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सीएसआईआर ने आयोजित किया प्रौद्योगिकी हस्तांतरण कार्यक्रम, चार स्वदेशी तकनीकें उद्योगों को सौंपीं

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नई दिल्ली- वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) ने आज नई दिल्ली स्थित अपने मुख्यालय में प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (Technology Transfer) कार्यक्रम आयोजित किया। कार्यक्रम का आयोजन सीएसआईआर-केंद्रीय वैज्ञानिक उपकरण संगठन (CSIR-CSIO), चंडीगढ़ द्वारा किया गया, जिसमें वैज्ञानिकों, उद्योग जगत के प्रतिनिधियों, प्रौद्योगिकी अपनाने वाले संस्थानों और अन्य प्रमुख हितधारकों ने भाग लिया।

इस अवसर पर चार स्वदेशी प्रौद्योगिकियों का उद्योगों को हस्तांतरण, ग्रामीण क्षेत्रों के लिए आईओटी (IoT) आधारित जल सेवा वितरण, मापन एवं निगरानी प्रणाली का व्यावसायिक शुभारंभ तथा भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL), पंचकूला से स्वदेशी रक्षा प्रौद्योगिकियों के लाइसेंस प्राप्त उत्पादन पर मिली रॉयल्टी का उल्लेख किया गया।

कार्यक्रम में सीएसआईआर की महानिदेशक एवं डीएसआईआर की सचिव डॉ. एन. कलैसेल्वी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं। उनके साथ सीएसआईआर-सीएसआईओ के निदेशक प्रो. शांतनु भट्टाचार्य, वरिष्ठ वैज्ञानिक, अधिकारी एवं उद्योग जगत के प्रतिनिधि भी मौजूद रहे।

प्रो. शांतनु भट्टाचार्य ने बताया कि इंडक्शन मोटर स्टेथोस्कोप (MSCOPE), पोर्टेबल एंड यूनिवर्सल मोटर-कम-पंप परफॉर्मेंस मॉनिटर (PU-MPPM) तथा आई-पावर क्वालिटी एनालाइज़र (IPQA) जैसी तकनीकों का लाइसेंस एम/एस पंप अकादमी प्राइवेट लिमिटेड, बेंगलुरु को दिया गया है। वहीं, एसयू-30 विमान के लिए हेड-अप डिस्प्ले (HUD) का ऑप्टिकल मॉड्यूल एवं बीम कंबाइनर असेंबली तकनीक भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL), पंचकूला को हस्तांतरित की गई।

उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों के लिए विकसित किफायती आईओटी आधारित जल सेवा वितरण, मापन एवं निगरानी प्रणाली के व्यावसायिक शुभारंभ की भी घोषणा की। यह प्रणाली जल की गुणवत्ता, मात्रा और सेवा वितरण की आधुनिक एवं प्रभावी निगरानी सुनिश्चित करेगी।

प्रो. भट्टाचार्य ने बताया कि वित्तीय वर्ष 2025-26 में BEL, पंचकूला से स्वदेशी सैन्य एवियोनिक्स तकनीकों—जिनमें हेड-अप डिस्प्ले (HUD), ड्रोग लाइट्स, टैक्सी लैंडिंग लाइट्स, HUD-I लेवल टेस्टर और बोरसाइट अलाइनमेंट टूल शामिल हैं—के लाइसेंस प्राप्त उत्पादन के लिए 1.67 करोड़ रुपये की रॉयल्टी प्राप्त हुई है। उन्होंने इसे भारतीय उद्योग के साथ सीएसआईआर-सीएसआईओ की मजबूत साझेदारी और स्वदेशी रक्षा विनिर्माण में उसके महत्वपूर्ण योगदान का प्रमाण बताया।

अपने संबोधन में डॉ. एन. कलैसेल्वी ने सफल प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और व्यावसायीकरण के लिए सीएसआईआर-सीएसआईओ की टीम को बधाई दी। उन्होंने कहा कि स्वदेशी तकनीकों का सफल व्यावसायीकरण, अनुसंधान को उद्योग एवं समाज के लिए उपयोगी उत्पादों और प्रक्रियाओं में बदलने की दिशा में सीएसआईआर के मिशन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने वैज्ञानिकों से राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और 'आत्मनिर्भर भारत' के विज़न के अनुरूप उद्योगोन्मुख अनुसंधान को आगे बढ़ाने का आह्वान किया।

कार्यक्रम का समापन सीएसआईआर-सीएसआईओ के बिजनेस डेवलपमेंट ग्रुप (BDG) के प्रमुख द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जारी किया DRDO का नया वित्तीय अधिकार ढांचा (DFP-2026), रक्षा अनुसंधान को मिलेगी नई गति

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नई दिल्ली- रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 29 जून 2026 को रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के लिए डेलीगेशन ऑफ फाइनेंशियल पावर्स-2026 (DFP-2026) जारी किया। यह नया वित्तीय ढांचा रक्षा अनुसंधान एवं विकास परियोजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण सुधार माना जा रहा है।

प्रमुख बातें

  • DFP-2026 से रक्षा अनुसंधान परियोजनाओं को समय पर मंजूरी और वित्तीय स्वीकृति मिलेगी।

  • रक्षा तकनीकों, हथियार प्रणालियों और प्लेटफॉर्म्स का तेजी से उत्पादन और सेना में शामिल किया जा सकेगा।

  • उद्योग, स्टार्टअप और शैक्षणिक संस्थानों के साथ साझेदारी को बढ़ावा मिलेगा।

  • यह पहल आत्मनिर्भर भारत अभियान को मजबूत करेगी और स्वदेशी रक्षा तकनीकों के विकास में तेजी लाएगी।

नए ढांचे की विशेषताएं

  • परीक्षण, ट्रायल और मूल्यांकन गतिविधियों के लिए अलग वित्तीय प्रावधान।

  • परियोजना शुरू होने से पहले अनुसंधान एवं विकास (Pre-Project R&D) को मंजूरी देने का अधिकार।

  • Extra-Mural Research Projects, Defence Innovation Accelerator – Centres of Excellence तथा Technology Development Fund परियोजनाओं के लिए अलग-अलग वित्तीय अधिकार निर्धारित किए गए हैं।

  • DRDO के विभिन्न स्तरों पर अधिकारियों को अधिक वित्तीय अधिकार देकर निर्णय प्रक्रिया को तेज बनाया जाएगा।

रक्षा मंत्री ने क्या कहा?

