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भरपूर खाद-बीज, मजबूत योजनाएं और आधुनिक खेती से समृद्धि की राह पर छत्तीसगढ़ का किसान

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उर्वरकों का 98 प्रतिशत भंडारण, किसानों को डीबीटी से हजारों करोड़ की सहायता, उद्यानिकी, पशुपालन और मत्स्य क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति

कृषि मंत्री रामविचार नेताम और कृषि उत्पादन आयुक्त सिद्धार्थ कोमल परदेशी ने विभागीय उपलब्धियों पर दी विस्तृत जानकारी

रायपुर- छत्तीसगढ़ में कृषि को अधिक लाभकारी, तकनीक आधारित और किसान केंद्रित बनाने की दिशा में राज्य सरकार लगातार प्रभावी कदम उठा रही है। किसानों को समय पर गुणवत्तापूर्ण बीज एवं उर्वरकों की उपलब्धता, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) के माध्यम से आर्थिक सहायता, सिंचाई सुविधाओं का विस्तार, कृषि यंत्रीकरण, प्राकृतिक खेती, उद्यानिकी, पशुपालन, मत्स्य पालन तथा कृषि अधोसंरचना के विकास के माध्यम से प्रदेश की कृषि अर्थव्यवस्था को नई गति मिल रही है।

कृषि विकास एवं किसान कल्याण तथा जैव प्रौद्योगिकी, पशुधन विकास, मत्स्य पालन एवं उद्यानिकी मंत्री रामविचार नेताम तथा कृषि उत्पादन आयुक्त सिद्धार्थ कोमल परदेशी ने आज संयुक्त रूप से आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में विभागीय उपलब्धियों एवं आगामी कार्ययोजना की विस्तृत जानकारी दी। इस मौके पर कृषि विभाग के संचालक राहुल देव, पशुधन विकास विभाग के चंद्रकांत वर्मा, छत्तीसगढ़ राज्य बीज एवं कृषि विकास निगम के एमडी अजय अग्रवाल, उद्यानिकी विभाग संचालक लोकेश चंद्राकर, मत्सय विभाग के संचालक एनएस नाग, छत्तीसगढ़ राज्य मण्डी बोर्ड के एमडी  महेन्द्र सवन्नी, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. गिरीश चंदेल, महात्मा गांधी उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय के कुलपति के डॉ. विनित सक्सेना उपस्थित थे।  

कृषि विकास एवं किसान कल्याण तथा जैव प्रौद्योगिकी, पशुधन विकास, मत्स्य पालन एवं उद्यानिकी मंत्री रामविचार नेताम तथा कृषि उत्पादन आयुक्त सिद्धार्थ कोमल परदेशी ने आज संयुक्त रूप से आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में विभागीय उपलब्धियों एवं आगामी कार्ययोजना की विस्तृत जानकारी दी।

मंत्री नेताम ने कहा कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार की सर्वाेच्च प्राथमिकता किसानों की आय में वृद्धि, खेती की लागत में कमी तथा कृषि को आधुनिक और टिकाऊ बनाना है। राज्य में कृषि एवं उससे जुड़े सभी क्षेत्रों में योजनाबद्ध तरीके से कार्य किए जा रहे हैं, जिसके सकारात्मक परिणाम अब दिखाई देने लगे हैं।

प्रदेश में पर्याप्त खाद और बीज की उपलब्धता

प्रेसवार्ता में कृषि उत्पादन आयुक्त परदेशी ने बताया कि खरीफ सीजन 2026 के लिए अप्रैल से सितंबर तक 15.55 लाख मीट्रिक टन रासायनिक उर्वरकों का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। इसके विरुद्ध 30 जुलाई 2026 तक 15.16 लाख मीट्रिक टन उर्वरकों का भंडारण किया जा चुका है, जो लक्ष्य का लगभग 98 प्रतिशत है। किसानों द्वारा अब तक 10.23 लाख मीट्रिक टन उर्वरकों का उठाव किया जा चुका है तथा लगभग 4.93 लाख मीट्रिक टन उर्वरक शेष उपलब्ध है।

