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रेलवे के 14 AC कोच कर्मचारियों को हाईकोर्ट से बड़ी राहत, अतिरिक्त कार्य भत्ता देने का आदेश बरकरार

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बिलासपुर- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे (SECR) के 14 AC कोच कर्मचारियों को अतिरिक्त कार्य के लिए भत्ता दिए जाने के मामले में कर्मचारियों के पक्ष में फैसला बरकरार रखा है। अदालत ने रेलवे प्रशासन की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए पूर्व में दिए गए आदेश को कायम रखा।

मामला AC कोचों में कार्यरत कर्मचारियों को उनके नियमित दायित्वों के अतिरिक्त किए जाने वाले कार्य के लिए अतिरिक्त कार्य भत्ता (Additional Duty Allowance) दिए जाने से जुड़ा था। कर्मचारियों की ओर से इस भत्ते का दावा किया गया था, जिसके बाद मामला न्यायालय तक पहुंचा।

रेलवे प्रशासन ने दी थी चुनौती

रेलवे प्रशासन ने कर्मचारियों को अतिरिक्त कार्य भत्ता देने संबंधी पूर्व आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। रेलवे की ओर से आदेश पर पुनर्विचार की मांग की गई थी।

मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने रेलवे की याचिका को स्वीकार नहीं किया और कर्मचारियों को अतिरिक्त कार्य भत्ता देने संबंधी पूर्व आदेश को बरकरार रखा। इससे संबंधित 14 कर्मचारियों को राहत मिली है।

14 कर्मचारियों को मिलेगा लाभ

हाईकोर्ट के इस निर्णय का सीधा लाभ दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के संबंधित 14 AC कोच कर्मचारियों को मिलेगा। अदालत के आदेश के बाद कर्मचारियों के अतिरिक्त कार्य के एवज में देय भत्ते को लेकर उनकी स्थिति स्पष्ट हुई है।

रेलवे कर्मचारियों के लिए यह फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यह मामला नियमित ड्यूटी के अतिरिक्त जिम्मेदारियां निभाने वाले कर्मचारियों को मिलने वाले भत्ते से संबंधित है।

रेलवे की याचिका खारिज

हाईकोर्ट ने मामले में रेलवे प्रशासन की याचिका को खारिज करते हुए पूर्व आदेश को प्रभावी रखा। इस फैसले के बाद संबंधित कर्मचारियों को अतिरिक्त कार्य भत्ता मिलने का रास्ता साफ हो गया है।

हाईकोर्ट के इस आदेश से दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के 14 कर्मचारियों को राहत मिली है।

धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2026 को हाईकोर्ट में चुनौती, राज्य सरकार से 3 सप्ताह में जवाब तलब

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बिलासपुर- छत्तीसगढ़ में लागू छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2026 और धर्म स्वतंत्रता नियम 2026 की संवैधानिक वैधता को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की युगल पीठ ने राज्य सरकार को अंतरिम आवेदन पर अपना जवाब प्रस्तुत करने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया है।

यह याचिका वी.एन. प्रसाद राव एवं अन्य की ओर से दायर की गई है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अपना पक्ष रखा। याचिकाकर्ताओं ने नए कानून के कुछ प्रावधानों की संवैधानिकता पर सवाल उठाते हुए उन्हें मौलिक अधिकारों के अनुरूप नहीं होने का दावा किया है।

धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया को लेकर उठाए सवाल

याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में तर्क दिया गया कि कानून के तहत धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया में कई प्रशासनिक औपचारिकताएं और अनुमतियां निर्धारित की गई हैं। याचिका में दावा किया गया है कि स्वैच्छिक धर्म परिवर्तन के मामले में भी संबंधित व्यक्ति को निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा और इसकी जानकारी सार्वजनिक करने सहित कई औपचारिकताएं पूरी करनी होंगी।

याचिकाकर्ता पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि धर्म परिवर्तन कराने वाले व्यक्ति के लिए पंजीकरण जैसी व्यवस्थाएं अनिवार्य की गई हैं। उनके अनुसार, कानून के कुछ प्रावधान अंतःकरण की स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता, निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक अधिकारों को प्रभावित कर सकते हैं।

कड़े दंडात्मक प्रावधानों पर भी आपत्ति

याचिका में कानून के दंडात्मक प्रावधानों को लेकर भी आपत्ति जताई गई है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, कुछ परिस्थितियों में धर्म परिवर्तन से जुड़े मामलों में कठोर सजा और आर्थिक दंड का प्रावधान किया गया है। हालांकि, इन प्रावधानों को लेकर याचिकाकर्ताओं की दलीलें अभी अदालत के समक्ष विचाराधीन हैं।

अब सरकार के जवाब पर होगी आगे की सुनवाई

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को अंतरिम आवेदन पर अपना पक्ष रखने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया है। अब सरकार के जवाब के बाद अदालत मामले में आगे की सुनवाई करेगी।

फिलहाल हाईकोर्ट ने कानून की संवैधानिक वैधता पर अंतिम निर्णय नहीं दिया है। मामला न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है और आगे की दिशा सरकार के जवाब तथा अदालत में होने वाली आगामी सुनवाई के बाद स्पष्ट होगी।

जनपद पंचायत कर्मचारी शासकीय सेवक नहीं, सरकारी पेंशन का वैधानिक अधिकार भी नहीं: हाईकोर्ट

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बिलासपुर- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जनपद पंचायतों से सेवानिवृत्त कर्मचारियों की पेंशन से जुड़ी याचिकाओं पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जनपद पंचायत के कर्मचारी राज्य सरकार के शासकीय सेवक नहीं हैं और मौजूदा नियमों के तहत उन्हें सरकारी कर्मचारियों के समान पेंशन पाने का स्वतः कोई वैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है। 

जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की एकलपीठ ने सेवानिवृत्त जनपद पंचायत कर्मचारियों की ओर से दायर 21 से अधिक संबंधित याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता पेंशन पाने के लिए ऐसा कोई वैधानिक प्रावधान नहीं दिखा सके, जिसके आधार पर उन्हें राज्य के नियमित कर्मचारियों के समान पेंशन का लाभ दिया जा सके। 

