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अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026 की तैयारियों को लेकर आयुष मंत्रालय की अहम बैठक

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नई दिल्ली में आज आयुष मंत्रालय द्वारा अंतर-मंत्रालयी समिति (IMC) की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के वरिष्ठ अधिकारी, योग गुरु तथा योग संस्थाओं के प्रतिनिधि शामिल हुए। बैठक का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय योग दिवस (IDY) 2026 के सफल आयोजन के लिए योजना और समन्वित क्रियान्वयन पर चर्चा करना था।

बैठक की अध्यक्षता केंद्रीय आयुष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने की। उन्होंने कहा कि योग आज केवल एक अभ्यास नहीं बल्कि जन-आंदोलन बन चुका है, जो लोगों को स्वस्थ जीवनशैली की ओर प्रेरित कर रहा है।

उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2015 से अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 190 से अधिक देशों में मनाया जा रहा है, जिससे योग को वैश्विक पहचान मिली है।

मंत्री ने सभी मंत्रालयों से “whole-of-government approach” अपनाने का आह्वान करते हुए 21 जून को होने वाले कॉमन योग प्रोटोकॉल में अधिकतम भागीदारी सुनिश्चित करने, स्कूलों, कार्यस्थलों और स्वास्थ्य संस्थानों में योग को शामिल करने, ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों तक पहुंच बढ़ाने और डिजिटल माध्यमों का उपयोग करने पर जोर दिया।

विदेश मंत्रालय के सचिव (पश्चिम) Sibi George ने कहा कि दुनिया भर में भारतीय दूतावास और मिशन IDY 2026 के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। उन्होंने जापान में चल रहे योग अभ्यास कार्यक्रम का भी उल्लेख किया, जिसमें लोगों की अच्छी भागीदारी देखने को मिली है।

आयुष मंत्रालय के सचिव राजेश कोटेचा ने कहा कि योग भारत की सांस्कृतिक धरोहर होने के साथ-साथ अब एक वैश्विक स्वास्थ्य अभियान बन चुका है।

वहीं एच. आर. नागेंद्र ने बताया कि पिछले वर्ष 26 करोड़ से अधिक लोगों ने योग दिवस में भाग लिया था और इस वर्ष यह संख्या 30 करोड़ से पार जाने की उम्मीद है।

बैठक में IDY 2026 के लिए विभिन्न योजनाओं, गतिविधियों और रणनीतियों पर विस्तृत चर्चा की गई। इसमें युवाओं की भागीदारी, डिजिटल पहुंच और राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों के साथ समन्वय पर विशेष जोर दिया गया।

आयुष मंत्रालय ने विश्वास जताया कि समन्वित प्रयासों और व्यापक भागीदारी के साथ अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026 को और भी भव्य और सफल बनाया जाएगा।

चिंतन शिविर–2026 का समापन, आयुष क्षेत्र को सशक्त बनाने पर जोर

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नई दिल्ली: प्रतापराव जाधव, केंद्रीय आयुष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) ने दो दिवसीय चिंतन शिविर–2026 के समापन सत्र की अध्यक्षता की। इस राष्ट्रीय स्तर के आयोजन का उद्देश्य आयुष क्षेत्र में नीति, शासन और क्रियान्वयन को मजबूत करना था।

अपने संबोधन में मंत्री ने कहा कि आयुष केवल उपचार पद्धति नहीं, बल्कि एक समग्र स्वास्थ्य और जीवनशैली का दृष्टिकोण है, जो विशेष रूप से जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

उन्होंने आयुष को मुख्यधारा की स्वास्थ्य सेवाओं के साथ एकीकृत करने, साक्ष्य-आधारित अनुसंधान को बढ़ावा देने और डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसे आयुष ग्रिड व टेलीमेडिसिन के उपयोग को बढ़ाने पर जोर दिया।

कार्यक्रम के दूसरे दिन नीति समन्वय और मंत्रालयों के बीच सहयोग पर चर्चा हुई। इस दौरान विनोद पॉल,पुण्य सलिला श्रीवास्तवऔर प्रीति सूदन जैसे वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया।

विनोद पॉल ने आधुनिक चिकित्सा और आयुष के एकीकरण के माध्यम से सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज हासिल करने की बात कही। वहीं, पुन्या सलिला श्रीवास्तव ने आयुष को राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों में शामिल करने और डिजिटल हेल्थ सिस्टम के उपयोग पर जोर दिया।

आयुष मंत्रालय के सचिव वैद्य राजेश कोटेचा ने कहा कि यह शिविर भविष्य की रणनीतियों के लिए एक महत्वपूर्ण मंच साबित हुआ है, जिससे आयुष क्षेत्र को और सशक्त बनाया जाएगा।

इस अवसर पर कई महत्वपूर्ण पहलें भी शुरू की गईं, जिनमें आयुष उपचार के लिए बीमा कवरेज बढ़ाने हेतु समझौता, मंत्रालय का व्हाट्सएप चैनल लॉन्च, आयुष बीमा दरों का दस्तावेज जारी करना और हेल्पलाइन नंबर 1800-11-0008 की शुरुआत शामिल है।

कार्यक्रम में उद्यमिता, कौशल विकास, डिजिटल लर्निंग प्लेटफॉर्म और मीडिया रणनीतियों पर भी चर्चा की गई, ताकि आयुष को एक प्रभावी और विश्वसनीय स्वास्थ्य प्रणाली के रूप में स्थापित किया जा सके।

दो दिवसीय चिंतन शिविर में नीति निर्धारकों, विशेषज्ञों और हितधारकों ने शिक्षा, अनुसंधान, सेवा वितरण, डिजिटलाइजेशन और जनसंपर्क जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श किया।

शिविर का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि आयुष क्षेत्र को सशक्त बनाकर 2047 तक स्वस्थ और विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल किया जाएगा।


‘योग 365’ पहल की शुरुआत: अंतरराष्ट्रीय योग दिवस को दैनिक जीवन से जोड़ने की दिशा में बड़ा कदम

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नई दिल्ली- योग को एक दिन के उत्सव से आगे बढ़ाकर दैनिक जीवन का हिस्सा बनाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने ‘योग 365’ नामक एक महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय अभियान की शुरुआत की है। इस पहल का लक्ष्य देशभर में लोगों को साल के 365 दिनों तक नियमित रूप से योग अपनाने के लिए प्रेरित करना है।

इस अभियान की घोषणा प्रतापराव जाधव, आयुष मंत्रालय के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) ने की। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर योग दिवस ने व्यापक जागरूकता पैदा की है, लेकिन अब समय आ गया है कि इस जागरूकता को नियमित अभ्यास में बदला जाए।

‘योग 365’ पहल का औपचारिक शुभारंभ Yoga Mahotsav–2026 के दौरान किया गया, जो 2026 के योग दिवस के लिए 100 दिन की उलटी गिनती का प्रतीक है। इस अवसर पर मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान (MDNIY) ने Habuild के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किया, जिसके तहत देशभर में लोगों के लिए निःशुल्क दैनिक ऑनलाइन योग सत्र उपलब्ध कराए जाएंगे।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में योग के प्रति जागरूकता काफी अधिक है—ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 95 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 96 प्रतिशत लोग योग के बारे में जानते हैं। हालांकि, नियमित रूप से योग करने वालों की संख्या अपेक्षाकृत कम है। ‘योग 365’ अभियान का उद्देश्य इसी अंतर को पाटना है।

आयुष मंत्रालय के सचिव वैद्य राजेश कोटेचा ने बताया कि यह पहल योग को अधिक सुलभ, व्यावहारिक और दैनिक स्वास्थ्य का हिस्सा बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। वहीं, संयुक्त सचिव मोनालिसा डैश ने कहा कि यह अभियान समुदायों, संस्थानों और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से व्यापक जनभागीदारी सुनिश्चित करेगा।

इस पहल के तहत योग को स्कूलों, कार्यालयों, सामुदायिक समूहों और डिजिटल माध्यमों से जोड़ने की योजना है। साथ ही, Y-Break, कॉमन योग प्रोटोकॉल और रोगों के लिए विशेष योग कार्यक्रमों के माध्यम से इसे जीवनशैली का हिस्सा बनाने पर जोर दिया जाएगा।

गौरतलब है कि 2015 में शुरू हुआ अंतरराष्ट्रीय योग दिवस अब एक वैश्विक जनआंदोलन बन चुका है, जिसमें हर वर्ष करोड़ों लोग भाग लेते हैं। वर्ष 2025 में ही 26 करोड़ से अधिक लोगों की भागीदारी ने इसकी लोकप्रियता को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।

‘योग 365’ इसी आंदोलन का अगला चरण है, जिसका उद्देश्य स्पष्ट है—

योग को एक दिन की गतिविधि से आगे बढ़ाकर, हर दिन की स्वस्थ आदत बनाना।

आयुष को सशक्त बनाने वाला बजट, समग्र स्वास्थ्य व्यवस्था की दिशा में ऐतिहासिक कदम : प्रतापराव जाधव

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माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं माननीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा आयुष पारिस्थितिकी तंत्र को सशक्त बनाने वाले परिवर्तनकारी बजट घोषणाओं के लिए हृदय से आभार व्यक्त करते हुए, केंद्रीय आयुष एवं स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार)प्रतापराव जाधव ने इन घोषणाओं को भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों के लिए एक बड़ा प्रोत्साहन बताया।

आयुष मंत्री ने बजट को “दूरदर्शी और भविष्य उन्मुख” बताते हुए कहा कि ये उपाय एक समग्र, समावेशी और वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी स्वास्थ्य प्रणाली के निर्माण के लिए सरकार की अटूट प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं, जिसमें आयुष एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में उभर रहा है।

अपने बजट भाषण में माननीय वित्त मंत्री ने आयुष क्षेत्र में शिक्षा, अनुसंधान, गुणवत्ता आश्वासन, वैश्विक नेतृत्व, मेडिकल वैल्यू टूरिज़्म तथा कुशल मानव संसाधन विकास को विस्तार देने हेतु कई ऐतिहासिक पहलों की घोषणा की। ये कदम पारंपरिक चिकित्सा को निवारक स्वास्थ्य सेवा, आर्थिक विकास और वैश्विक वेलनेस नेतृत्व का प्रमुख चालक बनाने की भारत की आकांक्षा को सुदृढ़ करते हैं।

