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उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने सेशेल्स संसदीय प्रतिनिधिमंडल से की मुलाकात, द्विपक्षीय संबंधों को नई गति देने पर जोर

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भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने आज नई दिल्ली स्थित संसद भवन में सेशेल्स गणराज्य के संसदीय प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की। प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व सेशेल्स की नेशनल असेंबली की अध्यक्ष महामहिम अज़रेल अर्नेस्टा ने किया।

प्रतिनिधिमंडल की अध्यक्ष और सदस्यों का स्वागत करते हुए उपराष्ट्रपति ने सेशेल्स की स्वतंत्रता की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पर वहां की सरकार और जनता को हार्दिक शुभकामनाएं दीं। उन्होंने महामहिम  अज़रेल अर्नेस्टा को सेशेल्स नेशनल असेंबली की पहली महिला अध्यक्ष बनने पर बधाई दी और जनवरी 2026 में नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रमंडल के अध्यक्षों एवं पीठासीन अधिकारियों के 28वें सम्मेलन (CSPOC) में उनकी भागीदारी का उल्लेख किया।

दोनों देशों के बीच घनिष्ठ और स्थायी संबंधों को याद करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि सेशेल्स उनके लिए विशेष स्थान रखता है। उन्होंने अक्टूबर 2025 में राष्ट्रपति महामहिम डॉ. पैट्रिक हर्मिनी के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए सेशेल्स की अपनी यात्रा को स्नेहपूर्वक याद किया। यह भारत के उपराष्ट्रपति के रूप में उनकी पहली विदेश यात्रा थी। उन्होंने राष्ट्रपति डॉ. पैट्रिक हर्मिनी और उपराष्ट्रपति सेबेस्टियन पिल्ले के साथ अपनी मुलाकातों को भी याद किया तथा सेशेल्स की जनता द्वारा दिए गए स्नेह और आतिथ्य का उल्लेख किया।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि 2026 भारत-सेशेल्स द्विपक्षीय संबंधों के लिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि इस वर्ष दोनों देशों के बीच दो राजकीय यात्राएं हुईं। भारत के प्रधानमंत्री ने जून 2026 में सेशेल्स में आयोजित 50वें राष्ट्रीय दिवस समारोह में भाग लिया, जबकि राष्ट्रपति डॉ. पैट्रिक हर्मिनी ने फरवरी 2026 में भारत की राजकीय यात्रा की। उन्होंने यह भी बताया कि उपराष्ट्रपति सेबेस्टियन पिल्ले ने फरवरी 2026 में एआई इम्पैक्ट समिट में भाग लेने के लिए भारत का दौरा किया। उन्होंने रेखांकित किया कि दोनों देश इस वर्ष राजनयिक संबंधों की 50वीं वर्षगांठ भी मना रहे हैं और विश्वास व्यक्त किया कि सेशेल्स के संसदीय प्रतिनिधिमंडल की वर्तमान यात्रा से दोनों देशों के बीच बढ़ती साझेदारी को और गति मिलेगी।

उपराष्ट्रपति ने फरवरी 2026 में भारत द्वारा सेशेल्स के लिए घोषित 175 मिलियन अमेरिकी डॉलर के विशेष आर्थिक पैकेज का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यह पैकेज दोनों देशों के विकास और सुरक्षा संबंधी साझेदारी को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगा।

उपराष्ट्रपति ने राज्यसभा सचिवालय द्वारा संसद के आधुनिकीकरण और डिजिटलीकरण के लिए किए जा रहे प्रयासों की जानकारी भी साझा की। उन्होंने संसदीय कार्यवाही के बढ़ते डिजिटलीकरण, कार्यवाही के एक साथ कई भाषाओं में अनुवाद, संसद की कार्यवाही को कागज रहित और अधिक प्रभावी बनाने के प्रयासों, साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में नियमित क्षमता निर्माण कार्यक्रमों तथा संसदीय दस्तावेजों के डिजिटल अभिलेख तैयार करने का उल्लेख किया। उन्होंने सेशेल्स नेशनल असेंबली के साथ भारत के अनुभव और विशेषज्ञता को साझा करने की इच्छा व्यक्त की तथा सेशेल्स की आवश्यकताओं और प्राथमिकताओं के अनुरूप अध्ययन यात्राएं और विशेष रूप से तैयार क्षमता निर्माण कार्यक्रम आयोजित करने की पेशकश की।

जनता के बीच संबंधों के महत्व पर जोर देते हुए उपराष्ट्रपति ने सेशेल्स में भारतीय प्रवासी समुदाय, विशेष रूप से गुजराती और तमिल समुदायों, के योगदान की सराहना की। उन्होंने कहा कि ये समुदाय दोनों देशों के बीच मित्रता के एक स्थायी सेतु के रूप में कार्य करते हैं।

उपराष्ट्रपति ने यह भी उल्लेख किया कि सेशेल्स नेशनल असेंबली की अध्यक्ष नियमित रूप से योग का अभ्यास करती हैं। उन्होंने कहा कि योग भारत और सेशेल्स के बीच घनिष्ठ जन-से-जन संबंधों का एक मजबूत प्रतीक है। उन्होंने आने वाले वर्षों में दोनों संसदीय संस्थाओं के बीच निरंतर संवाद और और अधिक सहयोग की आशा व्यक्त की।

अंत में, उपराष्ट्रपति ने सेशेल्स की अध्यक्ष और प्रतिनिधिमंडल के सभी सदस्यों को भारत में उनके सुखद एवं सफल प्रवास के लिए शुभकामनाएं दीं।

AIIMS रायपुर दीक्षांत समारोह में उपराष्ट्रपति का आह्वान: स्वास्थ्य, विश्वास और जीवन की जिम्मेदारी निभाएं युवा चिकित्सक

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उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने आज अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), रायपुर के तृतीय दीक्षांत समारोह में भाग लिया और स्नातक विद्यार्थियों से भारत के लोगों के स्वास्थ्य, विश्वास और जीवन की जिम्मेदारी को पूरी निष्ठा के साथ निभाने का आह्वान किया।

समारोह को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि दीक्षांत समारोह केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का भी क्षण है। उन्होंने कहा, “आज आपको अपनी डिग्रियां मिल रही हैं और कल आपको इससे कहीं अधिक मूल्यवान—भारत के लोगों के स्वास्थ्य, विश्वास और जीवन—की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी।”

उन्होंने कहा कि वर्ष 2012 में स्थापना के बाद से AIIMS रायपुर ने मध्य भारत में स्वास्थ्य सेवाओं, चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान में क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बहुत कम समय में यह संस्थान छत्तीसगढ़ तथा पड़ोसी राज्यों, विशेषकर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के लोगों को उन्नत चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने वाला प्रमुख तृतीयक स्वास्थ्य संस्थान बन गया है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि AIIMS रायपुर का विकास छत्तीसगढ़ में हो रहे व्यापक परिवर्तन का प्रतिबिंब है। उन्होंने कहा कि कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, कमजोर कनेक्टिविटी और वामपंथी उग्रवाद के कारण राज्य के कई क्षेत्रों में लंबे समय तक विकास बाधित रहा। दूरदराज और आदिवासी क्षेत्रों में भय और हिंसा के कारण सड़क, स्कूल और अस्पताल जैसी मूलभूत सुविधाओं का विस्तार प्रभावित हुआ।

उन्होंने कहा कि आज छत्तीसगढ़ अपने अतीत की छाया से निकलकर समृद्धि, विकास और प्रगति के नए दौर में प्रवेश कर रहा है। उन्होंने इस परिवर्तन का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्णायक नेतृत्व, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की रणनीतिक दृढ़ता और मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के प्रतिबद्ध नेतृत्व को दिया।

उन्होंने कहा कि दशकों से चली आ रही नक्सली समस्या का अंत हुआ है और जिन क्षेत्रों की पहचान कभी हिंसा से होती थी, वे अब सड़कों, स्कूलों, अस्पतालों, कनेक्टिविटी, निवेश और अवसरों के लिए पहचाने जा रहे हैं।

उपराष्ट्रपति ने AIIMS रायपुर को “नए छत्तीसगढ़ के बेहतरीन प्रतीकों में से एक” बताया, जो भय और अभाव के दौर से निकलकर शांति, प्रगति और संभावनाओं के युग की ओर बढ़ रहा है।

उन्होंने संस्थान की उन्नत चिकित्सा और प्रत्यारोपण सेवाओं में उपलब्धियों की भी सराहना की। छत्तीसगढ़ में पहला स्वैप किडनी ट्रांसप्लांट, किडनी प्रत्यारोपण में 95 प्रतिशत से अधिक सफलता, रीनल और कॉर्नियल ट्रांसप्लांट तथा कान के इम्प्लांट जैसी उपलब्धियों को उन्होंने महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि हृदय प्रत्यारोपण कार्यक्रम की मंजूरी भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

उन्होंने विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए संतुलित विकास को आवश्यक बताते हुए कहा कि यह लक्ष्य तभी पूरा होगा जब हर राज्य, जिला और गांव विकास की मुख्यधारा से जुड़ेगा।

उच्च शिक्षा को विकसित भारत की दृष्टि का महत्वपूर्ण आधार बताते हुए उन्होंने पिछले 12 वर्षों में उच्च शिक्षा के विस्तार का उल्लेख किया। उन्होंने उच्च शिक्षा में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी पर भी प्रकाश डाला। वर्ष 2014-15 में महिला नामांकन 1.57 करोड़ था, जो 2023-24 में बढ़कर 2.24 करोड़ हो गया—अर्थात 42.2 प्रतिशत की वृद्धि। AIIMS रायपुर के दीक्षांत समारोह में भी 376 छात्राओं और 313 छात्रों को डिग्रियां प्रदान की जा रही हैं।

