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आईआईसीए के राष्ट्रीय सम्मेलन में भारत की दिवाला एवं पुनर्गठन व्यवस्था के भविष्य पर मंथन

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नई दिल्ली- भारत के दिवाला एवं पुनर्गठन ढांचे (Insolvency and Restructuring Ecosystem) के एक दशक के अनुभवों और भविष्य की दिशा पर विचार-विमर्श के लिए भारतीय कॉर्पोरेट कार्य संस्थान (IICA) ने एसोसिएशन ऑफ इंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल एंटिटीज (AIPE) के सहयोग से राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया। प्रधानमंत्री संग्रहालय सभागार, तीन मूर्ति मार्ग, नई दिल्ली में आयोजित इस सम्मेलन का विषय था— “भारत के पुनर्गठन पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्परिभाषित करना: सीख का एक दशक और भविष्य की दिशा”।

सम्मेलन के साथ ही आईआईसीए के प्रमुख शैक्षणिक कार्यक्रम पोस्ट ग्रेजुएट इंसॉल्वेंसी प्रोग्राम (PGIP) के छठे बैच का दीक्षांत समारोह भी आयोजित किया गया, जिसमें 40 विद्यार्थियों को डिग्री एवं प्रमाणपत्र प्रदान किए गए।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति अशोक भूषण, अध्यक्ष, राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT), ने दीक्षांत भाषण देते हुए कहा कि दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC) ने पिछले दस वर्षों में उल्लेखनीय विकास किया है। उन्होंने वर्ष 2016 से 2021 तक की अवधि को “स्थापना का युग” तथा वर्तमान समय को “परिष्कार का युग” बताया। उन्होंने कहा कि आईबीसी (संशोधन) अधिनियम, 2026 इस कानून की परिपक्वता और निरंतर विकास का प्रतीक है।

मुख्य वक्ता न्यायमूर्ति अनुपिंदर सिंह ग्रेवाल, अध्यक्ष, राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT), ने आईबीसी की न्यायिक यात्रा पर प्रकाश डालते हुए समयबद्ध और मूल्य-संवर्धक समाधान सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक एवं संस्थागत समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने सीमा-पार दिवालियापन (Cross-Border Insolvency) के लिए UNCITRAL मॉडल कानून को अपनाने की आवश्यकता भी रेखांकित की।

कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय की सचिव दीप्ति गौर मुखर्जी ने अपने विशेष संबोधन में आईबीसी को भारत की वित्तीय और कॉर्पोरेट व्यवस्था में “व्यवहारिक क्रांति” बताया। उन्होंने कहा कि समाधान प्रक्रियाओं के माध्यम से लगभग 4 लाख करोड़ रुपये की वसूली की जा चुकी है, जबकि ऋणदाताओं को परिसमापन मूल्य का लगभग 170 प्रतिशत प्राप्त हुआ है। उन्होंने यह भी बताया कि 32 हजार से अधिक मामलों का समाधान औपचारिक स्वीकृति से पहले ही हो गया, जिससे लगभग 14 लाख करोड़ रुपये के ऋण मूल्य का संरक्षण संभव हुआ।

आईआईसीए के महानिदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी ज्ञानेश्वर कुमार सिंह ने प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि पीजीआईपी कार्यक्रम दिवाला पेशेवरों की नई पीढ़ी तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उन्होंने बताया कि सात बैचों के माध्यम से अब तक 239 पेशेवरों का एक मजबूत नेटवर्क विकसित हुआ है, जिनमें से कई पंजीकृत दिवाला पेशेवर के रूप में सक्रिय हैं।

दीक्षांत समारोह के दौरान शैक्षणिक उत्कृष्टता के लिए विद्यार्थियों को सम्मानित भी किया गया। आशीष कुमार ने प्रथम स्थान प्राप्त कर 50 हजार रुपये का नकद पुरस्कार जीता, जबकि अरुण कुमार को द्वितीय स्थान के लिए 30 हजार रुपये और के. गीता वैष्णवी को तृतीय स्थान के लिए 20 हजार रुपये का पुरस्कार प्रदान किया गया। ये पुरस्कार AZB एंड पार्टनर्स द्वारा प्रायोजित किए गए थे।

कार्यक्रम के दौरान आईबीसी के दस वर्षों की यात्रा और प्रभाव पर आधारित राष्ट्रीय सम्मेलन स्मारिका का विमोचन किया गया। साथ ही पीजीआईपी विद्यार्थियों के लिए पीएम विद्या लक्ष्मी मेरिट-कम-मीन्स छात्रवृत्ति की घोषणा की गई। इसके अतिरिक्त वन नेशन वन सब्सक्रिप्शन (ONOS) प्लेटफॉर्म की सुविधा भी आईआईसीए को प्रदान की गई, जिससे शोधकर्ताओं, शिक्षकों और विद्यार्थियों को वैश्विक शैक्षणिक संसाधनों तक सहज पहुंच प्राप्त होगी।

सम्मेलन में दिवाला एवं पुनर्गठन क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों, नीति-निर्माताओं, नियामकों, न्यायिक अधिकारियों, शिक्षाविदों और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। विभिन्न तकनीकी सत्रों और पैनल चर्चाओं में सीमा-पार दिवालियापन, ऋणदाता-प्रेरित समाधान प्रक्रिया (CIIRP), संकटग्रस्त परिसंपत्ति बाजार, वैकल्पिक निवेश कोष, मध्यस्थता तंत्र तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सुधारों जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तृत चर्चा हुई।

सम्मेलन के समापन अवसर पर आईआईसीए के सेंटर फॉर इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी के प्रमुख सुधाकर शुक्ला ने सभी वक्ताओं, विशेषज्ञों और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। सम्मेलन ने भारत की दिवाला एवं पुनर्गठन व्यवस्था को और अधिक सशक्त बनाने तथा भविष्य के सुधारों के लिए एक स्पष्ट रोडमैप तैयार करने की सामूहिक प्रतिबद्धता को पुनः स्थापित किया।

आईएफएससीए अधिकारियों के लिए आईआईसीए में एक सप्ताह का प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू

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मानेसर: भारतीय कॉर्पोरेट कार्य संस्थान ने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण के सहायक प्रबंधकों के लिए 13 से 18 अप्रैल 2026 तक एक सप्ताह का इंडक्शन प्रशिक्षण कार्यक्रम अपने मानेसर परिसर में शुरू किया है।

