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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: बर्खास्त कर्मचारी को देनी होगी विभागीय जांच की पूरी जानकारी

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RTI के तहत अपनी ही विभागीय जांच से जुड़े दस्तावेज मांगना कर्मचारी का अधिकार, सूचना रोकने की दलील को कोर्ट ने किया खारिज

बिलासपुर- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सूचना के अधिकार (RTI) को लेकर एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी कर्मचारी को उसके खिलाफ हुई विभागीय जांच और बर्खास्तगी का आधार बने दस्तावेज उपलब्ध कराए जा सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि जब कर्मचारी अपनी ही विभागीय जांच से संबंधित रिकॉर्ड अपने बचाव के लिए मांग रहा हो और उसमें किसी तीसरे व्यक्ति की निजता का सवाल न हो, तो केवल RTI की छूट का हवाला देकर सूचना रोकी नहीं जा सकती।

क्या है पूरा मामला?

मामला जांजगीर स्थित फैमिली कोर्ट में चालक के पद पर कार्यरत एक कर्मचारी से जुड़ा है। कर्मचारी के खिलाफ कथित कदाचार के आरोपों को लेकर दो विभागीय जांच शुरू की गई थीं। जांच में उसके खिलाफ सात आरोप लगाए गए और बाद में विभागीय कार्रवाई के तहत उसकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं।

बर्खास्तगी के बाद कर्मचारी ने अपने खिलाफ हुई विभागीय जांच से जुड़े दस्तावेज और रिकॉर्ड RTI के माध्यम से मांगे। हालांकि, संबंधित अधिकारियों की ओर से सूचना देने से इनकार किया गया और RTI कानून में मौजूद कुछ अपवादों का हवाला दिया गया।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने अधिकारियों की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने माना कि कर्मचारी जिस सूचना की मांग कर रहा है, वह उसकी अपनी विभागीय जांच से संबंधित है और उसके बचाव के लिए उपयोगी हो सकती है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि मांगी गई जानकारी में किसी तीसरे पक्ष की निजता प्रभावित नहीं होती है, तो केवल RTI Act की धारा 8(1)(c) या 8(1)(j) का हवाला देकर ऐसी सूचना से इनकार नहीं किया जा सकता।

फैमिली कोर्ट को दस्तावेज उपलब्ध कराने का निर्देश

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जांजगीर-चांपा फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया कि पूर्व कर्मचारी को उसकी विभागीय जांच से संबंधित मांगे गए दस्तावेज उपलब्ध कराए जाएं। यह आदेश 31 अगस्त 2026 को पारित किया गया था।

क्यों अहम है यह फैसला?

यह फैसला सरकारी और सार्वजनिक संस्थानों में पारदर्शिता और जवाबदेही के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विभागीय जांच का सामना करने वाले कर्मचारी के लिए संबंधित दस्तावेज उसके बचाव का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकते हैं। हाईकोर्ट के इस फैसले से यह संदेश गया है कि RTI कानून की छूट का इस्तेमाल कर्मचारी को उसकी अपनी विभागीय कार्रवाई से जुड़े रिकॉर्ड से वंचित करने के लिए नहीं किया जा सकता, जब तक कोई वैध गोपनीयता या अन्य कानूनी अपवाद लागू न हो।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: निजी शरिया कोर्ट कानूनी तलाक नहीं दे सकती

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रायपुर- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने निजी शरिया अदालतों और धार्मिक संस्थाओं के अधिकार को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कोई भी निजी धार्मिक संस्था या खुद को शरिया कोर्ट बताने वाला संगठन कानून द्वारा स्थापित अदालत का दर्जा नहीं रखता। ऐसी संस्था धार्मिक राय या फतवा दे सकती है, लेकिन वह किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति को कानूनी रूप से बदलने या विवाह-विच्छेद का बाध्यकारी आदेश जारी करने का अधिकार नहीं रखती।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला रायपुर की एक मुस्लिम महिला नीरोश अब्बासी से जुड़ा है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, उनके पहले पति की वर्ष 2015 में मृत्यु हो गई थी। इसके बाद उन्होंने वर्ष 2020 में मोहम्मद आबिद खान से विवाह किया।

