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चुनाव आयोग के भीतर मतभेद की रिपोर्ट

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10 महीनों में 14 बार दर्ज हुई आपत्ति, मतदाता सूची और एसआईआर प्रक्रिया को लेकर उठे सवाल

नई दिल्ली- देश की चुनावी व्यवस्था से जुड़ी एक महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयोग के दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने पिछले करीब 10 महीनों में कम-से-कम 14 बार आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर औपचारिक रूप से आपत्ति दर्ज की।

रिपोर्ट के अनुसार, इन आपत्तियों का संबंध मुख्य रूप से मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाताओं के नाम जोड़ने-हटाने और मतदाता डेटा के डिजिटल प्रबंधन से है।

मामला क्या है?

चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ दो चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी हैं।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, संधू और जोशी ने कई मौकों पर यह आपत्ति दर्ज की कि आयोग के नाम पर कुछ फैसले या आदेश उनकी जानकारी अथवा मंजूरी के बिना लिए गए।

रिपोर्ट के अनुसार, चार आपत्तियां एक ही दिन दर्ज की गई थीं। दोनों आयुक्तों की आपत्तियां चुनावी प्रक्रिया के बेहद महत्वपूर्ण हिस्सों से जुड़ी थीं।

एसआईआर बना विवाद का मुख्य केंद्र

इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा एसआईआर यानी Special Intensive Revision है।

एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण करना है। इसमें मतदाता रिकॉर्ड की जांच की जाती है और पात्रता से संबंधित रिकॉर्ड को अपडेट किया जाता है।

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, बिहार से शुरू हुई यह प्रक्रिया बाद में देश के कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों तक पहुंची और इसके दौरान 13 करोड़ से अधिक नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची से हटाए गए। यह संख्या व्यापक मतदाता रिकॉर्ड की प्रारंभिक छंटाई से संबंधित है; इसे अंतिम रूप से मताधिकार खो चुके लोगों की संख्या के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए।

फॉर्म-6 में बदलाव पर आपत्ति

रिपोर्ट के मुताबिक, फॉर्म-6 में किए गए बदलाव को लेकर भी दोनों चुनाव आयुक्तों ने सवाल उठाए।

फॉर्म-6 का इस्तेमाल नए मतदाता के रूप में नाम दर्ज कराने के लिए किया जाता है।

रिपोर्ट के अनुसार, नए फॉर्म में आवेदक से यह जानकारी मांगी गई कि उसका, उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली एसआईआर की मतदाता सूची में था या नहीं।

सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कथित तौर पर इस बदलाव की वैधानिक प्रक्रिया पर आपत्ति जताई। संधू ने बाद में इसे “अनधिकृत और गैरकानूनी” बताते हुए हटाने की मांग की।

मतदाता डेटा के केंद्रीकरण पर भी सवाल

दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों में मतदाता सूची के डिजिटल सिस्टम का मुद्दा भी सामने आया।

रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग के डिजिटल सिस्टम ईसीआईनेट (ECINet) में मतदाता डेटा के प्रबंधन और राज्य स्तर के अधिकारियों की पहुंच को लेकर सवाल उठाए गए।

आयुक्तों ने कथित तौर पर चिंता जताई कि मतदाता सूची के डेटाबेस का संचालन धीरे-धीरे केंद्र स्तर पर अधिक केंद्रीकृत हो रहा है और इससे स्थानीय स्तर पर मतदाता सूची संभालने वाले अधिकारियों की भूमिका प्रभावित हो सकती है।

गोवा में 97 मतदाताओं का मामला

रिपोर्ट में गोवा का एक उदाहरण भी दिया गया है।

इसके अनुसार, 97 मतदाताओं के मामलों में स्थानीय चुनाव अधिकारियों ने दस्तावेजों की जांच के बाद उन्हें पात्र पाया, लेकिन संबंधित डिजिटल सिस्टम में उनके नाम बहाल करने की प्रक्रिया समय पर उपलब्ध नहीं हो सकी।

नतीजतन, ये 97 पात्र मतदाता अंतिम मतदाता सूची में शामिल नहीं हो सके।

यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे सवाल उठता है कि यदि जमीनी स्तर का अधिकारी किसी व्यक्ति को पात्र मानता है, तो डिजिटल प्रणाली में उस निर्णय को दर्ज और लागू करने की प्रक्रिया कितनी प्रभावी है।

चुनाव आयोग ने क्या कहा?

इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों ने आंतरिक मतभेद या विभाजन की धारणा को खारिज किया।

डेक्कन क्रॉनिकल की रिपोर्ट के मुताबिक, आयोग से जुड़े सूत्रों ने कहा कि एसआईआर सहित आयोग के सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं और दोनों चुनाव आयुक्तों तथा मुख्य चुनाव आयुक्त की मंजूरी से लिए गए हैं।

इसलिए इस खबर को समझते समय दोनों पक्षों को अलग-अलग देखना जरूरी है:

रिपोर्ट का दावा:
दो चुनाव आयुक्तों ने कई फैसलों पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं।

चुनाव आयोग का पक्ष:
आयोग के सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं।

इसका संवैधानिक महत्व क्या है?

चुनाव आयोग भारत की संवैधानिक संस्था है और इसका आधार संविधान का अनुच्छेद 324 है।

चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त शामिल होते हैं। 2023 के कानून के तहत आयोग के कामकाज में जहां तक संभव हो सर्वसम्मति से निर्णय लेने का प्रावधान है। यदि सदस्यों के बीच मतभेद हो तो कानून के अनुसार बहुमत से निर्णय लिया जा सकता है।

इसी वजह से दो चुनाव आयुक्तों द्वारा बार-बार लिखित आपत्ति दर्ज किए जाने की रिपोर्ट को चुनावी प्रशासन की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

निष्कर्ष

चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेद की यह रिपोर्ट इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि विवाद सीधे मतदाता सूची, नए मतदाताओं के पंजीकरण और चुनावी डेटा के प्रबंधन जैसे मूल चुनावी कार्यों से जुड़ा है। फिलहाल सार्वजनिक चर्चा में एक तरफ इंडियन एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट है, जबकि दूसरी तरफ चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों का यह कहना है कि उसके फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं।

SIR पर EC का बड़ा स्पष्टीकरण, अंदरूनी मतभेद की खबरें खारिज; कहा- सभी फैसले सर्वसम्मति से

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 नई दिल्ली। स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) को लेकर चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेद की खबरों पर आयोग ने स्पष्टीकरण जारी किया है। आयोग के आधिकारिक सूत्रों ने इन खबरों को खारिज करते हुए कहा कि SIR समेत सभी रणनीतिक और प्रशासनिक फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी की सहमति से लिए गए हैं।


आयोग के सूत्रों के मुताबिक, SIR से जुड़े फैसलों समेत निर्वाचन आयोग के सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं। आयोग ने कहा कि प्रत्येक फैसले पर मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों की लिखित मंजूरी और सहमति रही है।

किस रिपोर्ट के बाद आया आयोग का स्पष्टीकरण?

आयोग का यह बयान The Indian Express की 23 सितंबर को प्रकाशित एक रिपोर्ट के बाद आया। रिपोर्ट में दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों को लेकर कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कराईं।

रिपोर्ट के अनुसार, इन आपत्तियों में SIR, नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने और जोड़ने, फॉर्म-6 में बदलाव, मतदाता सूची से जुड़े मामलों में अपील तथा चुनावी डेटा तक पहुंच जैसे मुद्दे शामिल थे।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ फैसलों और आदेशों के संबंध में सवाल उठाया था कि क्या उन्हें उनकी जानकारी और मंजूरी के बिना जारी किया गया। इन आपत्तियों की प्रतियां CEC ज्ञानेश कुमार को भी भेजे जाने की बात रिपोर्ट में कही गई है।

चुनाव आयोग के भीतर फैसले लेने की व्यवस्था क्या है?

