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कोटा निकाय चुनाव में BJP का बहुमत, 100 में 55 वार्डों पर जीत; EVM गड़बड़ी से 3 वार्डों के नतीजे अटके, 16 सितंबर को पुनर्मतदान

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कोटा- राजस्थान के शहरी निकाय चुनाव में कोटा नगर निगम का परिणाम राजनीतिक रूप से भाजपा के लिए बड़ी सफलता लेकर आया है। 100 सदस्यीय कोटा नगर निगम में भाजपा ने 55 वार्डों में जीत दर्ज कर स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया है। कांग्रेस को 40 वार्डों में जीत मिली, जबकि तीन वार्डों में निर्दलीय प्रत्याशी विजयी रहे।

हालांकि, चुनाव परिणाम के बीच EVM में तकनीकी खराबी ने प्रक्रिया को कुछ समय के लिए रोक दिया। कोटा नगर निगम के वार्ड 11, 44 और 87 के परिणामों को रोक दिया गया है। इसके अलावा सुकेत नगरपालिका के वार्ड 4 के एक मतदान केंद्र पर भी EVM संबंधी समस्या सामने आई। प्रभावित स्थानों पर 16 सितंबर को पुनर्मतदान कराया जाएगा और 17 सितंबर को मतगणना प्रस्तावित है। 

55 सीटों के साथ भाजपा ने हासिल किया बहुमत

कोटा नगर निगम में कुल 100 वार्ड हैं और बहुमत के लिए 51 सीटों की जरूरत होती है। भाजपा ने 55 सीटों पर जीत दर्ज कर इस आंकड़े को पार कर लिया। कांग्रेस को 40 सीटें मिलीं, जबकि निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी कुछ वार्डों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।

इस परिणाम के साथ कोटा नगर निगम में भाजपा का बोर्ड बनना लगभग तय माना जा रहा है। हालांकि, जिन वार्डों में पुनर्मतदान होना है, वहां अंतिम परिणाम और उसके बाद होने वाली पदाधिकारियों की चुनावी प्रक्रिया को लेकर स्थिति पुनर्मतदान के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट होगी।

EVM खराबी के कारण तीन वार्डों के परिणाम रोके गए

मतगणना के दौरान कोटा के वार्ड 11, 44 और 87 की EVM मशीनों में तकनीकी समस्या सामने आई। मशीनों से संबंधित समस्या के चलते इन वार्डों के परिणाम तत्काल घोषित नहीं किए जा सके। अधिकारियों के आदेश के बाद संबंधित मशीनों को सुरक्षित रखा गया और निर्वाचन प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए आयोग से निर्देश लिए गए। 

आधिकारिक आदेश के अनुसार, प्रभावित मतदान केंद्रों पर 16 सितंबर को दोबारा मतदान होगा। इसके बाद 17 सितंबर को मतगणना कर परिणाम घोषित किए जाएंगे।

वार्ड 87 को लेकर कांग्रेस का विरोध

EVM विवाद के बीच वार्ड 87 का मामला विशेष रूप से चर्चा में रहा। कांग्रेस प्रत्याशी लक्ष्मी शर्मा ने परिणाम घोषित नहीं होने के विरोध में मतगणना केंद्र के बाहर धरना दिया। उनके साथ पार्टी की स्थानीय नेता शालिनी गौतम और युवा कांग्रेस नेता शुभम गोचर भी मौजूद रहे।

कांग्रेस की ओर से चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग की गई। बाद में कोटा कांग्रेस अध्यक्ष राखी गौतम भी मतगणना केंद्र पहुंचीं और संबंधित EVM को कलेक्टर तथा ADM की मौजूदगी में सील करने की मांग की। अधिकारियों ने मामले की रिपोर्ट निर्वाचन आयोग को भेजी। 

ध्यान रहे कि कांग्रेस नेताओं द्वारा लगाए गए गड़बड़ी के आरोप राजनीतिक आरोप हैं; उपलब्ध रिपोर्टों में निर्वाचन अधिकारियों ने इसे EVM की तकनीकी खराबी के रूप में दर्ज किया है।

कई दिग्गजों ने भी दर्ज की जीत

कोटा के चुनाव परिणाम में भाजपा के कई पुराने नेताओं ने अपनी पकड़ बरकरार रखी। वार्ड 54 से भाजपा के विवेक राजवंशी ने लगातार चौथी बार जीत दर्ज की। उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी मनीष को 2,226 मतों के अंतर से हराया।

इसी तरह भाजपा के गोपाल राम मांडा ने लगातार पांचवीं बार जीत दर्ज की। उन्होंने कांग्रेस के संजय यादव को 899 मतों से पराजित किया। 

हालांकि, कुछ वार्डों में कांग्रेस और निर्दलीय प्रत्याशियों ने भी भाजपा को कड़ी चुनौती दी। वार्ड 86 में युवा कांग्रेस के अर्पित जैन ने भाजपा के पूर्व उप महापौर योगेंद्र खींची को 250 मतों से हराया। वहीं वार्ड 71 में निर्दलीय प्रत्याशी वंदना फौजदार ने भाजपा की मीनाक्षी सेन को 160 मतों से मात दी। 

अब आगे क्या?

EVM से प्रभावित वार्डों में पुनर्मतदान के बाद ही कोटा नगर निगम की चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह समाप्त होगी। 16 सितंबर को पुनर्मतदान और 17 सितंबर को मतगणना के बाद इन वार्डों के अंतिम परिणाम सामने आएंगे। इसके बाद नगर निगम में सभापति/महापौर सहित संबंधित पदों के चुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। 

राजस्थान की राजनीति में भी महत्वपूर्ण परिणाम

कोटा का परिणाम राजस्थान के व्यापक शहरी निकाय चुनावों के बीच सामने आया है। राज्य के 309 शहरी निकायों में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भाजपा ने 4,179 वार्ड, कांग्रेस ने 3,613 वार्ड और निर्दलीय उम्मीदवारों ने 2,273 वार्ड जीते हैं। कई निकायों में निर्दलीय उम्मीदवारों की भूमिका भी महत्वपूर्ण बनी हुई है।

कुल मिलाकर, कोटा में भाजपा की 55 वार्डों की जीत ने पार्टी को स्पष्ट बढ़त दिला दी है, लेकिन EVM तकनीकी विवाद के कारण तीन वार्डों का अंतिम फैसला अब पुनर्मतदान के बाद होगा।

UCC को लेकर बड़ा अपडेट, 2029 से पहले NDA शासित सभी 21 राज्यों में लागू करने का लक्ष्य

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नई दिल्ली- समान नागरिक संहिता यानी UCC (Uniform Civil Code) को लेकर बड़ी खबर सामने आई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले NDA शासित सभी 21 राज्यों में UCC लागू किया जाएगा। उनके इस बयान के बाद देश की राजनीति में UCC को लेकर चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है।

अमित शाह के मुताबिक, UCC का उद्देश्य नागरिकों के लिए विवाह, तलाक और विरासत जैसे व्यक्तिगत मामलों में समान कानूनी व्यवस्था सुनिश्चित करना है। उन्होंने कहा कि इस दिशा में NDA सरकारें आगे काम करेंगी।

कई राज्यों में पहले से चल रही प्रक्रिया

UCC को लेकर कुछ राज्यों में पहले ही कदम उठाए जा चुके हैं। उत्तराखंड में इसे लागू किया जा चुका है, जबकि अन्य NDA शासित राज्यों में भी इसे लेकर प्रक्रिया और चर्चा आगे बढ़ रही है। अब 2029 से पहले सभी 21 NDA शासित राज्यों में इसे लागू करने का लक्ष्य सामने रखा गया है।

क्यों महत्वपूर्ण है UCC?

समान नागरिक संहिता का मकसद व्यक्तिगत कानूनों के अलग-अलग प्रावधानों की जगह एक समान नागरिक कानून व्यवस्था लाना है। इसके दायरे में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे विषय शामिल हो सकते हैं।

अमित शाह के ताजा बयान के बाद अब नजर इस बात पर रहेगी कि अलग-अलग NDA शासित राज्यों में UCC को लागू करने के लिए सरकारें किस तरह की विधायी और प्रशासनिक प्रक्रिया आगे बढ़ाती हैं।

UCC का मुद्दा आने वाले समय में देश की राजनीति और कानून व्यवस्था से जुड़ी बहस का एक बड़ा केंद्र बन सकता है।

शराब घोटाले को लेकर सियासत गरम, पिछली कांग्रेस सरकार पर बड़े आरोप

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रायपुर- छत्तीसगढ़ में शराब कारोबार को लेकर एक बार फिर सियासी हलचल तेज हो गई है। प्रदेश सरकार के एक मंत्री ने पिछली कांग्रेस सरकार के कार्यकाल के दौरान शराब कारोबार में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए गंभीर सवाल उठाए हैं।

मंत्री के मुताबिक, पिछली सरकार के दौरान शराब कारोबार में कथित गड़बड़ियों के चलते सरकारी राजस्व को भारी नुकसान हुआ। उन्होंने पूरे मामले की जांच और जिम्मेदारी तय किए जाने की बात कही है।

शराब कारोबार में गड़बड़ी का आरोप

मंत्री ने आरोप लगाया कि पिछली कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में शराब की खरीदी-बिक्री और वितरण व्यवस्था में कथित तौर पर ऐसी अनियमितताएं हुईं, जिनका सीधा असर राज्य के राजस्व पर पड़ा। उनका दावा है कि इस पूरे मामले में बड़े स्तर पर आर्थिक नुकसान हुआ है।

हालांकि, लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि इस रिपोर्ट के स्तर पर नहीं हुई है। मामले में वास्तविक स्थिति जांच और आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर ही स्पष्ट हो सकेगी।

जांच को लेकर बढ़ सकती है सियासत

शराब कारोबार से जुड़े आरोपों के सामने आने के बाद प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर आरोप-प्रत्यारोप तेज होने के आसार हैं। सरकार की ओर से लगाए गए आरोपों पर विपक्ष की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

अब नजर इस बात पर है कि सरकार इन आरोपों के आधार पर आगे क्या कार्रवाई करती है और क्या पूरे मामले में कोई आधिकारिक जांच या दस्तावेजी खुलासा सामने आता है।

छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता की सुगबुगाहट तेज़: दुर्ग संभाग से शुरू होगा जन-संवाद

