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CSIR-NIScPR ने ‘विज्ञान संचार और उभरते रुझान’ पर दो दिवसीय कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया

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सीएसआईआर-राष्ट्रीय विज्ञान संचार एवं नीति अनुसंधान संस्थान (CSIR-NIScPR), नई दिल्ली ने 4–5 अगस्त 2026 को CSIR इंटीग्रेटेड स्किल इनिशिएटिव (फेज-III) के अंतर्गत ‘विज्ञान संचार और उभरते रुझान’ विषय पर दो दिवसीय कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम का सफल आयोजन किया।

संस्थान के प्रशिक्षण प्रभाग द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में देशभर के विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, शैक्षणिक संगठनों, मीडिया और उद्योग जगत से 30 प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। प्रशिक्षण को अनुभव-आधारित (Experiential Learning) बनाया गया, जिसमें विशेषज्ञ व्याख्यान, संवादात्मक चर्चाएं और व्यावहारिक सत्रों के माध्यम से आधुनिक विज्ञान संचार और उभरती प्रौद्योगिकियों की व्यापक जानकारी दी गई।

विज्ञान संचार में जिम्मेदारी और एआई की बढ़ती भूमिका पर जोर

कार्यक्रम का उद्घाटन CSIR-NIScPR की निदेशक डॉ. गीता वाणी रायसम ने किया। उन्होंने प्रतिभागियों को प्रशिक्षण में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करते हुए कहा कि संस्थान लंबे समय से देश में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने और विज्ञान संचार को मजबूत करने के लिए कार्य कर रहा है।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में जिम्मेदार विज्ञान संचार, डिजिटल प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की भूमिका लगातार बढ़ रही है, जिससे वैज्ञानिक जानकारी को अधिक विश्वसनीय, प्रभावी और व्यापक बनाया जा सकता है।

विज्ञान और समाज के बीच सेतु है विज्ञान संचार

CSIR-NIScPR के प्रशिक्षण प्रभाग के प्रमुख मुकेश ए. पुंड ने स्वागत भाषण में कहा कि विज्ञान संचार वैज्ञानिक अनुसंधान और समाज के बीच की दूरी को कम करने का प्रभावी माध्यम बन चुका है।

कार्यक्रम की नोडल प्रधान अन्वेषक (PI) मीताली भारती ने प्रशिक्षण के उद्देश्यों से प्रतिभागियों को अवगत कराया और पूरे कार्यक्रम का संचालन किया। वहीं पाठ्यक्रम समन्वयक डॉ. परमानंद बर्मन ने प्रशिक्षण की रूपरेखा प्रस्तुत की तथा शैक्षणिक सत्रों का संचालन किया।

आधुनिक विज्ञान संचार के विभिन्न पहलुओं पर हुआ प्रशिक्षण

दो दिवसीय प्रशिक्षण में प्रतिभागियों को विज्ञान संचार के विभिन्न समकालीन विषयों पर विस्तृत जानकारी दी गई। इनमें—

  • विज्ञान संचार की मूल अवधारणाएं एवं विभिन्न प्रारूप

  • श्रोताकेंद्रित संचार रणनीतियां

  • व्यवहारिक विज्ञान (Behavioural Insights)

  • सोशल मीडिया प्रबंधन

  • पॉडकास्ट निर्माण

  • इन्फोग्राफिक्स और लघु वीडियो तैयार करना

  • विज्ञान संचार में एआई आधारित ऐप्स का उपयोग

  • नैतिकता एवं पेशेवर जिम्मेदारियां

  • विज्ञान संचार में उभरते करियर अवसर

जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल रहे।

विशेषज्ञों ने साझा किए अनुभव

कार्यक्रम में डॉ. हेमांसी और प्रियंका (अशोका विश्वविद्यालय), डॉ. परमानंद बर्मन, डॉ. वी. वी. बिनॉय (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज़, बेंगलुरु), डॉ. एच. एस. सुधीरा (निदेशक, गुब्बी लैब्स), डॉ. मेहर वान तथा CSIR-NIScPR के संकाय सदस्यों ने विशेषज्ञ व्याख्यान दिए।

प्रशिक्षण की प्रभावशीलता का आकलन करने के लिए प्रतिभागियों की अपेक्षाओं, सीखने के परिणामों और अनुभवों का मूल्यांकन पूर्व एवं पश्चात प्रशिक्षण सर्वेक्षण के माध्यम से किया गया।

प्रतिभागियों को प्रदान किए गए प्रमाणपत्र

समापन सत्र में मुकेश ए. पुंड और मीताली भारती ने प्रतिभागियों को सफलतापूर्वक प्रशिक्षण पूरा करने पर बधाई दी और उनसे अपने-अपने संस्थानों में साक्ष्य-आधारित एवं जिम्मेदार विज्ञान संचार को बढ़ावा देने के लिए अर्जित ज्ञान और कौशल का उपयोग करने का आह्वान किया।

CSIR इंटीग्रेटेड स्किल इनिशिएटिव के सह-प्रधान अन्वेषक सलीम अंसारी ने प्रशिक्षण कार्यक्रम का समन्वय किया। कार्यक्रम के सफल समापन पर सभी प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र प्रदान किए गए।


राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस-2026: वैज्ञानिक सोच और नवाचार से सतत विकास का संकल्प

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33 जिलों के जिला समन्वयकों एवं रिसोर्स शिक्षकों का राज्य स्तरीय उन्मुखीकरण सम्पन्न

'साइंस एंड इनोवेशन फॉर सस्टेनेबिलिटी' विषय पर स्थानीय समस्याओं के वैज्ञानिक समाधान विकसित करने पर जोर

रायपुर- विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, छत्तीसगढ़ शासन तथा छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (सीकॉस्ट) द्वारा राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार के सहयोग से आयोजित 32वीं राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस-2026 के अंतर्गत जिला समन्वयकों एवं रिसोर्स शिक्षकों के लिए एक दिवसीय राज्य स्तरीय उन्मुखीकरण कार्यशाला का आयोजन शुक्रवार को रीजनल साइंस सेंटर, रायपुर में किया गया। 

कार्यशाला का उद्देश्य प्रदेशभर के शिक्षकों एवं जिला समन्वयकों को राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस की नई थीम, परियोजना निर्माण प्रक्रिया, वैज्ञानिक अनुसंधान पद्धति तथा मूल्यांकन प्रणाली से अवगत कराना था, ताकि अधिकाधिक विद्यार्थी स्थानीय समस्याओं पर आधारित वैज्ञानिक परियोजनाएं तैयार कर राष्ट्रीय स्तर तक अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर सकें। कार्यशाला का आयोजन प्रमुख सचिव, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग सोनमणी बोरा तथा महानिदेशक, छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद एवं रीजनल साइंस सेंटर प्रशांत कविश्वर के मार्गदर्शन में किया गया।

विद्यार्थियों को विज्ञान एवं अनुसंधान से जोड़ने का महत्वपूर्ण मंच

राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस देश का एक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक कार्यक्रम है, जो 10 से 17 वर्ष आयु वर्ग के विद्यार्थियों को विज्ञान एवं अनुसंधान से जोड़ने का महत्वपूर्ण मंच प्रदान करता है। इस कार्यक्रम के माध्यम से विद्यार्थी वैज्ञानिक पद्धति अपनाते हुए स्थानीय समस्याओं की पहचान करते हैं, आंकड़ों का संग्रह एवं विश्लेषण करते हैं तथा नवाचार आधारित समाधान प्रस्तुत करते हैं। ब्लॉक, जिला एवं राज्य स्तर पर चयनित बाल वैज्ञानिक राष्ट्रीय स्तर पर अपने राज्य का प्रतिनिधित्व करते हैं।

विद्यार्थियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, अनुसंधान क्षमता और नवाचार आधारित सोच विकसित करना

इस अवसर पर छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के वैज्ञानिक 'ई' एवं राज्य समन्वयक डॉ. जे. के. राय, वैज्ञानिक 'डी' डॉ. ए. के. पाठक, वैज्ञानिक 'डी' डॉ. अमित दुबे, राज्य अकादमिक समन्वयक प्रो. (डॉ.) केशव कांत साहू तथा वनस्पति विज्ञान के वरिष्ठ शिक्षाविद डॉ. वी. के. कानूनगो कार्यक्रम में शामिल हुए। सभी वक्ताओं ने राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस-2026 की थीम "साइंस एंड इनोवेशन फॉर सस्टेनेबिलिटी" की प्रासंगिकता पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि आज की सबसे बड़ी आवश्यकता विद्यार्थियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, अनुसंधान क्षमता और नवाचार आधारित सोच विकसित करना है। उन्होंने शिक्षकों एवं जिला समन्वयकों से आग्रह किया कि वे विद्यार्थियों को अपने आसपास की समस्याओं की वैज्ञानिक पहचान कर व्यावहारिक समाधान विकसित करने के लिए प्रेरित करें।

राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस की रूपरेखा और परियोजना निर्माण की जानकारी

