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SYNCHN 2026: लैब से मरीज तक स्वास्थ्य नवाचार पहुंचाने पर जोर, THSTI ने आयोजित किया तीसरा इंडस्ट्री बिजनेस मीट

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जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT), भारत सरकार के अंतर्गत बायोटेक्नोलॉजी रिसर्च एंड इनोवेशन काउंसिल (BRIC) के संस्थान ट्रांसलेशनल हेल्थ साइंस एंड टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट (THSTI) ने आज फरीदाबाद स्थित एनसीआर बायोटेक साइंस क्लस्टर में अपना तीसरा वार्षिक इंडस्ट्री बिजनेस मीट SYNCHN 2026 (Synergistic Collaboration in Healthcare Innovation) सफलतापूर्वक आयोजित किया।

इस सम्मेलन में वैश्विक स्वास्थ्य विशेषज्ञों, जैव प्रौद्योगिकी वैज्ञानिकों, स्टार्टअप्स, निवेशकों, नीति निर्माताओं और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य प्रयोगशाला में विकसित शोध को व्यावसायिक स्तर पर मरीजों तक पहुंचाने और स्वास्थ्य क्षेत्र में उद्योग–शोध संस्थानों के बीच सहयोग को मजबूत बनाना था।

मुख्य अतिथि डॉ. किरण मजूमदार-शॉ, कार्यकारी अध्यक्ष, बायोकॉन, ने वर्चुअल संबोधन में कहा कि 21वीं सदी जीवविज्ञान, जैव प्रौद्योगिकी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की होगी। उन्होंने कहा कि भारत में उत्कृष्ट वैज्ञानिक संस्थान हैं, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती वैज्ञानिक खोजों को बाजार और मरीजों तक पहुंचाना है। THSTI और SYNCHN जैसे मंच इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

THSTI के कार्यकारी निदेशक प्रो. गणेशन कार्तिकेयन ने बताया कि 2024 में SYNCHN के पहले संस्करण में 13 लेटर ऑफ इंटेंट पर हस्ताक्षर हुए थे, जबकि 2025 में यह संख्या बढ़कर 19 रणनीतिक समझौतों तक पहुंच गई। उन्होंने कहा कि संस्थान का लक्ष्य केवल शोध करना नहीं, बल्कि उसे सफल उत्पाद और उपचार में बदलना है।

उन्होंने THSTI के अत्याधुनिक मेडिकल रिसर्च सेंटर (MRC) और APEX (Accelerated Productisation and Epidemic Preparedness) पहल की भी जानकारी दी। MRC में प्रारंभिक चरण के क्लिनिकल ट्रायल, CAR-T सेल रिसर्च यूनिट और भारत की पहली Controlled Human Infection Studies (CHIS) सुविधा उपलब्ध है।

कार्यक्रम में ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) डॉ. राजीव सिंह रघुवंशी ने बताया कि CDSCO जैविक दवाओं (Biologics) के लिए नई नियामक व्यवस्था तैयार कर रहा है, जिसमें उद्योग विशेषज्ञों की भी भागीदारी होगी। वहीं नीति आयोग के सदस्य प्रो. एम. श्रीनिवास ने शोध को सस्ती और प्रभावी स्वास्थ्य सेवाओं में बदलने के लिए उद्योग और अनुसंधान संस्थानों के बीच मजबूत सहयोग पर जोर दिया।

BIRAC के डॉ. मनीष दीवान ने Research Development and Innovation (RDI) Fund को स्टार्टअप्स और उद्योगों के लिए वित्तीय सहायता का महत्वपूर्ण माध्यम बताया। वहीं IVCA के अमित पांडेय ने कहा कि भारत की बायोइकोनॉमी लगभग 18% वार्षिक वृद्धि के साथ तेजी से आगे बढ़ रही है।

सम्मेलन के दौरान कई महत्वपूर्ण पैनल चर्चाएं भी आयोजित की गईं, जिनमें वैश्विक स्वास्थ्य सहयोग, प्रारंभिक क्लिनिकल ट्रायल को तेज करने, जैव-प्रौद्योगिकी स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने और शोध से व्यवसाय तक की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने पर विस्तार से चर्चा हुई।

कार्यक्रम के अंत में उद्योग जगत के प्रतिनिधियों ने THSTI के वैज्ञानिकों के साथ खुली चर्चा की और संस्थान की अत्याधुनिक अनुसंधान सुविधाओं का दौरा भी किया।



प्रिसिजन मेडिसिन और जीन थेरेपी से बदलेगा स्वास्थ्य सेवा का भविष्य, भारत बनेगा वैश्विक हेल्थकेयर इनोवेशन हब: डॉ. जितेंद्र सिंह

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नई दिल्ली- डॉक्टर्स डे की पूर्व संध्या पर केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) तथा प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा एवं अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि प्रिसिजन मेडिसिन (Precision Medicine), जीन थेरेपी, न्यूक्लियर मेडिसिन और अन्य उभरती तकनीकें भविष्य की स्वास्थ्य सेवाओं को पूरी तरह बदल देंगी। उन्होंने कहा कि भारत स्वदेशी अनुसंधान के माध्यम से वैश्विक स्वास्थ्य चुनौतियों के समाधान विकसित कर रहा है और तेजी से विश्वस्तरीय हेल्थकेयर इनोवेशन हब के रूप में उभर रहा है।

डॉक्टर्स डे कॉन्क्लेव को संबोधित करते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि भारत की विशाल आनुवंशिक (Genetic) विविधता, विभिन्न प्रकार की बीमारियों का व्यापक स्वरूप और मजबूत होता वैज्ञानिक ढांचा देश को "भारतीय मरीजों के लिए भारतीय डेटा आधारित भारतीय उपचार" विकसित करने का अनूठा अवसर प्रदान करता है। इससे न केवल देश की स्वास्थ्य जरूरतें पूरी होंगी, बल्कि दुनिया को भी किफायती और प्रभावी चिकित्सा समाधान मिलेंगे।

प्रिसिजन मेडिसिन से बदलेगा इलाज का तरीका

उन्होंने कहा कि भविष्य में इलाज मरीज के जीन, जीवनशैली और पर्यावरणीय परिस्थितियों के आधार पर तय होगा। इससे रोगों का अधिक सटीक निदान, लक्षित उपचार और बेहतर परिणाम संभव होंगे।

जीनोम इंडिया मिशन बना मजबूत आधार

डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया कि जीनोम इंडिया मिशन के तहत अब तक 10,000 से अधिक लोगों का जीनोम सीक्वेंसिंग कार्य पूरा हो चुका है और भारत दुनिया के सबसे बड़े जीनोमिक डाटाबेस में से एक तैयार करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। इससे दुर्लभ आनुवंशिक रोगों और व्यक्तिगत चिकित्सा (Personalized Medicine) पर शोध को नई गति मिलेगी।

जीन थेरेपी और न्यूक्लियर मेडिसिन में बड़ी उपलब्धियां

उन्होंने कहा कि भारतीय वैज्ञानिकों ने हाल ही में हीमोफीलिया के लिए स्वदेशी जीन थेरेपी का सफल प्रदर्शन किया है, जो देश की चिकित्सा अनुसंधान क्षमता का बड़ा उदाहरण है। साथ ही न्यूक्लियर मेडिसिन कैंसर सहित गंभीर बीमारियों के उपचार में क्रांतिकारी बदलाव लाने की क्षमता रखती है।

स्वास्थ्य सेवाओं में एआई की बढ़ती भूमिका

डॉ. सिंह ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आज जीनोम विश्लेषण, रोगों की पहचान, मेडिकल शिक्षा, बायोमेडिकल रिसर्च और टेलीमेडिसिन जैसे क्षेत्रों में तेजी से उपयोग हो रहा है। इससे जटिल चिकित्सा डेटा का विश्लेषण तेजी से संभव हो रहा है और दूरदराज के क्षेत्रों तक विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाएं पहुंच रही हैं।

स्वदेशी दवा अनुसंधान में भारत आगे

उन्होंने कहा कि भारत अब केवल विदेशों में विकसित दवाओं का निर्माण करने वाला देश नहीं रहा, बल्कि स्वदेशी अनुसंधान, क्लिनिकल ट्रायल और नवाचार के माध्यम से नई दवाएं विकसित कर रहा है। हाल ही में दवा-प्रतिरोधी संक्रमणों के लिए विकसित भारत की पहली स्वदेशी एंटीबायोटिक इसका प्रमाण है।

जैव प्रौद्योगिकी और मेडिकल डिवाइस क्षेत्र में तेजी

डॉ. सिंह ने बताया कि BioE3 नीति और Bio-RIDE मिशन के माध्यम से जैव प्रौद्योगिकी, बायो-मैन्युफैक्चरिंग और हेल्थकेयर इनोवेशन को नई गति मिल रही है। वहीं भारत का मेडिकल डिवाइस उद्योग भी वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी तकनीक विकसित कर रहा है।

आयुष्मान भारत और डिजिटल हेल्थ नेटवर्क की सराहना

उन्होंने आयुष्मान भारत को दुनिया की सबसे समावेशी स्वास्थ्य सुरक्षा योजनाओं में से एक बताते हुए कहा कि मेडिकल कॉलेजों के विस्तार, डिजिटल हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर और टेलीमेडिसिन ने देश में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच को काफी मजबूत किया है।

रोकथाम आधारित स्वास्थ्य सेवाओं पर जोर

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भविष्य में डायबिटीज, कैंसर और फैटी लिवर जैसी गैर-संचारी बीमारियों से निपटने के लिए समय पर जांच, नियमित स्क्रीनिंग, जन-जागरूकता और रोकथाम आधारित स्वास्थ्य सेवाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी।

उन्होंने विश्वास जताया कि विज्ञान, नवाचार और अनुसंधान में निरंतर निवेश तथा सरकार, उद्योग और शिक्षण संस्थानों के बीच मजबूत साझेदारी भारत को अगली पीढ़ी की स्वास्थ्य सेवाओं का वैश्विक नेतृत्वकर्ता बनाएगी और विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

