय दोनों पक्षों को अलग-अलग देखना जरूरी है:

रिपोर्ट का दावा:
दो चुनाव आयुक्तों ने कई फैसलों पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं।

चुनाव आयोग का पक्ष:
आयोग के सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं।

इसका संवैधानिक महत्व क्या है?

चुनाव आयोग भारत की संवैधानिक संस्था है और इसका आधार संविधान का अनुच्छेद 324 है।

चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त शामिल होते हैं। 2023 के कानून के तहत आयोग के कामकाज में जहां तक संभव हो सर्वसम्मति से निर्णय लेने का प्रावधान है। यदि सदस्यों के बीच मतभेद हो तो कानून के अनुसार बहुमत से निर्णय लिया जा सकता है।

इसी वजह से दो चुनाव आयुक्तों द्वारा बार-बार लिखित आपत्ति दर्ज किए जाने की रिपोर्ट को चुनावी प्रशासन की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

निष्कर्ष

चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेद की यह रिपोर्ट इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि विवाद सीधे मतदाता सूची, नए मतदाताओं के पंजीकरण और चुनावी डेटा के प्रबंधन जैसे मूल चुनावी कार्यों से जुड़ा है। फिलहाल सार्वजनिक चर्चा में एक तरफ इंडियन एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट है, जबकि दूसरी तरफ चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों का यह कहना है कि उसके फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं।

ओडिशा की वोटर लिस्ट में बड़ा बदलाव—SIR के बाद 20.56 लाख नाम हटे, 2.90 लाख नए मतदाता जुड़े

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ओडिशा की वोटर लिस्ट में बड़ा बदलाव, 20.56 लाख नाम हटाए गए

भुवनेश्वर: ओडिशा में मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) की प्रक्रिया पूरी हो गई है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी एस. गोपालन के अनुसार, अंतिम मतदाता सूची में 20.56 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। 

अधिकारियों के मुताबिक, SIR की शुरुआत 30 मई 2026 को हुई थी। उस समय ओडिशा की मतदाता सूची में करीब 3.14 करोड़ मतदाता दर्ज थे। सत्यापन प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में ऐसे नाम सामने आए जिनमें मतदाता की मृत्यु हो चुकी थी, वे स्थायी रूप से दूसरे स्थान पर जा चुके थे या एक ही व्यक्ति के एक से अधिक रिकॉर्ड मौजूद थे। 

हटाए गए करीब 20.12 लाख नामों में लगभग 8.32 लाख मृत मतदाता, 8.08 लाख स्थायी रूप से स्थानांतरित मतदाता, करीब 2 लाख अनुपस्थित मतदाता और लगभग 1.58 लाख डुप्लीकेट प्रविष्टियां शामिल थीं।

इसके बाद ड्राफ्ट मतदाता सूची पर दावे और आपत्तियां मांगी गईं। अधिकारियों के अनुसार, इस चरण में कुछ और नाम हटाए गए, जबकि नए पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल भी किया गया। करीब 2.90 लाख नए नाम जोड़े गए, जिसके बाद अंतिम मतदाता सूची में कुल 3,16,32,754 मतदाता दर्ज हैं। 

निर्वाचन अधिकारी ने बताया कि अब SIR की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और मतदाता सूची का सामान्य अपडेट जारी रहेगा। जिन लोगों का नाम छूट गया है या जिन्हें अपने विवरण में सुधार कराना है, वे निर्धारित Form 6, Form 7 या Form 8 के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं। 

खास बात: 20.56 लाख नाम हटाए जाने का मतलब यह नहीं है कि सभी हटाए गए मतदाता गलत तरीके से सूची में थे; आधिकारिक विवरण में मृत्यु, स्थायी स्थानांतरण, अनुपस्थिति और डुप्लीकेट रिकॉर्ड जैसे अलग-अलग कारण बताए गए हैं।


नवा रायपुर में राज्य निर्वाचन आयुक्तों के 32वें अखिल भारतीय सम्मेलन का राज्यपाल रामेन डेका ने किया शुभारंभ

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Chhattisgarh Local Body Election Year Book- 2026 का किया विमोचन

