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राष्ट्रीय समुद्री खाद्य निर्यात कार्यशाला में भारत को वैश्विक सीफूड निर्यात महाशक्ति बनाने पर जोर

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विशाखापत्तनम- मत्स्य पालन विभाग, मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय ने वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय तथा आंध्र प्रदेश सरकार के सहयोग से 5 और 6 जून 2026 को आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में राष्ट्रीय समुद्री खाद्य (सीफूड) निर्यात कार्यशाला का आयोजन किया। कार्यशाला में केंद्र और राज्यों के वरिष्ठ अधिकारियों, निर्यातकों, उद्योग प्रतिनिधियों, स्टार्टअप्स तथा विभिन्न संस्थानों ने भाग लेकर भारत के समुद्री खाद्य निर्यात को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने की रणनीतियों पर विचार-विमर्श किया।

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री नारा चंद्रबाबू नायडू, केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल, केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्री राजीव रंजन सिंह, केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री किन्जारापु राममोहन नायडू तथा केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री चिराग पासवान ने कार्यशाला में भाग लिया

गुणवत्ता और वैल्यू एडिशन पर विशेष जोर

कार्यशाला में इस बात पर बल दिया गया कि भारत को केवल मात्रा आधारित निर्यातक नहीं, बल्कि उच्च गुणवत्ता और मूल्य संवर्धित समुद्री उत्पादों के वैश्विक आपूर्तिकर्ता के रूप में स्थापित किया जाए। विशेषज्ञों ने नवाचार, आधुनिक तकनीक, ट्रेसबिलिटी सिस्टम और गुणवत्ता प्रमाणन को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई ताकि भारतीय सीफूड उत्पादों की वैश्विक पहचान और मजबूत हो सके।

₹1 लाख करोड़ से अधिक निर्यात का लक्ष्य

कार्यशाला के दौरान सरकार ने समुद्री खाद्य निर्यात को ₹1 लाख करोड़ से अधिक तक पहुंचाने के लक्ष्य को रेखांकित किया। इसके लिए कोल्ड चेन, एयर कार्गो, क्वारंटीन सुविधाओं और प्रोसेसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता बताई गई।

अंतर्देशीय मत्स्य पालन में अपार संभावनाएं

विशेषज्ञों ने कहा कि देश के कुल मत्स्य उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले अंतर्देशीय मत्स्य क्षेत्र में निर्यात की अपार संभावनाएं हैं। पिंजरा मत्स्य पालन, जलाशय आधारित एक्वाकल्चर, मोती उत्पादन, समुद्री शैवाल (सीवीड) खेती और सजावटी मत्स्य पालन जैसे क्षेत्रों को बढ़ावा देकर किसानों और मत्स्य पालकों की आय बढ़ाई जा सकती है।

स्टार्टअप और एमएसएमई बनेंगे विकास के नए इंजन

कार्यशाला में स्टार्टअप्स और एमएसएमई की भूमिका पर विशेष चर्चा हुई। प्रतिभागियों ने माना कि नवाचार, मूल्य संवर्धन, ब्रांडिंग और नई तकनीकों के उपयोग से भारतीय समुद्री खाद्य उत्पादों की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाई जा सकती है। साथ ही, रोजगार सृजन और निर्यात विविधीकरण में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होगी।

चुनौतियों पर भी हुई चर्चा

हितधारकों ने रोग प्रबंधन, बढ़ती उत्पादन लागत, गुणवत्तापूर्ण बीजों की उपलब्धता, कोल्ड चेन की कमी, क्वारंटीन सुविधाओं की सीमाएं, कड़े अंतरराष्ट्रीय मानक और ट्रेसबिलिटी जैसी चुनौतियों को रेखांकित किया। इन समस्याओं के समाधान के लिए समन्वित नीति और निवेश बढ़ाने पर जोर दिया गया।

सामूहिक प्रयासों से बनेगा मजबूत निर्यात तंत्र

कार्यशाला का समापन केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, उद्योग जगत, अनुसंधान संस्थानों और उद्यमियों की साझा प्रतिबद्धता के साथ हुआ। सभी पक्षों ने सतत उत्पादन, गुणवत्ता, प्रमाणन, बुनियादी ढांचे के विकास और बाजार विविधीकरण के माध्यम से भारत को विश्वसनीय और प्रतिस्पर्धी सीफूड निर्यातक राष्ट्र बनाने का संकल्प दोहराया।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस कार्यशाला से प्राप्त सुझाव भविष्य की नीतियों और योजनाओं को दिशा देंगे तथा भारत को वैश्विक समुद्री खाद्य बाजार में और मजबूत स्थान दिलाने में मदद करेंगे।


केंद्रीय सचिव अभिलक्ष लिखी ने रायगढ़ में अलंकरणीय मत्स्य ब्रूड बैंक का दौरा किया

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अभिलक्ष लिखी, सचिव, मत्स्य पालन विभाग, मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय, भारत सरकार ने महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मंगरूल गांव में स्थापित अलंकरणीय मत्स्य ब्रूड बैंक का दौरा किया। यह ब्रूड बैंक यशोधरा संजय खंडागले द्वारा प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के तहत स्थापित किया गया है। दौरे के बाद केंद्रीय सचिव ने पीएमएमएसवाई के लाभार्थियों से संवाद कर जमीनी स्तर पर मौजूद चुनौतियों और कमियों की जानकारी ली।

केंद्रीय सचिव द्वारा दौरा किया गया यह ब्रूड बैंक भारत में अपनी तरह की पहली पहल है, जहां 25 से अधिक प्रजातियों की अलंकरणीय मछलियों का संरक्षण और प्रजनन किया जाता है। यशोधरा संजय खंडागले ने अपने ब्रांड “Sam Discus” को देश में उच्च गुणवत्ता वाली डिस्कस मछलियों के प्रमुख उत्पादकों में स्थापित किया है। इस ब्रूड बैंक ने 20 प्रजातियों की लगभग 7.7 लाख अलंकरणीय मछलियों का उत्पादन किया है, जिससे लगभग 1.93 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ तथा 25–30 लोगों के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर सृजित हुए हैं।

700 से अधिक टैंकों से सुसज्जित यह केंद्र कौशल विकास, रोजगार सृजन और सर्वोत्तम प्रक्रियाओं को अपनाने में भी सहयोग करता है तथा अलंकरणीय मत्स्य क्षेत्र के निर्यात को बढ़ावा देता है। यह ब्रूड बैंक नियामकीय मानकों का पालन करता है और GAIS तथा NFDP जैसी सरकारी योजनाओं के अंतर्गत कवर है। यहां से अलंकरणीय मछलियों का निर्यात अमेरिका, इटली, फ्रांस, मॉरीशस, दक्षिण कोरिया, कतर, कुवैत, मलेशिया, चीन, उज्बेकिस्तान, नाइजीरिया और इज़राइल सहित कई देशों में किया जाता है। यह मत्स्य क्षेत्र में नवाचार, सतत विकास और वृद्धि को बढ़ावा देने में सरकारी सहायता के प्रभावी उपयोग को दर्शाता है।

भारत में लगभग 700 स्वदेशी मीठे पानी की तथा 300 से अधिक समुद्री प्रजातियां उपलब्ध हैं, जो विशाल संसाधन क्षमता को दर्शाती हैं। भारत से अलंकरणीय मत्स्य निर्यात का अनुमान लगभग 41 करोड़ रुपये है, जो इस क्षेत्र के बढ़ते आर्थिक योगदान को दर्शाता है। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत अलंकरणीय मत्स्य पालन भारत में एक उच्च संभावनाओं वाले क्षेत्र के रूप में उभर रहा है, जिसे समृद्ध जैव विविधता तथा घरेलू और वैश्विक मांग का समर्थन प्राप्त है।