निर्वाचन आयोग तीन सदस्यीय संवैधानिक संस्था है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त होते हैं। आयोग की मौजूदा संरचना में ज्ञानेश कुमार CEC हैं, जबकि सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी चुनाव आयुक्त हैं।

2023 के कानून के तहत आयोग के कामकाज को जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से संचालित किए जाने का प्रावधान है। मतभेद की स्थिति में बहुमत के आधार पर निर्णय लेने की व्यवस्था भी है।

रिपोर्ट में किन मुद्दों का जिक्र?

The Indian Express की रिपोर्ट में फॉर्म-6 में कथित बदलाव, मतदाता सूची के डेटा के केंद्रीकरण और कुछ मामलों में मतदाता नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया को लेकर दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट में गोवा में 97 मतदाताओं से जुड़ी एक प्रक्रिया का भी जिक्र किया गया है, जहां स्थानीय स्तर पर पात्र पाए गए मतदाताओं से संबंधित फैसलों को सॉफ्टवेयर में दर्ज करने में समस्या आने की बात कही गई।

हालांकि, चुनाव आयोग के सूत्रों ने इन रिपोर्टों से अलग अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि आयोग के सभी फैसले तीनों सदस्यों की सहमति से ही लिए गए हैं।

विपक्षी दलों ने उठाए सवाल

रिपोर्ट सामने आने के बाद कांग्रेस, समाजवादी पार्टी समेत कई विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर सवाल उठाए। कांग्रेस ने CEC ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाए, जबकि सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने मामले को गंभीर बताते हुए चुनाव आयोग की स्वतंत्र कार्यप्रणाली को लेकर चिंता जताई।

वहीं, अन्य विपक्षी नेताओं ने भी SIR की प्रक्रिया और चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर सवाल उठाए हैं। ये राजनीतिक दलों के आरोप और प्रतिक्रियाएं हैं; चुनाव आयोग ने अपने आधिकारिक सूत्रों के माध्यम से आंतरिक मतभेद की खबरों को खारिज करते हुए सभी फैसलों को सर्वसम्मति से लिया जाना बताया है।

फिलहाल SIR को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर राजनीतिक और सार्वजनिक बहस जारी है। आयोग के स्पष्टीकरण और सामने आई मीडिया रिपोर्टों में दावों को लेकर अलग-अलग पक्ष सामने आए हैं।

ओडिशा की वोटर लिस्ट में बड़ा बदलाव—SIR के बाद 20.56 लाख नाम हटे, 2.90 लाख नए मतदाता जुड़े

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ओडिशा की वोटर लिस्ट में बड़ा बदलाव, 20.56 लाख नाम हटाए गए

भुवनेश्वर: ओडिशा में मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) की प्रक्रिया पूरी हो गई है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी एस. गोपालन के अनुसार, अंतिम मतदाता सूची में 20.56 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। 

अधिकारियों के मुताबिक, SIR की शुरुआत 30 मई 2026 को हुई थी। उस समय ओडिशा की मतदाता सूची में करीब 3.14 करोड़ मतदाता दर्ज थे। सत्यापन प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में ऐसे नाम सामने आए जिनमें मतदाता की मृत्यु हो चुकी थी, वे स्थायी रूप से दूसरे स्थान पर जा चुके थे या एक ही व्यक्ति के एक से अधिक रिकॉर्ड मौजूद थे। 

हटाए गए करीब 20.12 लाख नामों में लगभग 8.32 लाख मृत मतदाता, 8.08 लाख स्थायी रूप से स्थानांतरित मतदाता, करीब 2 लाख अनुपस्थित मतदाता और लगभग 1.58 लाख डुप्लीकेट प्रविष्टियां शामिल थीं।