यूरिया का लक्ष्य से अधिक 102 प्रतिशत भंडारण किया गया है, जबकि डीएपी, एनपीके, एमओपी एवं एसएसपी सहित सभी प्रमुख उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित की गई है। विभाग द्वारा कालाबाजारी, जमाखोरी तथा अवैध भंडारण पर लगातार कार्रवाई की जा रही है। 30 जुलाई तक 5,466 निरीक्षण किए गए, जिनमें अनेक मामलों में एफआईआर, लाइसेंस निलंबन, निरस्तीकरण तथा उर्वरक जब्ती जैसी कार्रवाई की गई।

प्रदेश में खरीफ 2026 के लिए लगभग 4.95 लाख क्विंटल बीज की मांग के विरुद्ध 4.85 लाख क्विंटल प्रमाणित बीजों का भंडारण किया गया है, जो लगभग 98 प्रतिशत उपलब्धता को दर्शाता है।

कृषक उन्नति योजना से किसानों को मिली बड़ी आर्थिक ताकत

कृषि उत्पादन आयुक्त परदेशी ने बताया कि राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी कृषक उन्नति योजना के तहत किसानों को डीबीटी के माध्यम से सीधे बैंक खातों में सहायता राशि उपलब्ध कराई जा रही है। खरीफ 2023 से खरीफ 2025 तक लगभग 25.52 लाख किसानों को 35,892.90 करोड़ रुपये की सहायता प्रदान की गई है। फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने के लिए धान के स्थान पर अन्य फसल लेने वाले किसानों को प्रति एकड़ मिलने वाली प्रोत्साहन राशि 11 हजार रुपये से बढ़ाकर 15 हजार रुपये कर दी गई है।

प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि से लाखों किसानों को लाभ

कृषि उत्पादन आयुक्त परदेशी ने बताया कि प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के अंतर्गत प्रदेश के 24.63 लाख किसानों को 23वीं किस्त के रूप में 493 करोड़ रुपये से अधिक की सहायता प्रदान की गई। अब तक किसानों को 11 हजार करोड़ रुपये से अधिक की राशि उपलब्ध कराई जा चुकी है। एग्रीस्टैक और ई-केवाईसी के माध्यम से योजना को और अधिक पारदर्शी बनाया गया है।

बढ़ रहा है कृषि का रकबा, 83 प्रतिशत बोनी पूर्ण

इस वर्ष खरीफ में 48.69 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बोनी का लक्ष्य रखा गया है, जिसके विरुद्ध अब तक लगभग 83 प्रतिशत क्षेत्र में बोनी पूरी हो चुकी है। प्रदेश में औसत वर्षा भी सामान्य से अधिक दर्ज की गई है, जिससे खरीफ फसलों की स्थिति संतोषजनक बनी हुई है।

आधुनिक खेती को मिल रहा बढ़ावा

कृषि उत्पादन आयुक्त परदेशी ने बताया कि राज्य में कृषि यंत्रीकरण के तहत अब तक 7,745 किसानों को आधुनिक कृषि यंत्र उपलब्ध कराए गए हैं तथा 568 फार्म मशीनरी बैंक स्थापित किए गए हैं, जिससे छोटे एवं सीमांत किसानों को भी आधुनिक उपकरणों का लाभ मिल रहा है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत 49,983 किसानों को लाभान्वित करते हुए लगभग 41,967 हेक्टेयर क्षेत्र में ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई का विस्तार किया गया है तथा 147 करोड़ रुपये से अधिक का अनुदान प्रदान किया गया है। 
प्राकृतिक खेती को भी विशेष प्रोत्साहन दिया जा रहा है। वर्ष 2025-26 में 57 हजार से अधिक किसानों को प्राकृतिक खेती से जोड़ा गया है।

दलहन-तिलहन उत्पादन पर विशेष जोर

मंत्री राम विचार नेताम प्रेसवार्ता में बताया कि प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (पीएम-आशा), राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा एवं पोषण मिशन, आत्मनिर्भर दलहन मिशन तथा नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल-ऑयलसीड्स जैसी योजनाओं के माध्यम से दलहन एवं तिलहन उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। किसानों को प्रमाणित बीज, प्रशिक्षण, फसल प्रदर्शन तथा अनुदान आधारित सहायता उपलब्ध कराई जा रही है।