बजट का एक ऐतिहासिक पहलू तीन नए अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थानों (AIIA) की स्थापना का प्रस्ताव है, जिससे उच्च गुणवत्ता वाली स्नातक एवं स्नातकोत्तर शिक्षा, उन्नत अनुसंधान और तृतीयक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार होगा। मौजूदा राष्ट्रीय संस्थानों की सफलता के आधार पर, ये संस्थान शैक्षणिक मानकों को ऊंचा उठाने और साक्ष्य-आधारित एकीकृत चिकित्सा को सुदृढ़ करने में सहायक होंगे।

बजट में आयुष फार्मेसियों एवं औषधि परीक्षण प्रयोगशालाओं को उच्च प्रमाणन मानकों के अनुरूप उन्नत करने का भी प्रस्ताव है। इससे उत्पाद गुणवत्ता, उपभोक्ता विश्वास और निर्यात क्षमता को बढ़ावा मिलेगा, साथ ही औषधीय पौधों की खेती करने वाले किसानों और प्रसंस्करण एवं विनिर्माण से जुड़े एमएसएमई को समर्थन मिलेगा।

भारत के वैश्विक नेतृत्व को और मजबूत करते हुए, जामनगर स्थित डब्ल्यूएचओ वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा केंद्र को उन्नत किया जाएगा, जिससे अनुसंधान सहयोग, अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण और नीति संवाद को गहराई मिलेगी। इससे भारत पारंपरिक चिकित्सा के लिए वैश्विक ज्ञान केंद्र के रूप में स्थापित होगा।

आर्थिक एकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में, प्रस्तावित पाँच क्षेत्रीय मेडिकल वैल्यू टूरिज़्म हब में आयुष केंद्रों को शामिल किया जाएगा। ये केंद्र उन्नत चिकित्सा उपचार के साथ पारंपरिक उपचार, वेलनेस सेवाओं और पुनर्वास सहायता को जोड़ते हुए एकीकृत स्वास्थ्य गंतव्य के रूप में विकसित होंगे। इससे आयुष चिकित्सकों, थैरेपिस्टों, योग प्रशिक्षकों और संबद्ध पेशेवरों के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर सृजित होंगे।

इसके अतिरिक्त, एनएसक्यूएफ से संरेखित केयरगिवर प्रशिक्षण कार्यक्रमों में योग और वेलनेस कौशल को शामिल किया गया है, जिसके तहत आगामी वर्ष में 1.5 लाख केयरगिवरों को प्रशिक्षित किया जाएगा। इससे आयुष से जुड़े कौशल केयर इकॉनमी में मुख्यधारा में आएंगे और निवारक तथा जेरियाट्रिक देखभाल सेवाएं सशक्त होंगी।

प्रतापराव जाधव ने कहा कि पिछले एक दशक में माननीय प्रधानमंत्री के नेतृत्व में आयुष क्षेत्र ने अभूतपूर्व संस्थागत विस्तार, वैश्विक मान्यता, डिजिटल विस्तार और अनुसंधान प्रगति देखी है। उन्होंने कहा, “यह बजट उसी मजबूत आधार पर आगे बढ़ते हुए विस्तार से समेकन, गुणवत्ता संवर्धन और वैश्विक एकीकरण की ओर ले जाता है। यह एक निर्णायक क्षण है, जहां पारंपरिक चिकित्सा को पूरक नहीं, बल्कि भारत के स्वास्थ्य भविष्य का अभिन्न अंग माना जा रहा है।”

आर्थिक प्रभाव पर जोर देते हुए मंत्री ने कहा कि ये घोषणाएं स्वास्थ्य नीति को ग्रामीण आजीविका, निर्यात वृद्धि, युवा रोजगार और उद्यमिता से जोड़ती हैं, जिससे भारत के साक्ष्य-आधारित समग्र स्वास्थ्य देखभाल के वैश्विक केंद्र के रूप में उभरने को बल मिलता है।

उन्होंने माननीय प्रधानमंत्री और माननीय वित्त मंत्री के प्रति उनके निरंतर समर्थन और दूरदर्शी दृष्टिकोण के लिए पुनः आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह बजट एक स्वस्थ, आत्मनिर्भर और वैश्विक रूप से सम्मानित भारत के लिए एकीकृत स्वास्थ्य सेवा को संस्थागत स्वरूप देने की दिशा में निर्णायक कदम है।


उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने चेन्नई के कलैवनार अरंगम में 9वें सिद्धा दिवस समारोह का उद्घाटन किया

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भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने आज चेन्नई के कलैवनार अरंगम में 9वें सिद्धा दिवस समारोह का उद्घाटन किया। इस अवसर पर उन्होंने सिद्धा चिकित्सा पद्धति को समकालीन विश्व में एक समग्र, निवारक एवं सतत स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली के रूप में इसकी प्रासंगिकता पर बल दिया। नीति-निर्माताओं, चिकित्सकों, शिक्षाविदों एवं विद्यार्थियों की विशिष्ट सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने सिद्धा की सुदृढ़ दार्शनिक नींव, वैज्ञानिक गहराई तथा शरीर, मन और प्रकृति के समन्वित दृष्टिकोण को रेखांकित किया।

अपने संबोधन में उपराष्ट्रपति ने कहा कि सिद्धा, आयुर्वेद, योग सहित भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियाँ केवल अतीत की धरोहर नहीं हैं, बल्कि जीवंत परंपराएँ हैं जो आज भी भारत और विश्वभर में करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य और कल्याण में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। उन्होंने कहा कि सिद्धा चिकित्सा देश की सबसे प्राचीन और गहन चिकित्सा परंपराओं में से एक है, जिसकी जड़ें हजारों वर्षों में संचित ज्ञान में निहित हैं, और जो शरीर, मन एवं प्रकृति के बीच सामंजस्य को बढ़ावा देती है।

प्राचीन ताड़पत्र पांडुलिपियों, शास्त्रीय ग्रंथों एवं औषधीय वनस्पतियों पर आधारित प्रदर्शनी और प्रस्तुतियों की सराहना करते हुए उपराष्ट्रपति ने भारत की पारंपरिक चिकित्सा विरासत के संरक्षण और पुनः अन्वेषण में लगे विद्वानों एवं संस्थानों के असाधारण प्रयासों की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक उपेक्षा और अपर्याप्त दस्तावेजीकरण के कारण अनेक अमूल्य ग्रंथों के क्षरण या लुप्त होने का खतरा उत्पन्न हो गया था, और भावी पीढ़ियों के लिए इस ज्ञान को सुरक्षित रखने हेतु व्यवस्थित संग्रह, संरक्षण एवं अनुसंधान की निरंतर आवश्यकता पर बल दिया।

उपराष्ट्रपति ने सिद्धा चिकित्सा में निवारक देखभाल, जीवनशैली प्रबंधन और रोगों के मूल कारणों पर उपचार के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि तनाव और अस्वास्थ्यकर आदतों से परिपूर्ण आज की तेज़-रफ्तार जीवनशैली में इसकी प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। आधुनिक चिकित्सा द्वारा निदान के क्षेत्र में हुई प्रगति को स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा कि सिद्धा जैसी पारंपरिक प्रणालियाँ दीर्घकालिक उपचार और संतुलन की पुनर्स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, और चिकित्सकों से जिम्मेदार एवं साक्ष्य-आधारित अभ्यास के माध्यम से जनविश्वास सुदृढ़ करने का आह्वान किया।

युवा शोधार्थियों और विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करते हुए उपराष्ट्रपति ने विश्वास व्यक्त किया कि सिद्धा चिकित्सा में सतत अनुसंधान से भविष्य में बड़े वैज्ञानिक नवाचार संभव हैं, जिनमें वर्तमान में असाध्य माने जाने वाले रोगों के स्थायी उपचार भी शामिल हो सकते हैं। उन्होंने अनुसंधानकर्ताओं को निर्बाध अध्ययन के लिए समुचित वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर बल दिया तथा आशा व्यक्त की कि आने वाली पीढ़ियाँ भारत की पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान प्रणालियों को वैश्विक पहचान दिलाएंगी।

उद्घाटन समारोह में आयुष मंत्रालय के स्वतंत्र प्रभार राज्य मंत्री तथा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव; तमिलनाडु सरकार के स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा एवं परिवार कल्याण मंत्रीमा. सुब्रमणियन; आयुष मंत्रालय एवं तमिलनाडु सरकार के वरिष्ठ अधिकारी तथा सिद्धा संस्थानों के प्रमुख उपस्थित थे।

सभा को संबोधित करते हुए प्रतापराव जाधव ने कहा कि सिद्धा चिकित्सा स्वास्थ्य, प्रकृति और चेतना की उन्नत समझ को समाहित करती है, जिससे यह आधुनिक समग्र स्वास्थ्य देखभाल के लिए अत्यंत प्रासंगिक बनती है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में, विशेषकर 2014 में आयुष मंत्रालय की स्थापना के बाद, भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों ने अभूतपूर्व प्रगति की है।

मंत्री ने सिद्धा शिक्षा एवं अनुसंधान में प्राप्त महत्वपूर्ण उपलब्धियों का उल्लेख किया, जिनमें राष्ट्रीय सिद्धा संस्थान में अवसंरचना विस्तार, कौशल-आधारित एवं प्रौद्योगिकी-सक्षम प्रशिक्षण कार्यक्रम तथा केंद्रीय सिद्धा अनुसंधान परिषद द्वारा किए गए सशक्त अनुसंधान कार्य शामिल हैं। उन्होंने बताया कि डब्ल्यूएचओ की ICD-11 में सिद्धा रुग्णता कोड्स का समावेश तथा आगामी डब्ल्यूएचओ अंतरराष्ट्रीय मानक शब्दावलियाँ सिद्धा को वैश्विक स्वास्थ्य मानचित्र पर सुदृढ़ रूप से स्थापित करेंगी।

वैश्विक पहुंच पर प्रकाश डालते हुए मंत्री ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग, डब्ल्यूएचओ के नेतृत्व वाली पहलों और अकादमिक आदान-प्रदान का उल्लेख किया, जिनसे सिद्धा की वैश्विक उपस्थिति सशक्त हुई है। उन्होंने सिद्धा को साक्ष्य-आधारित, वैश्विक रूप से मान्य और सभी के लिए सुलभ बनाने के साथ-साथ इसकी शास्त्रीय शुद्धता को बनाए रखने के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई।