रायपुर- छत्तीसगढ़ राज्य निर्वाचन आयुक्त अजय सिंह ने बताया कि हर वर्ष अलग-अलग राज्यों में होने वाले राज्य निर्वाचन आयुक्तगणों के सम्मेलन के क्रम में 32वां सम्मेलन इस वर्ष 16-17 सितम्बर को छत्तीसगढ़ की राजधानी नवा रायपुर अटल नगर में हो रहा है। इस सम्मेलन का आयोजन छत्तीसगढ़ राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा किया जा रहा है।

सम्मेलन का शुभारंभ आज माननीय राज्यपाल द्वारा किया गया। सम्मेलन के शुभारंभ अवसर पर मेजबान छत्तीसगढ़ के निर्वाचन आयुक्त अजय सिंह, राज्य निर्वाचन आयुक्तगण की स्थाई समिति के अध्यक्ष विजय देव एवं संयोजक सुधांशु पांडे तथा प्रदेश के मुख्य सचिव विकासशील उपस्थित रहे। शुभारंभ सहारोह के इस विशेष अवसर पर राज्यपाल रमेन डेका ने छत्तीसगढ़ स्थानीय निकाय निर्वाचन वार्षिकी 2026 Year Book के प्रथम संस्करण का विमोचन भी किया।

उद्घाटन उपरांत आज सम्मेलन में देशभर से विभिन्न राज्यों के पधारे राज्य निर्वाचन आयुक्तगण ने स्थानीय लोकतंत्र विशेषकर त्रिस्तरीय पंचायतों व नगरीय निकायों को और अधिक सशक्त, पारदर्शी, समावेशी, विश्वसनीय एवं सहभागी बनाने हेतु निर्वाचन के विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श किया एवं कॉन्फ्रेंस में अलग-अलग राज्यों के राज्य निर्वाचन आयुक्तगण और विषय-विशेषज्ञों के द्वारा प्रस्तुतीकरण दिया ।

सम्मेलन के दौरान राज्य निर्वाचन आयुक्तगण द्वारा स्थानीय निकाय निर्वाचन के संचालन में सामने आने वाली चुनौतियों, अनुभवों और नवाचारों को साझा करने के क्रम में छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा "राज्य गठन उपरांत नक्सल प्रभावित बस्तर में पिछले 25 वर्षों में स्थानीय लोकतंत्र की प्रगति" विषय पर छत्तीसगढ़ राज्य निर्वाचन आयुक्त अजय सिंह के निर्देशन में तैयार प्रस्तुति आयोग की सचिव  शिखा राजपूत तिवारी द्वारा प्रस्तुत की गई।

बस्तर में स्थानीय लोकतंत्र की यात्रा को विशेष रूप से रेखांकित किया गया। भौगोलिक दुर्गमता, विस्तृत वन क्षेत्र, सीमित संचार सुविधाओं तथा लंबे समय तक वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित बस्तर संभाग की परिस्थितियों के बीच स्थानीय निर्वाचन कराना एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक एवं लोकतांत्रिक चुनौती रहा है। छत्तीसगढ़ में स्थानीय निकायों के निर्वाचन के अनुभवों को साझा करते हुए बताया गया कि प्रशासन, पुलिस, सुरक्षा बल, निर्वाचन कर्मियों तथा स्थानीय समुदाय के समन्वित प्रयासों से लोकतांत्रिक प्रक्रिया को निरंतर सुदृढ़ किया गया है। वर्ष 2025 में नगरीय निकायों एवं त्रिस्तरीय पंचायतों के निर्वाचन एक साथ राज्यभर में, बस्तर संभाग सहित, शांतिपूर्वक एवं सफलतापूर्वक संपन्न कराने तथा पुनर्मतदान की आवश्यकता न पड़ने का उल्लेख किया गया।

मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान एवं केरलम की ओर से सूचना प्रोद्योगिकी के उपयोग के संबंध में 'EVM sharing tracking policy and it's challenges and EMS SOFTWARE' 'Panchayat Delimitation 2026: Transforming Delimitation through Technology A New Era of Paperless Delimitation', 'Digitalising Elections in India', 'Re-engineering elections in the Digital Era: The Kerala Story' विषयों पर प्रस्तुतियां दी गई।