एग्रीस्टैक से डिजिटल कृषि को नई पहचान

प्रदेश के 19,389 ग्रामों का जियो-रेफरेंसिंग पूरा किया जा चुका है तथा 36 लाख से अधिक किसानों का डिजिटल पंजीयन किया गया है। एग्रीस्टैक के माध्यम से पीएम-किसान, पीएम-आशा और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना सहित विभिन्न योजनाओं को एकीकृत किया जा रहा है, जिससे किसानों को पारदर्शी एवं समयबद्ध सेवाएं उपलब्ध हो रही हैं।

उद्यानिकी में लगातार बढ़ रहा क्षेत्र और उत्पादन

बीते ढाई वर्षों में उद्यानिकी फसलों का कुल रकबा 8.42 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 8.91 लाख हेक्टेयर पहुंच गया है। फल, सब्जी, मसाला, पुष्प एवं औषधीय फसलों के क्षेत्र और उत्पादन में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है। ऑयल पाम के क्षेत्र में लगभग 50 प्रतिशत तथा बांस रोपण में 79 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। प्रदेश में हाईटेक नर्सरियों, टिश्यू कल्चर लैब, ग्रीन हाउस, शेडनेट हाउस, पैक हाउस तथा कोल्ड स्टोरेज जैसी अधोसंरचनाओं का तेजी से विस्तार किया गया है। आगामी वर्षों में बलरामपुर एवं जशपुर में इंटीग्रेटेड पैक हाउस तथा नवा रायपुर में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित किए जाएंगे।

पशुपालन और डेयरी क्षेत्र में नई उपलब्धियांपशुधन विकास विभाग के बजट में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। प्रदेश में दूध, अंडा एवं मांस उत्पादन में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है। राज्य सरकार, छत्तीसगढ़ सहकारी दुग्ध महासंघ और एनडीडीबी के बीच हुए समझौते के बाद दुग्ध उत्पादकों को अब प्रत्येक दस दिन में भुगतान सुनिश्चित किया जा रहा है। दूध संकलन दर भी बढ़ाई गई है तथा नई दुग्ध समितियों, चिलिंग सेंटर और डेयरी अधोसंरचना का विस्तार किया गया है। मोबाइल वेटेरिनरी यूनिटों के माध्यम से दूरस्थ क्षेत्रों में पशु चिकित्सा सेवाएं पहुंचाई जा रही हैं। गौधाम योजना, गौशालाओं के अनुदान में वृद्धि तथा नए गौ-अभ्यारण्यों की स्थापना भी सरकार की प्रमुख उपलब्धियों में शामिल है।

छत्तीसगढ़ देश के अग्रणी मत्स्य उत्पादक राज्यों में शामिल

मंत्री नेताम ने बताया कि मत्स्य पालन विभाग ने ढाई वर्षों में जलक्षेत्र विकास, मत्स्य उत्पादन, केज कल्चर, बायोफ्लॉक, तालाब निर्माण और झींगा पालन जैसी आधुनिक तकनीकों को बढ़ावा दिया है। राज्य का मत्स्य उत्पादन लगभग 23 प्रतिशत बढ़कर 9.59 लाख टन पहुंच गया है। प्रदेश आज देश के अग्रणी मत्स्य उत्पादक राज्यों में शामिल हो चुका है।

कृषि विपणन और अधोसंरचना को गति

कृषि उत्पादन आयुक्त परदेशी ने बताया कि राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम) से प्रदेश की 21 मंडियां जुड़ चुकी हैं। ई-ट्रेडिंग के माध्यम से अंतरराज्यीय व्यापार को बढ़ावा मिला है। कृषि अवसंरचना निधि (एआईएफ) के अंतर्गत प्रदेश ने 1,900 करोड़ रुपये के लक्ष्य के विरुद्ध 3,026 करोड़ रुपये की उपलब्धि हासिल कर उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। प्रदेश की मंडियों एवं उपमंडियों में किसानों की सुविधा के लिए 885 करोड़ रुपये की लागत से विभिन्न अधोसंरचना विकास कार्य स्वीकृत एवं निर्मित किए गए हैं।