स्नातक विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए राधाकृष्णन ने उनसे “ड्रग्स को दृढ़ता से ना कहने” तथा ऐसा भारत बनाने में योगदान देने का आह्वान किया, जहां तकनीक अंतिम नागरिक तक पहुंचे और प्रत्येक युवा भारतीय बेहतर भविष्य का सपना देख सके।

उन्होंने कहा:

“आपका ज्ञान उपचार करे, आपका अनुसंधान नवाचार करे और आपकी सेवा प्रेरणा बने।”

उपराष्ट्रपति ने AIIMS रायपुर को चिकित्सा उत्कृष्टता, वैज्ञानिक नवाचार, जनस्वास्थ्य और करुणामय सेवा के क्षेत्र में निरंतर सफलता की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने आशा व्यक्त की कि छत्तीसगढ़ का परिवर्तन विकसित भारत 2047 की व्यापक यात्रा का एक महत्वपूर्ण अध्याय बनेगा।

इस अवसर पर उपराष्ट्रपति ने मेधावी विद्यार्थियों को स्वर्ण पदक और प्रमाण-पत्र भी प्रदान किए।

समारोह में छत्तीसगढ़ के राज्यपाल रमेन डेका, केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा रसायन एवं उर्वरक राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल, छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा चिकित्सा शिक्षा मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल, रायपुर के सांसद बृजमोहन अग्रवाल, AIIMS रायपुर के अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) संजीव हांडा और कार्यकारी निदेशक रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल अशोक जिंदल सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।

केंद्रीय तमिलनाडु विश्वविद्यालय के 11वें दीक्षांत समारोह में उपराष्ट्रपति ने विद्यार्थियों को दी शुभकामनाएं

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तिरुवरुर- उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने आज तिरुवरुर स्थित केंद्रीय तमिलनाडु विश्वविद्यालय (CUTN) के 11वें दीक्षांत समारोह में भाग लिया और डिग्री प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को जीवन के महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुंचने के लिए बधाई दी।

दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि दीक्षांत समारोह केवल डिग्री प्रदान करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह शिक्षा की परिवर्तनकारी शक्ति, ज्ञान की खोज तथा विद्यार्थियों की मेहनत, समर्पण, दृढ़ता और संघर्ष का उत्सव है।

उन्होंने स्नातक विद्यार्थियों के माता-पिता और शिक्षकों को भी बधाई दी। उन्होंने कहा कि माता-पिता और शिक्षकों ने अपने बच्चों एवं विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य के लिए अनेक वर्तमान सुख-सुविधाओं का त्याग किया है।

थिरुवरुर ज्ञान, आध्यात्म और कला की धरती

उपराष्ट्रपति ने थिरुवरुर के ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवान त्यागराज के भव्य मंदिर के लिए प्रसिद्ध यह पवित्र नगर सदियों से आध्यात्मिकता, विद्वता और कला की उत्कृष्टता का केंद्र रहा है। उन्होंने कहा कि इस पवित्र भूमि ने संतों, विद्वानों और कर्नाटक संगीत की महान त्रिमूर्ति को जन्म दिया है। जब संस्कृति, शिक्षा और मूल्य एक साथ विकसित होते हैं, तभी वास्तविक महानता का निर्माण होता है।

शिक्षा का उद्देश्य केवल अंक प्राप्त करना नहीं

उपराष्ट्रपति ने कहा कि पिछले 12 वर्षों में उच्च शिक्षा का तेजी से विस्तार हुआ है। उन्होंने कहा कि देशभर में आयोजित दीक्षांत समारोहों में वे अक्सर देखते हैं कि पुरुषों की तुलना में अधिक महिलाएं डिग्री और पदक प्राप्त कर रही हैं। उन्होंने इसे एक स्वागत योग्य बदलाव बताया।

उन्होंने कहा कि आज शिक्षा को केवल परीक्षा और अंकों के आधार पर नहीं मापा जा सकता।

उन्होंने कहा कि शिक्षा का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि व्यक्ति स्वतंत्र रूप से सोचने, प्रभावी ढंग से संवाद करने, मिलकर काम करने और जीवनभर सीखते रहने में कितना सक्षम है।

उपराष्ट्रपति ने केंद्रीय तमिलनाडु विश्वविद्यालय द्वारा बहुविषयक शिक्षा, अनुसंधान, नवाचार और मूल्य आधारित शिक्षा पर दिए जा रहे जोर की सराहना की।

परीक्षाओं में अनुचित साधनों पर रोक जरूरी

संसद द्वारा हाल ही में पारित लोक परीक्षाएं (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि परीक्षाओं में अनुचित साधनों को रोकना और विद्यार्थियों के हितों की रक्षा करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

झारखंड के राज्यपाल के रूप में अपने कार्यकाल को याद करते हुए उन्होंने बताया कि उनके कार्यकाल के दौरान झारखंड सरकार ने भी इसी प्रकार का विधेयक पारित किया था और तत्कालीन राज्यपाल के रूप में उन्होंने उस पर तुरंत हस्ताक्षर किए थे, जिसके बाद वह कानून बन सका।

उन्होंने कहा कि अच्छे लोगों के हितों की रक्षा के लिए समाज में गलत कार्य करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने सार्वजनिक परीक्षाओं की निष्पक्षता और पारदर्शिता बनाए रखने के लिए मजबूत कदम उठाने पर जोर दिया।

विद्यार्थी ज्ञान के उपभोक्ता नहीं, निर्माता बनें

उपराष्ट्रपति ने स्नातक विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे “ज्ञान के उपभोक्ता बनने के बजाय निर्माता, अनुकरण करने वालों के बजाय नवप्रवर्तक और अनुयायी बनने के बजाय नेता बनें।”

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में भारत ‘विकसित भारत @2047’ के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने युवाओं से अपने कार्यों में “राष्ट्र प्रथम—राष्ट्र प्रथम” की भावना को सर्वोच्च स्थान देने और अपने ज्ञान, कौशल एवं नेतृत्व क्षमता का उपयोग राष्ट्र निर्माण में करने का आह्वान किया।

नशे के खिलाफ सख्त कार्रवाई की अपील

उपराष्ट्रपति ने पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों से नशीले पदार्थों की तस्करी करने वालों तथा नशे के प्रसार में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का आग्रह किया।

उन्होंने कहा कि नशे की लत न केवल व्यक्ति का जीवन बर्बाद करती है, बल्कि परिवार और पूरे समाज पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है। युवाओं को इस खतरे से बचाना सामूहिक जिम्मेदारी है।

उन्होंने विद्यार्थियों से “नशे को ना कहें—Say No to Drugs” का संदेश अपनाने और अपने मित्रों को भी नशे से दूर रहने के लिए प्रेरित करने का आह्वान किया।

1,103 विद्यार्थियों को मिली डिग्री, 50 को स्वर्ण पदक

दीक्षांत समारोह में कुल 1,103 स्नातकों को डिग्री प्रदान की गई, जिनमें शैक्षणिक उत्कृष्टता के लिए 50 विद्यार्थियों को स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया। कुल स्नातकों में 616 छात्राएं शामिल हैं। वहीं 50 स्वर्ण पदकों में से 37 पदक छात्राओं ने हासिल किए।

समारोह में तमिलनाडु के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर, नागपट्टिनम से लोकसभा सांसद थिरु वी. सेल्वराज, कुलाधिपति प्रो. जी. पद्मनाभन, कुलपति सीनियर प्रो. सुलोचना शेखर, विश्वविद्यालय के शिक्षक, अभिभावक और विद्यार्थी उपस्थित रहे।

उपराष्ट्रपति ने SRMIST के 22वें दीक्षांत समारोह को किया संबोधित, युवाओं से ‘राष्ट्र प्रथम’ के सिद्धांत पर चलने का आह्वान

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भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने आज चेन्नई के निकट चेंगलपट्टु के कट्टनकुलथुर स्थित एस.आर.एम. इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (SRMIST) के 22वें दीक्षांत समारोह को संबोधित किया। उन्होंने स्नातक छात्रों से आह्वान किया कि वे ‘नेशन फर्स्ट – राष्ट्र प्रथम’ के सिद्धांत से प्रेरित होकर अपने ज्ञान, कौशल और नवाचार का उपयोग राष्ट्र निर्माण में करें।

स्नातक छात्रों को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि दीक्षांत समारोह केवल डिग्री प्रदान करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह वर्षों की मेहनत, अनुशासन और सीखने की यात्रा का उत्सव है। साथ ही, यह जिम्मेदारी और सेवा से जुड़ी आजीवन यात्रा की शुरुआत भी है।

सी. पी. राधाकृष्णन ने SRMIST द्वारा विकसित ऐसे शैक्षणिक वातावरण की सराहना की, जो अंतर-विषयक शिक्षा, रचनात्मकता, उद्यमिता और आलोचनात्मक चिंतन को बढ़ावा देता है। उन्होंने कहा कि संस्थान का आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम टेक्नोलॉजी, सेमीकंडक्टर रिसर्च, रोबोटिक्स, जैव प्रौद्योगिकी और सतत विकास जैसे क्षेत्रों पर बढ़ता ध्यान भविष्य की अर्थव्यवस्थाओं और समाज को आकार देगा।

