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आंबेडकर जयंती पर संसद परिसर में श्रद्धांजलि, नेताओं ने बाबासाहेब के विचारों को बताया प्रेरणास्रोत

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नई दिल्ली- सी. पी. राधाकृष्णन,नरेंद्र मोदीऔर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने आज संसद भवन परिसर स्थित प्रेरणा स्थल में डॉ. बी. आर. आंबेडकर की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी।

इस अवसर पर कई केंद्रीय मंत्री, राज्यसभा में नेता प्रतिपक्षमल्लिकार्जुन खड़गे, राज्यसभा के उपसभापति  हरिवंश, सांसद, पूर्व सांसद तथा अन्य गणमान्य व्यक्ति भी उपस्थित रहे और उन्होंने बाबासाहेब को नमन किया।

इसके बाद संविधान सदन के केंद्रीय कक्ष में भी डॉ. आंबेडकर के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की गई। इस अवसर पर लोकसभा सचिवालय के महासचिव उत्पल कुमार सिंह सहित कई वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे।

 “Know Your Leader” कार्यक्रम में युवाओं को संदेश

संविधान सदन के केंद्रीय कक्ष में आयोजित “Know Your Leader” कार्यक्रम के दौरान लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने अपने जीवन की हर चुनौती को अवसर में बदल दिया। उनका जीवन, विचार और राष्ट्र निर्माण में योगदान हम सभी के लिए प्रेरणास्रोत है।

उन्होंने कहा कि संविधान में समानता का अधिकार और बिना भेदभाव के मतदान का अधिकार जैसे प्रावधानों ने एक मजबूत और प्रगतिशील भारत की नींव रखी है, जो आज विश्व के लोकतंत्रों को भी प्रेरित कर रहा है।

 युवाओं को “Nation First” का संदेश

लोकसभा अध्यक्ष ने युवाओं को देश के भविष्य का सच्चा प्रतिनिधि बताते हुए कहा कि उन्हें हमेशा “Nation First” की भावना के साथ कार्य करना चाहिए। उन्होंने कहा कि युवाओं की प्रतिभा, कौशल और नवाचार भारत को एक मजबूत और विकसित राष्ट्र बनाएंगे।

सोशल मीडिया पर भी साझा किया संदेश

ओम बिरला ने सोशल मीडिया मंच X पर अपने संदेश में कहा कि डॉ. आंबेडकर का जीवन संघर्ष, साहस और समर्पण की प्रेरणादायक गाथा है। उन्होंने विषम परिस्थितियों में भी शिक्षा और कड़ी मेहनत के बल पर सफलता हासिल की और करोड़ों वंचितों के लिए आशा की किरण बने।

उन्होंने कहा कि बाबासाहेब ने समानता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व के मूल्यों को अपने जीवन का आधार बनाया और इन्हें संविधान में शामिल कर देश को एक मजबूत दिशा दी।

निष्कर्ष

आंबेडकर जयंती के अवसर पर संसद परिसर में आयोजित इस कार्यक्रम ने बाबासाहेब के विचारों और उनके योगदान को पुनः स्मरण कराया। नेताओं ने एक स्वर में कहा कि डॉ. आंबेडकर के आदर्श आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं और एक समावेशी, न्यायपूर्ण और सशक्त भारत के निर्माण में मार्गदर्शक बने रहेंगे।

आंबेडकर जयंती पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का संदेश: सामाजिक समरसता और शिक्षा पर दिया जोर

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गांधीनगर- द्रौपदी मुर्मू ने मंगलवार को गुजरात के गांधीनगर स्थित लोक भवनमें आयोजित ‘सामाजिक समरसता महोत्सव’ में भाग लिया। यह कार्यक्रम डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकरकी जयंती के अवसर पर आयोजित किया गया, जिसमें राष्ट्रपति ने बाबासाहेब को भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की।

राष्ट्रपति मुर्मू ने अपने संबोधन में कहा कि डॉ. भीमराव आंबेडकर ने देश के विकास और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में बहुआयामी योगदान दिए हैं। उन्होंने संविधान निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और देश को एक मजबूत लोकतांत्रिक ढांचा प्रदान किया। राष्ट्रपति ने कहा कि आंबेडकर केवल एक महान विधिवेत्ता ही नहीं, बल्कि एक कुशल अर्थशास्त्री और समाज सुधारक भी थे, जिन्होंने बैंकिंग, सिंचाई, बिजली, श्रम प्रबंधन और केंद्र-राज्य संबंधों जैसे क्षेत्रों में भी अहम योगदान दिया।