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8 और 9 सितंबर को बैठकों का दौर

​रायपुर- छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code - UCC) लागू करने की दिशा में राज्य सरकार ने अपनी तैयारियां तेज कर दी गई है। प्रदेश में UCC का प्रारूप (ड्राफ्ट) तैयार करने के लिए गठित उच्च स्तरीय समिति अब सीधे ज़मीन पर उतरकर सामाजिक और प्रशासनिक समन्वय साधने में जुट गई है। इसी रणनीति के तहत दुर्ग संभाग के सभी जिलों के प्रमुखों, प्रबुद्ध जनों और जनप्रतिनिधियों के साथ आगामी 8 और 9 सितंबर को एक वृहद समूह चर्चा और परिचयात्मक बैठक आयोजित करने जा रही है।

ज्ञात हो कि समान नागरिक संहिता  के दूरगामी प्रभावों और प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए यह संवाद प्रक्रिया शुरू की जा रही है। दो दिनों तक चलने वाले इस मंथन में दुर्ग संभाग के अलग-अलग जिलों को केंद्रित करते हुए बैठकें होंगी। आगामी ​8 सितंबर को दुर्ग में दोपहर 12 बजे से आयोजित इस बैठक में दुर्ग, बालोद और बेमेतरा जिले के प्रतिनिधि शामिल होंगे। इसी तरह ​9 सितंबर को राजनांदगांव में दोपहर 12 बजे से होने वाली बैठक में राजनांदगांव, कबीरधाम, खैरागढ़-छुईखदान-गंडई और मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जिले का प्रतिनिधित्व रहेगा।

हर वर्ग की आवाज़ को ड्राफ्ट में मिलेगी जगह

कानून का खाका तैयार करने में समाज के हर तबके की सहभागिता सुनिश्चित करने के लिए समिति ने एक व्यापक रूपरेखा तैयार की है। इन बैठकों में राजनीतिक दलों, सामाजिक व धार्मिक संगठनों, शिक्षाविदों, पद्म श्री सम्मान से अलंकृत हस्तियों, निगम-मंडल व आयोगों के प्रतिनिधियों तथा प्रतिष्ठित व विशिष्ट नागरिकों को खासतौर पर आमंत्रित किया गया है। इस कवायद का मुख्य उद्देश्य एक ऐसा समावेशी ड्राफ्ट तैयार करना है, जो विधिक और सामाजिक दोनों पैमानों पर राज्य के हर नागरिक के हितों का संरक्षण कर सके।

झीरम घाटी हमला: 13 साल बाद 10 आरोपी दोषी, NIA की विशेष अदालत का बड़ा फैसला; 16 सितंबर को सजा पर फैसला

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जगदलपुर- छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित झीरम घाटी नक्सली हमले के मामले में करीब 13 साल बाद अदालत का बड़ा फैसला आया है। जगदलपुर स्थित राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की विशेष अदालत ने 2013 के इस बहुचर्चित मामले में सुनवाई का सामना कर रहे सभी 10 आरोपियों को दोषी करार दिया है। अदालत अब दोषियों को दी जाने वाली सजा के बिंदु पर 16 सितंबर 2026 को फैसला सुनाएगी।

25 मई 2013 को बस्तर के दरभा क्षेत्र की झीरम घाटी में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के काफिले पर माओवादियों ने घात लगाकर हमला किया था। इस हमले में कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं समेत 29 लोगों की मौत हुई थी। घटना में बड़ी संख्या में लोग घायल भी हुए थे। यह हमला छत्तीसगढ़ के राजनीतिक इतिहास की सबसे भयावह घटनाओं में शामिल है।

क्या हुआ था झीरम घाटी में?

25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा बस्तर क्षेत्र से गुजर रही थी। यात्रा के दौरान कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं का काफिला झीरम घाटी के पास पहुंचा, जहां पहले से घात लगाए माओवादियों ने काफिले को निशाना बनाया।

जांच के अनुसार, हमले में बड़ी संख्या में माओवादी शामिल थे। पहले विस्फोट और उसके बाद लगातार गोलीबारी से काफिले में अफरा-तफरी मच गई। हमले में कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नंद कुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल, वरिष्ठ आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल और पूर्व विधायक उदय मुदलियार समेत कई प्रमुख लोगों की मौत हुई।

महेंद्र कर्मा को माओवादियों का प्रमुख निशाना माना गया था। वह नक्सल विरोधी अभियान और सलवा जुडूम से जुड़े रहे थे। यही वजह थी कि झीरम घाटी हमले को केवल एक सामान्य माओवादी हमला नहीं, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व को निशाना बनाने वाली बड़ी घटना के रूप में भी देखा गया।

13 साल चली कानूनी प्रक्रिया

हमले के बाद मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी NIA को सौंपी गई। NIA ने सितंबर 2014 में पहली चार्जशीट दाखिल की थी। इसके बाद सितंबर 2015 में पूरक चार्जशीट भी दाखिल की गई। मामले की सुनवाई लंबे समय तक चली और अदालत में 101 गवाहों के बयान दर्ज किए गए।

रिपोर्टों के अनुसार, मामले में गिरफ्तार किए गए 11 आरोपियों में से एक की सुनवाई के दौरान मौत हो गई। इसके बाद अदालत में 10 आरोपियों के खिलाफ ट्रायल जारी रहा। इस मामले में सुनवाई की प्रक्रिया एक दशक से अधिक समय तक चली और सैकड़ों सुनवाई हुईं।

कौन-कौन दोषी करार दिए गए?

NIA की विशेष अदालत ने जिन 10 आरोपियों को दोषी ठहराया है, उनमें प्रमिला मोडियम, चैतू लेकाम उर्फ मुन्ना, सुमित्रा उर्फ पुनेम मोडियम, मुक्का मंडावी, कवासी कोसा, आयता मरकाम, मड़कम देवा, जोगा मड़कम, बंजामी सन्ना उर्फ चमरा और महादेव नाग के नाम शामिल हैं। ताजा रिपोर्टों के अनुसार, दोषियों में महिलाएं भी शामिल हैं।

अदालत ने अभियोजन पक्ष की ओर से पेश किए गए गवाहों, दस्तावेजी और फोरेंसिक साक्ष्यों पर विचार करने के बाद आरोपियों को दोषी माना।

16 सितंबर को तय होगी सजा

अदालत ने फिलहाल दोषसिद्धि का फैसला सुनाया है, लेकिन सजा की अवधि अभी तय नहीं हुई है। विशेष अदालत ने सजा के बिंदु पर फैसला सुनाने के लिए 16 सितंबर 2026 की तारीख तय की है।

इसका मतलब है कि 5 सितंबर को अदालत ने आरोपियों को दोषी माना है, जबकि उन्हें कितनी सजा दी जाएगी, इसका फैसला 16 सितंबर को होगा।

बचाव पक्ष ने हाईकोर्ट जाने की बात कही

दोषसिद्धि के बाद बचाव पक्ष ने फैसले पर असहमति जताई है। बचाव पक्ष के वकील अरविंद चौधरी के अनुसार, अदालत के आदेश की पूरी प्रति मिलने और उसका अध्ययन करने के बाद आगे की कानूनी रणनीति तय की जाएगी। उन्होंने हाईकोर्ट में फैसले को चुनौती देने की बात कही है।

झीरम घाटी हमला क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

झीरम घाटी हमला केवल एक नक्सली हिंसा की घटना नहीं थी, बल्कि इसने छत्तीसगढ़ की राजनीति को गहरे स्तर पर प्रभावित किया। एक ही हमले में कांग्रेस के कई शीर्ष नेताओं की मौत ने प्रदेश के राजनीतिक नेतृत्व में बड़ा खालीपन पैदा कर दिया था।

हमले के बाद सुरक्षा व्यवस्था, राजनीतिक साजिश और घटना की व्यापक जांच को लेकर भी लंबे समय तक सवाल उठते रहे। कांग्रेस की ओर से समय-समय पर घटना के पीछे कथित राजनीतिक साजिश और सुरक्षा चूक की जांच की मांग की जाती रही है। दूसरी ओर, NIA की जांच और अदालत में चले मुकदमे का केंद्र आरोपियों की कथित आपराधिक भूमिका और हमले में उनकी भागीदारी रहा।

13 साल बाद आया फैसला, अब सजा का इंतजार

झीरम घाटी हमले के 13 साल बाद 10 आरोपियों को दोषी ठहराया जाना इस मामले की कानूनी प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है। हालांकि, पीड़ित परिवारों और राजनीतिक दलों की नजर अब 16 सितंबर 2026 पर है, जब अदालत दोषियों की सजा पर फैसला सुनाएगी।

इस फैसले के साथ झीरम घाटी हत्याकांड का एक महत्वपूर्ण कानूनी अध्याय आगे बढ़ा है, लेकिन घटना से जुड़े कई राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी सवाल अब भी सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बने हुए हैं।

झीरम घाटी कांड: एक नजर में

  • घटना: झीरम घाटी नक्सली हमला

  • तारीख: 25 मई 2013

  • स्थान: दरभा क्षेत्र, बस्तर, छत्तीसगढ़

  • निशाना: कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा का काफिला

  • मृतक: 29 लोग

  • प्रमुख मृतकों में: महेंद्र कर्मा, नंद कुमार पटेल, दिनेश पटेल, विद्याचरण शुक्ल और उदय मुदलियार

  • जांच एजेंसी: राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA)

  • दोषी करार: 10 आरोपी

  • फैसला: 5 सितंबर 2026

  • सजा पर फैसला: 16 सितंबर 2026

हिड़मा जैसे कुख्यात नक्सली को आदर्श मानने वाले ही दिमागी नक्सली - मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय

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हिंसा और नक्सलवाद का महिमामंडन करने वाली मानसिकता भी समाज के लिए घातक : मुख्यमंत्री  विष्णुदेव साय

मुख्यमंत्री ने कहा - बस्तर अब भय और हिंसा से निकलकर शांति, विश्वास और विकास की नई राह पर

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने एक निजी चैनल के साक्षात्कार के दौरान कहा कि  नक्सलवाद के समर्थन में बात करने वाले और कुख्यात नक्सली हिड़मा , जिसने सैकड़ो निर्दोषों की हत्या की,  उसे आदर्श मानने वाले ही दिमागी नक्सली हैं । 

उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ नक्सलवाद के लंबे और पीड़ादायक दौर से बाहर निकलकर शांति, विश्वास और विकास की नई राह पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। हमारे सुरक्षाबलों के अदम्य साहस, केंद्र और राज्य सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति तथा बस्तर के लोगों के सहयोग से नक्सलवाद समाप्ति की ओर है। अब आवश्यकता इस बात की भी है कि हिंसा और नक्सलवाद को वैचारिक समर्थन देने तथा उसका महिमामंडन करने वाली मानसिकता को समाज स्पष्ट रूप से अस्वीकार करे।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज भी कुछ लोग ऐसे कुख्यात नक्सलियों को अपना आदर्श मानते हैं, जिनके हाथ निर्दोष नागरिकों और सुरक्षाबलों के खून से रंगे रहे हैं। हिड़मा जैसे नक्सलियों ने हिंसा और आतंक के माध्यम से बस्तर की अनेक पीढ़ियों को भय, अभाव और पिछड़ेपन में रखने का काम किया। ऐसे लोगों का महिमामंडन करना, उनके समर्थन में नारे लगाना या उन्हें नायक के रूप में प्रस्तुत करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता।

मुख्यमंत्री ने कहा कि बंदूक उठाकर निर्दोष लोगों की जान लेने वाला व्यक्ति किसी समाज का आदर्श नहीं हो सकता। नक्सली हिंसा में बस्तर ने अपने हजारों निर्दोष नागरिकों, जनप्रतिनिधियों और बहादुर जवानों को खोया है। अनेक परिवारों ने अपनों को खोने का दर्द सहा, बच्चों से उनके माता-पिता छिने और विकास की संभावनाओं को दशकों तक बाधित किया गया। इस पीड़ा को नजरअंदाज कर हिंसा के जिम्मेदार लोगों का गुणगान करना बस्तर के पीड़ित परिवारों और शहीद जवानों के बलिदान का भी अपमान है।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि नक्सलवाद केवल बंदूक और जंगलों तक सीमित चुनौती नहीं है। हिंसा को उचित ठहराने, लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा करने और नक्सली हिंसा के जिम्मेदार लोगों को नायक के रूप में स्थापित करने वाली सोच भी उतनी ही चिंताजनक है। लोकतंत्र में प्रत्येक व्यक्ति को अपनी बात रखने और असहमति व्यक्त करने का अधिकार है, लेकिन हिंसा का समर्थन और निर्दोष लोगों की हत्या करने वालों का महिमामंडन किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकता।

उन्होंने कहा कि आज बस्तर की पहचान बदल रही है। जिस क्षेत्र को कभी नक्सली हिंसा, बारूदी सुरंगों और भय के कारण जाना जाता था, वहां अब स्कूलों की घंटियां सुनाई दे रही हैं, सड़कें बन रही हैं, स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंच रही हैं, युवाओं को शिक्षा और रोजगार के नए अवसर मिल रहे हैं तथा दूरस्थ गांव शासन की योजनाओं और विकास की मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि बस्तर के युवा अब बंदूक नहीं, किताब, कलम, कौशल और रोजगार चाहते हैं। वे अपने सपनों को साकार करना चाहते हैं और देश-प्रदेश की प्रगति में भागीदार बनना चाहते हैं। हमारी सरकार का संकल्प है कि बस्तर के प्रत्येक युवा को आगे बढ़ने का अवसर मिले और प्रत्येक परिवार तक विकास तथा सुशासन का लाभ पहुंचे।

मुख्यमंत्री ने कहा कि नक्सलवाद के विरुद्ध लड़ाई केवल सुरक्षा की लड़ाई नहीं थी, बल्कि बस्तर के भविष्य को बचाने की लड़ाई थी। हमारे जवानों ने अपने प्राणों की परवाह किए बिना इस लड़ाई को निर्णायक मुकाम तक पहुंचाया है। अब समाज की जिम्मेदारी है कि हिंसा की विचारधारा को किसी भी स्वरूप में महिमामंडित न होने दे।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि छत्तीसगढ़ शांति, लोकतंत्र और विकास के मार्ग पर आगे बढ़ चुका है। नक्सलवाद और हिंसा के लिए नए छत्तीसगढ़ में कोई स्थान नहीं है। बस्तर की नई पीढ़ी के आदर्श वे लोग होने चाहिए जो शिक्षा, सेवा, परिश्रम, नवाचार और राष्ट्र निर्माण के माध्यम से समाज को आगे बढ़ा रहे हैं, न कि वे जिन्होंने बंदूक और हिंसा के सहारे निर्दोष लोगों का जीवन छीना।

उन्होंने कहा कि बस्तर में शांति की स्थापना केवल सरकार या सुरक्षाबलों की उपलब्धि नहीं, बल्कि वहां के नागरिकों के साहस और विश्वास की जीत है। अब इस शांति को स्थायी बनाते हुए बस्तर को विकास, पर्यटन, शिक्षा, रोजगार और समृद्धि की नई पहचान देना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है।

2029 में 22 राज्यों के साथ विधानसभा चुनाव? NDA के One Nation, One Election प्लान की पूरी कहानी

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नई दिल्ली- भारत में चुनावी व्यवस्था को लेकर एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र में सत्तारूढ़ NDA 2029 के लोकसभा चुनाव के साथ 22 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में विधानसभा चुनाव कराने के विकल्प पर विचार कर रहा है।

यह प्रस्ताव “One Nation, One Election” यानी “एक देश, एक चुनाव” की दिशा में मौजूदा योजना से भी पहले कदम बढ़ाने की कोशिश माना जा रहा है। अभी इस पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है और मामला राजनीतिक तथा संवैधानिक चर्चा के दौर में है।

क्या है पूरा मामला?

भारत में फिलहाल लोकसभा और अलग-अलग राज्यों की विधानसभा के चुनाव अलग-अलग समय पर होते हैं। इसका मतलब है कि देश में लगभग हर साल कहीं न कहीं चुनावी प्रक्रिया चलती रहती है।

One Nation, One Election का विचार यह है कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ या एक समन्वित चुनाव चक्र में कराया जाए।

अब NDA के सामने जो विकल्प बताया जा रहा है, उसके अनुसार 2029 के लोकसभा चुनाव के साथ 22 NDA-शासित/समर्थित राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में भी विधानसभा चुनाव कराए जा सकते हैं।

22 राज्यों में चुनाव क्यों?

रिपोर्ट के अनुसार इन 22 राज्यों/UTs में NDA या उसके सहयोगी दलों की सरकार/बहुमत है। इनमें से कई राज्यों की विधानसभा का सामान्य कार्यकाल 2029 लोकसभा चुनाव से पहले समाप्त हो जाएगा।

रिपोर्ट में बताया गया है कि इनमें से 11 राज्यों/UTs में अगले दो वर्षों के दौरान चुनाव होने हैं।

इनमें प्रमुख रूप से 2027 और 2028 में चुनाव वाले राज्य शामिल हैं, जैसे:

  • छत्तीसगढ़

  • मध्य प्रदेश

  • मेघालय

  • राजस्थान

  • त्रिपुरा

इसके अलावा हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में 2029 के आसपास चुनाव होने हैं।

एक महत्वपूर्ण तथ्य

ओडिशा, आंध्र प्रदेश, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव पहले से ही लोकसभा चुनाव के साथ होते हैं। इसलिए इन राज्यों को एक साथ चुनाव कराने की प्रक्रिया में अपेक्षाकृत कम समायोजन की जरूरत होगी।

सबसे बड़ा सवाल: कार्यकाल खत्म होने से पहले विधानसभा कैसे भंग होगी?

यही इस प्रस्ताव का सबसे महत्वपूर्ण और विवादित हिस्सा है।

अगर किसी राज्य की विधानसभा का कार्यकाल 2030 या उसके आसपास तक है, लेकिन 2029 में लोकसभा के साथ चुनाव कराना है, तो उस विधानसभा को अपने सामान्य कार्यकाल से पहले समाप्त करना पड़ सकता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, यदि संबंधित राज्यों में NDA सरकारें अगले वर्षों में बनी रहती हैं, तो जनवरी 2029 तक कुछ विधानसभाओं को भंग करने का विकल्प विचाराधीन हो सकता है।

संविधान के अनुच्छेद 174(2)(b) के तहत राज्य विधानसभा को भंग किया जा सकता है। विधानसभा भंग होने के बाद कानून के अनुसार चुनाव निर्धारित अवधि के भीतर कराना होता है।

इसलिए 2029 में एक साथ चुनाव कराने के लिए राजनीतिक सहमति और संवैधानिक प्रक्रिया दोनों महत्वपूर्ण होंगी।

अभी योजना क्या है और बदलाव क्या होगा?

मौजूदा One Nation, One Election से जुड़े प्रस्तावों के अनुसार चुनावों को धीरे-धीरे एक चक्र में लाने की व्यवस्था बनाई जा रही है।

वर्तमान विधायी ढांचे की रिपोर्ट की गई टाइमलाइन में पहला पूर्ण समकालिक चुनाव चक्र 2034 के आसपास दिखाई देता है।

लेकिन NDA के भीतर अब यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या इसे 2029 से ही शुरू किया जा सकता है।

यानी सरल भाषा में:

मौजूदा प्रस्ताव → 2034 के आसपास पूर्ण समन्वय

NDA में विचाराधीन विकल्प → 2029 से बड़ा हिस्सा एक साथ

संसद की संयुक्त समिति क्या कर रही है?

“One Nation, One Election” से संबंधित विधेयकों की जांच के लिए संसद की Joint Parliamentary Committee (JPC) काम कर रही है।

समिति विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों और दूसरे हितधारकों से चर्चा कर रही है। इसमें संवैधानिक विशेषज्ञ, शिक्षाविद, नागरिक समाज और अन्य पक्ष भी शामिल हैं।

समिति के अध्यक्ष पी. पी. चौधरी ने इस मुद्दे पर कहा है कि अगर चुनाव पहले कराए जाने हैं तो यह फैसला मुख्य रूप से NDA के मुख्यमंत्रियों/राज्य सरकारों से संबंधित होगा और यह समिति के मूल अधिकार-क्षेत्र से अलग मुद्दा है।

क्या 2029 में ऐसा करना कानूनी रूप से आसान होगा?