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि नया वित्तीय ढांचा रक्षा अनुसंधान को अधिक प्रभावी बनाएगा, उद्योग और अकादमिक संस्थानों के साथ सहयोग बढ़ाएगा तथा देश की रक्षा तैयारियों को और मजबूत करेगा। उन्होंने कहा कि यह सुधार रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को नई गति देगा।

इस अवसर पर चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान, रक्षा सचिव एवं DRDO के अध्यक्ष राजेश कुमार सिंह, रक्षा उत्पादन सचिव संजीव कुमार, पूर्व सैनिक कल्याण सचिव सुकृति लिखी सहित रक्षा मंत्रालय और DRDO के कई वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

भारत इनोवेट्स 2026 का दूसरा दिन: डीपटेक इनोवेशन, निवेश और वैश्विक सहयोग पर रहा केंद्रित

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भारत इनोवेट्स 2026 (15 जून 2026) के दूसरे दिन वैश्विक निवेशकों, उद्योग जगत के नेताओं, शोधकर्ताओं, नीति निर्माताओं, स्टार्टअप्स और शैक्षणिक संस्थानों के बीच व्यापक और गहन संवाद हुआ। इस दिन का मुख्य फोकस नवाचार को गति देना, तकनीकी साझेदारी को मजबूत करना और डीपटेक समाधानों के व्यावसायीकरण को आगे बढ़ाना रहा।

भारत सरकार की पहल और शिक्षा मंत्रालय द्वारा संचालित यह कार्यक्रम भारत के तेजी से बढ़ते इनोवेशन इकोसिस्टम को वैश्विक पूंजी, उद्योग विशेषज्ञता और अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ने के लिए एक प्रमुख मंच के रूप में उभर रहा है।

इनोवेशन शोकेस में अत्याधुनिक तकनीकें प्रदर्शित

दिन की शुरुआत एक इनोवेशन शोकेस से हुई, जिसमें भारतीय स्टार्टअप्स और प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों द्वारा विकसित अत्याधुनिक तकनीकों को प्रदर्शित किया गया। इनमें बायोटेक्नोलॉजी, सेमीकंडक्टर्स, एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग, हेल्थकेयर, ऊर्जा, मोबिलिटी, स्पेस और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस क्षेत्र शामिल रहे।

वैश्विक विशेषज्ञों की भागीदारी

मुख्य वक्ता के रूप में एशियन पेंट्स लिमिटेड के को-प्रमोटर और एंजेल निवेशक जलज दानी ने वैज्ञानिक नवाचार को बाजार की जरूरतों और औद्योगिक साझेदारियों से जोड़ने पर जोर दिया।

पैनल चर्चाओं में प्रो. चेतन चिटनिस (इंस्टिट्यूट पाश्चर), ऑरेलि गिरो (CEO, Safran Reosc), बर्ट्रांड डेनिस (थेल्स अलेनिया स्पेस), फ्रेडरिक पेरिसोट (CEO, GIFAS), योको फुकाता (Sony Innovation Fund) और सुनील बख्शी (Mizuho Financial Group) जैसे वैश्विक विशेषज्ञ शामिल रहे।

स्टार्टअप–निवेशक संवाद

80 से अधिक डीपटेक स्टार्टअप्स ने 50 से अधिक वैश्विक निवेशकों के सामने अपने इनोवेशन प्रस्तुत किए। ये प्रस्तुतियाँ छह प्रमुख क्षेत्रों में आयोजित की गईं—

  • स्पेस और डिफेंस

  • आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सेमीकंडक्टर्स

  • हेल्थकेयर और मेडटेक

  • बायोटेक और एग्रीटेक

  • एनर्जी और क्लाइमेट टेक्नोलॉजी

  • एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग

इन सत्रों के दौरान 40 से अधिक स्टार्टअप्स को निवेशकों से आगे की बातचीत के लिए प्रतिबद्धता प्राप्त हुई।

प्रमुख उपलब्धियां

दूसरे दिन तक कार्यक्रम में उल्लेखनीय उपलब्धियां दर्ज की गईं—

  • 1,350 से अधिक B2B बैठकें

  • 50 से अधिक सहयोग समझौते

  • 10 से अधिक देशों के 50+ निवेशकों के साथ 80+ स्टार्टअप पिच

  • 40+ स्टार्टअप्स को निवेशक फॉलो-अप

  • लगभग 254.5 मिलियन अमेरिकी डॉलर के निवेश व फंडिंग की घोषणा

भारत की वैश्विक स्थिति को मजबूती

इस आयोजन ने भारत को डीपटेक इनोवेशन और वैश्विक तकनीकी सहयोग के एक प्रमुख केंद्र के रूप में और मजबूत किया है। कार्यक्रम का उद्देश्य भारत, यूरोप और अन्य अंतरराष्ट्रीय बाजारों के बीच नवाचार आधारित साझेदारी को बढ़ावा देना है।

कार्यक्रम के अंतिम दिन टेक्नोलॉजी पार्क्स, एक्सेलेरेटर, क्लाइमेट टेक्नोलॉजी, औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन और वैश्विक स्केलिंग रणनीतियों पर फोकस रहेगा।

अनुसंधान, विकास और नवाचार को नई गति: आरडीआई फंड के तहत टीडीबी की पहली ओपन कॉल लॉन्च

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मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज अनुसंधान, विकास और नवाचार (RDI) फंड के अंतर्गत प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड (TDB) की पहली ओपन कॉल का शुभारंभ किया। यह पहल अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (ANRF) के तहत शुरू की गई है, जिसका उद्देश्य स्वदेशी प्रौद्योगिकियों के व्यावसायीकरण को संरचित और दीर्घकालिक वित्तीय सहायता प्रदान कर भारत के नवाचार पारितंत्र को सुदृढ़ बनाना है।

इस अवसर पर संबोधित करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि यह पहल पारंपरिक सरकारी वित्तपोषण मॉडल से एक महत्वपूर्ण और दुर्लभ बदलाव को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि अब तक सरकारें मुख्यतः परोपकार या कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) के माध्यम से निजी क्षेत्र में निवेश को प्रोत्साहित करती रही हैं, जबकि निजी नवाचार को सीधे सरकारी वित्तीय समर्थन सीमित रहा है। आरडीआई फंड इस अंतर को पाटने का प्रयास है, जिससे निजी उद्यमों को उन क्षेत्रों में प्रौद्योगिकियों को विस्तार देने में सहायता मिलेगी, जो अब तक मुख्यतः सार्वजनिक क्षेत्र तक सीमित थे।