पीएमएमएसवाई के अंतर्गत अब तक 1,986 बैकयार्ड अलंकरणीय मछली पालन इकाइयों, 6,018 फिश कियोस्क एवं एक्वेरियम, तथा 117 खुदरा बाजारों को सहायता प्रदान की गई है, जिनमें विशेष अलंकरणीय मछली एवं एक्वेरियम बाजार भी शामिल हैं। इसके अतिरिक्त पांच मीठे पानी के अलंकरणीय मछली ब्रूड बैंक और 199 एकीकृत अलंकरणीय मछली इकाइयां स्थापित की गई हैं, जिससे उत्पादन, विपणन और आजीविका के अवसरों को मजबूती मिली है।

भारत सरकार के मत्स्य पालन विभाग ने देशभर में 34 मत्स्य उत्पादन एवं प्रसंस्करण क्लस्टरों को अधिसूचित किया है, जिनमें तमिलनाडु के मदुरै में अलंकरणीय मत्स्य क्लस्टर भी शामिल है।

महाराष्ट्र का मत्स्य क्षेत्र समुद्री और अंतर्देशीय दोनों संसाधनों के कारण मजबूत स्थिति में है। राज्य की 877.97 किलोमीटर लंबी तटरेखा, 173 मत्स्य अवतरण केंद्र और 526 मत्स्य गांव 15 लाख से अधिक मत्स्यजीवियों को आजीविका प्रदान करते हैं। वर्ष 2022–23 में राज्य में लगभग 5.9 लाख टन मछली उत्पादन हुआ। अंतर्देशीय मत्स्य पालन 4.10 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में फैला है, जिसमें जलाशय, नदियां, तालाब और खारे पानी के क्षेत्र शामिल हैं। ब्लू रिवोल्यूशन और पीएमएमएसवाई जैसी योजनाओं के माध्यम से महाराष्ट्र ने मत्स्य पालन, हैचरी, केज कल्चर, बुनियादी ढांचे और मत्स्यजीवियों के कल्याण में उल्लेखनीय प्रगति की है।

यह दौरा अलंकरणीय मत्स्य क्षेत्र को और अधिक सशक्त एवं प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा, क्योंकि इससे जमीनी स्तर का आकलन, हितधारकों की भागीदारी और लक्षित नीतिगत सहायता को बढ़ावा मिलेगा।

थाईलैंड में लघु-स्तरीय मत्स्य सम्मेलन में भारत की सक्रिय भागीदारी, डॉ. अभिलक्ष लिखी ने रखा पक्ष

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डॉ. अभिलक्ष लिखी सचिव, मत्स्य विभाग, भारत सरकार, ने 27 से 30 अप्रैल 2026 तक हुआ हिन में आयोजित 5वें विश्व लघु-स्तरीय मत्स्य कांग्रेस में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया। इस सम्मेलन का आयोजन Food and Agriculture Organization (FAO) और TBTI ग्लोबल द्वारा किया गया। सम्मेलन का विषय “न्यायपूर्ण समन्वय, युवा भविष्य और पुनर्योजी ज्ञान के लिए लघु-स्तरीय मत्स्य” रहा।

अपने संबोधन में डॉ. अभिलक्ष लिखी ने कहा कि लघु-स्तरीय मत्स्य और जलीय कृषि सामाजिक-आर्थिक विकास, खाद्य एवं पोषण सुरक्षा तथा पर्यावरणीय संतुलन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने बताया कि भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक देश है, जहां 19.7 मिलियन टन का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ है। साथ ही, आधुनिक तकनीक और निवेश के कारण समुद्री उत्पादों के निर्यात में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

उन्होंने सतत और ट्रेसएबल मत्स्य पालन, डिजिटल परिवर्तन तथा सामुदायिक भागीदारी आधारित दृष्टिकोण पर जोर दिया। साथ ही बंगाल की खाड़ी कार्यक्रम अंतर-सरकारी संगठन (BOBP-IGO) के माध्यम से क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करने की बात कही, जिसमें भारत वर्तमान में अध्यक्ष है।

डॉ. लिखी ने FAO द्वारा आयोजित एक पैनल चर्चा में भी भाग लिया, जिसमें राष्ट्रीय कार्ययोजना (NPOA-SSF) के माध्यम से लघु-स्तरीय मत्स्य क्षेत्र को सशक्त बनाने पर विचार-विमर्श हुआ। उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र खाद्य सुरक्षा, आजीविका, सांस्कृतिक पहचान और तटीय अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

चर्चा में यह बात सामने आई कि लघु-स्तरीय मछुआरों की संस्थागत और तकनीकी क्षमता बढ़ाना, वित्त और बुनियादी ढांचे तक पहुंच सुनिश्चित करना तथा नीति निर्माण में उनकी भागीदारी बढ़ाना जरूरी है। साथ ही, सतत और समावेशी मत्स्य प्रबंधन के लिए सामुदायिक आधारित और पारिस्थितिकी तंत्र आधारित दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया गया।

वैश्विक स्तर पर लघु-स्तरीय मत्स्य क्षेत्र लगभग 90% मछुआरों को रोजगार देता है और कुल मछली उत्पादन का लगभग 40% योगदान करता है। एशिया में यह क्षेत्र करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार है, लेकिन इसे जलवायु परिवर्तन, संसाधनों की कमी और औद्योगिक मत्स्य से प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

भारत में लगभग 40 लाख समुद्री मछुआरे इस क्षेत्र से जुड़े हैं, जो मुख्यतः 12 समुद्री मील के भीतर कार्य करते हैं। सरकार द्वारा Pradhan Mantri Matsya Sampada Yojana (PMMSY) जैसी योजनाओं के माध्यम से इस क्षेत्र को सशक्त बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं।

भारत सरकार ने 2015 से अब तक मत्स्य और जलीय कृषि क्षेत्र के विकास के लिए लगभग 39,272 करोड़ रुपये के निवेश को मंजूरी दी है। इन पहलों का उद्देश्य मछुआरों की आय बढ़ाना, संसाधनों का सतत उपयोग सुनिश्चित करना और देश की खाद्य सुरक्षा को मजबूत करना है।

यह सम्मेलन लघु-स्तरीय मत्स्य क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने और सतत विकास लक्ष्यों की दिशा में आगे बढ़ाने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच साबित हो रहा है।

PMMSY के तहत सिरसा में खारे पानी की झींगा पालन क्लस्टर की समीक्षा, किसानों की आय बढ़ाने पर जोर

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सिरसा (हरियाणा)- भारत सरकार के मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय के तहत मत्स्य पालन विभाग के सचिव डॉ. अभिलक्ष लिखी ने आज हरियाणा के सिरसा जिले का दौरा कर प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के अंतर्गत विकसित खारे पानी (Saline Water) एक्वाकल्चर क्लस्टर की प्रगति की समीक्षा की। इस दौरान उन्होंने झींगा (श्रिम्प) और मछली किसानों से संवाद कर जमीनी स्तर पर आने वाली समस्याओं और चुनौतियों को समझा।

डॉ. लिखी ने किसानों को संबोधित करते हुए तकनीक आधारित झींगा पालन, वैज्ञानिक तालाब प्रबंधन और मजबूत बायो-सिक्योरिटी उपायों को अपनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सिरसा जैसे खारे पानी वाले क्षेत्र झींगा पालन के लिए बेहद उपयुक्त हैं और इससे किसानों की आय में विविधता, रोजगार सृजन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सकती है। उन्होंने MPEDA को किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन देने और निर्यात से जोड़ने के निर्देश भी दिए। साथ ही, स्थानीय स्तर पर परीक्षण किट की उपलब्धता सुनिश्चित करने पर बल दिया गया ताकि किसानों को दूर नहीं जाना पड़े।

