Media24Media.com: आंबेडकर जयंती पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का संदेश: सामाजिक समरसता और शिक्षा पर दिया जोर

Responsive Ad Slot

Latest

latest


 

आंबेडकर जयंती पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का संदेश: सामाजिक समरसता और शिक्षा पर दिया जोर

Document Thumbnail

गांधीनगर- द्रौपदी मुर्मू ने मंगलवार को गुजरात के गांधीनगर स्थित लोक भवनमें आयोजित ‘सामाजिक समरसता महोत्सव’ में भाग लिया। यह कार्यक्रम डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकरकी जयंती के अवसर पर आयोजित किया गया, जिसमें राष्ट्रपति ने बाबासाहेब को भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की।

राष्ट्रपति मुर्मू ने अपने संबोधन में कहा कि डॉ. भीमराव आंबेडकर ने देश के विकास और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में बहुआयामी योगदान दिए हैं। उन्होंने संविधान निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और देश को एक मजबूत लोकतांत्रिक ढांचा प्रदान किया। राष्ट्रपति ने कहा कि आंबेडकर केवल एक महान विधिवेत्ता ही नहीं, बल्कि एक कुशल अर्थशास्त्री और समाज सुधारक भी थे, जिन्होंने बैंकिंग, सिंचाई, बिजली, श्रम प्रबंधन और केंद्र-राज्य संबंधों जैसे क्षेत्रों में भी अहम योगदान दिया।

उन्होंने शिक्षा के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि बाबासाहेब ने हमेशा शिक्षा को सशक्त समाज की नींव माना। संविधान में शिक्षा को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया गया है और वंचित वर्गों के हितों की रक्षा के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। राष्ट्रपति ने सभी नागरिकों से अपील की कि वे समाज के कमजोर वर्गों को शिक्षा के प्रति जागरूक करें और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें।

सामाजिक समरसता पर बोलते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि करुणा और समानता समाज की एकता के मूल आधार हैं। उन्होंने कहा कि जब लोग जाति, वर्ग, भाषा और क्षेत्र के भेदभाव से ऊपर उठकर एकता और भाईचारे की भावना अपनाते हैं, तभी सच्ची सामाजिक समरसता स्थापित होती है। उन्होंने कहा कि भारत के सभी नागरिक एक हैं और देश की प्रगति के लिए एकजुट रहना आवश्यक है।

राष्ट्रपति ने गुजरात में सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने के लिए किए जा रहे प्रयासों—जैसे वृक्षारोपण, स्वच्छता अभियान, पशुपालन और कृषि विकास—की सराहना भी की।

अपने संबोधन के अंत में राष्ट्रपति ने डॉ. आंबेडकर के उस संदेश को याद किया, जिसमें उन्होंने सामाजिक लोकतंत्र को जीवन का आधार बताते हुए स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को उसके मूल तत्व बताया था।

निष्कर्ष

राष्ट्रपति के इस संबोधन ने डॉ. आंबेडकर के विचारों और उनके आदर्शों को पुनः जीवंत किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि शिक्षा, समानता और सामाजिक समरसता के मार्ग पर चलकर ही एक सशक्त, समावेशी और विकसित भारत का निर्माण संभव है।

Don't Miss
© Media24Media | All Rights Reserved | Infowt Information Web Technologies.