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केंद्रीय सचिव अभिलक्ष लिखी ने रायगढ़ में अलंकरणीय मत्स्य ब्रूड बैंक का दौरा किया

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अभिलक्ष लिखी, सचिव, मत्स्य पालन विभाग, मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय, भारत सरकार ने महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मंगरूल गांव में स्थापित अलंकरणीय मत्स्य ब्रूड बैंक का दौरा किया। यह ब्रूड बैंक यशोधरा संजय खंडागले द्वारा प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के तहत स्थापित किया गया है। दौरे के बाद केंद्रीय सचिव ने पीएमएमएसवाई के लाभार्थियों से संवाद कर जमीनी स्तर पर मौजूद चुनौतियों और कमियों की जानकारी ली।

केंद्रीय सचिव द्वारा दौरा किया गया यह ब्रूड बैंक भारत में अपनी तरह की पहली पहल है, जहां 25 से अधिक प्रजातियों की अलंकरणीय मछलियों का संरक्षण और प्रजनन किया जाता है। यशोधरा संजय खंडागले ने अपने ब्रांड “Sam Discus” को देश में उच्च गुणवत्ता वाली डिस्कस मछलियों के प्रमुख उत्पादकों में स्थापित किया है। इस ब्रूड बैंक ने 20 प्रजातियों की लगभग 7.7 लाख अलंकरणीय मछलियों का उत्पादन किया है, जिससे लगभग 1.93 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ तथा 25–30 लोगों के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर सृजित हुए हैं।

700 से अधिक टैंकों से सुसज्जित यह केंद्र कौशल विकास, रोजगार सृजन और सर्वोत्तम प्रक्रियाओं को अपनाने में भी सहयोग करता है तथा अलंकरणीय मत्स्य क्षेत्र के निर्यात को बढ़ावा देता है। यह ब्रूड बैंक नियामकीय मानकों का पालन करता है और GAIS तथा NFDP जैसी सरकारी योजनाओं के अंतर्गत कवर है। यहां से अलंकरणीय मछलियों का निर्यात अमेरिका, इटली, फ्रांस, मॉरीशस, दक्षिण कोरिया, कतर, कुवैत, मलेशिया, चीन, उज्बेकिस्तान, नाइजीरिया और इज़राइल सहित कई देशों में किया जाता है। यह मत्स्य क्षेत्र में नवाचार, सतत विकास और वृद्धि को बढ़ावा देने में सरकारी सहायता के प्रभावी उपयोग को दर्शाता है।

भारत में लगभग 700 स्वदेशी मीठे पानी की तथा 300 से अधिक समुद्री प्रजातियां उपलब्ध हैं, जो विशाल संसाधन क्षमता को दर्शाती हैं। भारत से अलंकरणीय मत्स्य निर्यात का अनुमान लगभग 41 करोड़ रुपये है, जो इस क्षेत्र के बढ़ते आर्थिक योगदान को दर्शाता है। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत अलंकरणीय मत्स्य पालन भारत में एक उच्च संभावनाओं वाले क्षेत्र के रूप में उभर रहा है, जिसे समृद्ध जैव विविधता तथा घरेलू और वैश्विक मांग का समर्थन प्राप्त है।

पीएमएमएसवाई के अंतर्गत अब तक 1,986 बैकयार्ड अलंकरणीय मछली पालन इकाइयों, 6,018 फिश कियोस्क एवं एक्वेरियम, तथा 117 खुदरा बाजारों को सहायता प्रदान की गई है, जिनमें विशेष अलंकरणीय मछली एवं एक्वेरियम बाजार भी शामिल हैं। इसके अतिरिक्त पांच मीठे पानी के अलंकरणीय मछली ब्रूड बैंक और 199 एकीकृत अलंकरणीय मछली इकाइयां स्थापित की गई हैं, जिससे उत्पादन, विपणन और आजीविका के अवसरों को मजबूती मिली है।

भारत सरकार के मत्स्य पालन विभाग ने देशभर में 34 मत्स्य उत्पादन एवं प्रसंस्करण क्लस्टरों को अधिसूचित किया है, जिनमें तमिलनाडु के मदुरै में अलंकरणीय मत्स्य क्लस्टर भी शामिल है।

महाराष्ट्र का मत्स्य क्षेत्र समुद्री और अंतर्देशीय दोनों संसाधनों के कारण मजबूत स्थिति में है। राज्य की 877.97 किलोमीटर लंबी तटरेखा, 173 मत्स्य अवतरण केंद्र और 526 मत्स्य गांव 15 लाख से अधिक मत्स्यजीवियों को आजीविका प्रदान करते हैं। वर्ष 2022–23 में राज्य में लगभग 5.9 लाख टन मछली उत्पादन हुआ। अंतर्देशीय मत्स्य पालन 4.10 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में फैला है, जिसमें जलाशय, नदियां, तालाब और खारे पानी के क्षेत्र शामिल हैं। ब्लू रिवोल्यूशन और पीएमएमएसवाई जैसी योजनाओं के माध्यम से महाराष्ट्र ने मत्स्य पालन, हैचरी, केज कल्चर, बुनियादी ढांचे और मत्स्यजीवियों के कल्याण में उल्लेखनीय प्रगति की है।

यह दौरा अलंकरणीय मत्स्य क्षेत्र को और अधिक सशक्त एवं प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा, क्योंकि इससे जमीनी स्तर का आकलन, हितधारकों की भागीदारी और लक्षित नीतिगत सहायता को बढ़ावा मिलेगा।

मत्स्य पालन विभाग ने नई दिल्ली में ‘सीफूड एक्सपोर्टर्स मीट 2026’ का किया आयोजन

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मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय के अंतर्गत मत्स्य पालन विभाग ने अंबेडकर भवन, नई दिल्ली में सीफूड एक्सपोर्टर्स मीट 2026 का आयोजन किया। इस बैठक में केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह, राज्य मंत्री प्रो. एस.पी. सिंह बघेल और जॉर्ज कुरियन सहित कई वरिष्ठ अधिकारी और उद्योग प्रतिनिधि शामिल हुए।

इस मीट का उद्देश्य सरकार और उद्योग के बीच संवाद स्थापित करना, निर्यातकों की समस्याओं को समझना तथा बाजार विस्तार, मूल्य संवर्धन और निर्यात बढ़ाने के उपायों पर चर्चा करना था।

प्रमुख बिंदु:

  • केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने निर्यातकों के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारत के सीफूड निर्यात में मजबूत वृद्धि हुई है।

  • उन्होंने नए बाजारों की खोज, उत्पाद विविधीकरण और सख्त गुणवत्ता मानकों (जैसे एंटीबायोटिक प्रतिबंध और ट्रेसबिलिटी) के पालन पर जोर दिया।

  • अंडमान-निकोबार, EEZ और गहरे समुद्र में टूना जैसी उच्च मूल्य वाली प्रजातियों के निर्यात की संभावनाओं पर प्रकाश डाला गया।

  • बेहतर कोल्ड-चेन, पैकेजिंग, प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई गई।

  • निर्यातकों को ₹1 लाख करोड़ के लक्ष्य को हासिल करने के लिए प्रोत्साहित किया गया।

अन्य महत्वपूर्ण बातें:

  • राज्य मंत्री जॉर्ज कुरियन ने मत्स्य क्षेत्र को उच्च मूल्य और उच्च मांग वाले सेक्टर के रूप में विकसित करने पर जोर दिया।

  • सचिव डॉ. अभिलक्ष लिक्खी ने बताया कि लगभग 40 देशों के साथ मार्केट डाइवर्सिफिकेशन रणनीति पर काम किया जा रहा है।

  • रेडी-टू-ईट और वैल्यू एडेड उत्पादों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

चुनौतियां और सुझाव:

  • निर्यातकों ने मार्केट एक्सेस, उच्च अनुपालन लागत, कोल्ड-चेन की कमी और लॉजिस्टिक्स समस्याओं को प्रमुख चुनौतियां बताया।

  • कैच सर्टिफिकेट प्रक्रिया को सरल बनाने, समुद्री शैवाल (सीवीड) खेती को बढ़ावा देने और फिश फीड उत्पादन में सुधार की मांग उठाई गई।

पृष्ठभूमि:

  • भारत का सीफूड निर्यात पिछले 11 वर्षों में औसतन 7% वार्षिक वृद्धि के साथ बढ़ा है।

  • 2013-14 में ₹30,213 करोड़ से बढ़कर 2024-25 में ₹62,408 करोड़ हो गया।

  • झींगा (श्रिम्प) निर्यात का इसमें सबसे बड़ा योगदान है।

  • भारत लगभग 130 देशों में 350 से अधिक उत्पाद निर्यात करता है।

यह बैठक भारत के सीफूड निर्यात को और मजबूत करने तथा वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

PMMSY के तहत सिरसा में खारे पानी की झींगा पालन क्लस्टर की समीक्षा, किसानों की आय बढ़ाने पर जोर

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सिरसा (हरियाणा)- भारत सरकार के मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय के तहत मत्स्य पालन विभाग के सचिव डॉ. अभिलक्ष लिखी ने आज हरियाणा के सिरसा जिले का दौरा कर प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के अंतर्गत विकसित खारे पानी (Saline Water) एक्वाकल्चर क्लस्टर की प्रगति की समीक्षा की। इस दौरान उन्होंने झींगा (श्रिम्प) और मछली किसानों से संवाद कर जमीनी स्तर पर आने वाली समस्याओं और चुनौतियों को समझा।

डॉ. लिखी ने किसानों को संबोधित करते हुए तकनीक आधारित झींगा पालन, वैज्ञानिक तालाब प्रबंधन और मजबूत बायो-सिक्योरिटी उपायों को अपनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सिरसा जैसे खारे पानी वाले क्षेत्र झींगा पालन के लिए बेहद उपयुक्त हैं और इससे किसानों की आय में विविधता, रोजगार सृजन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सकती है। उन्होंने MPEDA को किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन देने और निर्यात से जोड़ने के निर्देश भी दिए। साथ ही, स्थानीय स्तर पर परीक्षण किट की उपलब्धता सुनिश्चित करने पर बल दिया गया ताकि किसानों को दूर नहीं जाना पड़े।