इसके बाद ड्राफ्ट मतदाता सूची पर दावे और आपत्तियां मांगी गईं। अधिकारियों के अनुसार, इस चरण में कुछ और नाम हटाए गए, जबकि नए पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल भी किया गया। करीब 2.90 लाख नए नाम जोड़े गए, जिसके बाद अंतिम मतदाता सूची में कुल 3,16,32,754 मतदाता दर्ज हैं। 

निर्वाचन अधिकारी ने बताया कि अब SIR की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और मतदाता सूची का सामान्य अपडेट जारी रहेगा। जिन लोगों का नाम छूट गया है या जिन्हें अपने विवरण में सुधार कराना है, वे निर्धारित Form 6, Form 7 या Form 8 के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं। 

खास बात: 20.56 लाख नाम हटाए जाने का मतलब यह नहीं है कि सभी हटाए गए मतदाता गलत तरीके से सूची में थे; आधिकारिक विवरण में मृत्यु, स्थायी स्थानांतरण, अनुपस्थिति और डुप्लीकेट रिकॉर्ड जैसे अलग-अलग कारण बताए गए हैं।


नवा रायपुर में राज्य निर्वाचन आयुक्तों के 32वें अखिल भारतीय सम्मेलन का राज्यपाल रामेन डेका ने किया शुभारंभ

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Chhattisgarh Local Body Election Year Book- 2026 का किया विमोचन

रायपुर- छत्तीसगढ़ राज्य निर्वाचन आयुक्त अजय सिंह ने बताया कि हर वर्ष अलग-अलग राज्यों में होने वाले राज्य निर्वाचन आयुक्तगणों के सम्मेलन के क्रम में 32वां सम्मेलन इस वर्ष 16-17 सितम्बर को छत्तीसगढ़ की राजधानी नवा रायपुर अटल नगर में हो रहा है। इस सम्मेलन का आयोजन छत्तीसगढ़ राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा किया जा रहा है।

सम्मेलन का शुभारंभ आज माननीय राज्यपाल द्वारा किया गया। सम्मेलन के शुभारंभ अवसर पर मेजबान छत्तीसगढ़ के निर्वाचन आयुक्त अजय सिंह, राज्य निर्वाचन आयुक्तगण की स्थाई समिति के अध्यक्ष विजय देव एवं संयोजक सुधांशु पांडे तथा प्रदेश के मुख्य सचिव विकासशील उपस्थित रहे। शुभारंभ सहारोह के इस विशेष अवसर पर राज्यपाल रमेन डेका ने छत्तीसगढ़ स्थानीय निकाय निर्वाचन वार्षिकी 2026 Year Book के प्रथम संस्करण का विमोचन भी किया।

उद्घाटन उपरांत आज सम्मेलन में देशभर से विभिन्न राज्यों के पधारे राज्य निर्वाचन आयुक्तगण ने स्थानीय लोकतंत्र विशेषकर त्रिस्तरीय पंचायतों व नगरीय निकायों को और अधिक सशक्त, पारदर्शी, समावेशी, विश्वसनीय एवं सहभागी बनाने हेतु निर्वाचन के विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श किया एवं कॉन्फ्रेंस में अलग-अलग राज्यों के राज्य निर्वाचन आयुक्तगण और विषय-विशेषज्ञों के द्वारा प्रस्तुतीकरण दिया ।

सम्मेलन के दौरान राज्य निर्वाचन आयुक्तगण द्वारा स्थानीय निकाय निर्वाचन के संचालन में सामने आने वाली चुनौतियों, अनुभवों और नवाचारों को साझा करने के क्रम में छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा "राज्य गठन उपरांत नक्सल प्रभावित बस्तर में पिछले 25 वर्षों में स्थानीय लोकतंत्र की प्रगति" विषय पर छत्तीसगढ़ राज्य निर्वाचन आयुक्त अजय सिंह के निर्देशन में तैयार प्रस्तुति आयोग की सचिव  शिखा राजपूत तिवारी द्वारा प्रस्तुत की गई।

