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खरीफ सम्मेलन-2026 में कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने रखी कृषि विकास की रूपरेखा

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नई दिल्ली- केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आज नई दिल्ली स्थित पूसा परिसर में आयोजित खरीफ सम्मेलन-2026 को संबोधित करते हुए कहा कि देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना, किसानों की आय बढ़ाना और नागरिकों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना केंद्र सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में केंद्र सरकार लगातार कृषि क्षेत्र को मजबूत करने के लिए कार्य कर रही है।

दो दिवसीय राष्ट्रीय खरीफ अभियान-2026 सम्मेलन का आयोजन 28 और 29 मई को NASC कॉम्प्लेक्स, पूसा, नई दिल्ली में किया जा रहा है। सम्मेलन में देशभर के कृषि मंत्री, वैज्ञानिक, वरिष्ठ अधिकारी, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR), राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं।

‘टीम एग्रीकल्चर’ का साझा मंच

चौहान ने कहा कि खरीफ सम्मेलन ने पूरे ‘टीम एग्रीकल्चर’ को एक मंच पर लाने का कार्य किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि टीम एग्रीकल्चर में केवल केंद्र सरकार ही नहीं, बल्कि राज्य सरकारें, वैज्ञानिक, किसान उत्पादक संगठन (FPO), और कृषि क्षेत्र से जुड़े सभी हितधारक शामिल हैं।

उन्होंने कहा कि कृषि राज्य का विषय है और राज्यों की सक्रिय भागीदारी से बेहतर परिणाम प्राप्त होते हैं, जबकि केंद्र सरकार सहयोगी और साझेदार की भूमिका निभाती है।

क्षेत्रीय कृषि सम्मेलनों पर जोर

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि देश की भौगोलिक और जलवायु विविधता को देखते हुए सरकार ने राष्ट्रीय कृषि सम्मेलन के साथ-साथ क्षेत्रीय सम्मेलनों की शुरुआत की है। जयपुर, लखनऊ और भुवनेश्वर में क्षेत्रीय सम्मेलन आयोजित किए जा चुके हैं, जबकि उत्तर-पूर्व और दक्षिण भारत में भी जल्द सम्मेलन आयोजित होंगे।

उन्होंने कहा कि राज्यों की समस्याओं और आवश्यकताओं पर छोटे समूहों में अधिक प्रभावी और विस्तृत चर्चा संभव हो पाती है। भविष्य में आठ कृषि-जलवायु क्षेत्रों के आधार पर क्षेत्रीय सम्मेलन आयोजित करने की योजना पर भी विचार किया जा रहा है।

खाद्यान्न उत्पादन में रिकॉर्ड उपलब्धि

चौहान ने कहा कि किसानों की मेहनत, वैज्ञानिक अनुसंधान और केंद्र व राज्यों के सहयोग से भारत ने वर्ष 2025-26 में खाद्यान्न उत्पादन के सभी पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।

उन्होंने बताया कि:

  • कुल खाद्यान्न उत्पादन 376.563 मिलियन टन तक पहुंच गया है।

  • चावल उत्पादन 154.024 मिलियन टन रहा और भारत ने चीन को पीछे छोड़ते हुए विश्व में पहला स्थान हासिल किया।

  • गेहूं उत्पादन 120.657 मिलियन टन और मक्का उत्पादन 55.092 मिलियन टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है।

तेलहन उत्पादन में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। कुल तेलहन उत्पादन 43.059 मिलियन टन अनुमानित है। मूंगफली उत्पादन 13.074 मिलियन टन और सरसों उत्पादन 13.768 मिलियन टन तक पहुंच गया है।

प्राकृतिक खेती और जलवायु परिवर्तन पर फोकस

कृषि मंत्री ने कहा कि जलवायु परिवर्तन कृषि क्षेत्र के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा और लंबे सूखे जैसी परिस्थितियों को देखते हुए टिकाऊ और सुरक्षित कृषि पर विशेष ध्यान देना जरूरी है।

उन्होंने बताया कि सम्मेलन में प्राकृतिक खेती, मृदा स्वास्थ्य कार्ड, संतुलित उर्वरक उपयोग, डिजिटल कृषि, किसान क्रेडिट कार्ड, कृषि अवसंरचना कोष और पीएम-आशा योजना जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की जाएगी।

छोटे किसानों की आय बढ़ाने पर जोर

चौहान ने कहा कि भारत में अधिकांश किसानों के पास छोटी जोत है, इसलिए सीमित भूमि से अधिक आय सुनिश्चित करने के लिए एकीकृत खेती मॉडल को बढ़ावा दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि पर्याप्त कृषि ऋण, निवेश और आधुनिक तकनीकों की मदद से किसान बेहतर खेती कर सकेंगे।

उन्होंने बताया कि सम्मेलन में ‘खेत बचाओ अभियान’ पर भी व्यापक चर्चा होगी और केंद्र व राज्य मिलकर खरीफ सीजन के लिए संयुक्त कृषि रोडमैप तैयार करेंगे।

भारत में 2025–26 में अब तक का सर्वाधिक 376.56 मिलियन टन खाद्यान्न उत्पादन का अनुमान, कृषि मंत्रालय ने जारी किए तृतीय अग्रिम आंकड़े

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केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आज वर्ष 2025–26 के प्रमुख कृषि फसलों के उत्पादन के तृतीय अग्रिम अनुमान (Third Advance Estimates) जारी किए। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार किसानों की समृद्धि और कृषि क्षेत्र के विकास के लिए लगातार कार्य कर रही है, जिसका सकारात्मक परिणाम अब रिकॉर्ड कृषि उत्पादन के रूप में दिखाई दे रहा है।

इन अनुमानों के अनुसार देश का कुल खाद्यान्न उत्पादन 376.563 मिलियन टन अनुमानित है, जो पिछले वर्ष के 357.732 मिलियन टन की तुलना में लगभग 18.8 मिलियन टन (5.3%) अधिक है। यह देश के इतिहास में अब तक का सबसे अधिक खाद्यान्न उत्पादन है। मंत्री ने इस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए देश के किसानों को बधाई दी।

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी तृतीय अग्रिम अनुमान भारत की कृषि प्रगति की मजबूत तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। फसलवार आंकड़ों के अनुसार चावल का उत्पादन रिकॉर्ड 154.024 मिलियन टन, गेहूं 120.657 मिलियन टन और मक्का 55.093 मिलियन टन अनुमानित है। श्री अन्न का उत्पादन 17.584 मिलियन टन, अरहर 3.592 मिलियन टन, चना 12.514 मिलियन टन तथा मसूर 1.762 मिलियन टन अनुमानित है।

इसी प्रकार कुल तिलहन उत्पादन 43.059 मिलियन टन अनुमानित है। मूंगफली का उत्पादन रिकॉर्ड 13.074 मिलियन टन, सोयाबीन 12.596 मिलियन टन तथा सरसों एवं राई 13.768 मिलियन टन (रिकॉर्ड) अनुमानित है। गन्ने का उत्पादन 500.063 मिलियन टन (रिकॉर्ड), कपास 29.024 मिलियन गांठें तथा जूट 9.176 मिलियन गांठें अनुमानित हैं।

मंत्री चौहान ने बताया कि विस्तृत आंकड़ों के अनुसार चावल उत्पादन पिछले वर्ष के 150.184 मिलियन टन की तुलना में बढ़कर 154.024 मिलियन टन हो गया है। गेहूं उत्पादन 117.945 मिलियन टन से बढ़कर 120.657 मिलियन टन अनुमानित है। मक्का उत्पादन 43.409 मिलियन टन से बढ़कर 55.093 मिलियन टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। श्री अन्न सहित मोटे अनाजों का कुल उत्पादन 74.472 मिलियन टन अनुमानित है।

दलहन फसलों में अरहर का उत्पादन लगभग पिछले वर्ष के समान 3.592 मिलियन टन अनुमानित है। चना उत्पादन 11.114 मिलियन टन से बढ़कर 12.514 मिलियन टन हो गया है। मसूर का उत्पादन 1.762 मिलियन टन अनुमानित है।

तिलहन में कुल उत्पादन 43.059 मिलियन टन अनुमानित है। मूंगफली उत्पादन 11.942 मिलियन टन से बढ़कर 13.074 मिलियन टन, सोयाबीन 12.596 मिलियन टन तथा सरसों एवं राई 12.667 मिलियन टन से बढ़कर 13.768 मिलियन टन अनुमानित है।