नहीं। यह सिर्फ राजनीतिक फैसला नहीं होगा।

एक साथ चुनाव कराने के लिए संविधान और चुनाव संबंधी कानूनों में बदलाव की जरूरत पड़ सकती है। विधानसभा और लोकसभा के कार्यकाल, विधानसभा भंग होने की स्थिति और चुनावी चक्र को एक साथ लाने जैसे मुद्दे इसमें शामिल हैं।

इसीलिए “One Nation, One Election” सिर्फ चुनाव की तारीख बदलने का मामला नहीं है; यह भारत की चुनावी व्यवस्था में बड़ा संस्थागत बदलाव होगा।

विपक्ष की क्या आपत्ति है?

विपक्षी दलों की मुख्य चिंताओं में से एक यह है कि अगर किसी राज्य की विधानसभा का सामान्य कार्यकाल पूरा होने से पहले चुनाव करा दिए जाते हैं, तो राज्य की लोकतांत्रिक अवधि कम हो सकती है।

विपक्ष यह सवाल भी उठा सकता है कि क्या राष्ट्रीय चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव होने पर स्थानीय मुद्दे राष्ट्रीय मुद्दों के पीछे दब जाएंगे।

कुछ विपक्षी दल इसे संघीय ढांचे के लिए चुनौती के रूप में भी देखते हैं। दूसरी ओर, समर्थकों का तर्क है कि बार-बार चुनावों से होने वाले खर्च और प्रशासनिक व्यवधान को कम किया जा सकता है।

सरकार/NDA के पक्ष में मुख्य तर्क

One Nation, One Election के समर्थकों के अनुसार इसके कई संभावित फायदे हैं:

1. चुनावी खर्च में कमी
बार-बार चुनाव होने से सरकार, राजनीतिक दलों और चुनाव मशीनरी पर लगातार खर्च होता है। एक साथ चुनाव कराने से इसमें कमी आ सकती है।

2. बार-बार Model Code of Conduct से राहत
चुनाव की घोषणा के बाद Model Code of Conduct लागू होता है। लगातार चुनाव होने पर सरकारों के नीतिगत और विकास कार्यों पर असर पड़ने की दलील दी जाती है।

3. प्रशासनिक मशीनरी पर कम दबाव
पुलिस, सुरक्षा बलों और सरकारी कर्मचारियों को बार-बार चुनाव ड्यूटी में लगाने की जरूरत कम हो सकती है।

4. राजनीतिक स्थिरता
समर्थकों का कहना है कि सरकारें लगातार चुनावी तैयारी करने के बजाय लंबे समय की नीतियों पर ध्यान दे सकती हैं।

लेकिन इसके खिलाफ प्रमुख तर्क क्या हैं?

1. राज्यों की स्वायत्तता का सवाल
भारत एक संघीय व्यवस्था है, जहां राज्य सरकारों का अपना राजनीतिक और संवैधानिक महत्व है।

2. विधानसभा का कार्यकाल छोटा करने की समस्या
यदि किसी सरकार का पांच साल का कार्यकाल पूरा होने से पहले विधानसभा भंग होती है, तो इसे लेकर राजनीतिक विवाद हो सकता है।

3. स्थानीय मुद्दों पर असर
लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ होने पर बेरोजगारी, सड़क, बिजली, पानी, कृषि जैसे राज्य-विशिष्ट मुद्दे राष्ट्रीय मुद्दों के पीछे चले जाने की आशंका जताई जाती है।

4. सरकार गिरने की स्थिति
अगर किसी राज्य में चुनाव के बाद सरकार गिर जाती है और नई सरकार नहीं बनती, तो एक साथ चुनाव चक्र को बनाए रखना कठिन हो सकता है।

2029 का प्रस्ताव इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

अगर NDA इस योजना को लागू करने में सफल होता है, तो 2029 का लोकसभा चुनाव भारत के चुनावी इतिहास में एक बड़े बदलाव का शुरुआती बिंदु बन सकता है।

इसका मतलब यह होगा कि देश के बहुत बड़े हिस्से में मतदाता एक ही चुनावी अवधि में:

लोकसभा + विधानसभा

के लिए मतदान कर सकते हैं।

हालांकि यह याद रखना जरूरी है कि 22 राज्यों में 2029 में एक साथ चुनाव कराने की खबर अभी एक विचाराधीन राजनीतिक विकल्प की रिपोर्ट है, अंतिम निर्णय नहीं।

आम जनता के लिए इसका क्या मतलब होगा?

अगर योजना लागू होती है, तो 2029 में कई राज्यों के मतदाताओं को लोकसभा और विधानसभा के लिए एक ही चुनाव अवधि में वोट देना पड़ सकता है।

मतदाता को दो अलग-अलग स्तरों पर सरकार चुननी होगी:

केंद्र के लिए → लोकसभा सांसद

राज्य के लिए → विधायक

इसका मतलब यह नहीं है कि दोनों वोट एक ही पार्टी को देना जरूरी होगा। मतदाता लोकसभा में एक पार्टी और विधानसभा में दूसरी पार्टी को भी वोट दे सकता है।

सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल

अब सबसे बड़ा सवाल यह है:

क्या NDA 2029 में 22 राज्यों/UTs में विधानसभा चुनाव कराने के लिए राजनीतिक और संवैधानिक सहमति जुटा पाएगा?

इसके लिए अगले चरण में राज्य सरकारों की भूमिका, संसद में विधायी प्रक्रिया, संवैधानिक संशोधन और विपक्ष की प्रतिक्रिया बेहद महत्वपूर्ण होगी।

निष्कर्ष

One Nation, One Election को 2029 से बड़े स्तर पर लागू करने की संभावित चर्चा भारत की चुनावी राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम है।

लेकिन अभी इसे “2029 में 22 राज्यों में चुनाव पक्का” कहना सही नहीं होगा।

सही स्थिति यह है कि NDA 2029 में लोकसभा चुनाव के साथ 22 NDA-बहुमत वाले राज्यों/UTs में विधानसभा चुनाव कराने के विकल्प पर विचार कर रहा है, जबकि मौजूदा विधायी टाइमलाइन का पूर्ण समकालिक चक्र 2034 के आसपास बताया गया है। आगे की तस्वीर संसद, राज्य सरकारों और राजनीतिक दलों के बीच होने वाली बातचीत से साफ होगी।

प्रेस क्लब में ‘मोदी चालीसा’ का वीडियो वायरल, PM मोदी की आरती पर मचा विवाद; प्रेस क्लब ने दी सफाई

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नई दिल्ली- दिल्ली स्थित प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर/कटआउट के सामने आरती और ‘मोदी चालीसा’ का पाठ किए जाने का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होने के बाद विवाद खड़ा हो गया है। वायरल वीडियो में कुछ लोग पीएम मोदी को भगवान राम के स्वरूप में दर्शाए गए कटआउट के सामने आरती करते और ‘जय जय मोदी, हर हर मोदी’ के नारे लगाते दिखाई दे रहे हैं। 

वायरल वीडियो में क्या दिखा?

वीडियो में एक कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक बड़ा कटआउट नजर आया, जिसमें उन्हें धनुष-बाण के साथ धार्मिक स्वरूप में दिखाया गया था। कार्यक्रम स्थल पर लगे बैनर पर ‘भगवान नरेंद्र मोदी चालीसा’ लिखा हुआ दिखाई दिया।

कार्यक्रम में मौजूद लोग कटआउट के सामने आरती करते और ‘मोदी चालीसा’ का पाठ करते नजर आए। वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर इसको लेकर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं आने लगीं। 

कार्यक्रम किसने आयोजित किया था?

रिपोर्टों के मुताबिक, यह कार्यक्रम बिहार स्टेट ट्रांसजेंडर वेलफेयर बोर्ड से जुड़े लोगों द्वारा आयोजित किया गया था। कार्यक्रम के आयोजकों की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सम्मान में धार्मिक शैली का कार्यक्रम किए जाने की बात सामने आई है। 

बताया गया है कि कार्यक्रम के आयोजकों में बोर्ड के उपाध्यक्ष डॉ. राजन सिंह का नाम सामने आया है। उन्होंने कार्यक्रम का बचाव करते हुए प्रधानमंत्री मोदी के प्रति सम्मान और समर्थन जताया। 

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने क्या कहा?

वीडियो वायरल होने और विवाद बढ़ने के बाद प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने कार्यक्रम से खुद को अलग कर लिया।

प्रेस क्लब ने स्पष्ट किया कि इस कार्यक्रम का आयोजन क्लब ने नहीं किया था। उसके मुताबिक, एक संगठन ने परिसर का हॉल प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित करने के लिए किराए पर लिया था। बाद में जब आयोजकों ने हॉल के इस्तेमाल से जुड़े नियमों का उल्लंघन किया तो क्लब प्रशासन ने हस्तक्षेप कर कार्यक्रम को रोक दिया। 

यानी प्रेस क्लब के अनुसार, हॉल की बुकिंग एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए की गई थी, लेकिन वहां आयोजित गतिविधियां बुकिंग की शर्तों के अनुरूप नहीं थीं।

सोशल मीडिया पर क्यों मचा बवाल?

वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर इस कार्यक्रम को लेकर तीखी बहस शुरू हो गई। सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर हुई कि एक संवैधानिक पद पर बैठे प्रधानमंत्री को धार्मिक स्वरूप में प्रस्तुत कर उनकी आरती और चालीसा का पाठ किया गया।

कुछ लोगों ने इसे राजनीतिक व्यक्ति का धार्मिक महिमामंडन बताया, जबकि कार्यक्रम से जुड़े लोगों ने प्रधानमंत्री के प्रति अपनी श्रद्धा और सम्मान को इसका आधार बताया।

कार्यक्रम को बीच में रोक दिया गया

प्रेस क्लब की ओर से दी गई सफाई के मुताबिक, जैसे ही क्लब प्रशासन को बुकिंग की शर्तों के उल्लंघन का पता चला, उसने हस्तक्षेप किया और कार्यक्रम को रोक दिया। इस वजह से क्लब ने यह भी स्पष्ट किया कि वायरल वीडियो के आधार पर यह नहीं माना जाना चाहिए कि कार्यक्रम प्रेस क्लब द्वारा आयोजित या समर्थित था। 

PM मोदी के मंदिर का भी जिक्र

इस विवाद के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंदिर से जुड़ी योजना का भी जिक्र सामने आया है। कार्यक्रम से जुड़े राजन सिंह ने बिहार में प्रधानमंत्री मोदी को समर्पित मंदिर बनाने की योजना की बात कही है। रिपोर्टों के अनुसार, प्रस्तावित मंदिर की लागत करीब ₹112 करोड़ बताई गई है।

अब क्या है पूरा मामला?