बाद में पति-पत्नी के बीच विवाद उत्पन्न हुआ। विवाद का एक कारण बच्चों के नए पारिवारिक माहौल में समायोजन को लेकर भी बताया गया है। मामला बढ़ने के बाद महिला ने अपने पति और ससुराल पक्ष पर उत्पीड़न, क्रूरता और दुर्व्यवहार के आरोप लगाए। दोनों पक्षों के बीच समझौते और काउंसलिंग की कोशिश भी हुई, लेकिन विवाद का समाधान नहीं हो सका।

शरिया संस्था ने क्या आदेश दिया था?

विवाद के बीच रायपुर की एक निजी शरिया संस्था ने 18 जनवरी 2022 को एक आदेश जारी किया था। इस आदेश में महिला को उसके पति से तलाकशुदा घोषित किया गया था।

महिला ने इस आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनका मुख्य सवाल यह था कि क्या किसी निजी धार्मिक संस्था के पास किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति को कानूनी रूप से बदलने का अधिकार हो सकता है?

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए निजी शरिया संस्था के उस आदेश को कानूनी अधिकार से बाहर और प्रभावहीन घोषित कर दिया।

कोर्ट ने साफ किया कि Darul Qaza जैसी निजी धार्मिक संस्थाएं संवैधानिक या कानून द्वारा स्थापित अदालत नहीं हैं। वे धार्मिक दृष्टिकोण या राय व्यक्त कर सकती हैं, लेकिन उनके आदेश किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकार, वैवाहिक स्थिति या कानूनी दायित्व को बाध्यकारी रूप से बदल नहीं सकते।

यानी आसान शब्दों में कहें तो—

धार्मिक राय अलग चीज है और कानूनी फैसला अलग।

किसी धार्मिक संस्था द्वारा यह कह देना कि किसी व्यक्ति का विवाह समाप्त हो गया है, अपने आप में ऐसा कानूनी आदेश नहीं बन जाता जिसे राज्य की न्याय व्यवस्था बाध्यकारी माने।

कोर्ट ने किन बातों पर जोर दिया?

हाईकोर्ट का फैसला मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित था कि किस संस्था के पास कानूनी रूप से वैवाहिक अधिकारों पर फैसला करने का अधिकार है।

कोर्ट ने माना कि:

  • निजी शरिया संस्था कानून द्वारा स्थापित न्यायालय नहीं है।

  • ऐसी संस्था धार्मिक राय या फतवा दे सकती है।

  • वह किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति का बाध्यकारी न्यायिक निर्धारण नहीं कर सकती।

  • वह अपने आदेश से किसी व्यक्ति का कानूनी विवाह समाप्त नहीं कर सकती।

  • वैवाहिक अधिकारों और कानूनी स्थिति का निर्धारण सक्षम न्यायिक/कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से ही होगा।

क्या हाईकोर्ट ने 'Talaq-e-Hasan' को गलत या असंवैधानिक घोषित कर दिया?

नहीं। यह बात समझना बहुत जरूरी है।

हाईकोर्ट ने इस मामले में Talaq-e-Hasan की संवैधानिक वैधता पर अंतिम फैसला नहीं दिया। अदालत ने इस मुद्दे को खुला रखा और कहा कि संबंधित पक्ष कानून के अनुसार सक्षम मंच पर अपना मामला उठा सकते हैं।

इसलिए इस फैसले का सीधा मतलब यह नहीं है कि कोर्ट ने मुस्लिम तलाक की किसी विशेष धार्मिक प्रक्रिया को पूरी तरह असंवैधानिक घोषित कर दिया है।

फैसले का मुख्य मुद्दा था—क्या निजी शरिया संस्था स्वयं एक कानूनी अदालत की तरह विवाह समाप्त करने का बाध्यकारी आदेश दे सकती है?

इसका जवाब हाईकोर्ट ने नहीं में दिया।

महिला के मामले पर इसका क्या असर होगा?