चौधरी देवी लाल विश्वविद्यालय (CDLU) में आयोजित एक समीक्षा बैठक में PMMSY के तहत क्लस्टर आधारित मत्स्य विकास योजनाओं की प्रगति पर चर्चा की गई। इस बैठक में केंद्र और राज्य सरकार के अधिकारी, ICAR के वैज्ञानिक, NABARD, NFDB, MPEDA, मत्स्य किसान, सहकारी संस्थाएं और देशभर के प्रतिनिधि शामिल हुए। 500 से अधिक प्रतिभागियों ने बैठक में हिस्सा लिया। किसानों ने इस दौरान बिजली की ऊंची लागत, गुणवत्तापूर्ण बीज की कमी और पानी की उपलब्धता जैसी समस्याएं उठाईं और पंचायत भूमि को स्वयं सहायता समूहों को लीज पर देने की मांग की।

डॉ. लिखी ने सिरसा के रघुआना गांव में PMMSY के तहत विकसित एक सफल झींगा फार्म का भी दौरा किया। करीब 3 हेक्टेयर में फैले 7 तालाबों वाले इस फार्म से सालाना 28 टन उत्पादन हो रहा है, जिससे लगभग ₹90 लाख का कारोबार और स्थानीय रोजगार सृजन हो रहा है। उन्होंने कहा कि झींगा पालन के विस्तार के लिए बेहतर बीज, फीड, बुनियादी ढांचा और बाजार तक पहुंच को मजबूत करना जरूरी है।

हरियाणा ने PMMSY के तहत उल्लेखनीय प्रगति की है, जहां ₹760.88 करोड़ का निवेश आकर्षित हुआ है। राज्य में 456 RAS और बायोफ्लॉक सिस्टम स्थापित किए गए हैं, जबकि 3,766 हेक्टेयर तालाब और 2,204 हेक्टेयर खारे क्षेत्र में विकास कार्य किए जा रहे हैं। इसके अलावा, सिरसा में ₹110 करोड़ का एकीकृत एक्वापार्क स्थापित किया जा रहा है और कोल्ड-चेन इंफ्रास्ट्रक्चर भी विकसित किया जा रहा है।

भारत का झींगा निर्यात समुद्री उत्पादों का प्रमुख हिस्सा है, जो कुल निर्यात का लगभग 69% है। देश का समुद्री निर्यात पिछले दशक में दोगुना होकर ₹62,408 करोड़ तक पहुंच गया है, जिसमें झींगा का योगदान ₹43,334 करोड़ है।

देश में 34 मत्स्य क्लस्टर विकसित किए जा रहे हैं, जिनमें सिरसा का खारा पानी क्लस्टर एक प्रमुख उदाहरण है। यह क्लस्टर झींगा, स्कैम्पी और सीबास जैसी उच्च मूल्य वाली प्रजातियों के जरिए किसानों की आय बढ़ाने, रोजगार सृजन और संसाधनों के बेहतर उपयोग को बढ़ावा दे रहा है।

भारत का अंतर्देशीय मत्स्य क्षेत्र तेजी से बढ़ रहा है, जो कुल उत्पादन का 75% योगदान देता है। 2013-14 से 2024-25 के बीच उत्पादन 61 लाख टन से बढ़कर 153 लाख टन हो गया है। देश के विशाल जल संसाधनों को देखते हुए मत्स्य पालन क्षेत्र में विकास की अपार संभावनाएं हैं, जिसे सरकार प्राथमिकता दे रही है।

निष्कर्ष: सिरसा का यह मॉडल दर्शाता है कि सही नीति, तकनीक और सहयोग के जरिए खारे और अनुपयोगी क्षेत्रों को भी आय और रोजगार के मजबूत स्रोत में बदला जा सकता है।

भारत के मत्स्य क्षेत्र को मिला अब तक का सबसे बड़ा बजट, उत्पादन में 106% की ऐतिहासिक बढ़ोतरी

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नई दिल्ली- केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2026–27 के लिए मत्स्य क्षेत्र को ₹2,761.80 करोड़ का अब तक का सबसे बड़ा बजट आवंटित किया है। यह कदम देश की ब्लू इकॉनमी को मजबूत करने और करोड़ों मछुआरों की आय बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा प्रयास माना जा रहा है।

सरकार की प्रमुख योजना प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) इस क्षेत्र के विकास की मुख्य धुरी बनी हुई है, जिसके लिए इस वर्ष ₹2,500 करोड़ का प्रावधान किया गया है। इस योजना के माध्यम से उत्पादन बढ़ाने, आधुनिक तकनीक अपनाने और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है।

उत्पादन और निर्यात में बड़ी छलांग

पिछले एक दशक में भारत के मत्स्य क्षेत्र ने उल्लेखनीय प्रगति की है।
वित्त वर्ष 2013-14 में जहां मछली उत्पादन 95.79 लाख टन था, वहीं 2024-25 में यह बढ़कर 197.75 लाख टन हो गया है, जो 106% की वृद्धि दर्शाता है।

इसके साथ ही समुद्री उत्पादों का निर्यात भी बढ़कर ₹62,408 करोड़ तक पहुंच गया है, जिसमें जमे हुए झींगे (Frozen Shrimp) का बड़ा योगदान है।

मछुआरों को मिल रहा सीधा लाभ

सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे मछुआरों तक पहुंच रहा है:

  • 4.39 लाख मछुआरों को किसान क्रेडिट कार्ड (KCC)

  • 33 लाख लोगों को बीमा सुरक्षा

  • 7.44 लाख परिवारों को आजीविका सहायता

इन पहलों से मछुआरों की आय स्थिर हुई है और जोखिम कम हुआ है।

इंफ्रास्ट्रक्चर और तकनीक पर जोर

सरकार ने मत्स्य क्षेत्र को आधुनिक बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं:

  • कोल्ड स्टोरेज, फिश मार्केट और प्रोसेसिंग यूनिट का विकास

  • RAS और Biofloc जैसी नई तकनीकों को बढ़ावा

  • 2,195 फिशर प्रोड्यूसर संगठन (FFPOs) का गठन

इसके अलावा, FIDF योजना के तहत 225 परियोजनाओं में ₹6,685 करोड़ का निवेश किया गया है, जिससे रोजगार और उत्पादन दोनों बढ़े हैं।

 डिजिटल इंडिया से जुड़ा मत्स्य क्षेत्र

सरकार ने नेशनल फिशरीज डिजिटल प्लेटफॉर्म (NFDP) लॉन्च किया है, जिसमें अब तक 30 लाख से अधिक लोग जुड़ चुके हैं। यह प्लेटफॉर्म मछुआरों को:

  • लोन

  • बीमा

  • बाजार से जुड़ाव

जैसी सुविधाएं एक ही जगह पर उपलब्ध कराता है।

सतत विकास और भविष्य की दिशा

सरकार ने 2025 में समुद्री मत्स्य संसाधनों के संरक्षण के लिए नए नियम लागू किए हैं, जिससे पर्यावरण संतुलन बनाए रखते हुए उत्पादन बढ़ाया जा सके।

भारत, जो पहले से ही दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक देश है, अब वैश्विक बाजार में अपनी स्थिति और मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

निष्कर्ष

मत्स्य क्षेत्र में बढ़ता निवेश, नई तकनीक, और डिजिटल पहलें भारत को एक मजबूत और टिकाऊ ब्लू इकॉनमी की ओर ले जा रही हैं। यह क्षेत्र न केवल देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देगा, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार भी बनेगा।

भारत के सीफूड निर्यात में 11 वर्षों में दोगुनी बढ़ोतरी, झींगा निर्यात बना प्रमुख आधार

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भारत के समुद्री उत्पाद (सीफूड) निर्यात में पिछले 11 वर्षों में मजबूत और निरंतर वृद्धि दर्ज की गई है। इस दौरान निर्यात में औसतन 7% की वार्षिक वृद्धि हुई है। वर्ष 2013-14 में ₹30,213 करोड़ के मुकाबले 2024-25 में यह बढ़कर ₹62,408 करोड़ हो गया है, जिसमें प्रमुख योगदान झींगा (श्रिम्प) निर्यात का रहा, जिसकी कीमत ₹43,334 करोड़ रही।

