Media24Media.com: उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने ‘Tides of Time’ पुस्तक का किया विमोचन, संसद के भित्ति चित्रों में भारत की सभ्यतागत यात्रा का वर्णन

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उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने ‘Tides of Time’ पुस्तक का किया विमोचन, संसद के भित्ति चित्रों में भारत की सभ्यतागत यात्रा का वर्णन

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भारत के उपराष्ट्रपति एवं राज्यसभा के सभापति सी. पी. राधाकृष्णन ने आज नई दिल्ली के संविधान सदन में ‘Tides of Time: Bharat’s History through Murals in Parliament’ नामक पुस्तक का विमोचन किया। यह लोकसभा सचिवालय का प्रकाशन है, जिसकी लेखिका राज्यसभा सांसद सुधा मूर्ति हैं।

सभा को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने इस अवसर पर प्रसन्नता व्यक्त की और संसद की भित्ति चित्रों की “शाश्वत सुंदरता और गहन प्रतीकात्मकता” को चित्रित करने तथा इतिहास को पीढ़ियों के लिए सुलभ बनाने के लिए सुधा मूर्ति की सराहना की। उन्होंने कहा कि संविधान सदन में स्थित भित्ति चित्र केवल कला के नमूने नहीं हैं, बल्कि भारत की सभ्यतागत यात्रा को दर्शाने वाले दृश्य कथानक हैं।

उन्होंने कहा कि उत्तर में वैशाली से लेकर दक्षिण में कुडवोलाई प्रणाली तक भारत में लोकतांत्रिक परंपराएं निरंतर, समावेशी और समाज में गहराई से निहित रही हैं। ये परंपराएं संवाद, सहमति और विविध मतों के सम्मान पर आधारित व्यापक सभ्यतागत मूल्यों का हिस्सा हैं, जो भारत को “लोकतंत्र की जननी” बनाते हैं।

महान तमिल कवि सुब्रमण्यम भारती का उद्धरण देते हुए उपराष्ट्रपति ने भारत की बुद्धिमत्ता, गरिमा, उदारता और सांस्कृतिक गहराई की समृद्धि पर प्रकाश डाला और कहा कि ऐसी नींव स्वाभाविक रूप से समावेशिता और सभी मतों के सम्मान को बढ़ावा देती है।

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में संसद भवन में पारंपरिक प्रतीकों के समावेशन की सराहना की। साथ ही, उन्होंने राष्ट्रपति के संयुक्त सत्र संबोधन के दौरान चोल वंश के पवित्र सेंगोल के प्रदर्शन का उल्लेख करते हुए इसे आधुनिक भारत को उसकी सभ्यतागत जड़ों से जोड़ने वाला शक्तिशाली प्रतीक बताया।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि संसद एक जीवंत लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों—संवाद, बहस, असहमति और चर्चा—का प्रतिनिधित्व करती है। उन्होंने जोर दिया कि चर्चा, बहस और असहमति महत्वपूर्ण हैं, लेकिन अंततः उन्हें राष्ट्रीय हित में रचनात्मक निर्णय लेने की दिशा में योगदान देना चाहिए।

उन्होंने इस पुस्तक को भारत की सभ्यतागत यात्रा को समर्पित एक अद्भुत कृति बताया और कहा कि इसमें 124 भित्ति चित्रों के माध्यम से इतिहास को जीवंत रूप दिया गया है। यह पुस्तक सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर महर्षि वाल्मीकि और चाणक्य जैसे महान विचारकों की बुद्धिमत्ता तथा महावीर और गौतम बुद्ध की आध्यात्मिक शिक्षाओं तक की यात्रा को समेटती है। इसमें अशोक और छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे शासकों की उपलब्धियों, कोणार्क सूर्य मंदिर जैसे स्मारकों और भक्ति आंदोलन की सांस्कृतिक समृद्धि को भी दर्शाया गया है।

उन्होंने कहा कि यह पुस्तक भारत के स्वतंत्रता संग्राम को भी श्रद्धांजलि अर्पित करती है, जिसमें दांडी मार्च जैसे आंदोलन और महात्मा गांधी तथा सुभाष चंद्र बोस जैसे महान नेताओं का उल्लेख किया गया है।

प्रधानमंत्री के ‘विकसित भारत @ 2047’ के दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने “विकास भी, विरासत भी” के सिद्धांत को दोहराया और कहा कि विकास और विरासत एक-दूसरे के पूरक हैं। संसद के भित्ति चित्र इस दर्शन को दर्शाते हैं, जो प्रगति को पहचान, मूल्यों और निरंतरता से जोड़ते हैं।

उपराष्ट्रपति ने सुधा मूर्ति की सराहना करते हुए कहा कि वे ज्ञान, विनम्रता और सामाजिक प्रतिबद्धता का अद्वितीय संगम हैं। उन्होंने कॉर्पोरेट जगत से सामाजिक सेवा और संसद तक की उनकी यात्रा को प्रेरणादायक बताया और कहा कि उनके सभी कार्य व्यापक जनहित से प्रेरित होते हैं। उन्होंने इस प्रकाशन को प्रस्तुत करने के लिए लोकसभा सचिवालय के प्रयासों की भी प्रशंसा की।

सुब्रमण्यम भारती का पुनः उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भाषा, क्षेत्र और संस्कृति की विविधता के बावजूद भारत अपने राष्ट्रीय उद्देश्य में एकजुट है और हमेशा एक रहेगा।

“राष्ट्र प्रथम” की भावना को अपनाने का आह्वान करते हुए उपराष्ट्रपति ने सभी नागरिकों से आग्रह किया कि वे प्रतिबद्धता, ईमानदारी और गर्व के साथ राष्ट्र सेवा के लिए स्वयं को समर्पित करें।

इस अवसर पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, केंद्रीय मंत्री जे. पी. नड्डा और मनोहर लाल, राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश, राज्यसभा सांसद एवं पुस्तक की लेखिका सुधा मूर्ति सहित संसद के दोनों सदनों के सदस्य और वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

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