यह कार्यक्रम दोनों संस्थाओं के बीच 20 फरवरी 2026 को गुजरात के गिफ्ट सिटी में हुए समझौता ज्ञापन (MoU) के तहत आयोजित किया जा रहा है। इस समझौते पर आईआईसीए के महानिदेशक एवं सीईओ ज्ञानेश्वर कुमार सिंह और आईएफएससीए के अध्यक्ष के. राजारामन ने हस्ताक्षर किए थे। इसका उद्देश्य भारत के अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा पारिस्थितिकी तंत्र को क्षमता निर्माण, नीति अनुसंधान और ज्ञान साझेदारी के माध्यम से मजबूत करना है।

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्देश्य आईएफएससीए अधिकारियों को कॉर्पोरेट कानून, गवर्नेंस ढांचे, वित्तीय नियमों और सीमा-पार लेनदेन की व्यापक समझ प्रदान करना है।

कार्यक्रम का उद्घाटन आईआईसीए के महानिदेशक ज्ञानेश्वर कुमार सिंह ने किया। उन्होंने अपने संबोधन में आईएफएससीए के गठन को भारत की नियामकीय दूरदर्शिता का उदाहरण बताते हुए इसे एक “चमत्कार” बताया। उन्होंने फिनटेक के माध्यम से नवाचार को बढ़ावा देने और विकसित भारत के विजन में आईएफएससीए की भूमिका पर जोर दिया।

कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों को सेबी और पीएफआरडीए जैसे नियामक संस्थानों से जुड़े विभिन्न कानूनों और ढांचों की जानकारी भी दी जाएगी।

इस अवसर पर डॉ. नीरज गुप्ता ने स्वागत भाषण दिया, जबकि डॉ. पायला नारायण राव ने कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की।

प्रशिक्षण के तहत प्रतिभागी 16 और 17 अप्रैल को “संसद प्राइड” का भी दौरा करेंगे, जिससे उन्हें संसदीय कार्यवाही और विधायी प्रक्रियाओं की व्यावहारिक जानकारी मिल सके।

इस कार्यक्रम में कॉर्पोरेट गवर्नेंस, सिक्योरिटीज रेगुलेशन, कॉर्पोरेट फाइनेंस, वित्तीय रिपोर्टिंग और सीमा-पार दिवालियापन जैसे विषयों पर विशेषज्ञों द्वारा सत्र आयोजित किए जा रहे हैं।

यह पहल आईआईसीए की क्षमता निर्माण और नीति समर्थन के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती है। कार्यक्रम का समापन 18 अप्रैल 2026 को प्रमाणपत्र वितरण के साथ होगा।


एलएल.एम. (कॉरपोरेट लॉ एंड मैनेजमेंट) कार्यक्रम का शुभारंभ: IICA और NLUJAA की संयुक्त पहल

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कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय, भारत सरकार की सचिव दीप्ति गौर मुखर्जी ने 24 मार्च 2026 को नई दिल्ली के कर्तव्य भवन–I में एलएल.एम. (कॉरपोरेट लॉ एंड मैनेजमेंट) कार्यक्रम का औपचारिक शुभारंभ किया। यह दो वर्षीय पूर्णतः आवासीय पाठ्यक्रम भारतीय कॉरपोरेट मामलों का संस्थान (IICA) और नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी एंड ज्यूडिशियल एकेडमी, असम (NLUJAA) द्वारा संयुक्त रूप से संचालित किया जाएगा।

इस कार्यक्रम के शुभारंभ अवसर पर कई गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे, जिनमें IICA के महानिदेशक एवं सीईओ ज्ञानेश्वर कुमार सिंह, NLUJAA के कुलपति प्रो. के. वी. एस. शर्मा, MCA के वरिष्ठ आर्थिक सलाहकार शांतनु मित्रा, उप सचिव शेखर श्रीवास्तव, NLUJAA के रजिस्ट्रार गुणजीत रॉय चौधरी, कर्नल अमनदीप सिंह पुरी, IICA के सेंटर फॉर इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी के प्रमुख सुधाकर शुक्ला तथा स्कूल ऑफ कॉरपोरेट लॉ के प्रमुख डॉ. प्याला नारायण राव सहित दोनों संस्थानों के वरिष्ठ अधिकारी एवं संकाय सदस्य शामिल थे।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए MCA की सचिव ने IICA और NLUJAA की सराहना की कि उन्होंने कम समय में कॉरपोरेट लॉ में एक विशेष मास्टर कार्यक्रम की परिकल्पना और शुरुआत की। उन्होंने कहा कि यह पहल IICA के नॉर्थईस्ट सेंटर के उद्घाटन के बाद एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगी।

उन्होंने बताया कि इस पाठ्यक्रम की संरचना अत्यंत सुविचारित है और यह MCA के नियामक ढांचे से प्रेरित है, जिससे छात्रों को उद्योग विशेषज्ञों, नीति-निर्माताओं और नियामकों के साथ व्यावहारिक अनुभव प्राप्त होगा।

IICA के महानिदेशक एवं सीईओ ज्ञानेश्वर कुमार सिंह ने कहा कि यह दो वर्षीय कार्यक्रम कॉरपोरेट लॉ, गवर्नेंस और नियामक ढांचे में पेशेवर दक्षताओं को मजबूत करने के लिए विशेष रूप से तैयार किया गया है। उन्होंने खासकर उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के छात्रों के लिए इसके महत्व पर जोर दिया।

NLUJAA के कुलपति प्रो. के. वी. एस. शर्मा ने कहा कि यह कार्यक्रम कानूनी शिक्षा को प्रबंधन और अनुपालन संबंधी दृष्टिकोण के साथ जोड़ने का प्रयास है। उन्होंने MCA और सभी सहयोगी संस्थानों के योगदान की सराहना की।

यह एलएल.एम. कार्यक्रम चार सेमेस्टर में कुल 54 क्रेडिट का होगा, जिसमें पहले वर्ष की पढ़ाई NLUJAA, असम में और दूसरे वर्ष की पढ़ाई IICA, आईएमटी मानेसर परिसर में होगी।

