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निजी क्षेत्र को R&D में आगे आना होगा: डॉ. जितेंद्र सिंह का आह्वान

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नई दिल्ली- केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने निजी क्षेत्र से अनुसंधान एवं विकास (R&D) गतिविधियों में अपनी भागीदारी तेज करने का आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि भारत के नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए उद्योगों की सक्रिय भागीदारी अत्यंत आवश्यक है।

नीति आयोग द्वारा R&D प्रक्रियाओं को सरल बनाने पर आधारित दो रिपोर्ट जारी करने के अवसर पर बोलते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि सरकार ने अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्रों को निजी क्षेत्र के लिए खोलने तथा RDI फंड जैसी व्यवस्थाएं बनाने सहित कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। अब उद्योगों को भी निवेश बढ़ाकर और साझेदारी के माध्यम से इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।

उन्होंने कहा कि शोध तभी फल-फूल सकता है, जब उसमें अनावश्यक बाधाएं, देरी और व्यवधान न हों। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि नीतियों का मूल्यांकन केवल उनके डिजाइन से नहीं, बल्कि शोधकर्ताओं के वास्तविक अनुभव के आधार पर होना चाहिए।

डॉ. सिंह ने कहा कि भारत में प्रतिभा की कमी नहीं है और देश के वैज्ञानिकों को वैश्विक स्तर पर पहचान मिल रही है, लेकिन संस्थागत और प्रक्रियागत जटिलताएं अभी भी प्रगति में बाधा बन रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि आज का शोध बहु-विषयक (interdisciplinary) हो गया है, जिसमें उद्योग, वित्त और वैश्विक सहयोग की अहम भूमिका है।

उन्होंने निजी क्षेत्र की सीमित भागीदारी पर चिंता जताते हुए कहा कि केवल सरकारी समर्थन से दीर्घकालिक नवाचार संभव नहीं है। उन्होंने कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) के तहत R&D में निवेश बढ़ाने और वैज्ञानिक कार्यों के लिए मजबूत सहयोग संस्कृति विकसित करने की आवश्यकता बताई।

डॉ. सिंह ने ‘वन नेशन, वन सब्सक्रिप्शन’ जैसी पहलों का उल्लेख करते हुए कहा कि ज्ञान तक आसान पहुंच शोध को गति देती है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि अनुमोदन, फंडिंग और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में छोटे-छोटे सुधार भी शोध उत्पादकता पर बड़ा प्रभाव डाल सकते हैं।

नीति आयोग के उपाध्यक्ष सुमन बेरी ने कहा कि R&D प्रक्रियाओं को आसान बनाने की पहल वैज्ञानिक समुदाय की लंबे समय से चली आ रही मांगों पर आधारित है। उन्होंने पूरे शोध चक्र में समन्वय बढ़ाने और अनावश्यक देरी को कम करने पर जोर दिया।

नीति आयोग के सदस्य वी. के. सारस्वत ने कहा कि भारत का शोध पारिस्थितिकी तंत्र एक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, जहां फंडिंग में देरी और प्रशासनिक बाधाएं अभी भी चुनौती बनी हुई हैं। उन्होंने अधिक स्वायत्तता और उद्योग-शोध के बेहतर संबंधों की आवश्यकता बताई।

प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार प्रो. ए.के. सूद ने कहा कि R&D को आसान बनाना एक सतत प्रक्रिया है और इसमें अभी भी कई सुधार की आवश्यकता है, जैसे फंडिंग सफलता दर, भर्ती और बुनियादी ढांचे से जुड़ी चुनौतियां।

नीति आयोग की रिपोर्टों में शोध प्रणाली में अधिक पारदर्शिता, लचीलापन और स्पष्टता लाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है, ताकि वैज्ञानिक अपने कार्य को बेहतर तरीके से योजना बनाकर आगे बढ़ा सकें।