मंत्री ने बताया कि अंतरिक्ष और परमाणु जैसे रणनीतिक क्षेत्रों को निजी भागीदारी के लिए खोलने से दशकों पुरानी परंपराओं में बदलाव आया है। आरडीआई फंड इसी परिवर्तन को समर्थन देने के लिए तैयार किया गया है, जो वित्तीय जोखिम को कम करते हुए जवाबदेही भी सुनिश्चित करता है। यह फंड दीर्घकालिक, किफायती वित्तपोषण प्रदान करता है और इसमें जोखिम साझा करने के लिए इक्विटी-लिंक्ड विकल्प भी शामिल हैं, जिससे जिम्मेदार व्यावसायीकरण को बढ़ावा मिलेगा।

डॉ. सिंह ने जानकारी दी कि आरडीआई फंड का कुल कोष ₹1 लाख करोड़ है। इसके अंतर्गत लगभग 2 से 4 प्रतिशत की रियायती ब्याज दर पर 15 वर्ष तक की अवधि के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाएगी, जिसमें मोरेटोरियम का प्रावधान भी शामिल है। यह ढांचा प्रौद्योगिकी डेवलपर्स के लिए पूंजी तक आसान पहुंच सुनिश्चित करने के साथ-साथ वित्तीय अनुशासन बनाए रखने के लिए तैयार किया गया है।

पहली कॉल के तहत प्राप्त प्रतिक्रिया का उल्लेख करते हुए मंत्री ने बताया कि लगभग 191 प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं, जिनमें से अधिकांश निजी क्षेत्र से आए हैं। उन्होंने कहा कि यह प्रतिक्रिया नवाचार-आधारित विकास को समर्थन देने के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता पर निजी उद्योग के बढ़ते विश्वास को दर्शाती है। साथ ही उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आवेदनों को योजना की मूल भावना के अनुरूप होना चाहिए और धनराशि का उपयोग वास्तविक प्रौद्योगिकी विकास और विस्तार के लिए किया जाना चाहिए।

कार्यक्रम में विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार पारितंत्र से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी और हितधारक उपस्थित रहे। मंच पर प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड के सचिव राजेश पाठक और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव प्रो. अभय करंदीकर भी मौजूद थे।

कार्यक्रम में बताया गया कि आरडीआई फंड के तहत टीडीबी की पहली कॉल उन परियोजनाओं पर केंद्रित है, जो टेक्नोलॉजी रेडीनेस लेवल (TRL) 4 या उससे ऊपर की अवस्था में हैं। वित्तीय सहायता सेकेंड लेवल फंड मैनेजर्स (SLFMs) के माध्यम से ऋण, इक्विटी या हाइब्रिड साधनों के रूप में प्रदान की जाएगी। किसी भी परियोजना के लिए अधिकतम 50 प्रतिशत तक का वित्तपोषण उपलब्ध होगा, जबकि शेष राशि कंपनियों या निजी निवेशकों द्वारा वहन की जाएगी।

इस फंडिंग व्यवस्था की एक प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें किसी प्रकार की जमानत, व्यक्तिगत या कॉर्पोरेट गारंटी की आवश्यकता नहीं होगी। प्रस्तावों का मूल्यांकन वैज्ञानिक, तकनीकी, वित्तीय और व्यावसायिक आधार पर किया जाएगा तथा मूल्यांकन और धनराशि निर्गमन के लिए स्पष्ट समय-सीमा निर्धारित की गई है। यह योजना अनुदान (ग्रांट) आधारित नहीं है, बल्कि टिकाऊ और व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य प्रौद्योगिकियों के विस्तार पर केंद्रित है।

उल्लेखनीय है कि आरडीआई फंड को जुलाई 2025 में केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी मिली थी और नवंबर 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका शुभारंभ किया था। यह पहल स्वदेशी तकनीकी क्षमताओं के निर्माण और भारत की नवाचार-आधारित अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दीर्घकालिक दृष्टि का हिस्सा है।

कार्यक्रम के दौरान आरडीआई फंड के तहत टीडीबी की पहली ओपन कॉल का औपचारिक शुभारंभ किया गया। डॉ. जितेंद्र सिंह ने नवोन्मेषकों, उद्योग जगत और मीडिया से आह्वान किया कि वे इस पहल की जानकारी व्यापक रूप से प्रसारित करें, ताकि देशभर के पात्र उद्यम भारत की प्रौद्योगिकी विकास यात्रा में सक्रिय रूप से भाग ले सकें।

भारत सरकार ने टेक्सटाइल सेक्टर में अनुसंधान और नवाचार के लिए Tex-RAMPS योजना को दी मंजूरी

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भारत सरकार ने टेक्सटाइल सेक्टर में अनुसंधान, नवाचार और प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करने के उद्देश्य से टेक्सटाइल फोकस्ड रिसर्च, असेसमेंट, मॉनिटरिंग, प्लानिंग और स्टार्ट-अप (Tex-RAMPS) योजना को मंजूरी दी है।

इस योजना के लिए कुल 305 करोड़ रुपये का बजट FY 2025-26 से FY 2030-31 तक रखा गया है और इसे केंद्रीय क्षेत्रीय योजना के रूप में लागू किया जाएगा, जिसे पूरी तरह से वस्त्र मंत्रालय द्वारा वित्तपोषित किया जाएगा।

वस्त्र मंत्रालय के केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा कि Tex-RAMPS योजना अनुसंधान, डेटा और नवाचार को एक साथ लाकर भारत के टेक्सटाइल सेक्टर को सशक्त बनाएगी और इसे वैश्विक स्तर पर स्थिरता, तकनीक और प्रतिस्पर्धात्मकता में अग्रणी बनाएगी।

Tex-RAMPS की मुख्य विशेषताएँ:

  1. अनुसंधान और नवाचार: स्मार्ट टेक्सटाइल, सततता, प्रक्रिया दक्षता और उभरती तकनीकों में उन्नत अनुसंधान को बढ़ावा देना।