चौधरी देवी लाल विश्वविद्यालय (CDLU) में आयोजित एक समीक्षा बैठक में PMMSY के तहत क्लस्टर आधारित मत्स्य विकास योजनाओं की प्रगति पर चर्चा की गई। इस बैठक में केंद्र और राज्य सरकार के अधिकारी, ICAR के वैज्ञानिक, NABARD, NFDB, MPEDA, मत्स्य किसान, सहकारी संस्थाएं और देशभर के प्रतिनिधि शामिल हुए। 500 से अधिक प्रतिभागियों ने बैठक में हिस्सा लिया। किसानों ने इस दौरान बिजली की ऊंची लागत, गुणवत्तापूर्ण बीज की कमी और पानी की उपलब्धता जैसी समस्याएं उठाईं और पंचायत भूमि को स्वयं सहायता समूहों को लीज पर देने की मांग की।

डॉ. लिखी ने सिरसा के रघुआना गांव में PMMSY के तहत विकसित एक सफल झींगा फार्म का भी दौरा किया। करीब 3 हेक्टेयर में फैले 7 तालाबों वाले इस फार्म से सालाना 28 टन उत्पादन हो रहा है, जिससे लगभग ₹90 लाख का कारोबार और स्थानीय रोजगार सृजन हो रहा है। उन्होंने कहा कि झींगा पालन के विस्तार के लिए बेहतर बीज, फीड, बुनियादी ढांचा और बाजार तक पहुंच को मजबूत करना जरूरी है।

हरियाणा ने PMMSY के तहत उल्लेखनीय प्रगति की है, जहां ₹760.88 करोड़ का निवेश आकर्षित हुआ है। राज्य में 456 RAS और बायोफ्लॉक सिस्टम स्थापित किए गए हैं, जबकि 3,766 हेक्टेयर तालाब और 2,204 हेक्टेयर खारे क्षेत्र में विकास कार्य किए जा रहे हैं। इसके अलावा, सिरसा में ₹110 करोड़ का एकीकृत एक्वापार्क स्थापित किया जा रहा है और कोल्ड-चेन इंफ्रास्ट्रक्चर भी विकसित किया जा रहा है।

भारत का झींगा निर्यात समुद्री उत्पादों का प्रमुख हिस्सा है, जो कुल निर्यात का लगभग 69% है। देश का समुद्री निर्यात पिछले दशक में दोगुना होकर ₹62,408 करोड़ तक पहुंच गया है, जिसमें झींगा का योगदान ₹43,334 करोड़ है।

देश में 34 मत्स्य क्लस्टर विकसित किए जा रहे हैं, जिनमें सिरसा का खारा पानी क्लस्टर एक प्रमुख उदाहरण है। यह क्लस्टर झींगा, स्कैम्पी और सीबास जैसी उच्च मूल्य वाली प्रजातियों के जरिए किसानों की आय बढ़ाने, रोजगार सृजन और संसाधनों के बेहतर उपयोग को बढ़ावा दे रहा है।

भारत का अंतर्देशीय मत्स्य क्षेत्र तेजी से बढ़ रहा है, जो कुल उत्पादन का 75% योगदान देता है। 2013-14 से 2024-25 के बीच उत्पादन 61 लाख टन से बढ़कर 153 लाख टन हो गया है। देश के विशाल जल संसाधनों को देखते हुए मत्स्य पालन क्षेत्र में विकास की अपार संभावनाएं हैं, जिसे सरकार प्राथमिकता दे रही है।

निष्कर्ष: सिरसा का यह मॉडल दर्शाता है कि सही नीति, तकनीक और सहयोग के जरिए खारे और अनुपयोगी क्षेत्रों को भी आय और रोजगार के मजबूत स्रोत में बदला जा सकता है।

भारत के मत्स्य क्षेत्र को मिला अब तक का सबसे बड़ा बजट, उत्पादन में 106% की ऐतिहासिक बढ़ोतरी

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नई दिल्ली- केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2026–27 के लिए मत्स्य क्षेत्र को ₹2,761.80 करोड़ का अब तक का सबसे बड़ा बजट आवंटित किया है। यह कदम देश की ब्लू इकॉनमी को मजबूत करने और करोड़ों मछुआरों की आय बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा प्रयास माना जा रहा है।

सरकार की प्रमुख योजना प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) इस क्षेत्र के विकास की मुख्य धुरी बनी हुई है, जिसके लिए इस वर्ष ₹2,500 करोड़ का प्रावधान किया गया है। इस योजना के माध्यम से उत्पादन बढ़ाने, आधुनिक तकनीक अपनाने और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है।

उत्पादन और निर्यात में बड़ी छलांग

पिछले एक दशक में भारत के मत्स्य क्षेत्र ने उल्लेखनीय प्रगति की है।
वित्त वर्ष 2013-14 में जहां मछली उत्पादन 95.79 लाख टन था, वहीं 2024-25 में यह बढ़कर 197.75 लाख टन हो गया है, जो 106% की वृद्धि दर्शाता है।

इसके साथ ही समुद्री उत्पादों का निर्यात भी बढ़कर ₹62,408 करोड़ तक पहुंच गया है, जिसमें जमे हुए झींगे (Frozen Shrimp) का बड़ा योगदान है।

मछुआरों को मिल रहा सीधा लाभ

सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे मछुआरों तक पहुंच रहा है:

  • 4.39 लाख मछुआरों को किसान क्रेडिट कार्ड (KCC)

  • 33 लाख लोगों को बीमा सुरक्षा

  • 7.44 लाख परिवारों को आजीविका सहायता

इन पहलों से मछुआरों की आय स्थिर हुई है और जोखिम कम हुआ है।

इंफ्रास्ट्रक्चर और तकनीक पर जोर

सरकार ने मत्स्य क्षेत्र को आधुनिक बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं:

  • कोल्ड स्टोरेज, फिश मार्केट और प्रोसेसिंग यूनिट का विकास

  • RAS और Biofloc जैसी नई तकनीकों को बढ़ावा

  • 2,195 फिशर प्रोड्यूसर संगठन (FFPOs) का गठन

इसके अलावा, FIDF योजना के तहत 225 परियोजनाओं में ₹6,685 करोड़ का निवेश किया गया है, जिससे रोजगार और उत्पादन दोनों बढ़े हैं।

 डिजिटल इंडिया से जुड़ा मत्स्य क्षेत्र

सरकार ने नेशनल फिशरीज डिजिटल प्लेटफॉर्म (NFDP) लॉन्च किया है, जिसमें अब तक 30 लाख से अधिक लोग जुड़ चुके हैं। यह प्लेटफॉर्म मछुआरों को:

  • लोन

  • बीमा

  • बाजार से जुड़ाव

जैसी सुविधाएं एक ही जगह पर उपलब्ध कराता है।

सतत विकास और भविष्य की दिशा

सरकार ने 2025 में समुद्री मत्स्य संसाधनों के संरक्षण के लिए नए नियम लागू किए हैं, जिससे पर्यावरण संतुलन बनाए रखते हुए उत्पादन बढ़ाया जा सके।

भारत, जो पहले से ही दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक देश है, अब वैश्विक बाजार में अपनी स्थिति और मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

निष्कर्ष

मत्स्य क्षेत्र में बढ़ता निवेश, नई तकनीक, और डिजिटल पहलें भारत को एक मजबूत और टिकाऊ ब्लू इकॉनमी की ओर ले जा रही हैं। यह क्षेत्र न केवल देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देगा, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार भी बनेगा।

भारत के सीफूड निर्यात में 11 वर्षों में दोगुनी बढ़ोतरी, झींगा निर्यात बना प्रमुख आधार

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भारत के समुद्री उत्पाद (सीफूड) निर्यात में पिछले 11 वर्षों में मजबूत और निरंतर वृद्धि दर्ज की गई है। इस दौरान निर्यात में औसतन 7% की वार्षिक वृद्धि हुई है। वर्ष 2013-14 में ₹30,213 करोड़ के मुकाबले 2024-25 में यह बढ़कर ₹62,408 करोड़ हो गया है, जिसमें प्रमुख योगदान झींगा (श्रिम्प) निर्यात का रहा, जिसकी कीमत ₹43,334 करोड़ रही।

भारत का सीफूड निर्यात काफी विविध है, जिसमें 350 से अधिक उत्पादों की किस्में शामिल हैं और ये लगभग 130 देशों में भेजे जाते हैं। 2024-25 में कुल निर्यात मूल्य का 36.42% हिस्सा अमेरिका को गया, जो सबसे बड़ा बाजार बना हुआ है। इसके बाद चीन, यूरोपीय संघ, दक्षिण-पूर्व एशिया, जापान और मध्य-पूर्व प्रमुख गंतव्य हैं।

निर्यात में फ्रोजन श्रिम्प का दबदबा बना हुआ है, इसके बाद फ्रोजन मछली, स्क्विड, सूखे उत्पाद, कटलफिश, सुरिमी आधारित उत्पाद और जीवित व चिल्ड सीफूड का स्थान है। साथ ही, वैल्यू-एडेड उत्पादों की हिस्सेदारी 2.5% से बढ़कर 11% हो गई है, जिसकी निर्यात कीमत 742 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गई है।

सरकार सीफूड निर्यात में विविधता लाने और वैश्विक बाजार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के तहत मछली उत्पादन, ब्रैकिश वाटर एक्वाकल्चर का विस्तार, नई तकनीकों को अपनाने, रोग प्रबंधन और ट्रेसबिलिटी सिस्टम को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है। इसके साथ ही कोल्ड-चेन नेटवर्क, आधुनिक मछली बंदरगाह और फिश लैंडिंग सेंटर विकसित किए जा रहे हैं।