फिलहाल इस पूरे विवाद का केंद्र वायरल वीडियो और प्रेस क्लब की सफाई है। वीडियो में दिखाई गई गतिविधियों को लेकर सोशल मीडिया पर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज है, जबकि प्रेस क्लब ने साफ कर दिया है कि उसने कार्यक्रम आयोजित नहीं किया था और नियमों के उल्लंघन के बाद उसे रोक दिया गया था।

निष्कर्ष

दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में ‘मोदी चालीसा’, आरती और पीएम मोदी को धार्मिक स्वरूप में दिखाने वाला वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। हालांकि, प्रेस क्लब ने कार्यक्रम से दूरी बनाते हुए कहा है कि हॉल प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए किराए पर दिया गया था और शर्तों का उल्लंघन होने पर कार्यक्रम रोक दिया गया।

अब यह मामला सोशल मीडिया से निकलकर राजनीति, धार्मिक प्रतीकों और सार्वजनिक संस्थानों के इस्तेमाल को लेकर बहस का विषय बन गया है।

जयपुर में CJP टीम पर हमले का मामला: आशुतोष रांका पर मारपीट का आरोप, ग्रामीणों ने लगाए गंभीर आरोप

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जयपुर- राजस्थान की राजधानी जयपुर में शुक्रवार, 21 अगस्त 2026 को सरकारी स्कूल की स्थिति का जायजा लेने पहुंची कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की टीम और स्थानीय ग्रामीणों के बीच विवाद ने तूल पकड़ लिया। बगरू क्षेत्र के रामपुरा-कंवरपुरा गांव में हुई इस घटना में CJP के सह-संयोजक आशुतोष रांका समेत पार्टी के कार्यकर्ताओं को ग्रामीणों के विरोध का सामना करना पड़ा। दोनों पक्षों की ओर से घटना को लेकर एक-दूसरे पर गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं।

सरकारी स्कूल का जायजा लेने पहुंची थी CJP टीम

जानकारी के मुताबिक, CJP की टीम अपने ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान के तहत जयपुर के ग्रामीण इलाकों में सरकारी स्कूलों की स्थिति का जायजा लेने पहुंची थी। रामपुरा-कंवरपुरा गांव के सरकारी स्कूल का निरीक्षण भी इसी अभियान का हिस्सा था।

CJP की ओर से स्कूल की बदहाल स्थिति और बुनियादी सुविधाओं को लेकर सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, संबंधित स्कूल की इमारत को असुरक्षित घोषित किए जाने के बाद बच्चों की कक्षाएं वैकल्पिक स्थान पर संचालित होने की बात भी सामने आई है।

लेकिन टीम के गांव पहुंचते ही स्थानीय लोगों ने इसका विरोध शुरू कर दिया। देखते ही देखते मामला कहासुनी से बढ़कर धक्का-मुक्की और कथित मारपीट तक पहुंच गया।

CJP का आरोप- बीजेपी समर्थकों ने बनाया निशाना

घटना के बाद CJP ने आरोप लगाया कि उनकी टीम पर पहले से योजनाबद्ध तरीके से हमला किया गया। पार्टी नेताओं का दावा है कि हमला करने वाले सामान्य ग्रामीण नहीं, बल्कि बीजेपी समर्थक लोग थे।

CJP नेताओं के मुताबिक, कार्यकर्ताओं के साथ मारपीट की गई, उन्हें गांव से बाहर खदेड़ा गया और वाहनों को भी नुकसान पहुंचाया गया। आशुतोष रांका ने आरोप लगाया कि उनके साथ मारपीट की गई और कुछ कार्यकर्ताओं को चोटें आईं।

CJP की ओर से यह भी आरोप लगाया गया कि पुलिस मौके पर मौजूद होने के बावजूद स्थिति को नियंत्रित करने में प्रभावी हस्तक्षेप नहीं कर पाई।

ग्रामीणों ने CJP के आरोपों को बताया गलत

दूसरी ओर, ग्रामीणों ने CJP के आरोपों को खारिज करते हुए पूरी घटना की अलग तस्वीर पेश की है। ग्रामीणों का कहना है कि CJP की टीम जिस तरह गांव में पहुंची और गतिविधियां कर रही थी, उससे स्थानीय लोगों में नाराजगी पैदा हुई।

ग्रामीणों की ओर से दावा किया गया कि CJP कार्यकर्ताओं के पास हथियार मौजूद थे और गांव में उन्होंने कथित तौर पर ‘देश विरोधी’ नारे लगाए। हालांकि, ये ग्रामीणों के आरोप हैं और इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है।

गाड़ियों के शीशे खुद तोड़ने का भी दावा

इस विवाद में ग्रामीणों ने CJP पर ही एक और गंभीर आरोप लगाया है। उनका दावा है कि टीम के सदस्यों ने कथित तौर पर अपनी ही गाड़ियों के शीशे खुद तोड़े, ताकि घटना को हमले के रूप में पेश किया जा सके।

ग्रामीणों का कहना है कि उनके ऊपर हमला करने या वाहनों में तोड़फोड़ करने के आरोप सही नहीं हैं। हालांकि, इस दावे की भी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और घटना से जुड़े वीडियो तथा अन्य साक्ष्यों के आधार पर ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

CJP ने बताई स्कूल की बदहाल स्थिति

विवाद के बीच CJP का कहना है कि उसका उद्देश्य किसी राजनीतिक दल से टकराव करना नहीं, बल्कि सरकारी स्कूलों की स्थिति को सामने लाना है।

पार्टी की टीम जिस स्कूल का निरीक्षण करने पहुंची थी, उसकी हालत को लेकर पहले से सवाल उठ रहे थे। रिपोर्टों में स्कूल भवन के असुरक्षित होने और वैकल्पिक व्यवस्था में पढ़ाई कराए जाने की बात सामने आई है। CJP का दावा है कि वह इसी तरह के स्कूलों की स्थिति को जनता और सरकार के सामने लाने के लिए अभियान चला रही है।

आशुतोष रांका ने सरकार को दिया अल्टीमेटम

घटना के बाद आशुतोष रांका ने राजस्थान सरकार और शिक्षा मंत्री मदन दिलावर पर भी निशाना साधा। CJP की ओर से आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है।

रिपोर्टों के मुताबिक, रांका ने सरकार को 48 घंटे का अल्टीमेटम देते हुए कथित हमलावरों की गिरफ्तारी की मांग की है। CJP ने मांग पूरी नहीं होने पर राजस्थान में व्यापक आंदोलन शुरू करने की चेतावनी भी दी है।

राजनीतिक बयानबाजी भी तेज

घटना के बाद मामला सिर्फ स्थानीय विवाद तक सीमित नहीं रहा। CJP नेताओं ने बीजेपी पर सीधे आरोप लगाए, जबकि ग्रामीणों की ओर से CJP की गतिविधियों और उनके दावों पर सवाल उठाए गए।

आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने भी घटना को लेकर बीजेपी पर निशाना साधा और CJP कार्यकर्ताओं पर कथित हमले की आलोचना की।

इस तरह सरकारी स्कूल के निरीक्षण से शुरू हुआ विवाद अब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और कानून-व्यवस्था के मुद्दे में बदलता दिखाई दे रहा है।

आखिर विवाद की असली वजह क्या है?

पूरे मामले में फिलहाल दोनों पक्षों के दावे एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं।

CJP का पक्ष:

  • टीम स्कूल की स्थिति देखने पहुंची थी।

  • ग्रामीणों ने उन्हें रोककर कथित तौर पर मारपीट की।

  • वाहनों में तोड़फोड़ और पथराव किया गया।

  • हमले के पीछे बीजेपी समर्थकों के होने का आरोप है।

  • पुलिस पर पर्याप्त कार्रवाई नहीं करने का आरोप लगाया गया है।

ग्रामीणों का पक्ष:

  • CJP की टीम के आने का स्थानीय लोगों ने विरोध किया।

  • ग्रामीणों ने CJP के कार्यकर्ताओं पर हथियार रखने और कथित ‘देश विरोधी’ नारे लगाने का आरोप लगाया।

  • ग्रामीणों ने CJP के वाहनों के शीशे खुद तोड़े जाने का दावा किया।

  • बीजेपी से जुड़े होने के आरोपों को ग्रामीणों ने खारिज किया है।

इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। इसलिए घटना की वास्तविक परिस्थितियां पुलिस जांच और उपलब्ध वीडियो/अन्य साक्ष्यों से ही स्पष्ट होंगी।

जांच के बाद साफ होगी तस्वीर

जयपुर की इस घटना ने सरकारी स्कूलों की स्थिति, राजनीतिक संगठनों के स्कूल निरीक्षण और ग्रामीण इलाकों में राजनीतिक टकराव को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि CJP टीम पर वास्तव में किसने हमला किया, वाहनों में तोड़फोड़ किसने की और ग्रामीणों द्वारा लगाए गए हथियार व कथित नारेबाजी के आरोपों में कितनी सच्चाई है। दोनों पक्षों के परस्पर विरोधी दावों के बीच निष्पक्ष जांच से ही पूरी तस्वीर सामने आ सकेगी।

https://youtube.com/shorts/i5VV-v__PeQ?feature=share

निष्कर्ष

जयपुर के रामपुरा-कंवरपुरा गांव में CJP टीम के स्कूल निरीक्षण के दौरान हुआ विवाद अब राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। आशुतोष रांका और CJP ने बीजेपी समर्थकों पर हमले का आरोप लगाया है, जबकि ग्रामीणों ने इन आरोपों को खारिज करते हुए CJP कार्यकर्ताओं पर गंभीर आरोप लगाए हैं।

एक तरफ CJP ने कार्रवाई नहीं होने पर आंदोलन की चेतावनी दी है, तो दूसरी तरफ ग्रामीण अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को गलत बता रहे हैं। ऐसे में अब पुलिस और प्रशासन की जांच अहम होगी, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि शुक्रवार को गांव में वास्तव में क्या हुआ था।

वंदे मातरम् पर कांग्रेस के दो छंद वाले फैसले से भड़की बीजेपी, नेताओं ने कांग्रेस पर बोला चौतरफा हमला

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नई दिल्ली- राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर कांग्रेस और बीजेपी के बीच सियासी घमासान तेज हो गया है। कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) ने स्पष्ट किया है कि पार्टी के कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के केवल शुरुआती दो छंद ही गाए जाएंगे। कांग्रेस ने इसके लिए 1937 में लिए गए अपने ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया है। लेकिन कांग्रेस के इस रुख पर बीजेपी ने तीखा हमला बोलते हुए इसे राष्ट्रविरोधी और तुष्टीकरण की राजनीति से जोड़ दिया है।

कांग्रेस ने क्या फैसला लिया?