आयुष मंत्रालय की उच्च स्तरीय बैठक में ASU चिकित्सा प्रणाली के लिए वैश्विक कोडिंग ढांचे के विकास पर चर्चा

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भारत सरकार के आयुष मंत्रालय ने 25–26 मई 2026 को ऑनलाइन माध्यम से आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी (ASU) चिकित्सा प्रणालियों के लिए इंटरनेशनल क्लासिफिकेशन ऑफ हेल्थ इंटरवेंशन्स (ICHI) तथा नेशनल हेल्थ इंटरवेंशन कोड्स (NHIC) के विकास पर एक उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक और परामर्श चर्चा का आयोजन किया।

World Health Organization के साथ हुए ऐतिहासिक समझौता ज्ञापन (MoU) और डोनर एग्रीमेंट के बाद यह पहल पारंपरिक चिकित्सा हस्तक्षेपों को WHO के ICHI फ्रेमवर्क में शामिल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसका उद्देश्य आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी (ASU) चिकित्सा हस्तक्षेपों के लिए एक वैश्विक स्तर पर मानकीकृत और वैज्ञानिक रूप से मजबूत कोडिंग शब्दावली विकसित करना है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डेटा का आदान-प्रदान, नैदानिक अनुसंधान को बढ़ावा और स्वास्थ्य प्रणालियों की अंतर-संचालनीयता (interoperability) सुनिश्चित की जा सके, साथ ही बीमा एकीकरण में भी सहायता मिले।

इस बैठक की अध्यक्षता आयुष मंत्रालय के सचिव वैद्य राजेश कोटेचा ने की। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समन्वित हस्तक्षेप वर्गीकरण पारंपरिक चिकित्सा को वैश्विक स्वास्थ्य प्रणालियों में एकीकृत करने, दस्तावेज़ीकरण को मजबूत करने तथा डिजिटल स्वास्थ्य पारिस्थितिकी तंत्र में अंतर-संचालनीयता बढ़ाने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

उद्घाटन एवं तकनीकी सत्र

उद्घाटन सत्र में Central Council for Research in Ayurvedic Sciences के उपमहानिदेशक डॉ. एन. श्रीकांत ने स्वागत संबोधन दिया। संयुक्त सचिव डॉ. कविता जैन ने अपने प्रारंभिक वक्तव्य में पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को साक्ष्य-आधारित बनाने के लिए मानकीकृत हस्तक्षेप शब्दावली के महत्व पर प्रकाश डाला।

इसके बाद World Health Organization के प्रतिनिधियों, जिनमें डॉ. पवन गोडतवार (WHO-SEARO) और डॉ. गीता कृष्णन (GTMC जामनगर) शामिल थे, ने अपने विचार प्रस्तुत किए।

चार-स्तरीय (four-level) श्रेणीबद्ध कोडिंग ढांचों पर विस्तृत तकनीकी प्रस्तुतियाँ संबंधित अनुसंधान परिषदों द्वारा दी गईं:

  • आयुर्वेद (NHICA): प्रो. वैद्य रबिनारायण आचार्य, महानिदेशक, CCRAS

  • सिद्ध (NHICS): प्रो. डॉ. एन. जे. मुथुकुमार, महानिदेशक, CCRS

  • यूनानी (NHICUM): डॉ. एन. ज़हीर अहमद, महानिदेशक, CCRUM

Dr. Nenad Kostanjsek सहित World Health Organization की डेटा स्टैंडर्ड्स एवं इन्फॉर्मेटिक्स टीम के अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने ASU हस्तक्षेप वर्गीकरण को वैश्विक स्वास्थ्य सूचना मानकों के अनुरूप बनाने हेतु भविष्य की रूपरेखा और तकनीकी आवश्यकताओं पर विचार-विमर्श किया।

दो दिवसीय बैठक में आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी प्रणालियों के लिए अलग-अलग ब्रेकआउट सत्र भी आयोजित किए गए, जिनमें ड्राफ्ट दस्तावेजों की विस्तृत तकनीकी समीक्षा, परीक्षण और विशेषज्ञ परामर्श किया गया। इस बैठक में लगभग 30 वैज्ञानिकों के साथ-साथ Institute of Teaching and Research in Ayurveda, All India Institute of Ayurveda, National Institute of Unani Medicine तथा अन्य प्रमुख आयुष राष्ट्रीय संस्थानों के संकाय सदस्यों ने भाग लिया।

यह अंतिम रूप दिया गया ढांचा जुलाई 2026 में प्रस्तावित WHO-ICHI ASU अल्फा ड्राफ्ट संपादकीय कार्यशाला का आधार बनेगा।

दुर्लभ रोगों के बेहतर प्रबंधन की दिशा में बड़ा कदम: राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन

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स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने आज नई दिल्ली में दो दिवसीय राष्ट्रीय दुर्लभ रोग सम्मेलन (National Conference on Rare Diseases) का उद्घाटन किया, जो 5 और 6 मई 2026 को आयोजित किया जा रहा है। यह सम्मेलन देश में दुर्लभ बीमारियों से जुड़ी चुनौतियों के समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए स्वास्थ्य सचिव पुन्य सलिला श्रीवास्तव ने कहा कि इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य हितधारकों की चुनौतियों को समझना, नवाचार को बढ़ावा देना और देश में दुर्लभ रोगों के बेहतर प्रबंधन के लिए नए विचार विकसित करना है।

उन्होंने बताया कि दुर्लभ रोगों से निपटने की आवश्यकता को सबसे पहले राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 में रेखांकित किया गया था और बाद में 2021 की राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति के माध्यम से इसे एक औपचारिक ढांचा प्रदान किया गया।

उन्होंने कहा कि इस नीति के तहत देशभर में उत्कृष्टता केंद्र (Centres of Excellence) स्थापित किए गए हैं, जिनकी संख्या 8 से बढ़कर 15 हो गई है, जिनमें उत्तर-पूर्व भारत के दो केंद्र भी शामिल हैं।

स्वास्थ्य सचिव ने यह भी बताया कि दुर्लभ रोगों के मरीजों के इलाज के लिए वित्तीय सहायता बढ़ाकर 50 लाख रुपये कर दी गई है। इसके साथ ही जीवनरक्षक दवाओं पर बेसिक कस्टम ड्यूटी में छूट दी गई है, और आगे भी नई दवाओं को इस सूची में शामिल करने पर विचार किया जा रहा है।

उन्होंने UMMID पहल और NIDAN केंद्रों के माध्यम से जेनेटिक काउंसलिंग और उपचार सहायता को मजबूत किए जाने की जानकारी दी। अब तक लगभग 1,800 मरीजों को इस नीति के तहत सहायता मिल चुकी है।

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) की भूमिका की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि यह संस्था दुर्लभ रोगों के लिए स्वदेशी शोध और उपचार विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है।

कार्यक्रम में बोलते हुए डॉ. राजीव बहल ने कहा कि पिछले तीन दशकों में दुर्लभ रोगों के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई है। उन्होंने कहा कि आज भारत न केवल निदान बल्कि उपचार और वित्तीय सहायता के क्षेत्र में भी बेहतर स्थिति में है।

डॉ. बहल ने यह भी कहा कि भारत को अपनी परिस्थितियों के अनुसार दुर्लभ रोगों के लिए स्वदेशी मॉडल विकसित करना चाहिए, जिसमें डिजिटल तकनीक, एआई और जेनेटिक रिसर्च की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।

इस सम्मेलन में विशेषज्ञों ने जेनेटिक तकनीक, सस्ती उपचार रणनीतियों, शोध सहयोग और रोगी-केंद्रित स्वास्थ्य मॉडल पर चर्चा की। मंत्रालय ने सभी हितधारकों के सहयोग से दुर्लभ रोगों से प्रभावित मरीजों को बेहतर और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धता दोहराई।

चिकित्सा शिक्षा में मजबूत क्लिनिकल आधार जरूरी: डॉ. जितेंद्र सिंह

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नई दिल्ली: केंद्रीय मंत्री और प्रख्यात चिकित्सक डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा है कि मेडिकल शिक्षा में मजबूत क्लिनिकल (व्यावहारिक) आधार अत्यंत आवश्यक है, चाहे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की भूमिका कितनी भी बढ़ जाए।

वे “Pediatric Gastroenterology, Hepatology and Nutrition” पुस्तक के दूसरे संस्करण के विमोचन अवसर पर बोल रहे थे। यह पुस्तक प्रो. अनुपम सिबल और डॉ. सारथ गोपालन द्वारा संपादित की गई है, जिसमें कैथलीन बी. श्वार्ट्ज (Kathleen B. Schwartz)  (Johns Hopkins University) ने फॉरवर्ड लिखा है।

 AI और मेडिकल शिक्षा पर विचार

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि:

  • AI एक सहायक (assistant) की भूमिका निभा सकता है

  • लेकिन पहले मूल चिकित्सा ज्ञान और क्लिनिकल समझ जरूरी है

  • बिना आधार के AI पर निर्भरता सीखने की प्रक्रिया को कमजोर कर सकती है

मेडिकल शिक्षा पर जोर

उन्होंने कहा कि:

  • चिकित्सा ज्ञान तेजी से बढ़ रहा है

  • छात्रों को बेसिक नॉलेज + प्रैक्टिकल ट्रेनिंग पर ध्यान देना चाहिए

  • तकनीक के साथ-साथ मानवीय अनुभव भी जरूरी है

 नई पुस्तक के बारे में

यह पुस्तक 45 अध्यायों में विस्तारित है और इसमें कई महत्वपूर्ण विषय शामिल हैं:

