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'कैच द रेन' अभियान में छत्तीसगढ़ का राजनांदगांव बना मिसाल, मिशन जल रक्षा से जल संरक्षण को मिली नई दिशा

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नई दिल्ली/राजनांदगांव- मानसून के आगमन के साथ देशभर में 'कैच द रेन' अभियान तेज़ी पकड़ रहा है। इस अभियान के तहत विभिन्न जिले वर्षा जल के संरक्षण और भूजल स्रोतों को मजबूत बनाने के लिए व्यापक प्रयास कर रहे हैं। इन्हीं में छत्तीसगढ़ का राजनांदगांव जिला अपनी अभिनव 'मिशन जल रक्षा' पहल के कारण देशभर में एक मिसाल बनकर उभरा है। वैज्ञानिक तकनीकों, जनभागीदारी और प्रभावी जल प्रबंधन के माध्यम से जिले ने यह सुनिश्चित किया है कि बारिश की हर बूंद को संरक्षित कर भूजल भंडार तक पहुंचाया जाए।

राजनांदगांव ने मानसून शुरू होने से पहले ही जल संरक्षण की व्यापक तैयारी कर ली थी। मिशन जल रक्षा के तहत ऐसा वैज्ञानिक और सामुदायिक ढांचा विकसित किया गया है, जिससे वर्षा जल बहकर व्यर्थ न जाए, बल्कि उसे धरती के भीतर पहुंचाकर भूजल स्तर को बढ़ाया जा सके।

इस अभियान में जीआईएस मैपिंग (GIS Mapping), रिमोट सेंसिंग, एक्वीफर मैपिंग, डिजिटल एलिवेशन मॉडल (DEM) और रिज-टू-वैली प्लानिंग जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर भूजल पुनर्भरण के लिए उपयुक्त स्थानों की पहचान की गई। इसके साथ ही बंद पड़े बोरवेलों को रिचार्ज शाफ्ट में बदला गया तथा मिनी परकोलेशन टैंक और डीप इंजेक्शन वेल जैसी संरचनाएं विकसित की गईं, जिससे कठोर चट्टानी क्षेत्रों में भी वर्षा जल गहरे भूजल स्रोतों तक पहुंच सके।

मिशन जल रक्षा की सबसे बड़ी सफलता यह रही कि यह केवल सरकारी योजना न रहकर जन आंदोलन बन गया। किसान, महिलाएं, युवा, ग्राम पंचायतें और स्थानीय समुदाय जल बजट, जागरूकता अभियान और व्यवहार परिवर्तन कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से शामिल हुए। जनभागीदारी के कारण जल संरक्षण को व्यापक सामाजिक समर्थन मिला।

कृषि क्षेत्र में भी इस पहल का सकारात्मक प्रभाव देखने को मिला। गर्मी के मौसम में होने वाली लगभग 70 प्रतिशत धान की खेती को कम पानी वाली फसलों की ओर स्थानांतरित किया गया, जिससे भूजल पर दबाव कम हुआ और कृषि अधिक टिकाऊ बनी।

मिशन के परिणाम भी बेहद उत्साहजनक रहे हैं। जिले की 662 ग्राम पंचायतों में 60 हजार से अधिक जल संरक्षण एवं भूजल पुनर्भरण संरचनाएं बनाई गई हैं। 500 से अधिक बंद पड़े बोरवेल रिचार्ज शाफ्ट में परिवर्तित किए गए हैं। 600 से अधिक इंजेक्शन वेल को 1,700 से अधिक मिनी परकोलेशन टैंकों से जोड़ा गया है तथा 2,500 से अधिक जलाशयों का जियो-टैगिंग किया गया है।

इन प्रयासों से 51 लाख से अधिक मानव-दिवस रोजगार सृजित हुए हैं और जिले में औसतन 2.04 मीटर भूजल स्तर की वृद्धि दर्ज की गई है। इससे सिंचाई और पेयजल सुरक्षा दोनों को मजबूत आधार मिला है।

'कैच द रेन' अभियान के तहत राजनांदगांव यह साबित कर रहा है कि वैज्ञानिक योजना, समय पर तैयारी और जनभागीदारी के माध्यम से मानसून को स्थायी जल सुरक्षा के अवसर में बदला जा सकता है। मिशन जल रक्षा यह संदेश देता है कि वर्षा जल संरक्षण केवल मौसमी गतिविधि नहीं, बल्कि जल स्रोतों की सुरक्षा, जलवायु अनुकूलन और जल-सुरक्षित भविष्य की दिशा में एक सतत संकल्प है।

राजनांदगांव अब बारिश का इंतजार नहीं करता, बल्कि बारिश की हर बूंद को सहेजने के लिए पूरी तरह तैयार है।


कैच द रेन अभियान (4 जुलाई–4 अगस्त 2026): नंद्याल जिले में वर्षा जल संरक्षण की दिशा में व्यापक पहल

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कैच द रेन अभियान (4 जुलाई–4 अगस्त 2026) आंध्र प्रदेश के नंद्याल जिले में “जहाँ वर्षा हो, वहीं वर्षा जल को संजोएँ (Catch the Rain, Where it Falls, When it Falls)” के सिद्धांत पर प्रभावी रूप से संचालित किया जा रहा है। इस अभियान का उद्देश्य प्रत्येक बूंद वर्षा जल का संरक्षण करना है। इसके अंतर्गत पारंपरिक जलाशयों का पुनर्जीवन, फीडर एवं सप्लाई चैनलों की गाद निकासी (डी-सिल्टिंग), टैंक प्रणालियों का पुनर्स्थापन तथा अतिरिक्त जल भंडारण क्षमता का निर्माण किया जा रहा है। विभिन्न विभागों के समन्वित प्रयासों, वैज्ञानिक योजना और जनभागीदारी के माध्यम से जिला वर्षा जल संरक्षण अवसंरचना को सुदृढ़ बना रहा है तथा मानसूनी जल के संग्रहण एवं भंडारण की क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि कर रहा है।

वैज्ञानिक योजना एवं जनभागीदारी आधारित क्रियान्वयन

जिले की सभी 489 ग्राम पंचायतों में फील्ड सर्वे, प्राथमिकता वाले जलाशयों, फीडर चैनलों एवं जलग्रहण क्षेत्रों का मानचित्रण तथा संबंधित विभागों द्वारा तकनीकी मूल्यांकन के आधार पर वैज्ञानिक योजना तैयार की गई। स्थानीय समुदायों एवं ग्राम के वरिष्ठ नागरिकों से परामर्श लेकर स्थानीय आवश्यकताओं एवं पारंपरिक ज्ञान के अनुरूप कार्यों की पहचान की गई। प्रस्तावित कार्यों को पारदर्शिता एवं सामुदायिक सहभागिता सुनिश्चित करने के लिए ग्राम सभा के समक्ष प्रस्तुत किया गया।

इस वैज्ञानिक एवं सहभागी योजना प्रक्रिया के आधार पर जिले में 2,103 जल संरक्षण कार्यों की पहचान, स्वीकृति एवं शत-प्रतिशत (100%) ग्राउंडिंग सुनिश्चित की गई। इन कार्यों की रणनीतिक योजना वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण तथा जल भंडारण क्षमता को अधिकतम करने के उद्देश्य से तैयार की गई है, जिससे कैच द रेन अभियान के लक्ष्यों को प्रभावी रूप से साकार किया जा सके।

बड़े पैमाने पर जल संरक्षण कार्य

अभियान के अंतर्गत 2,691 किलोमीटर लंबे फीडर एवं सप्लाई चैनलों की गाद निकासी एवं पुनर्स्थापन किया गया, जिससे वर्षा जल का टैंकों एवं जलाशयों तक सुचारु प्रवाह सुनिश्चित हुआ।

इसके अतिरिक्त, 251 लघु सिंचाई टैंकों के पुनर्स्थापन का कार्य किया गया, जिनमें से 225 कार्य पूर्ण हो चुके हैं, जबकि शेष कार्य प्रगति पर हैं।

जिले में 22,221 फार्म पॉन्ड, 2,221 चेक डैम तथा 202 परकोलेशन टैंक के नेटवर्क को भी सुदृढ़ किया गया है। इन संरचनाओं से वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण तथा जल उपलब्धता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इससे जल संरक्षण प्रणाली की समग्र दक्षता बढ़ी है और जिले की प्रत्येक संभव वर्षा बूंद को संचित करने की क्षमता और मजबूत हुई है।