कांग्रेस महासचिव के.सी. वेणुगोपाल के मुताबिक पार्टी ‘वंदे मातरम्’ को लेकर 1937 में कांग्रेस द्वारा लिए गए निर्णय का ही पालन करेगी। यानी कांग्रेस के आधिकारिक कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत के पहले दो छंद गाए जाएंगे। पार्टी का कहना है कि यह कोई नया फैसला नहीं बल्कि उसके पुराने रुख की पुनर्पुष्टि है। 

कांग्रेस के अनुसार 1937 में राष्ट्रीय सभाओं और सार्वजनिक कार्यक्रमों के संदर्भ में यह तय किया गया था कि ‘वंदे मातरम्’ के शुरुआती दो छंदों का इस्तेमाल किया जाए। पार्टी इस फैसले को महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल समेत उस दौर के कांग्रेस नेतृत्व की परंपरा से जोड़ रही है।

आखिर दो छंद ही क्यों?

इस विवाद की जड़ ‘वंदे मातरम्’ के इतिहास में है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित इस रचना में शुरुआती दो छंदों के अलावा अन्य छंद भी हैं। कांग्रेस का तर्क है कि शुरुआती दो छंद मातृभूमि की स्तुति पर केंद्रित हैं, जबकि बाद के हिस्सों में धार्मिक और पौराणिक संदर्भ आते हैं।

1937 में इस बात पर भी चर्चा हुई थी कि बहुधार्मिक और विविधता वाले भारत की राष्ट्रीय सभाओं में ऐसा संस्करण इस्तेमाल किया जाए जिसे सभी समुदाय सहजता से स्वीकार कर सकें। इसी संदर्भ में शुरुआती दो छंदों को प्राथमिकता देने का फैसला किया गया था।

अमित शाह ने कांग्रेस पर साधा निशाना

कांग्रेस के फैसले के बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इसे लेकर जोरदार हमला बोला। शाह ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि पार्टी ने ‘वंदे मातरम्’ को दो हिस्सों में बांटने का काम किया और अब उसी पुराने फैसले को आगे बढ़ा रही है।

शाह ने कांग्रेस के फैसले को “राष्ट्रविरोधी” बताते हुए इसे तुष्टीकरण की राजनीति से जोड़ा। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस एक बार फिर वोट बैंक की राजनीति के लिए पुराने रास्ते पर लौट रही है। 

बीजेपी का कहना है कि ‘वंदे मातरम्’ केवल एक राजनीतिक दल का मुद्दा नहीं बल्कि देश की स्वतंत्रता की लड़ाई और राष्ट्रीय भावना से जुड़ा प्रतीक है।

नितिन नबीन का कांग्रेस पर तीखा हमला

बीजेपी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन ने भी कांग्रेस के फैसले पर कड़ा हमला बोला। उन्होंने कांग्रेस को “नई मुस्लिम लीग” तक कह दिया और आरोप लगाया कि पार्टी तुष्टीकरण की राजनीति के कारण राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान से समझौता कर रही है।

नबीन ने कांग्रेस पर देश के स्वाभिमान को गिरवी रखने और अपमान को नीति का रूप देने जैसे गंभीर आरोप लगाए। उनके बयान के बाद विवाद और अधिक राजनीतिक रंग लेता दिखाई दिया।

रविशंकर प्रसाद ने भी कांग्रेस को घेरा

बीजेपी प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने भी कांग्रेस पर निशाना साधते हुए सवाल उठाया कि स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत का दावा करने वाली पार्टी राष्ट्रगीत के सम्मान को लेकर ऐसी स्थिति में क्यों खड़ी है।

बीजेपी ने आरोप लगाया कि स्वतंत्रता दिवस के दौरान कांग्रेस मुख्यालय और बाद में गोवा में भी ‘वंदे मातरम्’ के केवल दो छंद गाए गए।

खरगे ने बीजेपी को दिया करारा जवाब

दूसरी ओर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने बीजेपी के आरोपों को खारिज किया। उनका कहना है कि उन्होंने वही संस्करण गाया जिसे दशकों से कांग्रेस के कार्यक्रमों में गाया जाता रहा है।

खरगे ने बीजेपी पर पलटवार करते हुए कहा कि अगर यह गलत है तो उन ऐतिहासिक नेताओं पर भी सवाल उठाया जाना चाहिए जिन्होंने इसी संस्करण को गाया था। उन्होंने महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और अटल बिहारी वाजपेयी का भी उल्लेख किया। 

खरगे का तर्क है कि बीजेपी को कांग्रेस के ऐतिहासिक प्रस्तावों और राष्ट्रगीत को लेकर लिए गए पुराने फैसलों की जानकारी नहीं है। उनका कहना है कि कांग्रेस पिछले करीब आठ दशक से इसी परंपरा का पालन करती आई है।

अब विवाद सिर्फ गीत तक सीमित नहीं

‘वंदे मातरम्’ को लेकर मौजूदा विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि केंद्र सरकार ने हाल ही में इससे संबंधित कानूनी प्रावधानों में बदलाव किया है। 2026 में संसद ने ‘Prevention of Insults to National Honour’ कानून में संशोधन को मंजूरी दी, जिसके तहत ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गान के समान कानूनी संरक्षण देने का प्रावधान किया गया। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह प्रावधान लागू हुआ। 

इसी वजह से बीजेपी कांग्रेस के दो छंद वाले फैसले को केवल पार्टी की आंतरिक परंपरा नहीं बल्कि राष्ट्रीय सम्मान से जोड़कर देख रही है।

बीजेपी-कांग्रेस आमने-सामने, सियासत और गरमाई

एक तरफ बीजेपी कांग्रेस पर राष्ट्रगीत के अपमान और तुष्टीकरण की राजनीति का आरोप लगा रही है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस इसे अपने 1937 के ऐतिहासिक फैसले की निरंतरता बता रही है।

विवाद के बीच कांग्रेस नेताओं ने बीजेपी पर “फर्जी राष्ट्रवाद” का आरोप लगाया है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने भी बीजेपी के राष्ट्रवाद के दावे पर सवाल उठाए और कहा कि पार्टी इस मुद्दे को राजनीतिक विवाद में बदल रही है।

निष्कर्ष

कुल मिलाकर ‘वंदे मातरम्’ के दो छंदों को लेकर शुरू हुआ विवाद अब इतिहास, राष्ट्रवाद, तुष्टीकरण और राजनीतिक विरासत की बहस में बदल गया है। बीजेपी कांग्रेस के फैसले को देश और राष्ट्रगीत के सम्मान से जोड़ रही है, जबकि कांग्रेस इसे 1937 में तय की गई ऐतिहासिक परंपरा बता रही है।

आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद से लेकर राज्यों की राजनीति तक और ज्यादा गरमाने की संभावना है। खास तौर पर बीजेपी और कांग्रेस के बीच राष्ट्रवाद की राजनीति को लेकर यह नया टकराव 2026 की सियासत में बड़ा मुद्दा बनता दिख रहा है।

बीजेपी ने जारी की राज्यों के प्रभारियों की सूची, विनोद तावड़े को यूपी, सतीश पूनिया को पंजाब और तरुण चुघ को गुजरात की जिम्मेदारी

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नई दिल्ली- भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने संगठन में बड़ा फेरबदल करते हुए मंगलवार को विभिन्न राज्यों के नए प्रभारियों और सह-प्रभारियों की सूची जारी की। पार्टी ने आगामी चुनावों और संगठनात्मक गतिविधियों को ध्यान में रखते हुए कई वरिष्ठ नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी हैं।

बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव एवं राज्यसभा सांसद विनोद तावड़े को उत्तर प्रदेश का प्रभारी नियुक्त किया गया है, जबकि जगदीश ईश्वरभाई पटेल को यूपी का सह-प्रभारी बनाया गया है। वहीं, बीजेपी सांसद सतीश पूनिया को पंजाब का प्रभारी और तरुण चुघ को गुजरात का प्रभारी नियुक्त किया गया है।

उत्तर प्रदेश बीजेपी के लिए बेहद महत्वपूर्ण राज्य माना जाता है। ऐसे में पार्टी ने संगठन को मजबूत करने और आगामी राजनीतिक चुनौतियों को देखते हुए विनोद तावड़े को बड़ी जिम्मेदारी दी है। वहीं पंजाब और गुजरात में भी संगठनात्मक गतिविधियों को गति देने की जिम्मेदारी सतीश पूनिया और तरुण चुघ के कंधों पर होगी।

बीजेपी की ओर से जारी की गई नई सूची को पार्टी के संगठनात्मक विस्तार और आगामी चुनावी रणनीति के लिहाज से अहम माना जा रहा है। नई जिम्मेदारियों के साथ पार्टी ने राज्यों में संगठन को और मजबूत करने तथा जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के साथ बेहतर समन्वय स्थापित करने पर जोर दिया है।

प्रमुख नियुक्तियां

  • विनोद तावड़े — उत्तर प्रदेश प्रभारी

  • जगदीश ईश्वरभाई पटेल — उत्तर प्रदेश सह-प्रभारी

  • सतीश पूनिया — पंजाब प्रभारी

  • तरुण चुघ — गुजरात प्रभारी

बीजेपी के इस संगठनात्मक फेरबदल को आने वाले समय में पार्टी की रणनीति को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।


पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: जेल में बंद इमरान खान को अस्पताल भेजने का आदेश