सम्मेलन में लोकतांत्रिक निर्वाचन विषय से जुड़े प्रिंसटन यूनिवर्सिटी न्यू जर्सी अमेरिका के अंतर्राष्ट्रीय स्तर के विषय विशेषज्ञ ने भी हिस्सा लिया और उन्होंने भारत के राज्यों में होने वाले स्थानीय निर्वाचनों का तुलनात्मक एवं समेकित अध्ययन का सार प्रस्तुतीकरण के माध्यम से प्रस्तुत किया। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम इलेक्ट्रॉनिक कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया, हैदराबाद एवं भारत इलेक्ट्रानिक्स लिमिटेड, बेंगलूरु के ईलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन के विषय विशेषज्ञ ने भी सम्मेलन में अपने संस्थानों की अद्यतन जानकारी प्रस्तुत करते हुए बताया कि निर्वाचन में उपयोग होने वाली इलेक्ट्रानिक वोति वोटिंग मशीन हर प्रकार से सुरक्षित है और इसमें लगातार नवाचार करते हुए राज्य निर्वाचन आयोगों के अनुकूल इसका विकास एवं उत्पादन किया जा रहा है।

कोटा निकाय चुनाव में BJP का बहुमत, 100 में 55 वार्डों पर जीत; EVM गड़बड़ी से 3 वार्डों के नतीजे अटके, 16 सितंबर को पुनर्मतदान

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कोटा- राजस्थान के शहरी निकाय चुनाव में कोटा नगर निगम का परिणाम राजनीतिक रूप से भाजपा के लिए बड़ी सफलता लेकर आया है। 100 सदस्यीय कोटा नगर निगम में भाजपा ने 55 वार्डों में जीत दर्ज कर स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया है। कांग्रेस को 40 वार्डों में जीत मिली, जबकि तीन वार्डों में निर्दलीय प्रत्याशी विजयी रहे।

हालांकि, चुनाव परिणाम के बीच EVM में तकनीकी खराबी ने प्रक्रिया को कुछ समय के लिए रोक दिया। कोटा नगर निगम के वार्ड 11, 44 और 87 के परिणामों को रोक दिया गया है। इसके अलावा सुकेत नगरपालिका के वार्ड 4 के एक मतदान केंद्र पर भी EVM संबंधी समस्या सामने आई। प्रभावित स्थानों पर 16 सितंबर को पुनर्मतदान कराया जाएगा और 17 सितंबर को मतगणना प्रस्तावित है। 

55 सीटों के साथ भाजपा ने हासिल किया बहुमत

कोटा नगर निगम में कुल 100 वार्ड हैं और बहुमत के लिए 51 सीटों की जरूरत होती है। भाजपा ने 55 सीटों पर जीत दर्ज कर इस आंकड़े को पार कर लिया। कांग्रेस को 40 सीटें मिलीं, जबकि निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी कुछ वार्डों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।

इस परिणाम के साथ कोटा नगर निगम में भाजपा का बोर्ड बनना लगभग तय माना जा रहा है। हालांकि, जिन वार्डों में पुनर्मतदान होना है, वहां अंतिम परिणाम और उसके बाद होने वाली पदाधिकारियों की चुनावी प्रक्रिया को लेकर स्थिति पुनर्मतदान के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट होगी।

EVM खराबी के कारण तीन वार्डों के परिणाम रोके गए

मतगणना के दौरान कोटा के वार्ड 11, 44 और 87 की EVM मशीनों में तकनीकी समस्या सामने आई। मशीनों से संबंधित समस्या के चलते इन वार्डों के परिणाम तत्काल घोषित नहीं किए जा सके। अधिकारियों के आदेश के बाद संबंधित मशीनों को सुरक्षित रखा गया और निर्वाचन प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए आयोग से निर्देश लिए गए। 