अंत में डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत के शोध पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए सरकार के साथ-साथ उद्योग, संस्थान और समाज की संयुक्त भागीदारी जरूरी है। उन्होंने कहा, “विज्ञान आज इतना महत्वपूर्ण विषय है कि इसे केवल वैज्ञानिकों तक सीमित नहीं रखा जा सकता,” और सभी हितधारकों से इसमें सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।

वैज्ञानिकों की बड़ी खोज: छोटे अणुओं से उन्नत स्मार्ट मैटेरियल विकसित करने का नया तरीका

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नई दिल्ली- भारतीय वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण सफलता हासिल करते हुए यह समझ विकसित की है कि छोटे ऑर्गेनिक अणुओं (मॉलिक्यूल्स) को कैसे नियंत्रित कर उन्नत कार्यात्मक मैटेरियल तैयार किए जा सकते हैं। यह खोज भविष्य में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, ट्यून करने योग्य ऑप्टोइलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, स्मार्ट मैटेरियल और बायोइलेक्ट्रॉनिक इंटरफेस के विकास में मददगार साबित हो सकती है।

बेंगलुरु स्थित सेंटर फॉर नैनो एंड सॉफ्ट मैटर साइंसेज (CeNS) और जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च (JNCASR) के वैज्ञानिकों की संयुक्त टीम ने इस दिशा में काम किया। दोनों संस्थान विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST), भारत सरकार के अंतर्गत स्वायत्त संस्थाएं हैं।

शोध में वैज्ञानिकों ने नैफ्थलीन डाइइमाइड (NDI) नामक एक विशेष अणु का अध्ययन किया, जो एम्फीफिलिक (जल और वसा दोनों के साथ प्रतिक्रिया करने वाला) होता है। यह अणु पानी में स्वयं को एक व्यवस्थित संरचना में बदलने की क्षमता रखता है, जिसे ‘सुप्रामॉलिक्यूलर सेल्फ-असेंबली’ कहा जाता है।

अध्ययन में पाया गया कि सामान्य तापमान पर ये अणु मिलकर छोटे-छोटे गोलाकार नैनोस्ट्रक्चर (नैनोडिस्क) बनाते हैं। इन नैनोडिस्क में एक विशेष ऑप्टिकल गुण (काइरोऑप्टिकल एक्टिविटी) होता है, जिससे वे प्रकाश के साथ खास तरीके से प्रतिक्रिया करते हैं।

जब तापमान बढ़ाया जाता है, तो ये नैनोडिस्क अपनी संरचना बदलकर दो-आयामी नैनोशीट्स में परिवर्तित हो जाते हैं, और उनकी यह विशेष ऑप्टिकल क्षमता समाप्त हो जाती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि केवल तापमान के बदलाव से ही मैटेरियल के संरचनात्मक और ऑप्टिकल गुणों को बदला जा सकता है।

शोध में यह भी पाया गया कि नैनोडिस्क की विद्युत चालकता (इलेक्ट्रिकल कंडक्टिविटी) अधिक होती है, जबकि नैनोशीट्स में बदलने पर यह लगभग सात गुना तक कम हो जाती है। इसका मतलब है कि इस मैटेरियल के विद्युत गुणों को भी नियंत्रित किया जा सकता है, जो छोटे ऑर्गेनिक अणुओं में बहुत दुर्लभ माना जाता है।

यह तकनीक ऐसे स्मार्ट और अनुकूलनशील (adaptive) मैटेरियल विकसित करने का रास्ता खोलती है, जो अपने परिवेश के अनुसार खुद को बदल सकते हैं।

यह शोध हाल ही में ACS Applied Nano Materials जर्नल में प्रकाशित हुआ है। इस अध्ययन का नेतृत्व डॉ. गौतम घोष (CeNS) ने किया, उनके साथ शोध छात्र सौरव मोयरा (CeNS) और सहयोगी तारक नाथ दास (JNCASR) शामिल रहे।

यह खोज अगली पीढ़ी के सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक्स और स्मार्ट तकनीकों के विकास में नई संभावनाएं प्रदान करती है।