इस कार्यक्रम में प्रति बैच 60 सीटें उपलब्ध होंगी। आवेदन प्रक्रिया 24 मार्च 2026 से शुरू होकर 24 जून 2026 तक चलेगी। शैक्षणिक सत्र 10 अगस्त 2026 से NLUJAA, असम परिसर में आरंभ होगा। इच्छुक अभ्यर्थी NLUJAA की आधिकारिक वेबसाइट के माध्यम से ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं।

IICA मानेसर में “Meet the Legend” श्रृंखला के तहत न्यायिक विशेषज्ञों का विशेष सत्र, PGIP प्रतिभागियों को मिला महत्वपूर्ण मार्गदर्शन

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मानेसर स्थित Indian Institute of Corporate Affairs (IICA) में पोस्ट ग्रेजुएट इनसॉल्वेंसी प्रोग्राम (PGIP) के 7वें बैच के लिए “Meet the Legend” श्रृंखला के अंतर्गत एक विशेष और ज्ञानवर्धक सत्र का आयोजन किया गया। लगभग तीन घंटे चले इस मास्टरक्लास में दो प्रतिष्ठित न्यायिक विशेषज्ञों ने अपने अनुभव और विशेषज्ञता साझा की।

इस सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में J. P. Singh, न्यायिक सदस्य, GST अपीलीय न्यायाधिकरण और Balesh Kumar, सदस्य, अपीलीय न्यायाधिकरण (PMLA, FEMA, PBPTA, NDPSA और SAFEMA) उपस्थित रहे।

GST और IBC के संबंध पर विस्तृत चर्चा

अपने संबोधन में जे.पी. सिंह ने वस्तु एवं सेवा कर (GST) की संरचना और इसका Insolvency and Bankruptcy Code, 2016 (IBC) के तहत चल रही दिवालिया कार्यवाही के साथ संबंध का व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने “सप्लाई”, “कंसिडरेशन”, टैक्सेबल इवेंट, इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) तथा रिवर्स चार्ज मैकेनिज्म जैसे मूलभूत GST सिद्धांतों को विस्तार से समझाया। साथ ही उन्होंने अंतर-राज्य और अंतर-राज्यीय लेनदेन को नियंत्रित करने वाले वैधानिक ढांचे पर भी प्रकाश डाला।

उन्होंने महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णयों जैसे Swiss Ribbons Pvt. Ltd. v. Union of India और Ghanashyam Mishra & Sons Pvt. Ltd. v. Edelweiss Asset Reconstruction Co. Ltd. का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि एक बार जब समाधान योजना स्वीकृत हो जाती है, तो उसमें शामिल न किए गए सभी दावे, जिनमें वैधानिक बकाया भी शामिल हैं, समाप्त माने जाते हैं।

सत्र के दौरान CIRP प्रक्रिया में व्यावहारिक अनुपालन से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा हुई, जैसे कि नई GST पंजीकरण की आवश्यकता, IRP/RP द्वारा रिटर्न दाखिल करना, ITC की उपलब्धता तथा IBC की धारा 14 के तहत मोराटोरियम का वसूली कार्यवाही पर प्रभाव।

IBC और PMLA के बीच कानूनी समन्वय पर प्रकाश

दूसरे वक्ता बलेश कुमार ने Prevention of Money Laundering Act, 2002 (PMLA) और IBC के बीच संबंधों पर विस्तृत चर्चा की। उन्होंने “अपराध की आय” (Proceeds of Crime) की अवधारणा को समझाते हुए मनी लॉन्ड्रिंग की तीन प्रमुख अवस्थाओं — प्लेसमेंट, लेयरिंग और इंटीग्रेशन — की व्याख्या की।

उन्होंने National Company Law Tribunal (NCLT) और PMLA प्राधिकरणों के बीच अधिकार क्षेत्र से जुड़ी जटिलताओं पर भी चर्चा की, विशेषकर उन मामलों में जहाँ कॉरपोरेट देनदार CIRP के तहत हो और उसकी संपत्तियों पर अटैचमेंट की कार्यवाही चल रही हो।

उन्होंने IBC की धारा 32A के महत्व को रेखांकित करते हुए बताया कि यह प्रावधान समाधान प्रक्रिया की सुरक्षा और प्रभावी कार्यान्वयन के लिए बनाया गया है। उन्होंने Manish Kumar v. Union of India सहित कई न्यायिक निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि न्यायालयों द्वारा लगातार ऐसे सिद्धांत विकसित किए जा रहे हैं जो दिवालिया समाधान और मनी लॉन्ड्रिंग विरोधी कानूनों के उद्देश्यों के बीच संतुलन स्थापित करते हैं।

प्रतिभागियों को मिले व्यावहारिक और रणनीतिक दृष्टिकोण

इंटरएक्टिव सत्र के दौरान PGIP प्रतिभागियों को विभिन्न कानूनों के बीच समन्वय से उत्पन्न चुनौतियों को समझने और उनके समाधान के व्यावहारिक तरीकों के बारे में महत्वपूर्ण मार्गदर्शन मिला। इस चर्चा ने यह भी रेखांकित किया कि प्रभावी समाधान प्रक्रिया के लिए टैक्सेशन, दिवालिया कानून और प्रवर्तन कानूनों के बीच संबंधों की गहरी समझ आवश्यक है।

कार्यक्रम के अंत में सेंटर फॉर PGIP के प्रमुख सुधाकर शुक्ला ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए अतिथि वक्ताओं का आभार व्यक्त किया और उनके बहुमूल्य मार्गदर्शन के लिए प्रशंसा की।

“IICA की ‘Meet the Legend’ श्रृंखला” प्रतिभागियों को देश के अग्रणी न्यायिक और नियामकीय विशेषज्ञों से जोड़कर अकादमिक उत्कृष्टता और पेशेवर क्षमता निर्माण के अपने उद्देश्य को निरंतर आगे बढ़ा रही है।


भारत के अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करने हेतु IFSCA और IICA के बीच समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर

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भारत के अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा पारिस्थितिकी तंत्र (IFSC) को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, इंटरनेशनल फाइनेंशियल सर्विसेज सेंटर्स अथॉरिटी (IFSCA) और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स (IICA) ने गिफ्ट सिटी, गुजरात स्थित IFSCA परिसर में एक ऐतिहासिक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए।