इस अवसर पर सिद्धा चिकित्सा पद्धति में असाधारण एवं सराहनीय योगदान देने वाले पाँच विशिष्ट व्यक्तियों को सम्मानित किया गया। सम्मानित विभूतियों में डॉ. बी. माइकल जेयराज, डॉ. टी. कन्नन राजाराम, स्वर्गीय डॉ. आई. सोरनामारियम्मल, डॉ. मोहन राज तथा प्रो. डॉ. वी. बनुमति शामिल हैं, जिनकी आजीवन सेवा, अनुसंधान, पांडुलिपि संरक्षण, शिक्षा एवं नेतृत्व ने सिद्धा चिकित्सा को जमीनी, अकादमिक और राष्ट्रीय स्तर पर सुदृढ़ किया है।

“वैश्विक स्वास्थ्य के लिए सिद्धा” विषय पर आयोजित इस कार्यक्रम में देशभर से सिद्धा चिकित्सक, वैज्ञानिक, शिक्षाविद, शोधार्थी और विद्यार्थी एकत्र हुए। यह आयोजन अनुसंधान, शिक्षा, नवाचार और वैश्विक सहभागिता के माध्यम से सिद्धा चिकित्सा को प्रोत्साहित करने तथा इसे राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणालियों का अभिन्न अंग बनाने के प्रति आयुष मंत्रालय की प्रतिबद्धता को पुनः पुष्ट करता है।


आयुष मंत्रालय ने WHO ग्लोबल समिट ऑन ट्रेडिशनल मेडिसिन 2025 का कर्टेन रेज़र किया; 100+ देशों की भागीदारी, भारत फिर बनेगा वैश्विक केंद्र

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आयुष मंत्रालय ने आज नई दिल्ली स्थित नेशनल मीडिया सेंटर में द्वितीय WHO ग्लोबल समिट ऑन ट्रेडिशनल मेडिसिन (17–19 दिसंबर 2025, भारत मंडपम) के लिए कर्टेन रेज़र प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की।

जनस्वास्थ्य में पारंपरिक चिकित्सा की वैश्विक भूमिका को सुदृढ़ करेगा समिट: आयुष मंत्री

आयुष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) प्रतापराव जाधव ने गर्व व्यक्त किया कि भारत 2023 में गुजरात में पहली सफल मेजबानी के बाद एक बार फिर इस वैश्विक समिट की मेजबानी कर रहा है। उन्होंने कहा कि यह समिट पारंपरिक चिकित्सा को मुख्यधारा में लाने का एक महत्वपूर्ण कदम है, जो भारत की दृष्टि "सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः" को साकार करता है।

इस वर्ष समिट की थीम है—

“Restoring Balance: The Science and Practice of Health and Well-being”

इसमें 100 से अधिक देशों के मंत्री, नीति-निर्माता, स्वास्थ्य विशेषज्ञ, शोधकर्ता, उद्योग प्रतिनिधि व पारंपरिक चिकित्सा विशेषज्ञ भाग लेंगे।

Ashwagandha पर विशेष कार्यक्रम

मंत्री ने बताया कि आयुष मंत्रालय अश्वगंधा पर एक विशेष साइड इवेंट आयोजित करेगा, जिसमें इसके पारंपरिक व आधुनिक उपयोगों, वैज्ञानिक प्रमाणों और वैश्विक प्रभाव पर चर्चा होगी।

भारत की बढ़ती वैश्विक नेतृत्व भूमिका

जाधव ने कहा कि आयुर्वेद, योग–नौचिकित्सा, यूनानी, सिद्ध, सोवा-रिग्पा और होम्योपैथी विश्वभर में भरोसेमंद स्वास्थ्य समाधान के रूप में उभर रहे हैं।
जामनगर, गुजरात में WHO ग्लोबल ट्रेडिशनल मेडिसिन सेंटर की स्थापना इसका प्रमाण है।

WHO की वरिष्ठ सलाहकार डॉ. पूनम खेतरपाल ने कहा—समिट बनेगा वैश्विक रोडमैप

WHO की वरिष्ठ सलाहकार और SEARO की पूर्व क्षेत्रीय निदेशक, डॉ. पूनम खेतरपाल ने कहा कि यह समिट पारंपरिक, पूरक व स्वदेशी चिकित्सा प्रणालियों को राष्ट्रीय स्वास्थ्य तंत्र में वैज्ञानिक व संतुलित रूप से जोड़ने के लिए 10-वर्षीय वैश्विक रोडमैप तय करेगा।

उन्होंने कहा कि दुनिया में अरबों लोग आज भी पारंपरिक चिकित्सा पर निर्भर हैं, इसलिए शोध, नवाचार और नियमन को मजबूत करना अत्यंत आवश्यक है।

Ashwagandha पर 3-दिवसीय विशेषज्ञ सत्र

17–19 दिसंबर के दौरान आयोजित
“Ashwagandha: From Traditional Wisdom to Global Impact”
सत्र में वैश्विक विशेषज्ञ इसके तनाव-निरोधी, न्यूरो-प्रोटेक्टिव, और इम्यूनो-मॉड्यूलेटरी गुणों पर चर्चा करेंगे।

PM करेंगे समिट के समापन कार्यक्रम में शिरकत

मंत्री ने बताया कि इस ऐतिहासिक समिट के समापन सत्र में भारत के प्रधानमंत्री भी उपस्थित रहेंगे।

उच्च स्तरीय अधिकारियों की उपस्थिति

प्रेस कॉन्फ्रेंस में सचिव (आयुष) वैद्य राजेश कोटेचा, PIB के प्रमुख महानिदेशक धीरेंद्र ओझा, तथा आयुष मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

भारत ने समिट की आधिकारिक काउंटडाउन की शुरुआत की

आज का कर्टेन रेज़र कार्यक्रम 9–10 नवंबर 2025 को आयोजित राजनयिक स्वागत समारोह के बाद आयोजित किया गया, जिसमें WHO–India सहयोग और समिट के वैश्विक महत्व पर चर्चा हुई थी।

कर्टेन रेज़र के साथ ही भारत ने द्वितीय WHO ग्लोबल समिट ऑन ट्रेडिशनल मेडिसिन की उल्टी गिनती शुरू कर दी है, और वैश्विक स्तर पर समग्र, समावेशी एवं सतत स्वास्थ्य सेवा को बढ़ावा देने के अपने संकल्प को पुनः सुदृढ़ किया है।


आयुर्वेद नवाचार को नई दिशा: सिद्धि 2.0 राष्ट्रीय सम्मेलन शुरू

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आयुष मंत्रालय के अंतर्गत केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (CCRAS) ने आज विजयवाड़ा में अपने प्रमुख उद्योग–अनुसंधान इंटरफ़ेस कार्यक्रम सिद्धि 2.0 (Scientific Innovation in Drug Development, Healthcare & Integration) का दूसरा संस्करण लॉन्च किया। यह दो-दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन क्षेत्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान (RARI), विजयवाड़ा द्वारा, भारतीय उद्योग परिसंघ (CII), विजयवाड़ा ज़ोन के सहयोग से आयोजित किया गया है।

कार्यक्रम का शुभारंभ एक औपचारिक उद्घाटन सत्र से हुआ, जिसमें प्रो. वैद्य रबीनारायण आचार्य, महानिदेशक, CCRAS;के. दिनेश कुमार, IAS, निदेशक (आयुष), आंध्र प्रदेश सरकार; डॉ. एन. श्रीकांत, उप महानिदेशक, CCRAS; किरण भूपतिराजू, CEO, Laila Nutra Pvt. Ltd. एवं Chemiloids Life Sciences Pvt. Ltd.; डॉ. वी. नागलक्ष्मी, चेयरपर्सन, CII विजयवाड़ा ज़ोन; और डॉ. बी. वेंकटेश्वरलु, सहायक निदेशक (I/c), RARI विजयवाड़ा शामिल थे।

उद्घाटन समारोह में CCRAS ने अपनी औषधि-ऐतिहासिक पुस्तक “Evolution of Ayurveda, Siddha & Unani Drug Regulations in India” तथा Drug Inventory Management System पोर्टल जारी किया। यह सम्मेलन आयुर्वेद के वैज्ञानिक, औद्योगिक और वाणिज्यिक पारिस्थितिकी तंत्र को आगे बढ़ाने के लिए एक प्रमुख राष्ट्रीय मंच के रूप में स्थापित किया गया है।

PRAGATI-2024 (Pharma Research in Ayurgan and Techno-Innovation) की गति को आगे बढ़ाते हुए, सिद्धि 2.0 अनुसंधान-आधारित उत्पाद विकास, स्वदेशी प्रौद्योगिकी उन्नति, तेज़ ट्रांसलेशनल पाथवे और उद्योग साझेदारी की दिशा में एक रणनीतिक कदम है—जो भारत के उभरते हुए आयुष नवाचार एजेंडे के प्रमुख तत्व हैं।


इस अवसर पर बोलते हुए CCRAS के महानिदेशक प्रो. रबीनारायण आचार्य ने बताया कि जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ बढ़ रही हैं और आयुर्वेद का वेलनेस-केंद्रित दृष्टिकोण आज और भी प्रासंगिक है। उन्होंने CII की इस भूमिका की सराहना की कि उसके सहयोग से CCRAS और औषधि उद्योग के बीच सीधे संवाद संभव हो रहे हैं। SPARK, SMART, PDF फेलोशिप और शोध-कार्यक्रमों जैसे CCRAS के विभिन्न उपक्रमों का उल्लेख करते हुए उन्होंने सहयोगात्मक अनुसंधान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई और उद्योग सहभागियों को आश्वासन दिया कि संयुक्त कार्य से उत्पन्न IPR को समान रूप से साझा किया जाएगा।

के. दिनेश कुमार, IAS, निदेशक (आयुष), आंध्र प्रदेश सरकार, ने बताया कि राज्य में आयुर्वेद कॉलेजों और औषधि निर्माण इकाइयों की संख्या अभी भी सीमित है। उन्होंने राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान की स्थापना का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि सिद्धि 2.0 सभी प्रमुख हितधारकों को एक मंच पर लाता है और यह भी जोड़ा कि आधुनिक विज्ञान ने जीवनकाल बढ़ाया है, जबकि आयुर्वेद स्वस्थ जीवनकाल सुनिश्चित कर सकता है।

