Media24Media.com: अबूझमाड़ में कॉफी की खुशबू से बदलेगी तस्वीर: सतत खेती से आदिवासी समुदायों को मिलेगा नया रोजगार

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अबूझमाड़ में कॉफी की खुशबू से बदलेगी तस्वीर: सतत खेती से आदिवासी समुदायों को मिलेगा नया रोजगार

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रायपुर- छत्तीसगढ़ के सबसे दुर्गम और वनाच्छादित क्षेत्रों में शामिल अबूझमाड़ अब विकास की नई दिशा में कदम बढ़ा रहा है। वर्षों तक भौगोलिक दुर्गमता और वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित रहे इस क्षेत्र में अब कॉफी की खेती के माध्यम से स्थानीय आदिवासी समुदायों के लिए रोजगार और आय के नए अवसर तैयार करने की पहल शुरू की गई है।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व वाली राज्य सरकार की दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों में आजीविका बढ़ाने की नीति के तहत नारायणपुर जिला प्रशासन ने अबूझमाड़ के चयनित वन ग्रामों में कॉफी की खेती शुरू करने की तैयारी शुरू कर दी है।

इसी क्रम में नारायणपुर कलेक्टर नम्रता जैन ने कॉफी बोर्ड ऑफ इंडिया के विशेषज्ञों के साथ कुटुल, कच्छपाल, कोडलीयार, इराकभट्टी और टोके जैसे गांवों का दौरा कर वहां की जलवायु, मिट्टी, वर्षा, तापमान और ऊंचाई का वैज्ञानिक अध्ययन कराया।

विशेषज्ञों की प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार, अबूझमाड़ की प्राकृतिक परिस्थितियां कॉफी आधारित कृषि-वनीकरण (Agroforestry) के लिए अनुकूल हैं। परियोजना के पहले चरण में उपयुक्त भूमि की पहचान, पौधशालाओं (नर्सरी) की स्थापना और किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसके बाद चरणबद्ध तरीके से कॉफी के पौधे लगाए जाएंगे।

कॉफी बोर्ड ऑफ इंडिया पूरे प्रोजेक्ट के दौरान तकनीकी मार्गदर्शन देगा, जिसमें नर्सरी विकास, पौधरोपण, फसल प्रबंधन और किसानों का प्रशिक्षण शामिल होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि बस्तर क्षेत्र की जलवायु, पर्याप्त वर्षा, उपजाऊ वन भूमि और प्राकृतिक छायादार वातावरण जैविक (ऑर्गेनिक) कॉफी उत्पादन के लिए बेहद उपयुक्त हैं। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (आईजीकेवी), जगदलपुर द्वारा प्रकाशित तकनीकी अध्ययन में भी बस्तर को कॉफी उत्पादन के लिए संभावनाओं से भरपूर क्षेत्र बताया गया है।

कॉफी आधारित कृषि से पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा। छायादार पेड़ मिट्टी का कटाव रोकने, जैव विविधता बनाए रखने, पोषक तत्वों के संरक्षण और प्राकृतिक पारिस्थितिकी को मजबूत करने में सहायक होंगे।

जिला प्रशासन का मानना है कि लगभग चार वर्षों के बाद कॉफी का व्यावसायिक उत्पादन शुरू हो सकता है। इसके बाद स्थानीय लोगों को कॉफी उत्पादन, नर्सरी, पौधरोपण, रखरखाव, तुड़ाई और प्रसंस्करण जैसे कार्यों में स्थायी रोजगार के अवसर मिलेंगे। स्वयं सहायता समूहों (SHGs) की भी इस परियोजना में महत्वपूर्ण भूमिका होगी।

नारायणपुर कलेक्टर नम्रता जैन ने कहा कि प्रशासन का उद्देश्य अबूझमाड़ की प्राकृतिक संपदा का संरक्षण करते हुए विकास को बढ़ावा देना है। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक योजना और स्थानीय समुदायों की भागीदारी से कॉफी की खेती इस क्षेत्र के लिए दीर्घकालिक और टिकाऊ आजीविका का मजबूत आधार बन सकती है।

इसके अलावा भविष्य में अबूझमाड़ के उपयुक्त क्षेत्रों में चाय की खेती की संभावनाओं का भी अध्ययन किया जाएगा। इसके लिए चरणबद्ध कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं।

यदि यह परियोजना सफल होती है, तो अबूझमाड़ में कॉफी की खेती केवल आर्थिक विकास का माध्यम नहीं बनेगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और आदिवासी समुदायों के सतत विकास का एक नया मॉडल भी स्थापित करेगी।

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