व्यावसायिक फसलों में गन्ना उत्पादन 454.611 मिलियन टन से बढ़कर 500.063 मिलियन टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। कपास उत्पादन 29.024 मिलियन गांठें (प्रत्येक 170 किलोग्राम) तथा जूट उत्पादन 9.176 मिलियन गांठें (प्रत्येक 180 किलोग्राम) अनुमानित है।

मंत्री ने कहा कि ये तृतीय अग्रिम अनुमान स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि देश में खाद्यान्न, प्रमुख अनाज, तिलहन और व्यावसायिक फसलों का उत्पादन मजबूत स्थिति में है और कई फसलों में रिकॉर्ड उत्पादन दर्ज किया गया है।

उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और उसके संस्थानों द्वारा किए गए अनुसंधान ने उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसमें जलवायु-लचीली फसल किस्मों का विकास, वर्षा आधारित कृषि तकनीकें और किसानों तक वैज्ञानिक अनुसंधान का प्रसार शामिल है।

पिछले वर्ष आयोजित विकसित कृषि संकल्प अभियान के तहत वैज्ञानिकों ने सीधे किसानों से संपर्क कर कृषि पद्धतियों को मजबूत किया। किसानों को जलवायु-लचीली तकनीक, बेहतर उत्पादन विधियाँ और वैज्ञानिक सलाह प्रदान की गई।

वर्ष 2025–26 में ICAR ने विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों के लिए 339 फसल किस्में विकसित कीं, जिनमें अनाज, तिलहन, दलहन, व्यावसायिक फसलें और चारा फसलें शामिल हैं।

वर्ष 2024–25 में प्रजनक बीज उत्पादन 109,370.2 क्विंटल तथा गुणवत्तापूर्ण बीज उत्पादन 433,114.7 क्विंटल रहा। मृदा एवं जल संसाधन प्रबंधन, जलवायु-स्मार्ट कृषि, डिजिटल मृदा विश्लेषण और सतत कृषि तकनीकों में नवाचारों ने भी उत्पादन वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ा कदम: ICAR का जलवायु-सहिष्णु कृषि पर जोर, गेहूं-जौ अनुसंधान से मजबूत होगी खाद्य सुरक्षा

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नई दिल्ली/करनाल- आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत @2047 के लक्ष्य को आगे बढ़ाते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) देश में संरक्षण कृषि (Conservation Agriculture) और जलवायु-सहिष्णु गेहूं व जौ प्रणाली पर बड़े स्तर पर शोध कर रही है। इसका उद्देश्य खाद्य सुरक्षा को मजबूत करना, किसानों की आय बढ़ाना और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देना है।

ICAR के महानिदेशक एवं DARE के सचिव डॉ. एम.एल. जाट ने आज करनाल स्थित ICAR–गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान (IIWBR) और मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान (CSSRI) का दौरा कर चल रहे शोध कार्यों की समीक्षा की।

उत्पादन और आत्मनिर्भरता पर फोकस

डॉ. जाट ने कहा कि भारत इस वर्ष गेहूं उत्पादन में बेहतर स्थिति में है और न केवल अपनी जरूरतें पूरी कर सकता है बल्कि वैश्विक स्तर पर भी सहयोग देने में सक्षम है।

उन्होंने बताया कि ICAR का मुख्य लक्ष्य जलवायु-सहिष्णु और पोषक तत्वों से भरपूर फसल किस्में विकसित करना है, जिससे किसानों की आय और लोगों का स्वास्थ्य दोनों बेहतर हो सके।

बड़ी उपलब्धियां (Conservation Agriculture)

करनाल में चल रहे शोध से महत्वपूर्ण परिणाम सामने आए हैं:

  • 85% तक सिंचाई जल की बचत

  • 28% तक उर्वरक की कमी

  • 51% ईंधन की बचत

  • 95% तक पराली जलाने में कमी

  • 46% ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी

  • 33% तक उत्पादन में वृद्धि

  • किसानों की आय लगभग दोगुनी

पर्यावरण और मिट्टी की सेहत में सुधार

  • 15 वर्षों में मिट्टी की गुणवत्ता और जैविक कार्बन दोगुना

  • जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता मजबूत

  • कार्बन न्यूट्रल और “वन हेल्थ” लक्ष्य में योगदान

नई तकनीक: BNI (Biological Nitrification Inhibition)

  • उर्वरक उपयोग में 25% तक कमी संभव

  • उत्पादन पर कोई असर नहीं

  • अगर 25% क्षेत्र में लागू किया जाए तो
     हर साल ₹2000 करोड़ की बचत

गेहूं सुरक्षा और अनुसंधान

  • रस्ट (Rust) बीमारी से बचाव के लिए राष्ट्रीय निगरानी कार्यक्रम

  • 30+ संस्थानों का नेटवर्क, 1 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र कवर

  • हर साल 1000 से ज्यादा नई किस्मों का परीक्षण

जलवायु-सहिष्णु किस्में

  • जंगली प्रजातियों (Aegilops) के जरिए
    सूखा, गर्मी और लवणता सहने वाली नई किस्में विकसित

  • अब तक 55 बायोफोर्टिफाइड गेहूं किस्में जारी

  • 45% क्षेत्र में इनका उपयोग

जौ (Barley) की बढ़ती अहमियत

  • कम पानी और उर्वरक की जरूरत

  • स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद (हाई फाइबर)

  • फूड, फीड और इंडस्ट्री में बढ़ती मांग

आधुनिक खेती तकनीक

  • जीरो टिलेज, मशीन से बुवाई, अवशेष प्रबंधन

  • 6–10% उत्पादन बढ़ोतरी

  • 70–75% समय और ईंधन की बचत

निष्कर्ष

ICAR के ये प्रयास न केवल किसानों को सशक्त बना रहे हैं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सतत और आत्मनिर्भर कृषि प्रणाली की ओर भारत को तेजी से आगे बढ़ा रहे हैं।

QS रैंकिंग 2026 में भारतीय कृषि संस्थानों की ऐतिहासिक एंट्री, ICAR के संस्थानों ने बनाया वैश्विक पहचान

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 विकसित भारत के दृष्टिकोण को साकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करते हुए भारतीय कृषि संस्थानों ने पहली बार QS वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग्स (विषयवार) 2026 में अपनी जगह बनाई है। यह उपलब्धि विशेष महत्व रखती है, क्योंकि दिसंबर 2025 में मुख्य सचिवों के सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री ने कुशल मानव संसाधन विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया था।

इस राष्ट्रीय प्राथमिकता के अनुरूप, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR), जो कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करती है, राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान, शिक्षा एवं विस्तार प्रणाली (NAREES) के तहत एक विश्वस्तरीय, बहु-विषयक और शोध-आधारित शिक्षा तंत्र को मजबूत करने के लिए लगातार प्रयासरत रही है। 25 मार्च को ब्रिटेन की संस्था QS क्वाक्वारेली साइमंड्स द्वारा जारी रैंकिंग में 1,900 से अधिक विश्वविद्यालयों के 21,000 से ज्यादा शैक्षणिक कार्यक्रमों का मूल्यांकन किया गया।

पहली बार ICAR के दो संस्थानों ने इस प्रतिष्ठित वैश्विक सूची में स्थान प्राप्त किया है। ICAR-भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (IVRI), बरेली ने 51–100 रैंकिंग बैंड में जगह बनाई है और यह पशु चिकित्सा विज्ञान श्रेणी में शीर्ष 100 में शामिल होने वाला एकमात्र भारतीय संस्थान बन गया है। वहीं ICAR-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI), नई दिल्ली ने कृषि एवं वानिकी श्रेणी में 151–200 बैंड में स्थान प्राप्त कर वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाई है।

कृषि एवं वानिकी श्रेणी में कुल 475 वैश्विक संस्थानों में से 10 भारतीय विश्वविद्यालय शामिल हुए हैं। IARI के साथ 151–200 बैंड में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय और IIT खड़गपुर भी शामिल हैं, जबकि तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय (TNAU) 201–250 बैंड में स्थान पर है। इसके अलावा चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार ने भी 301–350 बैंड में पहली बार प्रवेश किया है।