कार्यशाला में राज्य समन्वयक डॉ. जे. के. राय ने राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस-2026 की संपूर्ण रूपरेखा, पात्रता, परियोजना निर्माण की प्रक्रिया, अनुसंधान पद्धति, दस्तावेजीकरण, प्रस्तुतीकरण एवं मूल्यांकन प्रणाली की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वैज्ञानिक परियोजनाएं केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित न रहकर स्थानीय आवश्यकताओं एवं समाजोपयोगी विषयों पर आधारित होनी चाहिए, जिससे विद्यार्थियों में वैज्ञानिक सोच के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व भी विकसित हो।

स्थानीय समस्याओं पर आधारित परियोजनाओं को मिलेगा बढ़ावा

तकनीकी सत्र में विशेषज्ञों ने इस वर्ष की थीम के विभिन्न उपविषयों पर विस्तृत प्रस्तुतियां दीं। इनमें R5 तकनीक (Reduce, Reuse, Recover, Redesign एवं Recycle) के माध्यम से कचरा प्रबंधन, E4 मॉडल (Explore, Experiment, Enhance एवं Evolve) के जरिए ऊर्जा संरक्षण एवं नवाचार, जल संचयन, पुनर्चक्रण एवं संरक्षण, तथा खाद्य, कृषि एवं स्वास्थ्य की स्थिरता के लिए भारतीय ज्ञान प्रणालियों के उपयोग जैसे विषय शामिल रहे। विशेषज्ञों ने बताया कि इन विषयों पर विद्यार्थियों द्वारा स्थानीय समस्याओं के समाधान आधारित उत्कृष्ट वैज्ञानिक परियोजनाएं विकसित की जा सकती हैं।मिशन लाइफ़ की भावना से जोड़ने का आह्वान

राज्य अकादमिक समन्वयक प्रो. (डॉ.) केशव कांत साहू ने राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस की थीम और उसके विभिन्न उपविषयों का विस्तार से परिचय देते हुए कहा कि विद्यार्थियों को केवल वैज्ञानिक जानकारी देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें अनुसंधान, डेटा संग्रहण, विश्लेषण एवं समाधान आधारित सोच के लिए प्रेरित करना भी आवश्यक है। उन्होंने मार्गदर्शकों को वैज्ञानिक लेखन, परियोजना प्रस्तुतीकरण तथा मूल्यांकन के मानकों से अवगत कराते हुए Mission LiFE की भावना के अनुरूप अधिकाधिक विद्यार्थियों की सहभागिता सुनिश्चित करने का आह्वान किया।

R5 तकनीक से पर्यावरण संरक्षण का संदेश

डॉ. वी. के. कानूनगो ने अपने व्याख्यान में R5 सिद्धांतों की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग, अपशिष्ट में कमी, पुनः उपयोग, पुनः डिज़ाइन तथा पुनर्चक्रण की अवधारणा को अपनाकर प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण किया जा सकता है। उन्होंने विद्यार्थियों को पर्यावरण संरक्षण के लिए दैनिक जीवन में इन सिद्धांतों को अपनाने के लिए प्रेरित किया।

ऊर्जा संरक्षण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर विशेष जोर

राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) रायपुर के सहायक प्राध्यापक डॉ. आयुष खरे ने ऊर्जा के क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते उपयोग पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि एआई आधारित तकनीकों के माध्यम से ऊर्जा दक्षता बढ़ाने, संसाधनों के बेहतर प्रबंधन तथा स्वच्छ ऊर्जा प्रणालियों के विकास को नई दिशा मिल रही है। उन्होंने विद्यार्थियों से ऊर्जा क्षेत्र में नवाचार आधारित अनुसंधान करने का आह्वान किया।

वैज्ञानिक परियोजनाओं को प्रोत्साहित करने का आग्रह

वहीं, प्रो. नमिता ब्राह्मे ने ऊर्जा संरक्षण, नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों तथा ऊर्जा दक्ष तकनीकों को सतत विकास की आधारशिला बताते हुए शिक्षकों से विद्यालय स्तर पर ऊर्जा ऑडिट, एलईडी अध्ययन, सौर कुकर एवं अन्य वैज्ञानिक परियोजनाओं को प्रोत्साहित करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक विद्यार्थी को "एनर्जी एम्बेसडर" बनकर समाज में ऊर्जा संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलानी चाहिए।

प्रदेशभर के शिक्षक होंगे वैज्ञानिक प्रतिभाओं के मार्गदर्शक

कार्यशाला में प्रदेश के सभी 33 जिलों से जिला समन्वयकों एवं रिसोर्स शिक्षकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। प्रशिक्षण के माध्यम से उन्हें राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस-2026 के सफल आयोजन तथा अधिक से अधिक बाल वैज्ञानिकों को शोध एवं नवाचार आधारित परियोजनाओं से जोड़ने के लिए आवश्यक मार्गदर्शन प्रदान किया गया। आगामी राज्य स्तरीय बाल विज्ञान कांग्रेस में प्रदेशभर से चयनित बाल वैज्ञानिक अपनी शोध परियोजनाओं का प्रदर्शन करेंगे, जिनमें उत्कृष्ट प्रतिभागी राष्ट्रीय स्तर पर छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व करेंगे। कार्यशाला में छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद एवं रीजनल साइंस सेंटर के वैज्ञानिकों एवं अधिकारियों की भी सक्रिय सहभागिता रही।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने विज्ञान मंत्रालयों की उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की, वैज्ञानिक संस्थानों के बीच समन्वय पर दिया जोर

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मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज भारत सरकार के विज्ञान मंत्रालयों एवं विभागों के सचिवों तथा वरिष्ठ अधिकारियों की उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की। उन्होंने राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को तेजी से पूरा करने के लिए वैज्ञानिक संस्थानों के बीच निर्बाध समन्वय पर बल दिया।

10 से 19 सितंबर 2026 तक आयोजित होने वाले राष्ट्रव्यापी तटीय स्वच्छता अभियान 'स्वच्छ सागर, सुरक्षित सागर' की तैयारियों की समीक्षा करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि अधिकतम राष्ट्रीय प्रभाव सुनिश्चित करने के लिए वैज्ञानिक संस्थानों को तकनीकी नवाचार, जनभागीदारी और अंतर-विभागीय सहयोग के साथ मिलकर कार्य करना होगा।

नई दिल्ली स्थित सीएसआईआर- विज्ञान केंद्र में आयोजित इस बैठक में भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार प्रो. अजय कुमार सूद, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के सचिव प्रो. उमेश वी. वाघमारे, जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) के सचिव डॉ. राजेश एस. गोखले, वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान विभाग (डीएसआईआर) तथा पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (एमओईएस) की सचिव डॉ. एन. कलैसेल्वी सहित संबंधित वैज्ञानिक विभागों एवं संस्थानों के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

पिछली समन्वय बैठक में लिए गए निर्णयों पर की गई कार्रवाई की समीक्षा करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि वैज्ञानिक विभागों को अलग-अलग संस्थानों के रूप में नहीं, बल्कि एकीकृत वैज्ञानिक पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में कार्य करना चाहिए। उन्होंने कहा कि मंत्रालयों के बीच नियमित संवाद, ज्ञान का आदान-प्रदान, संयुक्त पहल और समन्वित कार्यान्वयन से नवाचार को गति मिलेगी, सुशासन मजबूत होगा तथा वैज्ञानिक उपलब्धियों का लाभ सीधे नागरिकों तक पहुंचेगा।

बैठक का प्रमुख विषय 10 से 19 सितंबर 2026 तक देशभर के समुद्री तटों पर आयोजित होने वाला 'स्वच्छ सागर, सुरक्षित सागर' अभियान रहा। मंत्री ने इस राष्ट्रव्यापी पहल की जनजागरूकता रणनीति एवं तैयारियों की समीक्षा की। इस अभियान का उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण को जनजागरूकता एवं सामुदायिक भागीदारी के साथ जोड़ना है। इस अभियान में वैज्ञानिक संस्थान, सरकारी एजेंसियां, स्वयंसेवी संगठन, शैक्षणिक संस्थान तथा स्थानीय समुदाय व्यापक स्तर पर भागीदारी करेंगे।

बैठक में विभिन्न विज्ञान मंत्रालयों की संचार रणनीति की भी समीक्षा की गई, ताकि पिछले 12 वर्षों, विशेषकर वर्तमान सरकार के पिछले दो वर्षों की वैज्ञानिक उपलब्धियों को व्यापक स्तर पर लोगों तक पहुंचाया जा सके। विभागों ने वीडियो, वृत्तचित्र, विषयगत अभियान, इन्फोग्राफिक्स, सफलता की कहानियों तथा जनसंपर्क कार्यक्रमों के माध्यम से डिजिटल पहुंच को मजबूत करने की योजनाएं प्रस्तुत कीं।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) ने अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (एएनआरएफ), राष्ट्रीय क्वांटम मिशन, राष्ट्रीय अंतर्विषयक साइबर-भौतिक प्रणाली मिशन, अनुसंधान विकास एवं नवाचार योजना सहित विभिन्न प्रमुख राष्ट्रीय कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार की रणनीति प्रस्तुत की। जनभागीदारी बनाए रखने और वैज्ञानिक उपलब्धियों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए चरणबद्ध प्रसार योजना तैयार की गई है।

वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान विभाग (डीएसआईआर) ने जानकारी दी कि सीएसआईआर अपने स्थापना दिवस के अवसर पर पिछले 12 वर्षों की प्रमुख उपलब्धियों पर आधारित एक व्यापक प्रकाशन जारी करने की तैयारी कर रहा है। डिजिटल माध्यमों पर सफलता की कहानियों का नियमित प्रसार तथा "इनोवेशन इन एक्शन" व्याख्यान श्रृंखला के माध्यम से वैज्ञानिक संस्थानों के बीच संवाद को और सुदृढ़ किया जाएगा।

जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) ने बताया कि उसने सार्वजनिक स्वास्थ्य, जैव-अर्थव्यवस्था, जीनोमिक्स, कृषि जैव प्रौद्योगिकी, अनुसंधान अवसंरचना, जैव प्रौद्योगिकी स्टार्टअप तथा सतत विकास में अपने योगदान को प्रदर्शित करने वाली विषयगत प्रकाशनों की श्रृंखला शुरू की है। विभाग #DBTQuest जनसहभागिता अभियान के माध्यम से ज्ञान-आधारित गतिविधियों द्वारा वैज्ञानिक जागरूकता बढ़ा रहा है तथा समन्वित सोशल मीडिया पहलों के जरिए जनसंपर्क का विस्तार कर रहा है।

बैठक में विज्ञान विभागों के बीच अंतर-मंत्रालयी सहयोग को मजबूत करने के प्रयासों की भी समीक्षा की गई। सीएसआईआर, इसरो, डीएसटी, डीबीटी, बार्क तथा अन्य वैज्ञानिक संस्थानों के संयुक्त कार्यक्रमों, प्रौद्योगिकी विकास साझेदारियों, जैव-चिकित्सा अनुसंधान, नवाचार मंचों तथा उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के लिए समन्वित कार्यक्रमों की प्रगति पर चर्चा हुई। विभागों ने वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं एवं शैक्षणिक संस्थानों के बीच नियमित संवाद तंत्र को मजबूत करने के प्रयासों की जानकारी भी दी।

बैठक में अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (एएनआरएफ) के अंतर्गत हुई प्रगति की भी समीक्षा की गई। इसमें SARAL_AI मंच के व्यापक उपयोग, विभिन्न संस्थानों के शोधकर्ताओं की अधिक भागीदारी तथा अनुसंधान परियोजनाओं से संबंधित जानकारी को डिजिटल माध्यमों से आम जनता तक पहुंचाने के उपायों पर चर्चा हुई।

इसके अतिरिक्त ESTIC-2026, इंडिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टिवल (IISF)-2026, राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस-2026 तथा अन्य प्रमुख राष्ट्रीय वैज्ञानिक आयोजनों की तैयारियों की भी समीक्षा की गई। विभागों ने इन कार्यक्रमों में शोधकर्ताओं, उद्योगों, स्टार्टअप, विद्यार्थियों तथा आम नागरिकों की व्यापक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए संस्थागत तैयारियों एवं जनसंपर्क योजनाओं की जानकारी दी।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत का वैज्ञानिक पारिस्थितिकी तंत्र अब ऐसे नए चरण में प्रवेश कर चुका है, जहां अनुसंधान उत्कृष्टता, तकनीकी नवाचार, संस्थागत समन्वय और जनसहभागिता को साथ लेकर आगे बढ़ना होगा। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक विभागों के बीच बढ़ता सहयोग विज्ञान को अधिक सुलभ, अधिक प्रभावी तथा देश की विकास प्राथमिकताओं के अनुरूप बनाने की सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

बैठक के दौरान मंत्री ने प्रशासनिक कार्य निष्पादन, संस्थागत समन्वय तथा विज्ञान प्रशासकों की क्षमता निर्माण से जुड़े विषयों की भी समीक्षा की और विभागों से श्रेष्ठ कार्य प्रणालियों को साझा करते हुए वैज्ञानिक तंत्र में सहयोगात्मक सुशासन को और मजबूत करने का आह्वान किया।

भारत–ऑस्ट्रेलिया के बीच CSIR-TKDL समझौता, पारंपरिक ज्ञान की वैश्विक सुरक्षा को मिलेगी मजबूती

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वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) और आईपी ऑस्ट्रेलिया (IP Australia) ने 9 जुलाई 2026 को मेलबर्न, ऑस्ट्रेलिया में आयोजित तीसरे भारत–ऑस्ट्रेलिया वार्षिक शिखर सम्मेलन के दौरान CSIR की ट्रेडिशनल नॉलेज डिजिटल लाइब्रेरी (CSIR-TKDL) तक पहुंच प्रदान करने संबंधी एक महत्वपूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर किए। यह समझौता भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज़ की उपस्थिति में संपन्न हुआ।

यह समझौता शिखर सम्मेलन के दौरान हुए द्विपक्षीय विचार-विमर्श के 18 प्रमुख परिणामों में से एक है। दोनों देशों के बीच रक्षा एवं सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, शिक्षा, कौशल विकास, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, फिल्म निर्माण, पारंपरिक ज्ञान तथा सांस्कृतिक धरोहरों की वापसी जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा हुई।

क्या है TKDL?

ट्रेडिशनल नॉलेज डिजिटल लाइब्रेरी (TKDL) भारत द्वारा विकसित विश्व का पहला ऐसा डिजिटल डेटाबेस है, जिसका उद्देश्य भारतीय पारंपरिक ज्ञान के आधार पर गलत तरीके से पेटेंट दिए जाने को रोकना है।

इस समझौते के तहत IP Australia को TKDL डेटाबेस तक पहुंच मिलेगी, जिससे वह ऑस्ट्रेलिया में दायर पेटेंट आवेदनों की जांच के दौरान संबंधित पूर्व कला (Prior Art) का अध्ययन कर सकेगा। इससे पेटेंट जांच प्रक्रिया अधिक सटीक और प्रभावी होगी तथा भारत की पारंपरिक विरासत पर अनुचित पेटेंट दिए जाने से रोकने में मदद मिलेगी।

भारत और ऑस्ट्रेलिया दोनों ही समृद्ध स्वदेशी ज्ञान, पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों और सांस्कृतिक विरासत के धनी देश हैं। यह समझौता दोनों देशों की पारंपरिक ज्ञान की सुरक्षा और बौद्धिक संपदा प्रणाली को मजबूत करने की साझा प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

समझौते के क्रियान्वयन की निगरानी IP Australia के पेटेंट आयुक्त एंड्रयू विल्किंसन, CSIR की महानिदेशक एवं DSIR की सचिव डॉ. एन. कलैसेल्वी तथा CSIR-TKDL इकाई की प्रमुख डॉ. विश्वजननी जे. सत्तीगेरी करेंगी।

TKDL के बारे में

वर्ष 2001 में भारत सरकार द्वारा CSIR और आयुष मंत्रालय के संयुक्त प्रयास से स्थापित ट्रेडिशनल नॉलेज डिजिटल लाइब्रेरी (TKDL) दुनिया का पहला ऐसा डेटाबेस है, जिसे पारंपरिक ज्ञान की रक्षात्मक सुरक्षा (Defensive Protection) के लिए विकसित किया गया।

इस डेटाबेस में वर्तमान में आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध, सोवा-रिग्पा और योग से संबंधित 5.2 लाख से अधिक औषधीय सूत्रों और पारंपरिक प्रथाओं का विवरण उपलब्ध है। इसे अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, जापानी और स्पेनिश सहित पांच अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में अनुवादित किया गया है ताकि विश्वभर के पेटेंट परीक्षक इसका उपयोग कर सकें।

ऑस्ट्रेलिया के साथ इस समझौते के बाद अब 18 देशों के पेटेंट कार्यालयों को गोपनीयता समझौते (NDA) के तहत TKDL तक पहुंच प्राप्त हो चुकी है।

TKDL ने अब तक दुनिया भर में 375 से अधिक पेटेंट आवेदनों को रद्द, अस्वीकृत, संशोधित, वापस लेने या निरस्त कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह भारत की पारंपरिक ज्ञान संपदा की वैश्विक स्तर पर सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।

जनजातीय अनुसंधान संस्थानों को सशक्त बनाने के लिए 'भुवनेश्वर घोषणा' को अपनाया गया

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जनजातीय कार्य मंत्रालय और ओडिशा सरकार के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित 'जनजातीय अनुसंधान संस्थानों (TRIs) को सशक्त बनाने' पर दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का समापन भुवनेश्वर घोषणा (Bhubaneswar Declaration) को अपनाने के साथ हुआ। यह घोषणा प्रधानमंत्री के 'विकसित भारत@2047' के विजन को साकार करने की दिशा में जनजातीय ज्ञान, अनुसंधान, नवाचार और साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण को बढ़ावा देने वाले मजबूत संस्थानों के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।

कार्यशाला में जनजातीय अनुसंधान संस्थानों, राज्य जनजातीय कल्याण विभागों, शिक्षाविदों, अनुसंधान संस्थानों, प्रौद्योगिकी संगठनों, उद्योग, विकास सहयोगी संस्थाओं तथा नागरिक समाज के लगभग 200 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इसमें भारत के जनजातीय अनुसंधान तंत्र के भविष्य पर व्यापक विचार-विमर्श किया गया।