लंबे समय तक सेवा के बाद पेंशन की मांग

मामले में विभिन्न जिलों के जनपद पंचायतों से सेवानिवृत्त कर्मचारियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उन्होंने लंबे समय तक जनपद पंचायतों में सेवा की है और सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें पेंशन का लाभ मिलना चाहिए।

उन्होंने संबंधित अधिकारियों द्वारा उनकी पेंशन संबंधी मांग को खारिज किए जाने के आदेश को चुनौती दी और सरकारी कर्मचारियों की तरह मासिक पेंशन दिए जाने की मांग की थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी दलील दी गई कि कुछ अन्य जनपद पंचायतों के कर्मचारियों को पेंशन का भुगतान किया जा रहा है, इसलिए उन्हें भी समान लाभ मिलना चाहिए। 

हाईकोर्ट ने कहा—पंचायत संस्थाएं स्वायत्त निकाय

अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान जनपद पंचायतों की कानूनी स्थिति और उनके कर्मचारियों की सेवा शर्तों पर विचार किया। कोर्ट ने कहा कि पंचायत संस्थाएं स्वायत्त निकाय हैं और उनके कर्मचारियों की सेवा शर्तें अलग नियमों से निर्धारित होती हैं।

अदालत के अनुसार, केवल इसलिए कि पंचायत कर्मचारी सार्वजनिक कार्य करते हैं, उन्हें राज्य सरकार का कर्मचारी या शासकीय सेवक नहीं माना जा सकता। उनके वेतन और सेवा संबंधी मामलों का संचालन पंचायतों पर लागू अलग नियमों के तहत होता है। 

पेंशन के लिए स्पष्ट वैधानिक प्रावधान जरूरी

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पेंशन का लाभ तभी कानूनी अधिकार के रूप में दावा किया जा सकता है, जब उसके लिए संबंधित सेवा नियमों या कानून में प्रावधान मौजूद हो। अदालत ने माना कि जनपद पंचायत कर्मचारियों के मामले में ऐसा कोई वैधानिक पेंशन प्रावधान याचिकाकर्ता स्थापित नहीं कर सके।

राज्य की ओर से अदालत में यह भी बताया गया कि संबंधित कर्मचारियों की सेवा शर्तों में प्रोविडेंट फंड से जुड़े प्रावधान लागू थे और वे राज्य की नियमित सिविल सेवा के कर्मचारियों पर लागू छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1976 के दायरे में नहीं आते। 

दूसरे पंचायत कर्मचारियों को पेंशन मिलने की दलील भी नहीं मानी

याचिकाकर्ताओं ने यह दलील भी दी थी कि कुछ अन्य जनपद पंचायतों के सेवानिवृत्त कर्मचारियों को पेंशन का भुगतान किया जा रहा है, इसलिए उन्हें भी समानता के आधार पर पेंशन मिलनी चाहिए।

इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी अन्य स्थान पर नियमों के विपरीत या विवादित तरीके से कोई लाभ दिया गया है, तो वह दूसरे कर्मचारियों के लिए स्वतः कानूनी अधिकार पैदा नहीं करता। यानी किसी गलत या विवादित भुगतान को आधार बनाकर समान लाभ की मांग नहीं की जा सकती। 

कुछ जनपद पंचायतों में पेंशन भुगतान की जांच

मामले में यह तथ्य भी सामने आया कि कुछ जनपद पंचायतों में सेवानिवृत्त कर्मचारियों को स्थानीय स्तर पर गठित निधि या निर्णयों के आधार पर पेंशन का भुगतान किया जा रहा था। राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि इन भुगतानों की वैधानिकता की जांच के लिए संबंधित अधिकारियों को 27 अगस्त और 31 अगस्त 2026 को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए थे। 

कोर्ट ने याचिकाएं की खारिज

सभी पक्षों की दलीलों और संबंधित नियमों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता पेंशन प्राप्त करने का कोई स्पष्ट वैधानिक अधिकार स्थापित नहीं कर पाए हैं। इसके आधार पर अदालत ने पेंशन की मांग वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया।

इस फैसले से यह स्पष्ट हुआ है कि जनपद पंचायतों में सेवा करने मात्र से कर्मचारी राज्य सरकार के नियमित शासकीय सेवक नहीं बन जाते और उन्हें सरकारी कर्मचारियों के लिए लागू पेंशन व्यवस्था का लाभ स्वतः नहीं मिल सकता। 

मामला: Urmila Panigrahi बनाम State of Chhattisgarh एवं अन्य तथा संबंधित याचिकाएं
याचिका: WPS No. 11820/2025 एवं अन्य संबंधित मामले
पीठ: जस्टिस बिभु दत्ता गुरु
फैसला: 5 अक्टूबर 2026


नर्सिंग होम सील करने के मामले में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, नगर निगम आयुक्त की कार्रवाई रद्द

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मामला Dr. Shyama Agrawal v. State of Chhattisgarh, WPC No. 5701/2022 है। 

दुर्ग- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने नर्सिंग होम को सील करने के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि नगर निगम आयुक्त के पास नर्सिंग होम को सील करने की वैधानिक शक्ति नहीं है। कोर्ट ने दुर्ग नगर निगम द्वारा जारी नोटिस और उसके आधार पर की गई सीलिंग की कार्रवाई को रद्द कर दिया है।

यह मामला दुर्ग स्थित अग्रवाल नर्सिंग होम से संबंधित है। नर्सिंग होम की संचालक डॉ. श्यामा अग्रवाल ने नगर निगम आयुक्त द्वारा जारी नोटिस और नर्सिंग होम को सील किए जाने की कार्रवाई को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। मामले की सुनवाई जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने की। 

15 दिसंबर 2022 को जारी हुआ था नोटिस

मामले के अनुसार, 15 दिसंबर 2022 को दुर्ग नगर निगम के आयुक्त की ओर से नर्सिंग होम को नोटिस जारी किया गया था। इसके बाद नर्सिंग होम को सील कर दिया गया। नगर निगम की कार्रवाई के पीछे कथित अनियमितताओं, नर्सिंग होम अधिनियम के प्रावधानों के पालन में कमी तथा बायो-मेडिकल वेस्ट के प्रबंधन और निस्तारण से जुड़े नियमों के उल्लंघन का हवाला दिया गया था। 