  • इंफ्लेमेटरी बॉवेल डिजीज

  • सीलिएक डिजीज

  • लिवर ट्रांसप्लांट

  • न्यूरो-गैस्ट्रोएंटरोलॉजी

  • जेनेटिक्स और एंडोस्कोपी

महत्वपूर्ण तथ्य

  • लगभग 30% बच्चे पेट और लिवर संबंधी बीमारियों से प्रभावित होते हैं

  • यह पुस्तक डॉक्टरों और प्रशिक्षुओं के लिए एक महत्वपूर्ण संसाधन है

निष्कर्ष

डॉ. जितेंद्र सिंह ने स्पष्ट किया कि भविष्य की चिकित्सा शिक्षा में AI की भूमिका महत्वपूर्ण होगी, लेकिन मजबूत क्लिनिकल आधार ही एक सक्षम डॉक्टर की असली पहचान है।

आयुष्मान भारत योजना में डिजिटल बदलाव को बढ़ावा देने के लिए ‘ऑटो-एडजुडिकेशन हैकाथॉन 2026’ का आयोजन

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नई दिल्ली- National Health Authority द्वारा संचालित Ayushman Bharat Pradhan Mantri Jan Arogya Yojana (AB PM-JAY) के तहत देश में डिजिटल हेल्थ ट्रांसफॉर्मेशन को तेज़ी से आगे बढ़ाया जा रहा है। यह योजना प्रतिदिन लगभग 50,000 क्लेम्स को प्रोसेस करती है, जो 1900 से अधिक उपचार पैकेजों से जुड़े होते हैं।

इतनी बड़ी संख्या में क्लेम्स को देखते हुए, तेज़, सटीक और पारदर्शी क्लेम निपटान (adjudication) बेहद आवश्यक हो गया है। वर्तमान में लगभग 15–20% क्लेम्स ही ऑटोमैटिक तरीके से निपटाए जा रहे हैं, जबकि एक स्केलेबल और सभी पैकेजों पर लागू होने वाली प्रणाली की जरूरत महसूस की जा रही है।

हैकाथॉन का उद्देश्य

इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए NHA ने AB PM-JAY ऑटो-एडजुडिकेशन हैकाथॉन 2026 की शुरुआत की है। इसका उद्देश्य ऐसे डिजिटल समाधान विकसित करना है जो:

  • मौजूदा सिस्टम के साथ सहजता से जुड़ सकें

  • मैनुअल कार्यभार को कम करें

  • क्लेम प्रोसेसिंग को तेज और पारदर्शी बनाएं

  • AI आधारित फ्रॉड डिटेक्शन और रियल-टाइम वेरिफिकेशन को सक्षम बनाएं

प्रतिभागियों की बड़ी भागीदारी

इस हैकाथॉन को देशभर से शानदार प्रतिक्रिया मिली है, अब तक 2600 से अधिक प्रतिभागी रजिस्टर कर चुके हैं। इसमें छात्र, शोधकर्ता, डेवलपर्स, स्टार्टअप्स और प्रोफेशनल्स शामिल हैं।

रजिस्ट्रेशन की अंतिम तिथि: 13 अप्रैल 2026
इच्छुक प्रतिभागी आधिकारिक पोर्टल के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं।

मास्टरक्लास सीरीज की शुरुआत

प्रतिभागियों को मार्गदर्शन देने के लिए NHA द्वारा 3 विशेष मास्टरक्लास सत्र आयोजित किए जा रहे हैं:

  • सत्र 1: 13 अप्रैल 2026 (दोपहर 2:00 – 4:00 बजे)

  • सत्र 2: 15 अप्रैल 2026 (दोपहर 2:00 – 4:00 बजे)

  • सत्र 3: 16 अप्रैल 2026 (दोपहर 2:00 – 4:00 बजे)

ये सभी सत्र NHA के आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर लाइव प्रसारित किए जाएंगे।

IISc बेंगलुरु में ग्रैंड फिनाले

हैकाथॉन का ग्रैंड फिनाले 8-9 मई 2026 को Indian Institute of Science में आयोजित होगा। इसमें चयनित टीमें अपने समाधान प्रस्तुत करेंगी, जिनका मूल्यांकन हेल्थकेयर, टेक्नोलॉजी और पब्लिक पॉलिसी के विशेषज्ञों की जूरी द्वारा किया जाएगा।

आकर्षक पुरस्कार

विजेताओं को प्रत्येक समस्या के लिए:

  • प्रथम पुरस्कार: ₹5 लाख

  • द्वितीय पुरस्कार: ₹3 लाख

  • तृतीय पुरस्कार: ₹2 लाख

साथ ही NHA के साथ भविष्य में सहयोग का अवसर भी मिलेगा।

डिजिटल हेल्थ के भविष्य की दिशा

इस पहल के माध्यम से NHA ने स्पष्ट किया है कि वह नवाचार और सहयोग के जरिए देश में एक मजबूत, पारदर्शी और प्रभावी डिजिटल हेल्थ सिस्टम विकसित करने के लिए प्रतिबद्ध है, जिससे लाभार्थियों और स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं दोनों को बेहतर सुविधाएं मिल सकें।

स्वास्थ्य क्षेत्र में नवाचार को नई दिशा देगा वाइस चांसलर मीट-2026 : मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय

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आधुनिक चिकित्सा और पारंपरिक औषधीय ज्ञान के संगम से सशक्त होगा छत्तीसगढ़ का स्वास्थ्य मॉडल: मुख्यमंत्री साय

मेडिसिटी हब और नए मेडिकल कॉलेज से बदलेगा प्रदेश का स्वास्थ्य परिदृश्य

सुकमा में “मुख्यमंत्री बस्तर स्वास्थ्य योजना” का होगा शुभारम्भ

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने आज नवा रायपुर स्थित पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्मृति स्वास्थ्य विज्ञान एवं आयुष विश्वविद्यालय में आयोजित ऑल इंडिया हेल्थ साइंसेज वाइस चांसलर मीट-2026 को संबोधित करते हुए इसे प्रदेश के लिए एक ऐतिहासिक और गौरवपूर्ण अवसर बताया। उन्होंने भगवान श्रीराम के ननिहाल छत्तीसगढ़ की पावन धरा पर देशभर से आए कुलपतियों, शिक्षाविदों और विद्यार्थियों का आत्मीय स्वागत किया।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि पहली बार आयोजित इस एकदिवसीय सम्मेलन के माध्यम से स्वास्थ्य शिक्षा और चिकित्सा क्षेत्र में नवाचारों का व्यापक आदान-प्रदान होगा, जो आने वाले समय में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध होगा। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इस मंच से निकले विचार न केवल नीति निर्माण को दिशा देंगे, बल्कि आमजन तक बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने में भी सहायक होंगे।

मुख्यमंत्री ने कहा कि पिछले दो वर्षों में राज्य सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। प्रदेश में पांच नए मेडिकल कॉलेज, 14 नर्सिंग कॉलेज तथा एक होम्योपैथी कॉलेज का निर्माण कार्य प्रगति पर है। उन्होंने कहा कि स्वस्थ नागरिक ही विकसित छत्तीसगढ़ की आधारशिला हैं और इसी दृष्टिकोण के साथ स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार और गुणवत्ता सुधार पर निरंतर कार्य किया जा रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश में स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ बनाने के प्रयासों का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री साय ने कहा कि आयुष्मान भारत योजना के तहत गरीब परिवारों को 5 लाख रुपये तक की सहायता मिलना उनके लिए वरदान सिद्ध हो रहा है। उन्होंने कहा कि पहले गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए ग्रामीणों को कर्ज लेने या जमीन बेचने जैसी कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता था, लेकिन अब यह स्थिति तेजी से बदल रही है और स्वास्थ्य सेवाओं में विश्वास बढ़ा है।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि मधुमेह और कैंसर जैसी बीमारियां, जो पहले सीमित वर्ग तक मानी जाती थीं, अब ग्रामीण क्षेत्रों में भी तेजी से फैल रही हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए केंद्र सरकार द्वारा “आरोग्य मंदिर” जैसी पहल की जा रही है, जिसका उद्देश्य लोगों को स्वस्थ जीवनशैली के प्रति जागरूक करना है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा देश में तीन आयुर्वेदिक एम्स स्थापित करने का निर्णय लिया गया है। 

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि राज्य का लगभग 44 प्रतिशत क्षेत्र वनाच्छादित है, जो औषधीय पौधों की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है। इसी संदर्भ में उन्होंने हेमचंद मांझी को आयुर्वेद के क्षेत्र में पद्मश्री सम्मान मिलने पर गर्व व्यक्त करते हुए कहा कि उनके पास कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के उपचार के लिए विदेशों से भी लोग आते हैं।

मुख्यमंत्री ने राज्य में स्वास्थ्य अधोसंरचना के तेजी से विस्तार का उल्लेख करते हुए कहा कि राजधानी क्षेत्र में मेडिसिटी हब विकसित किया जा रहा है, जिसके अंतर्गत 5000 बिस्तरों वाला सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल स्थापित किया जाएगा। इससे प्रदेशवासियों को विश्वस्तरीय चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध होंगी। उन्होंने यह भी बताया कि उनके कार्यकाल में रायपुर में एक दर्जन से अधिक निजी अस्पतालों का शुभारंभ किया गया है।

भारत की समृद्ध ज्ञान परंपरा का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि हमारा देश नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला जैसे महान शिक्षा केंद्रों का धनी रहा है और चिकित्सा व अध्यात्म दोनों क्षेत्रों में विश्व गुरु के रूप में स्थापित रहा है। आयुर्वेद को ऋग्वेद का उपवेद बताते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में “सर्वे भवन्तु सुखिनः” का भाव सदैव विद्यमान रहा है।

कोविड-19 महामारी के दौरान भारत की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश ने तीन प्रकार के टीकों का विकास कर न केवल अपने 140 करोड़ नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित की, बल्कि अन्य देशों की भी सहायता कर वैश्विक स्तर पर मानवता का परिचय दिया।मुख्यमंत्री साय ने चिकित्सकों को समाज में भगवान के बाद सबसे महत्वपूर्ण स्थान बताते हुए उनसे सेवा भाव के साथ संवेदनशीलता बनाए रखने का आह्वान किया। उन्होंने विश्वास जताया कि यह सम्मेलन स्वास्थ्य क्षेत्र में नए मार्ग प्रशस्त करेगा और इसके सकारात्मक परिणाम आम जनता तक पहुंचेंगे।