उपराष्ट्रपति ने शोध को व्यावहारिक समाधानों में बदलने के लिए SRMIST के प्रयासों की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि शोध तभी अपनी सर्वोच्च सार्थकता प्राप्त करता है, जब वह समाज की सेवा करता है, लोगों के जीवन को बेहतर बनाता है, उद्योग को मजबूत करता है और सतत विकास में योगदान देता है।

राधाकृष्णन ने कोविड-19 महामारी के दौरान भारत की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने 100 से अधिक देशों को कोविड-19 वैक्सीन उपलब्ध कराई। उन्होंने कहा कि भारत ने इस मानवीय सहायता का व्यावसायीकरण करने का प्रयास नहीं किया। उन्होंने हाल ही में केन्या के स्पीकर के साथ हुई बातचीत का जिक्र किया, जिसमें उन्होंने भारत द्वारा उपलब्ध कराई गई वैक्सीन सहायता के लिए आभार व्यक्त किया था। उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत के प्रयासों ने मानवता की रक्षा में महत्वपूर्ण योगदान दिया और दोहराया कि भारत शांति, विकास और मानव कल्याण के लिए प्रतिबद्ध है।

उपराष्ट्रपति ने बताया कि प्रधानमंत्री ने उनसे कहा था कि देश के हर हिस्से में AIIMS उपलब्ध होना चाहिए, ताकि पूरे भारत में लोगों तक बेहतर चिकित्सा सुविधाएं और चिकित्सा शिक्षा पहुंच सके।

उन्होंने 2014 के बाद देश में उच्च शिक्षा के विस्तार को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि इस अवधि में 16 IIIT, 8 केंद्रीय विश्वविद्यालय, 8 IIM, 7 IIT, 2 IISER, 1 NIT और 12 AIIMS स्थापित किए गए हैं। उन्होंने बताया कि आज भारत में 1,425 से अधिक विश्वविद्यालय, 54,000 कॉलेज और 16,850 स्वतंत्र उच्च शिक्षण संस्थान हैं।

सी. पी. राधाकृष्णन ने उच्च शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि 2014-15 में उच्च शिक्षा में महिला विद्यार्थियों की संख्या 1.57 करोड़ थी, जो 2023-24 में बढ़कर 2.24 करोड़ हो गई। यह 42.2 प्रतिशत की वृद्धि है। उन्होंने कहा कि दीक्षांत समारोहों में बड़ी संख्या में महिलाओं को डिग्री और पदक प्राप्त करते देखना स्वागत योग्य बदलाव है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि स्नातक छात्र भारत की ‘विकसित भारत @2047’ की यात्रा के एक महत्वपूर्ण चरण में प्रवेश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि विकसित, नवोन्मेषी, समावेशी और आत्मनिर्भर भारत का लक्ष्य प्रत्येक युवा भारतीय से राष्ट्र निर्माण में योगदान की अपेक्षा करता है।

उन्होंने कहा कि भारत की सबसे बड़ी ताकत उसके लोग, विशेष रूप से युवा हैं। स्नातक छात्रों को संदेश देते हुए उन्होंने कहा: “भविष्य के लिए केवल खुद को तैयार न करें; भविष्य को आकार देने के लिए खुद को तैयार करें।”

उपराष्ट्रपति ने छात्रों से नशे और हर प्रकार के मादक पदार्थों के सेवन से दूर रहने का भी आग्रह किया। उन्होंने कहा कि युवाओं को “भटकाव के बजाय अनुशासन, प्रलोभन के बजाय उद्देश्य और आसान रास्तों के बजाय उत्कृष्टता” को चुनना चाहिए।

उन्होंने तमिलनाडु में हाल ही में हुई उस घटना का उल्लेख किया, जिसमें नशीले पदार्थों के कारोबार से जुड़ी जानकारी साझा करने के कारण एक छात्र की हत्या कर दी गई थी। उन्होंने कहा कि यह घटना बेहद पीड़ादायक है और उन्हें ऐसा लगा जैसे उन्होंने अपने परिवार के एक सदस्य को खो दिया हो।

उपराष्ट्रपति ने स्नातकों से ‘नेशन फर्स्ट – राष्ट्र प्रथम’ को अपना मार्गदर्शक सिद्धांत बनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि उनका ज्ञान, नवाचार और मेहनत भारत की प्रगति, सुरक्षा और समृद्धि में योगदान देनी चाहिए। उन्होंने छात्रों से संवैधानिक मूल्यों को बनाए रखने, विविधता का सम्मान करने, राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने और संकीर्ण निजी हितों से ऊपर व्यापक राष्ट्रीय हित को रखने का आग्रह किया।

अपने संबोधन के समापन में उपराष्ट्रपति ने स्नातकों से भारतीय जीवन मूल्यों ज्ञान, कर्तव्य, करुणा और सेवा को अपने साथ लेकर आगे बढ़ने का आह्वान किया।

इस अवसर पर उपराष्ट्रपति ने महिंद्रा एंड महिंद्रा लिमिटेड के ऑटोमोटिव बिजनेस के अध्यक्ष श्री आर. वेलुसामी को मानद उपाधि प्रमाणपत्र प्रदान किया। उन्होंने स्नातकों को पदक, रैंक और डिग्रियां भी प्रदान कीं तथा छात्रों और स्नातकों को ‘नशे को ना कहें’ की शपथ दिलाई।

इस अवसर पर तमिलनाडु और केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर, SRMIST के चांसलर डॉ. टी. आर. पारिवेंधर, प्रो-चांसलर (प्रशासन) डॉ. रवि पचमुथु, प्रो-चांसलर (शैक्षणिक) डॉ. पी. सत्यनारायणन, कुलपति डॉ. सी. मुथमिझचेलवन सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।

उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने अंडमान-निकोबार में ‘हर घर तिरंगा अभियान’ का किया शुभारंभ

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उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने आज अगस्त क्रांति दिवस के अवसर पर, 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की स्मृति में, श्री विजय पुरम स्थित फ्लैग प्वाइंट पर राष्ट्रीय ध्वज फहराकर ‘हर घर तिरंगा अभियान’ का शुभारंभ किया।

डीबीआरएआईटी सभागार में आयोजित राज्य स्तरीय समारोह एवं ‘वंदे मातरम्’ पर आधारित तिरंगा कॉन्सर्ट को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि इस अभियान के शुभारंभ के लिए इन ऐतिहासिक द्वीपों से अधिक उपयुक्त स्थान कोई और नहीं हो सकता। ये द्वीप भारत के स्वतंत्रता संग्राम और तिरंगे के इतिहास से गहराई से जुड़े हुए हैं।

महान तमिल कवि सुब्रमण्यम भारती के अमर शब्दों को याद करते हुए सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा कि भारती द्वारा ‘मणि कोडी’ की स्तुति भारतीय आत्मा के शाश्वत साहस और भारत माता के ध्वज की महिमा को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि हर घर तिरंगा अभियान इसी भावना को आगे बढ़ाते हुए प्रत्येक नागरिक को एक राष्ट्रीय ध्वज, एक मातृभूमि और एक साझा नियति के सूत्र में जोड़ता है।

‘काला पानी’ की कठोर यातनाएँ सहने वाले स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदानों को याद करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह भारत का केवल एक भौगोलिक हिस्सा नहीं, बल्कि बलिदान की पवित्र भूमि है। उन्होंने वीर विनायक दामोदर सावरकर और सेल्युलर जेल में यातनाएँ सहने वाले अनगिनत देशभक्तों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि उनका साहस, राष्ट्रभक्ति और बलिदान आज भी पीढ़ियों को प्रेरणा देता है।

उपराष्ट्रपति ने महात्मा गांधी द्वारा 8 अगस्त 1942 को दिए गए ऐतिहासिक “करो या मरो” के आह्वान को याद करते हुए कहा कि इस आह्वान ने लाखों भारतीयों को जागृत किया और स्वतंत्रता संग्राम को निर्णायक गति प्रदान की। उन्होंने तिरंगे के इतिहास में इन द्वीपों के विशेष स्थान का भी उल्लेख किया। उन्होंने याद दिलाया कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने 30 दिसंबर 1943 को यहीं भारतीय राष्ट्रीय ध्वज फहराया था, जो भारत के स्वतंत्रता संग्राम का एक ऐतिहासिक क्षण था।

हर घर तिरंगा अभियान के महत्व पर प्रकाश डालते हुए राधाकृष्णन ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किया गया यह अभियान अब एक राष्ट्रव्यापी जन आंदोलन का रूप ले चुका है। उन्होंने प्रत्येक नागरिक से तिरंगे को गर्व के साथ अपने घर पर फहराने तथा इसके माध्यम से राष्ट्रभक्ति, एकता और सामूहिक जिम्मेदारी के मूल्यों को आत्मसात करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा, “भारत एक है और हमेशा एक रहेगा।”

उपराष्ट्रपति ने अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह को ‘विविधता में एकता’ और ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ का जीवंत उदाहरण बताया। उन्होंने द्वीपों की समृद्ध जनजातीय विरासत के साथ-साथ कनेक्टिविटी, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और बुनियादी ढाँचे के क्षेत्र में हुई हालिया प्रगति का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ग्रेट निकोबार द्वीप विकास परियोजना भारत की समुद्री क्षमताओं, कनेक्टिविटी और आर्थिक अवसरों को और मजबूत करेगी तथा विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखेगी।