वैज्ञानिकों ने विकसित किया दिमाग की तरह काम करने वाला ‘न्यूरोमॉर्फिक सेंसर’, नमी के अनुसार करेगा प्रतिक्रिया

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नई दिल्ली- भारतीय वैज्ञानिकों ने एक ऐसा अत्याधुनिक ‘न्यूरोमॉर्फिक सेंसर’ विकसित किया है, जो मानव मस्तिष्क की तरह पर्यावरणीय बदलाव—विशेष रूप से नमी (ह्यूमिडिटी)—के प्रति प्रतिक्रिया दे सकता है। यह सेंसर एक ही डिवाइस में जानकारी को महसूस (sensing), प्रोसेस (processing) और संग्रहित (storage) करने में सक्षम है, जिससे पारंपरिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की तुलना में ऊर्जा खपत और डेटा प्रोसेसिंग की जरूरत काफी कम हो सकती है।

आज के समय में बढ़ती ऊर्जा खपत और डेटा प्रोसेसिंग की चुनौतियों के कारण न्यूरोमॉर्फिक इलेक्ट्रॉनिक्स का महत्व तेजी से बढ़ रहा है, खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एज कंप्यूटिंग जैसे क्षेत्रों में।

जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च (JNCASR), जो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्थान है, के शोधकर्ताओं ने यह अनोखा सेंसर विकसित किया है। यह सेंसर 1D सुप्रामॉलिक्यूलर नैनोफाइबर्स पर आधारित है और एक ही प्लेटफॉर्म पर सेंसिंग तथा ‘सिनैप्स’ जैसी सूचना प्रोसेसिंग को एकीकृत करता है।

इस शोध की प्रेरणा मेंढक—विशेष रूप से क्रिकेट फ्रॉग—के व्यवहार से ली गई है, जो नमी और प्रकाश के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होता है। इसी तरह यह सेंसर भी नमी के स्तर में बदलाव के अनुसार प्रतिक्रिया देता है और पहले के संकेतों को “याद” भी रख सकता है।

शोधकर्ताओं तेजस्विनी एस. राव और सुकन्या बरुआह ने विशेष नैनोफाइबर्स विकसित कर इस डिवाइस को तैयार किया। इसे एक नियंत्रित नमी वाले वातावरण में परीक्षण किया गया, जहां विभिन्न स्तरों की नमी पर इसके व्यवहार का अध्ययन किया गया। सेंसर ने ‘सिनैप्टिक’ प्रतिक्रियाएं जैसे फेसीलिटेशन, डिप्रेशन और मेटाप्लास्टिसिटी प्रदर्शित कीं, जो मानव मस्तिष्क की कार्यप्रणाली से मेल खाती हैं।

इस सेंसर की खास बात यह है कि यह नमी के बदलाव को महसूस करने के साथ-साथ उसी समय उसे प्रोसेस और स्टोर भी कर सकता है। यह विशेषता इसे पारंपरिक सेंसर से अलग बनाती है, जहां ये तीनों कार्य अलग-अलग घटकों में होते हैं।

शोधकर्ताओं के अनुसार, “यह पहली बार है जब किसी न्यूरोमॉर्फिक डिवाइस में नमी को मुख्य संकेत के रूप में इस्तेमाल कर सिनैप्टिक व्यवहार को प्रदर्शित किया गया है।”

भविष्य में यह तकनीक स्मार्ट पर्यावरण निगरानी प्रणालियों, हेल्थकेयर डिवाइसेस, पहनने योग्य सेंसर (wearables) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित एज कंप्यूटिंग में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। यह नवाचार ऊर्जा-कुशल और पर्यावरण के अनुकूल अगली पीढ़ी की तकनीकों के विकास में भी मददगार साबित होगा।

भारतीय वैज्ञानिकों ने बिना बाहरी सहायता के स्वयं-उपचार करने वाले ऑर्गेनिक क्रिस्टल की खोज की