  2. डेटा, विश्लेषण और डायग्नोस्टिक्स: रोजगार मूल्यांकन, आपूर्ति श्रृंखला मानचित्रण और इंडिया-साइज़ अध्ययन जैसे मजबूत डेटा सिस्टम का निर्माण।

  3. इंटीग्रेटेड टेक्सटाइल्स स्टैटिस्टिकल सिस्टम (ITSS): संरचित निगरानी और रणनीतिक निर्णय लेने के लिए रियल-टाइम डेटा और विश्लेषण प्लेटफार्म।

  4. क्षमता विकास और ज्ञान पारिस्थितिकी तंत्र: राज्य स्तर की योजना, सर्वश्रेष्ठ प्रथाओं का प्रसार, कार्यशालाएँ और क्षेत्रीय कार्यक्रम आयोजित करना।

  5. स्टार्ट-अप और नवाचार समर्थन: इनक्यूबेटर, हैकाथॉन और अकादमी-इंडस्ट्री सहयोग के माध्यम से उच्च-मूल्य वाले टेक्सटाइल स्टार्टअप और उद्यमिता को प्रोत्साहित करना।

अपेक्षित परिणाम:

  • वैश्विक बाजार में भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाना

  • अनुसंधान और नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करना

  • डेटा-आधारित नीति निर्माण में सुधार

  • रोजगार सृजन के अवसर प्रदान करना

  • राज्यों, उद्योग, अकादमी और सरकारी संस्थानों के बीच गहन सहयोग को बढ़ावा देना

Tex-RAMPS योजना भारत के टेक्सटाइल सेक्टर को भविष्य के लिए सक्षम, लचीला और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

सीएसआईआर–आईसीएमआर की उच्चस्तरीय बैठक में स्वास्थ्य अनुसंधान सहयोग को और मजबूत करने पर सहमति

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परिषद् वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान (CSIR) और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद् (ICMR) ने आज नई दिल्ली स्थित सीएसआईआर साइंस सेंटर में एक उच्च-स्तरीय विचार-विमर्श बैठक आयोजित की। बैठक का उद्देश्य दोनों संस्थानों के बीच चल रहे सहयोग को सुदृढ़ करना और भविष्य के लिए एक एकीकृत रोडमैप तैयार करना था।

बैठक की सह-अध्यक्षता सीएसआईआर की महानिदेशक व डीएसआईआर सचिव डॉ. एन. कलैसेल्वी तथा आईसीएमआर के महानिदेशक व स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के सचिव डॉ. राजीव बहल ने की। सीएसआईआर और आईसीएमआर की विभिन्न प्रयोगशालाओं के निदेशकों तथा वरिष्ठ अधिकारियों ने बैठक में भाग लिया।

बैठक के दौरान दोनों संस्थाओं ने कई प्रमुख संयुक्त परियोजनाओं की प्रगति की समीक्षा की, जिनमें शामिल हैं—

  • सीएसआईआर द्वारा विकसित अणुओं (molecules) का क्लीनिकल ट्रायल की ओर बढ़ना,

  • आईसीएमआर समर्थित उन्नत अनुसंधान केंद्रों की स्थिति,

  • बड़े पैमाने की चल रही परियोजनाओं की प्रगति।

विशेष रूप से, अनेक रोगजनकों की निगरानी के लिए अपशिष्ट जल (wastewater) विश्लेषण प्रणाली को और व्यापक बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। यह भी सहमति बनी कि इस दिशा में वन हेल्थ मिशन के तहत संयुक्त प्रयासों को मजबूत किया जाएगा।

नई दवाओं और अणुओं के विकास, व्यवस्थित क्लीनिकल ट्रायल, तथा आईसीएमआर की बड़े जानवरों के लिए उपलब्ध विषाक्तता परीक्षण सुविधाओं के उपयोग से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर भी चर्चा हुई।

AcSIR–ICMR पीएचडी कार्यक्रम की समीक्षा करते हुए युवा शोधकर्ताओं के लिए अधिक अवसर उपलब्ध कराने तथा आईसीएमआर की फेलोशिप को सीएसआईआर फेलोशिप के साथ समाहित करने पर भी जोर दिया गया।

बैठक में डॉ. कलैसेल्वी और डॉ. बहल ने कहा कि सीएसआईआर की वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकीय क्षमता को आईसीएमआर की सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञता के साथ जोड़ना राष्ट्रीय स्तर पर उच्च प्रभाव वाले परिणाम सुनिश्चित करेगा। दोनों ने समयबद्ध प्रगति, बेहतर समन्वय और तकनीकों के संयुक्त विकास के लिए संरचित तंत्र अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया। इसमें डिजिटल रूप से नियंत्रित मेडिकल इमरजेंसी ड्रोन सेवा जैसे नवीन संयुक्त प्रोजेक्ट पर भी चर्चा हुई।

बैठक का समापन इस प्रतिबद्धता के साथ हुआ कि सीएसआईआर और आईसीएमआर स्वास्थ्य विज्ञान, डायग्नॉस्टिक्स, डिजिटल हेल्थ, पर्यावरणीय स्वास्थ्य निगरानी और अन्य उभरते क्षेत्रों में सहयोग को और मजबूत करेंगे तथा संयुक्त परियोजनाओं के विकास और क्रियान्वयन में तेजी लाएंगे।

डीआरडीओ नई दिल्ली में आयोजित ‘उदीयमान विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार सम्मेलन (ESTIC) 2025’ में भाग ले रहा है

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रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) नई दिल्ली के भारत मंडपम में 3 से 5 नवंबर, 2025 तक आयोजित हो रहे Emerging Science, Technology and Innovation Conclave (ESTIC) 2025 में भाग ले रहा है। इस वर्ष सम्मेलन का विषय है – ‘विकसित भारत 2047: सतत नवाचार, तकनीकी प्रगति और सशक्तिकरण का मार्गदर्शन’, जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 3 नवंबर, 2025 को किया। यह सम्मेलन भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार के मार्गदर्शन में 13 मंत्रालयों एवं विभागों के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया जा रहा है।

उद्घाटन सत्र में प्रधानमंत्री ने ₹1 लाख करोड़ अनुसंधान, विकास और नवाचार योजना कोष (RDI Scheme Fund) का शुभारंभ किया, जिसका उद्देश्य निजी क्षेत्र आधारित अनुसंधान एवं नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ बनाना और भारत को वैश्विक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी केंद्र के रूप में विकसित करना है। प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर यह भी कहा कि सरकार निजी क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास को प्रोत्साहित करने के लिए लगातार प्रयासरत है।

