Media24Media.com: IICA मानेसर में “Meet the Legend” श्रृंखला के तहत न्यायिक विशेषज्ञों का विशेष सत्र, PGIP प्रतिभागियों को मिला महत्वपूर्ण मार्गदर्शन

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IICA मानेसर में “Meet the Legend” श्रृंखला के तहत न्यायिक विशेषज्ञों का विशेष सत्र, PGIP प्रतिभागियों को मिला महत्वपूर्ण मार्गदर्शन

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मानेसर स्थित Indian Institute of Corporate Affairs (IICA) में पोस्ट ग्रेजुएट इनसॉल्वेंसी प्रोग्राम (PGIP) के 7वें बैच के लिए “Meet the Legend” श्रृंखला के अंतर्गत एक विशेष और ज्ञानवर्धक सत्र का आयोजन किया गया। लगभग तीन घंटे चले इस मास्टरक्लास में दो प्रतिष्ठित न्यायिक विशेषज्ञों ने अपने अनुभव और विशेषज्ञता साझा की।

इस सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में J. P. Singh, न्यायिक सदस्य, GST अपीलीय न्यायाधिकरण और Balesh Kumar, सदस्य, अपीलीय न्यायाधिकरण (PMLA, FEMA, PBPTA, NDPSA और SAFEMA) उपस्थित रहे।

GST और IBC के संबंध पर विस्तृत चर्चा

अपने संबोधन में जे.पी. सिंह ने वस्तु एवं सेवा कर (GST) की संरचना और इसका Insolvency and Bankruptcy Code, 2016 (IBC) के तहत चल रही दिवालिया कार्यवाही के साथ संबंध का व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने “सप्लाई”, “कंसिडरेशन”, टैक्सेबल इवेंट, इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) तथा रिवर्स चार्ज मैकेनिज्म जैसे मूलभूत GST सिद्धांतों को विस्तार से समझाया। साथ ही उन्होंने अंतर-राज्य और अंतर-राज्यीय लेनदेन को नियंत्रित करने वाले वैधानिक ढांचे पर भी प्रकाश डाला।

उन्होंने महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णयों जैसे Swiss Ribbons Pvt. Ltd. v. Union of India और Ghanashyam Mishra & Sons Pvt. Ltd. v. Edelweiss Asset Reconstruction Co. Ltd. का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि एक बार जब समाधान योजना स्वीकृत हो जाती है, तो उसमें शामिल न किए गए सभी दावे, जिनमें वैधानिक बकाया भी शामिल हैं, समाप्त माने जाते हैं।

सत्र के दौरान CIRP प्रक्रिया में व्यावहारिक अनुपालन से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा हुई, जैसे कि नई GST पंजीकरण की आवश्यकता, IRP/RP द्वारा रिटर्न दाखिल करना, ITC की उपलब्धता तथा IBC की धारा 14 के तहत मोराटोरियम का वसूली कार्यवाही पर प्रभाव।

IBC और PMLA के बीच कानूनी समन्वय पर प्रकाश

दूसरे वक्ता बलेश कुमार ने Prevention of Money Laundering Act, 2002 (PMLA) और IBC के बीच संबंधों पर विस्तृत चर्चा की। उन्होंने “अपराध की आय” (Proceeds of Crime) की अवधारणा को समझाते हुए मनी लॉन्ड्रिंग की तीन प्रमुख अवस्थाओं — प्लेसमेंट, लेयरिंग और इंटीग्रेशन — की व्याख्या की।

उन्होंने National Company Law Tribunal (NCLT) और PMLA प्राधिकरणों के बीच अधिकार क्षेत्र से जुड़ी जटिलताओं पर भी चर्चा की, विशेषकर उन मामलों में जहाँ कॉरपोरेट देनदार CIRP के तहत हो और उसकी संपत्तियों पर अटैचमेंट की कार्यवाही चल रही हो।

उन्होंने IBC की धारा 32A के महत्व को रेखांकित करते हुए बताया कि यह प्रावधान समाधान प्रक्रिया की सुरक्षा और प्रभावी कार्यान्वयन के लिए बनाया गया है। उन्होंने Manish Kumar v. Union of India सहित कई न्यायिक निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि न्यायालयों द्वारा लगातार ऐसे सिद्धांत विकसित किए जा रहे हैं जो दिवालिया समाधान और मनी लॉन्ड्रिंग विरोधी कानूनों के उद्देश्यों के बीच संतुलन स्थापित करते हैं।

प्रतिभागियों को मिले व्यावहारिक और रणनीतिक दृष्टिकोण

इंटरएक्टिव सत्र के दौरान PGIP प्रतिभागियों को विभिन्न कानूनों के बीच समन्वय से उत्पन्न चुनौतियों को समझने और उनके समाधान के व्यावहारिक तरीकों के बारे में महत्वपूर्ण मार्गदर्शन मिला। इस चर्चा ने यह भी रेखांकित किया कि प्रभावी समाधान प्रक्रिया के लिए टैक्सेशन, दिवालिया कानून और प्रवर्तन कानूनों के बीच संबंधों की गहरी समझ आवश्यक है।

कार्यक्रम के अंत में सेंटर फॉर PGIP के प्रमुख सुधाकर शुक्ला ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए अतिथि वक्ताओं का आभार व्यक्त किया और उनके बहुमूल्य मार्गदर्शन के लिए प्रशंसा की।

“IICA की ‘Meet the Legend’ श्रृंखला” प्रतिभागियों को देश के अग्रणी न्यायिक और नियामकीय विशेषज्ञों से जोड़कर अकादमिक उत्कृष्टता और पेशेवर क्षमता निर्माण के अपने उद्देश्य को निरंतर आगे बढ़ा रही है।


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