भारत की शांति और उदारता की परंपरा के साथ राष्ट्रीय शक्ति की आवश्यकता पर जोर देते हुए राधाकृष्णन ने कहा, “भारत हमेशा उदार रहा है, लेकिन हमारी उदारता को कभी भी हमारी कमजोरी नहीं समझा जाना चाहिए। हमें अपने राष्ट्रीय हितों और संप्रभुता की रक्षा के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए।” उन्होंने नागरिकों से तिरंगे को साहस, एकता और आशा की प्रेरणा के रूप में अपनाने तथा स्वतंत्रता सेनानियों की विरासत को आगे बढ़ाते हुए एक मजबूत और विकसित भारत के निर्माण में योगदान देने का आह्वान किया।


उपराष्ट्रपति ने एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में भी भाग लिया और ‘हर घर तिरंगा’ प्रदर्शनी का दौरा किया, जिसमें अभियान की भावना तथा राष्ट्रीय एकता और देशभक्ति के संदेश को प्रदर्शित किया गया।

इस अवसर पर अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह के उपराज्यपाल एडमिरल डी. के. जोशी (सेवानिवृत्त), मुख्य सचिव चंचल यादव, विजय पुरम नगर परिषद की अध्यक्ष एम. वसंथा तथा जिला परिषद के अध्यक्ष पी. उम्मर सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।


उपराष्ट्रपति ने मन्नाथु पद्मनाभन की प्रतिमा का किया अनावरण, मन्नम स्मृति मंडपम् का उद्घाटन

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 भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने आज नई दिल्ली के द्वारका स्थित मन्नम इंटरनेशनल सेंटर में नायर सर्विस सोसाइटी (एनएसएस), दिल्ली द्वारा आयोजित कार्यक्रम में समाज सुधारक एवं स्वतंत्रता सेनानी मन्नाथु पद्मनाभन की प्रतिमा का अनावरण किया तथा मन्नम स्मृति मंडपम् का उद्घाटन किया।

इस अवसर पर उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने इसे आधुनिक भारत के महानतम समाज सुधारकों और राष्ट्रनिर्माताओं में से एक मन्नाथु पद्मनाभन की अमर विरासत का ऐतिहासिक उत्सव बताया। उन्होंने नायर सर्विस सोसाइटी (एनएसएस), दिल्ली को लंबे समय से संजोए गए मन्नम स्मृति मंडपम् के निर्माण के स्वप्न को साकार करने पर बधाई देते हुए कहा कि यह स्मारक केवल एक भवन नहीं, बल्कि एक ऐसी महान विरासत का जीवंत प्रतीक है, जिसके आदर्श सामाजिक न्याय, समानता और राष्ट्रसेवा की भावना को जाति, क्षेत्र और धर्म की सीमाओं से ऊपर उठाते हैं।

मन्नाथु पद्मनाभन के जीवन और योगदान का स्मरण करते हुए सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा कि प्रख्यात समाज सुधारक, स्वतंत्रता सेनानी और नायर सर्विस सोसाइटी के संस्थापक ने शिक्षा, सामाजिक सुधार, आत्मनिर्भरता और सामुदायिक सेवा के माध्यम से समाज के उत्थान के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित किया।

उपराष्ट्रपति ने मन्नाथु पद्मनाभन को सामाजिक पुनर्जागरण का सच्चा अग्रदूत बताते हुए कहा कि उनकी दृष्टि किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं थी। उन्होंने कहा, "वे मानते थे कि प्रत्येक व्यक्ति समान सम्मान और समान अवसर का अधिकारी है। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि वास्तविक सामाजिक प्रगति तभी संभव है, जब न्याय, करुणा और समावेशिता समाज के मार्गदर्शक सिद्धांत बनें।"

राधाकृष्णन ने कहा कि नायर सर्विस सोसाइटी की उल्लेखनीय प्रगति स्वयं उसके संस्थापक की असाधारण निष्ठा और दृढ़ संकल्प का प्रमाण है। उन्होंने बताया कि मन्नाथु पद्मनाभन का विश्वास था कि महान संस्थाएँ धन से नहीं, बल्कि समर्पण से बनती हैं। उन्होंने सामान्य परिवारों के छोटे-छोटे योगदानों से शिक्षा और सामाजिक संस्थानों की स्थापना की, जिसने अनेक पीढ़ियों के जीवन को बदल दिया।

उपराष्ट्रपति ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि स्थापना के एक शताब्दी से अधिक समय बाद भी मन्नाथु पद्मनाभन के आदर्श केरल से कहीं आगे तक फैल चुके हैं। उन्होंने विशेष रूप से एनएसएस दिल्ली द्वारा कलरिपयट्टु, कथकली और मोहिनीयाट्टम जैसी केरल की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में किए जा रहे उत्कृष्ट कार्यों की सराहना की। उन्होंने दिल्ली-एनसीआर में 25 शाखाओं और लगभग 25,000 सदस्यों वाले संगठन के रूप में एनएसएस दिल्ली की उल्लेखनीय प्रगति पर भी बधाई दी।

स्मारकों के महत्व पर विचार व्यक्त करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा, "स्मारक केवल पत्थरों पर की गई नक्काशी नहीं होते, बल्कि वे समाज की सामूहिक चेतना पर अंकित अमिट छाप होते हैं। उनका उद्देश्य केवल अतीत का स्मरण करना नहीं, बल्कि भविष्य को प्रेरणा देना भी है।"

उन्होंने नागरिकों से मन्नाथु पद्मनाभन के आदर्शों को अपनाने का आह्वान करते हुए कहा, "उनके प्रति हमारी सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यही होगी कि हम समानता, शिक्षा, करुणा, सेवा और राष्ट्रीय एकता पर आधारित समाज निर्माण के उनके मिशन को आगे बढ़ाएँ।"

इस अवसर पर उपराष्ट्रपति ने पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा संचालित राष्ट्रव्यापी 'एक पेड़ माँ के नाम' अभियान के अंतर्गत मन्नम इंटरनेशनल सेंटर परिसर में एक पौधा भी रोपा।

कार्यक्रम में केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस तथा पर्यटन राज्य मंत्री सुरेश गोपी, एनएसएस दिल्ली के अध्यक्ष एम. के. जी. पिल्लै, महासचिव एम. डी. जयप्रकाश सहित अनेक गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे।

उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने बिहार विधान सभा के 18वें कार्यकाल के सदस्यों के लिए आयोजित अभिमुखीकरण एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्घाटन किया

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भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने आज बिहार के गया स्थित बिहार इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन एंड रूरल डेवलपमेंट (बीआईपीएआरडी) में बिहार विधान सभा के 18वें कार्यकाल के सदस्यों के लिए आयोजित दो दिवसीय अभिमुखीकरण एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्घाटन किया।

बिहार विधान सभा एवं बिहार विधान परिषद के पीठासीन अधिकारियों तथा लोकसभा सचिवालय के संसदीय अनुसंधान एवं लोकतंत्र प्रशिक्षण संस्थान (PRIDE) की इस पहल की सराहना करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि ऐसे कार्यक्रम जनप्रतिनिधियों को अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों का प्रभावी ढंग से निर्वहन करने के लिए सक्षम बनाते हैं और लोकतांत्रिक संस्थाओं को सुदृढ़ करते हैं। उन्होंने गया जी में इस कार्यक्रम के आयोजन के लिए विधानसभा अध्यक्ष का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस पहल ने प्रतीकात्मक रूप से “पटना को गया जी तक पहुँचा दिया है।”

वैशाली की प्राचीन गणतांत्रिक परंपराओं का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि लोकतंत्र की जड़ें भारत में अत्यंत गहरी हैं और इसी कारण भारत को “लोकतंत्र की जननी” कहा जाता है। उन्होंने बिहार को भारत की लोकतांत्रिक यात्रा का “मार्गदर्शक” बताते हुए विधायकों से इसकी गौरवशाली विरासत को बनाए रखने का आह्वान किया। भगवान बुद्ध की इस पावन भूमि से प्रेरणा लेते हुए उन्होंने कहा कि वास्तविक ज्ञान इसी में है कि जनप्रतिनिधि शासन करने के लिए नहीं, बल्कि सेवा करने के लिए चुने जाते हैं। उन्होंने कहा कि विकसित बिहार के बिना विकसित भारत की कल्पना संभव नहीं है और विधायकों से आग्रह किया कि वे बिहार को रोजगार एवं विकास का ऐसा केंद्र बनाने की दिशा में कार्य करें, जहाँ अन्य राज्यों के लोग भी रोजगार के लिए आएँ।

लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले संपूर्ण क्रांति आंदोलन से अपने जुड़ाव का उल्लेख करते हुए सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा कि इसी आंदोलन ने उनके राजनीतिक जीवन की नींव रखी। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन तथा आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की रक्षा के संघर्ष में बिहार की ऐतिहासिक भूमिका को भी स्मरण किया। उन्होंने कहा कि चुनाव भले ही राजनीतिक दलों के आधार पर लड़े जाते हों, लेकिन शासन दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर होना चाहिए। उन्होंने कहा कि चुनाव वोटों से जीते जाते हैं, लेकिन जनता का विश्वास और सम्मान केवल निस्वार्थ सेवा से अर्जित होता है, सत्ता से नहीं। उन्होंने कहा कि प्रत्येक कानून, प्रत्येक प्रश्न और प्रत्येक बहस असंख्य लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने की क्षमता रखती है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन संविधान और जनकल्याण के प्रति प्रतिबद्धता सर्वोपरि होनी चाहिए। उन्होंने कहा, “विधान सभा के भीतर विचार भिन्न हो सकते हैं, लेकिन संविधान हमारा साझा पथप्रदर्शक होना चाहिए।” उन्होंने कहा कि स्वस्थ बहस लोकतंत्र को मजबूत करती है, जबकि रचनात्मक सहयोग राष्ट्र को आगे बढ़ाता है। प्रश्नकाल, शून्यकाल और कार्य मंत्रणा समिति के महत्व पर बल देते हुए उन्होंने सदस्यों से विधानमंडल की कार्यवाही को सुचारु और उत्पादक बनाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि ये संसदीय व्यवस्थाएँ जनप्रतिनिधियों को दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर अपने निर्वाचन क्षेत्रों से जुड़े मुद्दे उठाने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती हैं।