सम्मेलन में अग्रणी वैज्ञानिकों के व्याख्यान, पैनल चर्चाएँ, प्रस्तुतियाँ और प्रौद्योगिकी प्रदर्शनी आयोजित की जा रही हैं, जिनका उद्देश्य शोधकर्ताओं, उद्योग जगत और युवा नवोन्मेषकों के बीच सहयोग को सशक्त बनाना और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र को और मजबूत करना है।

मुख्य आयोजकों में से एक के रूप में DRDO ‘इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर विनिर्माण’ पर थीमैटिक सत्र का नेतृत्व कर रहा है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव एवं DRDO अध्यक्ष डॉ. समीर वी. कामत 5 नवंबर, 2025 को इस विषय पर तकनीकी सत्र की अध्यक्षता करेंगे।

सेमीकंडक्टर आधुनिक तकनीकी पारिस्थितिकियों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जो स्वास्थ्य सेवा, संचार, परिवहन, रक्षा और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में प्रमुख प्रणालियों को संचालित करते हैं। DRDO ने सेमीकंडक्टर प्रौद्योगिकी में उल्लेखनीय प्रगति की है, जिसमें 4-इंच सिलिकॉन कार्बाइड वेफर्स के स्वदेशी उत्पादन और गैलियम नाइट्राइड हाई इलेक्ट्रॉन मोबिलिटी ट्रांजिस्टर (HEMT) को 150 वॉट तक निर्मित करने की क्षमता शामिल है।

पैनल चर्चाओं में भाग लेने वाले अन्य DRDO अधिकारियों में विशिष्ट वैज्ञानिक एवं महानिदेशक (माइक्रो इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेज, कम्प्यूटेशनल सिस्टम्स एवं साइबर सिस्टम्स) श्रीमती सुमा वरुघीस, डिफेंस मेटालर्जिकल रिसर्च लेबोरेटरी, हैदराबाद के निदेशक डॉ. रामलिंगम बालामुरलीकृष्णन, और सॉलिड स्टेट फिजिक्स लेबोरेटरी, दिल्ली की वैज्ञानिक-जी डॉ. सोमन महाजन शामिल हैं।

ESTIC 2025 में शिक्षाविदों, अनुसंधान संस्थानों, उद्योग और सरकार से जुड़े 3,000 से अधिक प्रतिभागी शामिल हो रहे हैं, जिनमें नोबेल पुरस्कार विजेता, प्रतिष्ठित वैज्ञानिक, नवप्रवर्तक और नीति निर्माता भी सम्मिलित हैं। सम्मेलन में 11 प्रमुख क्षेत्रों पर चर्चा हो रही है, जिनमें उन्नत सामग्री और विनिर्माण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, बायो-निर्माण, ब्लू इकोनॉमी, डिजिटल संचार, इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर विनिर्माण, उभरती कृषि प्रौद्योगिकियाँ, ऊर्जा, पर्यावरण और जलवायु, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा प्रौद्योगिकी, क्वांटम विज्ञान और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियाँ शामिल हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ESTIC 2025 का किया शुभारंभ — विज्ञान, नवाचार और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में ऐतिहासिक कदम

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नई दिल्ली-प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित “उभरता विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार सम्मेलन (Emerging Science, Technology and Innovation Conclave – ESTIC 2025)” का उद्घाटन किया। इस अवसर पर उन्होंने देश-विदेश से आए वैज्ञानिकों, नवप्रवर्तकों, शिक्षाविदों और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों का स्वागत किया।

अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने सबसे पहले भारतीय महिला क्रिकेट टीम को आईसीसी महिला विश्व कप 2025 में ऐतिहासिक जीत पर बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह जीत न केवल खेल जगत की उपलब्धि है, बल्कि देश की बेटियों की शक्ति और आत्मविश्वास का प्रतीक भी है। उन्होंने कहा, “यह भारत का पहला महिला विश्व कप है — और यह सफलता आने वाली पीढ़ियों की लाखों बेटियों को प्रेरित करेगी।”

प्रधानमंत्री ने बताया कि कल भारत ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी एक और उपलब्धि हासिल की — देश के सबसे भारी संचार उपग्रह का सफल प्रक्षेपण। उन्होंने इस मिशन से जुड़े सभी वैज्ञानिकों और इसरो को बधाई दी।

विज्ञान, नवाचार और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में निर्णायक कदम

मोदी ने कहा कि 21वीं सदी परिवर्तन का युग है, और भारत इस बदलाव के केंद्र में है। उन्होंने कहा कि इस सदी में विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार के क्षेत्र में वैश्विक विशेषज्ञों का साथ आना अत्यंत आवश्यक है, और इसी विचार से ESTIC का जन्म हुआ।

प्रधानमंत्री ने कहा कि “भारत अब केवल तकनीक का उपभोक्ता नहीं, बल्कि तकनीक के माध्यम से परिवर्तन लाने वाला अग्रणी राष्ट्र बन चुका है।” उन्होंने याद दिलाया कि कोविड महामारी के समय भारत ने रिकॉर्ड समय में स्वदेशी वैक्सीन तैयार की और दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान सफलतापूर्वक चलाया।

₹1 लाख करोड़ का “अनुसंधान, विकास और नवाचार (RDI) कोष” लॉन्च

प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर देश के अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र को सशक्त करने के लिए ₹1 लाख करोड़ के “RDI स्कीम फंड” का शुभारंभ किया। उन्होंने कहा कि यह कोष निजी क्षेत्र को अनुसंधान एवं विकास में निवेश के लिए प्रोत्साहित करेगा।

उन्होंने बताया कि पहली बार उच्च जोखिम और उच्च प्रभाव वाले शोध कार्यों के लिए पूंजी उपलब्ध कराई जा रही है। इसके अलावा, अनुसंधान राष्ट्रीय निधि (Anusandhan National Research Foundation) की स्थापना की गई है ताकि भारतीय विश्वविद्यालयों में अनुसंधान का विस्तार हो सके।

भारत बन रहा है नवाचार का वैश्विक केंद्र

प्रधानमंत्री ने बताया कि बीते एक दशक में भारत का R&D व्यय दोगुना, पेटेंट पंजीकरण 17 गुना और स्टार्टअप इकोसिस्टम दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा बन गया है।