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भारतीय वैज्ञानिकों ने हाल ही में परतदार संरचना वाले ऑर्गेनिक क्रिस्टल में एक अनोखी स्वयं-उपचार (Self-Healing) क्षमता की खोज की है, जिसमें किसी भी बाहरी उत्तेजना की आवश्यकता नहीं होती। यह खोज ऐसे उन्नत पदार्थों के विकास में सहायक हो सकती है, जो तकनीकी उपयोगों में ऊर्ध्वाधर भार (Vertical Load) को सहन कर सकें।

वर्तमान में उपलब्ध अधिकांश स्वयं-उपचार तकनीकें प्रकाश, ताप या किसी रासायनिक माध्यम जैसे बाहरी कारकों पर निर्भर करती हैं, जिससे उनका उपयोग सीमित हो जाता है, विशेषकर उन परिस्थितियों में जहां बाहरी हस्तक्षेप संभव नहीं होता। स्वायत्त (Autonomous) स्वयं-उपचार के लिए आमतौर पर पॉलिमर, हाइड्रोजेल और कॉम्पोजिट्स में क्रॉस-लिंकिंग या हीलिंग एजेंट्स का उपयोग किया जाता है, लेकिन क्रिस्टलीय पदार्थों में यह प्रभावी नहीं होता क्योंकि उपचार के बाद उनकी संरचना (क्रिस्टैलिनिटी) को पुनः स्थापित करना अत्यंत आवश्यक होता है।

आईआईटी इंदौर (भौतिकी विभाग, प्रो. राजेश कुमार के नेतृत्व में), आईआईटी हैदराबाद (रसायन विज्ञान विभाग, प्रो. सी. मल्ला रेड्डी के नेतृत्व में) और विद्युत अभियांत्रिकी विभाग (प्रो. वरुण रघुनाथन के नेतृत्व में) के वैज्ञानिकों की टीम ने पाया कि परतदार संरचना वाले लचीले ऑर्गेनिक क्रिस्टल में माइक्रोन स्तर की बड़ी दरारें कुछ ही मिलीसेकंड में स्वतः ठीक हो सकती हैं। यह प्रक्रिया माइक्रोस्ट्रक्चर स्तर पर “सिमेट्री ब्रेकिंग” नामक एक नई प्रणाली के माध्यम से होती है, जिसकी पुष्टि रमन स्पेक्ट्रो-माइक्रोस्कोपी तकनीक से की गई। यह सुविधा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) की FIST योजना के अंतर्गत समर्थित है।

इस शोध में रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी ने उपचार प्रक्रिया के सटीक तंत्र को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह कार्य डॉ. ईशिता घोष, डॉ. रबीन्द्र बिस्वास, डॉ. मनुश्री तनवर, डॉ. सुरोजित भुनिया, डॉ. कौस्तव दास और डॉ. अमित मोंडल सहित शोधकर्ताओं के सहयोग से किया गया, जिसे वर्ष 2026 में ‘नेचर कम्युनिकेशंस’ में प्रकाशित किया गया है।

यह अध्ययन जीवित ऊतकों में होने वाली स्वयं-उपचार प्रक्रियाओं को समझने और उनके आधार पर स्मार्ट मैटेरियल विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

राष्ट्रीय विज्ञान पुरस्कार 2026 के लिए नामांकन शुरू, वैज्ञानिकों को मिलेगा बड़ा सम्मान

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नई दिल्ली- भारत सरकार ने राष्ट्रीय विज्ञान पुरस्कार (Rashtriya Vigyan Puraskar - RVP) 2026 के लिए नामांकन आमंत्रित किए हैं। यह प्रतिष्ठित पुरस्कार विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने वाले वैज्ञानिकों, तकनीकी विशेषज्ञों और नवप्रवर्तकों को सम्मानित करने के लिए दिया जाता है।

इन पुरस्कारों का संचालन सीएसआईआर (CSIR) के अंतर्गत RVP सचिवालय द्वारा किया जाता है, जिसकी अध्यक्षता भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार करते हैं।

पुरस्कार की श्रेणियां

RVP-2026 के तहत चार प्रमुख श्रेणियों में पुरस्कार दिए जाएंगे:

  • विज्ञान रत्न (Vigyan Ratna): जीवन भर के उत्कृष्ट योगदान के लिए

  • विज्ञान श्री (Vigyan Shri): विशेष योगदान के लिए

  • विज्ञान युवा-शांति स्वरूप भटनागर (VY-SSB): 45 वर्ष तक के युवा वैज्ञानिकों के लिए

  • विज्ञान टीम (Vigyan Team): 3 या अधिक सदस्यों की टीम को

 किस-किस क्षेत्र में नामांकन?