अतिरिक्त जल भंडारण क्षमता का सृजन

इन सभी कार्यों से उत्पन्न अतिरिक्त जल भंडारण क्षमता का आकलन संबंधित इंजीनियरिंग विभागों द्वारा तैयार तकनीकी अनुमानों के आधार पर किया गया।

फीडर चैनलों एवं जल संरक्षण संरचनाओं के पुनर्स्थापन से 3.27 टीएमसी टैंक भंडारण क्षमता की पुनर्बहाली का अनुमान है, जबकि नई जल संरक्षण संरचनाओं के निर्माण से 0.03 टीएमसी अतिरिक्त जल भंडारण क्षमता का सृजन हुआ है।

टैंकों एवं अन्य जल निकायों की मानसूनी जल संग्रहण क्षमता में वृद्धि के माध्यम से ये वैज्ञानिक रूप से नियोजित हस्तक्षेप भूजल पुनर्भरण को मजबूत करते हैं तथा कृषि, आजीविका और स्थानीय समुदायों के लिए जल उपलब्धता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

सतत जल सुरक्षा की दिशा में

कैच द रेन अभियान के अंतर्गत नंद्याल जिले में 2,691 किलोमीटर फीडर एवं सप्लाई चैनलों की गाद निकासी, 251 लघु सिंचाई टैंकों का पुनर्स्थापन, 2,103 जल संरक्षण कार्यों का क्रियान्वयन तथा हजारों वर्षा जल संचयन संरचनाओं का पुनर्जीवन जल संरक्षण प्रयासों को नई गति प्रदान कर रहा है।

वैज्ञानिक योजना, तकनीकी मूल्यांकन तथा सक्रिय जनभागीदारी पर आधारित यह समन्वित पहल जिले की वर्षा जल संग्रहण, भंडारण एवं भूजल पुनर्भरण क्षमता को सुदृढ़ करते हुए दीर्घकालिक जल सुरक्षा एवं जलवायु लचीलापन (Climate Resilience) को मजबूत बना रही है।

नंद्याल जिले का यह एकीकृत मॉडल दर्शाता है कि विभिन्न विभागों के समन्वित प्रयासों और सामुदायिक सहभागिता के माध्यम से "जहाँ वर्षा हो, वहीं वर्षा जल को संजोएँ" की अवधारणा को सफलतापूर्वक लागू करते हुए सतत जल संरक्षण एवं जल सुरक्षा के लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल की जा रही हैं।

खण्ड एवम अल्प वर्षा की संभावनाओं के बीच किसानों से सरकार का अपील

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धान की खेती रोपा पद्धति के बजाय सीधी बुवाई पर दे विशेष जोर

डीएसआर तकनीक से 20 प्रतिशत पानी की होती है बचत, प्रति एकड़ लगभग 5,000 रुपये की लागत कम आती है तथा फसल 12 से 15 दिन पहले हो जाती है तैयार

उच्चहन भूमि में दलहनी-तिलहनी अरहर, मूंग, उड़द, मूंगफली, सोयाबीन जैसी फसलों की खेती अपनाने की सलाह

रायपुर- खरीफ सीजन 2026 में अल-नीनो के संभावित प्रभाव के कारण मानसून के देर से आने, जल्दी समाप्त होने तथा फसल अवधि के दौरान लंबे अंतराल तक वर्षा नहीं होने (खण्ड वर्षा) एवम् अल्प की आशंका को देखते हुए मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व एवं कृषि मंत्री रामविचार नेताम के मार्गदर्शन में छत्तीसगढ़ सरकार ने प्रदेश के किसानों के लिए सामान्य आकस्मिक कार्ययोजना तैयार की है। इस कार्ययोजना का उद्देश्य कम वर्षा की स्थिति में भी किसानों की फसलों की सुरक्षा सुनिश्चित करना, उत्पादन बनाए रखना तथा खेती की लागत कम करना है।

कृषि विभाग द्वारा किसानों को कम एवं मध्यम अवधि में पकने वाली फसलों एवं किस्मों का चयन करने की सलाह दी गई है, ताकि वर्षा की अनिश्चितता का प्रभाव कम किया जा सके। धान की खेती में रोपा पद्धति के बजाय धान की सीधी बुवाई (डीएसआर) को प्राथमिकता देने पर विशेष जोर दिया गया है। इस तकनीक से 20 प्रतिशत पानी की बचत होती है, प्रति एकड़ लगभग 5,000 रुपये की लागत कम आती है तथा फसल 12 से 15 दिन पहले तैयार हो जाती है।

राज्य सरकार ने किसानों को वर्षा शुरू होने से पहले खेतों एवं मेड़ों की सफाई, समय पर जुताई तथा खेतों में मेडबंदी कर वर्षा जल संरक्षण सुनिश्चित करने की सलाह दी है, ताकि उपलब्ध जल का अधिकतम उपयोग किया जा सके। कम वर्षा की संभावना को देखते हुए उच्चहन भूमि में धान के स्थान पर अरहर, मूंग एवं उड़द जैसी दलहनी तथा मूंगफली, तिल, रामतिल एवं सोयाबीन जैसी तिलहनी फसलों की खेती अपनाने की सलाह दी गई है। ये फसलें अपेक्षाकृत कम पानी में भी बेहतर उत्पादन देने में सक्षम मानी जाती हैं, जिससे किसानों का जोखिम कम हो सकता है। फसलों की कतार पद्धति से बुवाई पर भी बल दिया गया है। इससे खरपतवार नियंत्रण, नमी संरक्षण तथा पौधों की जड़ों का बेहतर विकास होता है, जिससे सूखे की स्थिति में भी फसल अपेक्षाकृत सुरक्षित रहती है।

किसानों को बुवाई से पहले बीज उपचार अनिवार्य रूप से करने की सलाह दी गई है। इसके तहत कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज, थायमेथोक्साम-इमिडाक्लोप्रिड 1.5 मिलीलीटर प्रति किलोग्राम बीज तथा धान के लिए एजोस्थिरिलम, अन्य फसलों के लिए एजोटोबेक्टर और दलहनी फसलों के लिए राइजोबियम (10 मिलीलीटर प्रति किलोग्राम बीज) के उपयोग की सलाह दी गई है। यदि 15 जुलाई तक अंकुरण नहीं होता है, तो किसानों को पुनः बुवाई करते समय सामान्य बीज दर की तुलना में 10 प्रतिशत अधिक बीज उपयोग करने की सलाह दी गई है। साथ ही जुलाई के अंत तक मूंग एवं उड़द की बुवाई तथा अगस्त में तिल, सूरजमुखी एवं मध्यम अवधि वाली अरहर की बुवाई करने का सुझाव दिया गया है।

कम वर्षा की स्थिति में उर्वरकों के संतुलित उपयोग पर भी विशेष जोर दिया गया है। नत्रजन उर्वरकों का सीमित उपयोग करते हुए 2 प्रतिशत यूरिया घोल का पर्णीय छिड़काव अथवा प्रति एकड़ 2 बोतल नैनो यूरिया का उपयोग अधिक लाभकारी रहेगा। वहीं दलहनी एवं तिलहनी फसलों में बुवाई के लगभग एक माह बाद 2 प्रतिशत डीएपी घोल के पर्णीय छिड़काव करने को कहा गया है।

सरकार ने गांवों में नालों पर सीमेंट की बोरियों में रेत भरकर अस्थायी बांध बनाने, डबरियों, तालाबों एवं कुओं में वर्षा जल संग्रह करने तथा आवश्यकता पड़ने पर इस संचित जल का जीवन रक्षक सिंचाई के रूप में उपयोग करने की सलाह दी है। साथ ही किसानों से मौसम पूर्वानुमान के आधार पर कृषि कार्य करने, ड्रिप एवं स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को अपनाने तथा फसल विविधीकरण के माध्यम से खेती के जोखिम को कम करने की अपील की गई है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार यदि खरीफ 2026 में वर्षा सामान्य से कम रहती है, तो किसानों के लिए कम अवधि वाली धान की किस्मों के साथ-साथ अरहर, मूंग, उड़द, मूंगफली, तिल, रामतिल और सोयाबीन जैसी दलहनी एवं तिलहनी फसलें अपेक्षाकृत अधिक लाभकारी विकल्प साबित हो सकती हैं। राज्य सरकार ने किसानों से कृषि संबंधी किसी भी कठिनाई की स्थिति में निकटस्थ कृषि महाविद्यालय, अनुसंधान केन्द्र, कृषि विज्ञान केन्द्र एवं कृषि विभाग से संपर्क कर वैज्ञानिक सलाह लेने की अपील की है।