यह MoU 20 फरवरी 2026 को ज्ञानेश्वर कुमार सिंह, महानिदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी, IICA और के. राजारामन, अध्यक्ष, IFSCA द्वारा वरिष्ठ अधिकारियों और विशिष्ट गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में हस्ताक्षरित किया गया।

IFSCA और IICA की भूमिका

भारत के अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र के एकीकृत नियामक के रूप में IFSCA, कंपनियों अधिनियम, 2013 के व्यापक कानूनी ढांचे के तहत संचालित वित्तीय संस्थानों के बढ़ते पारिस्थितिकी तंत्र की निगरानी करता है, जिसमें IFSC में कार्यरत संस्थाओं को विशेष नियामकीय छूट भी प्राप्त है।

कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय के अधीन एक प्रमुख थिंक टैंक के रूप में IICA, कॉर्पोरेट गवर्नेंस ढांचे को आगे बढ़ाने, नियामकीय क्षमता निर्माण और नीति परामर्श सेवाओं के लिए संस्थागत सहयोग प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

समझौता ज्ञापन का उद्देश्य

इस MoU के माध्यम से IFSCA और IICA के बीच क्षमता निर्माण, नीति अनुसंधान और ज्ञान साझेदारी के क्षेत्रों में सहयोग के लिए एक संरचित ढांचा स्थापित किया गया है, ताकि GIFT-IFSC में नियामकीय प्रभावशीलता और कॉर्पोरेट गवर्नेंस मानकों को मजबूत किया जा सके।

प्रशिक्षण और नीति सहयोग

IICA, IFSCA और IFSC में पंजीकृत संस्थाओं को प्रशिक्षण और नीति समर्थन प्रदान करेगा ताकि वे विकसित हो रहे नियामकीय मानकों और वैश्विक गवर्नेंस प्रथाओं का पालन कर सकें।

IICA, IFSCA अधिकारियों के लिए ऑनलाइन प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम, इंडक्शन और विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करेगा, जिनमें निम्नलिखित विषय शामिल होंगे:

  • कॉर्पोरेट और संबद्ध कानून

  • कॉर्पोरेट गवर्नेंस

  • पर्यावरण, सामाजिक और गवर्नेंस (ESG)

  • सीमा-पार लेनदेन और पुनर्गठन

प्रमुख वक्तव्य

ज्ञानेश्वर कुमार सिंह ने कहा कि IICA, IFSCA के साथ निकट सहयोग की अपेक्षा करता है ताकि एक मानकीकृत कॉर्पोरेट गवर्नेंस पारिस्थितिकी तंत्र विकसित किया जा सके। उन्होंने बताया कि सहयोग के तत्काल प्रमुख क्षेत्र होंगे:

  • अनुकूलित क्षमता निर्माण कार्यक्रमों का शुभारंभ

  • इंडक्शन और नेतृत्व विकास पहल

  • नीति अनुसंधान और परामर्श समर्थन

के. राजारामन ने IICA की पहल की सराहना करते हुए सहयोग को क्रियान्वित करने के लिए तत्काल कार्य योजना का उल्लेख किया। उन्होंने GIFT सिटी में प्रतिवर्ष संयुक्त कॉर्पोरेट गवर्नेंस कार्यक्रमों और IFSC क्षेत्राधिकार में स्थापित होने वाली कंपनियों के लिए विशेष पाठ्यक्रमों की आवश्यकता पर जोर दिया।


आईआईसीए ने आईईएस और आईटीएस अधिकारियों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया

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कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय के अंतर्गत भारतीय कॉरपोरेट कार्य संस्थान (IICA) ने भारतीय आर्थिक सेवा (IES) और भारतीय व्यापार सेवा (ITS) के 21 अधिकारियों के लिए कंपनी अधिनियम, प्रतिस्पर्धा कानून तथा दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC) पर एक विशेषीकृत प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया। यह कार्यक्रम 2 से 6 फरवरी 2026 तक हरियाणा के आईएमटी मानेसर स्थित आईआईसीए परिसर में आयोजित किया गया।

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्देश्य अधिकारी प्रशिक्षुओं को कंपनी अधिनियम, प्रतिस्पर्धा कानून, कॉरपोरेट वित्त और दिवाला कानून जैसे प्रमुख विषयों के प्रति संवेदनशील बनाना तथा उनके पेशेवर दायित्वों के अनुरूप नियामक और नीति संबंधी समझ को सुदृढ़ करना है। कार्यक्रम के माध्यम से प्रतिभागियों को कॉरपोरेट प्रशासन, नियामक ढांचे और व्यावहारिक नीति दृष्टिकोण की गहन जानकारी प्रदान की जा रही है।

कार्यक्रम के दौरान अधिकारियों को कंपनी मामलों के प्रबंधन, भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) की शक्तियों और कार्यों, प्रतिस्पर्धा विरोधी समझौते, प्रभुत्व के दुरुपयोग, कॉरपोरेट वित्त, ऋण और चूक, दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP), एनसीएलटी और एनसीएलएटी की भूमिका, डेटा आधारित निर्णय निर्माण तथा विधायी मंशा जैसे विषयों पर विस्तृत जानकारी दी गई।

प्रशिक्षण कार्यक्रम में देश के प्रतिष्ठित विशेषज्ञों ने सहभागिता की, जिनमें सुधाकर शुक्ला (पूर्व सदस्य, IBBI), ज्ञानेश्वर कुमार सिंह (महानिदेशक एवं सीईओ, IICA), धनेंद्र कुमार (पूर्व अध्यक्ष, CCI), जी.पी. मदान, समीर गांधी, डॉ. एम.एस. साहू, डॉ. ऑगस्टीन पीटर, डॉ. नवीन सिरोही सहित कई वरिष्ठ विधि एवं नीति विशेषज्ञ शामिल रहे।

कार्यक्रम का औपचारिक उद्घाटन आईआईसीए के महानिदेशक एवं सीईओ ज्ञानेश्वर कुमार सिंह ने किया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय देश की सबसे बड़ी नियामक संरचनाओं में से एक का संचालन करता है और ‘ट्रस्ट आधारित विनियमन’ की अवधारणा पर बल दिया।