उन्होंने शिक्षा के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि बाबासाहेब ने हमेशा शिक्षा को सशक्त समाज की नींव माना। संविधान में शिक्षा को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया गया है और वंचित वर्गों के हितों की रक्षा के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। राष्ट्रपति ने सभी नागरिकों से अपील की कि वे समाज के कमजोर वर्गों को शिक्षा के प्रति जागरूक करें और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें।

सामाजिक समरसता पर बोलते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि करुणा और समानता समाज की एकता के मूल आधार हैं। उन्होंने कहा कि जब लोग जाति, वर्ग, भाषा और क्षेत्र के भेदभाव से ऊपर उठकर एकता और भाईचारे की भावना अपनाते हैं, तभी सच्ची सामाजिक समरसता स्थापित होती है। उन्होंने कहा कि भारत के सभी नागरिक एक हैं और देश की प्रगति के लिए एकजुट रहना आवश्यक है।

राष्ट्रपति ने गुजरात में सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने के लिए किए जा रहे प्रयासों—जैसे वृक्षारोपण, स्वच्छता अभियान, पशुपालन और कृषि विकास—की सराहना भी की।

अपने संबोधन के अंत में राष्ट्रपति ने डॉ. आंबेडकर के उस संदेश को याद किया, जिसमें उन्होंने सामाजिक लोकतंत्र को जीवन का आधार बताते हुए स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को उसके मूल तत्व बताया था।

निष्कर्ष

राष्ट्रपति के इस संबोधन ने डॉ. आंबेडकर के विचारों और उनके आदर्शों को पुनः जीवंत किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि शिक्षा, समानता और सामाजिक समरसता के मार्ग पर चलकर ही एक सशक्त, समावेशी और विकसित भारत का निर्माण संभव है।

अंबेडकर महापरिनिर्वाण दिवस पर NCSC का राष्ट्रीय संगोष्ठी, सरदार पटेल की 150वीं जयंती को भी दी श्रद्धांजलि

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राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) ने डॉ. भीमराव आंबेडकर की महापरिनिर्वाण दिवस पर प्रधनमंत्री राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया। यह कार्यक्रम सरदार वल्लभभाई पटेल की 150वीं जयंती और सरदार पटेल एकता यात्रा के समापन अवसर के साथ आयोजित किया गया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता NCSC के माननीय अध्यक्ष किशोर मकवाना और आयोग के सदस्यों ने की। इस अवसर पर सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

कार्यक्रम में प्रख्यात इतिहासकार और प्रधानमंत्री राष्ट्रीय संग्रहालय के सदस्य प्रो. रिज़वान क़ादरी ने मुख्य वक्तव्य दिया। उन्होंने डॉ. आंबेडकर और सरदार पटेल के ऐतिहासिक योगदानों—सामाजिक न्याय, राष्ट्रीय एकता, संवैधानिक शासन और वंचित वर्गों के उत्थान—पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने दोनों नेताओं की अस्पृश्यता उन्मूलन, सामाजिक सुधार, शिक्षा और समाज के कमजोर वर्गों को सशक्त बनाने की प्रतिबद्धता को रेखांकित किया।

इससे पहले NCSC के सचिव गुडे श्रीनिवास ने स्वागत भाषण देते हुए डॉ. आंबेडकर और सरदार पटेल के जीवनभर के संघर्षों और समर्पण को याद किया। उन्होंने डॉ. आंबेडकर की भेदभाव के खिलाफ लड़ाई और संविधान में दिए गए सुरक्षा प्रावधानों को रेखांकित किया। साथ ही उन्होंने सरदार पटेल के नेतृत्व में 562 रियासतों के सफल एकीकरण और "अखंड भारत" की नींव मजबूत करने की भूमिका पर प्रकाश डाला।

आयोग के माननीय सदस्य लवकुश कुमार और वड्डेपल्ली रामचंदर ने भी दोनों महान नेताओं द्वारा समानता आधारित समाज निर्माण के लिए किए गए कार्यों को याद किया।

अपने संबोधन में NCSC के अध्यक्ष किशोर मकवाना ने डॉ. आंबेडकर और सरदार पटेल के बीच महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संवादों और सहयोग का उल्लेख किया—जिसमें सरदार पटेल द्वारा सामाजिक अशांति के दौरान अस्पृश्यों के अधिकारों की रक्षा के प्रयास भी शामिल थे। उन्होंने डॉ. आंबेडकर के उस सिद्धांत को विशेष रूप से रेखांकित किया कि राष्ट्र सदैव किसी भी व्यक्ति या संगठन से ऊपर होता है।

समापन सत्र में केंद्रीय मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार ने आयोग द्वारा संगोष्ठी आयोजित करने के प्रयासों की सराहना की और दोनों राष्ट्रनिर्माताओं को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि उनका सामाजिक न्याय, एकता और कल्याण का साझा दृष्टिकोण आज भी देश का मार्गदर्शन कर रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरदार पटेल की राष्ट्र-निर्माण की भावना को आगे बढ़ाया जा रहा है।