राष्ट्रीय जलागम प्रबंधन दिशानिर्देशों पर एनआरएए की द्वितीय राष्ट्रीय परामर्श बैठक आयोजित

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भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय के भूमि संसाधन विभाग (DoLR) के ज्ञान साझेदार राष्ट्रीय वर्षा आधारित क्षेत्र प्राधिकरण (NRAA) ने विश्व बैंक समर्थित "रीवार्ड (REWARD) कार्यक्रम" के अंतर्गत बेहतर जलागम प्रबंधन के लिए मसौदा राष्ट्रीय तकनीकी दिशानिर्देशों (NTG) पर द्वितीय राष्ट्रीय स्तरीय परामर्श बैठक का आयोजन 17–18 जून 2026 को नई दिल्ली स्थित एनएएससी कॉम्प्लेक्स, पूसा में किया।

उद्घाटन सत्र में भूमि संसाधन विभाग के सचिव नरेंद्र भूषण, एनआरएए के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. चंद्रशेखर कुमार तथा विभाग और प्राधिकरण के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

इस परामर्श बैठक में जलागम विकास और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन से जुड़े प्रमुख हितधारकों ने भाग लिया। इनमें भूमि संसाधन विभाग, राष्ट्रीय वर्षा आधारित क्षेत्र प्राधिकरण, विश्व बैंक, रीवार्ड कार्यक्रम से जुड़े राज्य (कर्नाटक और ओडिशा), एनआरएए के कंसोर्टियम साझेदार, नाबार्ड, आईसीएआर संस्थान तथा अन्य राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधि शामिल थे।

मरुस्थलीकरण और सूखा रोकथाम के विश्व दिवस के अवसर पर नरेंद्र भूषण ने “मेरी मिट्टी, मेरा फ़र्ज़” शीर्षक से एक लघु फिल्म का शुभारंभ किया। यह फिल्म मिट्टी संरक्षण, क्षतिग्रस्त भू-दृश्यों के पुनर्स्थापन, वर्षा आधारित क्षेत्रों के विकास तथा जलागम प्रबंधन के माध्यम से सतत भविष्य सुनिश्चित करने के संदेश को समर्पित है।

अपने संबोधन में सचिव, भूमि संसाधन विभाग ने कहा कि जलागम प्रबंधन विज्ञान आधारित, जनभागीदारी पर आधारित तथा प्रशासनिक दृष्टि से सरल होना चाहिए। उन्होंने दिशानिर्देश तैयार करते समय वर्षा आधारित क्षेत्रों के विकास, कृषि उत्पादकता में वृद्धि, फसल सघनता बढ़ाने, जल सुरक्षा एवं भूजल पुनर्भरण को सुदृढ़ करने, जलवायु लचीलापन विकसित करने तथा जलागम परिसंपत्तियों के रखरखाव जैसे राष्ट्रीय लक्ष्यों को ध्यान में रखने पर बल दिया। उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रीय तकनीकी दिशानिर्देशों में सुझाए गए उपाय व्यापक स्तर पर लागू किए जा सकने योग्य होने चाहिए।

एनआरएए के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. चंद्रशेखर कुमार ने पहली राष्ट्रीय परामर्श बैठक में प्राप्त सुझावों का उल्लेख करते हुए निजी क्षेत्र की अधिक भागीदारी, डेटा-आधारित दृष्टिकोण, अभिसरण (कन्वर्जेंस), पंचायती राज संस्थाओं की सहभागिता तथा परियोजना-उपरांत स्थिरता पर जोर दिया। उन्होंने चैटबॉट आधारित अनुप्रयोगों के एकीकरण, प्रौद्योगिकी-संचालित निगरानी एवं मूल्यांकन प्रणाली, मजबूत निर्णय सहायता प्रणाली (DSS) और राष्ट्रीय वेब पोर्टल विकसित करने की आवश्यकता भी रेखांकित की।

भूमि संसाधन विभाग के संयुक्त सचिव (जलागम प्रबंधन) ने योजना निर्माण हेतु उच्च-रिज़ॉल्यूशन चित्र प्राप्त करने के लिए ड्रोन तकनीक के उपयोग, भूमि संसाधन सूची (LRI) एवं हाइड्रोलॉजी-लाइट दृष्टिकोण को अपनाने, राज्यों में संस्थागत एवं क्रियान्वयन तंत्र में सुधार तथा तकनीकी सेवा प्रदाताओं, संस्थानों और गैर-सरकारी संगठनों की भागीदारी के माध्यम से जलागम परिसंपत्तियों के दीर्घकालिक रखरखाव एवं स्थिरता सुनिश्चित करने पर विचार-विमर्श का सुझाव दिया।

इस परामर्श बैठक का उद्देश्य मसौदा राष्ट्रीय तकनीकी दिशानिर्देशों पर विचार-विमर्श करना तथा विशेषज्ञों के सुझावों को शामिल करते हुए देशभर में जलागम योजना, क्रियान्वयन, निगरानी और स्थिरता को मजबूत बनाना है। इन चर्चाओं से जलागम प्रशासन में सुधार और वर्षा आधारित क्षेत्रों में जलवायु लचीलापन बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान मिलने की अपेक्षा है।

बैठक के दौरान भूमि संसाधन सूची (LRI), हाइड्रोलॉजी, निर्णय सहायता प्रणाली (DSS), प्रौद्योगिकी-सक्षम निगरानी एवं मूल्यांकन, सामुदायिक सहभागिता एवं सामाजिक संगठन, आजीविका संवर्धन, जलागम स्थिरता तथा रिमोट सेंसिंग एवं जीआईएस आधारित वेब पोर्टल विकास जैसे प्रमुख विषयों पर तकनीकी सत्र आयोजित किए गए।

इस कार्यक्रम में राज्यों तथा प्रतिष्ठित संस्थानों का प्रतिनिधित्व करने वाले लगभग 100 विशेषज्ञों और व्यावसायिकों ने भाग लिया, जो देश में वैज्ञानिक एवं सतत जलागम प्रबंधन को आगे बढ़ाने के प्रति व्यापक प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

बेंगलुरु में अंतरराष्ट्रीय बांध सुरक्षा सम्मेलन (ICDS 2026) का आयोजन, वैश्विक विशेषज्ञों की भागीदारी

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बेंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) के जे.एन. टाटा ऑडिटोरियम में 13–14 फरवरी 2026 को अंतरराष्ट्रीय बांध सुरक्षा सम्मेलन (ICDS 2026) का आयोजन किया जा रहा है। यह सम्मेलन बांध पुनर्वास और सुधार परियोजना (DRIP) फेज-II और फेज-III के तहत आयोजित किया गया है।

सम्मेलन का आयोजन जल संसाधन, नदी विकास और गंगा पुनर्जीवन विभाग (जल शक्ति मंत्रालय) और कर्नाटक सरकार के जल संसाधन विभाग द्वारा केंद्रीय जल आयोग (CWC), IISc बेंगलुरु और विश्व बैंक के सहयोग से किया गया है।

सम्मेलन का उद्घाटन कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने किया, जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने की। उद्घाटन सत्र में केंद्रीय जल शक्ति राज्य मंत्री राज भूषण चौधरी, विश्व बैंक के क्षेत्रीय उपाध्यक्ष जोहान्स ज़ुट, ICOLD के अध्यक्ष डी.के. शर्मा सहित कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ मौजूद रहे।

मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कहा कि पुराने बांधों, जलवायु जोखिम और सतत विकास की चुनौतियों को देखते हुए बांध सुरक्षा राष्ट्रीय सुरक्षा का महत्वपूर्ण विषय है, जिसके लिए विज्ञान आधारित और सहयोगात्मक प्रयास जरूरी हैं। उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने बांध सुरक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकता बताते हुए पारदर्शी नीतियों और सामूहिक कार्रवाई का आह्वान किया।

सम्मेलन में DAMCHAT नामक एआई आधारित प्लेटफॉर्म और जल शक्ति डेटा प्रबंधन प्लेटफॉर्म का शुभारंभ किया गया। साथ ही बांध डिजाइन और जल संसाधन प्रबंधन से जुड़े महत्वपूर्ण दिशानिर्देश और प्रकाशन जारी किए गए।