भारत का सीफूड निर्यात काफी विविध है, जिसमें 350 से अधिक उत्पादों की किस्में शामिल हैं और ये लगभग 130 देशों में भेजे जाते हैं। 2024-25 में कुल निर्यात मूल्य का 36.42% हिस्सा अमेरिका को गया, जो सबसे बड़ा बाजार बना हुआ है। इसके बाद चीन, यूरोपीय संघ, दक्षिण-पूर्व एशिया, जापान और मध्य-पूर्व प्रमुख गंतव्य हैं।

निर्यात में फ्रोजन श्रिम्प का दबदबा बना हुआ है, इसके बाद फ्रोजन मछली, स्क्विड, सूखे उत्पाद, कटलफिश, सुरिमी आधारित उत्पाद और जीवित व चिल्ड सीफूड का स्थान है। साथ ही, वैल्यू-एडेड उत्पादों की हिस्सेदारी 2.5% से बढ़कर 11% हो गई है, जिसकी निर्यात कीमत 742 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गई है।

सरकार सीफूड निर्यात में विविधता लाने और वैश्विक बाजार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के तहत मछली उत्पादन, ब्रैकिश वाटर एक्वाकल्चर का विस्तार, नई तकनीकों को अपनाने, रोग प्रबंधन और ट्रेसबिलिटी सिस्टम को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है। इसके साथ ही कोल्ड-चेन नेटवर्क, आधुनिक मछली बंदरगाह और फिश लैंडिंग सेंटर विकसित किए जा रहे हैं।

उच्च मूल्य वाली प्रजातियों जैसे टूना, सीबास, कोबिया, पोम्पानो, मड क्रैब, GIFT तिलापिया, ग्रूपर और टाइगर श्रिम्प के उत्पादन को भी बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे भारत के निर्यात उत्पादों का दायरा और बढ़ सके।

अंतरराष्ट्रीय मानकों और नियमों के अनुरूप बनने के लिए भारत ने कई कदम उठाए हैं। अमेरिका के मरीन मैमल प्रोटेक्शन एक्ट (MMPA) के तहत आवश्यक शर्तों को पूरा करते हुए भारत को 2025 में मंजूरी मिली, जिससे अमेरिकी बाजार में निर्यात जारी रहेगा। साथ ही, टर्टल एक्सक्लूडर डिवाइस (TEDs) के उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है।

व्यवसाय को आसान बनाने के लिए सैनिटरी इम्पोर्ट परमिट (SIP) प्रणाली को डिजिटल कर दिया गया है, जिससे मंजूरी का समय 30 दिनों से घटकर 72 घंटे रह गया है। कुछ उत्पादों के लिए SIP की आवश्यकता भी समाप्त कर दी गई है, जिससे व्यापार को बढ़ावा मिला है।

आने वाले पांच वर्षों में सरकार का लक्ष्य उच्च मूल्य वाले उत्पादों का निर्यात बढ़ाना, नए बाजारों तक पहुंच बनाना और गुणवत्ता मानकों को मजबूत करना है। यूके, यूरोपीय संघ, आसियान और पश्चिम एशिया जैसे बाजारों में विस्तार पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

इन प्रयासों के साथ भारत वैश्विक स्तर पर एक भरोसेमंद और प्रीमियम सीफूड निर्यातक के रूप में अपनी पहचान मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

समुद्री खाद्य निर्यात को बढ़ावा देने के लिए 21 जनवरी को नई दिल्ली में राजदूतों एवं उच्चायुक्तों के साथ राउंड टेबल सम्मेलन

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नई दिल्ली- मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय के अंतर्गत मत्स्य विभाग 21 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में “समुद्री खाद्य निर्यात संवर्धन पर राजदूतों एवं उच्चायुक्तों के साथ राउंड टेबल सम्मेलन” का आयोजन कर रहा है। इस सम्मेलन का उद्देश्य द्विपक्षीय व्यापार को सुदृढ़ करना तथा अंतरराष्ट्रीय बाजार संपर्कों को मजबूत करना है।

सम्मेलन की अध्यक्षता केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह, मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय तथा पंचायती राज मंत्रालय करेंगे। यह कार्यक्रम मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय तथा अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के राज्य मंत्री जॉर्ज कुरियन और मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय तथा पंचायती राज मंत्रालय के राज्य मंत्री प्रो. एस. पी. सिंह बघेल की गरिमामयी उपस्थिति में आयोजित होगा।

भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा एक्वाकल्चर उत्पादक देश है और मछली तथा जलीय खाद्य उत्पादों के प्रमुख वैश्विक उत्पादकों में शामिल है। बीते वर्षों में यह क्षेत्र आजीविका आधारित गतिविधि से आगे बढ़कर एक मजबूत, निर्यातोन्मुख पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में विकसित हुआ है, जिसमें पालन, चारा, प्रसंस्करण, कोल्ड चेन, लॉजिस्टिक्स और मूल्य संवर्धन शामिल हैं। साथ ही यह क्षेत्र लाखों छोटे, सीमांत और पारंपरिक मछुआरों एवं किसानों की आजीविका का भी आधार बना हुआ है। लक्षित योजनाओं और नीतिगत समर्थन के बल पर भारत आज मछली एवं मत्स्य उत्पादों का छठा सबसे बड़ा निर्यातक देश है। वर्ष 2024–25 में भारत का समुद्री खाद्य निर्यात 16.98 लाख मीट्रिक टन रहा, जिसका मूल्य ₹62,408 करोड़ (7.45 अरब अमेरिकी डॉलर) रहा, जो देश के कुल कृषि निर्यात का लगभग 18 प्रतिशत है।

इस राउंड टेबल सम्मेलन में एशिया, अफ्रीका, यूरोप, उत्तरी अमेरिका, ओशिनिया तथा लैटिन अमेरिका एवं कैरेबियाई क्षेत्र के 83 साझेदार देशों के राजदूत और उच्चायुक्त भाग लेंगे। इसके अलावा विदेश मंत्रालय, मत्स्य विभाग, समुद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एमपीईडीए), निर्यात निरीक्षण परिषद (ईआईसी), वाणिज्य विभाग, विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी), खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय तथा एफएओ, एएफडी, जीआईजेड, बे ऑफ बंगाल प्रोग्राम (बीओबीपी), एडीबी और आईएफएडी जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के वरिष्ठ अधिकारी भी सम्मेलन में शामिल होंगे। यह सम्मेलन समुद्री खाद्य व्यापार, बाजार पहुंच, नियामक सहयोग और द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय साझेदारियों को सुदृढ़ करने के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक एवं तकनीकी मंच प्रदान करेगा।

सम्मेलन में सतत, ट्रेस करने योग्य और मूल्यवर्धित समुद्री खाद्य व्यापार को बढ़ावा देने, निवेश, संयुक्त उपक्रम, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और क्षमता निर्माण के अवसरों की पहचान पर चर्चा की जाएगी। साथ ही जलवायु और बाजार जोखिमों के प्रति समुद्री खाद्य मूल्य श्रृंखला की मजबूती पर भी विचार-विमर्श होगा। प्रमुख विषयों में वैश्विक समुद्री खाद्य व्यापार के रुझान, मानक एवं प्रमाणन, ट्रेसबिलिटी और डिजिटल रिपोर्टिंग, सतत एवं जिम्मेदार स्रोत, मूल्य संवर्धन एवं उत्पाद नवाचार, कोल्ड चेन अवसंरचना, लॉजिस्टिक्स, वित्तपोषण, निजी क्षेत्र की भागीदारी तथा मत्स्य और एक्वाकल्चर में डिजिटल एवं तकनीकी परिवर्तन शामिल हैं।