आधिकारिक आदेश के अनुसार, प्रभावित मतदान केंद्रों पर 16 सितंबर को दोबारा मतदान होगा। इसके बाद 17 सितंबर को मतगणना कर परिणाम घोषित किए जाएंगे।

वार्ड 87 को लेकर कांग्रेस का विरोध

EVM विवाद के बीच वार्ड 87 का मामला विशेष रूप से चर्चा में रहा। कांग्रेस प्रत्याशी लक्ष्मी शर्मा ने परिणाम घोषित नहीं होने के विरोध में मतगणना केंद्र के बाहर धरना दिया। उनके साथ पार्टी की स्थानीय नेता शालिनी गौतम और युवा कांग्रेस नेता शुभम गोचर भी मौजूद रहे।

कांग्रेस की ओर से चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग की गई। बाद में कोटा कांग्रेस अध्यक्ष राखी गौतम भी मतगणना केंद्र पहुंचीं और संबंधित EVM को कलेक्टर तथा ADM की मौजूदगी में सील करने की मांग की। अधिकारियों ने मामले की रिपोर्ट निर्वाचन आयोग को भेजी। 

ध्यान रहे कि कांग्रेस नेताओं द्वारा लगाए गए गड़बड़ी के आरोप राजनीतिक आरोप हैं; उपलब्ध रिपोर्टों में निर्वाचन अधिकारियों ने इसे EVM की तकनीकी खराबी के रूप में दर्ज किया है।

कई दिग्गजों ने भी दर्ज की जीत

कोटा के चुनाव परिणाम में भाजपा के कई पुराने नेताओं ने अपनी पकड़ बरकरार रखी। वार्ड 54 से भाजपा के विवेक राजवंशी ने लगातार चौथी बार जीत दर्ज की। उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी मनीष को 2,226 मतों के अंतर से हराया।

इसी तरह भाजपा के गोपाल राम मांडा ने लगातार पांचवीं बार जीत दर्ज की। उन्होंने कांग्रेस के संजय यादव को 899 मतों से पराजित किया। 

हालांकि, कुछ वार्डों में कांग्रेस और निर्दलीय प्रत्याशियों ने भी भाजपा को कड़ी चुनौती दी। वार्ड 86 में युवा कांग्रेस के अर्पित जैन ने भाजपा के पूर्व उप महापौर योगेंद्र खींची को 250 मतों से हराया। वहीं वार्ड 71 में निर्दलीय प्रत्याशी वंदना फौजदार ने भाजपा की मीनाक्षी सेन को 160 मतों से मात दी। 

अब आगे क्या?

EVM से प्रभावित वार्डों में पुनर्मतदान के बाद ही कोटा नगर निगम की चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह समाप्त होगी। 16 सितंबर को पुनर्मतदान और 17 सितंबर को मतगणना के बाद इन वार्डों के अंतिम परिणाम सामने आएंगे। इसके बाद नगर निगम में सभापति/महापौर सहित संबंधित पदों के चुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। 

राजस्थान की राजनीति में भी महत्वपूर्ण परिणाम

कोटा का परिणाम राजस्थान के व्यापक शहरी निकाय चुनावों के बीच सामने आया है। राज्य के 309 शहरी निकायों में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भाजपा ने 4,179 वार्ड, कांग्रेस ने 3,613 वार्ड और निर्दलीय उम्मीदवारों ने 2,273 वार्ड जीते हैं। कई निकायों में निर्दलीय उम्मीदवारों की भूमिका भी महत्वपूर्ण बनी हुई है।

कुल मिलाकर, कोटा में भाजपा की 55 वार्डों की जीत ने पार्टी को स्पष्ट बढ़त दिला दी है, लेकिन EVM तकनीकी विवाद के कारण तीन वार्डों का अंतिम फैसला अब पुनर्मतदान के बाद होगा।

2029 में 22 राज्यों के साथ विधानसभा चुनाव? NDA के One Nation, One Election प्लान की पूरी कहानी

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नई दिल्ली- भारत में चुनावी व्यवस्था को लेकर एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र में सत्तारूढ़ NDA 2029 के लोकसभा चुनाव के साथ 22 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में विधानसभा चुनाव कराने के विकल्प पर विचार कर रहा है।

यह प्रस्ताव “One Nation, One Election” यानी “एक देश, एक चुनाव” की दिशा में मौजूदा योजना से भी पहले कदम बढ़ाने की कोशिश माना जा रहा है। अभी इस पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है और मामला राजनीतिक तथा संवैधानिक चर्चा के दौर में है।

क्या है पूरा मामला?