उप महानिदेशक डॉ. एन. श्रीकांत ने बताया कि परिषद ने 150 से अधिक आयुर्वेदिक औषधीय फ़ॉर्मूलेशन, जिनमें हर्बो-मिनरल तैयारियाँ भी शामिल हैं, का सत्यापन किया है। उन्होंने उद्योग को CCRAS के व्यापक डेटा—गुणवत्ता, सुरक्षा और विषाक्तता अध्ययनों—का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया और संगठन की उद्योग-अनुकूल अनुसंधान नीति, जिसमें IPR साझा करने का प्रावधान है, का उल्लेख किया। उन्होंने आयुर्वेद-आधारित, AI-संचालित और प्रौद्योगिकी-सक्षम स्टार्टअप्स को मिल रहे CCRAS समर्थन को भी रेखांकित किया।

उद्योग परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करते हुए किरण भूपतिराजू (CEO, Laila Nutra Pvt. Ltd. एवं Chemiloids Life Sciences Pvt. Ltd.) ने वैश्विक बाज़ार में मजबूती के लिए आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों और फ़ॉर्मूलेशन के आधुनिकीकरण की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।

CII विजयवाड़ा ज़ोन की चेयरपर्सन डॉ. वी. नागलक्ष्मी ने कहा कि आयुर्वेद की पूरी क्षमता अभी सामने आना बाकी है। उन्होंने अनुसंधान, शिक्षा, निर्माण और उद्योग विकास के समन्वय के महत्व को रेखांकित किया और कहा कि बढ़ी हुई शोध गतिविधि उद्योग के विकास और रोज़गार के बड़े अवसरों को जन्म देगी।

कार्यक्रम में CCRAS विशेषज्ञों तथा Himalaya Wellness Company जैसी प्रमुख संस्थाओं के प्रतिनिधियों द्वारा तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। CCRAS वैज्ञानिकों ने अपनी सुविधाओं, प्रमुख शोध-परिणामों, विकसित उत्पादों एवं प्रौद्योगिकियों तथा विभिन्न स्तरों पर विकसित हो रहे फ़ॉर्मूलेशन प्रस्तुत किए। साथ ही, उद्योगों के साथ सहयोग के संभावित क्षेत्रों पर भी चर्चा की गई। पहले दिन फार्मास्यूटिकल क्षेत्र के विविध हितधारकों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली, जो आयुर्वेद क्षेत्र में सबूत-आधारित विकास को तेज़ करने की दिशा में उपयोगी रही।

सिद्धि 2.0 में दक्षिण भारत की 25 से अधिक प्रमुख आयुर्वेदिक फार्मास्यूटिकल कंपनियों—जैसे कि Himalaya Wellness Company, Oushadhi, IMPCOPS, Laila Nutra Pvt. Ltd., और Imis Pharmaceuticals—के प्रतिनिधियों सहित 100 से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। इसके अलावा शोधकर्ता, चिकित्सक, शिक्षाविद, राज्य आयुष अधिकारी और डॉ. NRS आयुर्वेदिक कॉलेज, विजयवाड़ा के स्नातकोत्तर छात्र भी उपस्थित रहे।

एक राष्ट्रीय ट्रांसलेशनल एक्सेलेरेटर के रूप में परिकल्पित, सिद्धि 2.0 का उद्देश्य CCRAS तकनीकों को उद्योग में व्यापक अपनाने को बढ़ावा देना, संस्थागत संबंधों को मजबूत करना, गुणवत्ता और नियामक ढाँचे को उन्नत करना और वैश्विक प्रतिस्पर्धी आयुर्वेदिक औषधि उद्योग के विकास का समर्थन करना है। वैज्ञानिक नवाचार और उद्योग सहयोग को एक साथ आगे बढ़ाते हुए, सिद्धि 2.0 आयुर्वेद के लिए एक आधुनिक, साक्ष्य-आधारित और विस्तार योग्य भविष्य की नींव रखता है, जो भारत की समग्र स्वास्थ्य दृष्टि के अनुरूप है।


तीसरा अंतर्राष्ट्रीय आयुर्वेद सम्मेलन 2025: ब्राज़ील में 40 वर्षों की आयुर्वेद यात्रा और वैश्विक समावेशिता पर जोर

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तीसरा अंतर्राष्ट्रीय आयुर्वेद सम्मेलन 14–15 नवंबर, 2025 को ब्राज़ील के साओ पाउलो में स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक केंद्र (SVCC) और कोनायर द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया। यह दो दिवसीय कार्यक्रम भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) के तत्वावधान में आयोजित किया गया और ब्राज़ील में आयुर्वेद के 40 वर्षों की उपलब्धियों को सम्मानित किया। सम्मेलन में लैटिन अमेरिका और भारत से विशेषज्ञ, चिकित्सक, विद्वान और छात्र उपस्थित हुए। कार्यक्रम का मुख्य विषय था—“आयुर्वेद में विविधता और समावेशिता: सभी प्राणियों और व्यक्तियों की देखभाल।”

सम्मेलन का उद्घाटन भारत के ब्राज़ील राजदूत,दीनश भाटिया ने किया। उन्होंने परंपरागत स्वास्थ्य प्रणाली में भारत और ब्राज़ील के बढ़ते सहयोग को उजागर किया। राजदूत ने कहा कि आयुर्वेद का वैश्विक महत्व वैज्ञानिक अनुसंधान और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से बढ़ रहा है, जिसका विस्तार आगामी WHO–आयुष मंत्रालय ग्लोबल समिट ऑन ट्रैडिशनल मेडिसिन (17–19 दिसंबर, 2025, नई दिल्ली) में देखने को मिलेगा।

उन्होंने ब्राज़ील के योगदान की सराहना की, जो आयुर्वेद को आधिकारिक रूप से मान्यता देने वाला पहला दक्षिण अमेरिकी देश बना। राजदूत ने ब्राज़ील के उपराष्ट्रपति, जेराल्डो अल्कमिन के ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ आयुर्वेद, नई दिल्ली के दौरे को द्विपक्षीय सहयोग को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण क्षण बताया। SVCC के निरंतर प्रयासों की प्रशंसा करते हुए उन्होंने आयुष मंत्रालय का आभार व्यक्त किया।

मुख्य भाषण में आयुष मंत्रालय के सचिव डॉ. (वैद्य) राजेश कोटेका ने बताया कि आयुर्वेद समावेशिता, करुणा और शरीर, मन एवं पर्यावरण के समग्र संतुलन का प्रतीक है। उन्होंने भारत–ब्राज़ील के पारंपरिक चिकित्सा सहयोग को रेखांकित किया, जो स्वास्थ्य मंत्रालयों के बीच समझौता ज्ञापन और राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान, जयपुर और ब्राज़ीलियाई विश्वविद्यालयों के संस्थागत सहयोग से मजबूत हुआ है।

डॉ. कोटेका ने उन शिक्षकों, शोधकर्ताओं और चिकित्सकों की सराहना की जिन्होंने पिछले चार दशकों में ब्राज़ील में आयुर्वेद को बढ़ावा दिया। उन्होंने भारत सरकार की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में दोनों देशों के बीच साक्ष्य-आधारित परंपरागत चिकित्सा सहयोग को और गहरा करने के संकल्प को दोहराया।

SVCC की निदेशक डॉ. ज्योति किरण शुक्ला ने आयुर्वेद और कल्याण परंपराओं में भारत और ब्राज़ील की साझा विरासत पर बल दिया और SVCC तथा ICCR द्वारा सांस्कृतिक और शैक्षणिक सहयोग को बढ़ावा देने की भूमिका को रेखांकित किया।

सम्मेलन में विषयगत व्याख्यान, प्लेनरी सत्र और सामान्य सभा आयोजित की गई। मुख्य मुद्दों में प्राचीन ज्ञान, आयुर्वेद में विविधता और समावेशिता, और ब्राज़ील में आयुर्वेद के पेशेवर नियमन पर चर्चा हुई। आयोजकों ने ऐलान किया कि आयुर्वेद अब ब्राज़ीलियाई वर्गीकरण में शामिल हो गया है, जो प्रणाली के लिए ऐतिहासिक मान्यता है।

साओ पाउलो में भारतीय वाणिज्य दूत, हंसराज सिंह वर्मा ने प्राकृतिक और निवारक स्वास्थ्य समाधानों में भारत–ब्राज़ील सहयोग के महत्व को रेखांकित किया।

दो दिवसीय कार्यक्रम में कई व्याख्यान हुए, जिनमें शामिल थे—“दैवव्यापाश्रय: आत्मा का उपचार – गंगा और पश्चिम के बीच सेतु” (पाउलो बास्टोस गोंçal्वेस), “पृथ्वी से आकाश तक: सूक्ष्म परिवर्तन की यात्रा” (वेनेसा सैंटेत्ती), और “आयुर्वेद: उपचार का मार्ग” (डॉ. रीटा बीट्रिज़ टोकेंटिन्स)। सम्मेलन का समापन गोलमेज सम्मेलन “ब्राज़ील में आयुर्वेद का भविष्य: अगले 40 वर्षों का निर्माण” के साथ हुआ।

सम्मेलन में आयुर्वेद के वैश्विक प्रभाव को पुनः पुष्टि मिली और आगामी WHO–आयुष मंत्रालय ग्लोबल समिट ऑन ट्रैडिशनल मेडिसिन, नई दिल्ली के लिए मार्ग प्रशस्त हुआ, जो समग्र स्वास्थ्य और सतत कल्याण में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को और मजबूत करेगा।


विश्व मधुमेह दिवस 2025: केंद्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान, बेंगलुरु करेगा “मधुमेह विमर्श” का आयोजन

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केंद्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान (CARI), बेंगलुरु, जो भारत सरकार के आयुष मंत्रालय द्वारा मधुमेह (Diabetes Mellitus) के क्षेत्र में उत्कृष्टता केंद्र (Centre of Excellence) के रूप में मान्यता प्राप्त है, 14 नवंबर 2025 को विश्व मधुमेह दिवस के अवसर पर एक विशेष कार्यक्रम “मधुमेह विमर्श” आयोजित करेगा। इस कार्यक्रम में मधुमेह पर चल रहे अनुसंधान, नैदानिक कार्यों और जनजागरूकता पहलों को प्रस्तुत किया जाएगा, जिन्हें उत्कृष्टता केंद्र द्वारा संचालित किया जा रहा है।

संस्थान का प्रमुख उद्देश्य आयुर्वेद, योग और जीवनशैली सुधारों के माध्यम से मधुमेह की रोकथाम और प्रबंधन के लिए एक समग्र (integrative) दृष्टिकोण विकसित और लागू करना है। अब तक लगभग 6,000 रोगियों ने संस्थान की सेवाओं का लाभ उठाया है, जिनमें से 25 प्रतिशत से अधिक आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) से हैं।