DARE के सचिव एवं ICAR के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट ने कहा कि ICAR के डीम्ड विश्वविद्यालयों का यह प्रदर्शन कृषि-खाद्य और स्वास्थ्य प्रणालियों में उनके बहुआयामी योगदान का प्रमाण है। वैश्विक स्तर पर कड़ी प्रतिस्पर्धा के बावजूद इन संस्थानों ने शोध उत्कृष्टता के साथ-साथ सामाजिक प्रभाव में भी अपनी मजबूत पहचान बनाई है। ICAR-IARI और IVRI का यह प्रदर्शन उनके समग्र दृष्टिकोण को दर्शाता है, जिसमें मूलभूत शोध, अनुप्रयुक्त विज्ञान, और जमीनी स्तर तक पहुंच शामिल है।

जैसे-जैसे भारत विकसित भारत की ओर अग्रसर हो रहा है, ICAR के प्रमुख संस्थानों को मिली यह वैश्विक पहचान इस बात का संकेत है कि देश की कृषि उच्च शिक्षा अब न केवल विश्व के साथ कदम मिला रही है, बल्कि उत्कृष्टता के नए मानक भी स्थापित कर रही है।

भारत में देशी मछली प्रजातियों के संवर्धन और मछली पालन में विविधीकरण को बढ़ावा

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भारत की विविध जलीय पारिस्थितिकी तंत्र, जो हिमालयी नदियों से लेकर भारतीय महासागर के तटीय जल तक फैली हुई है, में कई स्थानीय (देशी) मछली प्रजातियां पाई जाती हैं। ये प्रजातियां न केवल देश की पारिस्थितिकी संतुलन के लिए महत्वपूर्ण हैं, बल्कि सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से भी अत्यंत मूल्यवान हैं। इन देशी मछली प्रजातियों को बढ़ावा देना आवश्यक है, क्योंकि यह मछली पालन की स्थिरता, खाद्य सुरक्षा, स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं का समर्थन और जैव विविधता संरक्षण में योगदान देता है। बढ़ती मछली उत्पादों की मांग और पर्यावरणीय चुनौतियों को देखते हुए, इन देशी प्रजातियों का रणनीतिक संवर्धन इन लक्ष्यों को प्राप्त करने का मार्ग प्रदान करता है और देश की जलीय विरासत को संरक्षित करता है।

देशी मछली प्रजातियां, जिन्हें स्थानीय या मूल प्रजातियां भी कहा जाता है, वे प्रजातियां हैं जो विशेष भौगोलिक क्षेत्रों और जलीय वातावरण में विकसित और अनुकूलित हुई हैं। भारत में इन प्रजातियों में ताजा पानी, खारी पानी और समुद्री मछलियों की विस्तृत विविधता शामिल है, जिनका पारिस्थितिक और आर्थिक महत्व अद्वितीय है। अब तक 2800 से अधिक देशी मछली और शेलफिश प्रजातियां पहचानी जा चुकी हैं, जिनमें 917 ताजा पानी, 394 खारी पानी और 1548 समुद्री प्रजातियां शामिल हैं (स्रोत: ICAR-NBFGR)।

देश में अब तक 80 से अधिक वाणिज्यिक रूप से महत्वपूर्ण मछली/शेलफिश प्रजातियों के लिए प्रजनन और बीज उत्पादन तकनीक विकसित की गई है। हालांकि, भारत के मछली पालन उत्पादन का बड़ा हिस्सा कुछ चयनित प्रजातियों से ही आता है। तीन प्रमुख कॉर्प मछलियां – रोहु (Labeo rohita), कतला (Catla catla) और मृगल (Cirrhinus mrigala) और जायंट फ्रेशवाटर प्रॉन (Macrobrachium rosenbergii) भारतीय ताजे पानी के मछली पालन की रीढ़ हैं। इस कारण, 19.50 मिलियन टन ताजे पानी की मछली उत्पादन में तीन-चौथाई हिस्सेदारी भारतीय प्रमुख कॉर्प मछलियों की है।

खारी पानी में, वर्तमान उत्पादन का अधिकांश हिस्सा एक विदेशी झींगा प्रजाति (Penaeus vannamei) से आता है, जबकि देशी ब्लैक टाइगर झींगा (Penaeus monodon) का योगदान छोटा है। समुद्री मछली पालन अभी प्रारंभिक अवस्था में है।

मछली पालन में विविधीकरण को बढ़ावा देने के लिए यह आवश्यक है कि ताजे पानी, खारी पानी और समुद्री पर्यावरण में आर्थिक महत्व वाली संभावित देशी मछली प्रजातियों को प्राथमिकता दी जाए। प्रारंभिक रूप से जिन देशी प्रजातियों को चुना गया है, वे इस प्रकार हैं:

  1. फ्रिंज्ड-लिप्ड कॉर्प (Labeo fimbriatus)

  2. ऑलिव बार्ब (Systomus sarana)

  3. पेंगबा (Osteobrama belangiri)

  4. स्ट्राइप्ड मुर्रेल (Channa striata)

  5. पबड़ा (Ompok spp.)

  6. सिंगही (Heteropneustes fossilis)

  7. एशियन सीबास (Lates calcarifer)

  8. पर्लस्पॉट (Etroplus suratensis)

  9. पॉम्पानो (Trachinotus spp.)

  10. मड क्रैब (Scylla spp.)

  11. Penaeus indicus

इन प्रजातियों को मछली पालन के लिए उत्कृष्ट उम्मीदवार माना गया है, और इनके प्रजनन, बड़े पैमाने पर बीज उत्पादन और फार्मिंग तकनीकें उपलब्ध हैं। ये प्रजातियां स्थानीय समुदायों और उनके जलीय वातावरण के बीच गहरे संबंध को दर्शाती हैं और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने में मदद करती हैं। ये प्रजातियां न केवल सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि स्थानीय समुदायों की आजीविका के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये स्थानीय और क्षेत्रीय बाजारों में उच्च मूल्य रखती हैं। ये लाखों लोगों के आहार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और मछली पालन उत्पादन और आय में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं।

अक्सर देशी मछली प्रजातियों के लाभों के प्रति जागरूकता और तकनीकी ज्ञान की कमी होती है। इस कमी के कारण इन्हें मछली पालन प्रणालियों में पूरी तरह से शामिल करना मुश्किल हो जाता है। इसलिए हितधारकों को देशी प्रजातियों के प्रजनन, बीज उत्पादन और फार्मिंग तकनीकों के लाभों और तरीकों पर प्रशिक्षण देना आवश्यक है।

भारत में ताजा पानी और मछली पालन उत्पादन कुल मछली उत्पादन का 75% से अधिक योगदान देते हैं, जो दर्शाता है कि फार्मिंग सिस्टम पकड़ मछली (कैप्चर फिशरीज) पर हावी हैं। इस दिशा में, मछली पालन विभाग (DoF), भारत सरकार, प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY), नया उप-योजना प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना (PMMKSSY) और फिशरीज एवं एक्वाकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फंड (FIDF) के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण बीज और फीड की आपूर्ति को बढ़ावा देने, तकनीकी ज्ञान का प्रसार करने और प्रशिक्षण देने का कार्य कर रहा है।

PMMSY योजना का उद्देश्य मछली पालन उत्पादन बढ़ाना, मछुआरों की आजीविका सुधारना और जलीय संसाधनों के सतत उपयोग को सुनिश्चित करना है। यह योजना अक्वाकल्चर का विस्तार, प्रजातियों का विविधीकरण और आनुवंशिक सुधार पर केंद्रित है।

ICAR विभिन्न अनुसंधान संस्थानों के माध्यम से देशी मछली प्रजातियों पर अनुसंधान करता है, जिसमें उनकी जीवविज्ञान, प्रजनन आदतें, वाणिज्यिक रूप से महत्वपूर्ण मछली और शेलफिश प्रजातियों के आनुवंशिक सुधार कार्यक्रम और आवास आवश्यकताओं का अध्ययन शामिल है। ICAR संकटग्रस्त और लुप्तप्राय देशी मछली प्रजातियों के संरक्षण के प्रयासों में भी लगा हुआ है।

DoF ने ICAR के साथ परामर्श कर कुछ देशी प्रजातियों का आनुवंशिक सुधार हेतु चयन किया और गुणवत्तापूर्ण और स्वस्थ बीज उत्पादन के लिए वित्तीय सहायता दी। चयनित प्रजातियां हैं:

  1. स्कैम्पी

  2. रोहु

  3. कतला

  4. मुर्रेल

  5. Penaeus indicus

  6. Penaeus monodon

  7. भारतीय पॉम्पानो

इसके अलावा, PMMSY के तहत ICAR-CIFA, भुवनेश्वर में ताजे पानी की प्रजातियों के लिए न्यूक्लियस ब्रीडिंग सेंटर और ICAR-CMFRI, मंडपम में समुद्री प्रजातियों के लिए न्यूक्लियस ब्रीडिंग सेंटर की स्थापना को मंजूरी दी गई है।

DoF ने क्षेत्रीय महत्व के आधार पर देशी प्रजातियों के उत्पादन और प्रसंस्करण क्लस्टर भी स्थापित किए हैं, जिनका उद्देश्य उत्पादन बढ़ाना, मूल्य श्रृंखला मजबूत करना, पश्चात-उत्पादन नुकसान कम करना और ग्रामीण महिलाओं और युवाओं को रोजगार प्रदान करना है। कुल 34 क्लस्टर की घोषणा की गई है, जिनमें शामिल हैं:

  • ओडिशा: स्कैम्पी क्लस्टर

  • तेलंगाना: मुर्रेल क्लस्टर

  • त्रिपुरा: पबड़ा क्लस्टर

  • मणिपुर: पेंगबा क्लस्टर

  • जम्मू-कश्मीर: ट्राउट क्लस्टर

  • लद्दाख: ट्राउट क्लस्टर

  • केरल: पर्लस्पॉट क्लस्टर

  • कर्नाटक: समुद्री देशी प्रजातियों का केज कल्चर

  • मदुरै: ऑर्नामेंटल फिशरीज क्लस्टर

ये प्रयास भारत में देशी मछली प्रजातियों के संवर्धन, उत्पादन और सतत उपयोग की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैं।

भारत–अर्जेंटीना कृषि सहयोग को नई मजबूती: ICAR और INTA के बीच 2025–27 कार्ययोजना पर हस्ताक्षर

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भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और अर्जेंटीना के राष्ट्रीय कृषि प्रौद्योगिकी संस्थान (INTA) के बीच कृषि अनुसंधान, क्षमता निर्माण और प्रौद्योगिकी आदान-प्रदान को सुदृढ़ करने के लिए कार्ययोजना 2025–2027 पर हस्ताक्षर किए गए। आज इस हस्ताक्षरित ICAR–INTA कार्ययोजना का आदान-प्रदान कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव एवं ICAR के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट और भारत में अर्जेंटीना के राजदूत एच.ई. मारियानो ऑगस्टिन काउसीनो के बीच हुआ। यह पहल भारत–अर्जेंटीना के द्विपक्षीय कृषि सहयोग को नई दिशा देने वाला महत्वपूर्ण कदम है।

इस कार्ययोजना के तहत प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, सतत कृषि (जीरो टिलेज, यंत्रीकरण, माइक्रो-इरिगेशन और फर्टिगेशन), फसल एवं पशु जैव-प्रौद्योगिकी, पशुधन सुधार, समशीतोष्ण एवं उष्णकटिबंधीय फसलों की उत्पादन तकनीक, डिजिटल कृषि, जैव-सुरक्षा और फाइटोसैनिटरी उपाय, तथा मूल्य श्रृंखला विकास जैसे क्षेत्रों में सहयोग स्थापित किया जाएगा। इसका क्रियान्वयन संयुक्त अनुसंधान, जर्मप्लाज्म आदान-प्रदान, विशेषज्ञ सहभागिता और संरचित प्रशिक्षण व अध्ययन दौरों के माध्यम से किया जाएगा।

प्रस्तावित अध्ययन भ्रमण और प्रशिक्षण कार्यक्रमों में ग्रीनहाउस सब्जी उत्पादन, फ्लोरीकल्चर एवं समशीतोष्ण फल, पोस्ट-हार्वेस्ट फिज़ियोलॉजी, फंक्शनल फूड विकास, पशु चिकित्सा निदान, प्रिसिजन पशुपालन, वेस्ट-टू-वेल्थ तकनीक, माइक्रोबियल फीड संवर्धन, डिजिटल कृषि तथा सैनिटरी और फाइटोसैनिटरी प्रणालियाँ शामिल हैं। जर्मप्लाज्म आदान-प्रदान में सोयाबीन, सूरजमुखी, मक्का, ब्लूबेरी, साइट्रस, जंगली पपीता प्रजातियाँ, अमरूद और चुनिंदा सब्जी फसलें शामिल होंगी।

इसके अलावा, दोनों देश तेलहन और दलहन मूल्य श्रृंखलाओं, कृषि यंत्रीकरण (जीरो-टिलेज, कपास कटाई मशीनरी और ड्रोन), तथा बागवानी मूल्य श्रृंखला विकास (इन्फ्रास्ट्रक्चर और रोपण सामग्री का आदान-प्रदान) में सहयोग को और गहरा करेंगे। पौध एवं पशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में क्षेत्र-विशिष्ट खुरपका-मुंहपका (FMD) उन्मूलन रणनीतियाँ तथा टिड्डी निगरानी और प्रबंधन पर तकनीकी सहयोग और सर्वोत्तम प्रथाओं का साझा करना भी शामिल है।

दोनों पक्षों ने भारत–अर्जेंटीना वैज्ञानिक साझेदारी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई और प्रभावी क्रियान्वयन एवं प्रगति सुनिश्चित करने के लिए वार्षिक निगरानी और समीक्षा पर सहमति व्यक्त की।


भारत में कृषि शिक्षा, अनुसंधान और कौशल विकास के माध्यम से “एक राष्ट्र – एक कृषि – एक टीम” के विजन को साकार करने की दिशा में प्रगति

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कृषि: भारत की अर्थव्यवस्था और विकास का आधार

भारत की लगभग आधी आबादी की आजीविका का मुख्य स्रोत कृषि है, जो देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 18 प्रतिशत का योगदान देती है। उत्पादकता बढ़ाने, लागत घटाने और राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए उच्च शिक्षा, अनुसंधान और व्यावहारिक प्रशिक्षण के माध्यम से मानव क्षमता का निर्माण अत्यंत आवश्यक है।

कृषि शिक्षा, अनुसंधान और प्रसार को इस क्षेत्र के तीन प्रमुख स्तंभ माना गया है। ये तीनों स्तंभ मिलकर उस संस्थागत और वैज्ञानिक ढांचे को बनाते हैं जो 5 प्रतिशत कृषि विकास दर को बनाए रखने और “विकसित कृषि एवं समृद्ध किसान” — अर्थात “विकसित भारत” की मूल अवधारणा — को साकार करने के लिए आवश्यक है। इस दृष्टि को प्राप्त करने के लिए इन तीनों स्तंभों को “वन नेशन – वन एग्रीकल्चर – वन टीम” की भावना के तहत समन्वयित रूप से कार्य करना होगा।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR)

स्थापना और भूमिका:

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की स्थापना वर्ष 1929 में की गई थी। यह कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अधीन एक शीर्ष संस्था है, जो भारत में कृषि, उद्यानिकी, मत्स्य और पशु विज्ञान के अनुसंधान और उच्च शिक्षा का समन्वय करती है।

विस्तृत नेटवर्क:

ICAR का नेटवर्क विश्व के सबसे बड़े कृषि अनुसंधान नेटवर्क में से एक है, जिसमें 113 राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थान और 74 कृषि विश्वविद्यालय शामिल हैं। इसने हरित क्रांति में अहम भूमिका निभाई और अब जलवायु-सहिष्णु, उच्च उत्पादक किस्मों एवं तकनीकों के विकास में अग्रणी भूमिका निभा रहा है।

प्रसार और गुणवत्ता:

ICAR देशभर में 731 कृषि विज्ञान केंद्र (KVKs) संचालित करता है, जो किसानों तक नवीन तकनीक पहुंचाने का कार्य करते हैं। यह संस्थान ICAR मॉडल एक्ट (संशोधित 2023) और कृषि महाविद्यालयों की स्थापना हेतु न्यूनतम आवश्यकताओं के मानक जारी करता है तथा राष्ट्रीय कृषि शिक्षा प्रत्यायन बोर्ड के माध्यम से संस्थानों का मान्यता प्रदान करता है।