भारत में फिलहाल लोकसभा और अलग-अलग राज्यों की विधानसभा के चुनाव अलग-अलग समय पर होते हैं। इसका मतलब है कि देश में लगभग हर साल कहीं न कहीं चुनावी प्रक्रिया चलती रहती है।

One Nation, One Election का विचार यह है कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ या एक समन्वित चुनाव चक्र में कराया जाए।

अब NDA के सामने जो विकल्प बताया जा रहा है, उसके अनुसार 2029 के लोकसभा चुनाव के साथ 22 NDA-शासित/समर्थित राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में भी विधानसभा चुनाव कराए जा सकते हैं।

22 राज्यों में चुनाव क्यों?

रिपोर्ट के अनुसार इन 22 राज्यों/UTs में NDA या उसके सहयोगी दलों की सरकार/बहुमत है। इनमें से कई राज्यों की विधानसभा का सामान्य कार्यकाल 2029 लोकसभा चुनाव से पहले समाप्त हो जाएगा।

रिपोर्ट में बताया गया है कि इनमें से 11 राज्यों/UTs में अगले दो वर्षों के दौरान चुनाव होने हैं।

इनमें प्रमुख रूप से 2027 और 2028 में चुनाव वाले राज्य शामिल हैं, जैसे:

  • छत्तीसगढ़

  • मध्य प्रदेश

  • मेघालय

  • राजस्थान

  • त्रिपुरा

इसके अलावा हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में 2029 के आसपास चुनाव होने हैं।

एक महत्वपूर्ण तथ्य

ओडिशा, आंध्र प्रदेश, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव पहले से ही लोकसभा चुनाव के साथ होते हैं। इसलिए इन राज्यों को एक साथ चुनाव कराने की प्रक्रिया में अपेक्षाकृत कम समायोजन की जरूरत होगी।

सबसे बड़ा सवाल: कार्यकाल खत्म होने से पहले विधानसभा कैसे भंग होगी?

यही इस प्रस्ताव का सबसे महत्वपूर्ण और विवादित हिस्सा है।

अगर किसी राज्य की विधानसभा का कार्यकाल 2030 या उसके आसपास तक है, लेकिन 2029 में लोकसभा के साथ चुनाव कराना है, तो उस विधानसभा को अपने सामान्य कार्यकाल से पहले समाप्त करना पड़ सकता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, यदि संबंधित राज्यों में NDA सरकारें अगले वर्षों में बनी रहती हैं, तो जनवरी 2029 तक कुछ विधानसभाओं को भंग करने का विकल्प विचाराधीन हो सकता है।

संविधान के अनुच्छेद 174(2)(b) के तहत राज्य विधानसभा को भंग किया जा सकता है। विधानसभा भंग होने के बाद कानून के अनुसार चुनाव निर्धारित अवधि के भीतर कराना होता है।

इसलिए 2029 में एक साथ चुनाव कराने के लिए राजनीतिक सहमति और संवैधानिक प्रक्रिया दोनों महत्वपूर्ण होंगी।

अभी योजना क्या है और बदलाव क्या होगा?

मौजूदा One Nation, One Election से जुड़े प्रस्तावों के अनुसार चुनावों को धीरे-धीरे एक चक्र में लाने की व्यवस्था बनाई जा रही है।

वर्तमान विधायी ढांचे की रिपोर्ट की गई टाइमलाइन में पहला पूर्ण समकालिक चुनाव चक्र 2034 के आसपास दिखाई देता है।

लेकिन NDA के भीतर अब यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या इसे 2029 से ही शुरू किया जा सकता है।

यानी सरल भाषा में:

मौजूदा प्रस्ताव → 2034 के आसपास पूर्ण समन्वय

NDA में विचाराधीन विकल्प → 2029 से बड़ा हिस्सा एक साथ

संसद की संयुक्त समिति क्या कर रही है?