विचार-विमर्श के दौरान उच्च गुणवत्ता, प्रमाणित और सतत रूप से प्राप्त समुद्री खाद्य उत्पादों की बढ़ती वैश्विक मांग, उत्तरी अमेरिका, यूरोप और पूर्वी एशिया में एक्वाकल्चर आधारित प्रोटीन की बढ़ती खपत तथा रेडी-टू-कुक, रेडी-टू-ईट और न्यूट्रास्यूटिकल-ग्रेड समुद्री उत्पादों जैसे प्रीमियम वर्गों के विस्तार पर भी प्रकाश डाला जाएगा। ये रुझान भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप अनुपालन, मूल्यवर्धित प्रसंस्करण और प्रजातियों के विविधीकरण के माध्यम से वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के महत्वपूर्ण अवसर प्रस्तुत करते हैं।

सम्मेलन से प्राप्त निष्कर्षों से खाद्य सुरक्षा को सुदृढ़ करने, मत्स्य क्षेत्र से जुड़े लोगों की आजीविका में सुधार लाने तथा सतत, लचीले और समावेशी विकास के साझा लक्ष्यों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान मिलने की अपेक्षा है।

प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY): कौशल विकास और क्षमता निर्माण से मत्स्य क्षेत्र को नई दिशा

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प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) मत्स्य पालन मूल्य श्रृंखला के आधुनिकीकरण, उत्पादकता बढ़ाने, कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने तथा विपणन संपर्कों की स्थापना के लिए कौशल विकास और क्षमता निर्माण को एक महत्वपूर्ण आधार मानती है। इस योजना का उद्देश्य मानव संसाधन और संस्थागत क्षमता को सुदृढ़ कर मत्स्य एवं जलीय कृषि क्षेत्र को सशक्त बनाना है।

PMMSY के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने और मत्स्य एवं जलीय कृषि क्षेत्र में विकसित भारत 2047 के विज़न के अनुरूप, केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी तथा पंचायती राज मंत्री राजीव रंजन सिंह (ललन सिंह) ने राष्ट्रीय मत्स्य कृषक दिवस (10 जुलाई 2025) के अवसर पर भुवनेश्वर (ओडिशा) स्थित ICAR–केंद्रीय मीठाजल जलीय कृषि संस्थान (CIFA) में“ICAR मत्स्य संस्थानों एवं उनके क्षेत्रीय केंद्रों का प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण कार्यक्रम कैलेंडर” तथा “NFDB एवं ICAR द्वारा प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण एवं एक्सपोज़र विज़िट कैलेंडर” का विमोचन किया।

यह कैलेंडर 2025–2027 की अवधि के लिए प्रशिक्षण, एक्सपोज़र विज़िट और ज्ञान-साझाकरण गतिविधियों का एक सुव्यवस्थित रोडमैप प्रदान करता है।

व्यापक कवरेज और प्रशिक्षण पाठ्यक्रम

इन कार्यक्रमों का उद्देश्य मछुआरों और मत्स्य किसानों को तकनीकी रूप से सशक्त बनाना, वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना तथा पर्यावरण-सम्मत कार्यप्रणालियों को बढ़ावा देना है।
तेजी से विकसित हो रही जलीय कृषि तकनीकों और गुणवत्तापूर्ण मत्स्य उत्पादों की बढ़ती मांग को देखते हुए, प्रशिक्षण में पूर्व-उत्पादन, उत्पादन और उत्तर-उत्पादन चरणों को शामिल किया गया है, जिनमें—

  • हैचरी संचालन

  • उन्नत ग्रो-आउट तकनीक

  • समेकित/संयुक्त मत्स्य पालन

  • मत्स्य स्वास्थ्य प्रबंधन

  • फ़ीड निर्माण

  • समुद्री शैवाल (सीवीड) की खेती

  • मूल्यवर्धित मत्स्य प्रसंस्करण

पर विशेष ध्यान दिया गया है।

इसके अतिरिक्त, आधुनिक प्रणालियों जैसे रीसर्कुलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम (RAS), बायोफ्लॉक, केज कल्चर और सजावटी मछली प्रजनन पर विशेष प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है, जिससे किसान अपने कार्यों में विविधता और विस्तार कर सकें।
आजीविका एवं रोजगार केंद्रित प्रशिक्षण—जैसे सजावटी मत्स्य पालन, मत्स्य विपणन संपर्क तथा महिलाओं के लिए मूल्यवर्धित मत्स्य उत्पाद—भी कैलेंडर में सम्मिलित हैं।

अखिल भारतीय स्तर पर आयोजित एक्सपोज़र विज़िट किसानों को उन्नत तकनीकों को प्रत्यक्ष रूप से देखने और व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करने का अवसर प्रदान करती हैं। साथ ही, फिश फेस्टिवल, मेले आदि के माध्यम से घरेलू मछली/झींगा उपभोग को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है।

बजट एवं कार्यान्वयन

इस उद्देश्य से मत्स्य पालन विभाग, भारत सरकार ने ₹2.93 करोड़ की वित्तीय राशि चिन्हित की है, जिसे राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड (NFDB), हैदराबाद—PMMSY और PM-MKSSY के अंतर्गत प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण कार्यक्रमों की नोडल कार्यान्वयन एजेंसी—के माध्यम से क्रियान्वित किया जा रहा है।
मछुआरों और मत्स्य किसानों के प्रशिक्षण से संबंधित सभी व्यय विभाग द्वारा वहन किए जा रहे हैं।

प्रशिक्षण का संचालन राज्य एवं केंद्रशासित प्रदेशों के मत्स्य विभागों, ICAR मत्स्य अनुसंधान संस्थानों एवं उनके क्षेत्रीय केंद्रों, कृषि विज्ञान केंद्र (KVKs), एग्रीकल्चर स्किल काउंसिल ऑफ इंडिया (ASCI), CIFNET और NIFPHAT द्वारा किया गया।
पिछले छह महीनों में 499 प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनसे 22,921 प्रतिभागी लाभान्वित हुए।

भविष्य की दिशा

मत्स्य पालन विभाग के नेतृत्व में यह पहल न केवल हितधारकों को सशक्त बना रही है, बल्कि मत्स्य एवं जलीय कृषि क्षेत्र के दीर्घकालिक विकास, लचीलापन, रोजगार सृजन, खाद्य एवं पोषण सुरक्षा के लिए एक मजबूत आधार भी तैयार कर रही है। यह प्रयास देश के सामाजिक-आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देगा।

प्रशिक्षण कार्यक्रमों का सारांश

  • क्रम सं.
  • संस्थान का नाम
  • प्रशिक्षण कार्यक्रम
  • प्रतिभागी
  • 1
  • ICAR-CIFE, मुंबई एवं क्षेत्रीय केंद्र
  • 55
  • 1830
  • 2
  • ICAR-CIFA, भुवनेश्वर
  • 27
  • 737
  • 3
  • ICAR-CIBA, चेन्नई
  • 31
  • 1207
  • 4
  • ICAR-CIFT, कोच्चि
  • 55
  • 1001
  • 5
  • ICAR-CIFRI, कोलकाता
  • 42
  • 1776
  • 6
  • ICAR–शीत जल मत्स्य अनुसंधान संस्थान, भीमताल
  • 50
  • 3040
  • 7
  • ICAR-CMFRI, कोच्चि
  • 23
  • 622
  • 8
  • ICAR-NBFGR, लखनऊ
  • 58
  • 5592
  • 9
  • ICAR-ATARI, कोलकाता
  • 48
  • 1660
  • 10
  • ICAR-ATARI, जबलपुर
  • 3
  • 75
  • 11
  • ASCI
  • 26
  • 796
  • 12
  • TSP
  • 51
  • 3185
  • 13
  • SCSP
  • 19
  • 950
  • 14
  • CIFNET
  • 11
  • 450
  • कुल