उच्च मूल्य वाली प्रजातियों जैसे टूना, सीबास, कोबिया, पोम्पानो, मड क्रैब, GIFT तिलापिया, ग्रूपर और टाइगर श्रिम्प के उत्पादन को भी बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे भारत के निर्यात उत्पादों का दायरा और बढ़ सके।

अंतरराष्ट्रीय मानकों और नियमों के अनुरूप बनने के लिए भारत ने कई कदम उठाए हैं। अमेरिका के मरीन मैमल प्रोटेक्शन एक्ट (MMPA) के तहत आवश्यक शर्तों को पूरा करते हुए भारत को 2025 में मंजूरी मिली, जिससे अमेरिकी बाजार में निर्यात जारी रहेगा। साथ ही, टर्टल एक्सक्लूडर डिवाइस (TEDs) के उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है।

व्यवसाय को आसान बनाने के लिए सैनिटरी इम्पोर्ट परमिट (SIP) प्रणाली को डिजिटल कर दिया गया है, जिससे मंजूरी का समय 30 दिनों से घटकर 72 घंटे रह गया है। कुछ उत्पादों के लिए SIP की आवश्यकता भी समाप्त कर दी गई है, जिससे व्यापार को बढ़ावा मिला है।

आने वाले पांच वर्षों में सरकार का लक्ष्य उच्च मूल्य वाले उत्पादों का निर्यात बढ़ाना, नए बाजारों तक पहुंच बनाना और गुणवत्ता मानकों को मजबूत करना है। यूके, यूरोपीय संघ, आसियान और पश्चिम एशिया जैसे बाजारों में विस्तार पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

इन प्रयासों के साथ भारत वैश्विक स्तर पर एक भरोसेमंद और प्रीमियम सीफूड निर्यातक के रूप में अपनी पहचान मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

भारत सरकार ने समुद्री शैवाल (सीवीड) खेती को बढ़ावा देने के लिए ठोस कदम उठाए, अंडमान-निकोबार को ब्लू इकोनॉमी हब बनाने की दिशा में पहल

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भारत सरकार अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह को ब्लू इकोनॉमी के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित करने के उद्देश्य से समुद्री शैवाल (सीवीड) खेती और समुद्री मत्स्य पालन को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित कर रही है। इस दिशा में वैज्ञानिक तथा संस्थागत स्तर पर कई महत्त्वपूर्ण पहल की जा रही हैं।

परिषद् वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान (CSIR) के अंतर्गत केंद्रीय नमक एवं समुद्री रसायन अनुसंधान संस्थान (CSMCRI) द्वारा “अंडमान तट पर व्यावसायिक समुद्री शैवाल की पूर्व-व्यवहार्यता अध्ययन एवं पायलट स्तर पर खेती” परियोजना को लागू किया गया है। इस परियोजना के तहत समुद्री शैवाल खेती के लिए 25 विभिन्न स्थानों का विस्तृत अध्ययन किया गया, जिससे सर्वाधिक अनुकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों और पोषक तत्वों वाले क्षेत्रों की पहचान की जा सके।

इस अध्ययन के अंतर्गत Gracilaria edulis, Gracilaria debilis, Gracilaria salicornia तथा Kappaphycus alvarezii प्रजातियों का परीक्षण फ्लोटिंग बांस राफ्ट, ट्यूब नेट, नेट बैग और मोनो-लाइन जैसी तकनीकों से किया गया। इसके परिणामस्वरूप हाठी टापू (दक्षिण अंडमान), मायाबंदर (मध्य अंडमान) और दिगलीपुर (उत्तर अंडमान) में Gracilaria edulis और Kappaphycus alvarezii के साथ व्यावसायिक समुद्री शैवाल खेती सफलतापूर्वक स्थापित की गई है।

इसके अतिरिक्त, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अंतर्गत स्वायत्त संस्थान राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान (NIOT) ने अंडमान सागर में पहली बार खुले समुद्र में समुद्री मत्स्य पालन और गहरे पानी में समुद्री शैवाल खेती की परियोजना प्रारंभ की है। साथ ही, CSIR द्वारा शुरू किए गए “सीवीड मिशन” का उद्देश्य समुद्री शैवाल खेती को लाभकारी, पर्यावरण-अनुकूल, टिकाऊ और बड़े पैमाने पर अपनाने योग्य बनाना है।

सीवीड मिशन के अंतर्गत तमिलनाडु में 800 से अधिक स्वयं सहायता समूहों (SHGs) ने Kappaphycus की खेती को आजीविका के रूप में अपनाया है। इस शोध एवं विकास के परिणामस्वरूप एक नया समुद्री शैवाल उद्योग विकसित हुआ है, जिससे रोजगार के नए अवसर और अतिरिक्त आय के स्रोत सृजित हुए हैं। समुद्री शैवाल आधारित तकनीकों को 12 कंपनियों को व्यावसायीकरण के लिए हस्तांतरित किया गया है। अब तक लगभग 5,000 मछुआरों को तमिलनाडु, गुजरात और आंध्र प्रदेश में विभिन्न योजनाओं के तहत प्रशिक्षण दिया जा चुका है।

सरकार ने महिलाओं के नेतृत्व वाले स्वयं सहायता समूहों को विशेष रूप से प्रोत्साहित करने के लिए लक्षित वित्तीय और संस्थागत सहायता उपलब्ध कराई है। राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड (NFDB) के माध्यम से प्रशिक्षण, प्रदर्शन, मूल्य संवर्धन, स्थानीय प्रसंस्करण और विपणन के लिए सहायता दी जा रही है। मत्स्य विभाग (DoF) द्वारा बीज/रोपण सामग्री के आयात और उत्पादन से संबंधित तकनीकी दिशानिर्देश भी जारी किए गए हैं, जिनमें मछुआर परिवारों और महिला SHGs को प्राथमिक लाभार्थी के रूप में मान्यता दी गई है।

सरकार ने वर्ष 2030 तक समुद्री शैवाल उत्पादन को 11.2 लाख टन तक पहुँचाने का लक्ष्य निर्धारित किया है, जिसे मुख्यतः प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के तहत लागू किया जा रहा है। इस क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए ₹194.09 करोड़ का निवेश किया गया है, जिसमें तमिलनाडु में बहुउद्देशीय सीवीड पार्क और दमन एवं दीव में सीवीड ब्रूड बैंक की स्थापना शामिल है। इसके तहत 46,095 सीवीड राफ्ट और 65,330 मोनो-लाइन ट्यूब नेट की स्वीकृति दी जा चुकी है।

केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान (CMFRI), मंडपम केंद्र को समुद्री शैवाल खेती के लिए उत्कृष्टता केंद्र और नाभिकीय प्रजनन केंद्र (Nucleus Breeding Centre) के नोडल संस्थान के रूप में नामित किया गया है। इससे 20,000 से अधिक किसानों को लाभ और 5,000 से अधिक रोजगार अवसर सृजित होने की संभावना है। पिछले पाँच वर्षों में CMFRI द्वारा 5,268 राफ्ट और 112 मोनो-लाइन ट्यूब नेट स्थापित किए गए तथा 14,000 से अधिक हितधारकों के लिए 169 प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं।

यह जानकारी पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने 5 फरवरी 2026 को राज्यसभा में दी।

प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY): कौशल विकास और क्षमता निर्माण से मत्स्य क्षेत्र को नई दिशा

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प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) मत्स्य पालन मूल्य श्रृंखला के आधुनिकीकरण, उत्पादकता बढ़ाने, कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने तथा विपणन संपर्कों की स्थापना के लिए कौशल विकास और क्षमता निर्माण को एक महत्वपूर्ण आधार मानती है। इस योजना का उद्देश्य मानव संसाधन और संस्थागत क्षमता को सुदृढ़ कर मत्स्य एवं जलीय कृषि क्षेत्र को सशक्त बनाना है।

PMMSY के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने और मत्स्य एवं जलीय कृषि क्षेत्र में विकसित भारत 2047 के विज़न के अनुरूप, केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी तथा पंचायती राज मंत्री राजीव रंजन सिंह (ललन सिंह) ने राष्ट्रीय मत्स्य कृषक दिवस (10 जुलाई 2025) के अवसर पर भुवनेश्वर (ओडिशा) स्थित ICAR–केंद्रीय मीठाजल जलीय कृषि संस्थान (CIFA) में“ICAR मत्स्य संस्थानों एवं उनके क्षेत्रीय केंद्रों का प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण कार्यक्रम कैलेंडर” तथा “NFDB एवं ICAR द्वारा प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण एवं एक्सपोज़र विज़िट कैलेंडर” का विमोचन किया।

यह कैलेंडर 2025–2027 की अवधि के लिए प्रशिक्षण, एक्सपोज़र विज़िट और ज्ञान-साझाकरण गतिविधियों का एक सुव्यवस्थित रोडमैप प्रदान करता है।

व्यापक कवरेज और प्रशिक्षण पाठ्यक्रम

इन कार्यक्रमों का उद्देश्य मछुआरों और मत्स्य किसानों को तकनीकी रूप से सशक्त बनाना, वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना तथा पर्यावरण-सम्मत कार्यप्रणालियों को बढ़ावा देना है।
तेजी से विकसित हो रही जलीय कृषि तकनीकों और गुणवत्तापूर्ण मत्स्य उत्पादों की बढ़ती मांग को देखते हुए, प्रशिक्षण में पूर्व-उत्पादन, उत्पादन और उत्तर-उत्पादन चरणों को शामिल किया गया है, जिनमें—