“One Nation, One Election” से संबंधित विधेयकों की जांच के लिए संसद की Joint Parliamentary Committee (JPC) काम कर रही है।

समिति विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों और दूसरे हितधारकों से चर्चा कर रही है। इसमें संवैधानिक विशेषज्ञ, शिक्षाविद, नागरिक समाज और अन्य पक्ष भी शामिल हैं।

समिति के अध्यक्ष पी. पी. चौधरी ने इस मुद्दे पर कहा है कि अगर चुनाव पहले कराए जाने हैं तो यह फैसला मुख्य रूप से NDA के मुख्यमंत्रियों/राज्य सरकारों से संबंधित होगा और यह समिति के मूल अधिकार-क्षेत्र से अलग मुद्दा है।

क्या 2029 में ऐसा करना कानूनी रूप से आसान होगा?

नहीं। यह सिर्फ राजनीतिक फैसला नहीं होगा।

एक साथ चुनाव कराने के लिए संविधान और चुनाव संबंधी कानूनों में बदलाव की जरूरत पड़ सकती है। विधानसभा और लोकसभा के कार्यकाल, विधानसभा भंग होने की स्थिति और चुनावी चक्र को एक साथ लाने जैसे मुद्दे इसमें शामिल हैं।

इसीलिए “One Nation, One Election” सिर्फ चुनाव की तारीख बदलने का मामला नहीं है; यह भारत की चुनावी व्यवस्था में बड़ा संस्थागत बदलाव होगा।

विपक्ष की क्या आपत्ति है?

विपक्षी दलों की मुख्य चिंताओं में से एक यह है कि अगर किसी राज्य की विधानसभा का सामान्य कार्यकाल पूरा होने से पहले चुनाव करा दिए जाते हैं, तो राज्य की लोकतांत्रिक अवधि कम हो सकती है।

विपक्ष यह सवाल भी उठा सकता है कि क्या राष्ट्रीय चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव होने पर स्थानीय मुद्दे राष्ट्रीय मुद्दों के पीछे दब जाएंगे।

कुछ विपक्षी दल इसे संघीय ढांचे के लिए चुनौती के रूप में भी देखते हैं। दूसरी ओर, समर्थकों का तर्क है कि बार-बार चुनावों से होने वाले खर्च और प्रशासनिक व्यवधान को कम किया जा सकता है।

सरकार/NDA के पक्ष में मुख्य तर्क

One Nation, One Election के समर्थकों के अनुसार इसके कई संभावित फायदे हैं:

1. चुनावी खर्च में कमी
बार-बार चुनाव होने से सरकार, राजनीतिक दलों और चुनाव मशीनरी पर लगातार खर्च होता है। एक साथ चुनाव कराने से इसमें कमी आ सकती है।

2. बार-बार Model Code of Conduct से राहत
चुनाव की घोषणा के बाद Model Code of Conduct लागू होता है। लगातार चुनाव होने पर सरकारों के नीतिगत और विकास कार्यों पर असर पड़ने की दलील दी जाती है।

3. प्रशासनिक मशीनरी पर कम दबाव
पुलिस, सुरक्षा बलों और सरकारी कर्मचारियों को बार-बार चुनाव ड्यूटी में लगाने की जरूरत कम हो सकती है।

4. राजनीतिक स्थिरता
समर्थकों का कहना है कि सरकारें लगातार चुनावी तैयारी करने के बजाय लंबे समय की नीतियों पर ध्यान दे सकती हैं।

लेकिन इसके खिलाफ प्रमुख तर्क क्या हैं?