कार्यक्रम की शुरुआत में सुधाकर शुक्ला ने भारत में ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस के तीन प्रमुख स्तंभ—प्रवेश की स्वतंत्रता, संचालन की स्वतंत्रता और निकास की स्वतंत्रता—पर प्रकाश डाला और इन्हें कंपनी अधिनियम, प्रतिस्पर्धा अधिनियम तथा दिवाला संहिता से जोड़ा।

उद्घाटन सत्र को धनेंद्र कुमार, भारत के पहले प्रतिस्पर्धा आयोग अध्यक्ष, के संबोधन ने और भी समृद्ध बनाया। उन्होंने एमआरटीपी अधिनियम से लेकर आधुनिक प्रतिस्पर्धा कानून तक के विकास की यात्रा साझा की। तकनीकी सत्रों में कॉरपोरेट गवर्नेंस, निदेशकों की जिम्मेदारियों और प्रतिस्पर्धा कानून के व्यावहारिक पहलुओं पर विस्तृत चर्चा हुई।

कार्यक्रम का समापन आईआईसीए के स्कूल ऑफ कॉरपोरेट लॉ एंड कॉम्पिटिशन लॉ के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. प्याला नारायण राव द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ किया गया।

भारतीय कॉरपोरेट कार्य संस्थान में राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद के उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल का दौरा

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नई दिल्ली- भारतीय कॉरपोरेट कार्य संस्थान (IICA) ने प्रशिक्षण, अनुसंधान, उत्पादकता, सततता और अनुपालन सहयोग के क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाओं पर चर्चा के लिए राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद (NPC) के एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल की मेजबानी की। प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व नीरजा शेखर, महानिदेशक, NPC तथा उमाशंकर प्रसाद, उप महानिदेशक (ग्रुप) ने किया।

प्रतिनिधिमंडल का स्वागत महानिदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी, IICA,ज्ञानेश्वर कुमार सिंह द्वारा किया गया। इस अवसर पर उन्होंने गणमान्य अतिथियों को शॉल एवं स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया।

अपने संबोधन में डीजी एवं सीईओ, IICA ने उद्योग जगत की बढ़ती और बदलती आवश्यकताओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संस्थानों को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप स्वयं को निरंतर प्रासंगिक बनाए रखना होगा। उन्होंने कहा कि भारत के नेतृत्व ने भविष्य के लिए एक स्पष्ट दृष्टि प्रस्तुत की है और ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए संस्थानों को व्यक्तिगत एवं सामूहिक रूप से योगदान देना आवश्यक है।

दौरे के दौरान IICA के विभिन्न स्कूलों और केंद्रों के प्रमुखों द्वारा संस्थान के दायित्वों एवं गतिविधियों पर विस्तृत प्रस्तुतियां दी गईं। इन प्रस्तुतियों में शिक्षा, प्रशिक्षण, अनुसंधान, नीति समर्थन, परामर्श और सलाहकारी सेवाओं में IICA की बहुआयामी भूमिका को रेखांकित किया गया, जो सरकारी एवं निजी क्षेत्र दोनों के लिए सहायक है।

इस अवसर पर बातचीत के दौरान नीरजा शेखर, महानिदेशक, NPC ने बताया कि राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद की स्थापना 1958 में, स्वतंत्रता के तुरंत बाद की गई थी, जब देश के पास सीमित संसाधन थे और उत्पादकता बढ़ाने की तत्काल आवश्यकता थी। उन्होंने जापान गए ऐतिहासिक उत्पादकता प्रतिनिधिमंडल का उल्लेख किया, जिसने भारत में उत्पादकता प्रयासों के संस्थानीकरण की नींव रखी।

उन्होंने बताया कि समय के साथ NPC ने औद्योगिक क्षेत्र से आगे बढ़ते हुए कृषि, सेवा क्षेत्र, एमएसएमई, सतत विकास, हरित उत्पादकता तथा ईएसजी से जुड़े पहलों में भी अपनी गतिविधियों का विस्तार किया है।

नीरजा शेखर ने यह भी बताया कि NPC का एशियन प्रोडक्टिविटी ऑर्गनाइजेशन (APO) के साथ सक्रिय सहयोग है, जिसके माध्यम से अंतरराष्ट्रीय अनुभव, अंतर-देशीय अध्ययन यात्राएं, विशेषज्ञों का आदान-प्रदान और उत्पादकता बेंचमार्किंग फ्रेमवर्क को बढ़ावा दिया जाता है। ये पहल विशेष रूप से एमएसएमई के लिए औद्योगिक तैयारी, संगठनात्मक क्षमता, वित्तीय सुदृढ़ता और विनिर्माण परिपक्वता का आकलन करने में सहायक हैं।

दोनों संस्थानों ने नीति अनुसंधान, प्रशिक्षण और परामर्श में IICA की विशेषज्ञता तथा कार्यान्वयन-आधारित उत्पादकता अनुभव में NPC की क्षमता को एक साथ जोड़ते हुए सहयोग को आगे बढ़ाने की प्रबल इच्छा व्यक्त की। इसका उद्देश्य भारत को एक उच्च आय, प्रतिस्पर्धी, नवोन्मेषी और सतत अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर करना है।

इस कार्यक्रम का समन्वय डॉ. नवीन सिरोही, प्रमुख – स्कूल ऑफ फाइनेंस एंड मैनेजमेंट, IICA द्वारा किया गया।


IICA–DGR द्वारा रक्षा अधिकारियों के लिए तृतीय निदेशक प्रमाणन कार्यक्रम का सफल समापन

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भारतीय कॉर्पोरेट कार्य संस्थान (IICA) ने पुनर्वास महानिदेशालय (DGR), रक्षा मंत्रालय के साथ साझेदारी में कॉरपोरेट गवर्नेंस में निदेशकों के लिए प्रमाणन कार्यक्रम के तीसरे बैच का सफलतापूर्वक समापन 21 नवंबर 2025 को गुरुग्राम के मानेसर स्थित IICA परिसर में किया। यह दो सप्ताह का प्रमाणन कार्यक्रम तीनों सेनाओं के 30 वरिष्ठ अधिकारियों—सेवारत एवं हाल ही में सेवानिवृत्त हुए—को प्रशिक्षित करने हेतु आयोजित किया गया था। अगस्त 2024 से अब तक संचालित तीन बैचों के माध्यम से कुल 90 विशिष्ट रक्षा अधिकारियों को कॉरपोरेट गवर्नेंस और स्वतंत्र निदेशक की भूमिका के लिए व्यापक ज्ञान प्रदान किया जा चुका है।