  • हैचरी संचालन

  • उन्नत ग्रो-आउट तकनीक

  • समेकित/संयुक्त मत्स्य पालन

  • मत्स्य स्वास्थ्य प्रबंधन

  • फ़ीड निर्माण

  • समुद्री शैवाल (सीवीड) की खेती

  • मूल्यवर्धित मत्स्य प्रसंस्करण

पर विशेष ध्यान दिया गया है।

इसके अतिरिक्त, आधुनिक प्रणालियों जैसे रीसर्कुलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम (RAS), बायोफ्लॉक, केज कल्चर और सजावटी मछली प्रजनन पर विशेष प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है, जिससे किसान अपने कार्यों में विविधता और विस्तार कर सकें।
आजीविका एवं रोजगार केंद्रित प्रशिक्षण—जैसे सजावटी मत्स्य पालन, मत्स्य विपणन संपर्क तथा महिलाओं के लिए मूल्यवर्धित मत्स्य उत्पाद—भी कैलेंडर में सम्मिलित हैं।

अखिल भारतीय स्तर पर आयोजित एक्सपोज़र विज़िट किसानों को उन्नत तकनीकों को प्रत्यक्ष रूप से देखने और व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करने का अवसर प्रदान करती हैं। साथ ही, फिश फेस्टिवल, मेले आदि के माध्यम से घरेलू मछली/झींगा उपभोग को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है।

बजट एवं कार्यान्वयन

इस उद्देश्य से मत्स्य पालन विभाग, भारत सरकार ने ₹2.93 करोड़ की वित्तीय राशि चिन्हित की है, जिसे राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड (NFDB), हैदराबाद—PMMSY और PM-MKSSY के अंतर्गत प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण कार्यक्रमों की नोडल कार्यान्वयन एजेंसी—के माध्यम से क्रियान्वित किया जा रहा है।
मछुआरों और मत्स्य किसानों के प्रशिक्षण से संबंधित सभी व्यय विभाग द्वारा वहन किए जा रहे हैं।

प्रशिक्षण का संचालन राज्य एवं केंद्रशासित प्रदेशों के मत्स्य विभागों, ICAR मत्स्य अनुसंधान संस्थानों एवं उनके क्षेत्रीय केंद्रों, कृषि विज्ञान केंद्र (KVKs), एग्रीकल्चर स्किल काउंसिल ऑफ इंडिया (ASCI), CIFNET और NIFPHAT द्वारा किया गया।
पिछले छह महीनों में 499 प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनसे 22,921 प्रतिभागी लाभान्वित हुए।

भविष्य की दिशा

मत्स्य पालन विभाग के नेतृत्व में यह पहल न केवल हितधारकों को सशक्त बना रही है, बल्कि मत्स्य एवं जलीय कृषि क्षेत्र के दीर्घकालिक विकास, लचीलापन, रोजगार सृजन, खाद्य एवं पोषण सुरक्षा के लिए एक मजबूत आधार भी तैयार कर रही है। यह प्रयास देश के सामाजिक-आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देगा।

प्रशिक्षण कार्यक्रमों का सारांश

  • क्रम सं.
  • संस्थान का नाम
  • प्रशिक्षण कार्यक्रम
  • प्रतिभागी
  • 1
  • ICAR-CIFE, मुंबई एवं क्षेत्रीय केंद्र
  • 55
  • 1830
  • 2
  • ICAR-CIFA, भुवनेश्वर
  • 27
  • 737
  • 3
  • ICAR-CIBA, चेन्नई
  • 31
  • 1207
  • 4
  • ICAR-CIFT, कोच्चि
  • 55
  • 1001
  • 5
  • ICAR-CIFRI, कोलकाता
  • 42
  • 1776
  • 6
  • ICAR–शीत जल मत्स्य अनुसंधान संस्थान, भीमताल
  • 50
  • 3040
  • 7
  • ICAR-CMFRI, कोच्चि
  • 23
  • 622
  • 8
  • ICAR-NBFGR, लखनऊ
  • 58
  • 5592
  • 9
  • ICAR-ATARI, कोलकाता
  • 48
  • 1660
  • 10
  • ICAR-ATARI, जबलपुर
  • 3
  • 75
  • 11
  • ASCI
  • 26
  • 796
  • 12
  • TSP
  • 51
  • 3185
  • 13
  • SCSP
  • 19
  • 950
  • 14
  • CIFNET
  • 11
  • 450
  • कुल

  • 499
  • 22,921




भारत में देशी मछली प्रजातियों के संवर्धन और मछली पालन में विविधीकरण को बढ़ावा

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भारत की विविध जलीय पारिस्थितिकी तंत्र, जो हिमालयी नदियों से लेकर भारतीय महासागर के तटीय जल तक फैली हुई है, में कई स्थानीय (देशी) मछली प्रजातियां पाई जाती हैं। ये प्रजातियां न केवल देश की पारिस्थितिकी संतुलन के लिए महत्वपूर्ण हैं, बल्कि सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से भी अत्यंत मूल्यवान हैं। इन देशी मछली प्रजातियों को बढ़ावा देना आवश्यक है, क्योंकि यह मछली पालन की स्थिरता, खाद्य सुरक्षा, स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं का समर्थन और जैव विविधता संरक्षण में योगदान देता है। बढ़ती मछली उत्पादों की मांग और पर्यावरणीय चुनौतियों को देखते हुए, इन देशी प्रजातियों का रणनीतिक संवर्धन इन लक्ष्यों को प्राप्त करने का मार्ग प्रदान करता है और देश की जलीय विरासत को संरक्षित करता है।

देशी मछली प्रजातियां, जिन्हें स्थानीय या मूल प्रजातियां भी कहा जाता है, वे प्रजातियां हैं जो विशेष भौगोलिक क्षेत्रों और जलीय वातावरण में विकसित और अनुकूलित हुई हैं। भारत में इन प्रजातियों में ताजा पानी, खारी पानी और समुद्री मछलियों की विस्तृत विविधता शामिल है, जिनका पारिस्थितिक और आर्थिक महत्व अद्वितीय है। अब तक 2800 से अधिक देशी मछली और शेलफिश प्रजातियां पहचानी जा चुकी हैं, जिनमें 917 ताजा पानी, 394 खारी पानी और 1548 समुद्री प्रजातियां शामिल हैं (स्रोत: ICAR-NBFGR)।

देश में अब तक 80 से अधिक वाणिज्यिक रूप से महत्वपूर्ण मछली/शेलफिश प्रजातियों के लिए प्रजनन और बीज उत्पादन तकनीक विकसित की गई है। हालांकि, भारत के मछली पालन उत्पादन का बड़ा हिस्सा कुछ चयनित प्रजातियों से ही आता है। तीन प्रमुख कॉर्प मछलियां – रोहु (Labeo rohita), कतला (Catla catla) और मृगल (Cirrhinus mrigala) और जायंट फ्रेशवाटर प्रॉन (Macrobrachium rosenbergii) भारतीय ताजे पानी के मछली पालन की रीढ़ हैं। इस कारण, 19.50 मिलियन टन ताजे पानी की मछली उत्पादन में तीन-चौथाई हिस्सेदारी भारतीय प्रमुख कॉर्प मछलियों की है।

खारी पानी में, वर्तमान उत्पादन का अधिकांश हिस्सा एक विदेशी झींगा प्रजाति (Penaeus vannamei) से आता है, जबकि देशी ब्लैक टाइगर झींगा (Penaeus monodon) का योगदान छोटा है। समुद्री मछली पालन अभी प्रारंभिक अवस्था में है।

मछली पालन में विविधीकरण को बढ़ावा देने के लिए यह आवश्यक है कि ताजे पानी, खारी पानी और समुद्री पर्यावरण में आर्थिक महत्व वाली संभावित देशी मछली प्रजातियों को प्राथमिकता दी जाए। प्रारंभिक रूप से जिन देशी प्रजातियों को चुना गया है, वे इस प्रकार हैं:

  1. फ्रिंज्ड-लिप्ड कॉर्प (Labeo fimbriatus)

  2. ऑलिव बार्ब (Systomus sarana)

  3. पेंगबा (Osteobrama belangiri)

  4. स्ट्राइप्ड मुर्रेल (Channa striata)

  5. पबड़ा (Ompok spp.)

  6. सिंगही (Heteropneustes fossilis)

  7. एशियन सीबास (Lates calcarifer)

  8. पर्लस्पॉट (Etroplus suratensis)

  9. पॉम्पानो (Trachinotus spp.)

  10. मड क्रैब (Scylla spp.)

  11. Penaeus indicus

इन प्रजातियों को मछली पालन के लिए उत्कृष्ट उम्मीदवार माना गया है, और इनके प्रजनन, बड़े पैमाने पर बीज उत्पादन और फार्मिंग तकनीकें उपलब्ध हैं। ये प्रजातियां स्थानीय समुदायों और उनके जलीय वातावरण के बीच गहरे संबंध को दर्शाती हैं और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने में मदद करती हैं। ये प्रजातियां न केवल सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि स्थानीय समुदायों की आजीविका के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये स्थानीय और क्षेत्रीय बाजारों में उच्च मूल्य रखती हैं। ये लाखों लोगों के आहार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और मछली पालन उत्पादन और आय में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं।

अक्सर देशी मछली प्रजातियों के लाभों के प्रति जागरूकता और तकनीकी ज्ञान की कमी होती है। इस कमी के कारण इन्हें मछली पालन प्रणालियों में पूरी तरह से शामिल करना मुश्किल हो जाता है। इसलिए हितधारकों को देशी प्रजातियों के प्रजनन, बीज उत्पादन और फार्मिंग तकनीकों के लाभों और तरीकों पर प्रशिक्षण देना आवश्यक है।

भारत में ताजा पानी और मछली पालन उत्पादन कुल मछली उत्पादन का 75% से अधिक योगदान देते हैं, जो दर्शाता है कि फार्मिंग सिस्टम पकड़ मछली (कैप्चर फिशरीज) पर हावी हैं। इस दिशा में, मछली पालन विभाग (DoF), भारत सरकार, प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY), नया उप-योजना प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना (PMMKSSY) और फिशरीज एवं एक्वाकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फंड (FIDF) के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण बीज और फीड की आपूर्ति को बढ़ावा देने, तकनीकी ज्ञान का प्रसार करने और प्रशिक्षण देने का कार्य कर रहा है।