हाईकोर्ट द्वारा शरिया संस्था के आदेश को कानूनी अधिकार से बाहर बताए जाने का मतलब है कि उस निजी संस्था के आदेश के आधार पर महिला की वैवाहिक स्थिति को कानूनी रूप से समाप्त नहीं माना जा सकता।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका फैसला महिला के उपलब्ध अन्य कानूनी या वैधानिक उपायों को प्रभावित नहीं करेगा। मामले से जुड़े आपराधिक proceedings पर भी इस निर्णय का प्रतिकूल प्रभाव नहीं माना गया है।

इस फैसले का महत्व क्यों है?

यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें धार्मिक संस्थाओं और राज्य की न्यायिक व्यवस्था के अधिकार क्षेत्र की सीमा को स्पष्ट किया गया है।

भारत में अलग-अलग धार्मिक समुदायों में व्यक्तिगत कानून और धार्मिक परंपराओं का महत्व है। लेकिन जब किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकार, वैवाहिक स्थिति या अन्य नागरिक अधिकारों पर बाध्यकारी फैसला देने की बात आती है, तो सवाल यह होता है कि उस फैसले को कानूनी मान्यता देने का अधिकार किस संस्था के पास है।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इस मामले में स्पष्ट किया कि निजी धार्मिक संस्था का आदेश अपने आप में न्यायालय के आदेश के बराबर नहीं हो सकता।

आसान भाषा में समझें

मान लीजिए किसी निजी धार्मिक संस्था ने किसी दंपति के बारे में कहा कि उनका विवाह खत्म हो गया है।

हाईकोर्ट के इस फैसले के अनुसार, सिर्फ उस संस्था के कहने से सरकारी रिकॉर्ड और कानूनी व्यवस्था में विवाह समाप्त नहीं माना जा सकता।

धार्मिक राय = धार्मिक/सामुदायिक महत्व हो सकता है।

न्यायालय का कानूनी आदेश = राज्य की न्याय व्यवस्था में बाध्यकारी कानूनी प्रभाव।

यही इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।

निष्कर्ष

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रायपुर से जुड़े इस मामले में निजी शरिया संस्था द्वारा जारी तलाक संबंधी आदेश को कानूनी अधिकार के बिना जारी किया गया आदेश माना है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी संस्थाएं धार्मिक राय दे सकती हैं, लेकिन किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति को कानूनी रूप से बदलने या विवाह-विच्छेद का बाध्यकारी आदेश देने का अधिकार उनके पास नहीं है।

हालांकि, अदालत ने Talaq-e-Hasan की संवैधानिक वैधता पर कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया है। इसलिए इस फैसले को निजी शरिया संस्था के कानूनी अधिकार के सवाल तक सीमित समझना अधिक सही होगा।

राज्यपाल डेका ने न्यायाधिपति कृष्न राम महापात्र को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पद की दिलाई शपथ

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रायपुर- राज्यपाल रमेन डेका ने न्यायाधिपति कृष्न राम महापात्र  (Krushna Ram Mohapatra) को आज लोकभवन के छत्तीसगढ़ मण्डपम् में उच्च न्यायालय, छत्तीसगढ़ के मुख्य न्यायाधीश पद की शपथ दिलाई। इसके पूर्व कृष्न राम महापात्र उड़ीसा हाईकोर्ट के वरिष्ठ जज के पद पर कार्यरत थे। राज्यपाल डेका ने मुख्य न्यायाधीश कृष्न राम महापात्र को राष्ट्रपति द्वारा जारी मूल वारंट की प्रति सौंपी। राज्यपाल ने मुख्य न्यायाधीश महापात्र को बधाई एवं शुभकामनाएं दीं। 

इस अवसर पर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा, स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव, स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल, केन्द्रीय कृषि राज्य मंत्री तोखन साहू, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, पूर्व राज्यपाल रमेश बैस, राज्य सभा सांसद लक्ष्मी वर्मा, विधायक सुनील सोनी, अनुज शर्मा एवं अन्य जनप्रतिनिधि भी उपस्थित थे।