पहले दिन की प्रमुख चर्चाएं

पहले दिन चार विषयगत समूह चर्चाएं और विशेषज्ञ पैनल आयोजित किए गए। इनमें निम्नलिखित विषयों पर विशेष जोर दिया गया—

  • जनजातीय अनुसंधान संस्थानों को ज्ञान एवं सांस्कृतिक संसाधन केंद्रों के रूप में विकसित करना।

  • जनजातीय भाषाओं, पारंपरिक ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण एवं डिजिटल संरक्षण।

  • साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण के लिए मजबूत जनजातीय डेटा प्रणाली, आधारभूत सर्वेक्षण और उच्च गुणवत्ता वाले अनुसंधान को बढ़ावा देना।

  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) तथा नवाचार आधारित तकनीकों के माध्यम से अनुसंधान, योजना, सेवा वितरण और निगरानी को सशक्त बनाना।

  • संस्थागत सुधार, सुशासन, मानव संसाधन विकास और रणनीतिक साझेदारी के माध्यम से TRIs को पेशेवर एवं टिकाऊ संस्थानों के रूप में विकसित करना।

दूसरे दिन राष्ट्रीय रोडमैप पर सहमति

दूसरे दिन सभी कार्य समूहों ने अपनी सिफारिशें प्रस्तुत कीं, जिन पर विशेषज्ञों एवं जनजातीय कार्य मंत्रालय के साथ विस्तृत चर्चा हुई। इन सिफारिशों के आधार पर जनजातीय अनुसंधान संस्थानों को उत्कृष्टता केंद्रों के रूप में विकसित करने के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय रोडमैप तैयार किया गया।

सचिव रंजना चोपड़ा का वक्तव्य

जनजातीय कार्य मंत्रालय की सचिव  रंजना चोपड़ा ने कहा कि—

"जनजातीय अनुसंधान संस्थान जनजातीय समुदायों की आवाज़ हैं। उन्हें उच्च गुणवत्ता वाले अनुसंधान और समुदाय की वास्तविक आवश्यकताओं पर आधारित विश्वस्तरीय उत्कृष्टता केंद्रों के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। उन्हें अधिक संस्थागत और वित्तीय स्वायत्तता मिलनी चाहिए तथा राज्य सरकारों, विश्वविद्यालयों और अन्य ज्ञान संस्थानों के साथ मिलकर कार्य करना चाहिए। भुवनेश्वर घोषणा जनजातीय विकास को नई गति देने वाली महत्वपूर्ण प्रतिबद्धता है।"

उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले सात TRIs सम्मानित

जनजातीय अनुसंधान, दस्तावेजीकरण, ज्ञान सृजन एवं जनजातीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में उत्कृष्ट योगदान के लिए सात जनजातीय अनुसंधान संस्थानों को प्रशंसा प्रमाण-पत्र प्रदान किए गए—

  • जनजातीय अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान, छत्तीसगढ़

  • अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान, ओडिशा

  • जनजातीय अनुसंधान एवं सांस्कृतिक संस्थान, त्रिपुरा

  • जनजातीय अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान, महाराष्ट्र

  • किर्टाड्स (KIRTADS), केरल

  • जनजातीय सांस्कृतिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान, तेलंगाना

  • डॉ. रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण अनुसंधान संस्थान, झारखंड

भुवनेश्वर घोषणा के प्रमुख संकल्प

घोषणा में निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं पर सहमति बनी—

  • TRIs को उत्कृष्टता केंद्र (Centres of Excellence) के रूप में विकसित करना।

  • सामुदायिक आवश्यकताओं पर आधारित अनुसंधान को प्राथमिकता देना।

  • राष्ट्रीय TRI अनुसंधान एजेंडा (2027–2032) तैयार करना।

  • Model TRI Framework 2030 को लागू करना।

  • सभी TRIs के लिए परिणाम एवं रैंकिंग प्रणाली विकसित करना।

  • जनजातीय भाषाओं, संस्कृति, संगीत, पारंपरिक ज्ञान एवं कला का संरक्षण करना।

  • अनुसंधान गुणवत्ता, डेटा प्रबंधन और नैतिक मानकों को मजबूत करना।

  • AI, डेटा एनालिटिक्स और साझा तकनीकी अवसंरचना का उपयोग बढ़ाना।

  • विश्वविद्यालयों, उद्योग और तकनीकी संस्थानों के साथ रणनीतिक साझेदारी को बढ़ावा देना।

  • जनजातीय युवाओं की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना।

समापन

कार्यशाला के समापन पर भुवनेश्वर घोषणा को औपचारिक रूप से अपनाया गया। यह घोषणा जनजातीय अनुसंधान संस्थानों को अनुसंधान, ज्ञान सृजन, सांस्कृतिक संरक्षण और साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण के उत्कृष्ट केंद्रों के रूप में विकसित करने के लिए राष्ट्रीय स्तर का मार्गदर्शक दस्तावेज़ होगी। इसका उद्देश्य भारत की समृद्ध जनजातीय विरासत का संरक्षण करते हुए 'विकसित भारत@2047' के लक्ष्य को साकार करने में जनजातीय समुदायों की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करना है।

AI, परमाणु, अंतरिक्ष और क्वांटम तकनीकें तय करेंगी भारत का भविष्य: डॉ. जितेंद्र सिंह

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अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), परमाणु, अंतरिक्ष और क्वांटम प्रौद्योगिकियां भविष्य की आर्थिक वृद्धि और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की दिशा तय करेंगी।

उन्होंने कहा कि 2023 में शुरू किए गए राष्ट्रीय क्वांटम मिशन (NQM) ने केवल तीन वर्षों में अपने निर्धारित लक्ष्यों में से आधे से अधिक उपलब्धियां हासिल कर ली हैं, जिससे भारत अग्रणी तकनीकों के क्षेत्र में तेजी से उभरती हुई वैश्विक शक्ति बन रहा है।

एक प्रमुख समाचार चैनल द्वारा आयोजित मीडिया कॉन्क्लेव में फायरसाइड चर्चा के दौरान डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि आज भारत कई महत्वपूर्ण तकनीकी क्षेत्रों में दुनिया के अग्रणी देशों के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ रहा है और ऐसी क्षमताओं का विकास कर रहा है जो आर्थिक विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अगले दौर को परिभाषित करेंगी।

उन्होंने कहा कि अंतरिक्ष, परमाणु और क्वांटम प्रौद्योगिकियां भविष्य की विश्व व्यवस्था को आकार देने में निर्णायक भूमिका निभाएंगी। इनका प्रभाव केवल आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि रणनीतिक शक्ति और भू-राजनीतिक स्थिति पर भी पड़ेगा। उन्होंने कहा, "जो देश इन तकनीकों में पीछे रह जाएंगे, वे विकास और सुरक्षा दोनों में पिछड़ने का जोखिम उठाएंगे।"

राष्ट्रीय क्वांटम मिशन का उल्लेख करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि मिशन ने निर्धारित समय से पहले कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। उन्होंने बताया कि क्वांटम-सुरक्षित संचार (Quantum Secure Communication) के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, जिसका उपयोग रक्षा, रणनीतिक संचार, साइबर सुरक्षा और संवेदनशील सूचनाओं की सुरक्षा में किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि मिशन की तेज प्रगति भारत की वैज्ञानिक क्षमता और उभरती हुई तकनीकों में वैश्विक नेतृत्व स्थापित करने की प्रतिबद्धता को दर्शाती है। भारत क्वांटम संचार, क्वांटम कंप्यूटिंग और संबंधित अनुसंधान के पूरे इकोसिस्टम में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि AI अब लगभग हर क्षेत्र में एक आवश्यक उपकरण बनती जा रही है और भविष्य में शासन, उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य, अनुसंधान तथा सार्वजनिक सेवाओं को व्यापक रूप से प्रभावित करेगी। इसके साथ ही भारत डिजिटल अवसंरचना, कंप्यूटिंग क्षमता, डेटा संसाधनों और विश्वसनीय ऊर्जा प्रणालियों में निवेश कर इस क्षेत्र का मजबूत आधार तैयार कर रहा है।

उन्होंने कहा कि आधुनिक विश्व में तकनीकी प्रगति ही विकास का प्रमुख आधार बन गई है और कोई भी देश नवाचार तथा अत्याधुनिक तकनीकों को अपनाए बिना दीर्घकालिक विकास नहीं कर सकता। भारत समावेशी विकास, लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक कल्याण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखते हुए इस परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में किए गए अनेक नीतिगत सुधारों ने नवाचार, उद्यमिता और वैज्ञानिक प्रगति के नए अवसर खोले हैं। उन्होंने कहा कि अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी भागीदारी के लिए खोलने से स्टार्टअप इकोसिस्टम को नई ऊर्जा मिली है, जबकि परमाणु क्षेत्र में हाल की नीतिगत पहल निवेश, तकनीकी सहयोग और क्षमता निर्माण को गति देंगी।