नर्सिंग होम संचालक की ओर से हाईकोर्ट में दलील दी गई कि नगर निगम आयुक्त को नर्सिंग होम का लाइसेंस जारी करने, उसका नियमन करने, लाइसेंस निलंबित या रद्द करने अथवा नर्सिंग होम को सील करने का अधिकार ही नहीं है। इसलिए नगर निगम की कार्रवाई को अधिकार क्षेत्र से बाहर बताया गया। 

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने छत्तीसगढ़ राज्य उपचारगृह तथा रोगोपचार संबंधी स्थापनाएं अनुज्ञापन अधिनियम, 2010 और उससे जुड़े नियमों का परीक्षण किया। कोर्ट ने कहा कि नर्सिंग होम के लाइसेंस को निलंबित या रद्द करने की कार्रवाई के लिए कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है।

अदालत के अनुसार, संबंधित कानून की धारा 9 के तहत कार्रवाई करने से पहले सक्षम प्राधिकारी को प्रस्तावित कार्रवाई के आधार और कारण बताते हुए 30 दिन का नोटिस देना होता है। संबंधित पक्ष को अपना पक्ष रखने और सुनवाई का अवसर भी दिया जाना जरूरी है। इसके बाद ही सक्षम प्राधिकारी कारणों सहित आदेश पारित कर सकता है। 

नगर निगम आयुक्त के पास नहीं थी वैधानिक शक्ति

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संबंधित कानून और नियमों में नगर निगम या उसके आयुक्त को नर्सिंग होम का लाइसेंस जारी करने, उसका नियमन करने अथवा लाइसेंस रद्द करने की शक्ति नहीं दी गई है। इसी तरह नर्सिंग होम को सील करने की भी नगर निगम आयुक्त को वैधानिक शक्ति प्राप्त नहीं है।

अदालत ने यह भी नोट किया कि नर्सिंग होम कानून के तहत जिला कलेक्टर को सक्षम पर्यवेक्षण प्राधिकारी माना गया है। सुनवाई के दौरान नगर निगम की ओर से भी यह स्वीकार किया गया था कि संबंधित कानून के तहत जिला कलेक्टर सक्षम प्राधिकारी हैं।

आरोप सही पाए जाने पर भी नियमानुसार कार्रवाई जरूरी

हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि नर्सिंग होम को बायो-मेडिकल वेस्ट प्रबंधन और अन्य वैधानिक लाइसेंस संबंधी नियमों का पालन करना होगा। यदि किसी तरह का उल्लंघन पाया जाता है तो सक्षम प्राधिकारी कानून में निर्धारित प्रक्रिया के तहत कार्रवाई कर सकता है।

यानी अदालत ने नर्सिंग होम को नियमों से छूट नहीं दी है, बल्कि यह कहा है कि कार्रवाई वही अधिकारी कर सकता है जिसे कानून ने उसका अधिकार दिया है और उसे निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा। 

हाईकोर्ट ने नोटिस और सीलिंग की कार्रवाई की रद्द

सभी पक्षों की दलीलें और संबंधित कानूनी प्रावधानों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने 15 दिसंबर 2022 के नोटिस को निरस्त कर दिया। इसके साथ ही उस नोटिस के आधार पर नर्सिंग होम को सील करने की कार्रवाई भी रद्द कर दी गई।

मामले में अदालत ने यह स्वतंत्रता भी बरकरार रखी कि यदि नर्सिंग होम की ओर से किसी वैधानिक प्रावधान या बायो-मेडिकल वेस्ट प्रबंधन संबंधी नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, तो सक्षम प्राधिकारी कानून के अनुसार उचित कार्रवाई कर सकता है। 

मामला: Dr. Shyama Agrawal vs. State of Chhattisgarh & Others
याचिका: WPC No. 5701 of 2022
निर्णय: 22 सितंबर 2026
पीठ: जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट। 


नदियों के प्राकृतिक प्रवाह और संरक्षण को लेकर हाईकोर्ट में PIL, अरपा समेत कई नदियों पर फोकस

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छत्तीसगढ़- प्रदेश की प्रमुख नदियों के प्राकृतिक प्रवाह, उद्गम स्थलों के संरक्षण और पुनर्जीवन को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में जनहित याचिका (PIL) के जरिए मामला सामने आया है।

अरपा नदी समेत कई नदियां शामिल
मामले में अरपा, महानदी, शिवनाथ, हसदेव, तांदुला, पैरी, मांद, केलो, सोन और टिपान जैसी प्रमुख नदियों के उद्गम एवं संरक्षण पर ध्यान दिया जा रहा है। हाईकोर्ट की निगरानी के बाद राज्य सरकार ने नदियों के उद्गम स्थलों की पहचान, मैपिंग और संरक्षण के लिए राज्य स्तरीय समिति भी गठित की है। 

प्राकृतिक प्रवाह बचाने पर जोर
नदियों के संरक्षण के तहत उद्गम स्थलों की सुरक्षा, अतिक्रमण की स्थिति की जांच, जल प्रवाह और जल गुणवत्ता की निगरानी, कैचमेंट एरिया ट्रीटमेंट तथा वैज्ञानिक तरीके से नदी पुनर्जीवन योजनाओं पर काम किया जा रहा है। 

विशेषज्ञों की भी होगी भूमिका
हाईकोर्ट ने नदी संरक्षण की निगरानी को प्रभावी बनाने के लिए पर्यावरण, भू-विज्ञान, जल विज्ञान और भूजल जैसे क्षेत्रों के विशेषज्ञों को समिति में शामिल करने पर जोर दिया है।

अरपा नदी को लेकर भी विशेष निगरानी
अरपा नदी के उद्गम क्षेत्र के संरक्षण और नदी के आसपास अतिक्रमण से जुड़े मुद्दों पर भी हाईकोर्ट के समक्ष कार्रवाई की स्थिति रखी गई है। जुलाई 2026 के आदेश में कोर्ट ने अरपा सहित प्रमुख नदियों के लिए तैयार की जा रही River Revival Plans और संरक्षण कार्यों की प्रगति पर भी ध्यान दिया। 

उद्देश्य: नदियों के प्राकृतिक स्वरूप और जल प्रवाह को बनाए रखना, प्रदूषण एवं अतिक्रमण पर नियंत्रण करना और आने वाली पीढ़ियों के लिए जलस्रोतों का संरक्षण सुनिश्चित करना।


छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का अहम फैसला: मामूली विभागीय सजा पर निलंबन अवधि का पूरा वेतन देने का आदेश

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बिलासपुर- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि किसी कर्मचारी को विभागीय जांच के बाद केवल मामूली विभागीय सजा दी जाती है और उसे सेवा में बहाल कर दिया जाता है, तो निलंबन की अवधि के लिए उसके पूरे वेतन का भुगतान किया जाना चाहिए।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निलंबन अपने आप में कोई सजा नहीं है, बल्कि विभागीय जांच पूरी होने तक की एक अस्थायी प्रशासनिक कार्रवाई है। ऐसे में यदि जांच के बाद कर्मचारी के खिलाफ केवल मामूली दंड लगाया गया है, तो निलंबन अवधि के वेतन को रोकना उचित नहीं माना जा सकता।

रायपुर में पदस्थ महिला ASI से जुड़ा था मामला

यह मामला रायपुर में पदस्थ एक महिला सहायक उपनिरीक्षक (ASI) से संबंधित था। विभागीय कार्रवाई के चलते उन्हें कुछ समय के लिए निलंबित किया गया था। बाद में विभागीय जांच पूरी होने के बाद उन्हें सेवा में वापस बहाल कर दिया गया और उनके खिलाफ केवल मामूली विभागीय दंड लगाया गया।

मामले में निलंबन अवधि के दौरान रोके गए वेतन को लेकर विवाद सामने आया। इसी मुद्दे पर न्यायालय के समक्ष मामला पहुंचा, जहां कोर्ट ने कर्मचारी के निलंबन और बाद में दी गई विभागीय सजा के बीच के संबंध को देखते हुए वेतन भुगतान के अधिकार पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की।

कोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट के फैसले का मुख्य आधार यह है कि निलंबन को अंतिम दंड नहीं माना जा सकता। यदि विभागीय जांच का परिणाम गंभीर सजा के रूप में सामने नहीं आता और कर्मचारी को मामूली दंड के साथ सेवा में बहाल कर दिया जाता है, तो निलंबन की पूरी अवधि के वेतन को रोकने का पर्याप्त आधार नहीं बनता। ऐसे मामले में कर्मचारी को 100 प्रतिशत वेतन दिए जाने का अधिकार है।

इस फैसले को सरकारी कर्मचारियों से जुड़े सेवा मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यह निलंबन अवधि के दौरान वेतन और विभागीय कार्रवाई के बीच संबंध को स्पष्ट करता है।

नोट: यह रिपोर्ट उपलब्ध प्रकाशित न्यायिक समाचार के आधार पर तैयार की गई है; किसी मामले में अंतिम कानूनी प्रभाव संबंधित आदेश/निर्णय के मूल पाठ पर निर्भर करता है।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: बर्खास्त कर्मचारी को देनी होगी विभागीय जांच की पूरी जानकारी

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RTI के तहत अपनी ही विभागीय जांच से जुड़े दस्तावेज मांगना कर्मचारी का अधिकार, सूचना रोकने की दलील को कोर्ट ने किया खारिज

बिलासपुर- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सूचना के अधिकार (RTI) को लेकर एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी कर्मचारी को उसके खिलाफ हुई विभागीय जांच और बर्खास्तगी का आधार बने दस्तावेज उपलब्ध कराए जा सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि जब कर्मचारी अपनी ही विभागीय जांच से संबंधित रिकॉर्ड अपने बचाव के लिए मांग रहा हो और उसमें किसी तीसरे व्यक्ति की निजता का सवाल न हो, तो केवल RTI की छूट का हवाला देकर सूचना रोकी नहीं जा सकती।

क्या है पूरा मामला?

मामला जांजगीर स्थित फैमिली कोर्ट में चालक के पद पर कार्यरत एक कर्मचारी से जुड़ा है। कर्मचारी के खिलाफ कथित कदाचार के आरोपों को लेकर दो विभागीय जांच शुरू की गई थीं। जांच में उसके खिलाफ सात आरोप लगाए गए और बाद में विभागीय कार्रवाई के तहत उसकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं।

बर्खास्तगी के बाद कर्मचारी ने अपने खिलाफ हुई विभागीय जांच से जुड़े दस्तावेज और रिकॉर्ड RTI के माध्यम से मांगे। हालांकि, संबंधित अधिकारियों की ओर से सूचना देने से इनकार किया गया और RTI कानून में मौजूद कुछ अपवादों का हवाला दिया गया।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने अधिकारियों की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने माना कि कर्मचारी जिस सूचना की मांग कर रहा है, वह उसकी अपनी विभागीय जांच से संबंधित है और उसके बचाव के लिए उपयोगी हो सकती है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि मांगी गई जानकारी में किसी तीसरे पक्ष की निजता प्रभावित नहीं होती है, तो केवल RTI Act की धारा 8(1)(c) या 8(1)(j) का हवाला देकर ऐसी सूचना से इनकार नहीं किया जा सकता।

फैमिली कोर्ट को दस्तावेज उपलब्ध कराने का निर्देश

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जांजगीर-चांपा फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया कि पूर्व कर्मचारी को उसकी विभागीय जांच से संबंधित मांगे गए दस्तावेज उपलब्ध कराए जाएं। यह आदेश 31 अगस्त 2026 को पारित किया गया था।

क्यों अहम है यह फैसला?

यह फैसला सरकारी और सार्वजनिक संस्थानों में पारदर्शिता और जवाबदेही के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विभागीय जांच का सामना करने वाले कर्मचारी के लिए संबंधित दस्तावेज उसके बचाव का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकते हैं। हाईकोर्ट के इस फैसले से यह संदेश गया है कि RTI कानून की छूट का इस्तेमाल कर्मचारी को उसकी अपनी विभागीय कार्रवाई से जुड़े रिकॉर्ड से वंचित करने के लिए नहीं किया जा सकता, जब तक कोई वैध गोपनीयता या अन्य कानूनी अपवाद लागू न हो।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: निजी शरिया कोर्ट कानूनी तलाक नहीं दे सकती