समारोह में मुख्य न्यायाधीश महापात्र की धर्मपत्नी अनिता महापात्र सहित छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के न्यायाधीशगण उपस्थित थे। शपथ ग्रहण समारोह का संचालन प्रदेश के मुख्य सचिव विकास शील द्वारा किया गया तथा उन्होंने राष्ट्रपति द्वारा जारी वारंट का वाचन किया। इस अवसर पर अपर मुख्य सचिव सुब्रत साहू, प्रमुख सचिव गृह विभाग निहारिका बारिक, पुलिस महानिदेशक अरूण देव गौतम, राज्यपाल के सचिव डॉ. सी.आर. प्रसन्ना, महाधिवक्ता विवेक शर्मा, उच्च न्यायालय बिलासपुर के रजिस्ट्रार जनरल रजनीश श्रीवास्तव सहित राज्य शासन के वरिष्ठ अधिकारीगण एवं हाईकोर्ट के अधिवक्तागण उपस्थित थे। 

उल्लेखनीय है कि कृष्न राम महापात्र छत्तीसगढ़ के 16 वें मुख्य न्यायाधीश होंगे।


देशभर में 8 नए हाईकोर्ट चीफ जस्टिस की नियुक्ति, केंद्र सरकार ने जारी की अधिसूचना

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नई दिल्ली- केंद्र सरकार ने देश के विभिन्न हाईकोर्ट में 8 नए मुख्य न्यायाधीशों (Chief Justices) की नियुक्ति को लेकर 5 सितंबर को आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी। इन नियुक्तियों के साथ देश की न्यायपालिका के कई प्रमुख हाईकोर्ट में नेतृत्व स्तर पर महत्वपूर्ण बदलाव होने जा रहा है।

केंद्र सरकार की अधिसूचना के बाद संबंधित हाईकोर्ट में नए मुख्य न्यायाधीशों के कार्यभार संभालने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। इन नियुक्तियों को न्यायिक प्रशासन के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

नए मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के साथ संबंधित हाईकोर्ट में न्यायिक कार्यों के संचालन और प्रशासनिक जिम्मेदारियों को नई दिशा मिलने की उम्मीद है।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट को मिलेगा नया मुख्य न्यायाधीश

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सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जस्टिस कृष्ण राम महापात्रा के नाम की सिफारिश की है।

ओडिशा हाईकोर्ट में कार्यरत जस्टिस कृष्ण राम महापात्रा को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का अगला मुख्य न्यायाधीश बनाए जाने की सिफारिश की गई है। यह सिफारिश सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की 6 अगस्त 2026 को हुई बैठक में की गई।

जस्टिस के.आर. मोहपात्रा

वर्तमान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रमेश सिन्हा 4 सितंबर 2026 को सेवानिवृत्त होने वाले हैं। उनके सेवानिवृत्त होने के बाद निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने पर जस्टिस महापात्रा छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की कमान संभाल सकते हैं।

🔹 वर्तमान पद: न्यायाधीश, ओडिशा हाईकोर्ट
🔹 हाईकोर्ट जज के रूप में नियुक्ति: 17 अप्रैल 2015
🔹 प्रस्तावित पद: मुख्य न्यायाधीश, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
🔹 नियुक्ति की स्थिति: फिलहाल कॉलेजियम की सिफारिश; औपचारिक नियुक्ति के लिए आगे की प्रक्रिया बाकी है।

जस्टिस कृष्ण राम महापात्रा के अनुभव को देखते हुए उनकी प्रस्तावित नियुक्ति को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के लिए महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है।

बिलासपुर में बाढ़ और बिजली व्यवस्था पर हाईकोर्ट सख्त, CSPDCL और नगर निगम से मांगा नया शपथपत्र

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बिलासपुर- शहर में बारिश के दौरान जलभराव, बाढ़ प्रबंधन और बिजली आपूर्ति की समस्याओं को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक बार फिर सख्त रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (CSPDCL) के प्रबंध निदेशक और बिलासपुर नगर निगम के आयुक्त को नया शपथपत्र दाखिल कर अब तक किए गए कामों की वास्तविक प्रगति और मौजूदा स्थिति बताने का निर्देश दिया है।