उन्होंने कहा कि उन्नत कंप्यूटिंग, डेटा सेंटर और डिजिटल सेवाओं की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए मजबूत और विश्वसनीय ऊर्जा स्रोतों की आवश्यकता होगी। इस संदर्भ में परमाणु ऊर्जा भारत की तकनीक-आधारित विकास यात्रा और स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

शिक्षा सुधारों पर बोलते हुए उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 को एक परिवर्तनकारी कदम बताया, जिसने छात्रों के सीखने, उच्च शिक्षा और अनुसंधान के दृष्टिकोण को पूरी तरह बदल दिया है। उन्होंने कहा कि इस नीति ने पारंपरिक और कठोर शैक्षणिक ढांचे की जगह लचीले तथा बहुविषयक अवसर प्रदान किए हैं, जिससे छात्र अपनी रुचि, योग्यता और आकांक्षाओं के अनुरूप करियर चुन सकते हैं।

उन्होंने कहा कि NEP 2020 छात्रों को अनुसंधान और नवाचार की ओर प्रेरित कर एक मजबूत शोध संस्कृति विकसित कर रही है। इससे वैज्ञानिक अनुसंधान की गुणवत्ता बेहतर होगी और नए नवोन्मेषकों, उद्यमियों तथा प्रौद्योगिकी नेताओं की पीढ़ी तैयार होगी।

अनुसंधान एवं विकास (R&D) के व्यापक परिदृश्य पर उन्होंने कहा कि भारत सरकार-केंद्रित नवाचार मॉडल से आगे बढ़कर शैक्षणिक संस्थानों, उद्योग, स्टार्टअप और निजी क्षेत्र की भागीदारी वाला सहयोगात्मक मॉडल विकसित कर रहा है। वैज्ञानिक प्रगति के लिए वित्तीय, तकनीकी और बौद्धिक संसाधनों का समन्वय आवश्यक है और देश ऐसा वातावरण तैयार कर रहा है जो इस सहयोग को बढ़ावा देता है।

उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में किए गए सुधारों ने भारत के नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत किया है तथा वैज्ञानिक खोज, प्रौद्योगिकी विकास और अनुसंधान के व्यावसायीकरण के नए अवसर पैदा किए हैं।

भविष्य की ओर देखते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और क्वांटम प्रौद्योगिकियां आने वाले दशकों में समाज को अभूतपूर्व गति से बदल देंगी। आज विकसित किए जा रहे संस्थान, नीतियां और तकनीकी क्षमताएं ही भविष्य में देशों की दिशा तय करेंगी।

उन्होंने युवाओं से भारत के वैज्ञानिक और तकनीकी परिवर्तन में सक्रिय भागीदारी की अपील करते हुए कहा कि वर्तमान पीढ़ी के पास ज्ञान, सूचना और सीखने के ऐसे संसाधन उपलब्ध हैं, जो पहले कभी नहीं थे। उन्होंने छात्रों से इन अवसरों का पूरा लाभ उठाने, वैज्ञानिक सोच विकसित करने और भारत को ज्ञान एवं नवाचार आधारित अग्रणी राष्ट्र बनाने में योगदान देने का आह्वान किया।

अंत में उन्होंने कहा कि शिक्षा, अनुसंधान, अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा और उभरती हुई प्रौद्योगिकियों में किए गए सुधार भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में मजबूत आधार तैयार करेंगे और देश को दुनिया की अग्रणी नवाचार-आधारित अर्थव्यवस्थाओं में स्थापित करेंगे।

मुख्यमंत्री ने अमित शाह से की मुलाकात, छत्तीसगढ़ में अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान स्थापित करने की मांग

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रायपुर- छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय  ने नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह  से मुलाकात कर राज्य में All India Institute of Ayurveda (AIIA) की स्थापना का प्रस्ताव रखा। मुख्यमंत्री ने कहा कि यह संस्थान छत्तीसगढ़ में आयुर्वेदिक चिकित्सा, शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगा।

बैठक के दौरान मुख्यमंत्री ने बताया कि छत्तीसगढ़ में आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों के प्रति लोगों का विश्वास लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान की स्थापना से राज्य के विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और मरीजों को उच्च स्तरीय सुविधाएं उपलब्ध हो सकेंगी। इसके साथ ही प्रदेश को राष्ट्रीय स्तर पर आयुर्वेदिक शिक्षा और अनुसंधान के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित करने में भी मदद मिलेगी।

मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि संस्थान की स्थापना से स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे तथा स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार को गति मिलेगी। विशेष रूप से आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को आधुनिक शोध एवं उपचार सुविधाओं से जोड़ने में यह पहल महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मुख्यमंत्री द्वारा रखे गए प्रस्ताव पर सकारात्मक चर्चा की और राज्य के विकास से जुड़े विभिन्न विषयों पर विचार-विमर्श किया। यदि यह प्रस्ताव स्वीकृत होता है, तो छत्तीसगढ़ देश के उन चुनिंदा राज्यों में शामिल हो जाएगा जहां राष्ट्रीय स्तर का आयुर्वेदिक संस्थान स्थापित होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि AIIA की स्थापना से न केवल स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार होगा, बल्कि आयुष क्षेत्र में अनुसंधान, नवाचार और चिकित्सा पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा।


निजी क्षेत्र को R&D में आगे आना होगा: डॉ. जितेंद्र सिंह का आह्वान

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नई दिल्ली- केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने निजी क्षेत्र से अनुसंधान एवं विकास (R&D) गतिविधियों में अपनी भागीदारी तेज करने का आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि भारत के नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए उद्योगों की सक्रिय भागीदारी अत्यंत आवश्यक है।

नीति आयोग द्वारा R&D प्रक्रियाओं को सरल बनाने पर आधारित दो रिपोर्ट जारी करने के अवसर पर बोलते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि सरकार ने अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्रों को निजी क्षेत्र के लिए खोलने तथा RDI फंड जैसी व्यवस्थाएं बनाने सहित कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। अब उद्योगों को भी निवेश बढ़ाकर और साझेदारी के माध्यम से इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।

उन्होंने कहा कि शोध तभी फल-फूल सकता है, जब उसमें अनावश्यक बाधाएं, देरी और व्यवधान न हों। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि नीतियों का मूल्यांकन केवल उनके डिजाइन से नहीं, बल्कि शोधकर्ताओं के वास्तविक अनुभव के आधार पर होना चाहिए।

डॉ. सिंह ने कहा कि भारत में प्रतिभा की कमी नहीं है और देश के वैज्ञानिकों को वैश्विक स्तर पर पहचान मिल रही है, लेकिन संस्थागत और प्रक्रियागत जटिलताएं अभी भी प्रगति में बाधा बन रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि आज का शोध बहु-विषयक (interdisciplinary) हो गया है, जिसमें उद्योग, वित्त और वैश्विक सहयोग की अहम भूमिका है।

उन्होंने निजी क्षेत्र की सीमित भागीदारी पर चिंता जताते हुए कहा कि केवल सरकारी समर्थन से दीर्घकालिक नवाचार संभव नहीं है। उन्होंने कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) के तहत R&D में निवेश बढ़ाने और वैज्ञानिक कार्यों के लिए मजबूत सहयोग संस्कृति विकसित करने की आवश्यकता बताई।

डॉ. सिंह ने ‘वन नेशन, वन सब्सक्रिप्शन’ जैसी पहलों का उल्लेख करते हुए कहा कि ज्ञान तक आसान पहुंच शोध को गति देती है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि अनुमोदन, फंडिंग और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में छोटे-छोटे सुधार भी शोध उत्पादकता पर बड़ा प्रभाव डाल सकते हैं।

नीति आयोग के उपाध्यक्ष सुमन बेरी ने कहा कि R&D प्रक्रियाओं को आसान बनाने की पहल वैज्ञानिक समुदाय की लंबे समय से चली आ रही मांगों पर आधारित है। उन्होंने पूरे शोध चक्र में समन्वय बढ़ाने और अनावश्यक देरी को कम करने पर जोर दिया।

नीति आयोग के सदस्य वी. के. सारस्वत ने कहा कि भारत का शोध पारिस्थितिकी तंत्र एक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, जहां फंडिंग में देरी और प्रशासनिक बाधाएं अभी भी चुनौती बनी हुई हैं। उन्होंने अधिक स्वायत्तता और उद्योग-शोध के बेहतर संबंधों की आवश्यकता बताई।

प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार प्रो. ए.के. सूद ने कहा कि R&D को आसान बनाना एक सतत प्रक्रिया है और इसमें अभी भी कई सुधार की आवश्यकता है, जैसे फंडिंग सफलता दर, भर्ती और बुनियादी ढांचे से जुड़ी चुनौतियां।

नीति आयोग की रिपोर्टों में शोध प्रणाली में अधिक पारदर्शिता, लचीलापन और स्पष्टता लाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है, ताकि वैज्ञानिक अपने कार्य को बेहतर तरीके से योजना बनाकर आगे बढ़ा सकें।