ICDS 2026 में 12 देशों के 750 से अधिक प्रतिनिधि, इंजीनियर, नीति निर्माता और उद्योग विशेषज्ञ भाग ले रहे हैं। सम्मेलन में बांध सुरक्षा नियम, संरचनात्मक निगरानी, पुनर्वास तकनीक, जलाशय प्रबंधन, जोखिम आधारित निर्णय प्रणाली और बाढ़ नियंत्रण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की जा रही है।

यह सम्मेलन भारत की बांध सुरक्षा प्रणाली को मजबूत करने, जलवायु सहनशीलता बढ़ाने और आधुनिक जल अवसंरचना विकास के प्रति देश की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।


भारत में भूजल प्रबंधन में नई क्रांति: सतत जल सुरक्षा के लिए कई महत्वपूर्ण पहलें तेज़ी से आगे बढ़ीं

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भारत में भूजल (Groundwater) प्रबंधन के क्षेत्र में कई प्रमुख पहलों ने महत्वपूर्ण प्रगति हासिल की है। देश में भूजल की सतत उपलब्धता और जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा कई वैज्ञानिक, नीतिगत और समुदाय-आधारित कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं।

भूजल भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह देश की कृषि, पीने के पानी और उद्योगों की मुख्य आधारशिला है। भारत में लगभग 62% सिंचाई, 85% ग्रामीण जल और 50% शहरी जल की मांग भूजल से पूरी होती है। बढ़ती जनसंख्या, कृषि विस्तार, औद्योगिक विकास और शहरीकरण के कारण भूजल पर दबाव बढ़ा है। अतः भूजल के संरक्षण और संतुलित उपयोग के लिए वैज्ञानिक और प्रभावी प्रबंधन अनिवार्य हो गया है।

मुख्य तथ्य (Key Takeaways):

  • भारत में 43,228 भूजल स्तर निगरानी स्टेशन, 712 जल शक्ति केंद्र, और 53,264 जल गुणवत्ता निगरानी स्टेशन कार्यरत हैं।

  • जल शक्ति अभियान: कैच द रेन (JSA: CTR), जल संचय जन भागीदारी (JSJB), अटल भूजल योजना, और मिशन अमृत सरोवर जैसी योजनाओं ने भूजल प्रबंधन में महत्वपूर्ण प्रगति दिखाई है।

  • भूजल प्रबंधन सतत विकास लक्ष्यों (SDG 6, SDG 11, SDG 12) की दिशा में अहम भूमिका निभाता है।

सरकारी पहलें और उनकी प्रगति:

1. मॉडल ग्राउंडवाटर बिल (Model Groundwater Bill):

केंद्र सरकार ने भूजल संरक्षण, नियंत्रण और प्रबंधन हेतु मॉडल बिल तैयार किया है, जिसे 21 राज्य/संघ शासित प्रदेशों ने अपनाया है। इस बिल के माध्यम से राज्य स्तर पर भूजल की अंधाधुंध निकासी पर नियंत्रण और संतुलित उपयोग सुनिश्चित किया जा सकेगा।

2. जल शक्ति अभियान: कैच द रेन (JSA: CTR):

यह अभियान 22 मार्च 2021 को World Water Day के अवसर पर शुरू किया गया। इसका उद्देश्य पानी संरक्षण, वर्षा जल संचयन, जल निकायों की पहचान एवं जीओ-टैगिंग, और जागरूकता बढ़ाना है।

3. जल संचय जन भागीदारी (JSJB):

यह पहल 6 सितंबर 2024 को शुरू हुई और भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देती है।
22 जनवरी 2026 तक कुल 39,60,333 कृत्रिम भूजल पुनर्भरण और जल संचयन कार्य पूरे किए जा चुके हैं।

4. राष्ट्रीय एक्विफर मैपिंग और प्रबंधन कार्यक्रम (NAQUIM 2.0):

यह कार्यक्रम उच्च-स्तरीय डेटा और वैज्ञानिक inputs प्रदान करता है। इसका लक्ष्य पंचायत स्तर तक जल-स्तर और गुणवत्ता की जानकारी पहुंचाना है, ताकि स्थानीय स्तर पर प्रभावी निर्णय लिए जा सकें।

5. अटल भूजल योजना (Atal Jal):

7 राज्यों में सामुदायिक नेतृत्व वाली भूजल प्रबंधन पहल के तहत जल उपयोग में दक्षता और डिजिटल निगरानी जैसे उपाय किए जा रहे हैं।
20 जनवरी 2026 तक 6,68,683 हेक्टेयर क्षेत्र में जल उपयोग दक्षता बढ़ी है और 6,271 डिजिटल वॉटर लेवल रिकॉर्डर स्थापित किए गए हैं।

6. मिशन अमृत सरोवर:

24 अप्रैल 2022 को शुरू इस मिशन के तहत प्रत्येक जिले में कम से कम 1 एकड़ के अमृत सरोवर बनाए जा रहे हैं। यह न केवल जल संरक्षण बढ़ाता है बल्कि भूजल स्तर में सुधार भी करता है।

निष्कर्ष:

भूजल भारत की जल सुरक्षा का मुख्य आधार है, लेकिन इसकी स्थिति में लगातार गिरावट और गुणवत्ता में गिरावट चिंता का विषय है। इस स्थिति से निपटने के लिए सरकार ने वैज्ञानिक, नीतिगत और सामुदायिक भागीदारी पर आधारित एक समग्र रणनीति अपनाई है।
मॉडल बिल, JSA: CTR, JSJB, NAQUIM 2.0, अटल भूजल योजना और मिशन अमृत सरोवर जैसी पहलें भूजल संरक्षण, पुनर्भरण, निगरानी और समुचित उपयोग को बढ़ावा दे रही हैं।
इन प्रयासों से भारत जल-संरक्षण, जल-प्रबंधन और सतत विकास की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ रहा है।


आंध्र प्रदेश में MISHTI पर राष्ट्रीय स्तर की कार्यशाला का सफल आयोजन

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आंध्र प्रदेश में 8 एवं 9 जनवरी 2026 को MISHTI (Mangrove Initiative for Shoreline Habitats and Tangible Incomes) पर एक राष्ट्रीय स्तर की कार्यशाला का सफल आयोजन किया गया।

कार्यशाला का उद्घाटन आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण द्वारा किया गया। अपने संबोधन में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व के लिए आभार व्यक्त किया। साथ ही, उन्होंने केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव को MISHTI योजना के माध्यम से मैंग्रोव संरक्षण में राज्यों को सहयोग देने के लिए धन्यवाद दिया। इस कार्यशाला में वन विभाग के अधिकारी, विशेषज्ञ और विभिन्न हितधारक शामिल हुए, जिन्होंने मैंग्रोव संरक्षण एवं पुनर्स्थापन के सतत उपायों पर विचार-विमर्श किया।

कार्यशाला के दौरान राष्ट्रीय कैम्पा (National CAMPA) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी आनंद मोहन द्वारा एक महत्वपूर्ण प्रस्तुति दी गई, जिसमें MISHTI पहल के उद्देश्यों और कार्यान्वयन ढांचे पर प्रकाश डाला गया। MISHTI का उद्देश्य मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र का विकास एवं संरक्षण करना है, जिसमें मैंग्रोव पुनर्स्थापन, तटरेखा संरक्षण, जैव विविधता संरक्षण तथा तटीय समुदायों के लिए ठोस आजीविका अवसरों के सृजन पर विशेष बल दिया गया है। यह मिशन ‘मैंग्रोव एलायंस फॉर क्लाइमेट’ (MAC) के उद्देश्यों में भी योगदान देता है, जिसका भारत COP-27 के दौरान सक्रिय सदस्य बना था।

प्रस्तुति के दौरान राष्ट्रीय कैम्पा के सीईओ ने जलवायु सहनशीलता, तटीय संरक्षण और सतत आर्थिक लाभों में मैंग्रोव की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने प्रभावी कार्यान्वयन के लिए राज्यों और संस्थानों के बीच समन्वित प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया।

यह कार्यशाला ज्ञान साझा करने, सर्वोत्तम प्रथाओं और नीति संवाद के लिए एक महत्वपूर्ण मंच सिद्ध हुई, जिसने MISHTI ढांचे के अंतर्गत मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करने और सतत तटीय आजीविका सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता को और मजबूत किया।

मिशन मौसम: उन्नत प्रौद्योगिकी के माध्यम से सटीक मौसम पूर्वानुमान और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली की दिशा में भारत का कदम