यह मामला कोर्ट द्वारा स्वतः संज्ञान लेकर शुरू की गई सुओ-मोटो जनहित याचिका से जुड़ा है। कोर्ट ने इससे पहले भी शहर में बारिश के कारण होने वाले जलभराव और बिजली आपूर्ति बाधित होने की समस्या पर अधिकारियों से जवाब मांगा था।

कोर्ट ने कहा—सिर्फ योजना नहीं, जमीन पर दिखे काम

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने 25 अगस्त को मामले की सुनवाई के दौरान अधिकारियों द्वारा अब तक किए गए कार्यों और प्रस्तावित योजनाओं का संज्ञान लिया।

कोर्ट ने साफ किया कि केवल योजनाएं बनाना या कार्रवाई का आश्वासन देना पर्याप्त नहीं है। योजनाओं का जमीनी स्तर पर प्रभाव दिखाई देना चाहिए, ताकि बिलासपुर के लोगों को बारिश, जलभराव और बिजली से जुड़ी परेशानियों से वास्तविक राहत मिल सके।

इसी उद्देश्य से कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से प्रगति की निगरानी करने और ताजा शपथपत्र में ठोस प्रगति का विवरण प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।

बिजली व्यवस्था मजबूत करने के लिए कई बड़े कदम

सुनवाई के दौरान CSPDCL की ओर से बताया गया कि बिलासपुर की बिजली व्यवस्था को मजबूत करने के लिए कई स्तरों पर काम शुरू किया गया है।

इनमें क्षतिग्रस्त सीमेंट के बिजली खंभों को लोहे के खंभों से बदलना, बिजली लाइनों से जुड़े खतरनाक विज्ञापन होर्डिंग्स की पहचान करना और आपात स्थिति में बिजली बहाल करने के लिए अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध कराना शामिल है।

इसके अलावा बढ़ती बिजली मांग को देखते हुए एक Extra High Voltage (EHV) सब-स्टेशन और दो 33/11 KV सब-स्टेशन स्थापित करने की प्रक्रिया भी आगे बढ़ाई जा रही है। इनमें लोकांडी क्षेत्र में EHV सब-स्टेशन तथा सलावली नाला और मंगला रिवर व्यू क्षेत्र में 33/11 KV सब-स्टेशन प्रस्तावित हैं।

अधिकारियों का कहना है कि नए सब-स्टेशन बनने से मौजूदा नेटवर्क पर दबाव कम होगा और बिजली आपूर्ति को अधिक स्थिर बनाने में मदद मिलेगी।

जलभराव से निपटने नगर निगम ने बनाया Flood Control Cell

बिलासपुर नगर निगम ने मानसून के दौरान जलभराव और बाढ़ जैसी स्थिति से निपटने के लिए Flood Control Cell का गठन किया है। यह सेल विकास भवन, नेहरू चौक में स्थापित किया गया है और इसमें अधिकारियों की शिफ्टवार ड्यूटी तथा शिकायतों की निगरानी की व्यवस्था की गई है।

नगर निगम के अनुसार, आपात स्थिति के लिए राहत शिविरों की पहचान, आपातकालीन रोशनी और पेयजल की व्यवस्था, नालियों एवं सीवर की सफाई, बचाव दलों की तैनाती तथा JCB, पंप और अन्य मशीनरी की उपलब्धता सुनिश्चित करने की व्यवस्था की गई है।

इसके अलावा भारी बारिश के दौरान अधिकारियों को लगातार फील्ड में निगरानी रखने और जलभराव वाले क्षेत्रों में तत्काल कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।

 सभी आठ जोन में नालों की सफाई

नगर निगम ने बताया कि मानसून से पहले बिलासपुर के सभी आठ नगर निगम जोन में बड़े और छोटे नालों की सफाई एवं डी-सिल्टिंग का काम कराया गया है।

इसके लिए निगम के पास 14 वाहन उपलब्ध हैं, जिनका उपयोग गाद, कचरा और अन्य सामग्री हटाने के साथ-साथ जल निकासी व्यवस्था को दुरुस्त करने में किया जा रहा है।

नगर निगम ने कोर्ट को यह भी बताया कि बारिश और जलभराव से जुड़ी किसी भी आपात स्थिति में अन्य विभागों के साथ समन्वय कर मानव संसाधन, वाहन और मशीनरी उपलब्ध कराई जाएगी।