समापन सत्र व संबोधन

समापन समारोह में प्रतिष्ठित अतिथियों ने विचार साझा किए। IICA के महानिदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी ज्ञानेश्वर कुमार सिंह ने स्वागत भाषण देते हुए प्रतिभागियों को दो सप्ताह के इस गहन कार्यक्रम को सफलतापूर्वक पूरा करने पर बधाई दी। इस कार्यक्रम में 35 विशेष सत्र शामिल थे, जिनमें कॉरपोरेट गवर्नेंस रूपरेखाओं, नियामक प्रावधानों, वित्तीय प्रबंधन, ऑडिट समिति के कार्य, एंटरप्राइज रिस्क मैनेजमेंट, CSR और सतत शासन से संबंधित विषयों को सम्मिलित किया गया।

उन्होंने यह रेखांकित किया कि सैन्य अधिकारियों की रणनीतिक सोच, जोखिम मूल्यांकन का अनुभव, सुदृढ़ नैतिक ढांचा, तथा दबाव में निष्पक्ष निर्णय लेने की क्षमता उन्हें कॉरपोरेट बोर्डरूम में स्वतंत्र व निष्पक्ष स्वर बनने के लिए विशिष्ट रूप से सक्षम बनाती है। उन्होंने DGR के साथ मजबूत सहयोग तथा कार्यक्रम उपरांत प्रतिभागियों के लिए IICA द्वारा सतत सीख एवं पेशेवर नेटवर्किंग सहायता की प्रतिबद्धता पर भी जोर दिया।

भारत सरकार के पूर्व सचिव, प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के पूर्व सचिव और वर्तमान में अशोका विश्वविद्यालय के आइज़ैक सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी के डिस्टिंग्विश्ड फेलो, डॉ. के. पी. कृष्णन ने उद्घाटन भाषण दिया। उन्होंने प्रतिभागियों को कॉरपोरेट गवर्नेंस के मूलभूत सिद्धांतों एवं स्वतंत्र निदेशकों की भूमिका के बारे में महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रदान किए। उनके अनुसार, स्वतंत्र निदेशक उन हितधारकों के संरक्षक होते हैं जिनकी निर्णय-निर्माण संस्थाओं में प्रत्यक्ष आवाज़ नहीं होती—विशेषकर अल्पसंख्यक शेयरधारक। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस भूमिका में विभिन्न हितधारकों के प्रति फिड्यूशियरी दायित्व निभाते हुए "अधिकतमकरण" नहीं बल्कि "संतुलन" की भावना केंद्र में रहती है। उन्होंने कहा कि प्रतिभागियों के तीन दशक का सैन्य अनुभव—लोगों एवं संसाधनों के प्रबंधन में संतुलित और न्यायसंगत निर्णय—उन्हें स्वतंत्र निदेशक की भूमिका के लिए उपयुक्त रूप से तैयार करता है।

पूर्व सैनिक कल्याण विभाग की सचिव,सुकरिति लिखी ने मुख्य वक्तव्य दिया, जिसमें उन्होंने IICA और DGR के बीच निरंतर सहयोग को रेखांकित किया। उन्होंने रक्षा कर्मियों की असाधारण नेतृत्व क्षमताओं को नागरिक कॉरपोरेट क्षेत्र में उपयोग करने के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने प्रतिभागियों को शासन परिदृश्य और कॉरपोरेट अवसरों के व्यावहारिक पहलुओं पर मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्रदान की, तथा बताया कि भारतीय कॉरपोरेट क्षेत्र में दूरदर्शी, नैतिक और गतिशील बोर्ड सदस्यों की बढ़ती आवश्यकता इस प्रकार के सहयोग को और भी महत्वपूर्ण बनाती है।

कार्यक्रम की रूपरेखा

दो सप्ताह के इस गहन कार्यक्रम का उद्देश्य प्रतिभागियों को कॉरपोरेट गवर्नेंस की अवधारणात्मक एवं नियामक समझ प्रदान करना था ताकि वे सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र की कंपनियों के बोर्ड में प्रभावी योगदान दे सकें। विस्तृत पाठ्यक्रम में शामिल थे—

  • कॉरपोरेट गवर्नेंस सिद्धांत

  • बोर्ड संरचना और उसकी प्रभावशीलता

  • स्वतंत्र निदेशकों की भूमिकाएँ एवं उत्तरदायित्व

  • कंपनी अधिनियम 2013 और SEBI LODR विनियमों के प्रावधान

  • वित्तीय विवरण विश्लेषण

  • ऑडिट समिति के कार्य

  • एंटरप्राइज रिस्क मैनेजमेंट

  • कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) एवं ESG

कार्यक्रम में विषय विशेषज्ञों द्वारा कक्षा व्याख्यान, केस स्टडी आधारित चर्चाएँ, प्रैक्टिसिंग स्वतंत्र निदेशकों के साथ संवाद, तथा अनुभव आधारित शिक्षण पद्धतियाँ शामिल थीं। सैन्य तथा कॉरपोरेट संदर्भों के बीच समझ विकसित करने हेतु अनुभवी प्रैक्टिशनरों के सत्र भी आयोजित किए गए।

यह प्रमाणन प्रतिभागियों को इंडिपेंडेंट डायरेक्टर्स’ डेटाबैंक (IDDB)—जो कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय की पहल है और IICA द्वारा प्रबंधित है—में पंजीकरण के लिए सक्षम बनाता है। वर्तमान में IDDB में 35,000 से अधिक पंजीकृत स्वतंत्र निदेशक हैं, जिनमें 10,000 से अधिक महिलाएँ शामिल हैं, तथा 3,600 से अधिक कंपनियाँ इस प्रतिभा पूल का उपयोग कर रही हैं।

साझेदारी का महत्व

IICA–DGR की यह साझेदारी रक्षा कर्मियों के नेतृत्व कौशल को नागरिक कॉरपोरेट क्षेत्र में लाने और भारतीय कंपनियों में दक्ष एवं नैतिक बोर्ड सदस्यों की आवश्यकता को पूरा करने की दिशा में एक रणनीतिक कदम है। यह कार्यक्रम सैन्य मूल्यों—विश्वास, सत्यनिष्ठा एवं रणनीतिक सोच—को कॉरपोरेट गवर्नेंस के मुख्य सिद्धांतों के साथ जोड़ने का उत्कृष्ट उदाहरण है।