क्लिनिकल सेवाओं के अलावा, संस्थान ने डिजिटल स्वास्थ्य पहलों के माध्यम से अपनी पहुंच का विस्तार किया है, जिससे 6 लाख से अधिक लोगों को लाभ मिला है। इसमें ई-मेडिकल रिकॉर्ड, टेली-परामर्श, एसएमएस अलर्ट, और वेबसाइट (www.cari.gov.in) व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से जानकारी उपलब्ध कराई जाती है।

संस्थान ने मशीन लर्निंग आधारित मधुमेह जोखिम मूल्यांकन प्रणाली भी विकसित की है, जिसे कॉपीराइट सुरक्षा प्राप्त हुई है। इस प्रणाली का वेब एप्लिकेशन के माध्यम से सत्यापन किया जा रहा है और इसे एक मोबाइल एप के रूप में विकसित किया जाएगा ताकि व्यक्ति अपने स्वास्थ्य की निगरानी स्वयं कर सकें।

कार्यक्रम से पहले, डॉ. सुलोचना भट, प्रभारी, सीएआरआई बेंगलुरु ने कहा,

“हमारा ध्यान पारंपरिक ज्ञान और वैज्ञानिक अनुसंधान के संयोजन पर रहा है ताकि मधुमेह का समग्र और साक्ष्य-आधारित समाधान प्रदान किया जा सके। केंद्र की पहलें दिखाती हैं कि एकीकृत स्वास्थ्य दृष्टिकोण से न केवल रोकथाम संभव है बल्कि जीवन की गुणवत्ता में भी सुधार होता है।”

संस्थान सीएसआईआर-सीएफटीआरआई (मैसूर) और आईआईएससी (बेंगलुरु) के साथ चयनित खाद्य उत्पादों और आयुर्वेदिक औषधियों पर सहयोगात्मक अध्ययन कर रहा है। मधुमेह की रोकथाम और प्रबंधन के लिए एकीकृत रूपरेखा तैयार की गई है और यह प्रकाशनाधीन है, जबकि प्रकृति (Prakriti) और डायबेटिक पेरिफेरल न्यूरोपैथी पर अध्ययन भी प्रकाशन की प्रक्रिया में है।

कार्यक्रम में प्रो. (डॉ.) जी. जी. गंगाधरन, पूर्व निदेशक, रामैया इंडिक स्पेशियलिटी आयुर्वेद रिस्टोरेशन अस्पताल, “मधुमेह का समग्र प्रबंधन” विषय पर व्याख्यान देंगे।

आयुष मंत्रालय जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों जैसे मधुमेह के प्रबंधन हेतु सतत, समावेशी और साक्ष्य-आधारित रणनीतियों के विकास के लिए अनुसंधान और नैदानिक पहलों को बढ़ावा देता रहेगा।

नई दिल्ली में आयुष मंत्रालय और WHO द्वारा द्वितीय वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा शिखर सम्मेलन से पूर्व राजदूत स्वागत समारोह का आयोजन

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भारत सरकार के आयुष मंत्रालय ने आज विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के सहयोग से नई दिल्ली में राजदूतों के लिए एक विशेष स्वागत समारोह का आयोजन किया। यह आयोजन 17 से 19 दिसंबर 2025 को नई दिल्ली में होने वाले द्वितीय WHO वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा शिखर सम्मेलन (Global Summit on Traditional Medicine) से पहले एक अग्रदूत कार्यक्रम के रूप में आयोजित किया गया। इस उच्च स्तरीय बैठक में राजदूतों, उच्चायुक्तों और राजनयिक प्रतिनिधियों को शिखर सम्मेलन की दृष्टि, वैश्विक स्वास्थ्य से उसके संबंध और साक्ष्य-आधारित पारंपरिक चिकित्सा को आगे बढ़ाने के लिए बहुपक्षीय सहयोग के अवसरों के बारे में जानकारी दी गई।

कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री प्रतापराव जाधव, (स्वतंत्र प्रभार) आयुष मंत्रालय तथा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के राज्य मंत्री, वैद्य राजेश कोटेचा, सचिव, आयुष मंत्रालय, और राजदूत सिबी जॉर्ज, सचिव (पश्चिम), विदेश मंत्रालय उपस्थित थे। इसके साथ ही WHO और आयुष मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी भाग लिया, जिनमें शामिल थे — डॉ. कैथरीना बोहमे, WHO महानिदेशक की वरिष्ठ सलाहकार एवं WHO दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र (SEARO) की प्रभारी अधिकारी; मोनालिसा दास, संयुक्त सचिव, आयुष मंत्रालय; डॉ. पूनम खेत्रपाल, WHO दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र की क्षेत्रीय निदेशक (एमेरिटस) एवं पारंपरिक चिकित्सा पर WHO महानिदेशक की वरिष्ठ सलाहकार; तथा डॉ. श्यामा कुरुविल्ला, निदेशक, WHO ग्लोबल ट्रेडिशनल मेडिसिन सेंटर।

मुख्य अतिथि प्रतापराव जाधव ने अपने संबोधन में कहा,

“यह शिखर सम्मेलन दुनिया भर में समान, सुलभ और साक्ष्य-आधारित स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों की दिशा में हमारे साझा प्रयासों में एक और महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। पारंपरिक चिकित्सा हमारी सांस्कृतिक पहचान, सामुदायिक ज्ञान और प्रकृति तथा कल्याण के प्रति मानवता की सामूहिक समझ का भंडार है। विश्व अब पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के समन्वित दृष्टिकोण की नई सराहना कर रहा है। WHO और जामनगर स्थित ग्लोबल सेंटर फॉर ट्रेडिशनल मेडिसिन के साथ मिलकर हम अनुसंधान को सशक्त करने, गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों को बेहतर बनाने और यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं कि पारंपरिक चिकित्सा के लाभ सभी तक पहुँचें।”

वैद्य राजेश कोटेचा, सचिव, आयुष मंत्रालय ने सभा की शुरुआत अपने वक्तव्य से की और कहा,

“इस वर्ष के शिखर सम्मेलन का विषय ‘Restoring Balance: The Science and Practice of Health and Wellbeing’ (संतुलन की पुनर्स्थापना: स्वास्थ्य और कल्याण का विज्ञान और व्यवहार) हमारी समग्र स्वास्थ्य दृष्टि और पारंपरिक चिकित्सा के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है। भारत WHO और वैश्विक साझेदारों के सहयोग से मानकों को सुदृढ़ करने, अनुसंधान को आगे बढ़ाने और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए कार्य कर रहा है। हमें विश्वास है कि यह वैश्विक संवाद सार्थक अंतरराष्ट्रीय सहयोग को प्रोत्साहित करेगा।”

डॉ. पूनम खेत्रपाल, WHO की क्षेत्रीय निदेशक (एमेरिटस) और पारंपरिक चिकित्सा पर WHO महानिदेशक की वरिष्ठ सलाहकार ने विशेष संबोधन में कहा,

“पारंपरिक चिकित्सा ‘Health for All’ (सभी के लिए स्वास्थ्य) के लक्ष्य को प्राप्त करने का अभिन्न हिस्सा है। 170 सदस्य देशों द्वारा इसके उपयोग की रिपोर्ट और वैश्विक ढांचे के सुदृढ़ होने से यह क्षेत्र पहले से कहीं अधिक सशक्त हुआ है। जामनगर में स्थित ग्लोबल ट्रेडिशनल मेडिसिन सेंटर और ट्रेडिशनल मेडिसिन ग्लोबल लाइब्रेरी साक्ष्य-आधारित, लोगों-केंद्रित और समग्र स्वास्थ्य सेवा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।”

राजदूत सिबी जॉर्ज, सचिव (पश्चिम), विदेश मंत्रालय ने कहा,

“यह आयोजन पारंपरिक चिकित्सा की समय-परखी उपचार पद्धतियों को आधुनिक वैज्ञानिक समझ के साथ एकीकृत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। ‘Restoring Wellbeing and Balance’ की साझा दृष्टि वैश्विक स्तर पर पारंपरिक चिकित्सा को सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज में शामिल करने की बढ़ती मान्यता को दर्शाती है। आयुष मंत्रालय ने अनुसंधान, फार्माकोविजिलेंस और अंतरराष्ट्रीय सहयोगों, विशेष रूप से WHO ग्लोबल सेंटर, जामनगर के माध्यम से इन प्रणालियों को सशक्त किया है।”

डॉ. श्यामा कुरुविल्ला, निदेशक, WHO ग्लोबल ट्रेडिशनल मेडिसिन सेंटर ने आगामी शिखर सम्मेलन के वैश्विक परिप्रेक्ष्य और प्राथमिकताओं को रेखांकित किया। उन्होंने कहा,

“यह शिखर सम्मेलन पारंपरिक चिकित्सा के विज्ञान और व्यवहार पर आधारित होकर लोगों और ग्रह के लिए संतुलन बहाल करने की वैश्विक आंदोलन को आगे बढ़ाने का लक्ष्य रखता है। यह आयोजन Global Traditional Medicine Strategy 2025–2034 (विश्व स्वास्थ्य सभा 78) के मार्गदर्शन में आयोजित होगा और नवीनतम अनुसंधान, साक्ष्य और नवाचारों को उजागर करेगा।”

इसके बाद मोनालिसा दास, संयुक्त सचिव, आयुष मंत्रालय ने दिसंबर 2025 में होने वाले सम्मेलन के प्रतिभागियों, विषयगत सत्रों, मुख्य घोषणाओं और साझेदारियों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया।

कार्यक्रम का समापन डॉ. कैथरीना बोहमे, WHO महानिदेशक की वरिष्ठ सलाहकार और WHO SEARO की प्रभारी अधिकारी द्वारा किया गया। उन्होंने कहा,

“पारंपरिक चिकित्सा वैश्विक स्वास्थ्य के केंद्र में है—यह ‘Health for All’ की दृष्टि को साकार करने की कुंजी है। हम देशों से मंत्री-स्तरीय भागीदारी को बढ़ावा देने का आह्वान करते हैं। जैसे-जैसे हम शिखर सम्मेलन की ओर बढ़ रहे हैं, आइए हम सुलभ, सस्ती, समावेशी और साक्ष्य-आधारित स्वास्थ्य प्रणालियों के निर्माण के प्रति अपनी साझा प्रतिबद्धता को दोहराएं।”