नामांकन कई क्षेत्रों में आमंत्रित हैं, जैसे:

  • कृषि विज्ञान

  • परमाणु ऊर्जा

  • जैव विज्ञान

  • रसायन विज्ञान

  • रक्षा प्रौद्योगिकी

  • पृथ्वी विज्ञान

  • इंजीनियरिंग

  • पर्यावरण विज्ञान

  • गणित एवं कंप्यूटर विज्ञान

  • चिकित्सा

  • भौतिकी

  • अंतरिक्ष विज्ञान

  • तकनीक एवं नवाचार

आवेदन प्रक्रिया

  • आवेदन ऑनलाइन किए जा सकते हैं

  • पोर्टल: https://awards.gov.in

  • शुरुआत: 28 मार्च 2026

  • अंतिम तिथि: 11 मई 2026

  •  स्व-नामांकन (Self-nomination) भी स्वीकार्य है

सरकार का दृष्टिकोण

केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि यह पुरस्कार भारत में वैज्ञानिक उत्कृष्टता और नवाचार की संस्कृति को बढ़ावा देने का प्रतीक है। उन्होंने संस्थानों और व्यक्तियों से योग्य उम्मीदवारों को नामांकित करने की अपील की।

यह पहल भारत को ‘विकसित भारत’ और वैश्विक ज्ञान नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।


राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने उत्तराखंड के नैनीताल में कुमाऊँ विश्वविद्यालय के 20वें दीक्षांत समारोह में की शिरकत

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 भारत की राष्ट्रपति, द्रौपदी मुर्मु ने आज (4 नवम्बर, 2025) उत्तराखंड के नैनीताल में आयोजित कुमाऊँ विश्वविद्यालय के 20वें दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की।

इस अवसर पर संबोधित करते हुए, राष्ट्रपति ने कहा कि शिक्षा किसी भी राष्ट्र के विकास की नींव होती है। इसलिए शिक्षा का उद्देश्य केवल विद्यार्थियों की बौद्धिक क्षमता और कौशल का विकास करना नहीं, बल्कि उनके नैतिक बल और चरित्र को भी सशक्त बनाना होना चाहिए।

राष्ट्रपति ने कहा कि शिक्षा हमें आत्मनिर्भर बनाती है, साथ ही यह हमें विनम्र बनना और समाज एवं देश के विकास में योगदान देना भी सिखाती है। उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे अपनी शिक्षा को वंचित वर्गों की सेवा और राष्ट्र निर्माण के कार्य में समर्पित करें। उन्होंने कहा कि यही सच्चा धर्म है, जो उन्हें संतोष और खुशी प्रदान करेगा।

राष्ट्रपति ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। सरकार निरंतर प्रगति सुनिश्चित करने के लिए कई नीतिगत पहल कर रही है। इन पहलों से युवाओं के लिए अनेक अवसर पैदा हो रहे हैं। उच्च शिक्षण संस्थानों को चाहिए कि वे युवाओं को इन अवसरों का लाभ उठाने के लिए प्रोत्साहित करें।

राष्ट्रपति ने कहा कि देश में अनुसंधान, नवाचार और उद्यमिता को बढ़ावा देना अत्यंत आवश्यक है। उन्हें यह जानकर प्रसन्नता हुई कि कुमाऊँ विश्वविद्यालय शिक्षा, अनुसंधान और नवाचार में उत्कृष्टता के प्रति प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि शिक्षा और अनुसंधान के प्रभावी उपयोग के लिए बहुविषयक (multidisciplinary) दृष्टिकोण आवश्यक है। उन्हें विश्वास है कि विश्वविद्यालय इस दिशा में निरंतर प्रगति करेगा।