कार्यक्रम का संचालन एवं समन्वय डॉ. निरज गुप्ता, हेड–स्कूल ऑफ कॉरपोरेट गवर्नेंस एंड पब्लिक पॉलिसी, IICA तथा डॉ. अनिंदिता चक्रवर्ती, प्रिंसिपल रिसर्च एसोसिएट, सेंटर फॉर इंडिपेंडेंट डायरेक्टर सेक्रेटेरिएट, IICA द्वारा किया गया।


IICA में डिजिटल ट्रांसफ़ॉर्मेशन और साइबर सुरक्षा पर विशेष सत्र, राष्ट्रीय विशेषज्ञ विनय ठाकुर ने दी गहन अंतर्दृष्टियाँ

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इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ कॉरपोरेट अफेयर्स (IICA) ने डिजिटल गवर्नेंस और साइबर सुरक्षा के राष्ट्रीय विशेषज्ञ, BISAG-N के स्पेशल डायरेक्टर जनरल एवं पूर्व प्रबंध निदेशक, NICSI, विनय ठाकुर के साथ एक अत्यंत सूचनाप्रद और प्रभावशाली सत्र का आयोजन किया।

विनयठाकुर ने डिजिटल ट्रांसफ़ॉर्मेशन, सोल्यूशन आर्किटेक्चर, क्लाउड डिप्लॉयमेंट, साइबर सुरक्षा और पोस्ट क्वांटम क्रिप्टोग्राफी (PQC) जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर व्यापक व्याख्यान दिया।

कार्यक्रम की शुरुआत IICA के महानिदेशक एवं सीईओ ज्ञानेश्वर कुमार सिंह के स्वागत संबोधन के साथ हुई। उन्होंने कहा कि भारत की सामाजिक-आर्थिक प्रगति में भविष्य-दृष्टि वाली डिजिटल स्किल्स और सुरक्षित तकनीकों की महत्वपूर्ण भूमिका है।

भारत के विश्व-स्तरीय डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर विशेष जोर

अपने संबोधन में विनय ठाकुर ने भारत के तेजी से विकसित हो रहे डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) की शक्ति और पैमाने को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि:

  • आधार

  • UPI

  • डिजिलॉकर

  • भारतनेट

  • Co-WIN

  • UMANG

  • मेघराज क्लाउड

  • BISAG-N के GIS आधारित प्लेटफ़ॉर्म

जैसी पहलों ने शासन प्रणाली, सेवा वितरण और नागरिक सशक्तिकरण में क्रांतिकारी बदलाव लाए हैं।

उन्होंने इस डिजिटल परिवर्तन को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व का परिणाम बताया, जिनके मार्गदर्शन में ‘डिजिटल इंडिया’ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक परिवर्तनकारी आंदोलन बन गया है।

साइबर सुरक्षा और पोस्ट क्वांटम क्रिप्टोग्राफी की तात्कालिक आवश्यकता

विनय ठाकुर ने कहा कि भारत के डिजिटल विस्तार के साथ साइबर सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है। उन्होंने चर्चा की:

  • बढ़ते साइबर खतरों

  • DPDP अधिनियम की अहमियत

  • AI आधारित साइबर हमलों के जोखिम

  • पोस्ट क्वांटम क्रिप्टोग्राफी (PQC) की आवश्यकता

  • स्वदेशी साइबर सुरक्षा समाधानों के महत्व

पर जोर देते हुए कहा कि डिजिटल संप्रभुता के लिए मजबूत और सुरक्षित प्रणालियाँ अनिवार्य हैं।

उत्साहपूर्ण सहभागिता और ज्ञानवर्धक संवाद

कार्यक्रम में संकाय सदस्यों और छात्रों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
इंटरैक्टिव प्रश्न–उत्तर सत्र में प्रतिभागियों ने डिजिटल गवर्नेंस, डेटा सुरक्षा, क्लाउड सुरक्षा और उभरती तकनीकों पर गहन प्रश्न पूछे।

सत्र का समापन धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ, जिसमें विनय ठाकुर के दूरदर्शी विचारों के लिए आभार व्यक्त किया गया और भविष्य के नेतृत्व निर्माण में ऐसे संवाद की महत्ता को रेखांकित किया गया।


विकसित भारत के लक्ष्य की प्राप्ति हेतु सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय (MoSPI) और भारतीय कॉरपोरेट कार्य संस्थान (IICA) के बीच समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर

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नई दिल्ली-सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने 31 अक्टूबर, 2025 को भारतीय कॉरपोरेट कार्य संस्थान (Indian Institute of Corporate Affairs – IICA), जो कि कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्था है, के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए।

इस समझौते का उद्देश्य एक व्यापक सतत विकास लक्ष्य (SDG) संरेखण रूपरेखा (Comprehensive SDG Alignment Framework) विकसित करना है, जो राष्ट्रीय, राज्य, ESG (Environmental, Social, Governance) और CSR (Corporate Social Responsibility) संकेतकों को एकीकृत करते हुए “विकसित भारत” (Viksit Bharat) के विज़न को साकार करने की दिशा में कार्य करेगा।

IICA की भूमिका और नेतृत्व

IICA में यह सहयोग महानिदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्री ज्ञानेश्वर कुमार सिंह के गतिशील नेतृत्व में आरंभ किया गया है। श्री सिंह ने IICA की ESG, CSR और जिम्मेदार व्यवसाय आचरण (Responsible Business Conduct) से संबंधित रणनीतिक पहलों को राष्ट्रीय विकास एजेंडे के साथ जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

हस्ताक्षर समारोह में उपस्थित प्रमुख गणमान्य व्यक्तियों में शामिल थे —

  • किशोर बाबुराव सुरवाडे, अतिरिक्त महानिदेशक, क्षमता विकास प्रभाग, MoSPI

  • डॉ. गरिमा दाधिच, सहयोगी प्राध्यापक एवं प्रमुख, स्कूल ऑफ बिजनेस एनवायरनमेंट, IICA