  • 499
  • 22,921




मत्स्य पालन एवं जलीय कृषि में निवेश अवसरों पर लक्षद्वीप में निवेशक सम्मेलन का आयोजन

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भारत सरकार के मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय (MoFAH&D) के अंतर्गत मत्स्य पालन विभाग द्वारा लक्षद्वीप केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन के सहयोग से “लक्षद्वीप द्वीपसमूह के मत्स्य एवं जलीय कृषि क्षेत्र में निवेश अवसर” विषय पर एक निवेशक सम्मेलन का आयोजन 13 दिसंबर 2025 को बंगाराम द्वीप, लक्षद्वीप में किया जा रहा है।

इस कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह, राज्य मंत्री प्रो. एस.पी. सिंह बघेल, जॉर्ज कुरियन, तथा लक्षद्वीप के प्रशासक प्रफुल पटेल सहित कई गणमान्य अतिथि शामिल होंगे।

निवेशकों के लिए अवसर

यह कार्यक्रम निवेशकों को लक्षद्वीप में मत्स्य व जलीय कृषि क्षेत्र के विकास की संभावनाओं को समझने व सहयोग के अवसर तलाशने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करेगा। एक विशेष इंटरैक्टिव सत्र में निवेशक अपने अनुभव और चुनौतियाँ साझा करेंगे, जिससे नीतिगत सुधारों की दिशा तय होगी।

प्रतिभागी

इस कार्यक्रम में मत्स्य पालन विभाग, NFDB, MPEDA, EIC, CMFRI, CIFT, CIFNET, NCDC, NCEL, FSI, UT प्रशासन लक्षद्वीप, स्थानीय मत्स्य समितियों के अधिकारी तथा लगभग 35 प्रमुख निवेशक भाग ले रहे हैं। ये निवेशक टूना, सीवीड, डीप-सी फिशिंग, वेस्ट मैनेजमेंट और ऑर्नामेंटल फिशरी जैसे क्षेत्रों से जुड़े हैं।

लक्षद्वीप में निवेश की संभावनाएँ

लक्षद्वीप द्वीपसमूह में मत्स्य और जलीय कृषि क्षेत्र में अपार संभावनाएँ हैं—

  • कुल कैच का 75% टूना

  • 4200 वर्ग किमी लैगून क्षेत्र

  • समृद्ध ऑर्नामेंटल फिश बायोडायवर्सिटी

संभावित निवेश क्षेत्र:

  • डीप-सी टूना फिशिंग

  • टूना प्रोसेसिंग और कोल्ड-चेन सुविधाएँ

  • सीवीड खेती और समुद्री कृषि (Mariculture)

  • ऑर्नामेंटल फिश प्रोडक्शन यूनिट्स

इन निवेशों से स्थानीय आजीविका को बढ़ावा मिलेगा और ब्लू इकॉनमी को मजबूती मिलेगी। यह कार्यक्रम प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के तहत 1 लाख करोड़ रुपये के निर्यात लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

मुख्य फोकस

  • टूना फिशिंग में पूर्ण hook-to-plate ट्रैसेबिलिटी

  • स्वच्छ लैगूनों में उच्च गुणवत्ता वाले सीवीड की खेती

  • ऑर्नामेंटल फिशरी के लिए समृद्ध प्राकृतिक संसाधन

मत्स्य क्षेत्र की पृष्ठभूमि

  • मत्स्य क्षेत्र देश के 3 करोड़ लोगों की आजीविका का आधार

  • भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक

  • 2015 के बाद से सरकार द्वारा कुल ₹38,572 करोड़ के निवेश स्वीकृत

  • कुल मछली उत्पादन बढ़कर 197 लाख टन

  • समुद्री उत्पादों का निर्यात मूल्य ₹62,400 करोड़

  • लक्ष्य: 2030 तक ₹1 लाख करोड़ का समुद्री निर्यात

सरकार के प्रयास

  • 16 डीप-सी फिशिंग वेसल्स की स्वीकृति

  • सितंबर 2024 में लक्षद्वीप को समर्पित सीवीड क्लस्टर के रूप में अधिसूचित

  • ऑर्नामेंटल फिशरी के 300 प्रजातियों के साथ प्रबल संभावनाएँ

निष्कर्ष

यह निवेशक सम्मेलन लक्षद्वीप की मत्स्य क्षमता को उजागर करने तथा इसे विकसित भारत 2047 के विज़न की दिशा में अग्रसर करने का एक महत्वपूर्ण कदम है।


मत्स्य विभाग के सचिव डॉ. अभिलक्ष लिक्‍ही ने महाराष्ट्र के रायगढ़ में मत्स्य सहकारी क्लस्टर का किया दौरा, सहकारी मॉडल से मत्स्य क्षेत्र के एकीकृत विकास पर बल

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मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के तहत मत्स्य विभाग (Department of Fisheries - DoF) के केंद्रीय सचिव डॉ. अभिलक्ष लिक्‍ही ने आज महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में स्थित मत्स्य सहकारी क्लस्टर (Fisheries Cooperative Cluster) का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने परियोजना की प्रगति की समीक्षा की और सहकारी संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ संवाद किया।

यह क्लस्टर मत्स्य मूल्य श्रृंखला के एकीकृत विकास (Integrated Fisheries Value Chain Development) के एक मॉडल के रूप में विकसित किया जा रहा है। इस दौरे का उद्देश्य जमीनी स्तर की चुनौतियों का आकलन करना और सहकारी मॉडल के माध्यम से मत्स्य आधारित आजीविकाओं को मजबूत करने के अवसरों की पहचान करना था।

डॉ. लिक्‍ही ने इस अवसर पर रायगढ़ जिले की 156 प्राथमिक मत्स्य सहकारी समितियों (Primary Fisheries Cooperative Societies) और 9 फिश फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशनों (FFPOs) का प्रतिनिधित्व करने वाले 251 सदस्यों से मुलाकात की।

सहकारी विकास के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता

डॉ. लिक्‍ही ने कहा कि मत्स्य क्लस्टर गतिविधियों को प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) और मत्स्य अवसंरचना विकास कोष (FIDF) जैसी प्रमुख राष्ट्रीय योजनाओं के साथ जोड़ना आवश्यक है।
उन्होंने बताया कि मत्स्य विभाग और सहकारिता मंत्रालय के बीच एक संयुक्त कार्यबल (Joint Task Force) गठित किया गया है, जो देशभर में मत्स्य सहकारी समितियों को सशक्त बनाने की दिशा में काम कर रहा है।

डॉ. लिक्‍ही ने कहा कि सहकारी समितियाँ, सरकार की “सहकार से समृद्धि (Sahkar Se Samriddhi)” और मत्स्य समुदाय की समृद्धि की दृष्टि के केंद्र में हैं।

उन्होंने राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड (NFDB) को निर्देश दिया कि वह रायगढ़ जिले के सभी तालुकों में जागरूकता, प्रशिक्षण और शिकायत निवारण शिविरों का आयोजन करे ताकि योजनाओं का अधिक व्यापक प्रचार-प्रसार और प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित हो सके।

उन्होंने कहा कि क्लस्टर-आधारित दृष्टिकोण से मत्स्य क्षेत्र में समग्र विकास संभव है — जिससे निर्यात में वृद्धि, अवसंरचना सुदृढ़ीकरण, वित्तीय पहुंच में सुधार, और बाज़ार संपर्क को मजबूत किया जा सकेगा।

वरिष्ठ अधिकारियों के वक्तव्य

  • सागर मेहरा, संयुक्त सचिव (अंतर्देशीय मत्स्यपालन), ने कहा कि दीर्घकालिक स्थिरता के लिए विभिन्न मंत्रालयों और योजनाओं में कन्वर्जेंस (Convergence) सुनिश्चित करना आवश्यक है।