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 केंद्रीय क्षेत्र की योजना “मिशन मौसम (Mission Mausam)” का उद्देश्य देश में मौसम और जलवायु से जुड़े अवलोकन, समझ, मॉडलिंग और पूर्वानुमान क्षमताओं को उल्लेखनीय रूप से सुदृढ़ करना है, ताकि अधिक उपयोगी, सटीक और समयबद्ध सेवाएं प्रदान की जा सकें। इस मिशन का लक्ष्य पृथ्वी प्रणाली (Earth System) दृष्टिकोण को अपनाते हुए पृथ्वी प्रणाली अवलोकन के विभिन्न घटकों को मजबूत करना है, जिससे निर्बाध मौसम और जलवायु सेवाओं के लिए सटीक पूर्वानुमान और प्रभावी प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली विकसित की जा सके।

मिशन मौसम के प्रमुख उद्देश्य इस प्रकार हैं:

  • अत्याधुनिक मौसम निगरानी प्रौद्योगिकियों और प्रणालियों का विकास

  • उच्च स्थानिक एवं कालिक रेज़ोल्यूशन के साथ वायुमंडलीय अवलोकनों का विस्तार और सुदृढ़ीकरण

  • अगली पीढ़ी के डॉप्लर रडार, विंड प्रोफाइलर और उन्नत उपकरणों से युक्त उपग्रहों की तैनाती

  • उन्नत उच्च-प्रदर्शन संगणना (HPC) प्रणालियों का कार्यान्वयन

  • मौसम और जलवायु प्रक्रियाओं की समझ को बढ़ाना तथा पूर्वानुमान क्षमताओं में सुधार

  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और मशीन लर्निंग (ML) सहित उन्नत पृथ्वी प्रणाली मॉडल और डेटा-आधारित विधियों का विकास

  • प्रभावी मौसम प्रबंधन के लिए प्रौद्योगिकियों और प्रोटोकॉल का निर्माण

  • अंतिम छोर तक सूचना पहुंच सुनिश्चित करने हेतु अत्याधुनिक निर्णय सहायता प्रणाली (DSS) और प्रसारण प्रणाली की स्थापना

  • क्षमता निर्माण और अनुसंधान सहयोग को मजबूत करना

मिशन मौसम के कार्यान्वयन से उच्च स्थानिक और कालिक रेज़ोल्यूशन पर मौसम पूर्वानुमान की क्षमता में वृद्धि होगी, चरम मौसम घटनाओं के पूर्वानुमान में सुधार होगा तथा ‘सभी के लिए प्रारंभिक चेतावनी (Early Warning for All)’ पहल को समर्थन देने के लिए अंतिम छोर तक कनेक्टिविटी सुदृढ़ होगी।

मिशन मौसम के अंतर्गत भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM) और राष्ट्रीय मध्यम अवधि मौसम पूर्वानुमान केंद्र (NCMRWF) में अत्याधुनिक उच्च-प्रदर्शन संगणना प्रणालियां स्थापित की गई हैं। इसके साथ ही कई डॉप्लर मौसम रडार और अन्य इन-सीटू अवलोकन नेटवर्क भी लगाए गए हैं। इन प्रगतियों से देश के मौसम निगरानी अवसंरचना को मजबूती मिली है और पूर्वानुमान मॉडलों में सुधार हुआ है, जिससे लगभग 6 किलोमीटर के स्थानिक रेज़ोल्यूशन पर मौसम पूर्वानुमान संभव हो सका है। परिणामस्वरूप, मौसम पूर्वानुमानों की सटीकता और विश्वसनीयता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

उत्तराखंड में आपदा पूर्वानुमान होगा और सशक्त: डॉ. जितेंद्र सिंह ने किए तीन नए वेदर रडारों की घोषणा

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केंद्र सरकार में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री, तथा प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष विभाग के राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने घोषणा की कि उत्तराखंड में सुरकंडा देवी, मुक्तेश्वर और लैंसडौन में पहले ही तीन वेदर रडार लगाए जा चुके हैं और जल्द ही हरिद्वार, पंतनगर और औली में तीन और रडार स्थापित किए जाएंगे। इससे राज्य की रियल-टाइम मौसम पूर्वानुमान क्षमता और मजबूत होगी।

"विश्व आपदा प्रबंधन सम्मेलन" को संबोधित करते हुए पृथ्वी विज्ञान मंत्री ने कहा कि उत्तराखंड अपने भौगोलिक स्वरूप, हिमालयी पारिस्थितिकी और प्राकृतिक अनुभवों के कारण वैश्विक आपदा-रोधक चर्चा के लिए सबसे उपयुक्त स्थान है।

सम्मेलन में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, सांसद नरेश बंसल, एनडीएमए के सदस्य अग्रवाल, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सचिव नितीश कुमार झा, ग्राफिक एरा विश्वविद्यालय के अध्यक्ष प्रो. कमल घनसाला, डीजी दुर्गेश पंत, एसडीएमए उपाध्यक्ष रोहिला सहित विशेषज्ञ, शिक्षक एवं छात्र उपस्थित थे।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि उत्तराखंड की 25 वर्षों की यात्रा ने राज्य को आपदा प्रतिक्रिया और प्रशासन में विशिष्ट पहचान दी है। उन्होंने सिलक्यारा टनल रेस्क्यू ऑपरेशन को याद किया, जिसे दो वर्ष पूर्व सफलतापूर्वक पूरा किया गया था और जिसे वैश्विक आपदा प्रबंधन में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर माना जाएगा।

उन्होंने बताया कि पिछले एक दशक में उत्तराखंड में हाइड्रो-मीटियोरोलॉजिकल आपदाओं में तेजी से वृद्धि हुई है। 2013 की केदारनाथ आपदा और 2021 की चमोली घटना इसके प्रमुख उदाहरण हैं। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन, तेजी से पीछे हटते ग्लेशियर, जीएलओएफ का बढ़ता जोखिम, हिमालयी पहाड़ों की नाजुकता, वनों की कटाई और प्राकृतिक जलमार्गों पर अतिक्रमण इस स्थिति को और गंभीर बना रहे हैं।

मंत्री ने जानकारी दी कि पिछले दस वर्षों में केंद्र सरकार ने उत्तराखंड में मौसम और आपदा-निगरानी बुनियादी ढांचे को बड़ी मात्रा में बढ़ाया है। राज्य में 33 मौसम वेधशालाएँ, रेडियो-सोंडे और रेडियो-विंड सिस्टम्स, 142 स्वचालित मौसम स्टेशन, 107 वर्षामापक यंत्र, जिला व ब्लॉक स्तर के मॉनिटरिंग सिस्टम तथा किसानों के लिए ऐप-आधारित चेतावनी प्रणाली विकसित की गई है।

उन्होंने बताया कि तीन वेदर रडार पहले ही स्थापित किए जा चुके हैं और तीन और जल्द स्थापित होंगे, जिससे पूर्वानुमान पद्धति और अधिक सटीक होगी।

डॉ. सिंह ने कहा कि अचानक होने वाले क्लाउडबर्स्ट की परिस्थितियों को समझने के लिए भारत ने एक विशेष हिमालयी जलवायु अध्ययन कार्यक्रम शुरू किया है। उन्होंने बताया कि "नाउकास्ट" प्रणाली—जो तीन घंटे पहले की भविष्यवाणी देती है—अब उत्तराखंड में भी व्यापक रूप से लागू की जा रही है।

उन्होंने एनडीएमए, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय और वैज्ञानिक संस्थानों द्वारा विकसित उन्नत जंगल-आग मौसम सेवाओं का उल्लेख किया और इसे "पूरा-सरकार" और "पूरा-विज्ञान" मॉडल बताया।

कुछ क्षेत्रों में आईएमडी चेतावनियों की अनुपालना न होने पर उन्होंने चिंता व्यक्त की। उन्होंने जम्मू-कश्मीर की एक घटना का उल्लेख किया जहाँ एक नए आईएएस अधिकारी ने आईएमडी रेड अलर्ट के बाद तुरंत हाईवे बंद कर बड़ी त्रासदी को टाल दिया।

उन्होंने कहा कि एनडीएमए, पर्यावरण मंत्रालय और शहरी विकास निकायों के भूमि उपयोग नियमों का कड़ाई से पालन होना चाहिए। नदी तटों और नई हाईवे के पास अवैध खनन को उन्होंने बेहद खतरनाक मानवजनित खतरा बताया।