बस्तर में स्थानीय लोकतंत्र की यात्रा को विशेष रूप से रेखांकित किया गया। भौगोलिक दुर्गमता, विस्तृत वन क्षेत्र, सीमित संचार सुविधाओं तथा लंबे समय तक वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित बस्तर संभाग की परिस्थितियों के बीच स्थानीय निर्वाचन कराना एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक एवं लोकतांत्रिक चुनौती रहा है। छत्तीसगढ़ में स्थानीय निकायों के निर्वाचन के अनुभवों को साझा करते हुए बताया गया कि प्रशासन, पुलिस, सुरक्षा बल, निर्वाचन कर्मियों तथा स्थानीय समुदाय के समन्वित प्रयासों से लोकतांत्रिक प्रक्रिया को निरंतर सुदृढ़ किया गया है। वर्ष 2025 में नगरीय निकायों एवं त्रिस्तरीय पंचायतों के निर्वाचन एक साथ राज्यभर में, बस्तर संभाग सहित, शांतिपूर्वक एवं सफलतापूर्वक संपन्न कराने तथा पुनर्मतदान की आवश्यकता न पड़ने का उल्लेख किया गया।

मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान एवं केरलम की ओर से सूचना प्रोद्योगिकी के उपयोग के संबंध में 'EVM sharing tracking policy and it's challenges and EMS SOFTWARE' 'Panchayat Delimitation 2026: Transforming Delimitation through Technology A New Era of Paperless Delimitation', 'Digitalising Elections in India', 'Re-engineering elections in the Digital Era: The Kerala Story' विषयों पर प्रस्तुतियां दी गई।

सम्मेलन में लोकतांत्रिक निर्वाचन विषय से जुड़े प्रिंसटन यूनिवर्सिटी न्यू जर्सी अमेरिका के अंतर्राष्ट्रीय स्तर के विषय विशेषज्ञ ने भी हिस्सा लिया और उन्होंने भारत के राज्यों में होने वाले स्थानीय निर्वाचनों का तुलनात्मक एवं समेकित अध्ययन का सार प्रस्तुतीकरण के माध्यम से प्रस्तुत किया। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम इलेक्ट्रॉनिक कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया, हैदराबाद एवं भारत इलेक्ट्रानिक्स लिमिटेड, बेंगलूरु के ईलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन के विषय विशेषज्ञ ने भी सम्मेलन में अपने संस्थानों की अद्यतन जानकारी प्रस्तुत करते हुए बताया कि निर्वाचन में उपयोग होने वाली इलेक्ट्रानिक वोति वोटिंग मशीन हर प्रकार से सुरक्षित है और इसमें लगातार नवाचार करते हुए राज्य निर्वाचन आयोगों के अनुकूल इसका विकास एवं उत्पादन किया जा रहा है।

ईसीआई (ECI) ने नागरिकों से ECINet ऐप पर सुझाव मांगे, जनवरी 2026 में होगा आधिकारिक लॉन्च

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भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने सभी नागरिकों से अपील की है कि वे ECINet ऐप डाउनलोड करें और ऐप में उपलब्ध ‘Submit a Suggestion’ टैब के माध्यम से अपने सुझाव भेजें। सुझाव भेजने की अवधि 27 नवंबर 2025 से 27 दिसंबर 2025 तक निर्धारित की गई है।

बिहार चुनाव में रहा सफल ट्रायल

ECINet ऐप का ट्रायल वर्ज़न बिहार विधानसभा चुनाव 2025 और हालिया उपचुनावों में सफलतापूर्वक उपयोग किया गया। इस नए डिजिटल प्लेटफॉर्म ने—

  • बेहतर वोटर सर्विसेज,

  • मतदान प्रतिशत ट्रेंड की तेज उपलब्धता,

  • और मतदान समाप्ति के 72 घंटे के भीतर इंडेक्स कार्ड जारी करने जैसी सुविधाएँ प्रदान कीं।