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रायपुर- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने निजी शरिया अदालतों और धार्मिक संस्थाओं के अधिकार को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कोई भी निजी धार्मिक संस्था या खुद को शरिया कोर्ट बताने वाला संगठन कानून द्वारा स्थापित अदालत का दर्जा नहीं रखता। ऐसी संस्था धार्मिक राय या फतवा दे सकती है, लेकिन वह किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति को कानूनी रूप से बदलने या विवाह-विच्छेद का बाध्यकारी आदेश जारी करने का अधिकार नहीं रखती।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला रायपुर की एक मुस्लिम महिला नीरोश अब्बासी से जुड़ा है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, उनके पहले पति की वर्ष 2015 में मृत्यु हो गई थी। इसके बाद उन्होंने वर्ष 2020 में मोहम्मद आबिद खान से विवाह किया।

बाद में पति-पत्नी के बीच विवाद उत्पन्न हुआ। विवाद का एक कारण बच्चों के नए पारिवारिक माहौल में समायोजन को लेकर भी बताया गया है। मामला बढ़ने के बाद महिला ने अपने पति और ससुराल पक्ष पर उत्पीड़न, क्रूरता और दुर्व्यवहार के आरोप लगाए। दोनों पक्षों के बीच समझौते और काउंसलिंग की कोशिश भी हुई, लेकिन विवाद का समाधान नहीं हो सका।

शरिया संस्था ने क्या आदेश दिया था?

विवाद के बीच रायपुर की एक निजी शरिया संस्था ने 18 जनवरी 2022 को एक आदेश जारी किया था। इस आदेश में महिला को उसके पति से तलाकशुदा घोषित किया गया था।

महिला ने इस आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनका मुख्य सवाल यह था कि क्या किसी निजी धार्मिक संस्था के पास किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति को कानूनी रूप से बदलने का अधिकार हो सकता है?

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए निजी शरिया संस्था के उस आदेश को कानूनी अधिकार से बाहर और प्रभावहीन घोषित कर दिया।

कोर्ट ने साफ किया कि Darul Qaza जैसी निजी धार्मिक संस्थाएं संवैधानिक या कानून द्वारा स्थापित अदालत नहीं हैं। वे धार्मिक दृष्टिकोण या राय व्यक्त कर सकती हैं, लेकिन उनके आदेश किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकार, वैवाहिक स्थिति या कानूनी दायित्व को बाध्यकारी रूप से बदल नहीं सकते।

यानी आसान शब्दों में कहें तो—

धार्मिक राय अलग चीज है और कानूनी फैसला अलग।

किसी धार्मिक संस्था द्वारा यह कह देना कि किसी व्यक्ति का विवाह समाप्त हो गया है, अपने आप में ऐसा कानूनी आदेश नहीं बन जाता जिसे राज्य की न्याय व्यवस्था बाध्यकारी माने।

कोर्ट ने किन बातों पर जोर दिया?

हाईकोर्ट का फैसला मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित था कि किस संस्था के पास कानूनी रूप से वैवाहिक अधिकारों पर फैसला करने का अधिकार है।

कोर्ट ने माना कि:

  • निजी शरिया संस्था कानून द्वारा स्थापित न्यायालय नहीं है।

  • ऐसी संस्था धार्मिक राय या फतवा दे सकती है।

  • वह किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति का बाध्यकारी न्यायिक निर्धारण नहीं कर सकती।

  • वह अपने आदेश से किसी व्यक्ति का कानूनी विवाह समाप्त नहीं कर सकती।

  • वैवाहिक अधिकारों और कानूनी स्थिति का निर्धारण सक्षम न्यायिक/कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से ही होगा।

क्या हाईकोर्ट ने 'Talaq-e-Hasan' को गलत या असंवैधानिक घोषित कर दिया?

नहीं। यह बात समझना बहुत जरूरी है।

हाईकोर्ट ने इस मामले में Talaq-e-Hasan की संवैधानिक वैधता पर अंतिम फैसला नहीं दिया। अदालत ने इस मुद्दे को खुला रखा और कहा कि संबंधित पक्ष कानून के अनुसार सक्षम मंच पर अपना मामला उठा सकते हैं।

इसलिए इस फैसले का सीधा मतलब यह नहीं है कि कोर्ट ने मुस्लिम तलाक की किसी विशेष धार्मिक प्रक्रिया को पूरी तरह असंवैधानिक घोषित कर दिया है।

फैसले का मुख्य मुद्दा था—क्या निजी शरिया संस्था स्वयं एक कानूनी अदालत की तरह विवाह समाप्त करने का बाध्यकारी आदेश दे सकती है?

इसका जवाब हाईकोर्ट ने नहीं में दिया।

महिला के मामले पर इसका क्या असर होगा?

हाईकोर्ट द्वारा शरिया संस्था के आदेश को कानूनी अधिकार से बाहर बताए जाने का मतलब है कि उस निजी संस्था के आदेश के आधार पर महिला की वैवाहिक स्थिति को कानूनी रूप से समाप्त नहीं माना जा सकता।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका फैसला महिला के उपलब्ध अन्य कानूनी या वैधानिक उपायों को प्रभावित नहीं करेगा। मामले से जुड़े आपराधिक proceedings पर भी इस निर्णय का प्रतिकूल प्रभाव नहीं माना गया है।

इस फैसले का महत्व क्यों है?

यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें धार्मिक संस्थाओं और राज्य की न्यायिक व्यवस्था के अधिकार क्षेत्र की सीमा को स्पष्ट किया गया है।

भारत में अलग-अलग धार्मिक समुदायों में व्यक्तिगत कानून और धार्मिक परंपराओं का महत्व है। लेकिन जब किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकार, वैवाहिक स्थिति या अन्य नागरिक अधिकारों पर बाध्यकारी फैसला देने की बात आती है, तो सवाल यह होता है कि उस फैसले को कानूनी मान्यता देने का अधिकार किस संस्था के पास है।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इस मामले में स्पष्ट किया कि निजी धार्मिक संस्था का आदेश अपने आप में न्यायालय के आदेश के बराबर नहीं हो सकता।

आसान भाषा में समझें

मान लीजिए किसी निजी धार्मिक संस्था ने किसी दंपति के बारे में कहा कि उनका विवाह खत्म हो गया है।

हाईकोर्ट के इस फैसले के अनुसार, सिर्फ उस संस्था के कहने से सरकारी रिकॉर्ड और कानूनी व्यवस्था में विवाह समाप्त नहीं माना जा सकता।