राष्ट्रपति ने कहा कि हिमालय जीवनदायिनी संसाधनों के लिए प्रसिद्ध हैं। इन संसाधनों का संरक्षण और संवर्धन करना हम सभी की जिम्मेदारी है। उन्हें यह जानकर प्रसन्नता हुई कि कुमाऊँ विश्वविद्यालय पर्यावरण संरक्षण की दिशा में सजग प्रयास कर रहा है।

राष्ट्रपति ने कहा कि एक शैक्षणिक संस्थान के रूप में कुमाऊँ विश्वविद्यालय की सामाजिक जिम्मेदारियाँ भी हैं। उन्होंने विश्वविद्यालय के शिक्षकों और विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे आसपास के गांवों का दौरा करें, वहाँ की समस्याओं को समझें और यथासंभव उनके समाधान के लिए कार्य करें।

राष्ट्रपति ने कहा कि भारत को वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। कुमाऊँ विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों के युवा इस लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे। उन्हें विश्वास है कि अपनी प्रतिभा और समर्पण के बल पर वे इस भूमिका को सफलतापूर्वक निभाएँगे।

इससे पूर्व, राष्ट्रपति ने नैना देवी मंदिर, नैनीताल में पूजा-अर्चना की तथा श्री नीम करौली बाबा आश्रम, कैंची धाम में दर्शन भी किए।

कोल इंडिया और IIT मद्रास मिलकर बनाएंगे “सस्टेनेबल एनर्जी सेंटर”: भारत के स्वच्छ ऊर्जा भविष्य की दिशा में ऐतिहासिक कदम

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कोल इंडिया लिमिटेड (CIL) ने बुधवार को भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास (IIT मद्रास) के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके तहत IIT मद्रास में “सस्टेनेबल एनर्जी सेंटर” (Centre for Sustainable Energy) की स्थापना की जाएगी। इस समझौते पर सीआईएल के निदेशक (तकनीकी) अच्युत घाटक और IIT मद्रास के निदेशक वी. कामकोटि ने हस्ताक्षर किए। इस अवसर पर सीआईएल के अध्यक्ष पी. एम. प्रसाद, साथ ही दोनों संस्थानों के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

यह केंद्र सतत ऊर्जा प्रौद्योगिकियों (Sustainable Energy Technologies) में अत्याधुनिक अनुसंधान एवं विकास (R&D) और क्षमता निर्माण पहलों का एक प्रमुख केंद्र होगा। CIL द्वारा वित्तपोषित और उसके रणनीतिक विविधीकरण लक्ष्यों के अनुरूप, यह केंद्र कोयला खदानों के पुनःउपयोग, निम्न-कार्बन प्रौद्योगिकियों के विकास, और भारत के स्वच्छ ऊर्जा भविष्य में कोयले को एक मूल्यवान फीडस्टॉक के रूप में पुनर्परिभाषित करने के समाधान विकसित करने पर केंद्रित रहेगा। यह साझेदारी देश की नेट-जीरो (Net-Zero) 2070 की महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए स्वदेशी अनुसंधान, नवाचार और तकनीकी विकास के माध्यम से भारत की ऊर्जा परिवर्तन यात्रा में नेतृत्व करने की साझा प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

इस अवसर पर बोलते हुए, सीआईएल के अध्यक्ष पी. एम. प्रसाद ने कहा कि कोल इंडिया एक ऊर्जा प्रदाता से भारत की स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण यात्रा का एक प्रमुख सक्षमकर्ता बनने की दिशा में परिवर्तन कर रहा है। उन्होंने कहा, “यह समझौता कोल इंडिया की सतत विकास यात्रा में एक ऐतिहासिक कदम है। IIT मद्रास के साथ इस सहयोग के माध्यम से, कोल इंडिया ऊर्जा सुरक्षा, डीकार्बोनाइजेशन और सामाजिक-आर्थिक प्रगति सुनिश्चित करने के लिए स्वदेशी समाधान विकसित करने का लक्ष्य रखता है।”