यह राजनयिक स्वागत समारोह साक्ष्य-आधारित पारंपरिक चिकित्सा को आगे बढ़ाने, अंतरराष्ट्रीय सहयोग को सशक्त करने और एक ऐसे वैश्विक स्वास्थ्य तंत्र के निर्माण के प्रति सामूहिक संकल्प का प्रतीक रहा जिसमें पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान एक साथ मिलकर कार्य करें।

आयुष मंत्रालय ने सभी देशों से अनुरोध किया कि वे दिसंबर 2025 में होने वाले द्वितीय WHO वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा शिखर सम्मेलन में सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करें।


राष्ट्रीय कैंसर जागरूकता दिवस पर आयुष मंत्रालय ने रोकथाम, शीघ्र पहचान और समेकित देखभाल पर दिया विशेष जोर

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राष्ट्रीय कैंसर जागरूकता दिवस के अवसर पर आयुष मंत्रालय ने इस बात पर बल दिया कि जन-जागरूकता बढ़ाना और कैंसर की शीघ्र पहचान सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि कैंसर अब भी विश्व स्तर पर मृत्यु का दूसरा सबसे बड़ा कारण बना हुआ है। दुनिया के कई देशों में मुख (ओरल), गर्भाशय ग्रीवा (सर्वाइकल) और स्तन कैंसर के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। भारत इन चुनौतियों से निपटने के लिए शिक्षा, स्क्रीनिंग और समग्र स्वास्थ्य पद्धतियों (Holistic Health Practices) पर विशेष जोर दे रहा है।

कैंसर का एक बड़ा हिस्सा रोकथाम योग्य कारणों से उत्पन्न होता है, जैसे कि तंबाकू का सेवन, अस्वास्थ्यकर भोजन, मोटापा, शारीरिक निष्क्रियता, अत्यधिक शराब का सेवन, पर्यावरण प्रदूषण और एचपीवी संक्रमण। ये सभी कारक इस बात की ओर संकेत करते हैं कि मजबूत जागरूकता और समय पर कार्रवाई की आवश्यकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, शीघ्र पहचान (Early Detection) से कैंसर से बचाव और उपचार की संभावना कई गुना बढ़ जाती है—विशेष रूप से स्तन, गर्भाशय ग्रीवा और मुख कैंसर के मामलों में, जिन्हें प्रारंभिक अवस्था में नियमित जांच के माध्यम से पहचाना जा सकता है। चूँकि कई प्रकार के कैंसर रोके जा सकते हैं और कई का उपचार शुरुआती अवस्था में संभव है, इसलिए स्वस्थ जीवनशैली अपनाना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

तंबाकू से परहेज, शराब का सीमित सेवन, पौध-आधारित आहार, स्वस्थ वजन बनाए रखना, नियमित शारीरिक गतिविधि, और धुआँ व प्रदूषण से बचाव — ये सभी उपाय कैंसर के जोखिम को घटाने और दीर्घकालिक स्वास्थ्य को बढ़ाने में सहायक हैं।

प्रतापराव जाधव, केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) आयुष एवं राज्य मंत्री, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, भारत सरकार ने कहा कि जनस्वास्थ्य की रक्षा के लिए कैंसर जागरूकता और रोकथाम के प्रति सक्रिय और जनकेंद्रित दृष्टिकोण आवश्यक है। उन्होंने बताया कि मंत्रालय की बढ़ती पहलें—जैसे समेकित कैंसर-देखभाल केंद्र, सहयोगी अनुसंधान कार्यक्रम और सामुदायिक केंद्रित परियोजनाएं—यह सुनिश्चित करने के लिए हैं कि सुलभ, समग्र और सहायक उपचार देश के हर नागरिक तक पहुँचे।
उन्होंने जोड़ा कि आधुनिक ऑन्कोलॉजी और आयुष प्रणालियों के एकीकृत मॉडल जीवन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार ला सकते हैं, खासकर कमज़ोर और संवेदनशील वर्गों के लिए।

वैद्य राजेश कोटेचा, सचिव, आयुष मंत्रालय ने कहा कि भारत में बढ़ते समेकित कैंसर-देखभाल नेटवर्क मंत्रालय की इस प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं कि वह प्रमाण-आधारित (Evidence-Based), रोगी-केंद्रित समाधान को सशक्त बना रहा है। उन्होंने बताया कि उत्कृष्टता केंद्र (Centres of Excellence), सहयोगी अनुसंधान प्लेटफॉर्म और टाटा मेमोरियल सेंटर–ACTREC, आर्य वैद्यशाला, एम्स और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ साझेदारी से नए चिकित्सीय दृष्टिकोण, बेहतर लक्षण प्रबंधन और कैंसर रोगियों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार हो रहा है।

उन्होंने यह भी कहा कि ये प्रयास दिखाते हैं कि आयुष प्रणाली किस प्रकार आधुनिक ऑन्कोलॉजी को वैज्ञानिक अनुसंधान, प्रशिक्षित मानव संसाधन और सहायक क्लिनिकल देखभाल के माध्यम से पूरक बना सकती है।

आयुष मंत्रालय देशभर में समेकित कैंसर देखभाल (Integrative Cancer Care) का विस्तार कर रहा है। प्रमुख उत्कृष्टता केंद्र (Centres of Excellence) में से एक टीएमसी–ACTREC, मुंबई में स्थित है, जो इंटीग्रेटिव केयर और आयुष ड्रग डिस्कवरी पर केंद्रित है। ये केंद्र इन-सिलिको, प्री-क्लिनिकल और क्लिनिकल स्टडीज़, विशेष ओपीडी सेवाएँ और क्षमता निर्माण (Capacity Building) में सहयोग कर रहे हैं।

आर्य वैद्यशाला, कोट्टक्कल में स्थित एक समर्पित उत्कृष्टता केंद्र जीवन गुणवत्ता और सहायक चिकित्सा (Supportive Therapy) पर केंद्रित है, जिसने पिछले दो वर्षों में 26,356 कैंसर रोगियों, जिनमें 338 फेफड़ों के कैंसर के मामले शामिल हैं, का प्रबंधन किया है। यह समेकित रोगी देखभाल के सकारात्मक परिणामों को दर्शाता है।

अंत में मंत्रालय ने दोहराया कि रोकथाम, शीघ्र निदान और समेकित सहायक देखभाल भारत की कैंसर चुनौती का प्रमुख उत्तर होना चाहिए।

जागरूकता बढ़ाना, स्क्रीनिंग तक आसान पहुँच सुनिश्चित करना और स्वस्थ जीवनशैली को प्रोत्साहित करना — ये सभी कदम कैंसर के जोखिम को कम करने और परिणामों में सुधार के लिए अनिवार्य हैं।
आयुष प्रणाली की यह पहल आधुनिक चिकित्सा के साथ मिलकर एक समग्र स्वास्थ्य दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है, जो न केवल राष्ट्रीय कैंसर बोझ को कम करने बल्कि रोगियों और समुदायों के समग्र कल्याण को भी बढ़ाने में सहायक है।

कैंसर जागरूकता पर सीसीआरएएस (CCRAS) का आईईसी प्रकाशन यहाँ देखा जा सकता है:


ESTIC 2025: आयुष मंत्रालय ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में नवाचार और पारंपरिक चिकित्सा के संगम पर किया जोर

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आयुष मंत्रालय ने आज नई दिल्ली स्थित सेंट्रल काउंसिल फॉर रिसर्च इन आयुर्वेदिक साइंसेज (CCRAS) मुख्यालय, जनकपुरी में ईमर्जिंग साइंस, टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन कॉन्क्लेव (ESTIC) 2025 में अपनी भागीदारी को लेकर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की।

कार्यक्रम की अध्यक्षता आयुष मंत्रालय की संयुक्त सचिव अलार्मेलमंगई डी ने की। उन्होंने मंत्रालय की ESTIC 2025 में भागीदारी को दर्शाने वाला एक थीमैटिक वीडियो भी प्रदर्शित किया।

अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि ESTIC 2025 भारत की वैज्ञानिक भावना और सहयोग की शक्ति का उत्सव है। यह केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि भारत के नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र का उत्सव है — जो यह दर्शाता है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी मिलकर एक स्वस्थ, स्थायी भविष्य का निर्माण कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि आयुष मंत्रालय “स्वास्थ्य और चिकित्सा प्रौद्योगिकी” थीम के अंतर्गत भाग लेगा, जो भारत की पारंपरिक स्वास्थ्य ज्ञान प्रणाली और आधुनिक विज्ञान के सुंदर संगम का प्रतीक है।

संयुक्त सचिव ने यह भी उल्लेख किया कि भारत की स्वास्थ्य प्रणाली आज एक बड़े परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। आधुनिक चिकित्सा क्षेत्र में बायोमेडिकल इंजीनियरिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित निदान और प्रिसिजन मेडिसिन जैसे नवाचार नई दिशा दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर दुनिया फिर से आयुर्वेद और अन्य आयुष प्रणालियों की ओर रोकथाम और समग्र स्वास्थ्य कल्याण के लिए रुख कर रही है। उन्होंने कहा कि ये दोनों धाराएँ मिलकर स्वास्थ्य सेवा की नई परिभाषा गढ़ सकती हैं।

आयुष ग्रिड पहल के माध्यम से मंत्रालय ने पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली को डिजिटल और नागरिक-केंद्रित रूप देने के लिए कई अत्याधुनिक प्लेटफॉर्म विकसित किए हैं —

  • Ayush Hospital Management Information System (A-HMIS) — बेहतर स्वास्थ्य सेवा प्रबंधन हेतु

  • e-Learning Management System (e-LMS) — डिजिटल शिक्षा और छात्र प्रबंधन के लिए

  • Y-Break App — कार्यस्थल पर योग और वेलनेस के लिए

  • Yoga Portal — योग संसाधनों के एकीकृत मंच के रूप में

  • e-Aushadhi और Ayush Suraksha — औषधि नियंत्रण और रोगी सुरक्षा हेतु

इसके अतिरिक्त Ayush Research Portal, Clinical Case Repository, Ayusoft और NAMASTE Portal जैसी पहलों से अनुसंधान और मानकीकरण को सुदृढ़ किया जा रहा है। मंत्रालय mYoga App (WHO के साथ साझेदारी में) और Ayush Global Portal जैसे उपकरणों से वैश्विक पहुंच का विस्तार कर रहा है, वहीं PM GatiShakti Ayush Asset Mapping Tool अवसंरचना योजना और निगरानी को सशक्त बना रहा है।