बिजली शिकायतों के त्वरित समाधान पर जोर

बिजली व्यवस्था को लेकर कोर्ट की निगरानी का एक अहम हिस्सा शिकायतों के त्वरित निराकरण से जुड़ा है।

CSPDCL ने बताया कि बिजली आपूर्ति बाधित होने की शिकायतों को जल्द दर्ज करने और निर्धारित समय में उनका समाधान करने के लिए कॉल सेंटर व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने पर जोर दिया जा रहा है। इसके साथ ही आपातकालीन कार्यों के लिए अतिरिक्त मानवबल और ठेकेदारों की सेवाएं भी उपलब्ध कराई गई हैं।

इसका उद्देश्य बारिश या तेज आंधी के दौरान बिजली के खंभे, तार या अन्य उपकरण क्षतिग्रस्त होने पर कम से कम समय में बिजली बहाल करना है।

खराब मौसम और बिजली हादसों पर भी कोर्ट की नजर

बिलासपुर में बिजली और बारिश से जुड़ी समस्याओं पर हाईकोर्ट पहले भी लगातार निगरानी करता रहा है। जुलाई में कोर्ट ने बिजली आपूर्ति व्यवस्था, जलभराव और नागरिकों की सुरक्षा को लेकर अधिकारियों से विस्तृत जानकारी मांगी थी।

एक पूर्व सुनवाई में कोर्ट के सामने यह भी आया था कि बड़ी संख्या में खराब सर्विस वायर को बदलने की जरूरत थी और अधिकारियों से लंबित मामलों की वर्तमान स्थिति स्पष्ट करने को कहा गया था।

अब कोर्ट को देनी होगी जमीनी प्रगति की रिपोर्ट

हाईकोर्ट का मौजूदा निर्देश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अब अधिकारियों को केवल भविष्य की योजनाएं बताने के बजाय अब तक किए गए काम और उनकी वास्तविक प्रगति का ब्यौरा देना होगा।

कोर्ट ने ऊर्जा विभाग के प्रमुख सचिव, CSPDCL के प्रबंध निदेशक और बिलासपुर नगर निगम आयुक्त को अपने-अपने स्तर पर चल रहे कार्यों की निगरानी करने और ताजा शपथपत्र में प्रगति दर्ज करने का निर्देश दिया है।

क्यों अहम है यह मामला?

बिलासपुर में बारिश के दौरान सड़कों पर जलभराव और बिजली आपूर्ति में व्यवधान सीधे तौर पर आम लोगों की सुरक्षा और रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करते हैं। ऐसे में हाईकोर्ट की निगरानी से उम्मीद है कि जल निकासी, बिजली नेटवर्क, आपातकालीन प्रतिक्रिया और शिकायत निवारण की व्यवस्थाओं को केवल कागजों तक सीमित न रखकर जमीन पर प्रभावी बनाया जाएगा।

हाईकोर्ट का संदेश स्पष्ट है—बिलासपुर की जनता को राहत देने के लिए योजनाओं और दावों से आगे बढ़कर उनके परिणाम जमीन पर दिखाई देने चाहिए।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी: लगातार मानसिक प्रताड़ना और शादी का दबाव आत्महत्या के लिए उकसाने के समान हो सकता है

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बिलासपुर- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के दौरान कहा है कि यदि किसी व्यक्ति को लंबे समय तक मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाए और उस पर लगातार शादी करने का दबाव बनाया जाए, तो ऐसी परिस्थितियां आत्महत्या के लिए उकसाने (Abetment of Suicide) के दायरे में आ सकती हैं।

अदालत ने अपने अवलोकन में कहा कि किसी व्यक्ति पर लगातार मानसिक दबाव, उत्पीड़न और भावनात्मक प्रताड़ना उसके मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है। यदि इस तरह की परिस्थितियां किसी व्यक्ति को आत्महत्या जैसा कदम उठाने के लिए मजबूर करती हैं, तो मामले के तथ्यों के आधार पर इसे आत्महत्या के लिए उकसाने के रूप में देखा जा सकता है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में प्रत्येक घटना के तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों का सावधानीपूर्वक परीक्षण किया जाना आवश्यक है। अदालत की यह टिप्पणी मानसिक उत्पीड़न और सामाजिक दबाव से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी दृष्टिकोण के रूप में देखी जा रही है।