निरंतर सीखने की आवश्यकता पर बल देते हुए राधाकृष्णन ने विधायकों से सदन की कार्यवाही में भाग लेने से पहले पर्याप्त तैयारी करने तथा विधायी प्रक्रियाओं, समिति प्रणाली और संसदीय परंपराओं की गहन समझ विकसित करने का आग्रह किया। उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण (NLP) और राष्ट्रीय ई-विधान अनुप्रयोग (NeVA) जैसी डिजिटल विधायी पहलों को अपनाने का भी आह्वान किया, ताकि विधायी कार्य अधिक दक्ष, पारदर्शी और नागरिक-केंद्रित बन सके।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि राजनीति धैर्य और निरंतर प्रयास की मांग करती है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि एक समय उनका पहला कार्यकाल केवल सात दिनों का रहा, लेकिन बाद में वे बिहार के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले मुख्यमंत्री बने। उन्होंने राजनीति की तुलना टेस्ट क्रिकेट से करते हुए कहा कि सफलता धैर्य, दृढ़ता और सही अवसरों का चयन करने से मिलती है।

अपने संबोधन के समापन में उपराष्ट्रपति ने कहा कि एक विचारपूर्ण हस्तक्षेप किसी नीति को बदल सकता है, एक प्रभावी कानून कई पीढ़ियों का भविष्य संवार सकता है और एक संवेदनशील निर्णय असंख्य नागरिकों के जीवन में नई आशा जगा सकता है। उन्होंने कहा, “नेतृत्व का वास्तविक मूल्यांकन सदन के भीतर मिलने वाली तालियों से नहीं, बल्कि सदन के बाहर जनता के मन में उत्पन्न होने वाले विश्वास से होता है।” उन्होंने बिहार विधान सभा के 18वें कार्यकाल के सभी सदस्यों को सफल प्रशिक्षण कार्यक्रम और प्रभावी विधायी कार्यकाल के लिए शुभकामनाएँ दीं।

इस अवसर पर बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन, बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, बिहार विधान सभा के अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार, बिहार विधान परिषद के सभापति अवधेश नारायण सिंह, बिहार के उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी, बिहार विधान सभा के उपाध्यक्ष नरेंद्र नारायण यादव, बिहार विधानमंडल के सदस्य तथा अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

विकसित भारत 2047 की आधारशिला है एमएसएमई क्षेत्र : उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन

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नई दिल्ली- भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने डॉ. अंबेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र, नई दिल्ली में आयोजित अंतरराष्ट्रीय एमएसएमई दिवस 2026 समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) केवल एक आर्थिक क्षेत्र नहीं, बल्कि पहली पीढ़ी के उद्यमियों के साहस, युवाओं की आकांक्षाओं, महिला उद्यमियों के संकल्प और लाखों छोटे व्यवसायों के संघर्ष व सफलता का प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि 'विकसित भारत @2047' का सपना एक मजबूत और गतिशील एमएसएमई क्षेत्र के बिना संभव नहीं है।

उद्यमिता का अपना अनुभव साझा किया

उपराष्ट्रपति ने अपने उद्यमिता के शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताया कि स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने अपने पिता की आर्थिक सहायता से एक छोटा गारमेंट व्यवसाय शुरू किया था। शुरुआती कठिनाइयों के बावजूद लगातार सीखने, मेहनत और धैर्य के बल पर उन्होंने इसे एक सफल निटवियर निर्यात व्यवसाय में बदल दिया। उन्होंने युवाओं से कहा कि शुरुआती चुनौतियों से घबराने के बजाय अपने काम को सीखने और बेहतर बनाने पर ध्यान दें।

गुणवत्ता से कभी समझौता नहीं

उन्होंने कहा कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दौर में गुणवत्ता (Quality) ही सफलता की सबसे बड़ी कुंजी है। लागत कम करने के प्रयास में गुणवत्ता से समझौता नहीं होना चाहिए। उनका कहना था कि असली सफलता वही है, जब कम लागत में बेहतर गुणवत्ता और उत्कृष्ट सेवाएं प्रदान की जाएं।

हर छोटा उद्यम आगे बढ़ने का लक्ष्य रखे

उपराष्ट्रपति ने कहा कि प्रत्येक सूक्ष्म उद्यम को लघु उद्यम बनने और प्रत्येक लघु उद्यम को मध्यम उद्यम बनने का लक्ष्य रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि कुटीर उद्योगों को एक ही स्तर पर सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें निवेश, नवाचार और तकनीक के माध्यम से आगे बढ़ना चाहिए। इसके लिए आसान वित्तीय सहायता और अनुकूल नीतियों की आवश्यकता है।

एमएसएमई का सार्वभौमिक पंजीकरण जरूरी

उन्होंने एमएसएमई मंत्रालय से सभी उद्यमों का व्यापक पंजीकरण सुनिश्चित करने का आग्रह किया। उनका कहना था कि इससे सरकार को वास्तविक आंकड़े मिलेंगे और उद्योगों की जरूरतों के अनुरूप बेहतर नीतियां बनाई जा सकेंगी।

एआई को अवसर के रूप में अपनाएं

संयुक्त राष्ट्र की इस वर्ष की थीम "AI-Driven Future में Human-Centered Entrepreneurship" का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को खतरे के बजाय अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जैसे कंप्यूटर आने पर रोजगार खत्म होने की आशंका जताई गई थी, लेकिन बाद में उसी तकनीक ने नए अवसर पैदा किए। एआई भी भविष्य में नए रोजगार और व्यवसायिक संभावनाएं लेकर आएगा।

खादी और ग्रामोद्योग की सराहना

उन्होंने खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (KVIC) की सराहना करते हुए कहा कि संस्था ने शहद उत्पादन और खादी वस्त्रों के क्षेत्र में उल्लेखनीय परिवर्तन किया है। उन्होंने कहा कि गांधीवादी विचारों से प्रेरित खादी को आधुनिक तकनीक और बदलती उपभोक्ता आवश्यकताओं के अनुरूप निरंतर विकसित होना चाहिए।

कई नई डिजिटल पहल की शुरुआत

इस अवसर पर उपराष्ट्रपति ने नेशनल स्मॉल इंडस्ट्रीज कॉर्पोरेशन (NSIC) को शेड्यूल 'A' कंपनी का दर्जा मिलने पर सम्मानित किया। साथ ही उन्होंने कई नई डिजिटल पहलों की शुरुआत की, जिनमें शामिल हैं—

  • PMEGP 2.0 पोर्टल

  • समाधान 2.0 पोर्टल

  • प्रोक्योरमेंट एंड मार्केटिंग सपोर्ट (PMS) 2.0 पोर्टल

  • MSME ग्लोबल मार्ट 2.0 पोर्टल

  • टेस्टिंग सेंटर पोर्टल

  • एमएसएमई मंत्रालय की बहुभाषी डिजिटल पहल

  • MSME आइडिया हैकाथॉन 6.0

इसके अलावा सेल्फ रिलायंट इंडिया (SRI) फंड और पीएम विश्वकर्मा योजना पर आधारित ई-बुक्स का विमोचन तथा KVIC के नए उत्पादों का भी शुभारंभ किया गया।

इस कार्यक्रम में केंद्रीय एमएसएमई मंत्री जीतन राम मांझी, राज्य मंत्री शोभा करंदलाजे, KVIC के अध्यक्ष मनोज कुमार, एमएसएमई मंत्रालय के सचिव भारत खेड़ा, मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी, उद्योग जगत के प्रतिनिधि और बड़ी संख्या में उद्यमी उपस्थित रहे।

भारत में वीआईपी संस्कृति लोकतंत्र और जनजीवन से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय : उपराष्ट्रपति

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भारत के उपराष्ट्रपति ने आज नई दिल्ली स्थित उपराष्ट्रपति भवन में "VIP Culture in India: Power, Privilege and the Distance from Democracy" पुस्तक का विमोचन किया। यह पुस्तक अरुणाचल प्रदेश से राज्यसभा के पूर्व सदस्य नाबाम रेबिया और सह-लेखक संदीप कुमार द्वारा लिखी गई है।

इस अवसर पर उपराष्ट्रपति ने कहा कि पुस्तक में उठाया गया विषय भारत में लोकतांत्रिक शासन और सार्वजनिक जीवन के मूल तत्वों से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान न्याय, समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व पर आधारित समाज की परिकल्पना करता है तथा लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति नागरिकों और सार्वजनिक पदों पर आसीन व्यक्तियों के बीच संबंधों में निहित होती है।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र तभी फलता-फूलता है, जब सार्वजनिक पद को विशेषाधिकार नहीं बल्कि जिम्मेदारी के रूप में देखा जाए।