PMMSY योजना का उद्देश्य मछली पालन उत्पादन बढ़ाना, मछुआरों की आजीविका सुधारना और जलीय संसाधनों के सतत उपयोग को सुनिश्चित करना है। यह योजना अक्वाकल्चर का विस्तार, प्रजातियों का विविधीकरण और आनुवंशिक सुधार पर केंद्रित है।

ICAR विभिन्न अनुसंधान संस्थानों के माध्यम से देशी मछली प्रजातियों पर अनुसंधान करता है, जिसमें उनकी जीवविज्ञान, प्रजनन आदतें, वाणिज्यिक रूप से महत्वपूर्ण मछली और शेलफिश प्रजातियों के आनुवंशिक सुधार कार्यक्रम और आवास आवश्यकताओं का अध्ययन शामिल है। ICAR संकटग्रस्त और लुप्तप्राय देशी मछली प्रजातियों के संरक्षण के प्रयासों में भी लगा हुआ है।

DoF ने ICAR के साथ परामर्श कर कुछ देशी प्रजातियों का आनुवंशिक सुधार हेतु चयन किया और गुणवत्तापूर्ण और स्वस्थ बीज उत्पादन के लिए वित्तीय सहायता दी। चयनित प्रजातियां हैं:

  1. स्कैम्पी

  2. रोहु

  3. कतला

  4. मुर्रेल

  5. Penaeus indicus

  6. Penaeus monodon

  7. भारतीय पॉम्पानो

इसके अलावा, PMMSY के तहत ICAR-CIFA, भुवनेश्वर में ताजे पानी की प्रजातियों के लिए न्यूक्लियस ब्रीडिंग सेंटर और ICAR-CMFRI, मंडपम में समुद्री प्रजातियों के लिए न्यूक्लियस ब्रीडिंग सेंटर की स्थापना को मंजूरी दी गई है।

DoF ने क्षेत्रीय महत्व के आधार पर देशी प्रजातियों के उत्पादन और प्रसंस्करण क्लस्टर भी स्थापित किए हैं, जिनका उद्देश्य उत्पादन बढ़ाना, मूल्य श्रृंखला मजबूत करना, पश्चात-उत्पादन नुकसान कम करना और ग्रामीण महिलाओं और युवाओं को रोजगार प्रदान करना है। कुल 34 क्लस्टर की घोषणा की गई है, जिनमें शामिल हैं:

  • ओडिशा: स्कैम्पी क्लस्टर

  • तेलंगाना: मुर्रेल क्लस्टर

  • त्रिपुरा: पबड़ा क्लस्टर

  • मणिपुर: पेंगबा क्लस्टर

  • जम्मू-कश्मीर: ट्राउट क्लस्टर

  • लद्दाख: ट्राउट क्लस्टर

  • केरल: पर्लस्पॉट क्लस्टर

  • कर्नाटक: समुद्री देशी प्रजातियों का केज कल्चर

  • मदुरै: ऑर्नामेंटल फिशरीज क्लस्टर

ये प्रयास भारत में देशी मछली प्रजातियों के संवर्धन, उत्पादन और सतत उपयोग की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैं।

भारत सरकार की मत्स्य और दुग्ध विकास योजनाओं से गुजरात में मत्स्य और डेयरी क्षेत्र को मिली मजबूती

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नई दिल्ली- भारत सरकार के मत्स्य विभाग (DoF) और पशुपालन एवं डेयरी विभाग (DAHD) देश के सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में मत्स्य और दुग्ध क्षेत्र के समग्र विकास के लिए विभिन्न योजनाओं को लागू कर रहे हैं, जिनमें गुजरात भी शामिल है।

मत्स्य क्षेत्र में प्रमुख पहल:

मुख्य योजनाओं में ब्लू रिवोल्यूशन योजना (2015-16 से 2019-20), मत्स्य पालन में किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) का विस्तार (2018-19 से), Fisheries and Aquaculture Infrastructure Development Fund (FIDF) (2018-19 से 2025-26), प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) (2020-21 से 2024-26) और नया केंद्रीय उप-योजना प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह योजना (PM-MKSSY) (2023-24 से 2026-27) शामिल हैं। इन पहलों का मुख्य उद्देश्य मत्स्य उत्पादन बढ़ाना, मत्स्य अवसंरचना मजबूत करना, मत्स्यपालकों की आजीविका सुरक्षित करना और संसाधनों की स्थिरता सुनिश्चित करना है।

PMMSY के तहत, पिछले पांच वर्षों में गुजरात के 1200 मत्स्यपालकों को प्रशिक्षण दिया गया, जिसके लिए 10 लाख रुपये का बजट स्वीकृत किया गया। प्रशिक्षण में कृत्रिम रीफ स्थापित करना, सी-वीड फार्मिंग, रोग प्रबंधन, बेस्ट मैनेजमेंट प्रैक्टिस, झींगा पालन और मारीकल्चर जैसी सतत् प्रथाओं को बढ़ावा देना शामिल था।

साथ ही, गुजरात सरकार ने 2025–26 में तटीय एक्वाकल्चर कल्याण योजनाओं पर कुल ₹160 करोड़ का बजट खर्च किया। इस अवधि में कई प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन कामधेनु विश्वविद्यालय और ICAR-CIBA के सहयोग से किया गया।

डेयरी क्षेत्र में प्रमुख पहल:

राष्ट्रीय डेयरी विकास कार्यक्रम (NPDD) फरवरी 2014 से पूरे देश में लागू है। जुलाई 2021 में इसे पुनर्गठित किया गया, जिसके तहत दो प्रमुख घटक हैं:

  1. Component A: गुणवत्ता वाले दूध जांच उपकरण और प्राथमिक चिलिंग सुविधाओं के लिए अवसंरचना सृजन/मजबूती।

  2. Component B: सहकारी समितियों के माध्यम से डेयरीकरण।

NPDD के तहत गुजरात में 9 परियोजनाओं को मंजूरी मिली, जिनमें कुल 55,613.66 लाख रुपये का प्रावधान किया गया। इसके अलावा, डेयरी प्रसंस्करण अवसंरचना विकास कोष (DIDF) अब पशुपालन अवसंरचना विकास कोष (AHIDF) में समाहित किया गया है। SDCFPO योजना के तहत, 12 दूध संघों को 31 अक्टूबर 2025 तक 559.78 करोड़ रुपये का ब्याज सब्सिडी लाभ प्रदान किया गया।

यह जानकारी लोकसभा में मत्स्य, पशुपालन और डेयरी मंत्री राजीव रंजन सिंह (लल्लन सिंह) द्वारा दी गई।

मत्स्य पालन एवं जलीय कृषि में निवेश अवसरों पर लक्षद्वीप में निवेशक सम्मेलन का आयोजन

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भारत सरकार के मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय (MoFAH&D) के अंतर्गत मत्स्य पालन विभाग द्वारा लक्षद्वीप केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन के सहयोग से “लक्षद्वीप द्वीपसमूह के मत्स्य एवं जलीय कृषि क्षेत्र में निवेश अवसर” विषय पर एक निवेशक सम्मेलन का आयोजन 13 दिसंबर 2025 को बंगाराम द्वीप, लक्षद्वीप में किया जा रहा है।

इस कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह, राज्य मंत्री प्रो. एस.पी. सिंह बघेल, जॉर्ज कुरियन, तथा लक्षद्वीप के प्रशासक प्रफुल पटेल सहित कई गणमान्य अतिथि शामिल होंगे।

निवेशकों के लिए अवसर

यह कार्यक्रम निवेशकों को लक्षद्वीप में मत्स्य व जलीय कृषि क्षेत्र के विकास की संभावनाओं को समझने व सहयोग के अवसर तलाशने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करेगा। एक विशेष इंटरैक्टिव सत्र में निवेशक अपने अनुभव और चुनौतियाँ साझा करेंगे, जिससे नीतिगत सुधारों की दिशा तय होगी।

प्रतिभागी

इस कार्यक्रम में मत्स्य पालन विभाग, NFDB, MPEDA, EIC, CMFRI, CIFT, CIFNET, NCDC, NCEL, FSI, UT प्रशासन लक्षद्वीप, स्थानीय मत्स्य समितियों के अधिकारी तथा लगभग 35 प्रमुख निवेशक भाग ले रहे हैं। ये निवेशक टूना, सीवीड, डीप-सी फिशिंग, वेस्ट मैनेजमेंट और ऑर्नामेंटल फिशरी जैसे क्षेत्रों से जुड़े हैं।

लक्षद्वीप में निवेश की संभावनाएँ

लक्षद्वीप द्वीपसमूह में मत्स्य और जलीय कृषि क्षेत्र में अपार संभावनाएँ हैं—

  • कुल कैच का 75% टूना

  • 4200 वर्ग किमी लैगून क्षेत्र

  • समृद्ध ऑर्नामेंटल फिश बायोडायवर्सिटी

संभावित निवेश क्षेत्र:

  • डीप-सी टूना फिशिंग

  • टूना प्रोसेसिंग और कोल्ड-चेन सुविधाएँ

  • सीवीड खेती और समुद्री कृषि (Mariculture)

  • ऑर्नामेंटल फिश प्रोडक्शन यूनिट्स

इन निवेशों से स्थानीय आजीविका को बढ़ावा मिलेगा और ब्लू इकॉनमी को मजबूती मिलेगी। यह कार्यक्रम प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के तहत 1 लाख करोड़ रुपये के निर्यात लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