स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने अपने संबोधन में कहा कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में स्वास्थ्य क्षेत्र की अनेक चुनौतियों का सफलतापूर्वक समाधान किया गया है। उन्होंने कहा कि चिकित्सा शिक्षा में नवाचार के तहत हिंदी माध्यम की सुविधा प्रारंभ की गई है तथा तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग से भविष्य में स्वास्थ्य सेवाएं और अधिक प्रभावी होंगी। उन्होंने चिकित्सकों से सेवा भाव और संवेदनशीलता के साथ कार्य करने का आह्वान किया।

स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि प्रदेश में 5 नए मेडिकल कॉलेज, 14 नर्सिंग कॉलेज और 2 मानसिक अस्पताल सहित स्वास्थ्य सुविधाओं का व्यापक विस्तार किया गया है तथा 275 अत्याधुनिक एम्बुलेंस उपलब्ध कराई गई हैं। उन्होंने जानकारी दी कि 13 अप्रैल से सुकमा में मुख्यमंत्री बस्तर स्वास्थ्य योजना के तहत 36 लाख लोगों की हेल्थ स्क्रीनिंग और आयुष्मान कार्ड निर्माण का कार्य प्रारंभ किया जाएगा।

सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने अपने उद्बोधन में कहा कि नक्सल समस्या के समाप्त होने के बाद छत्तीसगढ़ तेजी से विकास की दिशा में अग्रसर होगा। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों तक बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि इस सम्मेलन से प्राप्त सुझाव आयुष मंत्रालय को भेजे जाएंगे और यह आयोजन स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार में प्रेरक भूमिका निभाएगा। उन्होंने आयोजन की सफलता के लिए शुभकामनाएं भी दीं।इस अवसर पर विधायक इंद्र कुमार साहू, विधायक पुरन्दर मिश्रा, विशेष आमंत्रित अतिथि डॉ. वेद प्रकाश मिश्रा, भारतीय स्वास्थ्य विद्यापीठ के अध्यक्ष डॉ. राजीव सूद तथा आयुष विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. प्रदीप कुमार पात्रा सहित अनेक गणमान्यजन उपस्थित थे।

Technology Development Board का बड़ा कदम: CAR-NK थेरेपी के लिए East Ocyon Bio Private Limited को समर्थन

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भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत Technology Development Board (TDB) ने गुरुग्राम स्थित East Ocyon Bio Private Limited को “CAR-NK आधारित सेल थेरेपी विकास एवं कठिन-उपचार योग्य ट्यूमर तथा लीशमैनियासिस के लिए क्लिनिकल परीक्षण” परियोजना हेतु वित्तीय सहायता प्रदान की है। यह परियोजना भारत में पहली बार ऑफ-द-शेल्फ CAR-NK सेल थेरेपी के लिए एक प्लेटफॉर्म-आधारित पारिस्थितिकी तंत्र स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, जो उन्नत इम्यूनोथेरेपी और बायोथेरेप्यूटिक्स निर्माण क्षमता को सुदृढ़ करेगा।

CAR-NK (काइमेरिक एंटीजन रिसेप्टर–नेचुरल किलर) सेल थेरेपी पारंपरिक ऑटोलॉगस CAR-T थेरेपी की तुलना में अधिक सुरक्षित और स्केलेबल विकल्प के रूप में उभर रही है। इसमें स्वस्थ दाताओं से NK कोशिकाओं को अलग कर उनका विस्तार किया जाता है और उन्हें रोग-विशिष्ट लक्ष्यों के विरुद्ध CAR संरचना के साथ इंजीनियर किया जाता है। CAR-T थेरेपी के विपरीत, CAR-NK थेरेपी तुरंत उपलब्ध होती है, निर्माण प्रक्रिया सरल होती है, ग्राफ्ट-वर्सस-होस्ट डिजीज (GvHD) का जोखिम कम होता है तथा साइटोकाइन रिलीज सिंड्रोम (CRS) और न्यूरोटॉक्सिसिटी की संभावना भी अपेक्षाकृत कम रहती है।

इस परियोजना के अंतर्गत कंपनी निम्नलिखित विकसित और व्यावसायीकरण करने का प्रस्ताव रखती है:

  • मल्टीपल प्रतिरोधी ठोस ट्यूमर के लिए Anti-PD-L1 CAR-NK सेल थेरेपी

  • लीशमैनियासिस के उपचार हेतु CAR-NK आधारित नई इम्यूनोथेरेप्यूटिक रणनीति

“यह स्वदेशी तकनीकी प्लेटफॉर्म एलोजेनिक, ऑफ-द-शेल्फ CAR-NK और CAR-गामा डेल्टा (γδ) टी-सेल थेरेपी पर आधारित है…”,जिन्हें स्वस्थ दाताओं से प्राप्त कर बड़े पैमाने पर इंजीनियर किया जाएगा, GMP-अनुकूल प्रणालियों के अंतर्गत क्रायो-प्रिजर्व किया जाएगा और बिना रोगी-मैचिंग के उपयोग में लाया जाएगा। यह प्रक्रिया लागत-प्रभावशीलता, तीव्र उपलब्धता और व्यापक पहुंच सुनिश्चित करेगी। प्रमुख नवाचार में PD-L1 लक्षित CAR संरचना को NK कोशिकाओं में गामा-रेट्रोवायरल प्लेटफॉर्म के माध्यम से समाहित किया गया है, जिससे उच्च अभिव्यक्ति दक्षता और दीर्घकालिक कार्यक्षमता सुनिश्चित होती है।

इस अवसर पर TDB के सचिव राजेश कुमार पाठक ने कहा कि यह समर्थन उच्च-प्रभाव वाली उन्नत तकनीकों को प्रोत्साहित करने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जो अपूर्ण चिकित्सा आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ-साथ स्वदेशी निर्माण क्षमताओं को भी मजबूत करती हैं। उन्होंने कहा कि देश में उन्नत सेल थेरेपी प्लेटफॉर्म विकसित होने से आयातित उपचारों पर निर्भरता कम होगी और भारत अगली पीढ़ी की इम्यूनोथेरेपी में प्रतिस्पर्धी भूमिका निभा सकेगा।

कंपनी के सह-संस्थापक डॉ. रेनु और डॉ. दिनेश कुंडू ने कहा कि TDB का सहयोग CAR-NK प्लेटफॉर्म के क्लिनिकल अनुवाद को गति देगा और प्रयोगशाला नवाचार से मरीजों तक पहुंच के बीच की दूरी को कम करेगा। उनका मानना है कि स्वदेशी, स्केलेबल और किफायती सेल थेरेपी प्लेटफॉर्म का विकास भारत और विश्व स्तर पर कैंसर एवं संक्रामक रोगों के उपचार परिदृश्य में परिवर्तन ला सकता है।

यह परियोजना भारत के बायो-इनोवेशन इकोसिस्टम को मजबूत करने, तकनीकी आत्मनिर्भरता बढ़ाने और अत्याधुनिक उपचारों की सुलभता सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान देगी, जो ‘आत्मनिर्भर भारत’ की परिकल्पना के अनुरूप है।

भारत में स्ट्रोक उपचार में ऐतिहासिक पहल: आईसीएमआर ने असम को सौंपे मोबाइल स्ट्रोक यूनिट

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भारत में स्ट्रोक मृत्यु और दीर्घकालिक विकलांगता के प्रमुख कारणों में से एक है। स्ट्रोक के मामलों में हर मिनट बेहद अहम होता है—इलाज में देरी होने पर हर मिनट लगभग 1.9 अरब मस्तिष्क कोशिकाएँ नष्ट हो जाती हैं। ‘गोल्डन ऑवर’ के भीतर समय पर उपचार से मृत्यु और आजीवन विकलांगता को काफी हद तक कम किया जा सकता है। हालांकि, स्ट्रोक उपचार की सबसे बड़ी चुनौती मरीजों का समय पर स्ट्रोक-सुविधायुक्त अस्पताल तक पहुँचना है।

इसी चुनौती का समाधान करते हुए भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) ने असम सरकार को दो मोबाइल स्ट्रोक यूनिट (MSU) सौंपे। यह पहल उस मॉडल में एक बड़ा बदलाव दर्शाती है, जिसमें अब मरीजों को अस्पताल तक पहुँचने के बजाय अस्पताल मरीज तक पहुँच रहा है। माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा के मार्गदर्शन में विकसित यह पहल सरकार की उस प्रतिबद्धता को दर्शाती है, जिसके तहत उन्नत स्वास्थ्य सेवाएँ दूरदराज़, वंचित और कठिन भौगोलिक क्षेत्रों में रहने वाले लोगों—विशेषकर महिलाओं—तक पहुँचाई जा रही हैं।

एमएसयू को असम सरकार को सौंपते हुए, स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के सचिव एवं ICMR के महानिदेशक डॉ. राजीव बहल ने कहा,

“मोबाइल स्ट्रोक यूनिट की शुरुआत जर्मनी में हुई थी और बाद में प्रमुख वैश्विक शहरों में इसका मूल्यांकन किया गया। भारत ने पहली बार ग्रामीण, दूरस्थ और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों वाले पूर्वोत्तर क्षेत्र में इसका सफल मूल्यांकन किया है। हम दुनिया का दूसरा देश हैं जिसने ग्रामीण तीव्र इस्केमिक स्ट्रोक मरीजों के उपचार के लिए एमएसयू को आपातकालीन सेवाओं के साथ सफलतापूर्वक एकीकृत किया है।”

असम सरकार की ओर से अनुभव साझा करते हुए, पी. अशोक बाबू, सचिव एवं आयुक्त, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, असम ने कहा कि यह हस्तांतरण राज्य की आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली को मजबूत करता है और इस जीवनरक्षक सेवा की निरंतरता को राज्य के स्वामित्व में सुनिश्चित करता है। उन्होंने बताया कि ICMR के साथ सहयोग से तेज़ उपचार, बेहतर समन्वय और बेहतर परिणाम संभव हुए हैं, जो भविष्य में विस्तार के लिए मजबूत आधार प्रदान करते हैं।