उन्होंने कहा कि आज भारत के पास 6,000 से अधिक डीप-टेक स्टार्टअप्स हैं, जो स्वच्छ ऊर्जा, जैव-अर्थव्यवस्था और उन्नत सामग्रियों पर कार्य कर रहे हैं। भारत की बायो-इकोनॉमी 2014 में $10 बिलियन से बढ़कर आज $140 बिलियन तक पहुंच चुकी है।

अंतरिक्ष से लेकर AI तक: भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका

प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम अब चाँद और मंगल तक पहुंच चुका है, और यह किसानों व मछुआरों के लिए भी लाभदायक सिद्ध हो रहा है।

उन्होंने बताया कि भारत अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) में भी वैश्विक नेतृत्व की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने घोषणा की कि भारत “Global AI Summit” फरवरी 2026 में आयोजित करेगा, जो “मानव-केंद्रित और नैतिक AI” के लिए अंतरराष्ट्रीय ढांचे को गति देगा।

उन्होंने कहा, “भारत का उद्देश्य है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस समाज के हर वर्ग तक पहुंचे और विकास का माध्यम बने।”

विज्ञान और तकनीक में महिलाओं की भागीदारी नई ऊंचाइयों पर

प्रधानमंत्री ने बताया कि अब भारत में हर वर्ष 5,000 से अधिक पेटेंट महिलाओं द्वारा दाखिल किए जा रहे हैं, जबकि एक दशक पहले यह संख्या 100 से भी कम थी।

उन्होंने कहा कि STEM शिक्षा में भारत में 43% छात्राएं नामांकित हैं, जो विश्व औसत से अधिक है। यह नारीशक्ति की वैज्ञानिक प्रगति का प्रतीक है।

 युवा नवाचार के अग्रदूत

प्रधानमंत्री ने कहा कि बच्चों में विज्ञान के प्रति जिज्ञासा बढ़ रही है, और इस दिशा में देशभर में 10,000 “अटल टिंकरिंग लैब्स” कार्यरत हैं। उन्होंने घोषणा की कि इनकी संख्या बढ़ाकर 25,000 की जाएगी ताकि और अधिक छात्र वैज्ञानिक प्रयोग कर सकें।

साथ ही उन्होंने कहा कि आने वाले पांच वर्षों में 10,000 नई “प्रधानमंत्री अनुसंधान फैलोशिप” दी जाएंगी ताकि युवा शोधकर्ताओं को प्रोत्साहन मिल सके।

आत्मनिर्भरता की दिशा में नए शोध लक्ष्य

प्रधानमंत्री ने कहा कि अब भारत को खाद्य सुरक्षा से पोषण सुरक्षा की दिशा में बढ़ना होगा। उन्होंने वैज्ञानिकों से आह्वान किया कि वे जैव-संवर्धित फसलें, स्वच्छ ऊर्जा भंडारण तकनीक, जीनोमिक विविधता मैपिंग और किफायती बायो-फर्टिलाइज़र जैसे क्षेत्रों में नवाचार करें ताकि भारत आत्मनिर्भर और विश्व में अग्रणी बन सके।

निष्कर्ष

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “जब विज्ञान का विस्तार होता है, नवाचार समावेशी बनता है, और तकनीक परिवर्तन को प्रेरित करती है — तब राष्ट्र महान उपलब्धियों की ओर बढ़ता है।”

उन्होंने सभी वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और नवप्रवर्तकों का आह्वान किया कि वे मिलकर एक विज्ञान-संचालित विकसित भारत के निर्माण में योगदान दें और अपने संबोधन का समापन “जय विज्ञान, जय अनुसंधान” के नारे के साथ किया।

पृष्ठभूमि

ESTIC 2025 (3–5 नवम्बर 2025) के दौरान 3,000 से अधिक प्रतिभागी — जिनमें नोबेल पुरस्कार विजेता, वैज्ञानिक, उद्योग विशेषज्ञ और नीति निर्माता शामिल हैं — 11 प्रमुख विषयों पर विचार-विमर्श करेंगे, जैसे कि क्वांटम टेक्नोलॉजी, ग्रीन एनर्जी, बायो-मैन्युफैक्चरिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, और स्पेस टेक्नोलॉजी।

इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह, प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार प्रो. अजय कुमार सूद, नोबेल पुरस्कार विजेता सर आंद्रे गीम और अन्य विशिष्ट अतिथि उपस्थित थे।

https://youtu.be/OaAhy7lw2Wg

नीति आयोग द्वारा “अनुसंधान एवं विकास को सुगम बनाने” पर 8वीं क्षेत्रीय परामर्श बैठक का तिरुवनंतपुरम में सफल आयोजन

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नीति आयोग द्वारा “अनुसंधान एवं विकास को सुगम बनाने” (Ease of Doing Research and Development) विषय पर 8वीं क्षेत्रीय परामर्श बैठक का आयोजन 30–31 अक्टूबर, 2025 को तिरुवनंतपुरम स्थित नेशनल सेंटर फॉर अर्थ साइंस स्टडीज (NCESS) में किया गया। इस दो दिवसीय परामर्श बैठक में विभिन्न संस्थानों के प्रमुखों, कुलपतियों, तथा वैज्ञानिक मंत्रालयों एवं विभागों के प्रतिनिधियों ने भारत के अनुसंधान एवं विकास पारिस्थितिकी तंत्र को सशक्त बनाने पर गहन विचार-विमर्श किया।

बैठक की शुरुआत प्रो. एन. वी. चैलपति राव, निदेशक, NCESS द्वारा स्वागत भाषण के साथ हुई। उन्होंने वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करने की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि क्षेत्रीय अनुसंधान संस्थान नवाचार-आधारित विकास को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

इसके बाद प्रो. विवेक कुमार सिंह, नीति आयोग ने बैठक की पृष्ठभूमि प्रस्तुत करते हुए ROPE Framework — Removing Obstacles, Promoting Enablers — का परिचय दिया। उन्होंने बताया कि यह रूपरेखा नीति आयोग की “Ease of Doing R&D” पहल का मार्गदर्शक सिद्धांत है, जिसका उद्देश्य अनुसंधानकर्ताओं के समक्ष आने वाली संस्थागत और नीतिगत चुनौतियों की पहचान कर उन्हें दूर करना तथा सहयोग, लचीलापन और क्षमता निर्माण को बढ़ावा देना है।