मुख्य फोकस

  • टूना फिशिंग में पूर्ण hook-to-plate ट्रैसेबिलिटी

  • स्वच्छ लैगूनों में उच्च गुणवत्ता वाले सीवीड की खेती

  • ऑर्नामेंटल फिशरी के लिए समृद्ध प्राकृतिक संसाधन

मत्स्य क्षेत्र की पृष्ठभूमि

  • मत्स्य क्षेत्र देश के 3 करोड़ लोगों की आजीविका का आधार

  • भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक

  • 2015 के बाद से सरकार द्वारा कुल ₹38,572 करोड़ के निवेश स्वीकृत

  • कुल मछली उत्पादन बढ़कर 197 लाख टन

  • समुद्री उत्पादों का निर्यात मूल्य ₹62,400 करोड़

  • लक्ष्य: 2030 तक ₹1 लाख करोड़ का समुद्री निर्यात

सरकार के प्रयास

  • 16 डीप-सी फिशिंग वेसल्स की स्वीकृति

  • सितंबर 2024 में लक्षद्वीप को समर्पित सीवीड क्लस्टर के रूप में अधिसूचित

  • ऑर्नामेंटल फिशरी के 300 प्रजातियों के साथ प्रबल संभावनाएँ

निष्कर्ष

यह निवेशक सम्मेलन लक्षद्वीप की मत्स्य क्षमता को उजागर करने तथा इसे विकसित भारत 2047 के विज़न की दिशा में अग्रसर करने का एक महत्वपूर्ण कदम है।


भारत में विश्व मत्स्य दिवस 2025 का आयोजन: “भारत का ब्लू ट्रांसफॉर्मेशन: समुद्री निर्यात में मूल्य संवर्धन को सुदृढ़ करना”

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मछली पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के तहत मत्स्य विभाग ने आज नई दिल्ली में विश्व मत्स्य दिवस 2025 मनाया। इस वर्ष का थीम था “भारत का ब्लू ट्रांसफॉर्मेशन: समुद्री निर्यात में मूल्य संवर्धन को सुदृढ़ करना”। इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह alias ललन सिंह ने वीडियो संदेश के माध्यम से प्रतिभागियों को संबोधित किया। केंद्रीय राज्य मंत्री प्रो. एस. पी. सिंह बघेल और जॉर्ज कुरियन ने भी इस अवसर पर नई दिल्ली में भाग लिया।

इस अवसर पर मत्स्य विभाग ने राष्ट्रीय मत्स्य और एक्वाकल्चर ट्रेसबिलिटी फ्रेमवर्क 2025 जारी किया और कई महत्वपूर्ण पहलें प्रस्तुत कीं, जिनमें शामिल हैं:

  • मारीकल्चर के लिए SOP

  • स्मार्ट और इंटीग्रेटेड फिशिंग हार्बर के विकास और प्रबंधन के लिए SOP

  • नोटिफाइड मरीन फिश लैंडिंग सेंटर्स में न्यूनतम बुनियादी ढांचे के विकास के लिए SOP

  • जलाशय मत्स्य प्रबंधन के लिए दिशानिर्देश

  • तटीय एक्वाकल्चर दिशानिर्देशों का संकलन

ये पहलें मत्स्य अवसंरचना को आधुनिक बनाने, स्थिरता प्रथाओं को मजबूत करने और क्षेत्र में मूल्य संवर्धन को तेज करने का लक्ष्य रखती हैं।

केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने वीडियो संदेश में भारत की प्रतिबद्धता को दोहराते हुए कहा कि नवाचार और वैश्विक साझेदारियों को बढ़ावा देकर निर्यात प्रतिस्पर्धा को बढ़ाया जाएगा। उन्होंने हितधारकों से अनुरोध किया कि वे पैकेजिंग, प्रमाणन मानकों और मुक्त व्यापार समझौतों का लाभ उठाकर समुद्री उत्पादों के मूल्य श्रृंखला को मजबूत करें। उन्होंने ट्रेसबिलिटी, ब्रांडिंग और जैव-सुरक्षा को वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाए रखने का महत्व भी रेखांकित किया।

जॉर्ज कुरियन ने भारत में मछली उत्पादन को पिछले दशक में 96 लाख टन से बढ़ाकर 195 लाख टन करने की उपलब्धि को उजागर किया और 2030 तक समुद्री उत्पादों के निर्यात को 1 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ाने की महत्वाकांक्षा व्यक्त की, जिसमें 30% उच्च मूल्य वाले उत्पाद होंगे। प्रो. एस. पी. सिंह बघेल ने मत्स्य क्षेत्र के 3 करोड़ से अधिक लोगों की आजीविका में योगदान और निर्यात में वृद्धि के महत्व पर जोर दिया।

मत्स्य विभाग के सचिव डॉ. अभिलाक्ष लिक्खी ने कहा कि भारत का मत्स्य क्षेत्र 9% की वार्षिक दर से बढ़ रहा है और FY 2024–25 में समुद्री उत्पादों का निर्यात 16.85 लाख टन तक पहुँच गया है। उन्होंने मूल्य संवर्धन, विविधीकरण और नियामक अनुपालन पर केंद्रित सरकार की प्राथमिकताओं को रेखांकित किया।

FAO के भारत प्रतिनिधि ताकायुकी हगीवारा ने भी भारत के खाद्य सुरक्षा, स्थिरता और मत्स्य पालन में वैश्विक सहयोग की प्रतिबद्धता दोहराई।

इस अवसर पर 19 देशों के दूतावासों और विश्व बैंक, FAO, AFD, GIZ, JICA, BoBP, MSC जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने भाग लिया, जिससे मत्स्य और एक्वाकल्चर क्षेत्र में वैश्विक सहयोग को बढ़ावा मिला।

राष्ट्रीय मत्स्य और एक्वाकल्चर ट्रेसबिलिटी फ्रेमवर्क 2025 के तहत डिजिटल उपकरणों जैसे ब्लॉकचेन, IoT, QR कोड और GPS का उपयोग कर ‘फार्म टू प्लेट’ और ‘कैच टू कंज्यूमर’ तक समुद्री उत्पादों का ट्रैकिंग सुनिश्चित की जाएगी। यह छोटे मछुआरों और किसानों के लिए भी समावेशी रूप से लागू किया जाएगा।

मुख्य पहलें:

  • National Framework on Traceability in Fisheries and Aquaculture 2025

  • SOP for Mariculture

  • SOP on Development and Management of Smart and Integrated Fishing Harbours

  • SOP on Development of Minimum Basic Infrastructure at Notified Marine Fish Landing Centres

  • Guidelines for Reservoir Fisheries Management

  • Compendium of Coastal Aquaculture Guidelines

भारत ने EEZ में सतत मत्स्य पालन के लिए नए नियम अधिसूचित, मछुआरों और समुद्री निर्यात को मिलेगा मजबूती

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04 नवंबर 2025 को भारत सरकार ने “सतत मत्स्य संसाधनों के उपयोग के लिए एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक ज़ोन (EEZ) नियम” को अधिसूचित किया। यह पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत के समुद्री क्षेत्र की अछूती संभावनाओं को सशक्त करने और सतत और समावेशी ब्लू इकोनॉमी को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह पहल वित्तीय वर्ष 2025–26 के बजट में घोषित संकल्प का पालन करती है, जिसमें अंडमान और निकोबार तथा लक्षद्वीप द्वीपसमूह पर विशेष ध्यान के साथ EEZ और उच्च समुद्री क्षेत्रों से सतत मत्स्य संसाधन उपयोग के लिए सक्षम ढांचे का निर्माण करने का वादा किया गया था।

सहकारी समितियों और समुदाय आधारित मॉडल को प्राथमिकता

नए नियमों के तहत मछुआरा सहकारी समितियों और फिश फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशन (FFPOs) को गहरे समुद्री मत्स्य पालन और तकनीकी रूप से उन्नत जहाजों के संचालन के लिए प्राथमिकता दी गई है। EEZ नियम गहरे समुद्री मत्स्य पालन को सुसज्जित करेंगे और सीफ़ूड निर्यात को बढ़ाने के लिए मूल्य संवर्धन, ट्रेसबिलिटी और प्रमाणन पर जोर देंगे।

मदर-एंड-चाइल्ड जहाजों की अवधारणा के तहत मध्य-सागर में ट्रांसशिपमेंट को RBI के निगरानी तंत्र के साथ अनुमति दी जाएगी। अंडमान और निकोबार तथा लक्षद्वीप में यह व्यवस्था उच्च गुणवत्ता वाली मछली के निर्यात को बढ़ावा देगी।

समग्र सहायता और क्षमता निर्माण

सरकार मछुआरों और उनकी सहकारी समितियों/FFPOs को प्रशिक्षण, अंतरराष्ट्रीय अनुभव यात्राएं और क्षमता निर्माण कार्यक्रम प्रदान करेगी। मूल्य श्रृंखला के सभी पहलुओं जैसे प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन, विपणन, ब्रांडिंग और निर्यात में सहायता दी जाएगी। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) और Fisheries & Aquaculture Infrastructure Development Fund (FIDF) के माध्यम से आसान और किफायती ऋण भी उपलब्ध कराया जाएगा।

हानिकारक प्रथाओं पर रोक और सतत मत्स्य पालन

नए नियम LED लाइट फिशिंग, पेयर ट्रॉवलिंग और बुल ट्रॉवलिंग जैसी हानिकारक मत्स्य पालन प्रथाओं पर रोक लगाते हैं। जैव विविधता संरक्षण के लिए मछली प्रजातियों के लिए न्यूनतम कानूनी आकार निर्धारित किया जाएगा और Fisheries Management Plans राज्य सरकारों और हितधारकों के साथ मिलकर विकसित किए जाएंगे।

सी-केज फार्मिंग और समुद्री शैवाल खेती जैसी मारिकल्प्चर प्रथाओं को बढ़ावा दिया जाएगा, जिससे तटीय क्षेत्रों में मछली पकड़ने पर दबाव कम होगा और उत्पादन बढ़ेगा। ये उपाय विशेष रूप से लघु मछुआरों और उनकी सहकारी समितियों के लिए लाभकारी होंगे।