  • रुचिका गुप्ता, उप महानिदेशक, सामाजिक सांख्यिकी प्रभाग, MoSPI

  • शिवनाथ सिंह जादावत, निदेशक, प्रशिक्षण इकाई, क्षमता विकास प्रभाग, MoSPI

  • डॉ. जियाउल हक, निदेशक, सामाजिक सांख्यिकी प्रभाग, MoSPI
    साथ ही MoSPI और IICA के अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी इस अवसर पर उपस्थित रहे।

राष्ट्रीय संकेतक रूपरेखा (NIF) और सहयोग की दिशा

राष्ट्रीय संकेतक रूपरेखा (National Indicator Framework – NIF), जो भारत की सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की प्रगति की निगरानी का प्रमुख आधार है, इस सहयोग की नींव बनेगी।

इस रूपरेखा के आधार पर, यह पहल एक ऐसी प्रणाली विकसित करेगी जो राज्य स्तर के संकेतकों को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप बनाएगी तथा उनमें ESG और CSR आयामों को भी एकीकृत करेगी।

इस एकीकृत दृष्टिकोण के माध्यम से राष्ट्रीय, राज्य एवं कॉरपोरेट सतत विकास ढाँचों के बीच समन्वय स्थापित किया जाएगा, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि व्यवसायों की CSR और ESG पहलें राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के SDG लक्ष्यों के साथ प्रभावी रूप से जुड़ी हों।

विकसित भारत की दिशा में एकीकृत प्रयास

NIF–SIF (National Indicator Framework – State Indicator Framework) के बीच इस समन्वय से प्रमाण-आधारित नीतिनिर्माण (Evidence-Based Policymaking) को सशक्त किया जाएगा, सतत कॉरपोरेट सहभागिता को बढ़ावा मिलेगा और विकसित भारत के विज़न को साकार करने की दिशा में सुसंगत एवं समावेशी SDG निगरानी और कार्यान्वयन को गति मिलेगी।


IICA में IICA सर्टिफाइड आर्बिट्रेशन प्रोग्राम (ICAP) के प्रथम बैच का समापन समारोह सम्पन्न

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भारतीय कॉरपोरेट कार्य संस्थान (IICA), जो कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन है, के वैकल्पिक विवाद समाधान केंद्र (CEADR) द्वारा आयोजित IICA सर्टिफाइड आर्बिट्रेशन प्रोग्राम (ICAP) के पहले बैच का समापन समारोह (Valedictory Session) 12 अक्टूबर 2025 को IICA परिसर, मानेसर में सम्पन्न हुआ। इस कार्यक्रम का उद्देश्य वैश्विक स्तर के अगली पीढ़ी के मध्यस्थता (arbitration) पेशेवरों का एक सशक्त समूह तैयार करना था।

दो दिवसीय कैंपस इमर्शन और समापन समारोह का उद्घाटन 11 अक्टूबर 2025 को जस्टिस हेमंत गुप्ता, अध्यक्ष, इंडिया इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन सेंटर द्वारा किया गया। अपने मुख्य संबोधन में उन्होंने भारत में मध्यस्थता पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ बनाने में IICA के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि भारत की तीव्र आर्थिक वृद्धि को देखते हुए, निवेशकों के विश्वास को बढ़ाने के लिए एक मजबूत वैकल्पिक विवाद समाधान प्रणाली (ADR System) का निर्माण आवश्यक है। उन्होंने यह भी जोर दिया कि संस्थागत मध्यस्थता (Institutional Arbitration) की स्थापना से मध्यस्थता कार्यवाही अधिक संरचित और प्रभावी हो सकेगी।

ज्ञानेश्वर कुमार सिंह, महानिदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO), IICA ने मुख्य अतिथि डॉ. राजीव मणि, सचिव (विधि विभाग), कानून एवं न्याय मंत्रालय, तथा विशिष्ट अतिथि प्रो. पी. के. मल्होत्रा, पूर्व विधि सचिव, कानून एवं न्याय मंत्रालय, का स्वागत एवं सम्मान किया। अपने स्वागत भाषण में ज्ञानेश्वर कुमार सिंह ने IICA द्वारा की गई विभिन्न मध्यस्थता संबंधी अध्ययनों की जानकारी दी और भारत में संस्थागत मध्यस्थता को बढ़ावा देकर इस क्षेत्र को मानकीकृत करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने मध्यस्थता पुरस्कारों (Arbitral Awards) की प्रवर्तनीयता (Enforceability) से जुड़ी चुनौतियों और उनके समाधान पर भी चर्चा की।

प्रो. पी. के. मल्होत्रा, पूर्व विधि सचिव, कानून एवं न्याय मंत्रालय ने अपने संबोधन में भारत के मध्यस्थता पेशेवरों की योग्यता और क्षमता की सराहना की, लेकिन उन्होंने सहायक पारिस्थितिकी तंत्र (Supporting Ecosystem) की कमी पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने प्रभावी कार्यान्वयन के लिए आवश्यक संशोधनों सहित भारतीय मध्यस्थता परिषद (Arbitration Council of India) की स्थापना के महत्व पर भी बल दिया।

डॉ. राजीव मणि, सचिव (विधि विभाग), कानून एवं न्याय मंत्रालय ने अपने समापन संबोधन (Valedictory Address) में विवाद समाधान के एक प्रभावी माध्यम के रूप में मध्यस्थता के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने भारतीय संवैधानिक इतिहास के संक्रमण काल (Transitional Period) में संविधान निर्माताओं द्वारा कुछ मामलों में मध्यस्थता को प्राथमिकता देने के उदाहरणों का उल्लेख किया। डॉ. मणि ने पारंपरिक अदालती मुकदमों (Court Litigation) के अलावा, मध्यस्थता जैसे अन्य विवाद समाधान माध्यमों को अपनाने के लिए लोगों की सोच, दृष्टिकोण और मानसिकता में परिवर्तन की आवश्यकता पर भी बल दिया।

धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए प्रो. (डॉ.) नवीन सिरोही, प्रमुख, CEADR, IICA ने सभी गणमान्य अतिथियों के सारगर्भित संबोधनों के लिए आभार व्यक्त किया तथा सभी प्रतिभागियों और IICA की आयोजन टीम के सहयोग की सराहना की।


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