डॉ. एम. रवीचंद्रन, सचिव, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने अनुसंधान की प्रभावशीलता और गुणवत्ता बढ़ाने के लिए ठोस सुझाव दिए। उन्होंने कहा कि सेवानिवृत्त वैज्ञानिकों के अनुभव का लाभ लिया जाए, University–Industry–Government (UIG) साझेदारी को मजबूत किया जाए, डेटा-साझाकरण को प्रोत्साहित किया जाए और विज्ञान संचार को अधिक सुलभ व समाज से जुड़ा बनाया जाए।

डॉ. वी. के. सारस्वत, सदस्य, नीति आयोग ने कहा कि Ease of Doing R&D दो प्रमुख आयामों — आंतरिक और बाह्य — पर निर्भर करता है। आंतरिक आयाम संस्थानों की संरचना, शासन और कार्यप्रणाली से जुड़ा है, जबकि बाह्य आयामों में नियामक अड़चनें, वित्त पोषण तंत्र और अंतर-विभागीय समन्वय शामिल हैं। उन्होंने कहा कि दोनों आयामों पर समान रूप से ध्यान देना भारत को वैश्विक अनुसंधान और नवाचार नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ाएगा।

बैठक में केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर ने मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि Ease of Doing R&D का उद्देश्य अंततः Ease of Living यानी नागरिकों के जीवन को सरल और बेहतर बनाना है। उन्होंने कहा कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी को जनकल्याण से जोड़ना आवश्यक है और संस्थानों, उद्योगों तथा सरकार के बीच सहयोगात्मक दृष्टिकोण ही समावेशी विकास की कुंजी है। राज्यपाल ने यह भी कहा कि “राज्य का विकास ही राष्ट्र के विकास का मार्ग प्रशस्त करेगा।”

दो दिवसीय बैठक का समापन अकादमिक संस्थानों, अनुसंधान प्रयोगशालाओं और सरकारी प्रतिनिधियों के बीच हुई विचार-विमर्श सत्रों के साथ हुआ, जिसमें भारत में एक सक्षम, कुशल और सहयोगात्मक R&D पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण के लिए सामूहिक प्रतिबद्धता दोहराई गई।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे “उभरते विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी नवाचार सम्मेलन (ESTIC) 2025” का उद्घाटन एवं ₹1 लाख करोड़ RDI योजना कोष का शुभारंभ

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 3 नवंबर 2025 को सुबह लगभग 9:30 बजे नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित “उभरते विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी नवाचार सम्मेलन (Emerging Science & Technology Innovation Conclave – ESTIC) 2025” का उद्घाटन करेंगे। इस अवसर पर प्रधानमंत्री सम्मेलन को संबोधित भी करेंगे।

देश के अनुसंधान एवं विकास (R&D) पारिस्थितिकी तंत्र को एक बड़ा प्रोत्साहन देते हुए प्रधानमंत्री ₹1 लाख करोड़ के अनुसंधान, विकास एवं नवाचार (RDI) योजना कोष का शुभारंभ करेंगे। इस योजना का उद्देश्य देश में निजी क्षेत्र–प्रधान अनुसंधान एवं विकास पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देना है।

ESTIC 2025 का आयोजन 3 से 5 नवंबर 2025 तक किया जाएगा। इस सम्मेलन में 3,000 से अधिक प्रतिभागी — शिक्षाविद्, अनुसंधान संस्थान, उद्योग और सरकारी प्रतिनिधि — सहित नोबेल पुरस्कार विजेता, प्रख्यात वैज्ञानिक, नवोन्मेषक और नीति-निर्माता भाग लेंगे। चर्चाएँ 11 प्रमुख विषयगत क्षेत्रों पर केंद्रित रहेंगी, जिनमें शामिल हैं —

  • उन्नत पदार्थ एवं विनिर्माण (Advanced Materials & Manufacturing)

  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence)

  • बायो-मैन्युफैक्चरिंग (Bio-Manufacturing)

  • ब्लू इकॉनॉमी (Blue Economy)

  • डिजिटल कम्युनिकेशन (Digital Communications)

  • इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सेमीकंडक्टर विनिर्माण (Electronics & Semiconductor Manufacturing)

  • उभरती कृषि तकनीकें (Emerging Agriculture Technologies)

  • ऊर्जा, पर्यावरण एवं जलवायु (Energy, Environment & Climate)

  • स्वास्थ्य एवं चिकित्सा प्रौद्योगिकियाँ (Health & Medical Technologies)

  • क्वांटम विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (Quantum Science & Technology)

  • अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी (Space Technologies)

ESTIC 2025 में प्रमुख वैज्ञानिकों के व्याख्यान, पैनल चर्चाएँ, प्रस्तुतियाँ और प्रौद्योगिकी प्रदर्शनी आयोजित की जाएंगी। यह सम्मेलन शोधकर्ताओं, उद्योगों और युवा नवोन्मेषकों को सहयोग और साझेदारी का मंच प्रदान करेगा, जिससे भारत के विज्ञान और प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र को और सशक्त बनाया जा सके।

नीति आयोग द्वारा तिरुवनंतपुरम में “अनुसंधान एवं विकास को सुगम बनाने” पर 8वीं क्षेत्रीय परामर्श बैठक का सफल आयोजन

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“अनुसंधान एवं विकास को सुगम बनाने” पर 8वीं क्षेत्रीय परामर्श बैठक का आयोजन नीति आयोग द्वारा राष्ट्रीय पृथ्वी विज्ञान अध्ययन केंद्र (NCESS), तिरुवनंतपुरम में 30–31 अक्टूबर 2025 को किया गया। इस परामर्श बैठक में संस्थागत प्रमुखों, कुलपतियों तथा विभिन्न वैज्ञानिक मंत्रालयों और विभागों के वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने भारत के अनुसंधान एवं विकास पारिस्थितिकी तंत्र को सशक्त बनाने पर गहन विचार-विमर्श किया।