डिजिटल और पारदर्शी एक्सेस पास तंत्र

EEZ नियमों के तहत मेकैनिकाइज्ड और बड़े मोटरयुक्त जहाजों के लिए एक्सेस पास अनिवार्य होगा, जो ReALCRaft पोर्टल के माध्यम से नि:शुल्क ऑनलाइन प्राप्त किया जा सकता है। पारंपरिक और छोटे मछुआरे इस पास से मुक्त रहेंगे।

ReALCRaft पोर्टल MPEDA और EIC के साथ एकीकृत किया गया है ताकि फिश कैच और स्वास्थ्य प्रमाण पत्र डिजिटल रूप से जारी किए जा सकें, जिससे ट्रेसबिलिटी, स्वास्थ्य अनुपालन और ईको-लेबलिंग सुनिश्चित होगी और भारतीय सीफ़ूड का वैश्विक प्रतिस्पर्धा में स्तर बढ़ेगा।

नियामक सुधार, समुद्री सुरक्षा और तटीय सुरक्षा

EEZ में मत्स्य संसाधनों को ‘भारतीय मूल’ के रूप में मान्यता दी जाएगी, ताकि निर्यात के समय उन्हें आयात के रूप में न माना जाए। Illegal, Unreported, and Unregulated (IUU) Fishing रोकने के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना तैयार की जाएगी।

मछुआरों और उनके जहाजों की सुरक्षा के लिए ट्रांसपोंडर का अनिवार्य उपयोग किया जाएगा और QR-कोडित आधार कार्ड/मछुआरा पहचान कार्ड की पहचान अनिवार्य होगी। ReALCRaft पोर्टल Nabhmitra एप्लिकेशन के साथ जुड़ा हुआ है, जिससे सुरक्षित नेविगेशन और तटीय सुरक्षा सुनिश्चित होगी।

समुद्री मत्स्य पालन का आधुनिकीकरण

ये सुधार समुद्री मत्स्य पालन के शासन को आधुनिक बनाने, सहकारी और समुदाय आधारित मॉडल को सशक्त करने और डिजिटल नवाचार और पारदर्शिता के माध्यम से ब्लू इकोनॉमी को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण मील का पत्थर हैं।

प्रमुख तथ्य

  • भारत की 11,099 किमी की लंबी तटरेखा और 23 लाख वर्ग किमी से अधिक EEZ में 50 लाख से अधिक मछुआरे समुदाय रहते हैं।

  • भारत का EEZ अभी तक गहरे समुद्र में उच्च मूल्य वाले संसाधनों का पूर्ण उपयोग नहीं कर पाया था।

  • बजट 2025–26 में घोषणा की गई थी कि भारत दूसरे स्थान का विश्व मत्स्य उत्पादन देश है और सीफ़ूड निर्यात ₹60,000 करोड़ का है।

ReALCRaft पोर्टल के बारे में

ReALCRaft पोर्टल मछुआरों और तटीय राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के लिए नागरिक-केंद्रित ऑनलाइन सेवाएं प्रदान करता है, जैसे मछली पकड़ने के जहाजों का पंजीकरण, लाइसेंसिंग, स्वामित्व हस्तांतरण आदि। वर्तमान में 2.38 लाख जहाज पोर्टल पर पंजीकृत हैं।

  • मोटरयुक्त जहाज: ~1.32 लाख

  • गैर-मोटरयुक्त पारंपरिक जहाज: 40,461

  • एक्सेस पास अनिवार्य जहाज: 64,187


डॉ. अभिलक्ष लिंखी ने फतेहगढ़ साहिब, पंजाब में मछली पालन और आधुनिक मत्स्य परियोजनाओं का किया अवलोकन

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आज केंद्रीय मत्स्य, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के अंतर्गत मत्स्य विभाग के सचिव डॉ. अभिलक्ष लिंखी ने पंजाब के फतेहगढ़ साहिब जिले का दौरा किया और मछली किसानों एवं मत्स्य उद्यमियों से Recirculatory Aquaculture Systems (RAS) और झींगा पालन से जुड़ी समस्याओं और चुनौतियों पर चर्चा की।

डालुतपुर गांव, बसी पठाना में आधुनिक RAS सुविधाओं का दौरा करते हुए, डॉ. लिंखी ने प्रधान मंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के तहत विभिन्न केंद्रीय योजनाओं के अंतर्गत चल रही मत्स्य परियोजनाओं और गतिविधियों की समीक्षा की। उन्हें स्थानीय किसानों द्वारा अपनाई गई नवीनतम प्रथाओं के बारे में जानकारी दी गई, जिनकी मदद से बंजर भूमि को उत्पादक मत्स्य पालन केंद्र में बदलकर रोजगार और आजीविका के अवसर उत्पन्न किए गए हैं। इस बातचीत में लगभग 35–40 प्रगतिशील मछली किसान शामिल हुए और अपने अनुभव एवं सुझाव साझा किए।

डॉ. लिंखी ने प्रौद्योगिकी-संचालित मछली पालन, किसानों की क्षमता निर्माण और विविध प्रजातियों के पालन के महत्व पर जोर दिया ताकि आय में वृद्धि हो और ग्रामीण आजीविका सुदृढ़ हो। उन्होंने यह भी दोहराया कि सरकार प्रधान मत्स्य योजनाओं के तहत आधुनिक मत्स्य पालन प्रथाओं को बुनियादी ढांचा, नवाचार और क्षमता संवर्धन के माध्यम से समर्थन देने के लिए प्रतिबद्ध है।

 इस दौरे ने यह भी रेखांकित किया कि सरकार पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में खारी जल मत्स्य पालन को प्राथमिकता दे रही है। ये क्षेत्र, जो अक्सर कृषि क्षेत्रों से खारी जल के प्रभाव से प्रभावित होते हैं, मत्स्य पालन के माध्यम से भूमि उपयोग अनुकूलन के लिए अद्वितीय अवसर प्रदान करते हैं।

पृष्ठभूमि –

भारत के अंतर्देशीय जल संसाधनों की संभावना विशाल और अधिकांशतः अछूती है। देश में 1.95 लाख किलोमीटर नदियाँ और नहरें, 6.06 लाख हेक्टेयर खारी जल क्षेत्र, 3.65 लाख हेक्टेयर तालाब और ओक्सबो झीलें, 27.56 लाख हेक्टेयर टैंक और तालाब तथा 31.53 लाख हेक्टेयर जलाशय हैं। इससे सतत अंतर्देशीय मत्स्य विकास की अपार संभावनाएँ हैं।

भारत की अंतर्देशीय मत्स्य उत्पादन राष्ट्रीय मत्स्य उत्पादन का 75% योगदान देता है। 2024–25 में अंतर्देशीय मत्स्य उत्पादन 139.07 लाख मीट्रिक टन रहा। 2013–14 से 2024–25 के बीच अंतर्देशीय मत्स्य उत्पादन में 142% वृद्धि हुई, जो 61 लाख टन से बढ़कर 147.37 लाख टन हो गया। इस विस्तार ने भारत के कुल राष्ट्रीय मत्स्य उत्पादन को 195 लाख टन तक बढ़ा दिया।

प्रधान मंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के तहत भारत में ₹3,300 करोड़ का निवेश किया गया है, जिससे 12,000 RAS यूनिट्स, 4,000 बायोफ्लॉक सिस्टम्स, 59,000 पिंजरे और 561 हेक्टेयर पेन बनाए गए हैं। इससे राष्ट्रीय औसत मत्स्य पालन उत्पादकता 4.77 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर तक पहुंच गई है।

पंजाब में प्रगति:

PMMSY के तहत पंजाब में ₹187 करोड़ का निवेश हुआ, जिसमें केंद्र का हिस्सा ₹72 करोड़ है। राज्य का मत्स्य उत्पादन लक्ष्य 2.21 लाख टन है, जबकि 2023–24 में वास्तविक उत्पादन 1.84 लाख टन रहा। आधुनिक मत्स्य पालन प्रथाओं के माध्यम से पिछले पांच वर्षों में किसानों की आय में लगभग ₹500 करोड़ की वृद्धि हुई और 2020–21 से मत्स्य उत्पादन में 35,000 टन की बढ़ोतरी हुई।

खारी जल मत्स्य पालन:

हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश में 2024–25 के लिए 263.80 हेक्टेयर क्षेत्र में खारी जल मत्स्य पालन परियोजनाओं को मंजूरी दी गई, जिसमें ₹36.93 करोड़ का बजट आवंटित किया गया, जो प्रारंभिक लक्ष्य 200 हेक्टेयर से अधिक है। मुक्तसर साहिब (पंजाब) और सिरसा (हरियाणा) में खारी जल मत्स्य पालन क्लस्टर की स्वीकृति और अधिसूचना महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हैं। इसके अलावा, हरियाणा के सिरसा, पंजाब के मुक्तसर और राजस्थान के चूरू जिलों में खारी जल क्लस्टर के विकास के लिए अधिसूचना जारी की गई है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री धन धान्य कृषि योजना (PM-DDKY) और दालों में आत्मनिर्भरता मिशन की शुरुआत की

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज नई दिल्ली में कृषि और उससे संबंधित क्षेत्रों में सतत एवं समावेशी विकास को बढ़ावा देने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री धन धान्य कृषि योजना (PM-DDKY) और दालों में आत्मनिर्भरता मिशन (Mission for Aatmanirbharta in Pulses) का शुभारंभ किया।

इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम को वर्चुअल माध्यम से संबोधित करते हुए मछली पालन, पशुपालन, डेयरी और पंचायती राज मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ने कहा कि यह पहलें अभिसरण, नवाचार और समावेशी विकास के माध्यम से देश के कृषि प्रधान जिलों में परिवर्तन लाएंगी।

इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पशुपालन क्षेत्र में ₹947 करोड़ की 16 प्रमुख परियोजनाओं का उद्घाटन किया तथा ₹219 करोड़ की एक परियोजना की आधारशिला रखी। इसके साथ ही मत्स्य क्षेत्र में ₹572 करोड़ की 7 नई परियोजनाओं की आधारशिला रखी और ₹121 करोड़ की 9 परियोजनाओं का उद्घाटन किया।