अंत में डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत के शोध पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए सरकार के साथ-साथ उद्योग, संस्थान और समाज की संयुक्त भागीदारी जरूरी है। उन्होंने कहा, “विज्ञान आज इतना महत्वपूर्ण विषय है कि इसे केवल वैज्ञानिकों तक सीमित नहीं रखा जा सकता,” और सभी हितधारकों से इसमें सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।

वैज्ञानिकों की बड़ी खोज: छोटे अणुओं से उन्नत स्मार्ट मैटेरियल विकसित करने का नया तरीका

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नई दिल्ली- भारतीय वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण सफलता हासिल करते हुए यह समझ विकसित की है कि छोटे ऑर्गेनिक अणुओं (मॉलिक्यूल्स) को कैसे नियंत्रित कर उन्नत कार्यात्मक मैटेरियल तैयार किए जा सकते हैं। यह खोज भविष्य में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, ट्यून करने योग्य ऑप्टोइलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, स्मार्ट मैटेरियल और बायोइलेक्ट्रॉनिक इंटरफेस के विकास में मददगार साबित हो सकती है।

बेंगलुरु स्थित सेंटर फॉर नैनो एंड सॉफ्ट मैटर साइंसेज (CeNS) और जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च (JNCASR) के वैज्ञानिकों की संयुक्त टीम ने इस दिशा में काम किया। दोनों संस्थान विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST), भारत सरकार के अंतर्गत स्वायत्त संस्थाएं हैं।

शोध में वैज्ञानिकों ने नैफ्थलीन डाइइमाइड (NDI) नामक एक विशेष अणु का अध्ययन किया, जो एम्फीफिलिक (जल और वसा दोनों के साथ प्रतिक्रिया करने वाला) होता है। यह अणु पानी में स्वयं को एक व्यवस्थित संरचना में बदलने की क्षमता रखता है, जिसे ‘सुप्रामॉलिक्यूलर सेल्फ-असेंबली’ कहा जाता है।

अध्ययन में पाया गया कि सामान्य तापमान पर ये अणु मिलकर छोटे-छोटे गोलाकार नैनोस्ट्रक्चर (नैनोडिस्क) बनाते हैं। इन नैनोडिस्क में एक विशेष ऑप्टिकल गुण (काइरोऑप्टिकल एक्टिविटी) होता है, जिससे वे प्रकाश के साथ खास तरीके से प्रतिक्रिया करते हैं।

जब तापमान बढ़ाया जाता है, तो ये नैनोडिस्क अपनी संरचना बदलकर दो-आयामी नैनोशीट्स में परिवर्तित हो जाते हैं, और उनकी यह विशेष ऑप्टिकल क्षमता समाप्त हो जाती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि केवल तापमान के बदलाव से ही मैटेरियल के संरचनात्मक और ऑप्टिकल गुणों को बदला जा सकता है।

शोध में यह भी पाया गया कि नैनोडिस्क की विद्युत चालकता (इलेक्ट्रिकल कंडक्टिविटी) अधिक होती है, जबकि नैनोशीट्स में बदलने पर यह लगभग सात गुना तक कम हो जाती है। इसका मतलब है कि इस मैटेरियल के विद्युत गुणों को भी नियंत्रित किया जा सकता है, जो छोटे ऑर्गेनिक अणुओं में बहुत दुर्लभ माना जाता है।

यह तकनीक ऐसे स्मार्ट और अनुकूलनशील (adaptive) मैटेरियल विकसित करने का रास्ता खोलती है, जो अपने परिवेश के अनुसार खुद को बदल सकते हैं।

यह शोध हाल ही में ACS Applied Nano Materials जर्नल में प्रकाशित हुआ है। इस अध्ययन का नेतृत्व डॉ. गौतम घोष (CeNS) ने किया, उनके साथ शोध छात्र सौरव मोयरा (CeNS) और सहयोगी तारक नाथ दास (JNCASR) शामिल रहे।

यह खोज अगली पीढ़ी के सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक्स और स्मार्ट तकनीकों के विकास में नई संभावनाएं प्रदान करती है।

वैज्ञानिकों ने विकसित किया दिमाग की तरह काम करने वाला ‘न्यूरोमॉर्फिक सेंसर’, नमी के अनुसार करेगा प्रतिक्रिया

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नई दिल्ली- भारतीय वैज्ञानिकों ने एक ऐसा अत्याधुनिक ‘न्यूरोमॉर्फिक सेंसर’ विकसित किया है, जो मानव मस्तिष्क की तरह पर्यावरणीय बदलाव—विशेष रूप से नमी (ह्यूमिडिटी)—के प्रति प्रतिक्रिया दे सकता है। यह सेंसर एक ही डिवाइस में जानकारी को महसूस (sensing), प्रोसेस (processing) और संग्रहित (storage) करने में सक्षम है, जिससे पारंपरिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की तुलना में ऊर्जा खपत और डेटा प्रोसेसिंग की जरूरत काफी कम हो सकती है।

आज के समय में बढ़ती ऊर्जा खपत और डेटा प्रोसेसिंग की चुनौतियों के कारण न्यूरोमॉर्फिक इलेक्ट्रॉनिक्स का महत्व तेजी से बढ़ रहा है, खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एज कंप्यूटिंग जैसे क्षेत्रों में।

जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च (JNCASR), जो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्थान है, के शोधकर्ताओं ने यह अनोखा सेंसर विकसित किया है। यह सेंसर 1D सुप्रामॉलिक्यूलर नैनोफाइबर्स पर आधारित है और एक ही प्लेटफॉर्म पर सेंसिंग तथा ‘सिनैप्स’ जैसी सूचना प्रोसेसिंग को एकीकृत करता है।

इस शोध की प्रेरणा मेंढक—विशेष रूप से क्रिकेट फ्रॉग—के व्यवहार से ली गई है, जो नमी और प्रकाश के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होता है। इसी तरह यह सेंसर भी नमी के स्तर में बदलाव के अनुसार प्रतिक्रिया देता है और पहले के संकेतों को “याद” भी रख सकता है।

शोधकर्ताओं तेजस्विनी एस. राव और सुकन्या बरुआह ने विशेष नैनोफाइबर्स विकसित कर इस डिवाइस को तैयार किया। इसे एक नियंत्रित नमी वाले वातावरण में परीक्षण किया गया, जहां विभिन्न स्तरों की नमी पर इसके व्यवहार का अध्ययन किया गया। सेंसर ने ‘सिनैप्टिक’ प्रतिक्रियाएं जैसे फेसीलिटेशन, डिप्रेशन और मेटाप्लास्टिसिटी प्रदर्शित कीं, जो मानव मस्तिष्क की कार्यप्रणाली से मेल खाती हैं।

इस सेंसर की खास बात यह है कि यह नमी के बदलाव को महसूस करने के साथ-साथ उसी समय उसे प्रोसेस और स्टोर भी कर सकता है। यह विशेषता इसे पारंपरिक सेंसर से अलग बनाती है, जहां ये तीनों कार्य अलग-अलग घटकों में होते हैं।

शोधकर्ताओं के अनुसार, “यह पहली बार है जब किसी न्यूरोमॉर्फिक डिवाइस में नमी को मुख्य संकेत के रूप में इस्तेमाल कर सिनैप्टिक व्यवहार को प्रदर्शित किया गया है।”

भविष्य में यह तकनीक स्मार्ट पर्यावरण निगरानी प्रणालियों, हेल्थकेयर डिवाइसेस, पहनने योग्य सेंसर (wearables) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित एज कंप्यूटिंग में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। यह नवाचार ऊर्जा-कुशल और पर्यावरण के अनुकूल अगली पीढ़ी की तकनीकों के विकास में भी मददगार साबित होगा।

भारतीय वैज्ञानिकों ने बिना बाहरी सहायता के स्वयं-उपचार करने वाले ऑर्गेनिक क्रिस्टल की खोज की

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भारतीय वैज्ञानिकों ने हाल ही में परतदार संरचना वाले ऑर्गेनिक क्रिस्टल में एक अनोखी स्वयं-उपचार (Self-Healing) क्षमता की खोज की है, जिसमें किसी भी बाहरी उत्तेजना की आवश्यकता नहीं होती। यह खोज ऐसे उन्नत पदार्थों के विकास में सहायक हो सकती है, जो तकनीकी उपयोगों में ऊर्ध्वाधर भार (Vertical Load) को सहन कर सकें।

वर्तमान में उपलब्ध अधिकांश स्वयं-उपचार तकनीकें प्रकाश, ताप या किसी रासायनिक माध्यम जैसे बाहरी कारकों पर निर्भर करती हैं, जिससे उनका उपयोग सीमित हो जाता है, विशेषकर उन परिस्थितियों में जहां बाहरी हस्तक्षेप संभव नहीं होता। स्वायत्त (Autonomous) स्वयं-उपचार के लिए आमतौर पर पॉलिमर, हाइड्रोजेल और कॉम्पोजिट्स में क्रॉस-लिंकिंग या हीलिंग एजेंट्स का उपयोग किया जाता है, लेकिन क्रिस्टलीय पदार्थों में यह प्रभावी नहीं होता क्योंकि उपचार के बाद उनकी संरचना (क्रिस्टैलिनिटी) को पुनः स्थापित करना अत्यंत आवश्यक होता है।