उपराष्ट्रपति ने महान तमिल संत-कवि तिरुवल्लुवर का उल्लेख करते हुए कहा कि सच्चे नेतृत्व की पहचान सुलभता, करुणा और जवाबदेही होती है। जो नेता जनता के प्रति सम्मानजनक और सहज उपलब्ध रहते हैं, वे लोगों का स्थायी विश्वास और सम्मान अर्जित करते हैं।

राधाकृष्णन ने कहा कि पुस्तक में उठाए गए विषय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस सोच से मेल खाते हैं, जिसमें सार्वजनिक पद को विशेषाधिकार नहीं बल्कि सेवा का माध्यम माना गया है। उन्होंने वीआईपी वाहनों पर लाल बत्ती की व्यवस्था समाप्त करने तथा हाल ही में नीट (NEET) परीक्षार्थियों को यातायात संबंधी असुविधा से बचाने के लिए प्रधानमंत्री द्वारा अपने प्रस्थान में देरी किए जाने का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे कदम नागरिक-केंद्रित शासन के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

उपराष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री के शब्दों को उद्धृत करते हुए कहा, "हर भारतीय विशेष है, हर भारतीय एक वीआईपी है।" उन्होंने आगे कहा कि "सेवा ही सर्वोच्च धर्म है।"

उन्होंने पुस्तक में पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री तथा अन्य महान व्यक्तित्वों की सादगी और जनसेवा की भावना का उल्लेख किए जाने की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि लेखकों ने अपने विश्लेषण को भारत की सभ्यतागत और बौद्धिक परंपराओं जैसे उपनिषदों, रामचरितमानस, भगवान बुद्ध की शिक्षाओं और पंचतंत्र के संदर्भों से समृद्ध बनाया है।

उपराष्ट्रपति ने गणराज्य की मूल भावना को मजबूत करने के लिए समानता, कानून के समक्ष सभी की बराबरी, प्रत्येक नागरिक की गरिमा तथा विनम्रता और उत्तरदायित्व से प्रेरित लोकसेवा के मूल्यों के प्रति नए सिरे से प्रतिबद्धता का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि किसी भी नेतृत्व की वास्तविक कसौटी जनता का विश्वास और समाज के प्रति उसकी सेवा होती है।

कार्यक्रम में अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री नाबाम तुकी, मेघालय से राज्यसभा के पूर्व सदस्य डब्ल्यू. आर. खारलुखी लेखक नाबाम रेबिया तथा सह-लेखक संदीप कुमार सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

वरिष्ठ फिल्म निर्देशक भारतीराजा के निधन पर उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने जताया गहरा शोक

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 भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने वरिष्ठ फिल्म निर्देशक भारतीराजा के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है।

अपने शोक संदेश में उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारतीराजा एक दूरदर्शी कथाकार थे, जिन्होंने ग्रामीण भारत की आत्मा और मानवीय भावनाओं की गहराई को अद्भुत प्रामाणिकता के साथ बड़े पर्दे पर प्रस्तुत कर तमिल सिनेमा में क्रांतिकारी बदलाव लाया।

उन्होंने कहा कि अपनी विशिष्ट सिनेमाई शैली, अविस्मरणीय पात्रों और कालजयी फिल्मों के माध्यम से भारतीराजा ने भारतीय सिनेमा पर अमिट छाप छोड़ी तथा फिल्मकारों और कलाकारों की कई पीढ़ियों को प्रेरित किया।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारतीराजा का निधन सिनेमा जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उन्होंने दिवंगत फिल्मकार के परिवार, मित्रों, सहयोगियों तथा दुनिया भर में फैले उनके असंख्य प्रशंसकों के प्रति अपनी हार्दिक संवेदनाएँ व्यक्त कीं।

उपराष्ट्रपति से मिले केंद्रीय जल शक्ति मंत्री, जल संरक्षण और नदी जोड़ो परियोजनाओं की प्रगति पर हुई चर्चा

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नई दिल्ली- केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल, जल शक्ति राज्य मंत्री डॉ. राज भूषण चौधरी तथा जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण विभाग (DoWR, RD & GR) के वरिष्ठ अधिकारियों ने आज भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन से उपराष्ट्रपति भवन में मुलाकात की।

बैठक के दौरान उपराष्ट्रपति को जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण विभाग द्वारा संचालित विभिन्न योजनाओं और परियोजनाओं की जानकारी दी गई। उन्होंने जल संरक्षण एवं भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई प्रमुख पहल “जल संचय जन भागीदारी (JSJB)” की सराहना की। उन्हें बताया गया कि JSJB 2.0 के अंतर्गत 1.55 करोड़ से अधिक जल संरक्षण एवं भूजल पुनर्भरण संरचनाओं की सूचना प्राप्त हुई है, जो निर्धारित लक्ष्य से कहीं अधिक है।

उपराष्ट्रपति को केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना,पार्वती-कालीसिंध-चंबल नदी जोड़ो परियोजना,गोदावरी-कावेरी नदी जोड़ो परियोजना जैसी प्रमुख नदी जोड़ो परियोजनाओं की प्रगति से भी अवगत कराया गया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि नदियों को आपस में जोड़ने की परियोजनाएं जल संकट कम करने, सूखे की समस्या से निपटने, सिंचाई क्षेत्र का विस्तार करने तथा संतुलित क्षेत्रीय विकास सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

उपराष्ट्रपति ने सुझाव दिया कि केन-बेतवा लिंक परियोजना जैसी राष्ट्रीय महत्व की जल अवसंरचना परियोजनाओं का विस्तृत दस्तावेजीकरण किया जाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां इन ऐतिहासिक राष्ट्रनिर्माण प्रयासों को समझ सकें और उन पर गर्व कर सकें।

नदी जोड़ो अभियान के समर्थन में अपनी पूर्व पदयात्रा को याद करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि ऐसी परियोजनाओं के क्रियान्वयन में धन की कमी मुख्य चुनौती नहीं है, बल्कि मानसिकता और राजनीतिक दृष्टिकोण से जुड़ी बाधाएं अधिक महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने राष्ट्रीय हित में दूरदर्शी और सहयोगात्मक जल प्रबंधन दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया।

बैठक के दौरान केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल और राज्य मंत्री डॉ. राज भूषण चौधरी ने उपराष्ट्रपति को मंत्रालय के आगामी कार्यक्रमों में शामिल होने का भी आमंत्रण दिया।

भारत के तकनीकी आत्मनिर्भरता अभियान में युवाओं की भूमिका महत्वपूर्ण : उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन

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भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने आज कर्नाटक के दावणगेरे स्थित यूनिवर्सिटी बी.डी.टी. कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग के प्लैटिनम जुबली समारोह में भाग लिया और युवाओं से भारत को तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर एवं विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में सक्रिय योगदान देने का आह्वान किया।

सभा को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि इंजीनियरिंग संस्थानों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है कि वे ऐसे समस्या-समाधानकर्ता, नवोन्मेषक, नैतिक नेतृत्वकर्ता और राष्ट्र-निर्माता तैयार करें, जो भारत को तकनीकी प्रगति और वैश्विक ज्ञान नेतृत्व की ओर अग्रसर कर सकें।

उन्होंने कहा कि भारत वर्तमान में तकनीक, नवाचार और युवाशक्ति से प्रेरित एक परिवर्तनकारी दौर से गुजर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, स्किल इंडिया, सेमीकंडक्टर निर्माण, हरित ऊर्जा और आत्मनिर्भर भारत जैसी पहलें युवा इंजीनियरों, शोधकर्ताओं, नवोन्मेषकों और उद्यमियों के लिए अभूतपूर्व अवसर प्रदान कर रही हैं।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने की भारत की आकांक्षा इंजीनियरों, वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और उद्यमियों के योगदान पर काफी हद तक निर्भर करेगी। संस्थान द्वारा अनुसंधान और नवाचार को सशक्त बनाने के प्रयासों की सराहना करते हुए उन्होंने एआईसीटीई आइडिया लैब, ड्रोन टेक्नोलॉजी प्रयोगशाला तथा कॉलेज द्वारा विकसित उन्नत शोध अवसंरचना जैसी पहलों की प्रशंसा की।

उन्होंने प्लैटिनम जुबली को विरासत और भविष्य की आकांक्षाओं का उत्सव बताते हुए कहा कि संस्थान के 75 वर्ष दूरदृष्टि, दृढ़ता, शैक्षणिक उत्कृष्टता और समाज सेवा का प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि उत्कृष्ट संस्थानों का निर्माण कई पीढ़ियों के दूरदर्शी संस्थापकों, समर्पित शिक्षकों, निष्ठावान प्रशासकों, मेहनती विद्यार्थियों और प्रतिष्ठित पूर्व छात्रों के योगदान से होता है।

संस्थान की स्थापना में ब्रह्मप्पा देवेंद्रप्पा तवनप्पनावर की दूरदर्शी परोपकारिता और महामहिम जयचामराजेंद्र वोडेयार के आशीर्वाद को श्रद्धांजलि देते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि ऐसे संस्थान शिक्षा और राष्ट्र निर्माण के प्रति अपनी स्थायी प्रतिबद्धता के माध्यम से पीढ़ियों को प्रेरित करते रहते हैं।

विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने उनसे ज्ञान का उपयोग विनम्रता, ईमानदारी और करुणा के साथ करने का आग्रह किया। नवाचार के नैतिक पक्ष पर जोर देते हुए उन्होंने कहा, “प्रौद्योगिकी मानवता की सेवा के लिए होनी चाहिए,” और इस बात पर बल दिया कि वैज्ञानिक प्रगति सदैव जनकल्याण और मानवीय मूल्यों से प्रेरित होनी चाहिए।

उपराष्ट्रपति ने नशा मुक्ति के संबंध में भी सशक्त संदेश देते हुए विद्यार्थियों और समाज से “नशे को ना” कहने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपने मन पर स्वयं नियंत्रण रखना चाहिए और किसी भी हानिकारक पदार्थ को अपने जीवन पर नियंत्रण नहीं करने देना चाहिए।

संस्थान के भविष्य पर विश्वास व्यक्त करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि यूनिवर्सिटी बी.डी.टी. कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग उत्कृष्टता का केंद्र बनकर भारत की नवाचार, तकनीकी प्रगति और राष्ट्रीय विकास की यात्रा में महत्वपूर्ण योगदान देता रहेगा।

इस अवसर पर कर्नाटक के राज्यपाल थावर चंद गहलोत; निर्मलानंदनाथ स्वामीजी; कर्नाटक के पूर्व उच्च शिक्षा मंत्री डॉ. एम.सी. सुधाकर; सांसद यदुवीर वाडियार; सांसद डॉ. प्रभा मल्लिकार्जुन; कर्नाटक के पूर्व मंत्री एवं जिला प्रभारी एस.एस. मल्लिकार्जुन; बोर्ड ऑफ गवर्नर्स, निफ्टेम के अध्यक्ष डॉ. टी.जी. सीताराम; वीटीयू के कुलपति डॉ. एस. विद्याशंकर; वरिष्ठ अधिकारी, संकाय सदस्य, विद्यार्थी और प्रतिष्ठित पूर्व छात्र भी उपस्थित थे।

उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने आईआईएमटी यूनिवर्सिटी, मेरठ के दीक्षांत समारोह को संबोधित किया

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भारत के उपराष्ट्रपतिसी. पी. राधाकृष्णन ने आज आईआईएमटी यूनिवर्सिटी, मेरठ के तृतीय दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि यह अवसर केवल शैक्षणिक यात्रा का समापन नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण के प्रति आजीवन प्रतिबद्धता की शुरुआत है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि छात्र एक ऐसे भारत में कदम रख रहे हैं जो तेजी से बदल रहा है और अवसरों से भरपूर है। उन्होंने वर्तमान समय को देश के इतिहास का एक महत्वपूर्ण दौर बताया, जो परिवर्तनकारी बुनियादी ढांचे और विकास पहलों से चिह्नित है।

उन्होंने इस वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उद्घाटित नमो भारत ट्रेन और मेरठ मेट्रो का उल्लेख करते हुए कहा कि ये आधुनिक, कुशल और टिकाऊ कनेक्टिविटी के उदाहरण हैं, जो छात्रों और पेशेवरों के लिए नए अवसर खोल रहे हैं।

“विकसित भारत” के दृष्टिकोण पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि यह एक राष्ट्रीय मिशन है, जिसमें युवाओं की ऊर्जा, रचनात्मकता और प्रतिबद्धता आवश्यक है। उन्होंने कहा कि “आत्मनिर्भर भारत” की भावना इस परिवर्तनकारी यात्रा का मूल है।

छात्रों को उनकी जिम्मेदारियों का एहसास कराते हुए उपराष्ट्रपति ने राष्ट्र-निर्माण में योगदान देने, ईमानदारी, अनुशासन और सेवा के मूल्यों को अपनाने तथा विकास को समावेशी, सतत और भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा बनाए रखने पर बल दिया।

उन्होंने छात्रों को व्यक्तिगत सफलता से आगे सोचने और अपनी आकांक्षाओं को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के साथ जोड़ने की सलाह दी। उन्होंने उन्हें नौकरी खोजने वाले नहीं, बल्कि नौकरी देने वाले बनने के लिए प्रेरित किया। साथ ही नवाचार को अपनाने, स्थानीय उद्योगों को समर्थन देने और स्वदेशी समाधान को बढ़ावा देने का आह्वान किया।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि “विकसित भारत @ 2047” का दृष्टिकोण केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य अंतिम गांव और अंतिम व्यक्ति तक समावेशी विकास पहुंचाना है।

उन्होंने यह भी कहा कि दीक्षांत समारोहों में महिलाएं लगातार अधिक संख्या में सम्मान और पदक प्राप्त कर रही हैं, जो एक सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन का संकेत है। यह परिवर्तन उनकी दृढ़ता, अनुशासन और सहयोगी वातावरण का परिणाम है और भविष्य की पीढ़ियों को एक अधिक समावेशी और प्रगतिशील भारत की ओर प्रेरित कर रहा है।

इस अवसर पर उत्तर प्रदेश सरकार में पशुपालन एवं डेयरी विकास मंत्री धर्मपाल सिंह, राज्यसभा सांसद लक्ष्मीकांत बाजपेयी, योगेश मोहन गुप्ता सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

आंबेडकर जयंती पर संसद परिसर में श्रद्धांजलि, नेताओं ने बाबासाहेब के विचारों को बताया प्रेरणास्रोत

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नई दिल्ली- सी. पी. राधाकृष्णन,नरेंद्र मोदीऔर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने आज संसद भवन परिसर स्थित प्रेरणा स्थल में डॉ. बी. आर. आंबेडकर की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी।

इस अवसर पर कई केंद्रीय मंत्री, राज्यसभा में नेता प्रतिपक्षमल्लिकार्जुन खड़गे, राज्यसभा के उपसभापति  हरिवंश, सांसद, पूर्व सांसद तथा अन्य गणमान्य व्यक्ति भी उपस्थित रहे और उन्होंने बाबासाहेब को नमन किया।

इसके बाद संविधान सदन के केंद्रीय कक्ष में भी डॉ. आंबेडकर के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की गई। इस अवसर पर लोकसभा सचिवालय के महासचिव उत्पल कुमार सिंह सहित कई वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे।

 “Know Your Leader” कार्यक्रम में युवाओं को संदेश

संविधान सदन के केंद्रीय कक्ष में आयोजित “Know Your Leader” कार्यक्रम के दौरान लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने अपने जीवन की हर चुनौती को अवसर में बदल दिया। उनका जीवन, विचार और राष्ट्र निर्माण में योगदान हम सभी के लिए प्रेरणास्रोत है।

उन्होंने कहा कि संविधान में समानता का अधिकार और बिना भेदभाव के मतदान का अधिकार जैसे प्रावधानों ने एक मजबूत और प्रगतिशील भारत की नींव रखी है, जो आज विश्व के लोकतंत्रों को भी प्रेरित कर रहा है।

 युवाओं को “Nation First” का संदेश

लोकसभा अध्यक्ष ने युवाओं को देश के भविष्य का सच्चा प्रतिनिधि बताते हुए कहा कि उन्हें हमेशा “Nation First” की भावना के साथ कार्य करना चाहिए। उन्होंने कहा कि युवाओं की प्रतिभा, कौशल और नवाचार भारत को एक मजबूत और विकसित राष्ट्र बनाएंगे।

सोशल मीडिया पर भी साझा किया संदेश

ओम बिरला ने सोशल मीडिया मंच X पर अपने संदेश में कहा कि डॉ. आंबेडकर का जीवन संघर्ष, साहस और समर्पण की प्रेरणादायक गाथा है। उन्होंने विषम परिस्थितियों में भी शिक्षा और कड़ी मेहनत के बल पर सफलता हासिल की और करोड़ों वंचितों के लिए आशा की किरण बने।

उन्होंने कहा कि बाबासाहेब ने समानता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व के मूल्यों को अपने जीवन का आधार बनाया और इन्हें संविधान में शामिल कर देश को एक मजबूत दिशा दी।

निष्कर्ष

आंबेडकर जयंती के अवसर पर संसद परिसर में आयोजित इस कार्यक्रम ने बाबासाहेब के विचारों और उनके योगदान को पुनः स्मरण कराया। नेताओं ने एक स्वर में कहा कि डॉ. आंबेडकर के आदर्श आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं और एक समावेशी, न्यायपूर्ण और सशक्त भारत के निर्माण में मार्गदर्शक बने रहेंगे।

ध्यान से ही शांत और विकसित विश्व की नींव: उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन

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उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने आज भारत मंडपम में “ग्लोबल कॉन्फ्रेंस ऑफ मेडिटेशन लीडर्स – मेडिटेशन फॉर होलिस्टिक लिविंग एंड ए पीसफुल वर्ल्ड” को संबोधित किया। इस सम्मेलन का आयोजन पिरामिड स्पिरिचुअल सोसायटीज़ मूवमेंट और बुद्धा-CEO क्वांटम फाउंडेशन द्वारा किया गया था।

आयोजकों, वक्ताओं, ध्यान गुरुओं और प्रतिभागियों को बधाई देते हुए उपराष्ट्रपति ने समग्र जीवन और वैश्विक शांति के मार्ग के रूप में ध्यान को बढ़ावा देने के उनके समर्पण की सराहना की।

प्रसिद्ध तमिल संत तिरुमूलर की शिक्षाओं को याद करते हुए राधाकृष्णन ने कहा कि ध्यान एक आंतरिक दीपक जलाने के समान है, जो अज्ञानता को दूर कर सत्य और शांति की ओर ले जाता है। उन्होंने बताया कि तिरुमूलर ने मानव शरीर को एक मंदिर और ध्यान को भीतर स्थित दिव्यता के साक्षात्कार का माध्यम बताया है।