राज्य बीज एवं जैविक प्रमाणीकरण संस्था द्वारा बीज उत्पादन की संपूर्ण प्रक्रिया को ऑनलाइन साथी (ै।ज्भ्प्) पोर्टल से जोड़ा गया है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं महिला कृषकों को बीज प्रमाणीकरण शुल्क पर शत-प्रतिशत अनुदान दिया जा रहा है, जिससे वर्ष 2025-26 में 7,510 किसानों को लाभ मिला। रायपुर स्थित बीज परीक्षण प्रयोगशाला को एनएबीएल मान्यता प्राप्त हुई है, जो छत्तीसगढ़ एवं मध्यप्रदेश की पहली एनएबीएल मान्यता प्राप्त शासकीय बीज परीक्षण प्रयोगशाला है। वर्ष 2025-26 में यहां 15 हजार बीज नमूनों का सफल परीक्षण किया गया।

प्रेसवार्ता के अंत में मंत्री रामविचार नेताम ने कहा कि राज्य सरकार किसानों की आय दोगुनी करने, कृषि को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने तथा आधुनिक तकनीक और पारदर्शी व्यवस्था के माध्यम से कृषि क्षेत्र को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने के लिए पूरी प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रही है। कृषि उत्पादन आयुक्त सिद्धार्थ कोमल परदेशी ने कहा कि गुणवत्तापूर्ण बीज, पर्याप्त उर्वरक, डिजिटल सेवाओं, आधुनिक तकनीक और प्रभावी योजनाओं के समन्वित क्रियान्वयन से छत्तीसगढ़ कृषि विकास के नए आयाम स्थापित कर रहा है।

अबूझमाड़ में कॉफी की खुशबू से बदलेगी तस्वीर: सतत खेती से आदिवासी समुदायों को मिलेगा नया रोजगार

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रायपुर- छत्तीसगढ़ के सबसे दुर्गम और वनाच्छादित क्षेत्रों में शामिल अबूझमाड़ अब विकास की नई दिशा में कदम बढ़ा रहा है। वर्षों तक भौगोलिक दुर्गमता और वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित रहे इस क्षेत्र में अब कॉफी की खेती के माध्यम से स्थानीय आदिवासी समुदायों के लिए रोजगार और आय के नए अवसर तैयार करने की पहल शुरू की गई है।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व वाली राज्य सरकार की दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों में आजीविका बढ़ाने की नीति के तहत नारायणपुर जिला प्रशासन ने अबूझमाड़ के चयनित वन ग्रामों में कॉफी की खेती शुरू करने की तैयारी शुरू कर दी है।

इसी क्रम में नारायणपुर कलेक्टर नम्रता जैन ने कॉफी बोर्ड ऑफ इंडिया के विशेषज्ञों के साथ कुटुल, कच्छपाल, कोडलीयार, इराकभट्टी और टोके जैसे गांवों का दौरा कर वहां की जलवायु, मिट्टी, वर्षा, तापमान और ऊंचाई का वैज्ञानिक अध्ययन कराया।

विशेषज्ञों की प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार, अबूझमाड़ की प्राकृतिक परिस्थितियां कॉफी आधारित कृषि-वनीकरण (Agroforestry) के लिए अनुकूल हैं। परियोजना के पहले चरण में उपयुक्त भूमि की पहचान, पौधशालाओं (नर्सरी) की स्थापना और किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसके बाद चरणबद्ध तरीके से कॉफी के पौधे लगाए जाएंगे।

कॉफी बोर्ड ऑफ इंडिया पूरे प्रोजेक्ट के दौरान तकनीकी मार्गदर्शन देगा, जिसमें नर्सरी विकास, पौधरोपण, फसल प्रबंधन और किसानों का प्रशिक्षण शामिल होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि बस्तर क्षेत्र की जलवायु, पर्याप्त वर्षा, उपजाऊ वन भूमि और प्राकृतिक छायादार वातावरण जैविक (ऑर्गेनिक) कॉफी उत्पादन के लिए बेहद उपयुक्त हैं। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (आईजीकेवी), जगदलपुर द्वारा प्रकाशित तकनीकी अध्ययन में भी बस्तर को कॉफी उत्पादन के लिए संभावनाओं से भरपूर क्षेत्र बताया गया है।