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इस्लामाबाद- पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री और पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के संस्थापक इमरान खान को इलाज और चिकित्सकीय जांच के लिए अस्पताल स्थानांतरित करने का आदेश दिया है। अदालत ने उन्हें रावलपिंडी की अदियाला जेल से इस्लामाबाद स्थित शिफा इंटरनेशनल अस्पताल ले जाने का निर्देश दिया है।

तीन सदस्यीय पीठ ने स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को देखते हुए इमरान खान के लिए एक विशेष मेडिकल बोर्ड गठित करने का भी निर्देश दिया है। इसमें उनके निजी चिकित्सक और उनकी बहन डॉ. उजमा खान को भी शामिल किया जाना है। अदालत ने उनके परिवार को अस्पताल में उनसे मिलने तथा विदेश में रह रहे उनके बेटों से फोन पर बातचीत की सुविधा देने का निर्देश भी दिया है।

स्वास्थ्य को लेकर बढ़ी चिंता

इमरान खान की स्वास्थ्य स्थिति को लेकर उनकी पार्टी और परिवार लंबे समय से चिंता जताते रहे हैं। जेल प्रशासन की ओर से अदालत में पेश की गई मेडिकल रिपोर्ट में उनके ब्लड प्रेशर में उतार-चढ़ाव और हृदय संबंधी असामान्य संकेतों का उल्लेख किया गया था। उनकी आंखों की समस्या को लेकर भी लगातार चिकित्सकीय चिंता सामने आती रही है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह आदेश कैदी के स्वास्थ्य, सुरक्षा और मौलिक अधिकारों को ध्यान में रखते हुए दिया जा रहा है। अदालत के निर्देश के अनुसार इमरान खान को अस्पताल में रखा जाएगा और उनके इलाज की निगरानी मेडिकल बोर्ड करेगा।

इमरान खान अगस्त 2023 से जेल में हैं और विभिन्न मामलों में उन्हें दोषी ठहराया गया है। वह और उनकी पार्टी इन मामलों को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताते रहे हैं।

राष्ट्र, समाज और सनातन संस्कृति के प्रति दिलीप सिंह जूदेव जी का समर्पण सदैव स्मरणीय रहेगा : मुख्यमंत्री विष्णु देव साय

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रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने आज राजधानी रायपुर स्थित मुख्यमंत्री निवास में श्रद्धेय स्वर्गीय दिलीप सिंह जूदेव जी की पुण्यतिथि पर उनके छायाचित्र पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धापूर्वक नमन किया और राष्ट्र एवं समाज के प्रति उनके योगदान का स्मरण किया।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि श्रद्धेय दिलीप सिंह जूदेव जी का संपूर्ण जीवन राष्ट्र, समाज और सनातन संस्कृति के प्रति समर्पित रहा। जनजातीय समाज के हितों की रक्षा, उनके स्वाभिमान और सामाजिक जागरण के लिए उन्होंने आजीवन कार्य किया। समाज के अंतिम व्यक्ति के प्रति उनकी संवेदनशीलता और जनसेवा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ने उन्हें जन-जन के हृदय में विशिष्ट स्थान दिलाया।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि जूदेव जी का छत्तीसगढ़ की माटी और यहां के लोगों से गहरा आत्मीय जुड़ाव था। विशेष रूप से जनजातीय अंचलों में उन्होंने समाज को संगठित करने, लोगों में आत्मविश्वास जगाने और उनकी आवाज को मजबूती देने का महत्वपूर्ण कार्य किया। 

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि जूदेव जी का जीवन राष्ट्रसेवा, सामाजिक सरोकार और अपनी संस्कृति एवं परंपराओं के प्रति अटूट निष्ठा का प्रेरक उदाहरण है। उनके विचार और आदर्श आने वाली पीढ़ियों को समाज एवं राष्ट्र के लिए समर्पित भाव से कार्य करने की प्रेरणा देते रहेंगे।

इस अवसर पर प्रबल प्रताप सिंह जूदेव, राज्य महिला आयोग की सदस्य प्रियंवदा सिंह जूदेव, प्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी तथा छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी के अध्यक्ष शशांक शर्मा उपस्थित थे।

केरल का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने की तैयारी, लोकसभा से बिल पास; अब राज्यसभा की बारी

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नई दिल्ली- केरल के नाम को बदलकर ‘केरलम’ करने की प्रक्रिया अब एक महत्वपूर्ण चरण में पहुंच गई है। Kerala (Alteration of Name) Bill, 2026 को लोकसभा ने 11 अगस्त 2026 को पारित कर दिया। अब यह विधेयक राज्यसभा में विचार और पारित होने के लिए रखा जा रहा है। विधेयक के कानून बनने के बाद संविधान की प्रथम अनुसूची में राज्य का नाम ‘Kerala’ से बदलकर ‘Keralam’ किया जाएगा।

क्यों बदला जा रहा है केरल का नाम?

‘केरलम’ नाम मलयालम भाषा में राज्य के प्रचलित नाम से जुड़ा है। केरल विधानसभा ने 24 जून 2024 को राज्य का नाम ‘Kerala’ से ‘Keralam’ करने के लिए प्रस्ताव पारित किया था। इसके बाद राज्य सरकार ने केंद्र से संविधान में आवश्यक संशोधन की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का अनुरोध किया।

केंद्र सरकार की ओर से फरवरी 2026 में इस नाम परिवर्तन के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई थी। इसके बाद संवैधानिक प्रक्रिया के तहत विधेयक को संसद में लाने का रास्ता साफ हुआ।

लोकसभा से पारित हुआ बिल

Kerala (Alteration of Name) Bill, 2026 को लोकसभा ने 11 अगस्त को पारित किया। रिपोर्टों के मुताबिक, उस दिन सदन में विपक्ष के विरोध और हंगामे के बीच विधेयक पारित हुआ और इस पर विस्तृत बहस नहीं हो सकी।

अब विधेयक की अगली मंजिल राज्यसभा है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा इसे राज्यसभा में विचार और पारित करने के लिए पेश किए जाने का कार्यक्रम है।

क्या ‘केरलम’ नाम तुरंत लागू हो जाएगा?

नहीं। केवल लोकसभा से बिल पास होने के बाद नाम आधिकारिक रूप से नहीं बदलता। इसे संसद के दोनों सदनों से पारित होना और इसके बाद संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होना जरूरी है।

संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत किसी राज्य के नाम में परिवर्तन के लिए संसद द्वारा कानून बनाया जाता है। इसी प्रक्रिया के तहत ‘Kerala (Alteration of Name) Bill, 2026’ लाया गया है।

इसलिए फिलहाल खबर को ‘केरल का नाम बदलकर केरलम करने की प्रक्रिया’ के रूप में देखना अधिक सही है, न कि यह कहना कि राज्य का नाम आधिकारिक तौर पर बदल चुका है।

‘केरल’ से ‘केरलम’ क्यों महत्वपूर्ण है?

‘केरलम’ मलयालम में राज्य के स्थानीय नाम को दर्शाता है। नाम परिवर्तन के समर्थकों का तर्क है कि आधिकारिक नाम को स्थानीय भाषाई पहचान के अनुरूप किया जाना चाहिए।

केरल विधानसभा द्वारा 2024 में पारित प्रस्ताव भी इसी मांग पर आधारित था। केंद्र सरकार के दस्तावेजों में भी यह दर्ज है कि राज्य सरकार ने संविधान की प्रथम अनुसूची में नाम बदलने का अनुरोध किया था।

आगे क्या होगा?

अब सबसे महत्वपूर्ण चरण राज्यसभा में विधेयक का पारित होना है। यदि राज्यसभा भी इसे मंजूरी देती है और आगे की संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होती है, तभी ‘Kerala’ की जगह ‘Keralam’ आधिकारिक नाम के रूप में लागू होगा।

नाम परिवर्तन के बाद सरकारी दस्तावेजों, संवैधानिक संदर्भों और विभिन्न आधिकारिक रिकॉर्ड में आवश्यक बदलाव किए जाने की प्रक्रिया भी शुरू होगी।

क्या बदलेगा?

नाम परिवर्तन लागू होने के बाद मुख्य रूप से—

  • राज्य का आधिकारिक नाम Kerala से Keralam होगा।

  • संविधान की प्रथम अनुसूची में आवश्यक संशोधन किया जाएगा।

  • केंद्र और राज्य सरकार के आधिकारिक दस्तावेजों में नाम को अपडेट किया जाएगा।

  • सरकारी रिकॉर्ड, वेबसाइटों और अन्य आधिकारिक संदर्भों में चरणबद्ध तरीके से बदलाव किए जा सकते हैं।

एक नजर में पूरी खबर

राज्य: केरल
प्रस्तावित नया नाम: केरलम (Keralam)
राज्य विधानसभा का प्रस्ताव: 24 जून 2024
केंद्र की मंजूरी: फरवरी 2026
लोकसभा से बिल पास: 11 अगस्त 2026
अगला चरण: राज्यसभा में विचार और पारित होना

निष्कर्ष

केरल का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने की प्रक्रिया अब संसद के महत्वपूर्ण चरण में पहुंच चुकी है। लोकसभा से विधेयक पारित होने के बाद अब राज्यसभा की मंजूरी महत्वपूर्ण होगी। यदि संसद की प्रक्रिया पूरी होती है, तो केरल को आधिकारिक रूप से ‘केरलम’ नाम मिल सकता है।

यह बदलाव केवल नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि राज्य की भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को आधिकारिक स्वरूप देने की दिशा में उठाया गया कदम माना जा रहा है।

भूपेश बघेल के खिलाफ चुनाव याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में बड़ी सुनवाई

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नई दिल्ली- सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से जुड़ी चुनाव याचिका को आगे बढ़ाने की अनुमति दे दी है। अदालत ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें बघेल के चुनाव को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करने से इनकार किया गया था।

इस फैसले के बाद अब चुनाव याचिका पर आगे कानूनी प्रक्रिया जारी रह सकेगी। याचिका में भूपेश बघेल के चुनाव को चुनौती दी गई है।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि बघेल का चुनाव अवैध घोषित कर दिया गया है। फिलहाल मामला केवल याचिका की सुनवाई आगे बढ़ने से जुड़ा है। अब संबंधित आरोपों और दावों पर आगे की न्यायिक प्रक्रिया के दौरान सुनवाई होगी।