1. राज्यों की स्वायत्तता का सवाल
भारत एक संघीय व्यवस्था है, जहां राज्य सरकारों का अपना राजनीतिक और संवैधानिक महत्व है।

2. विधानसभा का कार्यकाल छोटा करने की समस्या
यदि किसी सरकार का पांच साल का कार्यकाल पूरा होने से पहले विधानसभा भंग होती है, तो इसे लेकर राजनीतिक विवाद हो सकता है।

3. स्थानीय मुद्दों पर असर
लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ होने पर बेरोजगारी, सड़क, बिजली, पानी, कृषि जैसे राज्य-विशिष्ट मुद्दे राष्ट्रीय मुद्दों के पीछे चले जाने की आशंका जताई जाती है।

4. सरकार गिरने की स्थिति
अगर किसी राज्य में चुनाव के बाद सरकार गिर जाती है और नई सरकार नहीं बनती, तो एक साथ चुनाव चक्र को बनाए रखना कठिन हो सकता है।

2029 का प्रस्ताव इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

अगर NDA इस योजना को लागू करने में सफल होता है, तो 2029 का लोकसभा चुनाव भारत के चुनावी इतिहास में एक बड़े बदलाव का शुरुआती बिंदु बन सकता है।

इसका मतलब यह होगा कि देश के बहुत बड़े हिस्से में मतदाता एक ही चुनावी अवधि में:

लोकसभा + विधानसभा

के लिए मतदान कर सकते हैं।

हालांकि यह याद रखना जरूरी है कि 22 राज्यों में 2029 में एक साथ चुनाव कराने की खबर अभी एक विचाराधीन राजनीतिक विकल्प की रिपोर्ट है, अंतिम निर्णय नहीं।

आम जनता के लिए इसका क्या मतलब होगा?

अगर योजना लागू होती है, तो 2029 में कई राज्यों के मतदाताओं को लोकसभा और विधानसभा के लिए एक ही चुनाव अवधि में वोट देना पड़ सकता है।

मतदाता को दो अलग-अलग स्तरों पर सरकार चुननी होगी:

केंद्र के लिए → लोकसभा सांसद

राज्य के लिए → विधायक

इसका मतलब यह नहीं है कि दोनों वोट एक ही पार्टी को देना जरूरी होगा। मतदाता लोकसभा में एक पार्टी और विधानसभा में दूसरी पार्टी को भी वोट दे सकता है।

सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल

अब सबसे बड़ा सवाल यह है:

क्या NDA 2029 में 22 राज्यों/UTs में विधानसभा चुनाव कराने के लिए राजनीतिक और संवैधानिक सहमति जुटा पाएगा?

इसके लिए अगले चरण में राज्य सरकारों की भूमिका, संसद में विधायी प्रक्रिया, संवैधानिक संशोधन और विपक्ष की प्रतिक्रिया बेहद महत्वपूर्ण होगी।

निष्कर्ष

One Nation, One Election को 2029 से बड़े स्तर पर लागू करने की संभावित चर्चा भारत की चुनावी राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम है।

लेकिन अभी इसे “2029 में 22 राज्यों में चुनाव पक्का” कहना सही नहीं होगा।

सही स्थिति यह है कि NDA 2029 में लोकसभा चुनाव के साथ 22 NDA-बहुमत वाले राज्यों/UTs में विधानसभा चुनाव कराने के विकल्प पर विचार कर रहा है, जबकि मौजूदा विधायी टाइमलाइन का पूर्ण समकालिक चक्र 2034 के आसपास बताया गया है। आगे की तस्वीर संसद, राज्य सरकारों और राजनीतिक दलों के बीच होने वाली बातचीत से साफ होगी।

भारत निर्वाचन आयोग द्वारा मीडिया एवं संचार अधिकारियों के लिए राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित

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नई दिल्ली स्थित आईआईआईडीईएम में आयोजित हुआ एक दिवसीय प्रशिक्षण एवं संवाद कार्यक्रम

रायपुर- भारत निर्वाचन आयोग द्वारा नई दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डेमोक्रेसी एंड इलेक्शन मैनेजमेंट (आईआईआईडीईएम) में मीडिया एवं संचार अधिकारियों के लिए दूसरे एक दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। तीन जुलाई शुक्रवार को आयोजित सम्मेलन में देश के 16 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के विभिन्न जिलों के मीडिया नोडल अधिकारी, सोशल मीडिया नोडल अधिकारी, जिला जनसंपर्क अधिकारी तथा राज्य जनसंपर्क विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों सहित 260 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लिया। छत्तीसगढ़ से सहायक मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी, अपर संचालक जनसंपर्क विभाग तथा प्रदेश के सभी 33 जिलों के जिला जनसंपर्क अधिकारी सम्मेलन में शामिल हुए। 