उन्होंने कहा कि आज दुनिया कई चुनौतियों से जूझ रही है और संघर्ष केवल बाहरी ही नहीं, बल्कि लोगों के भीतर भी मौजूद है। इस संदर्भ में उन्होंने जोर दिया कि ध्यान शांति, स्पष्टता और सकारात्मक दृष्टिकोण लाकर परिवर्तनकारी भूमिका निभा सकता है तथा दूसरों को सुनने और समझने की क्षमता को बढ़ाता है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि ध्यान की वास्तविक शक्ति मानव के भीतर परिवर्तन लाने में निहित है। उन्होंने बताया कि ध्यान तनाव को कम करता है, एकाग्रता बढ़ाता है, भावनात्मक संतुलन को मजबूत करता है और अधिक सोचने तथा अत्यधिक काम करने जैसी समस्याओं को दूर करने में मदद करता है।

उन्होंने चेतावनी दी कि केवल भौतिक सफलता की अंधी दौड़ में सार्थक जीवन को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि धन सुविधा दे सकता है, लेकिन जीवन से अधिक महत्वपूर्ण नहीं होना चाहिए। ध्यान सोच को बेहतर बनाता है और संतुलित तथा संतोषजनक जीवन जीने में मदद करता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ध्यान केवल आध्यात्मिक लोगों के लिए नहीं, बल्कि हर व्यक्ति के लिए है।

2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आर्थिक प्रगति के साथ मानसिक स्वास्थ्य का विकास भी उतना ही आवश्यक है। ध्यान आंतरिक शांति, भावनात्मक संतुलन और स्पष्ट सोच विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जो एक प्रगतिशील राष्ट्र के लिए जरूरी हैं।

नशा मुक्ति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराते हुए उन्होंने 2004 में किए गए अपने पदयात्रा का उल्लेख किया। युवाओं में बढ़ते नशे पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि ध्यान तनाव, चिंता और दिशाहीनता को दूर कर नशे की समस्या से लड़ने में सहायक हो सकता है।

दार्शनिक जिद्दू कृष्णमूर्ति का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा, “बिना मूल्यांकन के अवलोकन करने की क्षमता ही सर्वोच्च बुद्धिमत्ता है।” उन्होंने कहा कि ध्यान व्यक्ति को अपने विचारों को बिना किसी निर्णय के देखने की क्षमता देता है, जिससे आत्मिक परिवर्तन संभव होता है। यह परिवर्तन समझदार व्यक्तियों, सामंजस्यपूर्ण समाज, संवेदनशील नेतृत्व और मानवीय संस्थाओं के निर्माण में मदद करता है।

अंत में उन्होंने कहा कि बेहतर दुनिया बनाने के लिए पहले बेहतर और शांत मन का निर्माण जरूरी है, और ध्यान इस यात्रा की शुरुआत है।

इस अवसर पर सीबीआई और सीआरपीएफ के पूर्व निदेशक डी.आर. कार्तिकेयन, परमार्थ निकेतन आश्रम, ऋषिकेश के अध्यक्ष और आध्यात्मिक प्रमुख स्वामी चिदानंद सरस्वती, क्वांटम लाइफ यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष डॉ. न्यूटन कोंडावेटी, बुद्धा-CEO क्वांटम फाउंडेशन के संस्थापक चंद्र पुलमारासेट्टी, पिरामिड स्पिरिचुअल ट्रस्ट (हैदराबाद) के अध्यक्ष श्री विजय भास्कर रेड्डी सहित कई ध्यान गुरु, नीति निर्माता और विद्वान उपस्थित रहे।


उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने ‘Tides of Time’ पुस्तक का किया विमोचन, संसद के भित्ति चित्रों में भारत की सभ्यतागत यात्रा का वर्णन

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भारत के उपराष्ट्रपति एवं राज्यसभा के सभापति सी. पी. राधाकृष्णन ने आज नई दिल्ली के संविधान सदन में ‘Tides of Time: Bharat’s History through Murals in Parliament’ नामक पुस्तक का विमोचन किया। यह लोकसभा सचिवालय का प्रकाशन है, जिसकी लेखिका राज्यसभा सांसद सुधा मूर्ति हैं।

सभा को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने इस अवसर पर प्रसन्नता व्यक्त की और संसद की भित्ति चित्रों की “शाश्वत सुंदरता और गहन प्रतीकात्मकता” को चित्रित करने तथा इतिहास को पीढ़ियों के लिए सुलभ बनाने के लिए सुधा मूर्ति की सराहना की। उन्होंने कहा कि संविधान सदन में स्थित भित्ति चित्र केवल कला के नमूने नहीं हैं, बल्कि भारत की सभ्यतागत यात्रा को दर्शाने वाले दृश्य कथानक हैं।

उन्होंने कहा कि उत्तर में वैशाली से लेकर दक्षिण में कुडवोलाई प्रणाली तक भारत में लोकतांत्रिक परंपराएं निरंतर, समावेशी और समाज में गहराई से निहित रही हैं। ये परंपराएं संवाद, सहमति और विविध मतों के सम्मान पर आधारित व्यापक सभ्यतागत मूल्यों का हिस्सा हैं, जो भारत को “लोकतंत्र की जननी” बनाते हैं।

महान तमिल कवि सुब्रमण्यम भारती का उद्धरण देते हुए उपराष्ट्रपति ने भारत की बुद्धिमत्ता, गरिमा, उदारता और सांस्कृतिक गहराई की समृद्धि पर प्रकाश डाला और कहा कि ऐसी नींव स्वाभाविक रूप से समावेशिता और सभी मतों के सम्मान को बढ़ावा देती है।

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में संसद भवन में पारंपरिक प्रतीकों के समावेशन की सराहना की। साथ ही, उन्होंने राष्ट्रपति के संयुक्त सत्र संबोधन के दौरान चोल वंश के पवित्र सेंगोल के प्रदर्शन का उल्लेख करते हुए इसे आधुनिक भारत को उसकी सभ्यतागत जड़ों से जोड़ने वाला शक्तिशाली प्रतीक बताया।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि संसद एक जीवंत लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों—संवाद, बहस, असहमति और चर्चा—का प्रतिनिधित्व करती है। उन्होंने जोर दिया कि चर्चा, बहस और असहमति महत्वपूर्ण हैं, लेकिन अंततः उन्हें राष्ट्रीय हित में रचनात्मक निर्णय लेने की दिशा में योगदान देना चाहिए।

उन्होंने इस पुस्तक को भारत की सभ्यतागत यात्रा को समर्पित एक अद्भुत कृति बताया और कहा कि इसमें 124 भित्ति चित्रों के माध्यम से इतिहास को जीवंत रूप दिया गया है। यह पुस्तक सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर महर्षि वाल्मीकि और चाणक्य जैसे महान विचारकों की बुद्धिमत्ता तथा महावीर और गौतम बुद्ध की आध्यात्मिक शिक्षाओं तक की यात्रा को समेटती है। इसमें अशोक और छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे शासकों की उपलब्धियों, कोणार्क सूर्य मंदिर जैसे स्मारकों और भक्ति आंदोलन की सांस्कृतिक समृद्धि को भी दर्शाया गया है।

उन्होंने कहा कि यह पुस्तक भारत के स्वतंत्रता संग्राम को भी श्रद्धांजलि अर्पित करती है, जिसमें दांडी मार्च जैसे आंदोलन और महात्मा गांधी तथा सुभाष चंद्र बोस जैसे महान नेताओं का उल्लेख किया गया है।

प्रधानमंत्री के ‘विकसित भारत @ 2047’ के दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने “विकास भी, विरासत भी” के सिद्धांत को दोहराया और कहा कि विकास और विरासत एक-दूसरे के पूरक हैं। संसद के भित्ति चित्र इस दर्शन को दर्शाते हैं, जो प्रगति को पहचान, मूल्यों और निरंतरता से जोड़ते हैं।

उपराष्ट्रपति ने सुधा मूर्ति की सराहना करते हुए कहा कि वे ज्ञान, विनम्रता और सामाजिक प्रतिबद्धता का अद्वितीय संगम हैं। उन्होंने कॉर्पोरेट जगत से सामाजिक सेवा और संसद तक की उनकी यात्रा को प्रेरणादायक बताया और कहा कि उनके सभी कार्य व्यापक जनहित से प्रेरित होते हैं। उन्होंने इस प्रकाशन को प्रस्तुत करने के लिए लोकसभा सचिवालय के प्रयासों की भी प्रशंसा की।

सुब्रमण्यम भारती का पुनः उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भाषा, क्षेत्र और संस्कृति की विविधता के बावजूद भारत अपने राष्ट्रीय उद्देश्य में एकजुट है और हमेशा एक रहेगा।

“राष्ट्र प्रथम” की भावना को अपनाने का आह्वान करते हुए उपराष्ट्रपति ने सभी नागरिकों से आग्रह किया कि वे प्रतिबद्धता, ईमानदारी और गर्व के साथ राष्ट्र सेवा के लिए स्वयं को समर्पित करें।

इस अवसर पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, केंद्रीय मंत्री जे. पी. नड्डा और मनोहर लाल, राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश, राज्यसभा सांसद एवं पुस्तक की लेखिका सुधा मूर्ति सहित संसद के दोनों सदनों के सदस्य और वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

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