Media24Media.com: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: निजी शरिया कोर्ट कानूनी तलाक नहीं दे सकती

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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: निजी शरिया कोर्ट कानूनी तलाक नहीं दे सकती

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रायपुर- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने निजी शरिया अदालतों और धार्मिक संस्थाओं के अधिकार को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कोई भी निजी धार्मिक संस्था या खुद को शरिया कोर्ट बताने वाला संगठन कानून द्वारा स्थापित अदालत का दर्जा नहीं रखता। ऐसी संस्था धार्मिक राय या फतवा दे सकती है, लेकिन वह किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति को कानूनी रूप से बदलने या विवाह-विच्छेद का बाध्यकारी आदेश जारी करने का अधिकार नहीं रखती।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला रायपुर की एक मुस्लिम महिला नीरोश अब्बासी से जुड़ा है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, उनके पहले पति की वर्ष 2015 में मृत्यु हो गई थी। इसके बाद उन्होंने वर्ष 2020 में मोहम्मद आबिद खान से विवाह किया।

बाद में पति-पत्नी के बीच विवाद उत्पन्न हुआ। विवाद का एक कारण बच्चों के नए पारिवारिक माहौल में समायोजन को लेकर भी बताया गया है। मामला बढ़ने के बाद महिला ने अपने पति और ससुराल पक्ष पर उत्पीड़न, क्रूरता और दुर्व्यवहार के आरोप लगाए। दोनों पक्षों के बीच समझौते और काउंसलिंग की कोशिश भी हुई, लेकिन विवाद का समाधान नहीं हो सका।

शरिया संस्था ने क्या आदेश दिया था?

विवाद के बीच रायपुर की एक निजी शरिया संस्था ने 18 जनवरी 2022 को एक आदेश जारी किया था। इस आदेश में महिला को उसके पति से तलाकशुदा घोषित किया गया था।

महिला ने इस आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनका मुख्य सवाल यह था कि क्या किसी निजी धार्मिक संस्था के पास किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति को कानूनी रूप से बदलने का अधिकार हो सकता है?

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए निजी शरिया संस्था के उस आदेश को कानूनी अधिकार से बाहर और प्रभावहीन घोषित कर दिया।

कोर्ट ने साफ किया कि Darul Qaza जैसी निजी धार्मिक संस्थाएं संवैधानिक या कानून द्वारा स्थापित अदालत नहीं हैं। वे धार्मिक दृष्टिकोण या राय व्यक्त कर सकती हैं, लेकिन उनके आदेश किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकार, वैवाहिक स्थिति या कानूनी दायित्व को बाध्यकारी रूप से बदल नहीं सकते।

यानी आसान शब्दों में कहें तो—

धार्मिक राय अलग चीज है और कानूनी फैसला अलग।

किसी धार्मिक संस्था द्वारा यह कह देना कि किसी व्यक्ति का विवाह समाप्त हो गया है, अपने आप में ऐसा कानूनी आदेश नहीं बन जाता जिसे राज्य की न्याय व्यवस्था बाध्यकारी माने।

कोर्ट ने किन बातों पर जोर दिया?

हाईकोर्ट का फैसला मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित था कि किस संस्था के पास कानूनी रूप से वैवाहिक अधिकारों पर फैसला करने का अधिकार है।

कोर्ट ने माना कि:

  • निजी शरिया संस्था कानून द्वारा स्थापित न्यायालय नहीं है।

  • ऐसी संस्था धार्मिक राय या फतवा दे सकती है।

  • वह किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति का बाध्यकारी न्यायिक निर्धारण नहीं कर सकती।

  • वह अपने आदेश से किसी व्यक्ति का कानूनी विवाह समाप्त नहीं कर सकती।

  • वैवाहिक अधिकारों और कानूनी स्थिति का निर्धारण सक्षम न्यायिक/कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से ही होगा।

क्या हाईकोर्ट ने 'Talaq-e-Hasan' को गलत या असंवैधानिक घोषित कर दिया?

नहीं। यह बात समझना बहुत जरूरी है।

हाईकोर्ट ने इस मामले में Talaq-e-Hasan की संवैधानिक वैधता पर अंतिम फैसला नहीं दिया। अदालत ने इस मुद्दे को खुला रखा और कहा कि संबंधित पक्ष कानून के अनुसार सक्षम मंच पर अपना मामला उठा सकते हैं।

इसलिए इस फैसले का सीधा मतलब यह नहीं है कि कोर्ट ने मुस्लिम तलाक की किसी विशेष धार्मिक प्रक्रिया को पूरी तरह असंवैधानिक घोषित कर दिया है।

फैसले का मुख्य मुद्दा था—क्या निजी शरिया संस्था स्वयं एक कानूनी अदालत की तरह विवाह समाप्त करने का बाध्यकारी आदेश दे सकती है?

इसका जवाब हाईकोर्ट ने नहीं में दिया।

महिला के मामले पर इसका क्या असर होगा?

हाईकोर्ट द्वारा शरिया संस्था के आदेश को कानूनी अधिकार से बाहर बताए जाने का मतलब है कि उस निजी संस्था के आदेश के आधार पर महिला की वैवाहिक स्थिति को कानूनी रूप से समाप्त नहीं माना जा सकता।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका फैसला महिला के उपलब्ध अन्य कानूनी या वैधानिक उपायों को प्रभावित नहीं करेगा। मामले से जुड़े आपराधिक proceedings पर भी इस निर्णय का प्रतिकूल प्रभाव नहीं माना गया है।

इस फैसले का महत्व क्यों है?

यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें धार्मिक संस्थाओं और राज्य की न्यायिक व्यवस्था के अधिकार क्षेत्र की सीमा को स्पष्ट किया गया है।

भारत में अलग-अलग धार्मिक समुदायों में व्यक्तिगत कानून और धार्मिक परंपराओं का महत्व है। लेकिन जब किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकार, वैवाहिक स्थिति या अन्य नागरिक अधिकारों पर बाध्यकारी फैसला देने की बात आती है, तो सवाल यह होता है कि उस फैसले को कानूनी मान्यता देने का अधिकार किस संस्था के पास है।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इस मामले में स्पष्ट किया कि निजी धार्मिक संस्था का आदेश अपने आप में न्यायालय के आदेश के बराबर नहीं हो सकता।

आसान भाषा में समझें

मान लीजिए किसी निजी धार्मिक संस्था ने किसी दंपति के बारे में कहा कि उनका विवाह खत्म हो गया है।

हाईकोर्ट के इस फैसले के अनुसार, सिर्फ उस संस्था के कहने से सरकारी रिकॉर्ड और कानूनी व्यवस्था में विवाह समाप्त नहीं माना जा सकता।

धार्मिक राय = धार्मिक/सामुदायिक महत्व हो सकता है।

न्यायालय का कानूनी आदेश = राज्य की न्याय व्यवस्था में बाध्यकारी कानूनी प्रभाव।

यही इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।

निष्कर्ष

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रायपुर से जुड़े इस मामले में निजी शरिया संस्था द्वारा जारी तलाक संबंधी आदेश को कानूनी अधिकार के बिना जारी किया गया आदेश माना है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी संस्थाएं धार्मिक राय दे सकती हैं, लेकिन किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति को कानूनी रूप से बदलने या विवाह-विच्छेद का बाध्यकारी आदेश देने का अधिकार उनके पास नहीं है।

हालांकि, अदालत ने Talaq-e-Hasan की संवैधानिक वैधता पर कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया है। इसलिए इस फैसले को निजी शरिया संस्था के कानूनी अधिकार के सवाल तक सीमित समझना अधिक सही होगा।

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