अब मंत्रालय कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से भविष्यवाणी विश्लेषण, साहित्य खनन, व्यक्तिगत अनुशंसाओं और वास्तविक समय निगरानी जैसे क्षेत्रों में नवाचार को बढ़ावा दे रहा है — जिससे एक डेटा-चालित, नवाचार-नेतृत्वित और वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त आयुष डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण हो सके।

डॉ. ए. रघु, सलाहकार (आय), ने कहा कि ESTIC 2025 भारत-केंद्रित नवाचारों, पॉइंट-ऑफ-केयर डायग्नोस्टिक्स, बायोमेडिकल प्रौद्योगिकियों और एकीकृत स्वास्थ्य समाधानों को प्रदर्शित करने का एक राष्ट्रीय मंच है। उन्होंने कहा कि यह भागीदारी आत्मनिर्भर, नवाचार-प्रधान और वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त स्वास्थ्य प्रणाली के निर्माण के प्रति मंत्रालय की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

डॉ. श्रीनिवास राव चिंता, संयुक्त सलाहकार (एच), ने मंत्रालय की भागीदारी पर विस्तृत प्रस्तुति दी और बताया कि “हेल्थ एंड मेडिकल टेक्नोलॉजीज़” थीम के अंतर्गत मंत्रालय का फोकस क्षेत्र नवोन्मेषी अनुसंधान मॉडल, एकीकृत स्वास्थ्य ढाँचे और पारंपरिक चिकित्सा को आधुनिक वैज्ञानिक नवाचार से जोड़ने वाले सहयोगी प्रोजेक्ट्स पर होगा।

ESTIC 2025 में आयुष मंत्रालय पार्टनर मंत्रालय के रूप में भाग लेगा। मंत्रालय का विशेष सत्र 4 नवंबर 2025 को भारत मंडपम, नई दिल्ली में आयोजित होगा, जिसकी सह-अध्यक्षता वैद्य राजेश कोटेचा, सचिव (आयुष) और डॉ. राजीव बहल, सचिव (डीएचआर) एवं महानिदेशक (ICMR) करेंगे।

इस सत्र में प्रमुख वक्ता होंगे —

  • डॉ. शिव कुमार सारिन, निदेशक, ILBS

  • प्रो. गगनदीप कांग, बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन

  • प्रो. तनुजा नेसरी, निदेशक, ITRA, जामनगर

  • सी. वी. मुरलीधरन, SCTIMST, तिरुवनंतपुरम

पैनल चर्चा का संचालन डॉ. जितेंद्र शर्मा, प्रबंध निदेशक एवं संस्थापक-सीईओ, आंध्र प्रदेश मेडटेक ज़ोन करेंगे।

ESTIC 2025, जो कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) द्वारा प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार के कार्यालय के मार्गदर्शन में आयोजित किया जा रहा है, 3 से 5 नवंबर 2025 तक भारत मंडपम, नई दिल्ली में आयोजित होगा। इसका उद्देश्य सरकार, अकादमिक जगत, उद्योग, स्टार्टअप्स और नागरिक समाज के बीच साझेदारी को प्रोत्साहित करना है, ताकि भारत की नवाचार-आधारित विकास यात्रा को गति मिले और विकसित भारत 2047 के विज़न को साकार किया जा सके।

स्ट्रोक की रोकथाम और पुनर्वास में समग्र एवं निवारक देखभाल प्रदान करने में आयुष प्रणालियों की महत्वपूर्ण भूमिका: आयुष मंत्रालय

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आयुष मंत्रालय ने स्ट्रोक जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्या के लिए आयुष प्रणालियों की समग्र, निवारक और पुनर्वासात्मक देखभाल की भूमिका पर बल दिया है। भारत में मृत्यु और विकलांगता के प्रमुख कारणों में से एक होने के नाते, स्ट्रोक से निपटने के लिए आयुष प्रणालियाँ एक एकीकृत दृष्टिकोण अपनाती हैं, जो शरीर की संतुलन प्रणाली को सुदृढ़ करने, लचीलापन बढ़ाने और दीर्घकालिक पुनर्प्राप्ति को प्रोत्साहित करने पर केंद्रित है — जिससे पारंपरिक चिकित्सा उपचार को प्रभावी रूप से पूरक बनाया जा सके।

आयुष और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री प्रतापराव जाधव ने कहा,

“स्ट्रोक की बढ़ती चुनौती व्यापक और एकीकृत स्वास्थ्य रणनीतियों की आवश्यकता को रेखांकित करती है। निवारक देखभाल और दीर्घकालिक पुनर्वास पर आधारित आयुष प्रणालियाँ पारंपरिक स्ट्रोक प्रबंधन को महत्वपूर्ण रूप से पूरक कर सकती हैं। आयुष मंत्रालय साक्ष्य-आधारित पारंपरिक चिकित्सा को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है ताकि जीवन की गुणवत्ता में सुधार हो और स्ट्रोक के राष्ट्रीय बोझ को कम किया जा सके। हमारा ध्यान मजबूत शोध सहयोग और जन-जागरूकता बढ़ाने पर है, जो स्ट्रोक की घटनाओं को कम करने और सतत पुनर्प्राप्ति मार्गों को समर्थन देने में परिवर्तनकारी भूमिका निभा सकता है।”

आयुष मंत्रालय के सचिव वैद्य राजेश कोटेचा ने कहा,

“आयुष प्रणालियाँ सामूहिक रूप से स्ट्रोक जैसी जटिल न्यूरोलॉजिकल विकारों को समझने और प्रबंधित करने के लिए एक समग्र ढाँचा प्रदान करती हैं। मंत्रालय सहयोगात्मक और अनुवादात्मक अनुसंधान को बढ़ावा दे रहा है ताकि आयुष आधारित उपचारों की चिकित्सीय क्षमता को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित और विस्तारित किया जा सके, जिससे स्ट्रोक की रोकथाम, पुनर्वास और समग्र तंत्रिका स्वास्थ्य के लिए एकीकृत स्वास्थ्य देखभाल को सुदृढ़ किया जा सके।”

आयुष प्रणालियाँ शरीर, मन और पर्यावरण के बीच संतुलन पर जोर देती हैं। इनकी निवारक दर्शनशास्त्र और समग्र उपचार पद्धतियाँ न केवल रोग प्रबंधन पर केंद्रित हैं, बल्कि प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, पुनरावृत्ति कम करने और जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने पर भी ध्यान देती हैं।

आयुर्वेद में स्ट्रोक को वात दोष की असंतुलन स्थिति के रूप में समझा जाता है, जिससे शरीर के एक हिस्से में कमजोरी या पक्षाघात हो सकता है। आयुर्वेदिक उपचार का उद्देश्य संतुलन बहाल करना है — जिसमें शुद्धिकरण, पुनर्स्थापन और पुनर्वासात्मक चिकित्सा शामिल हैं जो रक्त संचार, तंत्रिका कार्य और समग्र जीवन शक्ति को बढ़ावा देती हैं।

होम्योपैथी को सहायक उपचार के रूप में प्रभावी पाया गया है, विशेषकर न्यूरोलॉजिकल सुधार, मोटर रिकवरी और स्ट्रोक के बाद जीवन की गुणवत्ता में सुधार में।

आयुष मंत्रालय ने बताया कि विभिन्न आयुष प्रणालियाँ स्ट्रोक की रोकथाम, प्रबंधन और पुनर्वास के लिए विशिष्ट और पूरक दृष्टिकोण प्रदान करती हैं, जो शारीरिक और न्यूरोलॉजिकल दोनों प्रकार की पुनर्प्राप्ति को लक्षित करती हैं।

सीएसआईआर–एनआईएससीपीआर ने 17 अक्टूबर 2025 को 10वां आयुर्वेद दिवस मनाया

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नई दिल्ली- सीएसआईआर–राष्ट्रीय विज्ञान संचार एवं नीति अनुसंधान संस्थान (CSIR–NIScPR) ने 10वां आयुर्वेद दिवस आयोजित किया। इस अवसर ने आयुर्वेद को स्वास्थ्य और कल्याण के लिए सततता और प्राकृतिक जीवन पर आधारित समग्र दृष्टिकोण के रूप में बढ़ावा देने में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर स्थापित किया।

समारोह के अंतर्गत #SVASTIK (Scientifically Validated Societal Traditional Knowledge) पहल के तहत एक NIScPR SVASTIK व्याख्यान आयोजित किया गया और CSIR–NIScPR कर्मचारियों के लिए नि:शुल्क स्वास्थ्य परीक्षण शिविर भी लगाया गया।

मुख्य वक्ताओं और उनके संदेश

  • डॉ. किशोर पटेल (CCRAS–सेंट्रल आयुर्वेद रिसर्च इंस्टिट्यूट, नई दिल्ली) ने आयुर्वेद के मूलभूत सिद्धांतों पर व्याख्यान दिया। उन्होंने जीवनशैली और तनाव से जुड़े रोगों के कारणों पर चर्चा की और Āchāra Rasāyana और Sadvṛtta के माध्यम से संतुलित पोषण, सचेत भोजन और नैतिक जीवन के महत्व को रेखांकित किया।

  • डॉ. नरेश कुमार, चीफ साइंटिस्ट, CSIR–NIScPR ने आयुर्वेद के वैश्विक विस्तार पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद दिवस ने अब एक राष्ट्रीय आयोजन से बढ़कर वैश्विक स्वास्थ्य आंदोलन का रूप ले लिया है। उन्होंने आयुर्वेदिक चिकित्सकों और शोधकर्ताओं से आग्रह किया कि वे गलत सूचना का मुकाबला करें, मिलावट से बचाव करें, मानकीकृत फार्मूलेशन्स अपनाएँ, प्रमाण-आधारित एकीकरण करें, और सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाएँ। उन्होंने #SVASTIK पहल की सराहना की, जो पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ जनता तक पहुँचाती है।

  • राजेश कुमार सिंह रोशन, कंट्रोलर ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन, CSIR–NIScPR ने आयुर्वेद की ऐतिहासिक जड़ें और प्राचीन चिकित्सकों जैसे आचार्य नागार्जुन के योगदानों पर प्रकाश डाला। उन्होंने आयुर्वेद की वैश्विक मान्यता और इसके समग्र स्वास्थ्य प्रणाली के महत्व की भी बात की।

  • डॉ. सुमन रे, सीनियर प्रिंसिपल साइंटिस्ट, CSIR–NIScPR ने इस वर्ष के थीम “Ayurveda for People and Planet” की सराहना की, जो वैश्विक स्वास्थ्य और पर्यावरणीय संतुलन के लिए आयुर्वेद की संभावनाओं का लाभ उठाने की साझा प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