कृषि शिक्षा संस्थान

सरकारी संस्थान:

भारत में वर्तमान में 63 राज्य कृषि विश्वविद्यालय (SAUs), 3 केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (CAUs) — (पूस, इंफाल, झांसी), 4 डीम्ड विश्वविद्यालय (IARI-नई दिल्ली, NDRI-कर्नाल, IVRI-इज़तनगर, CIFE-मुंबई), और 4 केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं जिनमें कृषि संकाय शामिल हैं। इसके अलावा, 11 एग्रीकल्चर टेक्नोलॉजी एप्लिकेशन रिसर्च इंस्टीट्यूट्स (ATARI) केंद्र भी ICAR नेटवर्क का हिस्सा हैं।

निजी क्षेत्र की भूमिका:

राज्य सरकारों की अपनी नीतियों के तहत निजी कृषि संस्थानों की स्थापना और प्रोत्साहन किया जाता है। ICAR इन संस्थानों को मान्यता प्रदान करता है। पिछले पाँच वर्षों में ICAR द्वारा मान्यता प्राप्त निजी कृषि कॉलेजों की संख्या 2020–21 में 5 से बढ़कर 2024–25 में 22 हो गई है।

केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (CAUs)

  1. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा (बिहार):

    • अक्टूबर 2016 में राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय (1970 में स्थापित) को CAU में परिवर्तित किया गया।

    • इसमें 8 घटक कॉलेज हैं — कृषि, कृषि अभियांत्रिकी, सामुदायिक विज्ञान, मत्स्य, उद्यानिकी, वानिकी, जैव प्रौद्योगिकी, और खाद्य प्रौद्योगिकी।

    • विश्वविद्यालय के तीन परिसर पूसा (समस्तीपुर), ढोली (मुजफ्फरपुर) और पिपराकोठी (पूर्वी चंपारण) में हैं।

    • यह 18 कृषि विज्ञान केंद्र (KVKs) संचालित करता है और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के अनुरूप लघु अवधि के प्रमाणपत्र एवं डिप्लोमा कार्यक्रम चलाता है।

  2. केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, इंफाल (मणिपुर):

    • 1993 में केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय अधिनियम, 1992 के तहत स्थापित।

    • यह पूर्वोत्तर भारत के 7 राज्यों — अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, सिक्किम, नागालैंड और त्रिपुरा — को सेवाएं प्रदान करता है।

    • इसके 13 घटक कॉलेज हैं और यह कृषि एवं संबद्ध विषयों में 10 स्नातक, 48 परास्नातक और 34 पीएच.डी. कार्यक्रम संचालित करता है।

  3. रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झांसी (उत्तर प्रदेश):

    • कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग (DARE) के अधीन संसद के अधिनियम (संख्या 10, 2014) द्वारा स्थापित।

    • विश्वविद्यालय कृषि, उद्यानिकी, पशु विज्ञान और कृषि अभियांत्रिकी में उत्कृष्टता केंद्र के रूप में कार्य करता है।

    • इसके कॉलेज झांसी (UP) और दतिया (MP) में स्थित हैं।

कृषि में इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI)

तकनीकी नवाचार:

सरकार IoT और AI तकनीकों को अपनाकर कृषि के आधुनिकीकरण को बढ़ावा दे रही है। इनका उपयोग सटीक कृषि (precision farming), ड्रोन तकनीक, जलवायु-स्मार्ट ग्रीनहाउस, कीट निगरानी, और रिमोट सेंसिंग में किया जा रहा है।

इनोवेशन हब्स:

डीएसटी के राष्ट्रीय मिशन ऑन इंटरडिसिप्लिनरी साइबर-फिजिकल सिस्टम्स (NM-ICPS) के तहत 25 टेक्नोलॉजी इनोवेशन हब्स (TIHs) स्थापित किए गए हैं, जिनमें से 3 कृषि में IoT और AI अनुप्रयोगों पर केंद्रित हैं।
उदाहरण के लिए —

  • IIT रोपड़ का एग्री/वॉटर TIH केसर उत्पादन हेतु IoT सेंसर पर कार्य कर रहा है।

  • IIT मुंबई “Internet of Everything” TIH चला रहा है।

  • IIT खड़गपुर का AI4ICPS हब AI/ML समाधानों पर केंद्रित है।

डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर:

इलेक्ट्रॉनिक्स मंत्रालय ने IoT उत्कृष्टता केंद्र बेंगलुरु, गुरुग्राम, गांधीनगर और विशाखापट्टनम में स्थापित किए हैं। विशाखापट्टनम का CoE कृषि-तकनीक को बढ़ावा देने के लिए उद्योग, निवेशक और अकादमिक जगत को जोड़ता है।

स्टार्टअप इकोसिस्टम:

राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) के तहत “इनोवेशन एंड एग्री-एंटरप्रेन्योरशिप डेवलपमेंट प्रोग्राम” के माध्यम से कृषि क्षेत्र में स्टार्टअप्स को आर्थिक सहायता और प्रशिक्षण दिया जा रहा है। ये स्टार्टअप AI, IoT, ब्लॉकचेन, फूड टेक्नोलॉजी, और वैल्यू एडिशन जैसे क्षेत्रों में कार्यरत हैं।

किसानों का कौशल विकास और प्रशिक्षण

सरकार ने किसानों को नई तकनीकों और बाजार की मांगों के अनुरूप ढालने के लिए कौशल विकास को प्राथमिकता दी है।

मुख्य कार्यक्रम:

  • स्किल ट्रेनिंग ऑफ रूरल यूथ (STRY) — 2021–24 के बीच 51,000 से अधिक ग्रामीण युवाओं को प्रशिक्षित किया गया।

  • कृषि यांत्रिकीकरण उप-मिशन (SMAM) — 2021–25 के दौरान 57,000 किसानों को आधुनिक कृषि मशीनरी के उपयोग में प्रशिक्षित किया गया।

  • मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना (Soil Health Card) — जुलाई 2025 तक 25.17 करोड़ कार्ड जारी किए गए, 93,000+ प्रशिक्षण और 6.8 लाख प्रदर्शन आयोजित हुए।

  • कृषि विज्ञान केंद्र (KVKs) — 2021–25 के बीच 76 लाख से अधिक किसानों को प्रशिक्षित किया गया।

  • कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी (ATMA) — 2021–25 के दौरान 1.27 करोड़ किसानों को प्रशिक्षण मिला।

  • किसान उत्पादक संगठन (FPOs) — 10,000 से अधिक पंजीकृत, जो किसानों को व्यवसाय और विपणन कौशल में प्रशिक्षित कर रहे हैं।

निष्कर्ष

भारत का कृषि शिक्षा और प्रशिक्षण तंत्र आज शिक्षा, अनुसंधान, तकनीक और कौशल विकास को एकीकृत रूप में जोड़ता है। ICAR, केंद्रीय और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों तथा कृषि विज्ञान केंद्रों ने एक मजबूत आधार बनाया है जिससे खेती अधिक उत्पादक, टिकाऊ और ज्ञान-आधारित बन रही है।

IoT, AI, और सटीक कृषि तकनीकों के उपयोग ने कृषि को आधुनिक और डेटा-आधारित दिशा में अग्रसर किया है। ATMA, STRY, और SMAM जैसी योजनाओं ने किसानों और ग्रामीण युवाओं को तकनीकी एवं उद्यमशीलता कौशल से सशक्त बनाया है।

इन पहलों के माध्यम से भारत न केवल आत्मनिर्भर खाद्य उत्पादन की दिशा में अग्रसर है, बल्कि एक मजबूत, समृद्ध और आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था के निर्माण की ओर भी बढ़ रहा है।

शिवराज सिंह चौहान ने तमिलनाडु के वेल्लोर स्थित ICAR–कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) का दौरा किया; “वन एग्रीकल्चर – वन नेशन – वन टीम” की भावना के तहत किसानों से किया संवाद

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केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आज तमिलनाडु के वेल्लोर स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) – कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) का दौरा किया। यह दौरा “वन एग्रीकल्चर – वन नेशन – वन टीम” (One Agriculture – One Nation – One Team) की भावना के अंतर्गत भारत के कृषि क्षेत्र की एकता और समग्र प्रगति का प्रतीक रहा।