धार्मिक राय = धार्मिक/सामुदायिक महत्व हो सकता है।

न्यायालय का कानूनी आदेश = राज्य की न्याय व्यवस्था में बाध्यकारी कानूनी प्रभाव।

यही इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।

निष्कर्ष

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रायपुर से जुड़े इस मामले में निजी शरिया संस्था द्वारा जारी तलाक संबंधी आदेश को कानूनी अधिकार के बिना जारी किया गया आदेश माना है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी संस्थाएं धार्मिक राय दे सकती हैं, लेकिन किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति को कानूनी रूप से बदलने या विवाह-विच्छेद का बाध्यकारी आदेश देने का अधिकार उनके पास नहीं है।

हालांकि, अदालत ने Talaq-e-Hasan की संवैधानिक वैधता पर कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया है। इसलिए इस फैसले को निजी शरिया संस्था के कानूनी अधिकार के सवाल तक सीमित समझना अधिक सही होगा।

राज्यपाल डेका ने न्यायाधिपति कृष्न राम महापात्र को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पद की दिलाई शपथ

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रायपुर- राज्यपाल रमेन डेका ने न्यायाधिपति कृष्न राम महापात्र  (Krushna Ram Mohapatra) को आज लोकभवन के छत्तीसगढ़ मण्डपम् में उच्च न्यायालय, छत्तीसगढ़ के मुख्य न्यायाधीश पद की शपथ दिलाई। इसके पूर्व कृष्न राम महापात्र उड़ीसा हाईकोर्ट के वरिष्ठ जज के पद पर कार्यरत थे। राज्यपाल डेका ने मुख्य न्यायाधीश कृष्न राम महापात्र को राष्ट्रपति द्वारा जारी मूल वारंट की प्रति सौंपी। राज्यपाल ने मुख्य न्यायाधीश महापात्र को बधाई एवं शुभकामनाएं दीं। 

इस अवसर पर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा, स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव, स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल, केन्द्रीय कृषि राज्य मंत्री तोखन साहू, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, पूर्व राज्यपाल रमेश बैस, राज्य सभा सांसद लक्ष्मी वर्मा, विधायक सुनील सोनी, अनुज शर्मा एवं अन्य जनप्रतिनिधि भी उपस्थित थे।

समारोह में मुख्य न्यायाधीश महापात्र की धर्मपत्नी अनिता महापात्र सहित छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के न्यायाधीशगण उपस्थित थे। शपथ ग्रहण समारोह का संचालन प्रदेश के मुख्य सचिव विकास शील द्वारा किया गया तथा उन्होंने राष्ट्रपति द्वारा जारी वारंट का वाचन किया। इस अवसर पर अपर मुख्य सचिव सुब्रत साहू, प्रमुख सचिव गृह विभाग निहारिका बारिक, पुलिस महानिदेशक अरूण देव गौतम, राज्यपाल के सचिव डॉ. सी.आर. प्रसन्ना, महाधिवक्ता विवेक शर्मा, उच्च न्यायालय बिलासपुर के रजिस्ट्रार जनरल रजनीश श्रीवास्तव सहित राज्य शासन के वरिष्ठ अधिकारीगण एवं हाईकोर्ट के अधिवक्तागण उपस्थित थे। 

उल्लेखनीय है कि कृष्न राम महापात्र छत्तीसगढ़ के 16 वें मुख्य न्यायाधीश होंगे।


देशभर में 8 नए हाईकोर्ट चीफ जस्टिस की नियुक्ति, केंद्र सरकार ने जारी की अधिसूचना

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नई दिल्ली- केंद्र सरकार ने देश के विभिन्न हाईकोर्ट में 8 नए मुख्य न्यायाधीशों (Chief Justices) की नियुक्ति को लेकर 5 सितंबर को आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी। इन नियुक्तियों के साथ देश की न्यायपालिका के कई प्रमुख हाईकोर्ट में नेतृत्व स्तर पर महत्वपूर्ण बदलाव होने जा रहा है।

केंद्र सरकार की अधिसूचना के बाद संबंधित हाईकोर्ट में नए मुख्य न्यायाधीशों के कार्यभार संभालने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। इन नियुक्तियों को न्यायिक प्रशासन के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

नए मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के साथ संबंधित हाईकोर्ट में न्यायिक कार्यों के संचालन और प्रशासनिक जिम्मेदारियों को नई दिशा मिलने की उम्मीद है।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट को मिलेगा नया मुख्य न्यायाधीश

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सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जस्टिस कृष्ण राम महापात्रा के नाम की सिफारिश की है।

ओडिशा हाईकोर्ट में कार्यरत जस्टिस कृष्ण राम महापात्रा को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का अगला मुख्य न्यायाधीश बनाए जाने की सिफारिश की गई है। यह सिफारिश सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की 6 अगस्त 2026 को हुई बैठक में की गई।

जस्टिस के.आर. मोहपात्रा

वर्तमान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रमेश सिन्हा 4 सितंबर 2026 को सेवानिवृत्त होने वाले हैं। उनके सेवानिवृत्त होने के बाद निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने पर जस्टिस महापात्रा छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की कमान संभाल सकते हैं।

🔹 वर्तमान पद: न्यायाधीश, ओडिशा हाईकोर्ट
🔹 हाईकोर्ट जज के रूप में नियुक्ति: 17 अप्रैल 2015
🔹 प्रस्तावित पद: मुख्य न्यायाधीश, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
🔹 नियुक्ति की स्थिति: फिलहाल कॉलेजियम की सिफारिश; औपचारिक नियुक्ति के लिए आगे की प्रक्रिया बाकी है।

जस्टिस कृष्ण राम महापात्रा के अनुभव को देखते हुए उनकी प्रस्तावित नियुक्ति को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के लिए महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है।

बिलासपुर में बाढ़ और बिजली व्यवस्था पर हाईकोर्ट सख्त, CSPDCL और नगर निगम से मांगा नया शपथपत्र

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बिलासपुर- शहर में बारिश के दौरान जलभराव, बाढ़ प्रबंधन और बिजली आपूर्ति की समस्याओं को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक बार फिर सख्त रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (CSPDCL) के प्रबंध निदेशक और बिलासपुर नगर निगम के आयुक्त को नया शपथपत्र दाखिल कर अब तक किए गए कामों की वास्तविक प्रगति और मौजूदा स्थिति बताने का निर्देश दिया है।