  • डॉ. चारु लता, प्रिंसिपल साइंटिस्ट और SVASTIK समन्वयक ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया और सभी प्रमुख वक्ताओं, निदेशक CSIR–NIScPR और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया।

स्वास्थ्य परीक्षण शिविर और पहल के उद्देश्य

कार्यक्रम के दौरान आयोजित नि:शुल्क स्वास्थ्य मूल्यांकन शिविर में NIScPR के कर्मचारी और छात्र OPD परामर्श का लाभ उठाए।
इस प्रकार की पहल का उद्देश्य है:

  • पारंपरिक स्वास्थ्य देखभाल ज्ञान तक पहुँच बढ़ाना

  • समुदाय में स्वास्थ्य जागरूकता बढ़ाना

  • आयुर्वेद क्षेत्र में वैज्ञानिक नवाचार को प्रोत्साहित करना


विश्व ऑस्टियोपोरोसिस दिवस 2025: आयुष मंत्रालय ने हड्डियों के स्वास्थ्य और आयुर्वेदिक रोकथाम पर जोर दिया

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विश्व ऑस्टियोपोरोसिस दिवस 2025 के अवसर पर, आयुष मंत्रालय ने हड्डियों के स्वास्थ्य, प्रारंभिक रोकथाम और जीवनशैली सुधारों की अहमियत पर जोर दिया है। ऑस्टियोपोरोसिस एक चुपचाप बढ़ने वाली गंभीर स्वास्थ्य समस्या है, जो दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रभावित करती है। इस वर्ष के observance का उद्देश्य हड्डियों के स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाना और यह दिखाना है कि आयुर्वेद ऑस्टियोपोरोसिस जैसी स्थितियों के लिए टिकाऊ, रोकथाम और पुनर्स्थापनात्मक समाधान प्रदान करता है।

ऑस्टियोपोरोसिस के बारे में जानकारी:

विशेषज्ञों के अनुसार, ऑस्टियोपोरोसिस एक सामान्य हड्डियों की स्थिति है जो हड्डियों को कमजोर और भंगुर बनाती है, जिससे वे टूटने के अधिक खतरे में रहती हैं। यह धीरे-धीरे हड्डियों की ताकत और घनत्व कम होने के कारण विकसित होती है। इसे अक्सर “साइलेंट डिजीज” कहा जाता है क्योंकि इसके कोई स्पष्ट लक्षण तब तक दिखाई नहीं देते जब तक हड्डी टूट न जाए। अक्सर पहला संकेत हिप, कलाई या रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर होता है, जिससे दर्द, मुद्रा में बदलाव (जैसे कूबड़पन) और चोट के बाद धीमी रिकवरी हो सकती है।

आयुर्वेद के अनुसार, ऑस्टियोपोरोसिस मुख्य रूप से वात दोष के असंतुलन से जुड़ा होता है, जो हड्डियों की मजबूती कम करता है और हड्डियों के घनत्व को घटाता है। यह पारंपरिक समझ आधुनिक विज्ञान से मिलती-जुलती है, जो ऑस्टियोपोरोसिस को हड्डियों में खनिज तत्वों की कमी और उम्र से संबंधित हार्मोनल बदलावों से जोड़ती है।

प्रो. रबिनारायण आचार्य, महानिदेशक, CCRAS ने कहा,

“ऑस्टियोपोरोसिस एक बढ़ती सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है, लेकिन इसे आयुर्वेद की रोकथाम और पुनर्स्थापनात्मक बुद्धिमत्ता के माध्यम से प्रभावी रूप से संबोधित किया जा सकता है। क्लासिकल अवधारणा अस्थि सौषिर्य आधुनिक हड्डी भंगुरता की समझ के साथ साम्य रखती है। आयुर्वेद में प्रारंभिक हस्तक्षेप, संतुलित आहार और जीवनशैली पर जोर हड्डियों को मजबूत करने और स्वस्थ उम्र बढ़ने के लिए प्राकृतिक मार्ग प्रदान करता है।”

उन्होंने आगे कहा कि सेंट्रल काउंसिल फॉर रिसर्च इन आयुर्वेदिक साइंसेज (CCRAS) ने लक्ष गुग्गुलु और प्रवल पिष्टी जैसी आयुर्वेदिक औषधियों के ऑस्टियोपोरोसिस प्रबंधन में प्रभावकारिता पर वैज्ञानिक अध्ययन किए हैं और मस्कुलोस्केलेटल डिसऑर्डर्स में आयुर्वेदिक हस्तक्षेप की भूमिका के प्रमाण जुटाए हैं।

आयुर्वेद में ऑस्टियोपोरोसिस का समग्र प्रबंधन

आयुर्वेद हड्डियों को मजबूत करने, संतुलन बहाल करने और degeneration को रोकने के लिए व्यापक प्रबंधन दृष्टिकोण प्रदान करता है। CCRAS ने निम्नलिखित उपायों को प्रमुख बताया है:

  • रसायन चिकित्सा (Rasayana Therapy): प्रारंभिक रसायन उपचार हड्डियों को मजबूत करता है और उम्र संबंधित degeneration को धीमा करता है।

  • स्नेहन (Therapeutic Massage): महानारायण तेल, दशमूल तेल, चंदनबला लक्षादी तेल जैसे औषधीय तेलों से मालिश हड्डियों और जोड़ों को पोषण देती है।

  • हर्बल फॉर्मूलेशन्स: लक्ष गुग्गुलु, महायोगराज गुग्गुलु, प्रवल पिष्टी और मुक़्ता शुक्ति भस्म जैसी पारंपरिक आयुर्वेदिक औषधियाँ हड्डियों की ताकत बढ़ाने और उपचार में सहायक हैं।

  • वात-शामक आहार और जीवनशैली: कुलत्ती (घोड़ाकुलथी), शुंठी (अदरक), रासोना (लहसुन), मूंग (हरी मूंग), कूष्माण्ड (कोद्दू) और अनार, आम, अंगूर जैसे फलों का सेवन हड्डियों के घनत्व और शक्ति बनाए रखता है।

  • योग और हल्का व्यायाम: विशेष आसन हड्डियों और जोड़ों में लचीलापन बढ़ाते हैं, परिसंचरण में सुधार करते हैं और अकड़न को रोकते हैं।

विश्व ऑस्टियोपोरोसिस दिवस 2025 पर आयुष मंत्रालय का संदेश:

मंत्रालय सभी नागरिकों—विशेषकर वृद्ध व postmenopausal महिलाएं—से आग्रह करता है कि वे आयुर्वेदिक रोकथाम उपाय, संतुलित आहार और हल्की शारीरिक गतिविधि अपनाएं। इन समग्र अभ्यासों को दैनिक जीवन में शामिल करके व्यक्ति हड्डियों को मजबूत बना सकते हैं, फ्रैक्चर का जोखिम कम कर सकते हैं और स्वस्थ एवं सक्रिय उम्र बढ़ने को सुनिश्चित कर सकते हैं।


आर्कटिक सर्कल असेंबली 2025 में भारत की सक्रिय भागीदारी: प्रो. (वैद्य) रबिनारायण आचार्य ने आर्कटिक में आयुष की संभावनाओं पर किया जोर

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भारतीय प्रतिनिधिमंडल के हिस्से के रूप में, प्रो. (वैद्य) रबिनारायण आचार्य, महानिदेशक, केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (CCRAS), तथा डॉ. श्रीनिवास राव चिंता, संयुक्त सलाहकार (होम्योपैथी), आयुष मंत्रालय, ने आइसलैंड की राजधानी रेक्जाविक में आयोजित 2025 आर्कटिक सर्कल असेंबली में भाग लिया।

“द रोल एंड इम्पॉर्टेंस ऑफ द ग्लोबल साउथ इन द आर्कटिक” शीर्षक वाले पूर्ण सत्र (प्लेनरी सेशन) के दौरान, प्रो. आचार्य ने भारत की व्यापक आर्कटिक नीति के अंतर्गत आर्कटिक क्षेत्र में उसकी सक्रिय भागीदारी प्रस्तुत की। उन्होंने वैश्विक स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटने में पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों की बढ़ती प्रासंगिकता पर जोर दिया और आर्कटिक जैसे चरम पर्यावरणों में भी स्वास्थ्य और प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में आयुष (AYUSH) पद्धतियों की संभावनाओं को रेखांकित किया।

यह सत्र भारत सरकार द्वारा आयोजित किया गया था और इसमें प्रमुख वक्ताओं के रूप में रियर एडमिरल टी.वी.एन. प्रसन्ना, पोलर कोऑर्डिनेटर, भारत सरकार; मनीष तिवारी, वैज्ञानिक ‘एफ’, राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं महासागरीय अनुसंधान केंद्र (NCPOR); तथा वसीम सईद, स्टीयरिंग कमेटी सदस्य, एमिरेट्स पोलर प्रोग्राम (यूएई) शामिल थे।

प्रो. आचार्य ने पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों और आर्कटिक अनुसंधान के बीच सहयोग को सशक्त करने की एक दूरदर्शी रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने सुझाव दिया कि आर्कटिक क्षेत्रों में अंतरविषयक प्रूफ-ऑफ-कॉन्सेप्ट क्लिनिकल परीक्षण प्रारंभ किए जाएँ, आर्कटिक नीति ढांचे के तहत एक संयुक्त अनुसंधान संघ (कंसोर्टियम) की स्थापना की जाए, तथा क्रॉस-कल्चरल आयुष डिलीवरी और सुरक्षा निगरानी में क्षमता विकास किया जाए। उन्होंने यह भी बल दिया कि पारंपरिक और आधुनिक चिकित्सा के बीच सेतु के रूप में वैज्ञानिक साक्ष्य प्रकाशित करना अत्यंत आवश्यक है और भारत की आर्कटिक कूटनीति में आयुष जागरूकता को समाहित किया जाना चाहिए।

आयुष मंत्रालय के प्रतिनिधिमंडल की यह भागीदारी यह दर्शाती है कि भारत वैश्विक स्थिरता और स्वास्थ्य संवादों में आयुष-आधारित साक्ष्य, नवाचार और कूटनीति को एकीकृत करने के लिए प्रतिबद्ध है। यह सहभागिता भारत की इस भूमिका को पुनः स्थापित करती है कि वह समग्र स्वास्थ्य, वैज्ञानिक सहयोग और जन-से-जन साझेदारी को अपनी आर्कटिक नीति के तहत सक्रिय रूप से बढ़ावा दे रहा है।

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