पहले यह प्रक्रिया कई हफ्तों या महीनों तक चलती थी। ट्रायल से मिले अनुभवों और CEO, DEO, ERO, प्रेक्षकों व फील्ड अधिकारियों के फीडबैक को अब ऐप को और मजबूत बनाने के लिए शामिल किया जा रहा है।

और अधिक यूज़र-फ्रेंडली बनेगा प्लेटफ़ॉर्म

निर्वाचन आयोग ने बताया कि नागरिकों के सुझावों की समीक्षा की जाएगी और प्लेटफ़ॉर्म को आगे और यूज़र-फ्रेंडली तथा फीचर-रिच बनाया जाएगा। ऐप का आधिकारिक लॉन्च जनवरी 2026 में प्रस्तावित है।

एकीकृत चुनाव ऐप: 40 एप्लिकेशन एक में

ECINet ऐप एक सिंगल यूनिफाइड प्लेटफॉर्म है, जिसमें पहले अलग-अलग उपयोग होने वाली लगभग 40 चुनाव-संबंधी ऐप्स/वेबसाइट्स को एकीकृत किया गया है। इनमें शामिल हैं—

  • Voter Helpline App (VHA)

  • cVIGIL

  • Saksham

  • Polling Trends (Voter Turnout App)

  • Know Your Candidate (KYC)
    आदि।

ऐप Google Play Store और Apple App Store दोनों पर उपलब्ध है।

 CEC के नेतृत्व में बड़ा डिजिटल सुधार

यह ऐप आयोग की उन प्रमुख पहलों में से एक है, जिन्हें मुख्य निर्वाचन आयुक्त श्री ज्ञानेश कुमार, तथा निर्वाचन आयुक्त डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी के नेतृत्व में विकसित किया गया है। ऐप के विकास पर काम 4 मई 2025 को घोषणा के तुरंत बाद प्रारंभ किया गया था।


बड़ी खबर-बिहार विधानसभा चुनाव और उपचुनावों के लिए निर्वाचन आयोग ने प्रेक्षकों को दी ब्रीफिंग

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नई दिल्ली- भारत निर्वाचन आयोग ने आज आगामी बिहार विधानसभा आम चुनाव और विभिन्न राज्यों में होने वाले उपचुनावों के लिए नियुक्त किए जाने वाले केन्द्रीय प्रेक्षकों की ब्रीफिंग आयोजित की। यह बैठक नई दिल्ली स्थित भारतीय निर्वाचन प्रबंधन संस्थान (IIIDEM) में हुई।

कुल 425 अधिकारी इस ब्रीफिंग में शामिल हुए, जिनमें 287 आईएएस, 58 आईपीएस और 80 अधिकारी आईआरएस/आईआरएएस/आईसीएएस व अन्य सेवाओं से थे।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार, निर्वाचन आयुक्त डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी ने प्रेक्षकों को संबोधित किया। सीईसी ज्ञानेश कुमार ने प्रेक्षकों को "लोकतंत्र का प्रकाशस्तंभ" बताते हुए कहा कि वे आयोग की “आंख और कान” हैं।

प्रेक्षकों को निर्देश दिया गया कि वे—

  • चुनावी कानूनों, नियमों और दिशा-निर्देशों से पूरी तरह परिचित हों।

  • निष्पक्षता और सख्ती के साथ नियमों का पालन कराएं।

  • राजनीतिक दलों, प्रत्याशियों और मतदाताओं की शिकायतों के समाधान के लिए सुलभ रहें।

  • मतदान केंद्रों का दौरा कर हाल ही में आयोग द्वारा मतदाताओं की सुविधा हेतु उठाए गए कदमों के क्रियान्वयन की निगरानी करें।

निर्वाचन आयोग संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 20B के तहत केंद्रीय प्रेक्षकों की नियुक्ति करता है। ये प्रेक्षक आयोग की मदद से चुनावों को स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने के साथ-साथ मैदान स्तर पर चुनाव प्रक्रिया के प्रभावी प्रबंधन की देखरेख करते हैं।


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