यह मामला कोर्ट द्वारा स्वतः संज्ञान लेकर शुरू की गई सुओ-मोटो जनहित याचिका से जुड़ा है। कोर्ट ने इससे पहले भी शहर में बारिश के कारण होने वाले जलभराव और बिजली आपूर्ति बाधित होने की समस्या पर अधिकारियों से जवाब मांगा था।

कोर्ट ने कहा—सिर्फ योजना नहीं, जमीन पर दिखे काम

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने 25 अगस्त को मामले की सुनवाई के दौरान अधिकारियों द्वारा अब तक किए गए कार्यों और प्रस्तावित योजनाओं का संज्ञान लिया।

कोर्ट ने साफ किया कि केवल योजनाएं बनाना या कार्रवाई का आश्वासन देना पर्याप्त नहीं है। योजनाओं का जमीनी स्तर पर प्रभाव दिखाई देना चाहिए, ताकि बिलासपुर के लोगों को बारिश, जलभराव और बिजली से जुड़ी परेशानियों से वास्तविक राहत मिल सके।

इसी उद्देश्य से कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से प्रगति की निगरानी करने और ताजा शपथपत्र में ठोस प्रगति का विवरण प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।

बिजली व्यवस्था मजबूत करने के लिए कई बड़े कदम

सुनवाई के दौरान CSPDCL की ओर से बताया गया कि बिलासपुर की बिजली व्यवस्था को मजबूत करने के लिए कई स्तरों पर काम शुरू किया गया है।

इनमें क्षतिग्रस्त सीमेंट के बिजली खंभों को लोहे के खंभों से बदलना, बिजली लाइनों से जुड़े खतरनाक विज्ञापन होर्डिंग्स की पहचान करना और आपात स्थिति में बिजली बहाल करने के लिए अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध कराना शामिल है।

इसके अलावा बढ़ती बिजली मांग को देखते हुए एक Extra High Voltage (EHV) सब-स्टेशन और दो 33/11 KV सब-स्टेशन स्थापित करने की प्रक्रिया भी आगे बढ़ाई जा रही है। इनमें लोकांडी क्षेत्र में EHV सब-स्टेशन तथा सलावली नाला और मंगला रिवर व्यू क्षेत्र में 33/11 KV सब-स्टेशन प्रस्तावित हैं।

अधिकारियों का कहना है कि नए सब-स्टेशन बनने से मौजूदा नेटवर्क पर दबाव कम होगा और बिजली आपूर्ति को अधिक स्थिर बनाने में मदद मिलेगी।

जलभराव से निपटने नगर निगम ने बनाया Flood Control Cell

बिलासपुर नगर निगम ने मानसून के दौरान जलभराव और बाढ़ जैसी स्थिति से निपटने के लिए Flood Control Cell का गठन किया है। यह सेल विकास भवन, नेहरू चौक में स्थापित किया गया है और इसमें अधिकारियों की शिफ्टवार ड्यूटी तथा शिकायतों की निगरानी की व्यवस्था की गई है।

नगर निगम के अनुसार, आपात स्थिति के लिए राहत शिविरों की पहचान, आपातकालीन रोशनी और पेयजल की व्यवस्था, नालियों एवं सीवर की सफाई, बचाव दलों की तैनाती तथा JCB, पंप और अन्य मशीनरी की उपलब्धता सुनिश्चित करने की व्यवस्था की गई है।

इसके अलावा भारी बारिश के दौरान अधिकारियों को लगातार फील्ड में निगरानी रखने और जलभराव वाले क्षेत्रों में तत्काल कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।

 सभी आठ जोन में नालों की सफाई

नगर निगम ने बताया कि मानसून से पहले बिलासपुर के सभी आठ नगर निगम जोन में बड़े और छोटे नालों की सफाई एवं डी-सिल्टिंग का काम कराया गया है।

इसके लिए निगम के पास 14 वाहन उपलब्ध हैं, जिनका उपयोग गाद, कचरा और अन्य सामग्री हटाने के साथ-साथ जल निकासी व्यवस्था को दुरुस्त करने में किया जा रहा है।

नगर निगम ने कोर्ट को यह भी बताया कि बारिश और जलभराव से जुड़ी किसी भी आपात स्थिति में अन्य विभागों के साथ समन्वय कर मानव संसाधन, वाहन और मशीनरी उपलब्ध कराई जाएगी।

बिजली शिकायतों के त्वरित समाधान पर जोर

बिजली व्यवस्था को लेकर कोर्ट की निगरानी का एक अहम हिस्सा शिकायतों के त्वरित निराकरण से जुड़ा है।

CSPDCL ने बताया कि बिजली आपूर्ति बाधित होने की शिकायतों को जल्द दर्ज करने और निर्धारित समय में उनका समाधान करने के लिए कॉल सेंटर व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने पर जोर दिया जा रहा है। इसके साथ ही आपातकालीन कार्यों के लिए अतिरिक्त मानवबल और ठेकेदारों की सेवाएं भी उपलब्ध कराई गई हैं।

इसका उद्देश्य बारिश या तेज आंधी के दौरान बिजली के खंभे, तार या अन्य उपकरण क्षतिग्रस्त होने पर कम से कम समय में बिजली बहाल करना है।

खराब मौसम और बिजली हादसों पर भी कोर्ट की नजर

बिलासपुर में बिजली और बारिश से जुड़ी समस्याओं पर हाईकोर्ट पहले भी लगातार निगरानी करता रहा है। जुलाई में कोर्ट ने बिजली आपूर्ति व्यवस्था, जलभराव और नागरिकों की सुरक्षा को लेकर अधिकारियों से विस्तृत जानकारी मांगी थी।

एक पूर्व सुनवाई में कोर्ट के सामने यह भी आया था कि बड़ी संख्या में खराब सर्विस वायर को बदलने की जरूरत थी और अधिकारियों से लंबित मामलों की वर्तमान स्थिति स्पष्ट करने को कहा गया था।

अब कोर्ट को देनी होगी जमीनी प्रगति की रिपोर्ट

हाईकोर्ट का मौजूदा निर्देश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अब अधिकारियों को केवल भविष्य की योजनाएं बताने के बजाय अब तक किए गए काम और उनकी वास्तविक प्रगति का ब्यौरा देना होगा।

कोर्ट ने ऊर्जा विभाग के प्रमुख सचिव, CSPDCL के प्रबंध निदेशक और बिलासपुर नगर निगम आयुक्त को अपने-अपने स्तर पर चल रहे कार्यों की निगरानी करने और ताजा शपथपत्र में प्रगति दर्ज करने का निर्देश दिया है।

क्यों अहम है यह मामला?