मोबाइल स्ट्रोक यूनिट एक चलती-फिरती अस्पताल व्यवस्था है, जिसमें सीटी स्कैन, विशेषज्ञों से टेली-परामर्श, पॉइंट-ऑफ-केयर लैब और क्लॉट-बस्टिंग दवाएँ उपलब्ध हैं। इससे मरीज के घर या उसके निकट ही स्ट्रोक का शीघ्र निदान और उपचार संभव हो पाता है। यह नवाचार विशेष रूप से उन दूरस्थ और कठिन क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है, जहाँ अस्पताल तक पहुँचने में कई घंटे लग सकते हैं।

पूर्वोत्तर भारत में स्ट्रोक का बोझ अपेक्षाकृत अधिक है। कठिन भू-भाग, लंबी दूरी और विशेष चिकित्सा सुविधाओं की सीमित उपलब्धता के कारण समय पर उपचार चुनौतीपूर्ण रहा है। इसे ध्यान में रखते हुए ICMR ने डिब्रूगढ़ के असम मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में न्यूरोलॉजिस्ट-नेतृत्व वाला स्ट्रोक यूनिट और तेज़पुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल तथा बैपटिस्ट क्रिश्चियन अस्पताल, तेज़पुर में चिकित्सक-नेतृत्व वाले स्ट्रोक यूनिट स्थापित किए। मोबाइल स्ट्रोक यूनिट को इसी प्री-हॉस्पिटल स्ट्रोक केयर प्रणाली में जोड़ा गया।

इसके परिणाम अत्यंत प्रभावशाली रहे हैं। इस मॉडल से उपचार में लगने वाला समय लगभग 24 घंटे से घटकर करीब 2 घंटे रह गया, मृत्यु दर में एक-तिहाई की कमी आई और विकलांगता में आठ गुना तक कमी दर्ज की गई। वर्ष 2021 से अगस्त 2024 के बीच एमएसयू को 2,300 से अधिक आपातकालीन कॉल प्राप्त हुईं। प्रशिक्षित नर्सों ने 294 संदिग्ध स्ट्रोक मामलों की जाँच की, जिनमें से 90% मरीजों का उपचार सीधे उनके घर से किया गया। 108-आपातकालीन एंबुलेंस सेवा के साथ एकीकरण से इसकी पहुँच 100 किलोमीटर के दायरे तक बढ़ी।

इस अवसर पर केंद्र और राज्य सरकारों के वरिष्ठ अधिकारी तथा ICMR नेतृत्व उपस्थित रहे, जिनमें डॉ. क्रिस्टीना जेड. चोंगथु (सचिव, स्वास्थ्य, तेलंगाना सरकार), डॉ. संघमित्रा पति (अपर महानिदेशक, ICMR), डॉ. अलका शर्मा (अपर महानिदेशक, ICMR), मनीषा सक्सेना (वरिष्ठ उप महानिदेशक–प्रशासन) और डॉ. आर.एस. ढालीवाल (प्रमुख, एनसीडी) शामिल थे।


नई दिल्ली में दूसरा WHO ग्लोबल समिट ऑन ट्रेडिशनल मेडिसिन

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भारत 17 से 19 दिसंबर 2025 तक नई दिल्ली में द्वितीय WHO ग्लोबल समिट ऑन ट्रेडिशनल मेडिसिन की सह-आयोजक भूमिका निभाएगा, जिसका आयोजन विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के सहयोग से किया जाएगा। इस समिट में वैश्विक नेता, नीति निर्माता, शोधकर्ता और विशेषज्ञ भाग लेंगे और पारंपरिक चिकित्सा में नवाचार, साक्ष्य-आधारित प्रथाओं और भविष्य की रणनीतियों पर विचार-विमर्श करेंगे।

8 दिसंबर 2025 को आयुष मंत्रालय ने कर्टन राइज़र कार्यक्रम का आयोजन किया, जिसकी अध्यक्षता प्रतापराव जाधव, माननीय केंद्रीय आयुष मंत्री ने की। अपने संबोधन में मंत्री ने भारत में पारंपरिक चिकित्सा में बढ़ते नेतृत्व और राष्ट्रीय शोध संस्थानों की वैज्ञानिक प्रमाणिकता और वैश्विक सहयोग को मजबूत करने वाली भूमिका पर प्रकाश डाला।

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में, CCRAS का सेंट्रल आयुर्वेद रिसर्च इंस्टीट्यूट (CARI), दिल्ली आयुर्वेदिक शोध और चिकित्सीय उन्नति का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बना हुआ है। संस्थान के निदेशक एवं प्रभारी, डॉ. हेमंता पाणिग्रही ने बताया कि CARI के समेकित शोध—मुख्य रूप से क्लिनिकल, फंडामेंटल और पॉलिसी शोध—ने प्रमुख जीवनशैली और गैर-संचारी रोगों (NCDs) के समाधान में इसकी क्षमता को काफी बढ़ा दिया है। उन्होंने यह भी बताया कि संस्थान की विशेष क्लिनिक, चल रहे शोध अध्ययन और पेशेवर प्रशिक्षण कार्यक्रम राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप साक्ष्य-आधारित पारंपरिक स्वास्थ्य देखभाल से जुड़े हैं।

आगामी WHO समिट में मंत्री स्तरीय चर्चाएँ, वैज्ञानिक पैनल, प्रदर्शनियाँ और वैश्विक ज्ञान-साझा सत्र शामिल होंगे, जिनका उद्देश्य पारंपरिक चिकित्सा को वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों के भीतर और अधिक प्रभावी ढंग से एकीकृत करना है।


सीएसआईआर–आईसीएमआर की उच्चस्तरीय बैठक में स्वास्थ्य अनुसंधान सहयोग को और मजबूत करने पर सहमति

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परिषद् वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान (CSIR) और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद् (ICMR) ने आज नई दिल्ली स्थित सीएसआईआर साइंस सेंटर में एक उच्च-स्तरीय विचार-विमर्श बैठक आयोजित की। बैठक का उद्देश्य दोनों संस्थानों के बीच चल रहे सहयोग को सुदृढ़ करना और भविष्य के लिए एक एकीकृत रोडमैप तैयार करना था।

बैठक की सह-अध्यक्षता सीएसआईआर की महानिदेशक व डीएसआईआर सचिव डॉ. एन. कलैसेल्वी तथा आईसीएमआर के महानिदेशक व स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के सचिव डॉ. राजीव बहल ने की। सीएसआईआर और आईसीएमआर की विभिन्न प्रयोगशालाओं के निदेशकों तथा वरिष्ठ अधिकारियों ने बैठक में भाग लिया।

बैठक के दौरान दोनों संस्थाओं ने कई प्रमुख संयुक्त परियोजनाओं की प्रगति की समीक्षा की, जिनमें शामिल हैं—

  • सीएसआईआर द्वारा विकसित अणुओं (molecules) का क्लीनिकल ट्रायल की ओर बढ़ना,

  • आईसीएमआर समर्थित उन्नत अनुसंधान केंद्रों की स्थिति,

  • बड़े पैमाने की चल रही परियोजनाओं की प्रगति।

विशेष रूप से, अनेक रोगजनकों की निगरानी के लिए अपशिष्ट जल (wastewater) विश्लेषण प्रणाली को और व्यापक बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। यह भी सहमति बनी कि इस दिशा में वन हेल्थ मिशन के तहत संयुक्त प्रयासों को मजबूत किया जाएगा।

नई दवाओं और अणुओं के विकास, व्यवस्थित क्लीनिकल ट्रायल, तथा आईसीएमआर की बड़े जानवरों के लिए उपलब्ध विषाक्तता परीक्षण सुविधाओं के उपयोग से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर भी चर्चा हुई।

AcSIR–ICMR पीएचडी कार्यक्रम की समीक्षा करते हुए युवा शोधकर्ताओं के लिए अधिक अवसर उपलब्ध कराने तथा आईसीएमआर की फेलोशिप को सीएसआईआर फेलोशिप के साथ समाहित करने पर भी जोर दिया गया।

बैठक में डॉ. कलैसेल्वी और डॉ. बहल ने कहा कि सीएसआईआर की वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकीय क्षमता को आईसीएमआर की सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञता के साथ जोड़ना राष्ट्रीय स्तर पर उच्च प्रभाव वाले परिणाम सुनिश्चित करेगा। दोनों ने समयबद्ध प्रगति, बेहतर समन्वय और तकनीकों के संयुक्त विकास के लिए संरचित तंत्र अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया। इसमें डिजिटल रूप से नियंत्रित मेडिकल इमरजेंसी ड्रोन सेवा जैसे नवीन संयुक्त प्रोजेक्ट पर भी चर्चा हुई।

बैठक का समापन इस प्रतिबद्धता के साथ हुआ कि सीएसआईआर और आईसीएमआर स्वास्थ्य विज्ञान, डायग्नॉस्टिक्स, डिजिटल हेल्थ, पर्यावरणीय स्वास्थ्य निगरानी और अन्य उभरते क्षेत्रों में सहयोग को और मजबूत करेंगे तथा संयुक्त परियोजनाओं के विकास और क्रियान्वयन में तेजी लाएंगे।

TDB ने स्वदेशी 16-वेलेन्ट न्यूमोकोकल वैक्सीन विकास को दी मंज़ूरी, उन्नत टीका निर्माण में बढ़ेगी भारत की आत्मनिर्भरता

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प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड (TDB), विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार ने नवी मुंबई स्थित टेकइन्वेंशन लाइफकेयर लिमिटेड को स्वदेशी रूप से विकसित 16-वलेंट न्यूमोकोकल कंजुगेट वैक्सीन (PCV-16) के वाणिज्यिक स्तर पर cGMP उत्पादन सुविधा स्थापित करने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की है। यह परियोजना देश में अगली पीढ़ी के कंजुगेट वैक्सीन के विकास और निर्माण क्षमता को मजबूत करेगी तथा आयातित उत्पादों पर दीर्घकालिक निर्भरता कम करेगी।