वेल्लोर में  शिवराज चौहान ने किसानों और ग्रामीण समुदाय के सदस्यों के साथ संवाद किया और उनसे प्रधान मंत्री धन धान्य कृषि योजना (PM-DDKY), राष्ट्रीय दलहन मिशन, राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (NMNF), क्लस्टर फ्रंटलाइन डेमोंस्ट्रेशन ऑन पल्सेस (CFLD on Pulses), फर्मेंटेड ऑर्गेनिक मैन्योर (FOM/LFOM) तथा अन्य KVK संबंधित योजनाओं पर चर्चा की।

अपने दौरे के दौरान केंद्रीय मंत्री ने प्रगतिशील किसानों, महिला स्व-सहायता समूहों (SHG) और ग्रामीण युवाओं से बातचीत की तथा क्षेत्र की कृषि उपलब्धियों की समीक्षा की। उन्होंने वेल्लोर कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा विकसित जंगली सूअर भगाने वाले उपकरण (Wild Boar Repellent) जैसी नवाचार तकनीक की सराहना की, जिसने किसानों को जंगली सूअरों से फसलों की सुरक्षा का व्यावहारिक समाधान प्रदान किया है। सीड हब और पल्सेस मिशन के अंतर्गत उच्च उत्पादक किस्में (VBN-8, VBN-10, VBN-11) सफलतापूर्वक प्रसारित की गई हैं। केंद्रीय मंत्री ने कृषि नवाचारों और मूल्यवर्धित उत्पादों की प्रदर्शनी भी देखी।

शिवराज चौहान ने किसानों से कृषि, पशुपालन और मत्स्य पालन से जुड़ी योजनाओं पर फीडबैक लिया और उन्हें बेहतर कृषि प्रथाओं के बारे में मार्गदर्शन दिया। ‘चौपाल’ संवाद के दौरान उन्होंने विभिन्न योजनाओं पर जमीनी स्तर की प्रतिक्रिया प्राप्त की और आसपास के जिलों के किसानों से भी बातचीत की।

पहली ‘चौपाल’ में शिवराज चौहान ने तमिलनाडु के विरुधुनगर, शिवगंगा, तूतीकोरिन और रामनाथपुरम जिलों के किसानों से बातचीत की, जो प्रधान मंत्री धन धान्य कृषि योजना (PM-DDKY) से जुड़े हुए हैं। उन्होंने बताया कि इस योजना के तहत 11 केंद्रीय मंत्रालयों की 36 योजनाओं का एकीकरण किया जा रहा है, जिससे किसानों को समग्र लाभ प्राप्त हो सके। उन्होंने इन चार जिलों के KVK प्रमुखों के साथ योजना के अभिसरण की प्रगति की समीक्षा की। किसानों ने प्राकृतिक खेती, मुंडु मिर्च की खेती, दलहन एवं तिलहन CFLD और अन्य परियोजनाओं से संतुष्टि व्यक्त की।

दूसरी ‘चौपाल’ में शिवराज सिंह ने प्राकृतिक खेती और राष्ट्रीय दलहन मिशन पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रारंभ की गई यह अनोखी पहल देश को दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाएगी। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु जैसे राज्य इस मिशन से उन्नत किस्मों, आधुनिक तकनीक और सुनिश्चित विपणन के माध्यम से अत्यधिक लाभान्वित होंगे। उन्होंने राष्ट्रीय दलहन अनुसंधान केंद्र, वंबन (TNAU) द्वारा विकसित उन्नत दलहन किस्मों की भी सराहना की।

कृषि से संबंधित प्रमुख घोषणाएँ

केंद्रीय मंत्री ने धैर्यपूर्वक किसानों की समस्याएँ सुनीं और आश्वासन दिया कि नारियल फसलों को प्रभावित करने वाले कीट और रोगों के समाधान के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे। उन्होंने यह भी कहा कि आम उत्पादन में अधिकता से उत्पन्न मूल्य गिरावट की समस्या को दूर करने के लिए मूल्य संवर्धन और प्रसंस्करण इकाइयाँ स्थापित करने के प्रयास किए जाएंगे।
उन्होंने आश्वासन दिया कि तमिलनाडु के सभी पात्र किसानों को प्रधान मंत्री किसान सम्मान निधि योजना (PM-KISAN) से जोड़ा जाएगा ताकि अधिकतम लाभ सुनिश्चित किया जा सके।

तमिलनाडु के किसानों के प्रति प्रशंसा

अपने संबोधन में शिवराज सिंह चौहान ने तमिलनाडु के मेहनती किसानों, उनकी संस्कृति और मूल्यों के प्रति गहरी प्रशंसा व्यक्त की। उन्होंने कहा कि वे शीघ्र ही फिर से तमिलनाडु आएंगे ताकि किसानों से सीधे संवाद कर सकें और प्राकृतिक खेती सहित अन्य योजनाओं पर चर्चा कर सकें।

कार्यक्रम में तमिलनाडु के कृषि, उद्यानिकी एवं किसान कल्याण विभाग के निदेशक; TNAU के कुलपति डॉ. आर. तमिऴवेंदान; ICAR-ATARI हैदराबाद के निदेशक डॉ. शेख एन. मीरा; कृषि एवं किसान कल्याण विभाग की संयुक्त सचिव इनिथा; राज्य उद्यानिकी आयुक्त कुमारवेल पांडियन, TNAU और TANUVAS के वरिष्ठ अधिकारी, ICAR तथा कृषि, उद्यानिकी, पशुपालन और संबद्ध क्षेत्रों के प्रतिनिधि उपस्थित थे।
सैकड़ों किसान इस कार्यक्रम में शामिल हुए और केंद्र व राज्य स्तर पर कृषि विकास प्रयासों के प्रति उत्साह व्यक्त किया। ‘ड्रोन दीदी’ और ‘लखपति दीदी’ जैसे स्व-सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएँ भी इस संवाद में शामिल हुईं।

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ICAR–मक्का अनुसंधान संस्थान का दौरा किया, नए प्रशासनिक भवन का उद्घाटन और किसानों से की बातचीत

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केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आज पंजाब के लुधियाना स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद–भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान (ICAR-IIMR) का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने संस्थान के नए निर्माणाधीन प्रशासनिक भवन का उद्घाटन किया और मक्का के हितधारकों, किसानों, ग्रामीण विकास योजनाओं के लाभार्थियों तथा महिला स्व-सहायता समूह (SHG) के सदस्यों से संवाद किया। केंद्रीय मंत्री ने पत्रकारों से भी बात की और पंजाब में कृषि और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में केंद्रीय सरकार की प्रमुख पहलों और विकास कार्यक्रमों के बारे में जानकारी साझा की।

इस अवसर पर कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री भगीरथ चौधरी, रेलवे एवं खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्य मंत्री रवीनीत सिंह बिट्टू, और पंजाब कृषि मंत्री गुरमीत सिंह खुदियन भी उपस्थित थे।

शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्रीय सरकार के प्रमुख उद्देश्य हैं अन्न उत्पादन बढ़ाना, उत्पादन लागत कम करना और किसानों की आय बढ़ाना। उन्होंने कहा कि भारत गेहूँ और चावल में पूरी तरह आत्मनिर्भर है, लेकिन कृषि में विविधीकरण आवश्यक है। उन्होंने कहा, “गेहूँ और चावल के बाद मक्का हमारे देश की तीसरी सबसे महत्वपूर्ण फसल है। यह केवल खाद्य फसल नहीं है, बल्कि इसके कई औद्योगिक उपयोग भी हैं। मक्का धान का सतत् विकल्प बन सकता है, जिससे जल की बचत होगी और किसानों को बेहतर लाभ मिलेगा।”

केंद्रीय मंत्री ने भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान के महत्व पर भी जोर दिया, कहा कि संस्थान का कार्य मक्का उत्पादन बढ़ाने और कृषि विविधीकरण को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

शिवराज सिंह चौहान ने घोषणा की कि केंद्रीय सरकार ने पंजाब में फसल हानि के लिए गेहूँ के बीज मुफ्त वितरण हेतु ₹74 करोड़ जारी किए हैं। सरसों और अन्य बीज किस्मों के लिए भी धन स्वीकृत किया गया है। इसके अलावा, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-Kisan Samman Nidhi) योजना के तहत 11.09 लाख किसानों के खातों में अग्रिम रूप से ₹222 करोड़ पहले ही स्थानांतरित किए जा चुके हैं। समग्र बागवानी विकास मिशन (MIDH) के तहत भी प्रभावित किसानों को सहायता प्रदान की जाएगी।