IIT मद्रास के निदेशक वी. कामकोटि ने कहा कि उद्योग–शैक्षणिक सहयोग IIT मद्रास की यात्रा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है, जो भारत को निम्न-कार्बन अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर करने में मदद कर रहा है। उन्होंने कहा, “कोल इंडिया के साथ यह साझेदारी हमारे इस मिशन के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती है। हम मिलकर ऐसे स्केलेबल और प्रभावशाली समाधान विकसित करेंगे जो भारत के सतत ऊर्जा भविष्य का समर्थन करें।”

यह केंद्र मानव संसाधन विकास में भी योगदान देगा, जिसमें पीएचडी, पोस्टडॉक्टरल और इंटर्नशिप कार्यक्रम शामिल होंगे, ताकि शोधकर्ताओं और इंजीनियरों की नई पीढ़ी को भारत के हरित ऊर्जा परिवर्तन का नेतृत्व करने के लिए तैयार किया जा सके।

ब्लैक होल की गतिविधियाँ रोकती हैं नए तारों का जन्म: भारतीय खगोलविदों का महत्वपूर्ण अध्ययन

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ब्लैक होल की गतिविधियाँ उसके आसपास नए तारों के जन्म को दबा सकती हैं — एक हालिया अध्ययन में यह खुलासा हुआ है। यह खोज ब्रह्मांड में आकाशगंगाओं के विकास की गहरी समझ प्रदान कर सकती है और यह भी समझाने में मदद कर सकती है कि कुछ आकाशगंगाओं में तारा-निर्माण की दर इतनी कम क्यों होती है।

गैलेक्‍सी के केंद्र में मौजूद अति-द्रव्यमान वाले ब्लैक होल गैस के प्रवाह (outflows) को बाहर फेंकते हैं। खगोलविद लंबे समय से अध्ययन कर रहे हैं कि ये गैस प्रवाह और विकिरण (radiation) कैसे मिलकर आकाशगंगाओं के विकास को प्रभावित करते हैं। अब तक यह समझना एक बड़ी पहेली रहा है कि गैस प्रवाह और ब्लैक होल से निकलने वाले विकिरण का सापेक्ष प्रभाव आकाशगंगाओं के विकास पर कितना होता है।

भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (Indian Institute of Astrophysics – IIA), जो विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) का एक स्वायत्त संस्थान है, के खगोलविदों के नेतृत्व में किए गए एक नए अध्ययन ने इन शक्तिशाली प्रक्रियाओं पर नई रोशनी डाली है। अध्ययन से पता चला है कि ब्लैक होल के आसपास की तीव्र विकिरण और उनसे निकलने वाले उच्च गति के जेट (jets) दोनों मिलकर आकाशगंगा के केंद्र से गैस को बाहर निकाल सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप आकाशगंगा के केंद्रीय क्षेत्रों में तारा निर्माण लगभग बंद हो जाता है, जिससे उसकी वृद्धि नियंत्रित होती है।

अंतरराष्ट्रीय खगोलीय वेधशालाओं जैसे Sloan Digital Sky Survey (SDSS) टेलीस्कोप (ऑप्टिकल तरंगदैर्घ्य) और Very Large Array (VLA) रेडियो टेलीस्कोप (रेडियो तरंगदैर्घ्य) से प्राप्त आंकड़ों का उपयोग करते हुए वैज्ञानिकों ने लगभग 500 निकटवर्ती आकाशगंगाओं का अध्ययन किया जिनके केंद्रों में सक्रिय गैलेक्टिक नाभिक (Active Galactic Nuclei – AGN) मौजूद हैं। AGN वे ऊर्जावान क्षेत्र हैं जहाँ ब्लैक होल के आसपास गिरता हुआ पदार्थ अत्यधिक विकिरण और गैस उत्पन्न करता है।