डॉ. सिंह ने हिमालयी क्षेत्रों की आर्थिक क्षमता बढ़ाने की दिशा में कृषि-स्टार्टअप्स और सीएसआईआर आधारित वैल्यू-एडिशन मॉडलों की चर्चा की। जम्मू-कश्मीर के उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि कैसे कई तकनीकी और प्रबंधन स्नातक निजी नौकरियाँ छोड़कर इन उद्यमों से जुड़े हैं। उन्होंने इसी मॉडल को उत्तराखंड में भी दोहराने की अपील की।

भारत की वैश्विक आपदा-रोधक क्षमता का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत अब पड़ोसी देशों को तकनीकी सहायता भी प्रदान कर रहा है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के COP-26 में घोषित 2070 नेट ज़ीरो लक्ष्य की भी चर्चा की।

अंत में, उन्होंने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और आयोजनकर्ताओं को विश्व आपदा प्रबंधन सम्मेलन आयोजित करने के लिए बधाई दी और कहा कि इससे वैश्विक स्तर पर आपदा-नियंत्रण, जलवायु अनुकूलन और लचीले विकास की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान मिलेगा।


मेघालय के 39 में से 25 C&RD ब्लॉक उच्च या अत्यधिक जलवायु संवेदनशीलता श्रेणी में: अध्ययन

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एक नए अध्ययन के अनुसार मेघालय के 39 सामुदायिक एवं ग्रामीण विकास (C&RD) ब्लॉकों में से 25 ब्लॉक उच्च या अत्यधिक जलवायु संवेदनशील (Climate Vulnerable) श्रेणी में आते हैं।

Integrated Vulnerability Assessment के आधार पर ब्लॉकों की श्रेणियाँ दर्शाता मानचित्र।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के CEST डिविजन के अंतर्गत चल रहे क्लाइमेट चेंज प्रोग्राम के तहत देश के 30 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में स्टेट क्लाइमेट चेंज सेल्स (SCCCs) स्थापित की गई हैं ताकि केंद्र और राज्यों तथा राज्यों के बीच जलवायु कार्रवाई में बेहतर समन्वय स्थापित किया जा सके।

इसी क्रम में, मेघालय क्लाइमेट चेंज सेंटर (MCCC) को राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC) के तहत राष्ट्रीय हिमालयी पारिस्थितिकी संरक्षण मिशन (NMSHE) के एक प्रमुख घटक के रूप में स्थापित किया गया है।

भारतीय हिमालय क्षेत्र की पारिस्थितिक नाजुकता को देखते हुए जलवायु परिवर्तन प्राकृतिक व सामाजिक-आर्थिक प्रणालियों के लिए गंभीर खतरा पैदा करता है।

इसी पृष्ठभूमि में, MCCC ने मेघालय के 39 C&RD ब्लॉकों का विस्तृत जलवायु संवेदनशीलता मूल्यांकन किया है। इस अध्ययन में राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत फ्रेमवर्क का उपयोग करते हुए जैव-भौतिक तथा सामाजिक-आर्थिक संकेतकों को एकीकृत किया गया है।

अध्ययन की मुख्य बातें

📍 39 में से 25 ब्लॉक उच्च या अत्यधिक जलवायु संवेदनशील पाए गए।
📍 संवेदनशीलता बढ़ाने वाले प्रमुख कारक:

  • संस्थागत ऋण तक सीमित पहुंच

  • निम्न घरेलू आय

  • स्वास्थ्य एवं पोषण संरचना की कमी (जैसे आंगनवाड़ी केंद्र)

  • सीमित वन संसाधन

  • सिंचाई कवरेज का कम होना

ये कारक इस ओर संकेत करते हैं कि राज्य में अनुकूलन क्षमता बढ़ाने और जलवायु-सहिष्णु आजीविका को बढ़ावा देने के लिए लक्षित नीति हस्तक्षेप की आवश्यकता है।

अध्ययन क्यों महत्वपूर्ण है?

  • यह शोध नीति निर्माताओं को स्थानीय स्तर की कमजोरियों की स्पष्ट समझ प्रदान करता है, जिन्हें जिला-स्तरीय अध्ययन अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

  • ब्लॉक-स्तर के इस मूल्यांकन से मेघालय के विविध भौगोलिक क्षेत्रों और समुदायों के लिए अनुकूल, स्थान-विशिष्ट रणनीतियाँ बनाने में मदद मिलेगी।

  • निष्कर्ष बताते हैं कि ग्रामीण स्तर पर एकीकृत जलवायु अनुकूलन योजना कितनी आवश्यक है, खासकर हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को जलवायु-सहिष्णु बनाने के लिए।

    मेघालय में ब्लॉक स्तर पर एकीकृत संवेदनशीलता (Integrated Vulnerability) में योगदान देने वाले कारक।


अध्ययन का प्रकाशन

इस शोध कार्य “Integrated Climate Vulnerability Assessment of Meghalaya at Block Level” को Discover Sustainability नामक प्रतिष्ठित जर्नल में प्रकाशित किया गया है, जो इसकी वैज्ञानिक एवं नीतिगत महत्व को दर्शाता है।


नई दिल्ली में APDIM के 10वें सत्र में समावेशी आपदा जोखिम डेटा शासन पर वैश्विक सहयोग को बढ़ावा

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समावेशी आपदा जोखिम डेटा शासन पर एशियाई और प्रशांत आपदा सूचना प्रबंधन केंद्र (APDIM) के 10वें सत्र का आयोजन विज्ञान भवन, नई दिल्ली में किया गया। भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व गृहमंत्री तथा आपदा प्रबंधन राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने किया। प्रतिनिधिमंडल में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के सदस्य व विभागाध्यक्ष राजेंद्र सिंह तथा NDMA के सचिव  मनीष भारद्वाज भी शामिल थे।

उद्घाटन संबोधन

अपने उद्घाटन भाषण में, नित्यानंद राय ने क्षेत्रीय आपदा लचीलापन एवं सहयोग के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दोहराया। उन्होंने उल्लेख किया कि भारत की अध्यक्षता में और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गतिशील नेतृत्व में भारत जोखिम आंकलन, भू-स्थानिक अनुप्रयोग, प्रभाव-आधारित पूर्वानुमान, शीघ्र चेतावनी प्रसार, तथा जलवायु-लचीला अवसंरचना योजना जैसे क्षेत्रों में व्यापक क्षमता-विकास एजेंडे को आगे बढ़ाएगा।

क्षेत्रीय सहयोग के प्रति भारत की प्रतिबद्धता

भारत ने APDIM तथा एशिया–प्रशांत क्षेत्र के साझेदार देशों के साथ मिलकर आपदा एवं जलवायु जोखिमों को कम करने की अपनी प्रतिबद्धता को पुनः दृढ़ किया।
संयुक्त राष्ट्र एशिया एवं प्रशांत आर्थिक और सामाजिक आयोग (UN ESCAP), APDIM तथा अन्य बहुपक्षीय संस्थानों के साथ भारत की साझेदारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आपदा जोखिम न्यूनीकरण हेतु 10 सूत्रीय एजेंडे द्वारा निर्देशित है। यह एजेंडा स्थानीय स्तर पर निवेश, प्रौद्योगिकी का उपयोग, विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों के नेटवर्क को बढ़ावा देने, जोखिम डेटा को सुदृढ़ करने और क्षेत्रीय सहयोग को प्रोत्साहित करने पर बल देता है।

सत्र के प्रमुख निष्कर्ष

सत्र का समापन एशिया–प्रशांत क्षेत्र में आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ाने और नवाचारपूर्ण रणनीतियों को लागू करने की साझा प्रतिबद्धता के साथ हुआ।
बैठक के दौरान गवर्निंग काउंसिल की चर्चा का विशेष एजेंडा प्रस्तुत किया गया, जिसमें—

  • APDIM की पिछले वर्ष की गतिविधियों की समीक्षा

  • वर्ष 2026 के लिए प्रस्तावित गतिविधियाँ

  • 2026–2030 की रणनीतिक कार्य योजना शामिल रहे।

इस बैठक के निष्कर्ष APDIM के समग्र कार्य कार्यक्रम का मार्गदर्शन करेंगे तथा सेंडाई फ्रेमवर्क और सतत विकास के लिए 2030 एजेंडा के लक्ष्यों को आगे बढ़ाने में योगदान देंगे।