इस फैसले ने यह संदेश भी दिया है कि किसी भी व्यक्ति पर लगातार मानसिक दबाव या अनावश्यक सामाजिक एवं वैवाहिक दबाव बनाना गंभीर कानूनी परिणामों का कारण बन सकता है।

अग्नि सुरक्षा को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट सख्त, सरकार से मांगी नई स्थिति रिपोर्ट

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बिलासपुर- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य में अग्निशमन एवं आपातकालीन सेवाओं की व्यवस्था को लेकर गंभीर रुख अपनाते हुए राज्य सरकार से अग्नि सुरक्षा संबंधी तैयारियों और आधुनिकीकरण कार्यों पर नई स्थिति रिपोर्ट (Status Report) प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि अग्निशमन सेवाओं को आधुनिक बनाने के लिए 280 करोड़ रुपये से अधिक की व्यापक कार्ययोजना तैयार की गई है। इस योजना के तहत राज्यभर में नए फायर स्टेशन स्थापित किए जाएंगे, मौजूदा फायर स्टेशनों को सुदृढ़ किया जाएगा तथा अत्याधुनिक अग्निशमन वाहन, बचाव उपकरण और अन्य आधुनिक संसाधन उपलब्ध कराए जाएंगे।

सरकार ने यह भी जानकारी दी कि अग्निशमन विभाग की क्षमता बढ़ाने के लिए आधुनिक तकनीक, बेहतर प्रशिक्षण और आवश्यक बुनियादी ढांचे के विकास पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, ताकि किसी भी आपात स्थिति में त्वरित और प्रभावी राहत एवं बचाव कार्य सुनिश्चित किया जा सके।

हाईकोर्ट ने सरकार से इन योजनाओं की प्रगति, समय-सीमा और क्रियान्वयन की विस्तृत जानकारी अगली सुनवाई में प्रस्तुत करने को कहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि नागरिकों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और अग्निशमन सेवाओं को मजबूत बनाने के लिए ठोस एवं प्रभावी कदम उठाए जाने आवश्यक हैं।

राज्य सरकार की इस पहल से आने वाले समय में छत्तीसगढ़ की फायर सेफ्टी और आपदा प्रबंधन प्रणाली को अधिक आधुनिक, सक्षम और प्रभावी बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।

जेलों में बढ़ती मौतों पर हाईकोर्ट सख्त, प्रशासन से मांगा जवाब

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रायपुर- छत्तीसगढ़ में जेलों के भीतर हो रही मौतों को लेकर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। एक वर्ष के भीतर राज्य की विभिन्न जेलों में 33 कैदियों की मौत होने के मामले को गंभीरता से लेते हुए अदालत ने चिंता जताई है।

सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि कई मामलों में अब तक पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार नहीं हुई है या लंबित पड़ी है, जिससे मौत के कारणों पर सवाल उठ रहे हैं। कोर्ट ने इसे बेहद गंभीर लापरवाही मानते हुए संबंधित अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर नाराजगी व्यक्त की।

हाईकोर्ट ने जेल विभाग के महानिदेशक (DG) और अन्य जिम्मेदार अधिकारियों को नोटिस जारी कर विस्तृत जवाब तलब किया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कैदियों की सुरक्षा और स्वास्थ्य की जिम्मेदारी पूरी तरह से प्रशासन की है, और इसमें किसी भी तरह की लापरवाही स्वीकार नहीं की जाएगी।

कोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि सभी लंबित पोस्टमार्टम रिपोर्ट को जल्द से जल्द पूरा किया जाए और प्रत्येक मौत की विस्तृत जांच रिपोर्ट पेश की जाए। साथ ही, भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने के निर्देश भी दिए गए हैं।

इस मामले की अगली सुनवाई में कोर्ट प्रशासन द्वारा उठाए गए कदमों और रिपोर्ट की समीक्षा करेगा।

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