इस PCV-16 तकनीक में न्यूमोकोकल बैक्टीरिया के 16 रणनीतिक रूप से चुने गए सीरोटाइप शामिल हैं। इनमें वे प्रकार शामिल हैं जो भारत तथा अन्य निम्न और मध्यम-आय वाले देशों में गंभीर संक्रमण (IPD), एंटीमाइक्रोबियल रेज़िस्टेंस और अधिक मृत्यु दर के लिए ज़िम्मेदार हैं। जहाँ 13 सीरोटाइप मौजूदा वैश्विक वैक्सीन प्लेटफॉर्म से मेल खाते हैं, वहीं 12F, 15A और 22F जैसे तीन उभरते सीरोटाइप को जोड़कर इसके कवरेज को और व्यापक बनाया गया है, जिससे इस स्वदेशी वैक्सीन का सार्वजनिक स्वास्थ्य महत्व बढ़ता है।

परियोजना सेरोटाइप प्राथमिकता निर्धारण का वैज्ञानिक पुनर्मूल्यांकन दर्शाती है, जिससे बच्चों, बुजुर्गों और अन्य संवेदनशील समूहों के लिए किफायती प्रतिरक्षण समाधान संभव हो सकेगा। इस तकनीक का प्रारंभिक शोध एवं विकास कार्य फरीदाबाद स्थित BSC BioNEST Bio-Incubator के BSL-2 सुविधा में किया गया, जिसके बाद इसे नवी मुंबई स्थित कंपनी के GMP-संगत हाई-कंटेनमेंट R&D केंद्र ‘HORIZON’ में आगे बढ़ाया गया। अनोखे सेरोटाइप डिजाइन और प्रक्रिया नवाचारों की सुरक्षा के लिए भारतीय पेटेंट भी दायर किया गया है।

TDB के समर्थन से अब यह परियोजना पूर्ण पैमाने पर cGMP निर्माण की ओर बढ़ेगी, जिससे उन्नत कंजुगेट वैक्सीन तकनीकों का देश में ही विकास, प्रमाणीकरण और व्यावसायीकरण संभव होगा। यह पहल भारत की वैक्सीन आत्मनिर्भरता बढ़ाने, घरेलू बायोमैन्युफैक्चरिंग क्षमता को मजबूत करने और भविष्य की बहुवैलेंट वैक्सीन प्लेटफॉर्म का मार्ग खोलने में मदद करेगी।

टेकइन्वेंशन लाइफकेयर लिमिटेड अब तक 15 से अधिक पेटेंट दर्ज कर चुकी है और कई स्वदेशी वैक्सीन उम्मीदवारों—जैसे भारत का पहला 6-इन-1 मेनिंगोकोकल कंजुगेट वैक्सीन—पर काम कर रही है। कंपनी को अगली पीढ़ी के वैक्सीन नवाचार में योगदान के लिए राष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा सराहा भी गया है।

इस अवसर पर TDB के सचिव  राजेश कुमार पाठक ने कहा:

“PCV-16 परियोजना उन उच्च-प्रभाव वाली, अगली पीढ़ी की वैक्सीन तकनीकों का प्रतिनिधित्व करती है, जिन्हें TDB समर्थन देना चाहता है। स्वदेशी विकास और बड़े पैमाने के निर्माण को सक्षम बनाकर हम भारत की स्वास्थ्य तैयारी को मजबूत कर रहे हैं तथा घरेलू, विश्वसनीय समाधान उपलब्ध करा रहे हैं।”

टेकइन्वेंशन के प्रवर्तकों ने कहा:

“TDB का सहयोग हमारे PCV-16 को उन्नत R&D से बड़े पैमाने पर, किफायती उत्पादन की ओर तेजी से ले जाएगा। यह साझेदारी भारत और निम्न-मध्यम आय वाले देशों के लिए विस्तृत कवरेज वाली वैक्सीन उपलब्ध कराने के हमारे प्रयास की आधारशिला है।”

भारत-जर्मनी सहयोग: आयुष मंत्रालय की पारंपरिक और एकीकृत चिकित्सा पर तीसरी संयुक्त कार्य समूह बैठक बर्लिन में संपन्न

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भारत सरकार के आयुष मंत्रालय और जर्मनी के संघीय स्वास्थ्य मंत्रालय के बीच वैकल्पिक चिकित्सा पर तीसरी संयुक्त कार्य समूह (JWG) बैठक 18 से 20 नवंबर 2025 को बर्लिन में आयोजित की गई, जो पारंपरिक और एकीकृत स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में भारत-जर्मनी सहयोग को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व मोनालिशा दाश, संयुक्त सचिव, आयुष मंत्रालय ने किया। इसमें प्रो. (डॉ.) रबिनारायण आचार्य, महानिदेशक, CCRAS; डॉ. सुभाष कौशिक, महानिदेशक, CCRH; डॉ. कौस्तभ उपाध्याय, सलाहकार, आयुष मंत्रालय; और डॉ. काशीनाथ समागंदी, निदेशक, MDNY शामिल थे। प्रतिनिधिमंडल ने सहयोग को और मजबूत बनाने के लिए प्रमुख जर्मन संस्थानों के साथ वार्ता की।

जर्मनी की ओर से कार्यक्रम का नेतृत्व पॉल जुबाइल, हेड ऑफ डिवीजन यूरोपियन एंड इंटरनेशनल हेल्थ पॉलिसी, जर्मन स्वास्थ्य मंत्रालय; प्रो. डॉ. मेड. गियोर्ग सिफ़र्ट, हेड ऑफ कॉम्पिटेंस सेंटर फॉर ट्रेडिशनल एंड इंटीग्रेटिव मेडिसिन, चारिटी बर्लिन; आंद्रेया गैले, सीईओ, BKK mkk (स्टैच्यूटरी हेल्थ इंश्योरेंस फंड); और डॉ. जैकलीन वीसनर, हेड ऑफ डिपार्टमेंट फॉर विटामिन्स, मिनरल्स, स्पेशल थेरेप्यूटिक अप्रोचेज, फेडरल इंस्टिट्यूट फॉर ड्रग्स एंड मेडिकल डिवाइसेज (BfArM) ने किया।

वार्ता के तीन मुख्य स्तंभ रहे—

  1. पारंपरिक चिकित्सा को सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों में समाहित करना।

  2. रोगियों की पहुँच सुनिश्चित करने के लिए प्रतिपूर्ति (reimbursement) मार्ग स्थापित करना।

  3. नियामक अनुमोदन तंत्र को मजबूत करना।

इन विषयों में दोनों देशों की साझा प्रतिबद्धता पर बल दिया गया कि वे सबूत-आधारित और नागरिक-केंद्रित पारंपरिक चिकित्सा प्रथाओं को बढ़ावा देंगे।

मुख्य कार्यक्रम में निम्नलिखित शामिल थे:

  • कॉम्पिटेंस सेंटर फॉर ट्रेडिशनल एंड इंटीग्रेटिव मेडिसिन, चारिटी यूनिवर्सिटी, जहां सहयोगी अनुसंधान के अवसरों की खोज और आयुष मंत्रालय के साथ प्रस्तावित एमओयू को आगे बढ़ाने पर चर्चा हुई।

  • कम्युनिटी हॉस्पिटल हावेल्होहे – क्लिनिक फॉर एन्थ्रोपोसॉफिक मेडिसिन, जहां एकीकृत देखभाल और अनुसंधान प्रथाओं की समीक्षा की गई।

  • फेडरल जॉइंट कमिटी (G-BA), जहां पारंपरिक चिकित्सा से संबंधित बीमा और प्रतिपूर्ति तंत्र पर विस्तृत चर्चा हुई।

यह मिशन आयुष मंत्रालय के रणनीतिक प्रयासों को दर्शाता है, जिसमें आयुष प्रणालियों का वैश्विकरण, सबूत-आधारित एकीकरण के लिए मजबूत ढांचे का निर्माण, और उच्च-मूल्य वाले अंतरराष्ट्रीय साझेदारी को मजबूत करना शामिल है, जिससे भारत का वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा क्षेत्र में प्रभाव बढ़े।

मंत्रालय ने पुष्टि की कि जर्मनी के साथ सतत सहयोग अनुसंधान, नियामक समन्वय, और रोगियों की पहुँच को सुरक्षित, गुणवत्तापूर्ण और वैज्ञानिक प्रमाण पर आधारित एकीकृत स्वास्थ्य देखभाल समाधान प्रदान करने में तेजी लाएगा।

पीसीआईएम एंड एच द्वारा ‘एएसयूएंडएच की फार्माकोपियल पैरामीटर्स’ पर जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन

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फार्माकोपिया कमीशन फॉर इंडियन मेडिसिन एंड होम्योपैथी (PCIM&H) ने आज राष्ट्रीय आयुर्वेदिक पौधों बोर्ड (NMPB), आयुष मंत्रालय द्वारा वित्तपोषित रीजनल रॉ ड्रग रिपॉजिटरी (RRDR) – गंगा के मैदानी क्षेत्र परियोजना के तहत “एएसयू एंड एच (आयुर्वेद, सिद्ध, यूनानी और होम्योपैथी) की फार्माकोपियल पैरामीटर्स” विषय पर एक दिवसीय जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया।