राष्ट्रीय सम्मेलन “जीवंत संविधान: लोकतंत्र, गरिमा और विकास के 75 वर्ष” का डॉ. अम्बेडकर अंतर्राष्ट्रीय केंद्र में भव्य समापन

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डॉ. अम्बेडकर फाउंडेशन (DAF), सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन “जीवंत संविधान: लोकतंत्र, गरिमा और विकास के 75 वर्ष” का आज डॉ. अम्बेडकर अंतर्राष्ट्रीय केंद्र (DAIC), नई दिल्ली में समापन हुआ। यह कार्यक्रम भारत में संविधान अपनाए जाने के 75 वर्षों (Samvidhan @75) के अवसर पर पूरे देश में आयोजित कार्यक्रमों का भव्य समापन था।

सम्मेलन की शुरुआत मुख्य न्यायाधीश (सेवानिवृत्त), DAF सचिव, अतिरिक्त सचिव और मंत्रालय के वरिष्ठ नेताओं के उद्घाटन भाषणों से हुई। वक्ताओं ने संविधान को एक गतिशील दस्तावेज़ बताया, जो भारत के लोकतांत्रिक विकास, सामाजिक न्याय और विकासात्मक प्राथमिकताओं का मार्गदर्शन करता है।

उद्घाटन सत्र में राष्ट्रीय अभिलेखागार (National Archives of India) द्वारा क्यूरेट की गई विशेष प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया, जिसमें संविधान निर्माण काल के दुर्लभ दस्तावेज, तस्वीरें और अभिलेखीय सामग्री प्रदर्शित की गईं।

सम्मेलन में दो प्रमुख पैनल चर्चाएँ आयोजित की गईं:

पैनल चर्चा – I:

“जीवंत संविधान का क्रियान्वयन: 21वीं सदी में लोकतंत्र, गरिमा और विकास”
इस चर्चा में उच्च शिक्षा के उपकुलपतियों, कानून के प्रोफेसरों और वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने संवैधानिक व्याख्या, लोकतांत्रिक मजबूती, अधिकार ढांचा और तकनीकी एवं सामाजिक बदलावों की चुनौतियों पर विचार-विमर्श किया।

पैनल चर्चा – II:

“सामाजिक न्याय और समावेशी विकास के संवैधानिक मार्ग: समकालीन भारत में डॉ. अम्बेडकर के दृष्टिकोण का साकार होना”

इसमें सार्वजनिक कानून, सामाजिक नीति और डिजिटल गवर्नेंस के विशेषज्ञों ने संवैधानिक उपायों पर चर्चा की, जिनसे हाशिए के समुदायों को सशक्त बनाया जा सके, डिजिटल विभाजन को पाटा जा सके और Viksit Bharat 2047 की दिशा में कदम बढ़ाए जा सकें।

सम्मेलन में 700 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लिया, जिनमें डॉ. अम्बेडकर चेयर प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर, डॉक्टोरल फेलो और दिल्ली के विभिन्न कॉलेजों के अंतिम वर्ष के छात्र शामिल थे। उनके सक्रिय योगदान ने विचार-विमर्श को और गहराई और जीवंतता प्रदान की।

सम्मेलन के मुख्य आकर्षणों में से एक थी प्रो. जेम्स स्टीफन मेका, डॉ. बी.आर. अम्बेडकर चेयर प्रोफेसर, आंध्र विश्वविद्यालय द्वारा लिखित पुस्तक “One India through Digital India” का विमोचन। इसे मुख्य न्यायाधीश (सेवानिवृत्त) द्वारा जारी किया गया, जिन्होंने डिजिटल सशक्तिकरण को सामाजिक-आर्थिक विभाजन को पाटने के संवैधानिक उपकरण के रूप में महत्व दिया।

समापन सत्र में, केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री ने “सभी पोर्टलों के एकीकरण का पहला चरण (Consolidation of All Portals of DoSJE)” लॉन्च किया। यह पहल मंत्रालय के विभिन्न डिजिटल प्लेटफार्मों को एकीकृत करके पारदर्शिता, डेटा समेकन और सेवा वितरण में सुधार लाएगी।

सम्मेलन ने संविधान मूल्यों की रक्षा और लोकतंत्र, गरिमा और विकास को भारत के भविष्य के मार्गदर्शक के रूप में बनाए रखने के प्रति एक नई राष्ट्रीय प्रतिबद्धता को पुनः पुष्टि की। यह आयोजन डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की स्थायी विरासत को सम्मानित करने और संविधान को भारत की अगली सदी का मार्गदर्शक बल मानने के उद्देश्य से आयोजित किया गया।

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