बिलासपुर में बारिश के दौरान सड़कों पर जलभराव और बिजली आपूर्ति में व्यवधान सीधे तौर पर आम लोगों की सुरक्षा और रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करते हैं। ऐसे में हाईकोर्ट की निगरानी से उम्मीद है कि जल निकासी, बिजली नेटवर्क, आपातकालीन प्रतिक्रिया और शिकायत निवारण की व्यवस्थाओं को केवल कागजों तक सीमित न रखकर जमीन पर प्रभावी बनाया जाएगा।

हाईकोर्ट का संदेश स्पष्ट है—बिलासपुर की जनता को राहत देने के लिए योजनाओं और दावों से आगे बढ़कर उनके परिणाम जमीन पर दिखाई देने चाहिए।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी: लगातार मानसिक प्रताड़ना और शादी का दबाव आत्महत्या के लिए उकसाने के समान हो सकता है

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बिलासपुर- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के दौरान कहा है कि यदि किसी व्यक्ति को लंबे समय तक मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाए और उस पर लगातार शादी करने का दबाव बनाया जाए, तो ऐसी परिस्थितियां आत्महत्या के लिए उकसाने (Abetment of Suicide) के दायरे में आ सकती हैं।

अदालत ने अपने अवलोकन में कहा कि किसी व्यक्ति पर लगातार मानसिक दबाव, उत्पीड़न और भावनात्मक प्रताड़ना उसके मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है। यदि इस तरह की परिस्थितियां किसी व्यक्ति को आत्महत्या जैसा कदम उठाने के लिए मजबूर करती हैं, तो मामले के तथ्यों के आधार पर इसे आत्महत्या के लिए उकसाने के रूप में देखा जा सकता है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में प्रत्येक घटना के तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों का सावधानीपूर्वक परीक्षण किया जाना आवश्यक है। अदालत की यह टिप्पणी मानसिक उत्पीड़न और सामाजिक दबाव से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी दृष्टिकोण के रूप में देखी जा रही है।

इस फैसले ने यह संदेश भी दिया है कि किसी भी व्यक्ति पर लगातार मानसिक दबाव या अनावश्यक सामाजिक एवं वैवाहिक दबाव बनाना गंभीर कानूनी परिणामों का कारण बन सकता है।

अग्नि सुरक्षा को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट सख्त, सरकार से मांगी नई स्थिति रिपोर्ट

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बिलासपुर- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य में अग्निशमन एवं आपातकालीन सेवाओं की व्यवस्था को लेकर गंभीर रुख अपनाते हुए राज्य सरकार से अग्नि सुरक्षा संबंधी तैयारियों और आधुनिकीकरण कार्यों पर नई स्थिति रिपोर्ट (Status Report) प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि अग्निशमन सेवाओं को आधुनिक बनाने के लिए 280 करोड़ रुपये से अधिक की व्यापक कार्ययोजना तैयार की गई है। इस योजना के तहत राज्यभर में नए फायर स्टेशन स्थापित किए जाएंगे, मौजूदा फायर स्टेशनों को सुदृढ़ किया जाएगा तथा अत्याधुनिक अग्निशमन वाहन, बचाव उपकरण और अन्य आधुनिक संसाधन उपलब्ध कराए जाएंगे।

सरकार ने यह भी जानकारी दी कि अग्निशमन विभाग की क्षमता बढ़ाने के लिए आधुनिक तकनीक, बेहतर प्रशिक्षण और आवश्यक बुनियादी ढांचे के विकास पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, ताकि किसी भी आपात स्थिति में त्वरित और प्रभावी राहत एवं बचाव कार्य सुनिश्चित किया जा सके।

हाईकोर्ट ने सरकार से इन योजनाओं की प्रगति, समय-सीमा और क्रियान्वयन की विस्तृत जानकारी अगली सुनवाई में प्रस्तुत करने को कहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि नागरिकों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और अग्निशमन सेवाओं को मजबूत बनाने के लिए ठोस एवं प्रभावी कदम उठाए जाने आवश्यक हैं।

राज्य सरकार की इस पहल से आने वाले समय में छत्तीसगढ़ की फायर सेफ्टी और आपदा प्रबंधन प्रणाली को अधिक आधुनिक, सक्षम और प्रभावी बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।

जेलों में बढ़ती मौतों पर हाईकोर्ट सख्त, प्रशासन से मांगा जवाब

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रायपुर- छत्तीसगढ़ में जेलों के भीतर हो रही मौतों को लेकर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। एक वर्ष के भीतर राज्य की विभिन्न जेलों में 33 कैदियों की मौत होने के मामले को गंभीरता से लेते हुए अदालत ने चिंता जताई है।

सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि कई मामलों में अब तक पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार नहीं हुई है या लंबित पड़ी है, जिससे मौत के कारणों पर सवाल उठ रहे हैं। कोर्ट ने इसे बेहद गंभीर लापरवाही मानते हुए संबंधित अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर नाराजगी व्यक्त की।

हाईकोर्ट ने जेल विभाग के महानिदेशक (DG) और अन्य जिम्मेदार अधिकारियों को नोटिस जारी कर विस्तृत जवाब तलब किया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कैदियों की सुरक्षा और स्वास्थ्य की जिम्मेदारी पूरी तरह से प्रशासन की है, और इसमें किसी भी तरह की लापरवाही स्वीकार नहीं की जाएगी।

कोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि सभी लंबित पोस्टमार्टम रिपोर्ट को जल्द से जल्द पूरा किया जाए और प्रत्येक मौत की विस्तृत जांच रिपोर्ट पेश की जाए। साथ ही, भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने के निर्देश भी दिए गए हैं।

इस मामले की अगली सुनवाई में कोर्ट प्रशासन द्वारा उठाए गए कदमों और रिपोर्ट की समीक्षा करेगा।

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