आईआईटी इंदौर (भौतिकी विभाग, प्रो. राजेश कुमार के नेतृत्व में), आईआईटी हैदराबाद (रसायन विज्ञान विभाग, प्रो. सी. मल्ला रेड्डी के नेतृत्व में) और विद्युत अभियांत्रिकी विभाग (प्रो. वरुण रघुनाथन के नेतृत्व में) के वैज्ञानिकों की टीम ने पाया कि परतदार संरचना वाले लचीले ऑर्गेनिक क्रिस्टल में माइक्रोन स्तर की बड़ी दरारें कुछ ही मिलीसेकंड में स्वतः ठीक हो सकती हैं। यह प्रक्रिया माइक्रोस्ट्रक्चर स्तर पर “सिमेट्री ब्रेकिंग” नामक एक नई प्रणाली के माध्यम से होती है, जिसकी पुष्टि रमन स्पेक्ट्रो-माइक्रोस्कोपी तकनीक से की गई। यह सुविधा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) की FIST योजना के अंतर्गत समर्थित है।

इस शोध में रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी ने उपचार प्रक्रिया के सटीक तंत्र को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह कार्य डॉ. ईशिता घोष, डॉ. रबीन्द्र बिस्वास, डॉ. मनुश्री तनवर, डॉ. सुरोजित भुनिया, डॉ. कौस्तव दास और डॉ. अमित मोंडल सहित शोधकर्ताओं के सहयोग से किया गया, जिसे वर्ष 2026 में ‘नेचर कम्युनिकेशंस’ में प्रकाशित किया गया है।

यह अध्ययन जीवित ऊतकों में होने वाली स्वयं-उपचार प्रक्रियाओं को समझने और उनके आधार पर स्मार्ट मैटेरियल विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

राष्ट्रीय विज्ञान पुरस्कार 2026 के लिए नामांकन शुरू, वैज्ञानिकों को मिलेगा बड़ा सम्मान

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नई दिल्ली- भारत सरकार ने राष्ट्रीय विज्ञान पुरस्कार (Rashtriya Vigyan Puraskar - RVP) 2026 के लिए नामांकन आमंत्रित किए हैं। यह प्रतिष्ठित पुरस्कार विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने वाले वैज्ञानिकों, तकनीकी विशेषज्ञों और नवप्रवर्तकों को सम्मानित करने के लिए दिया जाता है।

इन पुरस्कारों का संचालन सीएसआईआर (CSIR) के अंतर्गत RVP सचिवालय द्वारा किया जाता है, जिसकी अध्यक्षता भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार करते हैं।

पुरस्कार की श्रेणियां

RVP-2026 के तहत चार प्रमुख श्रेणियों में पुरस्कार दिए जाएंगे:

  • विज्ञान रत्न (Vigyan Ratna): जीवन भर के उत्कृष्ट योगदान के लिए

  • विज्ञान श्री (Vigyan Shri): विशेष योगदान के लिए

  • विज्ञान युवा-शांति स्वरूप भटनागर (VY-SSB): 45 वर्ष तक के युवा वैज्ञानिकों के लिए

  • विज्ञान टीम (Vigyan Team): 3 या अधिक सदस्यों की टीम को

 किस-किस क्षेत्र में नामांकन?

नामांकन कई क्षेत्रों में आमंत्रित हैं, जैसे:

  • कृषि विज्ञान

  • परमाणु ऊर्जा

  • जैव विज्ञान

  • रसायन विज्ञान

  • रक्षा प्रौद्योगिकी

  • पृथ्वी विज्ञान

  • इंजीनियरिंग

  • पर्यावरण विज्ञान

  • गणित एवं कंप्यूटर विज्ञान

  • चिकित्सा

  • भौतिकी

  • अंतरिक्ष विज्ञान

  • तकनीक एवं नवाचार

आवेदन प्रक्रिया

  • आवेदन ऑनलाइन किए जा सकते हैं

  • पोर्टल: https://awards.gov.in

  • शुरुआत: 28 मार्च 2026

  • अंतिम तिथि: 11 मई 2026

  •  स्व-नामांकन (Self-nomination) भी स्वीकार्य है

सरकार का दृष्टिकोण

केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि यह पुरस्कार भारत में वैज्ञानिक उत्कृष्टता और नवाचार की संस्कृति को बढ़ावा देने का प्रतीक है। उन्होंने संस्थानों और व्यक्तियों से योग्य उम्मीदवारों को नामांकित करने की अपील की।

यह पहल भारत को ‘विकसित भारत’ और वैश्विक ज्ञान नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।


राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने उत्तराखंड के नैनीताल में कुमाऊँ विश्वविद्यालय के 20वें दीक्षांत समारोह में की शिरकत

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 भारत की राष्ट्रपति, द्रौपदी मुर्मु ने आज (4 नवम्बर, 2025) उत्तराखंड के नैनीताल में आयोजित कुमाऊँ विश्वविद्यालय के 20वें दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की।

इस अवसर पर संबोधित करते हुए, राष्ट्रपति ने कहा कि शिक्षा किसी भी राष्ट्र के विकास की नींव होती है। इसलिए शिक्षा का उद्देश्य केवल विद्यार्थियों की बौद्धिक क्षमता और कौशल का विकास करना नहीं, बल्कि उनके नैतिक बल और चरित्र को भी सशक्त बनाना होना चाहिए।

राष्ट्रपति ने कहा कि शिक्षा हमें आत्मनिर्भर बनाती है, साथ ही यह हमें विनम्र बनना और समाज एवं देश के विकास में योगदान देना भी सिखाती है। उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे अपनी शिक्षा को वंचित वर्गों की सेवा और राष्ट्र निर्माण के कार्य में समर्पित करें। उन्होंने कहा कि यही सच्चा धर्म है, जो उन्हें संतोष और खुशी प्रदान करेगा।

राष्ट्रपति ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। सरकार निरंतर प्रगति सुनिश्चित करने के लिए कई नीतिगत पहल कर रही है। इन पहलों से युवाओं के लिए अनेक अवसर पैदा हो रहे हैं। उच्च शिक्षण संस्थानों को चाहिए कि वे युवाओं को इन अवसरों का लाभ उठाने के लिए प्रोत्साहित करें।

राष्ट्रपति ने कहा कि देश में अनुसंधान, नवाचार और उद्यमिता को बढ़ावा देना अत्यंत आवश्यक है। उन्हें यह जानकर प्रसन्नता हुई कि कुमाऊँ विश्वविद्यालय शिक्षा, अनुसंधान और नवाचार में उत्कृष्टता के प्रति प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि शिक्षा और अनुसंधान के प्रभावी उपयोग के लिए बहुविषयक (multidisciplinary) दृष्टिकोण आवश्यक है। उन्हें विश्वास है कि विश्वविद्यालय इस दिशा में निरंतर प्रगति करेगा।

राष्ट्रपति ने कहा कि हिमालय जीवनदायिनी संसाधनों के लिए प्रसिद्ध हैं। इन संसाधनों का संरक्षण और संवर्धन करना हम सभी की जिम्मेदारी है। उन्हें यह जानकर प्रसन्नता हुई कि कुमाऊँ विश्वविद्यालय पर्यावरण संरक्षण की दिशा में सजग प्रयास कर रहा है।

राष्ट्रपति ने कहा कि एक शैक्षणिक संस्थान के रूप में कुमाऊँ विश्वविद्यालय की सामाजिक जिम्मेदारियाँ भी हैं। उन्होंने विश्वविद्यालय के शिक्षकों और विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे आसपास के गांवों का दौरा करें, वहाँ की समस्याओं को समझें और यथासंभव उनके समाधान के लिए कार्य करें।

राष्ट्रपति ने कहा कि भारत को वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। कुमाऊँ विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों के युवा इस लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे। उन्हें विश्वास है कि अपनी प्रतिभा और समर्पण के बल पर वे इस भूमिका को सफलतापूर्वक निभाएँगे।

इससे पूर्व, राष्ट्रपति ने नैना देवी मंदिर, नैनीताल में पूजा-अर्चना की तथा श्री नीम करौली बाबा आश्रम, कैंची धाम में दर्शन भी किए।

कोल इंडिया और IIT मद्रास मिलकर बनाएंगे “सस्टेनेबल एनर्जी सेंटर”: भारत के स्वच्छ ऊर्जा भविष्य की दिशा में ऐतिहासिक कदम

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कोल इंडिया लिमिटेड (CIL) ने बुधवार को भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास (IIT मद्रास) के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके तहत IIT मद्रास में “सस्टेनेबल एनर्जी सेंटर” (Centre for Sustainable Energy) की स्थापना की जाएगी। इस समझौते पर सीआईएल के निदेशक (तकनीकी) अच्युत घाटक और IIT मद्रास के निदेशक वी. कामकोटि ने हस्ताक्षर किए। इस अवसर पर सीआईएल के अध्यक्ष पी. एम. प्रसाद, साथ ही दोनों संस्थानों के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