अपने स्वागत भाषण में डॉ. रमन मोहन सिंह, निदेशक, PCIM&H, ने प्रतिभागियों को आयोग द्वारा आयुर्वेद, सिद्ध, यूनानी और होम्योपैथी दवाओं के मानकीकरण और गुणवत्ता नियंत्रण के क्षेत्र में की गई गतिविधियों और हालिया पहलों के बारे में जानकारी दी।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रो. (डॉ.) महेश कुमार दाधीच, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, NMPB, ने एएसयू एंड एच प्रणाली की सुरक्षा और प्रभावकारिता सुनिश्चित करने में कच्ची औषधियों की गुणवत्ता के महत्वपूर्ण महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने PCIM&H द्वारा RRDR के विकास में की गई प्रगति की सराहना की और बताया कि NMPB राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला के सहयोग से ASU&H दवाओं के लिए भारतीय निर्देशांक द्रव्य (Bhartiya Nirdeshak Dravya) विकसित कर रहा है। साथ ही उन्होंने PCIM&H द्वारा क्यूआर-कोड आधारित डेटाबेस के साथ विषयगत औषधीय पौधों के उद्यान विकसित करने के प्रयासों की भी प्रशंसा की।

डॉ. राजेंद्र सिंह, पूर्व एसोसिएट डायरेक्टर, DRDR, ने ASU&H दवाओं की बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता का उल्लेख करते हुए बताया कि फार्माकोपियल और फॉर्मुलेरी मानकों की स्थापना में PCIM&H की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

डॉ. ए. जयंती, प्रिंसिपल साइंटिफिक ऑफिसर (फार्माकोग्नोसी), PCIM&H, ने गंगा के मैदानी क्षेत्र RRDR परियोजना के तहत की जा रही गतिविधियों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया। उन्होंने जानकारी दी कि PCIM&H वर्तमान में 523 प्रामाणिक कच्ची औषधि नमूनों, लगभग 1,000 हरबेरियम नमूनों, और 218 औषधीय प्रजातियों का संरक्षण कर रहा है।

कार्यक्रम में करीब 60 प्रतिभागियों ने भाग लिया, जिनमें जामिया हमदर्द विश्वविद्यालय (दिल्ली), राज कुमार गोयल इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (गाजियाबाद), जीएस आयुर्वेद कॉलेज (गाजियाबाद), अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (AIIA, नई दिल्ली), संस्कार कॉलेज ऑफ फार्मेसी (गाजियाबाद), बकसन होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज (ग्रेटर नोएडा), IMS गाजियाबाद आदि संस्थानों के प्रतिनिधि शामिल थे।

तकनीकी सत्रों में विशेषज्ञ व्याख्यान शामिल थे, जैसे:

  • औषधीय पौधों की टैक्सोनॉमिक पहचान – डॉ. मुकेश कुमार, कंसल्टेंट, RRDR

  • फार्माकोग्नोस्टिक पैरामीटर्स द्वारा कच्ची औषधियों की पहचान – डॉ. ए. जयंती

  • पारंपरिक दवाओं का गुणवत्ता नियंत्रण और गुणवत्ता मूल्यांकन – डॉ. एस.सी. वर्मा

  • ASU&H दवाओं का सूक्ष्मजीवीय विश्लेषण – डॉ. एम. रमेश

तकनीकी सत्रों के बाद प्रतिभागियों को फार्माकोग्नोसी, केमिस्ट्री और माइक्रोबायोलॉजी प्रयोगशालाओं में हैंड्स-ऑन प्रशिक्षण दिया गया तथा एएसयू एंड एच दवाओं के मानकीकरण और गुणवत्ता नियंत्रण में उपयोग होने वाले प्रमुख उपकरणों का प्रदर्शन कराया गया। प्रतिभागियों को हर्बल गार्डन, रीजनल रॉ ड्रग रिपॉजिटरी और सीड बैंक का भ्रमण भी कराया गया।


रजोनिवृत्ति देखभाल में एकीकृत स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ावा: सफदरजंग अस्पताल और सीएआरआई के बीच एमओयू हस्ताक्षर

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महिलाओं के लिए एकीकृत स्वास्थ्य सेवाओं को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज (VMMC) और सफदरजंग अस्पताल ने आज केन्द्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान (CARI), जो केन्द्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (CCRAS), आयुष मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करता है, के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए। इस सहयोग का उद्देश्य रजोनिवृत्ति (Menopause) देखभाल में सुधार के लिए वैज्ञानिक और प्रमाण-आधारित आयुर्वेद अनुसंधान को बढ़ावा देना है।

रजोनिवृत्ति से गुजर रहीं महिलाओं में सामान्यतः गर्माहट के दौरे (Hot Flushes), अनिद्रा, थकान, योनि शुष्कता, मूड में उतार-चढ़ाव, चिंता और स्मरण शक्ति संबंधी समस्याएँ देखी जाती हैं। सुरक्षित और सहयोगी उपचार विकल्पों में बढ़ती रुचि के चलते कई महिलाएँ समग्र (Holistic) चिकित्सा पद्धतियों, विशेषकर आयुर्वेद, की ओर रुख कर रही हैं। यह MoU पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक चिकित्सा को एकीकृत करने वाले प्रमाणित प्रोटोकॉल विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

समारोह के दौरान VMMC एवं सफदरजंग अस्पताल के निदेशक डॉ. संदीप बंसल ने कहा कि आयुर्वेद आधारित उपचार, जब एलोपैथिक तरीकों के साथ सावधानीपूर्वक उपयोग किए जाते हैं, तो रजोनिवृत्ति से गुजर रही महिलाओं के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो सकते हैं। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि धातु युक्त आयुर्वेदिक दवाइयों का सेवन केवल विशेषज्ञ की निगरानी में ही किया जाना चाहिए, ताकि उनकी सुरक्षा और प्रभाव सुनिश्चित हो सके।

CARI के प्रभारी डॉ. हेमंता पाणिग्रही ने बताया कि CCRAS आयुर्वेद के वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए दशकों से कार्यरत है। उन्होंने बताया कि सफदरजंग अस्पताल में आयुर्वेद इकाई वर्ष 1996 से सक्रिय है और मरीजों की देखभाल तथा सहयोगात्मक अनुसंधान में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। उन्होंने कहा, “प्रमाण-आधारित आयुर्वेद को वैश्विक स्वीकृति मिल रही है, और यह साझेदारी एकीकृत अनुसंधान पद्धतियों को और मजबूत करेगी तथा जनसामान्य की स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार लाएगी।”

यह सहयोग रजोनिवृत्ति देखभाल को बेहतर बनाने हेतु वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित, सुरक्षित और प्रभावी आयुर्वेदिक हस्तक्षेप विकसित करने पर केंद्रित है, ताकि आधुनिक चिकित्सा को पूरक समर्थन मिल सके। इस पहल से मरीजों के परिणामों में सुधार, अनुसंधान क्षमता में वृद्धि और समग्र स्वास्थ्य सेवाओं तक व्यापक पहुंच सुनिश्चित होने की उम्मीद है।

कार्यक्रम के दौरान प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर डॉ. शिवशंकर राजपूत और प्रो. उपमा सक्सेना ने परियोजना के विवरण प्रस्तुत किए। इस अवसर पर डॉ. चारु बाम्बा (मेडिकल सुपरिटेंडेंट), डॉ. श्वेता माता और डॉ. असीमा जैन भी उपस्थित रहीं।

यह MoU VMMC–सफदरजंग अस्पताल और आयुष मंत्रालय की ओर से सहयोगात्मक, मरीज-केंद्रित स्वास्थ्य सेवाओं को आगे बढ़ाने और महिलाओं के स्वास्थ्य के क्षेत्र में एकीकृत अनुसंधान के नए मानक स्थापित करने की साझा प्रतिबद्धता को दर्शाता है।


केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस पर राष्ट्रीय कार्य योजना 2.0 (2025–29) लॉन्च की

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केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने आज राष्ट्रीय रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एंटीमाइक्रोबियल रेज़िस्टेंस–AMR) पर राष्ट्रीय कार्य योजना का दूसरा संस्करण (2025–29) लॉन्च किया।
इस अवसर पर उनके साथ डॉ. ए. के. सूद, प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार; पुन्या सलिला श्रीवास्तव, केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव; डॉ. राजीव बहल, सचिव—स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग, तथा डॉ. सुनीता शर्मा, महानिदेशक स्वास्थ्य सेवाएँ (DGHS) भी उपस्थित रहे।

“AMR एक बड़ा सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है, समाधान केवल सामूहिक प्रयासों से संभव” —  नड्डा

कार्यक्रम में बोलते हुए नड्डा ने जोर देकर कहा कि एंटीमाइक्रोबियल रेज़िस्टेंस (AMR) एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है जिसे केवल सामूहिक प्रयासों से ही नियंत्रित किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि इस दिशा में यात्रा वर्ष 2010 में प्रारंभ हुई थी और 2017 में पहला NAP-AMR लॉन्च किया गया था।


उन्होंने कहा कि AMR विशेष रूप से सर्जरी, कैंसर उपचार और अन्य महत्वपूर्ण स्वास्थ्य प्रक्रियाओं में गंभीर जोखिम पैदा करता है। एंटीबायोटिक दवाओं के अतिरिक्त और गलत उपयोग से यह समस्या और बढ़ गई है, जिसके लिए तुरंत सुधारात्मक कदम उठाने की आवश्यकता है। उन्होंने विभिन्न मंत्रालयों द्वारा उठाए गए कई महत्त्वपूर्ण कदमों का भी उल्लेख किया।

NAP–AMR 2.0 में प्रमुख सुधार

नड्डा ने बताया कि AMR पर नई राष्ट्रीय कार्य योजना—NAP-AMR 2.0—ने पहली कार्य योजना में पहचानी गई कमियों को दूर किया है। इसमें:

  • AMR प्रयासों की जिम्मेदारी बढ़ाना

  • सभी क्षेत्रों के बीच बेहतर समन्वय

  • निजी क्षेत्र के साथ मजबूत भागीदारी शामिल है।

उन्होंने जागरूकता, शिक्षा, प्रशिक्षण, प्रयोगशाला क्षमता और अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया। उन्होंने नियमित बैठकों और समीक्षा की आवश्यकता भी बताई।

“AMR एक प्रकार की वैश्विक महामारी है” — डॉ. ए. के. सूद

प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार डॉ. सूद ने कहा कि NAP-AMR 2.0 का लॉन्च WHO की विश्व AMR जागरूकता सप्ताह (18–24 नवंबर) के पहले दिन होना अत्यंत उपयुक्त है।