प्रतिभागी देश एवं प्रतिनिधि

गवर्निंग काउंसिल के 10वें सत्र में निम्न सदस्य देशों के प्रतिनिधियों एवं प्रमुखों ने भाग लिया—
बांग्लादेश, ईरान, मालदीव, कज़ाखस्तान, मंगोलिया और तुर्की, तथा ताजिकिस्तान के पर्यवेक्षक प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

इसके अलावा,

  • स्टीफन कूपर, निदेशक (प्रशासन), UN ESCAP

  • लेटिज़िया रॉसानो, निदेशक, APDIM

  •  मोस्तफ़ा मोहांघेघ, वरिष्ठ समन्वयक, APDIM

  • तथा APDIM सचिवालय, ईरान और अन्य पर्यवेक्षक संगठनों के अधिकारी भी मौजूद थे।


ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु लचीलापन: आईएसए–एसआईडीएस नेतृत्व सत्र में भारत की वैश्विक सौर प्रतिबद्धता

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पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने 19.11.2025 को ब्राज़ील के बेलेम में आयोजित यूएनएफसीसीसी सीओपी30 के अवसर पर आयोजित आईएसए-एसआईडीएस प्लेटफ़ॉर्म के उच्च-स्तरीय मंत्री नेतृत्व सत्र को संबोधित किया। यह आयोजन ‘यूनाइटिंग आइलैंड्स, इंस्पायरिंग एक्शन – लीडरशिप फ़ॉर एनर्जी सिक्योरिटी’ विषय के अंतर्गत आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में स्मॉल आइलैंड डेवलपिंग स्टेट्स (SIDS), अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) के सदस्य देशों और भागीदार संगठनों के मंत्रियों और वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने ऊर्जा सुरक्षा, वहनीयता और लचीलापन बढ़ाने के लिए सामूहिक कार्यों को आगे बढ़ाने हेतु भाग लिया।

सत्र के विचार-विमर्श से यह स्पष्ट हुआ कि SIDS विशेष प्रकार की चुनौतियों का सामना करते हैं—आयातित जीवाश्म ईंधन पर अत्यधिक निर्भरता, जलवायु-जनित व्यवधान, और कमजोर अवसंरचना। ISA-SIDS प्लेटफ़ॉर्म का उद्देश्य एक परिवर्तनकारी डिजिटल और वित्तीय तंत्र स्थापित करना है, जो मानकीकृत खरीद प्रणाली, मिश्रित वित्त, स्थानीय क्षमता निर्माण और सौर प्रौद्योगिकियों तक सुगम पहुंच के माध्यम से सौर ऊर्जा को तेजी से अपनाने में सहायता करेगा।

सत्र को संबोधित करते हुए मंत्री यादव ने ISA के माध्यम से SIDS को स्वच्छ ऊर्जा मार्गों को आगे बढ़ाने में भारत की प्रतिबद्धता को रेखांकित किया। आशावाद के साथ अपने वक्तव्य की शुरुआत करते हुए मंत्री ने भारत की नवीकरणीय ऊर्जा में तेज प्रगति का उल्लेख किया और कहा, “आज भारत 500 गीगावॉट से अधिक स्थापित बिजली क्षमता पार कर चुका है — और इसका आधे से अधिक हिस्सा स्वच्छ ऊर्जा है। भारत अपने एनडीसी लक्ष्य से पाँच वर्ष पहले ही 50% गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता हासिल कर चुका है।”

मंत्री ने बताया कि भारत अब विश्व का चौथा सबसे बड़ा नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादक और सौर ऊर्जा में तीसरा सबसे बड़ा देश है। उन्होंने कहा, “यह प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के विज़न और उनके स्केल, स्पीड तथा आम लोगों की शक्ति में विश्वास के कारण संभव हुआ।” उन्होंने पीएम सूर्य घर रूफटॉप सोलर कार्यक्रम की उदाहरणस्वरूप एक स्कूल शिक्षक के अनुभव का उल्लेख करते हुए बताया कि कैसे इस योजना ने उनके जीवन में परिवर्तन लाया—जहाँ पहले वे हर महीने बिजली बिल को लेकर चिंतित रहते थे, वहीं अब वे धूप का इंतज़ार करते हैं क्योंकि वही उनकी आय का स्रोत बन गया है।

मंत्री ने बताया कि भारत में 20 लाख से अधिक परिवारों ने रूफटॉप सोलर अपनाया है, जिसे उन्होंने “हर घर की स्वतंत्रता” और “हर छत पर एक मिनी पावर प्लांट” कहा। कृषि क्षेत्र में सौर ऊर्जा का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा, “कृषि के लिए सौर ऊर्जा हमारे किसान समुदाय के लिए एक नया सवेरा है। अब वे सूरज के साथ काम करते हैं और शांति से सोते हैं।” सौर पंप और सौर ऊर्जा से संचालित फीडर खेती को ज्यादा भरोसेमंद और सम्मानजनक बना रहे हैं, क्योंकि वे किसानों को दिन के समय स्वच्छ सौर ऊर्जा उपलब्ध कराते हैं—न डीज़ल, न इंतज़ार, न तनाव।

मंत्री ने पीएम जनमन योजना के माध्यम से दूरस्थ और वनों में बसे क्षेत्रों को रोशन करने की पहल तथा ऊर्जा भंडारण में भारत की बड़ी प्रगति को रेखांकित किया। उन्होंने बताया, “भारत दुनिया की सबसे बड़ी ‘सोलर और बैटरी’ परियोजनाओं में से कुछ बना रहा है, जिनमें लद्दाख की एक परियोजना भी शामिल है, जो इतनी स्वच्छ ऊर्जा संग्रहीत करेगी कि पूरे एक शहर को रोशन कर सके।” उन्होंने जोर देकर कहा कि SIDS के लिए ऐसे मॉडल डीज़ल आयात कम करने, ऊर्जा लागत घटाने और जलवायु लचीलापन बढ़ाने में मददगार हो सकते हैं।

आईएसए के प्रति भारत की प्रतिबद्धता दोहराते हुए मंत्री यादव ने कहा, “ISA एक वैश्विक सोलर परिवार के रूप में उभरा है। अब 124 से अधिक देश अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन का हिस्सा हैं। ISA को एक वैश्विक सौर परिवार के रूप में सोचें—प्रशांत द्वीपों से लेकर अफ्रीका के सवाना तक और दक्षिण अमेरिका के पर्वतों तक।” उन्होंने कहा कि ISA सौर परियोजना डिज़ाइन में तेजी ला रहा है, वित्त जुटा रहा है, स्थानीय रोजगार पैदा कर रहा है, और सौर ऊर्जा को स्वच्छ और विश्वसनीय बिजली का पहला विकल्प बना रहा है।

अपने संबोधन के अंत में मंत्री ने साझा वैश्विक कार्रवाई का आह्वान करते हुए कहा, “सौर ऊर्जा केवल तकनीकी रूप से ही नहीं बल्कि आशा और सशक्तिकरण की किरण बनकर फैल रही है। यह स्वतंत्रता है। यह गरिमा है। यह शांति है।”

अपने वक्तव्यों में छोटे द्वीपीय देशों के प्रतिनिधियों और अन्य प्रतिभागियों ने भारत की नवीकरणीय ऊर्जा, विशेषकर सौर ऊर्जा क्षेत्र में तेज प्रगति की सराहना की। उन्होंने SIDS प्लेटफ़ॉर्म का समर्थन करते हुए कहा कि यह उनके देशों में नवीकरणीय ऊर्जा की क्षमता को खोलने में सहायक होगा। यह भी माना गया कि जलवायु-लचीली प्रणालियाँ केवल जलवायु की ही नहीं बल्कि सामाजिक-आर्थिक प्राथमिकता भी हैं। उम्मीद जताई गई कि यह प्लेटफ़ॉर्म व्यवहार्यता अध्ययन, स्थानीय कार्यबल के कौशल विकास और जलवायु वित्त के जोखिम घटाने के माध्यम से उनके जलवायु लचीलेपन को बढ़ाने में मदद करेगा।


हिमाचल प्रदेश में मौसम पूर्वानुमान और आपदा प्रबंधन अवसंरचना सुदृढ़ करने पर मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू और केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह की बैठक

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हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने आज केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह से मुलाकात की और राज्य में मौसम पूर्वानुमान एवं आपदा तैयारी अवसंरचना को सुदृढ़ करने पर चर्चा की।