पंजाब की पुनर्वास और लचीलेपन के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दोहराते हुए,शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि प्रधानमंत्री राज्य में बाढ़ से हुए नुकसान को लेकर गहन चिंता व्यक्त कर रहे हैं। केंद्रीय सरकार ने बाढ़ प्रभावित परिवारों के लिए ₹1,600 करोड़ का पैकेज मंजूर किया है। उन्होंने बताया कि 36,703 क्षतिग्रस्त घरों के पुनर्निर्माण के लिए प्रति परिवार ₹1.60 लाख स्वीकृत किए गए हैं, जिसमें ₹1.20 लाख घर निर्माण के लिए और ₹40,000 श्रम एवं शौचालय सुविधाओं के लिए हैं।

शिवराज सिंह चौहान ने नागरिकों से भारतीय निर्मित (स्वदेशी) उत्पादों को प्राथमिकता देने का आग्रह किया, कहा कि इससे स्थानीय कारीगर सशक्त होंगे, धन देश में रहेगा और भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। उन्होंने कहा, “स्वदेशी उत्पादों का समर्थन कर हम न केवल आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देते हैं, बल्कि स्थानीय समुदायों की समृद्धि सुनिश्चित करते हैं।”


“Weaving India Together” राष्ट्रीय सम्मेलन में बोले शिवराज सिंह चौहान – पूर्वोत्तर के कारीगर भारत की सांस्कृतिक धरोहर के संवाहक

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नई दिल्ली- राजधानी दिल्ली के सी. सुब्रमण्यम ऑडिटोरियम, NASC कॉम्प्लेक्स में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन “Weaving India Together” में देशभर से आए बुनकरों और कारीगरों ने अपनी कला, अनुभव और चुनौतियों को साझा किया।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पूर्वोत्तर भारत से आए बुनकरों और कारीगरों से संवाद किया और उनकी समृद्ध कला, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि भारत की आत्मा गाँवों में बसती है और बुनकरों व कारीगरों की मेहनत से देश की पहचान और भी सशक्त होती है।

“वोकल फॉर लोकल” और “आत्मनिर्भर भारत” पर जोर

शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश “वोकल फॉर लोकल” के मंत्र के साथ आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि पारंपरिक हस्तशिल्प को आधुनिक बाजारों से जोड़ने की दिशा में सरकार कई कदम उठा रही है, जिससे ग्रामीण कारीगरों को आर्थिक सशक्तिकरण और रोजगार के नए अवसर मिलेंगे।

नीति निर्माताओं और कारीगरों का संवाद

इस अवसर पर उपस्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक एवं DARE सचिव डॉ. मांगी लाल जाट, तथा ICAR के कृषि प्रसार के उप महानिदेशक डॉ. राजबीर सिंह ने भी कारीगरों से बातचीत की और उनके अनुभव सुने।
कार्यक्रम ने कारीगरों को अपने अनुभव, चुनौतियाँ और आकांक्षाएँ साझा करने का मंच दिया, वहीं अधिकारियों और विशेषज्ञों ने पारंपरिक कला और आधुनिक तकनीक को एकजुट करने के उपायों पर चर्चा की।

इम्फाल विश्वविद्यालय के प्रयासों की सराहना

कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, इम्फाल के प्रयासों की भी सराहना की गई, जिसने बुनाई परंपराओं को बढ़ावा देने, कारीगरों को प्रशिक्षण देने और सामुदायिक हस्तशिल्प के माध्यम से आर्थिक अवसर सृजित करने में अहम भूमिका निभाई है।

 कारीगरों के माध्यम से “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” का संदेश

सम्मेलन ने “वीविंग इंडिया टुगेदर” के माध्यम से यह संदेश दिया कि भारत की विविधता उसकी ताकत है — और देश के कारीगर इस विविधता को एक सूत्र में पिरोने का कार्य कर रहे हैं।



ICAR में गन्ना अनुसंधान के लिए विशेष टीम गठित, किसानों की आय और उत्पादन बढ़ाने पर जोर

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कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने घोषणा की है कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अंतर्गत गन्ना अनुसंधान के लिए एक विशेष टीम गठित की जाएगी। यह टीम गन्ना नीति पर भी कार्य करेगी। मंत्री जी ने यह घोषणा ग्रामीण वॉइस और नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज़ द्वारा ICAR के सहयोग से आयोजित गन्ना अर्थव्यवस्था पर राष्ट्रीय चर्चा में की।

चौहान ने कहा कि गन्ने की किस्म 238 में शर्करा की मात्रा अच्छी है, लेकिन यह रेड रॉट रोग के प्रति संवेदनशील है। उन्होंने एक साथ वैकल्पिक किस्मों के विकास की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका कहना था कि नई किस्मों के साथ अक्सर नई बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है, और रोग नियंत्रण एक बड़ी चुनौती है।

उन्होंने बताया कि मोनो-क्रॉपिंग (एक ही फसल बार-बार उगाना) से कई समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, जैसे पोषण तत्त्वों की कमी और नाइट्रोजन फिक्सेशन में सीमाएँ। इसकी जगह इंटरक्रॉपिंग (मिश्रित खेती) पर विचार करना जरूरी है।

चौहान ने कहा—

"हमें उत्पादन और मशीनीकरण बढ़ाने, लागत घटाने और रिकवरी सुधारने पर ध्यान देना होगा। पानी का उपयोग गंभीर चिंता का विषय है। ‘प्रति बूंद, अधिक फसल’ के सिद्धांत पर हमें पानी की खपत कम करने की रणनीति बनानी होगी। लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि ड्रिप इरीगेशन की लागत किसानों पर भारी पड़ती है।"

उन्होंने बायो-प्रोडक्ट्स पर भी बल दिया। उनका कहना था कि जहाँ एथनॉल और मोलासेस का उपयोग अच्छी तरह से हो रहा है, वहीं किसानों की आय बढ़ाने के लिए नए मूल्यवर्धित उत्पाद विकसित करने होंगे। साथ ही, प्राकृतिक खेती से खाद पर निर्भरता कम की जा सकती है।

गन्ना मूल्य शृंखला की समस्याओं पर बोलते हुए चौहान ने माना कि किसानों की भुगतान में देरी की शिकायतें वाजिब हैं। मिलों की भी कठिनाइयाँ हैं, लेकिन देर से भुगतान का सबसे अधिक नुकसान किसानों को उठाना पड़ता है। उन्होंने श्रमिकों की कमी पर भी ध्यान दिलाया और कहा कि गन्ना कटाई को कम श्रम-प्रधान बनाने के लिए प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण और मशीनीकरण में नवाचार की जरूरत है।

"मैं ICAR से आग्रह करता हूँ कि गन्ना अनुसंधान के लिए अलग टीम बनाए, जो व्यावहारिक मुद्दों पर काम करे। अनुसंधान का लाभ किसानों और उद्योग दोनों को मिलना चाहिए। जो शोध किसानों के काम न आए, उसका कोई अर्थ नहीं," उन्होंने कहा।

सेमिनार में ICAR के महानिदेशक एवं DARE सचिव डॉ. एम.एल. जात ने अनुसंधान के चार प्रमुख क्षेत्रों की पहचान की—

  1. अनुसंधान की प्राथमिकताएँ तय करना

  2. अनुसंधान को आगे बढ़ाने में विकासात्मक चुनौतियाँ

  3. उद्योग से जुड़ी समस्याओं का समाधान

  4. इस क्षेत्र को सहयोग देने के लिए नीतिगत सुझाव

डॉ. जात ने कहा कि गन्ने में पानी और खाद की खपत बहुत अधिक होती है। पानी की कमी दूर करने के लिए कई अध्ययन हुए हैं और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में माइक्रो-इरिगेशन पद्धतियाँ आशाजनक साबित हुई हैं। उन्होंने यह भी कहा कि खाद का उपयोग वर्तमान में अप्रभावी है और उसकी दक्षता बढ़ाना आवश्यक है।

उन्होंने फसल विविधीकरण पर जोर देते हुए कहा कि दलहन और तिलहन को गन्ने के साथ मिलाने से न केवल उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि किसानों की आय और स्थिरता भी मजबूत होगी।