उन्होंने बताया:

  • केरल और गुजरात OTC (ओवर-द-काउंटर) एंटीबायोटिक बिक्री पर प्रतिबंध लगाने वाले पहले राज्य हैं।

  • कई एंटीमाइक्रोबियल और कीटनाशक कृषि उपयोग के लिए प्रतिबंधित किए गए हैं।

  • India AMR Innovation Hub के माध्यम से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय हितधारकों को जोड़कर नई तकनीकों पर कार्य किया जा रहा है।

पृष्ठभूमि

एंटीमाइक्रोबियल रेज़िस्टेंस (AMR) को वैश्विक स्तर पर एक गंभीर स्वास्थ्य खतरे के रूप में मान्यता दी गई है, जिसके स्वास्थ्य, राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव व्यापक हैं।

AMR के परिणाम:

  • उपचार में देरी

  • संक्रमण के प्रसार का बढ़ना

  • स्वास्थ्य-सेवा लागत में वृद्धि

  • सर्जिकल प्रक्रियाओं, अंग प्रत्यारोपण और कैंसर उपचार की प्रभावशीलता में कमी

भारत ने AMR रोकथाम को राष्ट्रीय प्राथमिकता माना है।
2010 में राष्ट्रीय कार्यबल का गठन, 2011 में राष्ट्रीय नीति और 2017 में पहली राष्ट्रीय कार्य योजना (NAP-AMR) लॉन्च की गई थी।

NAP-AMR 2.0 का निर्माण 2022 से कई चरणों में हुआ, जिसमें मानव स्वास्थ्य, पशुपालन, पर्यावरण, कृषि, अनुसंधान सहित 20 से अधिक मंत्रालयों/विभागों की भागीदारी थी।

नई कार्य योजना में:

  • सभी मंत्रालयों के स्पष्ट कार्य, समयसीमा और बजट शामिल

  • विभिन्न क्षेत्रों के बीच समन्वय की व्यवस्था

  • निजी क्षेत्र, उद्योग, तकनीकी संस्थानों, NGOs और अंतरराष्ट्रीय भागीदारों की सक्रिय भागीदारी पर जोर

कार्यक्रम में मत्स्य पालन मंत्रालय, पशुपालन मंत्रालय, कृषि मंत्रालय, पर्यावरण मंत्रालय, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय, AYUSH मंत्रालय, जल शक्ति मंत्रालय, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय तथा शिक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल हुए।


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्र को समर्पित किए तीन क्रांतिकारी स्वदेशी नवाचार — QSIP, क्वांटम चिप और CAR-T सेल थेरेपी

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माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को भेंट की तीन अभूतपूर्व नवाचार उपलब्धियां — QSIP: भारत की अपनी क्वांटम सुरक्षा चिप, 25-क्यूबिट QPU: भारत की पहली क्वांटम कंप्यूटिंग चिप और CAR-T सेल थेरेपी: भारत की पहली स्वदेशी कैंसर सेल थेरेपी

चल रहे Emerging Science, Technology & Innovation Conclave (ESTIC 2025) के दौरान माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को तीन ऐतिहासिक नवाचार उपलब्धियां समर्पित कीं —

  1. QSIP (Quantum Security in Package) : भारत की अपनी क्वांटम सुरक्षा चिप।
  2. 25-क्यूबिट QPU (Quantum Processing Unit) : भारत की पहली क्वांटम कंप्यूटिंग चिप, जो भविष्य की कंप्यूटेशन शक्ति का प्रतीक है।
  3. CAR-T सेल थेरेपी : भारत की पहली स्वदेशी कैंसर सेल थेरेपी, जिसे भारतीय वैज्ञानिकों ने विकसित किया है।

इनमें से NexCAR19, जो विश्व की पहली humanised CAR-T therapy है, भारत में ImmunoACT द्वारा विकसित की गई है — यह वास्तव में “Made in India, for the World” नवाचार का उदाहरण है। इस परियोजना को Department of Biotechnology (DBT) और BIRAC द्वारा समर्थन प्राप्त हुआ है।

CAR-T सेल थेरेपी (Chimeric Antigen Receptor T-cell therapy) कैंसर उपचार के क्षेत्र में एक बड़ी क्रांति बनकर उभरी है। विश्वभर में किए गए क्लिनिकल ट्रायल्स ने दर्शाया है कि यह थेरेपी Acute Lymphocytic Leukemia जैसे गंभीर कैंसर रोगियों में अत्यंत प्रभावी साबित हुई है।

NexCAR19, भारत की पहली living drug, ने जीन थेरेपी को न केवल किफायती बल्कि सुलभ भी बनाया है, जबकि वैज्ञानिक गुणवत्ता और रोगी सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया गया है।

ImmunoACT, जो IIT बॉम्बे की एक स्पिन-ऑफ स्टार्टअप है, को BIRAC के BioNest Initiative के तहत वित्तीय सहायता, मार्गदर्शन और संसाधन प्रदान किए गए, जब यह Society for Innovation and Entrepreneurship (SINE), IIT बॉम्बे के Technology Business Incubator में इनक्यूबेट की जा रही थी।

वर्ष 2021 में, भारत की पहली CAR-T थेरेपी के Lentivirus manufacturing और clinical trial के लिए DBT और BIRAC ने National Biopharma Mission के तहत आंशिक सहायता प्रदान की। यह परीक्षण ACTREC Centre, टाटा मेमोरियल अस्पताल में TMC-IIT Bombay Team द्वारा किया गया, जिसमें ImmunoACT निर्माण भागीदार के रूप में कार्यरत है।

हाल ही में, DBT ने BioE3 Policy के तहत Biomanufacturing initiative के माध्यम से ImmunoACT को 200-लीटर GMP lentiviral vector and plasmid प्लेटफॉर्म स्थापित करने हेतु वित्त पोषण प्रदान किया है। इस प्लेटफॉर्म से उत्पादन क्षमता बढ़ेगी और थेरेपी की लागत कम होगी। अनुमान है कि यह GMP ग्रेड gene delivery vector प्रति वर्ष कम से कम 1000 रोगियों की मदद कर सकेगा।

DBT प्रारंभिक एवं उन्नत translational research को भी बढ़ावा दे रहा है ताकि देश में CAR-T आधारित थेरेप्यूटिक्स विकसित कर विभिन्न प्रकार के कैंसर जैसे Multiple Myeloma (MM), Acute Lymphocytic Leukemia, B-cell Acute Lymphoblastic Leukemia, glioblastoma आदि का उपचार किया जा सके।

यह पहल भारत को कैंसर उपचार में आत्मनिर्भर और वैश्विक अग्रणी बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।

'महा MedTech मिशन' के माध्यम से भारत में चिकित्सा प्रौद्योगिकी में नवाचार को बढ़ावा

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अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF) ने भारतीय आयुष एवं चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) और गेट्स फाउंडेशन के सहयोग से Mission for Advancement in High-Impact Areas (MAHA) – Medical Technology (महाः MedTech) की शुरुआत की है। इस महत्वाकांक्षी पहल का उद्देश्य भारत में चिकित्सा प्रौद्योगिकी क्षेत्र में नवाचार को तेज करना, महंगे आयात पर निर्भरता कम करना और किफायती तथा उच्च गुणवत्ता वाली मेडिकल तकनीकों तक समान पहुंच सुनिश्चित करना है।

मुख्य उद्देश्य:

  • प्राथमिक रोग क्षेत्रों के लिए प्रभावशाली तकनीकों का समर्थन कर सार्वजनिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव डालना।

  • लागत को कम करने वाली तकनीकों के माध्यम से सस्ती और सुलभ स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित करना।

  • देश में मेडटेक विकास, विनिर्माण और उद्योग–शिक्षा सहयोग को बढ़ावा देकर आत्मनिर्भरता और प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करना।

मिशन की सीमा:

यह योजना नवीनतम चिकित्सा उपकरणों और इन-विट्रो डायग्नोस्टिक्स को कवर करती है, जिनमें उपकरण और उनके प्रमुख घटक, इम्प्लांट, सहायक और सर्जिकल डिवाइस, उपभोज्य सामग्री और सॉफ्टवेयर आधारित चिकित्सा समाधान शामिल हैं। इसमें उन्नत डायग्नोस्टिक इमेजिंग, न्यूनतम इनवेसिव तकनीकें, पॉइंट ऑफ केयर मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक्स, AI/ML प्लेटफॉर्म, रोबोटिक्स और अन्य उभरते क्षेत्रों को शामिल किया जा सकता है। मिशन उन परियोजनाओं का स्वागत करता है जो राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राथमिकताओं जैसे टीबी, कैंसर, नवजात देखभाल और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा से संबंधित हों।

समर्थन और सुविधाएं:

  • पेटेंट मित्र (Patent Mitra) – IP सुरक्षा और तकनीक हस्तांतरण।

  • मेडटेक मित्र (MedTech Mitra) – नियामक मार्गदर्शन और अनुमोदन।

  • क्लिनिकल ट्रायल नेटवर्क – नैदानिक प्रमाणीकरण और डेटा संग्रह।

  • उद्योग विशेषज्ञों से मार्गदर्शन और मेंटरशिप।

आवेदन प्रक्रिया और समयसीमा:

  • कॉनसेप्ट नोट्स: 15 सितंबर से 7 नवंबर 2025 तक, ANRF पोर्टल पर जमा करें: www.anrfonline.in

  • पूर्ण प्रस्ताव: केवल शॉर्टलिस्ट किए गए कॉन्सेप्ट नोट्स को दिसंबर 2025 में पूर्ण प्रस्ताव जमा करने का अवसर मिलेगा।

यह मिशन भारत में मेडिकल तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देने, स्वास्थ्य क्षेत्र में प्रभावशाली समाधानों को बाजार में लाने और देश को आत्मनिर्भर बनाने में एक महत्वपूर्ण कदम है।

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