बैठक की शुरुआत प्रो. एन. वी. चेलापथी राव, निदेशक, NCESS के स्वागत संबोधन से हुई। उन्होंने वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए सक्षम वातावरण की आवश्यकता पर जोर दिया और यह रेखांकित किया कि क्षेत्रीय अनुसंधान संस्थान नवाचार-आधारित विकास को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके बाद प्रो. विवेक कुमार सिंह, नीति आयोग, ने बैठक की पृष्ठभूमि प्रस्तुत की और ROPE Framework – Removing Obstacles, Promoting Enablers का परिचय दिया, जो नीति आयोग की “Ease of Doing R&D” पहल का मार्गदर्शक सिद्धांत है। उन्होंने बताया कि इस रूपरेखा का उद्देश्य अनुसंधानकर्ताओं द्वारा सामना की जाने वाली संस्थागत और नीतिगत चुनौतियों की पहचान करना तथा उन्हें कम करने के लिए लचीलापन, अंतःसंस्थागत सहयोग और क्षमता वृद्धि जैसे सहायक तंत्रों को बढ़ावा देना है।

डॉ. एम. रविचंद्रन, सचिव, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने अनुसंधान की दक्षता और प्रभाव बढ़ाने के लिए कई व्यावहारिक सुझाव दिए। उन्होंने सेवानिवृत्त वैज्ञानिकों के अनुभव का उपयोग करने, विश्वविद्यालय-उद्योग-सरकार (UIG) पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने, संस्थानों के बीच डेटा साझाकरण को प्रोत्साहित करने और विज्ञान संचार को सशक्त बनाने की आवश्यकता पर बल दिया ताकि अनुसंधान के परिणाम समाज के लिए अधिक प्रासंगिक बन सकें।

डॉ. वी. के. सारस्वत, सदस्य, नीति आयोग ने अपने संबोधन में कहा कि “Ease of Doing R&D” दो प्रमुख तत्वों — आंतरिक और बाह्य कारकों — पर निर्भर करता है। आंतरिक कारक संस्थानों की संरचना, प्रशासन और कार्यप्रणाली से संबंधित हैं, जबकि बाह्य कारक नियामक अवरोधों, वित्त पोषण तंत्र और अंतःक्षेत्रीय समन्वय से जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि भारत को अनुसंधान और नवाचार के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व प्राप्त करने के लिए इन दोनों पहलुओं को समानांतर रूप से संबोधित करना आवश्यक है।

इस बैठक में केरल के राज्यपाल राजेन्द्र विश्वनाथ आर्लेकर ने मुख्य अतिथि के रूप में भाग लिया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि “Ease of Doing R&D” सीधे तौर पर नागरिकों के “Ease of Living” से जुड़ा हुआ है। उन्होंने रेखांकित किया कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी को जनकेंद्रित विकास के साथ संरेखित होना चाहिए और संस्थानों, उद्योगों तथा सरकारों के बीच सहयोगात्मक दृष्टिकोण ही समावेशी विकास की कुंजी है। राज्यपाल ने कहा कि “राज्य का विकास ही राष्ट्र के विकास का आधार है,” और क्षेत्रीय स्तर पर नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र के सुदृढ़ीकरण की आवश्यकता पर बल दिया।

दो दिवसीय इस बैठक का समापन शैक्षणिक संस्थानों, अनुसंधान प्रयोगशालाओं और सरकारी प्रतिनिधियों के बीच हुई संवादात्मक चर्चाओं और परामर्शों के साथ हुआ, जिसमें सभी ने मिलकर भारत में एक सक्षम, प्रभावी और सहयोगात्मक R&D पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण के लिए अपने सामूहिक संकल्प को दोहराया।

राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन के तहत IISc बेंगलुरु और C-MET हैदराबाद को उत्कृष्टता केंद्र के रूप में मान्यता

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खनिज मंत्रालय ने राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन (National Critical Mineral Mission - NCMM) के तहत दो और संस्थानों — भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु और सेंटर फॉर मटेरियल्स फॉर इलेक्ट्रॉनिक्स टेक्नोलॉजी (C-MET), हैदराबाद — को उत्कृष्टता केंद्र (Centres of Excellence - CoE) के रूप में मान्यता प्रदान की है। इससे पहले 7 अन्य संस्थानों को CoE के रूप में मान्यता दी जा चुकी थी। यह निर्णय 24 अक्टूबर 2025 को हुई परियोजना अनुमोदन और सलाहकार समिति (PAAC) की बैठक में लिया गया, जिसकी सह-अध्यक्षता खनिज मंत्रालय के सचिव पीयूष गोयल और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव प्रो. अभय करंदीकर ने की।

महत्वपूर्ण कच्चे खनिज (Critical Raw Materials) स्वच्छ ऊर्जा, गतिशीलता परिवर्तन, उन्नत प्रौद्योगिकी, रक्षा, अंतरिक्ष और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे उभरते क्षेत्रों की आपूर्ति श्रृंखला का अहम हिस्सा हैं। इन क्षेत्रों में संपूर्ण प्रणाली दृष्टिकोण (end-to-end systems approach) अपनाने, प्रौद्योगिकी विकसित करने, प्रदर्शित करने और लागू करने के लिए अनुसंधान एवं विकास (R&D) आवश्यक है, ताकि तकनीकी तत्परता स्तर (Technology Readiness Level – TRL) को TRL 7/8 के पायलट संयंत्र और प्री-कमर्शियल प्रदर्शन तक बढ़ाया जा सके।

ये उत्कृष्टता केंद्र देश की विज्ञान और प्रौद्योगिकी क्षमता को महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में सशक्त और उन्नत बनाने के लिए नवोन्मेषी और परिवर्तनकारी अनुसंधान करेंगे।

प्रत्येक उत्कृष्टता केंद्र ‘हब एंड स्पोक मॉडल’ (Hub & Spoke Model) पर कार्य करेगा, जिसके तहत विभिन्न संस्थानों की अनुसंधान क्षमताओं और विशेषज्ञताओं को एक मंच पर लाया जाएगा। CoE (हब संस्थान) को दिशानिर्देशों के अनुसार कम से कम दो उद्योग साझेदार और दो अनुसंधान/शैक्षणिक साझेदारों को अपने संघ (consortium) में शामिल करना अनिवार्य है।

अब तक मान्यता प्राप्त 9 उत्कृष्टता केंद्रों ने सामूहिक रूप से लगभग 90 उद्योग, शैक्षणिक एवं अनुसंधान संस्थानों को अपने ‘स्पोक्स’ के रूप में जोड़ा है।

यह पहल भारत की आत्मनिर्भरता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने के साथ-साथ महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में तकनीकी नवाचार और औद्योगिक सहयोग को भी सुदृढ़ करेगी।

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