ICAR के डॉ. देवेंद्र कुमार यादव (उप महानिदेशक, फसल विज्ञान) ने बताया कि किस्म 238 किसानों द्वारा खूब अपनाई गई, लेकिन इससे मोनो-क्रॉपिंग को बढ़ावा मिला। उन्होंने कहा कि वैकल्पिक किस्में उपलब्ध हैं, लेकिन नई किस्मों को अपनाने में समय लगता है क्योंकि हर किस्म को रोग, कीट प्रतिरोध और पैदावार की निगरानी के लिए तीन साल का परीक्षण करना होता है। उनके अनुसार अधिकांश फसलों में यील्ड गैप का विश्लेषण करना बहुत जरूरी है।

डॉ. राजबीर सिंह (उप महानिदेशक, विस्तार, ICAR) ने सेमिनार के एक सत्र की अध्यक्षता की।



सिक्किम में कृषि शिक्षा को बढ़ावा: केंद्रीय मंत्री ने बागवानी कॉलेज भवनों का उद्घाटन

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केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, इम्फाल के अंतर्गत सिक्किम के बर्मीओक स्थित बागवानी महाविद्यालय की प्रशासनिक एवं शैक्षणिक इमारतों का उद्घाटन आज केंद्रीय कृषि, किसान कल्याण एवं ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने वर्चुअल माध्यम से किया। इस अवसर पर वार्षिक क्षेत्रीय कार्यशाला का भी आयोजन हुआ। कार्यक्रम में सिक्किम के राज्यपाल ओम प्रकाश माथुर, केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री भगीरथ चौधरी, सिक्किम के कृषि मंत्री पुरन कुमार गुरूंग, कुलपति डॉ. अनुपम मिश्रा एवं अन्य गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे।

शिवराज चौहान ने कहा कि यद्यपि वे आज शारीरिक रूप से सिक्किम में उपस्थित नहीं हैं, किंतु उनकी आत्मा बर्मीओक के नव-निर्मित भवनों में सभी के साथ है। उन्होंने बताया कि भारत सरकार की ओर से केंद्रीय राज्य मंत्री भगीरथ चौधरी कार्यक्रम में व्यक्तिगत रूप से सम्मिलित हुए।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि लगभग ₹52 करोड़ की लागत से निर्मित यह नई इमारतें सिक्किम के युवाओं को बेहतर शैक्षणिक सुविधाएँ प्रदान करेंगी। सिक्किम को प्राकृतिक सौंदर्य एवं अनोखी जलवायु वाला अद्भुत राज्य बताते हुए उन्होंने कहा कि यहाँ की भूमि एवोकाडो, कीवी, बड़ी इलायची, आर्किड और अदरक, हल्दी, टमाटर, पत्ता गोभी जैसी सब्जियों की अपार संभावनाएँ रखती है।

उन्होंने कहा कि मधुमक्खी पालन, मशरूम उत्पादन, बांस और औषधीय पौधों जैसी गैर-पारंपरिक खेती को प्रोत्साहित करके सिक्किम ने बागवानी गतिविधियों में विविधता लाई है। सिक्किम को एक पूर्णत: जैविक राज्य बताते हुए उन्होंने कहा कि यहाँ के किसान रासायनिक उर्वरकों से दूर रहते हुए शुद्ध उत्पादन केवल सिक्किम ही नहीं बल्कि पूरे देश को उपलब्ध कराते हैं। इसके लिए उन्होंने सिक्किम के किसानों को नमन किया।

शिवराज चौहान ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय कृषि तीव्र गति से प्रगति कर रही है और प्रधानमंत्री ने पर्वतीय राज्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। उन्होंने आश्वासन दिया कि भारत सरकार सिक्किम में कृषि को बढ़ावा देने में कोई कमी नहीं छोड़ेगी। उन्होंने कहा कि देश में जैविक खेती का विस्तार समय की आवश्यकता है।

केंद्रीय मंत्री ने प्रधानमंत्री मोदी के कृषि संवर्धन हेतु छह सूत्रीय कार्यक्रम को स्पष्ट किया: उत्पादन बढ़ाना, खेती की लागत कम करना, उपज का उचित मूल्य सुनिश्चित करना, नुकसान की भरपाई करना और कृषि का विविधीकरण। उन्होंने कहा कि फ्लोरीकल्चर, बांस और बागवानी किसानों की आय बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों के उपयोग पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इससे कई बीमारियाँ उत्पन्न हुई हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए यह हानिकारक सिद्ध हो सकता है।

कृषि के विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए शिवराज चौहान ने उनसे आग्रह किया कि शिक्षा पूर्ण करने के बाद भी वे कृषि से जुड़े रहें – चाहे स्वयं खेती करें, कृषि-आधारित स्टार्टअप शुरू करें या कृषि में नई तकनीक एवं नवाचार लाएँ। उन्होंने कहा कि कृषि में अपार संभावनाएँ हैं और आज भी यह भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है तथा किसान इसकी आत्मा हैं। उन्होंने बताया कि देश की लगभग 46% जनसंख्या कृषि में संलग्न है।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक डॉ. मंगी लाल जाट ने भी कार्यक्रम में कृषि भवन, नई दिल्ली से वर्चुअल माध्यम से भाग लिया।

भारत–ब्राज़ील कृषि नवाचार सहयोग: ICAR ने Maitri 2.0 कार्यक्रम लॉन्च किया

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भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने नई दिल्ली में ब्राज़ील–भारत क्रॉस-इंक्यूबेशन प्रोग्राम इन एग्रीटेक (Maitri 2.0) का दूसरा संस्करण लॉन्च किया। इस कार्यक्रम में डॉ. एम.एल. जाट (सचिव, DARE और महानिदेशक, ICAR) और ब्राज़ील के राजदूत केनेथ नोब्रागा के अलावा प्रमुख ब्राज़ीलियाई अनुसंधान और नवाचार संस्थानों के प्रतिनिधि उपस्थित थे।

  • डॉ. जाट ने भारत और ब्राज़ील के 77 वर्षीय साझेदारी और BRICS तथा G20 जैसे वैश्विक मंचों में सहयोग पर प्रकाश डाला। उन्होंने ICAR–EMBRAPA MoU को कृषि-खाद्य श्रृंखला में सहयोग के लिए महत्वपूर्ण कदम बताया।

  • उन्होंने ICAR के नवाचार और पेटेंट की उपलब्धियों का जिक्र किया: 1996 में 74 पेटेंट से बढ़कर वर्तमान में हर साल 1,800 से अधिक पेटेंट, 5,000 से अधिक लाइसेंसिंग समझौते, और नवाचार केंद्रों के माध्यम से व्यावसायीकरण पर जोर।

  • Maitri 2.0 को उन्होंने भारत और ब्राज़ील के नवप्रवर्तकों के बीच सह-निर्माण और सीखने का मंच बताया।

ब्राज़ील के राजदूत केनेथ नोब्रागा ने कार्यक्रम की सराहना करते हुए कहा कि Maitri 2.0 भारत–ब्राज़ील रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करता है और कृषि, उभरती तकनीकों, और खाद्य एवं पोषण सुरक्षा में सहयोग की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

  • डॉ. च. श्रीनिवास राव (निदेशक, ICAR–IARI) ने बताया कि ICAR–IARI ने 400+ कृषि स्टार्टअप का समर्थन किया है, और कृषि को न केवल आजीविका बल्कि व्यवसाय के रूप में देखने की आवश्यकता पर जोर दिया।

  • डॉ. नीरू भूषण (ADG, IPTM) ने साझा चुनौतियों जैसे जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा और सतत कृषि विकास पर प्रकाश डाला।

कार्यक्रम का समापन डॉ. विश्वनाथन श्रीनिवासन (JD, ICAR-IARI) के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।

Maitri 2.0 के उद्देश्य:

  • भारत और ब्राज़ील के नवप्रवर्तकों, स्टार्टअप और संस्थानों को एक मंच पर लाना।

  • कृषि नवाचार और इनक्यूबेटर लिंक को मजबूत करना।

  • सर्वश्रेष्ठ प्रथाओं का आदान–प्रदान और सह-इंक्यूबेशन को बढ़ावा देना।

  • सतत कृषि, डिजिटल तकनीकों और मूल्य श्रृंखला विकास में नए अवसर खोलना।

  • किसानों को सशक्त बनाकर लचीली खाद्य प्रणालियों का निर्माण करना।

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