यह केंद्र सतत ऊर्जा प्रौद्योगिकियों (Sustainable Energy Technologies) में अत्याधुनिक अनुसंधान एवं विकास (R&D) और क्षमता निर्माण पहलों का एक प्रमुख केंद्र होगा। CIL द्वारा वित्तपोषित और उसके रणनीतिक विविधीकरण लक्ष्यों के अनुरूप, यह केंद्र कोयला खदानों के पुनःउपयोग, निम्न-कार्बन प्रौद्योगिकियों के विकास, और भारत के स्वच्छ ऊर्जा भविष्य में कोयले को एक मूल्यवान फीडस्टॉक के रूप में पुनर्परिभाषित करने के समाधान विकसित करने पर केंद्रित रहेगा। यह साझेदारी देश की नेट-जीरो (Net-Zero) 2070 की महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए स्वदेशी अनुसंधान, नवाचार और तकनीकी विकास के माध्यम से भारत की ऊर्जा परिवर्तन यात्रा में नेतृत्व करने की साझा प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

इस अवसर पर बोलते हुए, सीआईएल के अध्यक्ष पी. एम. प्रसाद ने कहा कि कोल इंडिया एक ऊर्जा प्रदाता से भारत की स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण यात्रा का एक प्रमुख सक्षमकर्ता बनने की दिशा में परिवर्तन कर रहा है। उन्होंने कहा, “यह समझौता कोल इंडिया की सतत विकास यात्रा में एक ऐतिहासिक कदम है। IIT मद्रास के साथ इस सहयोग के माध्यम से, कोल इंडिया ऊर्जा सुरक्षा, डीकार्बोनाइजेशन और सामाजिक-आर्थिक प्रगति सुनिश्चित करने के लिए स्वदेशी समाधान विकसित करने का लक्ष्य रखता है।”

IIT मद्रास के निदेशक वी. कामकोटि ने कहा कि उद्योग–शैक्षणिक सहयोग IIT मद्रास की यात्रा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है, जो भारत को निम्न-कार्बन अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर करने में मदद कर रहा है। उन्होंने कहा, “कोल इंडिया के साथ यह साझेदारी हमारे इस मिशन के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती है। हम मिलकर ऐसे स्केलेबल और प्रभावशाली समाधान विकसित करेंगे जो भारत के सतत ऊर्जा भविष्य का समर्थन करें।”

यह केंद्र मानव संसाधन विकास में भी योगदान देगा, जिसमें पीएचडी, पोस्टडॉक्टरल और इंटर्नशिप कार्यक्रम शामिल होंगे, ताकि शोधकर्ताओं और इंजीनियरों की नई पीढ़ी को भारत के हरित ऊर्जा परिवर्तन का नेतृत्व करने के लिए तैयार किया जा सके।

ब्लैक होल की गतिविधियाँ रोकती हैं नए तारों का जन्म: भारतीय खगोलविदों का महत्वपूर्ण अध्ययन

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ब्लैक होल की गतिविधियाँ उसके आसपास नए तारों के जन्म को दबा सकती हैं — एक हालिया अध्ययन में यह खुलासा हुआ है। यह खोज ब्रह्मांड में आकाशगंगाओं के विकास की गहरी समझ प्रदान कर सकती है और यह भी समझाने में मदद कर सकती है कि कुछ आकाशगंगाओं में तारा-निर्माण की दर इतनी कम क्यों होती है।

गैलेक्‍सी के केंद्र में मौजूद अति-द्रव्यमान वाले ब्लैक होल गैस के प्रवाह (outflows) को बाहर फेंकते हैं। खगोलविद लंबे समय से अध्ययन कर रहे हैं कि ये गैस प्रवाह और विकिरण (radiation) कैसे मिलकर आकाशगंगाओं के विकास को प्रभावित करते हैं। अब तक यह समझना एक बड़ी पहेली रहा है कि गैस प्रवाह और ब्लैक होल से निकलने वाले विकिरण का सापेक्ष प्रभाव आकाशगंगाओं के विकास पर कितना होता है।

भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (Indian Institute of Astrophysics – IIA), जो विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) का एक स्वायत्त संस्थान है, के खगोलविदों के नेतृत्व में किए गए एक नए अध्ययन ने इन शक्तिशाली प्रक्रियाओं पर नई रोशनी डाली है। अध्ययन से पता चला है कि ब्लैक होल के आसपास की तीव्र विकिरण और उनसे निकलने वाले उच्च गति के जेट (jets) दोनों मिलकर आकाशगंगा के केंद्र से गैस को बाहर निकाल सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप आकाशगंगा के केंद्रीय क्षेत्रों में तारा निर्माण लगभग बंद हो जाता है, जिससे उसकी वृद्धि नियंत्रित होती है।

अंतरराष्ट्रीय खगोलीय वेधशालाओं जैसे Sloan Digital Sky Survey (SDSS) टेलीस्कोप (ऑप्टिकल तरंगदैर्घ्य) और Very Large Array (VLA) रेडियो टेलीस्कोप (रेडियो तरंगदैर्घ्य) से प्राप्त आंकड़ों का उपयोग करते हुए वैज्ञानिकों ने लगभग 500 निकटवर्ती आकाशगंगाओं का अध्ययन किया जिनके केंद्रों में सक्रिय गैलेक्टिक नाभिक (Active Galactic Nuclei – AGN) मौजूद हैं। AGN वे ऊर्जावान क्षेत्र हैं जहाँ ब्लैक होल के आसपास गिरता हुआ पदार्थ अत्यधिक विकिरण और गैस उत्पन्न करता है।

अध्ययन की मुख्य लेखिका और IIA की पीएच.डी. छात्रा पायल नंदी बताती हैं —

“हमने पाया कि आयनित गैस के प्रवाह (outflows) AGN में बहुत आम हैं। हालांकि इनका प्रमुख कारण ब्लैक होल से निकलने वाला विकिरण है, लेकिन जिन आकाशगंगाओं में रेडियो जेट हैं, उनमें ये प्रवाह और भी तेज़ तथा ऊर्जावान पाए गए।”

शोध में यह भी पता चला कि रेडियो तरंगदैर्घ्य पर देखी जाने वाली आकाशगंगाओं में इन गैस प्रवाहों की उपस्थिति 56% मामलों में पाई गई, जबकि जिन आकाशगंगाओं में रेडियो उत्सर्जन नहीं था, उनमें यह केवल 25% थी। ये गैस प्रवाह 2000 किलोमीटर प्रति सेकंड तक की गति से चल सकते हैं — इतनी तेज़ कि वे पूरी आकाशगंगा के गुरुत्वाकर्षण से भी बच निकलें।

एक रूपरेखा जो दर्शाती है कि जेट और विकिरण दोनों वाले AGN, केवल विकिरण से संचालित AGN की तुलना में अधिक शक्तिशाली गैस प्रवाह उत्पन्न करते हैं, जिससे उनकी मेजबान आकाशगंगाओं पर अलग-अलग प्रभाव पड़ते हैं।

IIA के वैज्ञानिक सी. एस. स्टालिन, जो अध्ययन के सह-लेखक हैं, ने कहा —

“यह अध्ययन यह दिखाता है कि आकाशगंगाओं के विकास को समझने के लिए बहु-तरंगदैर्घ्य (multi-wavelength) डेटा को साथ में उपयोग करना कितना आवश्यक है।”

वैज्ञानिकों ने पाया कि इन गैस प्रवाहों की ऊर्जा का संबंध ब्लैक होल की कुल चमक (luminosity) से गहराई से जुड़ा है। विशेष रूप से उन आकाशगंगाओं में जिनमें रेडियो जेट मौजूद हैं, यह संबंध और भी मजबूत है। इसका अर्थ यह है कि जेट मुख्य कारण नहीं हैं, लेकिन वे ब्लैक होल से निकलने वाली ऊर्जा को “बूस्ट” कर अधिक गैस बाहर निकालने में मदद करते हैं।

सह-लेखक ध्रुबा जे. साइकिया (IUCAA) ने कहा —

“ये निष्कर्ष सुपरमैसिव ब्लैक होल, रेडियो जेट, तारा निर्माण और आकाशगंगा के विकास के बीच के जटिल संबंधों को समझने में एक महत्वपूर्ण कदम हैं।”

अध्ययन में यह भी पाया गया कि इन गैस प्रवाहों के कारण आकाशगंगाओं के केंद्र में तारा निर्माण लगभग पूरी तरह बंद हो गया है। ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड अवलोकनों से यह पुष्टि की गई कि ये हवाएँ ब्लैक होल की गतिविधि से संचालित हैं, न कि नए तारों के बनने से।

इस प्रकार, यह अध्ययन तथाकथित निगेटिव AGN फीडबैक (negative AGN feedback) को दर्शाता है — यानी ब्लैक होल की गतिविधियाँ अपने आसपास नए तारों के बनने को रोक देती हैं।

यह अध्ययन The Astrophysical Journal में प्रकाशित हुआ है और यह ब्रह्मांड में आकाशगंगाओं के विकास की प्रक्रिया को समझने में एक महत्वपूर्ण योगदान है। यह दिखाता है कि ब्रह्मांड के सबसे रहस्यमय पिंड — सुपरमैसिव ब्लैक होल — भी अपने आसपास के तारों और आकाशगंगाओं के भाग्य को आकार देने में गहरा प्रभाव डालते हैं।

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