  • नीतू कुमारी, संयुक्त सचिव (सामुद्रिक मत्स्यपालन), ने हार्बर प्रबंधन के लिए मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOPs) के विकास पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि इन पहलों को सहकारिता मंत्रालय, NCDC और अन्य भागीदार संस्थानों के साथ समन्वय में लागू किया जा रहा है।

  • डॉ. बी.के. बेहरा, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड (NFDB) ने रायगढ़ की मत्स्य संरचना पर प्रस्तुति दी और अगले पाँच वर्षों की प्रमुख योजनाओं की रूपरेखा प्रस्तुत की, जिनमें अवसंरचना विकास, कोल्ड चेन, प्रसंस्करण, बाज़ार संपर्क और कल्याणकारी उपाय शामिल हैं।

हितधारकों की भागीदारी

बैठक में समुद्री, अंतर्देशीय और खारे पानी के मत्स्यपालन से जुड़े प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
उन्होंने जेटी, आइस प्लांट, कोल्ड स्टोरेज और ड्रेजिंग सुविधाओं की आवश्यकता पर बल दिया।
महिला मत्स्य कर्मियों के लिए स्वास्थ्य शिविर, स्वच्छता सुविधाएँ और प्रशिक्षण कार्यक्रमों की भी मांग की गई।
प्रतिभागियों ने आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों के दौरे का सुझाव दिया ताकि सर्वोत्तम प्रथाओं (Best Practices) से सीख ली जा सके।

वित्तीय संस्थानों ने सहकारी प्रयासों को मजबूत करने के लिए सतत समर्थन का आश्वासन दिया।
बैठक में यह सहमति बनी कि PMMSY फेज़ 2 में स्थानीय जरूरतों के अनुसार हस्तक्षेपों को शामिल किया जाएगा ताकि एक मजबूत, समावेशी और आत्मनिर्भर मत्स्य क्षेत्र का निर्माण किया जा सके।

रायगढ़ मत्स्य क्लस्टर का उद्देश्य

रायगढ़ सहित देश के 34 मत्स्य सहकारी क्लस्टर, जो प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के अंतर्गत अधिसूचित हैं,
का उद्देश्य है —

  • मत्स्य आधारित उद्यमों को सशक्त बनाना,

  • जलीय कृषि, समुद्री मत्स्यपालन और गहरे समुद्र मछली पकड़ने की गतिविधियों को एकीकृत करना,

  • प्रतिस्पर्धी, संगठित और सतत मत्स्य क्षेत्र को बढ़ावा देना।

इन क्लस्टर्स को ब्लू इकॉनॉमी (Blue Economy) के स्तंभ के रूप में विकसित किया जा रहा है, जो रोज़गार सृजन, आय वृद्धि, उद्यमिता और तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देंगे।

भागीदारी

बैठक में रायगढ़ के जिलाधिकारी किशन राव जवाले,
मत्स्य आयुक्त, महाराष्ट्र किशोर तवाड़े,
सहकारिता मंत्रालय, NCDC, NFDB, MPEDA, NABARD, ICAR सहित
कई राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधियों और हितधारकों ने भाग लिया।


डॉ. अभिलक्ष लिंखी ने फतेहगढ़ साहिब, पंजाब में मछली पालन और आधुनिक मत्स्य परियोजनाओं का किया अवलोकन

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आज केंद्रीय मत्स्य, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के अंतर्गत मत्स्य विभाग के सचिव डॉ. अभिलक्ष लिंखी ने पंजाब के फतेहगढ़ साहिब जिले का दौरा किया और मछली किसानों एवं मत्स्य उद्यमियों से Recirculatory Aquaculture Systems (RAS) और झींगा पालन से जुड़ी समस्याओं और चुनौतियों पर चर्चा की।

डालुतपुर गांव, बसी पठाना में आधुनिक RAS सुविधाओं का दौरा करते हुए, डॉ. लिंखी ने प्रधान मंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के तहत विभिन्न केंद्रीय योजनाओं के अंतर्गत चल रही मत्स्य परियोजनाओं और गतिविधियों की समीक्षा की। उन्हें स्थानीय किसानों द्वारा अपनाई गई नवीनतम प्रथाओं के बारे में जानकारी दी गई, जिनकी मदद से बंजर भूमि को उत्पादक मत्स्य पालन केंद्र में बदलकर रोजगार और आजीविका के अवसर उत्पन्न किए गए हैं। इस बातचीत में लगभग 35–40 प्रगतिशील मछली किसान शामिल हुए और अपने अनुभव एवं सुझाव साझा किए।

डॉ. लिंखी ने प्रौद्योगिकी-संचालित मछली पालन, किसानों की क्षमता निर्माण और विविध प्रजातियों के पालन के महत्व पर जोर दिया ताकि आय में वृद्धि हो और ग्रामीण आजीविका सुदृढ़ हो। उन्होंने यह भी दोहराया कि सरकार प्रधान मत्स्य योजनाओं के तहत आधुनिक मत्स्य पालन प्रथाओं को बुनियादी ढांचा, नवाचार और क्षमता संवर्धन के माध्यम से समर्थन देने के लिए प्रतिबद्ध है।

 इस दौरे ने यह भी रेखांकित किया कि सरकार पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में खारी जल मत्स्य पालन को प्राथमिकता दे रही है। ये क्षेत्र, जो अक्सर कृषि क्षेत्रों से खारी जल के प्रभाव से प्रभावित होते हैं, मत्स्य पालन के माध्यम से भूमि उपयोग अनुकूलन के लिए अद्वितीय अवसर प्रदान करते हैं।

पृष्ठभूमि –

भारत के अंतर्देशीय जल संसाधनों की संभावना विशाल और अधिकांशतः अछूती है। देश में 1.95 लाख किलोमीटर नदियाँ और नहरें, 6.06 लाख हेक्टेयर खारी जल क्षेत्र, 3.65 लाख हेक्टेयर तालाब और ओक्सबो झीलें, 27.56 लाख हेक्टेयर टैंक और तालाब तथा 31.53 लाख हेक्टेयर जलाशय हैं। इससे सतत अंतर्देशीय मत्स्य विकास की अपार संभावनाएँ हैं।

भारत की अंतर्देशीय मत्स्य उत्पादन राष्ट्रीय मत्स्य उत्पादन का 75% योगदान देता है। 2024–25 में अंतर्देशीय मत्स्य उत्पादन 139.07 लाख मीट्रिक टन रहा। 2013–14 से 2024–25 के बीच अंतर्देशीय मत्स्य उत्पादन में 142% वृद्धि हुई, जो 61 लाख टन से बढ़कर 147.37 लाख टन हो गया। इस विस्तार ने भारत के कुल राष्ट्रीय मत्स्य उत्पादन को 195 लाख टन तक बढ़ा दिया।

प्रधान मंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के तहत भारत में ₹3,300 करोड़ का निवेश किया गया है, जिससे 12,000 RAS यूनिट्स, 4,000 बायोफ्लॉक सिस्टम्स, 59,000 पिंजरे और 561 हेक्टेयर पेन बनाए गए हैं। इससे राष्ट्रीय औसत मत्स्य पालन उत्पादकता 4.77 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर तक पहुंच गई है।

पंजाब में प्रगति:

PMMSY के तहत पंजाब में ₹187 करोड़ का निवेश हुआ, जिसमें केंद्र का हिस्सा ₹72 करोड़ है। राज्य का मत्स्य उत्पादन लक्ष्य 2.21 लाख टन है, जबकि 2023–24 में वास्तविक उत्पादन 1.84 लाख टन रहा। आधुनिक मत्स्य पालन प्रथाओं के माध्यम से पिछले पांच वर्षों में किसानों की आय में लगभग ₹500 करोड़ की वृद्धि हुई और 2020–21 से मत्स्य उत्पादन में 35,000 टन की बढ़ोतरी हुई।