अध्ययन की मुख्य लेखिका और IIA की पीएच.डी. छात्रा पायल नंदी बताती हैं —

“हमने पाया कि आयनित गैस के प्रवाह (outflows) AGN में बहुत आम हैं। हालांकि इनका प्रमुख कारण ब्लैक होल से निकलने वाला विकिरण है, लेकिन जिन आकाशगंगाओं में रेडियो जेट हैं, उनमें ये प्रवाह और भी तेज़ तथा ऊर्जावान पाए गए।”

शोध में यह भी पता चला कि रेडियो तरंगदैर्घ्य पर देखी जाने वाली आकाशगंगाओं में इन गैस प्रवाहों की उपस्थिति 56% मामलों में पाई गई, जबकि जिन आकाशगंगाओं में रेडियो उत्सर्जन नहीं था, उनमें यह केवल 25% थी। ये गैस प्रवाह 2000 किलोमीटर प्रति सेकंड तक की गति से चल सकते हैं — इतनी तेज़ कि वे पूरी आकाशगंगा के गुरुत्वाकर्षण से भी बच निकलें।

एक रूपरेखा जो दर्शाती है कि जेट और विकिरण दोनों वाले AGN, केवल विकिरण से संचालित AGN की तुलना में अधिक शक्तिशाली गैस प्रवाह उत्पन्न करते हैं, जिससे उनकी मेजबान आकाशगंगाओं पर अलग-अलग प्रभाव पड़ते हैं।

IIA के वैज्ञानिक सी. एस. स्टालिन, जो अध्ययन के सह-लेखक हैं, ने कहा —

“यह अध्ययन यह दिखाता है कि आकाशगंगाओं के विकास को समझने के लिए बहु-तरंगदैर्घ्य (multi-wavelength) डेटा को साथ में उपयोग करना कितना आवश्यक है।”

वैज्ञानिकों ने पाया कि इन गैस प्रवाहों की ऊर्जा का संबंध ब्लैक होल की कुल चमक (luminosity) से गहराई से जुड़ा है। विशेष रूप से उन आकाशगंगाओं में जिनमें रेडियो जेट मौजूद हैं, यह संबंध और भी मजबूत है। इसका अर्थ यह है कि जेट मुख्य कारण नहीं हैं, लेकिन वे ब्लैक होल से निकलने वाली ऊर्जा को “बूस्ट” कर अधिक गैस बाहर निकालने में मदद करते हैं।

सह-लेखक ध्रुबा जे. साइकिया (IUCAA) ने कहा —

“ये निष्कर्ष सुपरमैसिव ब्लैक होल, रेडियो जेट, तारा निर्माण और आकाशगंगा के विकास के बीच के जटिल संबंधों को समझने में एक महत्वपूर्ण कदम हैं।”

अध्ययन में यह भी पाया गया कि इन गैस प्रवाहों के कारण आकाशगंगाओं के केंद्र में तारा निर्माण लगभग पूरी तरह बंद हो गया है। ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड अवलोकनों से यह पुष्टि की गई कि ये हवाएँ ब्लैक होल की गतिविधि से संचालित हैं, न कि नए तारों के बनने से।

इस प्रकार, यह अध्ययन तथाकथित निगेटिव AGN फीडबैक (negative AGN feedback) को दर्शाता है — यानी ब्लैक होल की गतिविधियाँ अपने आसपास नए तारों के बनने को रोक देती हैं।

यह अध्ययन The Astrophysical Journal में प्रकाशित हुआ है और यह ब्रह्मांड में आकाशगंगाओं के विकास की प्रक्रिया को समझने में एक महत्वपूर्ण योगदान है। यह दिखाता है कि ब्रह्मांड के सबसे रहस्यमय पिंड — सुपरमैसिव ब्लैक होल — भी अपने आसपास के तारों और आकाशगंगाओं के भाग्य को आकार देने में गहरा प्रभाव डालते हैं।

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