इस मामले पर छत्तीसगढ़ की राजनीति में भी नजर बनी हुई है।

बिहार के बैंकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर की ऐतिहासिक जीत

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राजनीतिक रणनीतिकार से जननेता बने प्रशांत किशोर ने बिहार की बैंकीपुर विधानसभा सीट के उपचुनाव में शानदार जीत दर्ज की है। उनकी इस जीत को राज्य की राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। इस परिणाम ने न केवल उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता को मजबूत किया है, बल्कि बिहार के राजनीतिक समीकरणों को भी नई दिशा दी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस जीत के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और विपक्षी दल आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारियों को लेकर अपनी रणनीतियों की समीक्षा और पुनर्गठन में जुट गए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, बैंकीपुर उपचुनाव का यह परिणाम बिहार की भविष्य की राजनीति और चुनावी परिदृश्य पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है।

बिजली दर वृद्धि और स्मार्ट मीटर के विरोध में कांग्रेस का दो माह का राज्यव्यापी आंदोलन

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रायपुर- छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस ने बिजली दरों में वृद्धि, स्मार्ट मीटर की स्थापना और बिजली सब्सिडी से जुड़े मुद्दों को लेकर राज्यभर में दो महीने तक चलने वाले चरणबद्ध आंदोलन की घोषणा की है।

कांग्रेस का आरोप है कि बिजली दरों में बढ़ोतरी और स्मार्ट मीटर लगाने की प्रक्रिया से आम उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है। पार्टी ने मांग की है कि राज्य सरकार बिजली दर वृद्धि पर पुनर्विचार करे, स्मार्ट मीटर लगाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करे तथा उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाए।

प्रदेश कांग्रेस के अनुसार, आंदोलन के दौरान जिला, ब्लॉक और ग्राम स्तर पर जनसभाएं, प्रदर्शन, ज्ञापन सौंपने और जनजागरण अभियान जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। पार्टी का कहना है कि वह बिजली उपभोक्ताओं की समस्याओं और जनहित के मुद्दों को व्यापक रूप से उठाएगी।

वहीं, राज्य सरकार का कहना है कि बिजली क्षेत्र में किए जा रहे सुधारों का उद्देश्य वितरण व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, आधुनिक और दक्ष बनाना है। सरकार का दावा है कि स्मार्ट मीटर से बिजली की वास्तविक खपत का सटीक आकलन होगा और उपभोक्ताओं को बेहतर सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकेंगी।

आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक गतिविधियां और तेज होने की संभावना है, क्योंकि कांग्रेस इसे राज्यव्यापी जनआंदोलन के रूप में चलाने की तैयारी कर रही है।

रेत खनन की रंजिश ने ली तीन जानें, भाजपा नेता को जिंदा जलाने का आरोप

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कोरिया- छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले में अवैध रेत खनन को लेकर चल रही पुरानी दुश्मनी ने मंगलवार रात खूनी रूप ले लिया। कथित तौर पर सुनियोजित हमले में तीन लोगों की मौत हो गई, जबकि दो अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए। मृतकों में एक स्थानीय भाजपा नेता भी शामिल हैं, जिन्हें हमलावरों द्वारा उनकी फॉर्च्यूनर गाड़ी समेत जिंदा जलाए जाने का आरोप है।

पुलिस के अनुसार, यह घटना दो प्रभावशाली परिवारों के बीच लंबे समय से चल रहे रेत खनन विवाद से जुड़ी हो सकती है। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि पीड़ितों पर घात लगाकर हमला किया गया, जिसके बाद मारपीट और आगजनी की वारदात को अंजाम दिया गया।

घटना के बाद पूरे इलाके में तनाव का माहौल है। पुलिस और प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी है तथा आरोपियों की तलाश में विशेष टीमों का गठन किया गया है। अधिकारियों का कहना है कि मामले की हर पहलू से जांच की जा रही है और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। 

इस सनसनीखेज हत्याकांड ने एक बार फिर प्रदेश में अवैध रेत खनन और उससे जुड़े आपराधिक नेटवर्क पर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि खनन को लेकर क्षेत्र में लंबे समय से विवाद चल रहा था, लेकिन इस तरह की हिंसक घटना ने पूरे जिले को झकझोर कर रख दिया है। 

मुख्य बिंदु:

  • कोरिया जिले में रेत खनन विवाद ने लिया हिंसक रूप।

  • तीन लोगों की मौत, दो गंभीर रूप से घायल।

  • भाजपा नेता को फॉर्च्यूनर में जिंदा जलाने का आरोप।

  • पुलिस ने इसे सुनियोजित हमला माना।

  • पुरानी रंजिश और खनन विवाद की जांच जारी।

सुशासन तिहार में सौम्य छवि के सीएम साय के दिखे सख्त तेवर

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सीएम ने लापरवाही पर सहायक आयुक्त को किया तत्काल सस्पेंड

सुशासन तिहार में शिकायत मिलने पर कोरिया के सहायक आयुक्त सहकारी संस्थाएं को किया सस्पेंड 

परीक्षा परिणाम अपेक्षानुसार नहीं आने पर भी सीएम ने जतायी नाराजगी

कलेक्टर को विस्तृत कार्य योजना बनाने के निर्देश

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने आज कोरिया जिले में सुशासन त्यौहार के दौरान शिकायत मिलने पर सहायक आयुक्त सहकारी संस्थाएं को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड करने के निर्देश दिए। सहायक आयुक्त आयुष प्रताप सिंह की कार्य में लापरवाही से संबंधित कई शिकायतें प्राप्त हुई थी , जिस पर जीरो टॉलरेंस दिखाते हुए मुख्यमंत्री ने उक्त कार्रवाई करने के निर्देश दिए.

सुशासन तिहार के दौरान मुख्यमंत्री ने विभिन्न विभागों की समीक्षा करते हुए प्रधानमंत्री आवास योजना के कार्यों में तेजी लाने के निर्देश भी दिए। उन्होंने कहा कि पात्र हितग्राहियों के आवास निर्माण कार्य शीघ्र पूर्ण कराए जाएं ताकि लोगों को योजनाओं का लाभ समय पर मिल सके।

इस दौरान मुख्यमंत्री ने शिक्षा व्यवस्था को लेकर भी नाराजगी जताई। परीक्षा परिणाम अपेक्षानुसार नहीं आने पर उन्होंने अप्रसन्नता व्यक्त करते हुए कलेक्टर को विस्तृत कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए। मुख्यमंत्री ने कहा कि शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना शासन की प्राथमिकता है और इसके लिए ठोस प्रयास किए जाने चाहिए।

चौपाल में मुख्यमंत्री ने आम लोगों की समस्याएं भी सुनीं और अधिकारियों को त्वरित निराकरण के निर्देश दिए।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के अपमान पर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने लिखा ममता बनर्जी को कड़ा पत्र

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संवैधानिक मर्यादाओं का सम्मान जरूरी: आदिवासी समाज और मातृशक्ति का अपमान देश कभी स्वीकार नहीं करेगा : मुख्यमंत्री

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को कड़ा पत्र लिखकर भारत की माननीय राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ हाल ही में हुए व्यवहार पर गहरी आपत्ति जताई है। 

मुख्यमंत्री साय ने कहा है कि जनजातीय समाज से आने वाली देश की प्रथम महिला राष्ट्रपति के साथ किया गया यह व्यवहार केवल एक व्यक्ति का नहीं बल्कि देश की सर्वोच्च संवैधानिक संस्था, आदिवासी समाज और मातृशक्ति का अपमान है।

मुख्यमंत्री साय ने अपने पत्र में कहा है कि भारत की लोकतांत्रिक परंपराएं और शिष्टाचार पूरी दुनिया में सम्मानित रहे हैं। मतभेद को कभी भी मनभेद में न बदलने की हमारी संस्कृति रही है, लेकिन राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च संवैधानिक पद के प्रति न्यूनतम शिष्टाचार का भी पालन न किया जाना लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस से ठीक पहले एक जनजातीय समाज से आने वाली महिला राष्ट्रपति के प्रवास के दौरान कार्यक्रम से जुड़ी व्यवस्थाओं में लापरवाही और उनका अपमान किया जाना अत्यंत निंदनीय और दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि यह घटना देश के करोड़ों आदिवासियों, पिछड़ों, दलितों और मातृशक्ति की भावनाओं को गहराई से आहत करने वाली है।

मुख्यमंत्री साय ने अपने पत्र में यह भी कहा कि यह पहली बार हुआ है जब किसी राज्य सरकार के व्यवहार को लेकर स्वयं राष्ट्रपति जी को अपनी पीड़ा सार्वजनिक करनी पड़ी है। उन्होंने कहा कि यह स्थिति देश के लोकतांत्रिक इतिहास में अत्यंत चिंताजनक है और इससे पश्चिम बंगाल जैसे प्रतिष्ठित राज्य की छवि को भी ठेस पहुंची है।

मुख्यमंत्री साय ने अपने पत्र में संदेशखाली की घटना का भी उल्लेख करते हुए कहा कि वहां भी जनजातीय समाज की महिलाओं के साथ हुई घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर दिया था। उन्होंने कहा कि वंचित और जनजातीय समाज के साथ इस प्रकार का व्यवहार किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने  ममता बनर्जी से आग्रह किया है कि वे इस विषय पर देश और समाज से क्षमा मांगते हुए अपनी भूल स्वीकार करें तथा भविष्य में लोकतांत्रिक संस्थाओं और संवैधानिक पदों के प्रति सम्मान बनाए रखने के लिए देश को आश्वस्त करें।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में राष्ट्रपति देश की सर्वोच्च संवैधानिक संस्था का प्रतीक हैं और उनके सम्मान से ही लोकतंत्र की गरिमा जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि किसी भी राजनीतिक मतभेद से ऊपर उठकर संवैधानिक पदों का सम्मान किया जाना चाहिए।

मुख्यमंत्री साय ने स्पष्ट कहा कि जनजातीय समाज से आने वाली राष्ट्रपति के सम्मान से जुड़ा यह विषय पूरे देश की अस्मिता और स्वाभिमान से जुड़ा हुआ है, इसलिए देश और समाज की भावनाओं का सम्मान करते हुए इस प्रकरण में जिम्मेदारी के साथ कदम उठाए जाना आवश्यक है।

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