बैठक के दौरान मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत सरकार के प्रति आभार व्यक्त किया कि हिमाचल प्रदेश में डॉप्लर वेदर रडार की स्थापना की गई है, जिससे प्रदेश में मौसम पूर्वानुमान और प्रारंभिक चेतावनी की सटीकता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।

हाल के बादल फटने और अचानक आई बाढ़ की घटनाओं के मद्देनज़र, मुख्यमंत्री ने राज्य के सभी जिलों, विशेष रूप से आपदा-प्रवण क्षेत्रों में अतिरिक्त डॉप्लर रडार और स्वचालित मौसम स्टेशन (AWS) स्थापित करने का अनुरोध किया ताकि भविष्य में मौसम से संबंधित चुनौतियों का बेहतर ढंग से सामना किया जा सके।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने मुख्यमंत्री के इस सक्रिय दृष्टिकोण की सराहना की और कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार जलवायु लचीलापन और आपदा न्यूनीकरण के लिए राज्यों के प्रयासों को पूर्ण सहयोग देने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने बताया कि पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय लगातार देश के मौसम विज्ञान नेटवर्क का विस्तार कर रहा है, विशेषकर पहाड़ी और दूरदराज के क्षेत्रों में, ताकि आम जनता और स्थानीय प्रशासन तक समय पर मौसम से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी पहुंच सके।

प्रधानमंत्री मोदी की शासन नीति का उल्लेख करते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि केंद्र सरकार ने 2014 से सहकारी संघवाद की भावना को निरंतर सशक्त किया है और हर राज्य को समान व न्यायसंगत सहयोग प्रदान किया है, चाहे वह किसी भी क्षेत्र या राजनीतिक दल से संबंधित हो। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री का दृष्टिकोण राज्यों की वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमताओं को सुदृढ़ कर उन्हें स्थानीय स्तर पर उभरती चुनौतियों का शीघ्र और प्रभावी ढंग से सामना करने में सक्षम बनाना है।

डॉ. सिंह ने यह भी बताया कि डॉप्लर रडार और AWS जैसे उन्नत मौसम संबंधी उपकरण न केवल आपदा तैयारी में बल्कि कृषि, जलविद्युत और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जो हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। उन्होंने यह आश्वासन दिया कि केंद्र सरकार इन अवसंरचनाओं के विस्तार में पूर्ण सहयोग देगी ताकि संवेदनशील क्षेत्रों को कवर किया जा सके और जन सुरक्षा को सुदृढ़ किया जा सके।

बैठक ने केंद्र और राज्य सरकार के बीच वैज्ञानिक ढांचे को मजबूत करने की साझा प्रतिबद्धता को प्रदर्शित किया, जिससे हिमाचल प्रदेश में विकास जलवायु जोखिमों के प्रति अधिक सुदृढ़ और टिकाऊ बनेगा। दोनों नेताओं ने सहमति व्यक्त की कि भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और राज्य प्राधिकरणों के बीच घनिष्ठ समन्वय हिमाचल प्रदेश की चरम मौसम घटनाओं से निपटने की क्षमता को और बढ़ाएगा।

भू-कालक्रमिकी तकनीकों पर स्कूल 2025 का उद्घाटन: युवा शोधकर्ताओं के लिए प्रशिक्षण और ज्ञान संवर्धन

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भू-कालक्रमिकी तकनीकों पर स्कूल – 2025 का MoES सचिव डॉ. एम. रवीचंद्रन द्वारा उद्घाटन

आज पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (MoES) के सचिव डॉ. एम. रवीचंद्रन ने भू-कालक्रमिकी तकनीकों पर स्कूल – 2025 का उद्घाटन किया। अपने उद्घाटन भाषण में, डॉ. रवीचंद्रन ने प्रशिक्षण स्कूल में भाग ले रहे युवा शोधकर्ताओं से आग्रह किया कि वे नमूना तैयारी और आधुनिक उपकरणों में अपनी तकनीकी क्षमताओं को मजबूत करें, साथ ही केवल डेटा उत्पादन तक सीमित न रहकर वैज्ञानिक निष्कर्षों और अर्थपूर्ण व्याख्याओं की ओर ध्यान दें। उन्होंने जोर दिया कि भारत में पृथ्वी विज्ञान का भविष्य राष्ट्रीय विकासात्मक लक्ष्यों के अनुरूप होना चाहिए, जिसमें विकसित भारत 2047 की दृष्टि भी शामिल है। इस संदर्भ में, उन्होंने स्वदेशी सुविधाओं, विधियों और डेटा सेट्स के उपयोग के माध्यम से आत्मनिर्भरता बढ़ाने का आह्वान किया, साथ ही सहयोग और सहकर्मी शिक्षण के जरिए राष्ट्रीय ज्ञान आधार का विस्तार करने की आवश्यकता पर बल दिया।

डॉ. रवीचंद्रन ने प्रशिक्षण स्कूलों के गुणन प्रभाव (multiplier effect) पर भी जोर दिया और कहा कि युवा शोधकर्ताओं को शिक्षक की भूमिका निभानी चाहिए और अपने संस्थानों में अपनी सीख साझा करनी चाहिए, जिससे राष्ट्रीय ज्ञान आधार मजबूत हो। उन्होंने आश्वस्त किया कि पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय भू-कालक्रमिकी और संबंधित क्षेत्रों को आगे बढ़ाने वाले पहलों का समर्थन करता रहेगा, और भारत को वैश्विक पृथ्वी विज्ञान अनुसंधान में प्रमुख योगदानकर्ता के रूप में स्थापित करेगा।

उन्होंने रेखांकित किया कि भू-कालक्रमिकी पृथ्वी के इतिहास को समझने, प्राकृतिक संसाधनों का मानचित्रण करने और पर्यावरणीय चुनौतियों, जैसे जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं का सामना करने के लिए एक महत्वपूर्ण विषय बन गई है।

डॉ. रवीचंद्रन ने अंटार्कटिका पर किए गए अध्ययनों का उल्लेख करते हुए भू-कालक्रमिकी की केंद्रीय भूमिका को उजागर किया। उन्होंने कहा कि ऐसे अध्ययन वैज्ञानिकों को दीर्घकालीन भूवैज्ञानिक परिवर्तनों को वर्तमान चुनौतियों जैसे प्राकृतिक आपदाओं, संसाधन प्रबंधन और जलवायु लचीलापन से जोड़ने में सक्षम बनाते हैं।

कार्यक्रम में बोलते हुए डॉ. एन. खरे, सलाहकार एवं कार्यक्रम प्रमुख, SAGE, MoES, ने IUC की विशेष भूमिका की सराहना की। उन्होंने बताया कि IUC न केवल उन्नत विश्लेषणात्मक सुविधाएँ प्रदान करता है बल्कि युवा शोधकर्ताओं को हाथों-हाथ प्रशिक्षण भी देता है। उन्होंने याद दिलाया कि मंत्रालय की दृष्टि, जो पहले पंचवर्षीय योजना काल से चली आ रही थी, भू-प्रौद्योगिकी और भू-कालक्रमिकी में राष्ट्रीय सुविधाओं की स्थापना थी, और IUC की देखरेख में यह क्षेत्र फल-फूल रहा है। डॉ. खरे ने उल्लेख किया कि अब तक 9,000 से अधिक नमूनों का AMS डेटिंग और अन्य उपकरणों द्वारा विश्लेषण किया जा चुका है, और यह सुविधा पृथ्वी की गतिशीलता, महाद्वीपीय विकास और भू-विज्ञान के अनुप्रयुक्त पहलुओं को समझने में आधारशिला बन गई है।

सचिव ने समानता, न्याय, विविधता और समावेशिता के महत्व पर भी जोर दिया और कहा कि ये मूल्य यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं कि भू-विज्ञान अनुसंधान के लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुँचें। उन्होंने युवा प्रतिभागियों को IUAC और पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय से संपर्क बनाए रखने और अपने अकादमिक एवं पेशेवर प्रयासों में निरंतर समर्थन प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया।

उद्घाटन सत्र में प्रो. ए.सी. पांडेय, निदेशक, IUAC; डॉ. पंकज कुमार, IUAC; और चैत्य असवाल, IUAC ने भी संबोधन दिया। देशभर से फैकल्टी, वैज्ञानिक और युवा शोधकर्ता इस सप्ताह भर चलने वाले प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग ले रहे हैं।


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