ललन सिंह ने कहा कि 2019 में मछली पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय की स्थापना के बाद इन क्षेत्रों को समर्पित नीति समर्थन मिला जिससे विकास में तीव्र गति आई। आज ये क्षेत्र 10 करोड़ से अधिक लोगों की आजीविका का स्रोत हैं, जिनमें 70% से अधिक महिलाएं डेयरी क्षेत्र से जुड़ी हैं, जो महिलाओं के सशक्तिकरण और ग्रामीण समृद्धि का सच्चा प्रतीक है।

उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) और फिशरीज इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फंड (FIDF) जैसी योजनाओं के माध्यम से मत्स्य क्षेत्र में आधुनिक ढांचे — जैसे फिशिंग हार्बर, हैचरी, फीड मिल, और कोल्ड चेन — के निर्माण को बढ़ावा मिला है। भारत अब मछली उत्पादन में विश्व में दूसरे स्थान पर है, जिसमें 2013–14 के 96 लाख टन से बढ़कर 2024–25 में 195 लाख टन तक की 104% वृद्धि हुई है।

उन्होंने यह भी बताया कि इस अवसर पर ₹693 करोड़ से अधिक की 16 प्रमुख मत्स्य परियोजनाओं का उद्घाटन किया गया है जो उत्पादन, निर्यात और रोजगार को और बढ़ावा देंगी।

डेयरी और पशुपालन क्षेत्रों की उपलब्धियों पर प्रकाश डालते हुए ललन  सिंह ने कहा कि दूध उत्पादन में 63% की वृद्धि (2014–15 में 146 मिलियन टन से बढ़कर 2024–25 में 239 मिलियन टन) हुई है, और भारत दुनिया में दूध उत्पादन में प्रथम स्थान पर है। पशुधन की उत्पादकता में 25% से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है, जो विश्व में सबसे तेज दर है।

उन्होंने कहा कि देशभर में 125 करोड़ से अधिक टीके मुफ्त लगाए गए हैं — जैसे मुंह-खुर रोग (FMD), ब्रुसेलोसिस, PPR आदि के खिलाफ। 9 राज्य अब FMD-मुक्त दर्जे की ओर तेजी से अग्रसर हैं, जिससे भारत के दूध निर्यात को और मजबूती मिलेगी।

ललन सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री धन धान्य कृषि योजना (PM-DDKY) प्रधानमंत्री के उस दृष्टिकोण को साकार करती है जिसके तहत किसानों की आय में वृद्धि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाना, और मत्स्य, पशुपालन एवं डेयरी क्षेत्रों को आत्मनिर्भर भारत के प्रमुख स्तंभ के रूप में स्थापित करना शामिल है।

अंत में, उन्होंने “ग्रामीण समृद्धि से राष्ट्रीय समृद्धि” के संकल्प को दोहराते हुए कहा कि तकनीकी आधारित विकास, बेहतर आजीविका, और सभी के लिए पोषण सुरक्षा इस दिशा में प्रमुख लक्ष्य होंगे।

“देशभर में मत्स्य पालन क्षेत्र के हितधारकों के साथ 15,000 से अधिक मछुआरों और मछली किसानों की आभासी संवाद श्रृंखला संपन्न”

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अप्रैल से सितंबर 2025 तक केंद्रीय मत्स्य विभाग (DoF), मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय द्वारा आयोजित राष्ट्रीय स्तर की आभासी संवाद श्रृंखला में 34 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से 15,000 से अधिक मछुआरे और मछली किसान शामिल हुए। इस पहल का नेतृत्व DoF के सचिव डॉ. अभिलक्ष लिक्खी ने किया, जिससे हितधारकों को सीधे अपने विचार, चिंताएँ और अपेक्षाएँ साझा करने का अवसर मिला।


इन सत्रों में मछुआरों, मछली किसानों, मत्स्य संघों, सहकारी समितियों, Fisheries Farmer Producer Organizations (FFPOs), स्टार्टअप्स, DoF के अधीनस्थ कार्यालयों, ICAR संस्थानों, राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड और राज्य/केंद्र शासित प्रदेश मत्स्य विभागों ने भाग लिया। ये सत्र छह महीने की अवधि में 2 अप्रैल से 30 सितंबर 2025 तक आयोजित किए गए और तटीय, अंतर्देशीय, पहाड़ी, द्वीप और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों सहित लगभग हर जिले का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया गया।

इस अभ्यास ने न केवल वर्तमान चुनौतियों की पहचान करने में मदद की, बल्कि भविष्य की नीति हस्तक्षेप, अवसंरचना योजना और लक्षित कल्याणकारी उपायों के लिए फीडबैक एकत्र करने में भी योगदान दिया। मछुआरों और मछली किसानों ने प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY), प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना (PM-MKSSY), Fisheries and Aquaculture Infrastructure Development Fund (FIDF), समूह दुर्घटना बीमा योजना (GAIS), ब्लू रिवॉल्यूशन और किसान क्रेडिट कार्ड जैसी सरकारी योजनाओं के तहत मिले समर्थन की सराहना की।

हितधारकों से प्रमुख फीडबैक

मछुआरों और मछली किसानों ने उच्च गुणवत्ता वाली मछली के बीज, ब्रूड बैंक, किफायती फ़ीड और स्थानीय फ़ीड मिलों की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने परिवहन, केज कल्चर, मिनी हैचरी, आइस बॉक्स, पॉली शीट, कोल्ड स्टोरेज सुविधाओं और सौर ऊर्जा समेत एक्वाकल्चर के लिए सहायक सुविधाओं को और मजबूत करने की जरूरत बताई।

इसके अलावा, तकनीक-आधारित नवाचारों जैसे लाइव मछली परिवहन के लिए ड्रोन, मछुआरों की सुरक्षा के लिए सैटेलाइट अनुप्रयोग, और संभावित मत्स्य क्षेत्र (PFZ) की जानकारी प्रदान करने जैसी पहल को अपनाने की सलाह दी गई। मछुआरों ने मुफ्त ट्रांसपोंडर की स्थापना की पहल की भी सराहना की, जिसने उन्हें PFZ सलाह, मौसम अलर्ट और चक्रवात अपडेट प्रदान कर सुरक्षित मार्ग पर नेविगेशन में मदद की। साथ ही, इन ट्रांसपोंडरों ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा के अनजाने में पार होने से भी रोका।

मार्केटिंग के क्षेत्र में, मछुआरों ने समर्पित मछली बाजार, कियोस्क और आधुनिक मछली प्रसंस्करण संयंत्रों को मजबूत करने की आवश्यकता बताई ताकि मूल्य श्रृंखला बेहतर हो और मूल्य वर्धन में मदद मिले। उन्होंने PMMSY के तहत वैकल्पिक आजीविका जैसे सीवेड कल्चर, सजावटी मत्स्य पालन और मोती पालन को बढ़ावा देने की सलाह दी। तकनीकी ज्ञान, फार्म प्रबंधन और रोग नियंत्रण में सुधार के लिए नियमित प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया। इसके अतिरिक्त, जल गुणवत्ता परीक्षण प्रयोगशालाओं के माध्यम से जलीय स्वास्थ्य प्रबंधन और रोग नियंत्रण की आवश्यकता पर भी बल दिया गया।

डिजिटल संवाद की विशेषताएँ

मोबाइल-आधारित वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग प्रारूप ने प्रतिभागियों को घर बैठे वरिष्ठ अधिकारियों से सीधे जुड़ने का अवसर दिया। इन फीडबैक सत्रों की महत्वता पर जोर देते हुए, डॉ. अभिलक्ष लिक्खी ने कहा:

“इन सत्रों के माध्यम से मछुआरों और मछली किसानों और नीति निर्धारकों के बीच एक महत्वपूर्ण पुल बना है। प्राप्त सुझाव हमारे हस्तक्षेपों को मार्गदर्शन देंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि इस क्षेत्र में विकास समावेशी, सतत और किसान-केंद्रित रहे, जैसा कि मत्स्य विभाग की 5 वर्ष की रोडमैप और ‘विकसित भारत 2047’ की दृष्टि में परिलक्षित है।”

मत्स्य पालन क्षेत्र के बारे में

मत्स्य पालन क्षेत्र, जिसे ‘सनराइज सेक्टर’ के रूप में माना जाता है, लगभग 3 करोड़ लोगों के रोजगार के लिए महत्वपूर्ण है, विशेषकर हाशिए पर और कमजोर मछुआरों और मछली किसानों के लिए। भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक है, जो वैश्विक उत्पादन में 8% का योगदान देता है, और विश्व स्तर पर मत्स्य पालन उत्पादन में भी दूसरे स्थान पर है।

2015 के बाद से लागू लक्षित पहलों के तहत भारत सरकार ने विभिन्न योजनाओं में कुल ₹38,572 करोड़ के निवेश की मंजूरी या घोषणा की है। इसके परिणामस्वरूप कुल मछली उत्पादन 195 लाख टन तक पहुंच गया है। इस क्षेत्र की वार्षिक वृद्धि दर 8.74% है। समुद्री खाद्य निर्यात भी 2023-24 में ₹60,524 करोड़ तक बढ़ गया।

देश भर में 34 मत्स्य उत्पादन और प्रसंस्करण क्लस्टरों की घोषणा के साथ, विभाग अब प्रजाति-विशिष्ट क्लस्टरों का निर्माण कर रहा है, ताकि प्रजाति-विशिष्ट मूल्य श्रृंखला को मजबूत किया जा सके और नवीनतम तकनीकों का लाभ उठाया जा सके। इस क्लस्टर आधारित दृष्टिकोण का उद्देश्य महिलाओं को सशक्त करना, FFPOs और सहकारी समितियों के माध्यम से घरेलू मछली खपत बढ़ाना, निर्यात को बढ़ावा देना और कमजोर मछुआरों और मछली किसानों के लिए आजीविका सुनिश्चित करना भी है।



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