सम्मेलन को संबोधित करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कहा कि भारत निर्वाचन आयोग की प्रत्येक कार्यवाही संविधान, निर्वाचन संबंधी कानूनों तथा आयोग द्वारा समय-समय पर जारी पारदर्शी दिशा-निर्देशों के अनुरूप संचालित होती है। उन्होंने सोशल मीडिया पर प्रसारित होने वाली भ्रामक एवं फर्जी सूचनाओं के प्रति सतर्क रहने तथा तथ्यात्मक जानकारी के प्रभावी प्रसार के माध्यम से गलत सूचनाओं पर अंकुश लगाने में मीडिया एवं संचार अधिकारियों की सक्रिय भूमिका पर बल दिया। उन्होंने कहा कि हाल के विधानसभा चुनावों में रिकॉर्ड मतदान प्रतिशत भारतीय मतदाताओं के निर्वाचन प्रणाली पर गहरे विश्वास का परिचायक है।

चुनाव आयुक्त डॉ. विवेक जोशी ने डिजिटल युग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), डीपफेक तथा भ्रामक डिजिटल सामग्री से उत्पन्न चुनौतियों का उल्लेख करते हुए अधिकारियों से आयोग के दिशा-निर्देशों के अनुरूप इनका प्रभावी ढंग से मुकाबला करने का आह्वान किया। उन्होंने चुनावी साक्षरता क्लबों के माध्यम से युवा मतदाताओं को निर्वाचन प्रक्रिया से जोड़ने पर भी विशेष जोर दिया।

सम्मेलन में निर्वाचन प्रक्रिया के विभिन्न चरणों से संबंधित संचार रणनीतियों, मतदाता सूची प्रबंधन, मतदान एवं मतगणना प्रक्रिया, ईसीआईनेट, संवैधानिक एवं विधिक प्रावधानों, मीडिया प्रबंधन, प्रेस विज्ञप्ति लेखन, सोशल मीडिया के प्रभावी उपयोग तथा भ्रामक सूचनाओं के प्रबंधन पर विस्तृत तकनीकी एवं व्यावहारिक सत्र आयोजित किए गए। प्रतिभागियों को समूहों में निर्वाचन प्रक्रिया का व्यवहारिक प्रदर्शन कराया गया तथा प्रदर्शनी एवं मीडिया कॉर्नर का अवलोकन भी कराया गया। कार्यक्रम के दौरान हाल ही में चुनाव संपन्न कराने वाले राज्यों के अधिकारियों ने निर्वाचन प्रबंधन एवं जनसंचार से जुड़े अपने अनुभव साझा किए तथा प्रभावी संचार की सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों पर चर्चा की। सम्मेलन का समापन प्रतिभागियों एवं भारत निर्वाचन आयोग के अधिकारियों के बीच प्रश्नोत्तर सत्र के साथ हुआ।

चुनाव से पहले AAP को बड़ा झटका, राघव चड्ढा ने छोड़ी पार्टी

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 भारतीय राजनीति में एक बड़ा झटका देखने को मिला है। आम आदमी पार्टी (Aam Aadmi Party) के प्रमुख नेता राघव चड्ढा ने पार्टी से इस्तीफा देकर भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party) का दामन थाम लिया है

यह कदम ऐसे समय पर सामने आया है जब देश में आगामी चुनावों की तैयारियाँ तेज़ हो रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह बदलाव AAP के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि राघव चड्ढा पार्टी के प्रमुख और युवा चेहरों में से एक थे।

उनके इस फैसले से न केवल पार्टी के भीतर हलचल बढ़ी है, बल्कि विपक्ष और सत्ताधारी दल के बीच राजनीतिक समीकरण भी बदल सकते हैं। आने वाले दिनों में इसका असर चुनावी रणनीतियों और गठबंधनों पर भी देखने को मिल सकता है।


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