खारी जल मत्स्य पालन:

हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश में 2024–25 के लिए 263.80 हेक्टेयर क्षेत्र में खारी जल मत्स्य पालन परियोजनाओं को मंजूरी दी गई, जिसमें ₹36.93 करोड़ का बजट आवंटित किया गया, जो प्रारंभिक लक्ष्य 200 हेक्टेयर से अधिक है। मुक्तसर साहिब (पंजाब) और सिरसा (हरियाणा) में खारी जल मत्स्य पालन क्लस्टर की स्वीकृति और अधिसूचना महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हैं। इसके अलावा, हरियाणा के सिरसा, पंजाब के मुक्तसर और राजस्थान के चूरू जिलों में खारी जल क्लस्टर के विकास के लिए अधिसूचना जारी की गई है।

“देशभर में मत्स्य पालन क्षेत्र के हितधारकों के साथ 15,000 से अधिक मछुआरों और मछली किसानों की आभासी संवाद श्रृंखला संपन्न”

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अप्रैल से सितंबर 2025 तक केंद्रीय मत्स्य विभाग (DoF), मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय द्वारा आयोजित राष्ट्रीय स्तर की आभासी संवाद श्रृंखला में 34 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से 15,000 से अधिक मछुआरे और मछली किसान शामिल हुए। इस पहल का नेतृत्व DoF के सचिव डॉ. अभिलक्ष लिक्खी ने किया, जिससे हितधारकों को सीधे अपने विचार, चिंताएँ और अपेक्षाएँ साझा करने का अवसर मिला।


इन सत्रों में मछुआरों, मछली किसानों, मत्स्य संघों, सहकारी समितियों, Fisheries Farmer Producer Organizations (FFPOs), स्टार्टअप्स, DoF के अधीनस्थ कार्यालयों, ICAR संस्थानों, राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड और राज्य/केंद्र शासित प्रदेश मत्स्य विभागों ने भाग लिया। ये सत्र छह महीने की अवधि में 2 अप्रैल से 30 सितंबर 2025 तक आयोजित किए गए और तटीय, अंतर्देशीय, पहाड़ी, द्वीप और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों सहित लगभग हर जिले का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया गया।

इस अभ्यास ने न केवल वर्तमान चुनौतियों की पहचान करने में मदद की, बल्कि भविष्य की नीति हस्तक्षेप, अवसंरचना योजना और लक्षित कल्याणकारी उपायों के लिए फीडबैक एकत्र करने में भी योगदान दिया। मछुआरों और मछली किसानों ने प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY), प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना (PM-MKSSY), Fisheries and Aquaculture Infrastructure Development Fund (FIDF), समूह दुर्घटना बीमा योजना (GAIS), ब्लू रिवॉल्यूशन और किसान क्रेडिट कार्ड जैसी सरकारी योजनाओं के तहत मिले समर्थन की सराहना की।

हितधारकों से प्रमुख फीडबैक

मछुआरों और मछली किसानों ने उच्च गुणवत्ता वाली मछली के बीज, ब्रूड बैंक, किफायती फ़ीड और स्थानीय फ़ीड मिलों की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने परिवहन, केज कल्चर, मिनी हैचरी, आइस बॉक्स, पॉली शीट, कोल्ड स्टोरेज सुविधाओं और सौर ऊर्जा समेत एक्वाकल्चर के लिए सहायक सुविधाओं को और मजबूत करने की जरूरत बताई।

इसके अलावा, तकनीक-आधारित नवाचारों जैसे लाइव मछली परिवहन के लिए ड्रोन, मछुआरों की सुरक्षा के लिए सैटेलाइट अनुप्रयोग, और संभावित मत्स्य क्षेत्र (PFZ) की जानकारी प्रदान करने जैसी पहल को अपनाने की सलाह दी गई। मछुआरों ने मुफ्त ट्रांसपोंडर की स्थापना की पहल की भी सराहना की, जिसने उन्हें PFZ सलाह, मौसम अलर्ट और चक्रवात अपडेट प्रदान कर सुरक्षित मार्ग पर नेविगेशन में मदद की। साथ ही, इन ट्रांसपोंडरों ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा के अनजाने में पार होने से भी रोका।

मार्केटिंग के क्षेत्र में, मछुआरों ने समर्पित मछली बाजार, कियोस्क और आधुनिक मछली प्रसंस्करण संयंत्रों को मजबूत करने की आवश्यकता बताई ताकि मूल्य श्रृंखला बेहतर हो और मूल्य वर्धन में मदद मिले। उन्होंने PMMSY के तहत वैकल्पिक आजीविका जैसे सीवेड कल्चर, सजावटी मत्स्य पालन और मोती पालन को बढ़ावा देने की सलाह दी। तकनीकी ज्ञान, फार्म प्रबंधन और रोग नियंत्रण में सुधार के लिए नियमित प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया। इसके अतिरिक्त, जल गुणवत्ता परीक्षण प्रयोगशालाओं के माध्यम से जलीय स्वास्थ्य प्रबंधन और रोग नियंत्रण की आवश्यकता पर भी बल दिया गया।

डिजिटल संवाद की विशेषताएँ

मोबाइल-आधारित वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग प्रारूप ने प्रतिभागियों को घर बैठे वरिष्ठ अधिकारियों से सीधे जुड़ने का अवसर दिया। इन फीडबैक सत्रों की महत्वता पर जोर देते हुए, डॉ. अभिलक्ष लिक्खी ने कहा:

“इन सत्रों के माध्यम से मछुआरों और मछली किसानों और नीति निर्धारकों के बीच एक महत्वपूर्ण पुल बना है। प्राप्त सुझाव हमारे हस्तक्षेपों को मार्गदर्शन देंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि इस क्षेत्र में विकास समावेशी, सतत और किसान-केंद्रित रहे, जैसा कि मत्स्य विभाग की 5 वर्ष की रोडमैप और ‘विकसित भारत 2047’ की दृष्टि में परिलक्षित है।”

मत्स्य पालन क्षेत्र के बारे में

मत्स्य पालन क्षेत्र, जिसे ‘सनराइज सेक्टर’ के रूप में माना जाता है, लगभग 3 करोड़ लोगों के रोजगार के लिए महत्वपूर्ण है, विशेषकर हाशिए पर और कमजोर मछुआरों और मछली किसानों के लिए। भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक है, जो वैश्विक उत्पादन में 8% का योगदान देता है, और विश्व स्तर पर मत्स्य पालन उत्पादन में भी दूसरे स्थान पर है।

2015 के बाद से लागू लक्षित पहलों के तहत भारत सरकार ने विभिन्न योजनाओं में कुल ₹38,572 करोड़ के निवेश की मंजूरी या घोषणा की है। इसके परिणामस्वरूप कुल मछली उत्पादन 195 लाख टन तक पहुंच गया है। इस क्षेत्र की वार्षिक वृद्धि दर 8.74% है। समुद्री खाद्य निर्यात भी 2023-24 में ₹60,524 करोड़ तक बढ़ गया।

देश भर में 34 मत्स्य उत्पादन और प्रसंस्करण क्लस्टरों की घोषणा के साथ, विभाग अब प्रजाति-विशिष्ट क्लस्टरों का निर्माण कर रहा है, ताकि प्रजाति-विशिष्ट मूल्य श्रृंखला को मजबूत किया जा सके और नवीनतम तकनीकों का लाभ उठाया जा सके। इस क्लस्टर आधारित दृष्टिकोण का उद्देश्य महिलाओं को सशक्त करना, FFPOs और सहकारी समितियों के माध्यम से घरेलू मछली खपत बढ़ाना, निर्यात को बढ़ावा देना और कमजोर मछुआरों और मछली किसानों के लिए आजीविका सुनिश्चित करना भी है।



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