कॉफी आधारित कृषि से पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा। छायादार पेड़ मिट्टी का कटाव रोकने, जैव विविधता बनाए रखने, पोषक तत्वों के संरक्षण और प्राकृतिक पारिस्थितिकी को मजबूत करने में सहायक होंगे।

जिला प्रशासन का मानना है कि लगभग चार वर्षों के बाद कॉफी का व्यावसायिक उत्पादन शुरू हो सकता है। इसके बाद स्थानीय लोगों को कॉफी उत्पादन, नर्सरी, पौधरोपण, रखरखाव, तुड़ाई और प्रसंस्करण जैसे कार्यों में स्थायी रोजगार के अवसर मिलेंगे। स्वयं सहायता समूहों (SHGs) की भी इस परियोजना में महत्वपूर्ण भूमिका होगी।

नारायणपुर कलेक्टर नम्रता जैन ने कहा कि प्रशासन का उद्देश्य अबूझमाड़ की प्राकृतिक संपदा का संरक्षण करते हुए विकास को बढ़ावा देना है। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक योजना और स्थानीय समुदायों की भागीदारी से कॉफी की खेती इस क्षेत्र के लिए दीर्घकालिक और टिकाऊ आजीविका का मजबूत आधार बन सकती है।

इसके अलावा भविष्य में अबूझमाड़ के उपयुक्त क्षेत्रों में चाय की खेती की संभावनाओं का भी अध्ययन किया जाएगा। इसके लिए चरणबद्ध कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं।

यदि यह परियोजना सफल होती है, तो अबूझमाड़ में कॉफी की खेती केवल आर्थिक विकास का माध्यम नहीं बनेगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और आदिवासी समुदायों के सतत विकास का एक नया मॉडल भी स्थापित करेगी।

मानसून में देरी से घबराएं नहीं, समय पर करें धान की बोआई-रोपाई : कृषि वैज्ञानिक

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रायपुर-  प्रदेश में इस वर्ष मानसून सामान्य से कुछ देर से पहुंचा है, लेकिन किसानों को चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर के वैज्ञानिकों ने कहा है कि अभी भी धान की खेती के लिए पर्याप्त समय है। मौसम को देखते हुए किसानों को कुछ जरूरी कृषि सलाह जारी की गई है।

वैज्ञानिकों के अनुसार इस वर्ष अल नीनो के प्रभाव के कारण मानसून लगभग 10 दिन देर से आया। जून माह में सामान्य से लगभग 40 प्रतिशत कम वर्षा हुई, लेकिन अब प्रदेश के सभी हिस्सों में मानसून पहुंच चुका है। मौसम विभाग के अनुसार 8 जुलाई तक राज्य में अच्छी वर्षा होने की संभावना है।

कृषि वैज्ञानिकों ने बताया कि किसान 15 जुलाई तक धान की सीधी बुआई तथा 30 जुलाई तक रोपाई और बियासी का कार्य कर सकते हैं। यदि किसी कारणवश थोड़ा विलंब भी हो जाए और हरेली (12 अगस्त) तक बोआई-रोपाई करनी पड़े, तब भी फसल पर अधिक असर नहीं पड़ेगा।

मानसून में देरी को देखते हुए किसानों को कम अवधि में तैयार होने वाली धान की किस्मों, जैसे इन्द्रावती, बस्तर धान-1, छत्तीसगढ़ बारानी धान, इंदिरा एरोबिक धान, एमटीयू-1010, एमटीयू-1153, एमटीयू-1156, एमटीयू-1001, छत्तीसगढ़ धान-1919, छत्तीसगढ़ तेजस्वी धान और महामाया का उपयोग करने की सलाह दी गई है। किसानों से कहा गया है कि बुआई से पहले बीज का फफूंदनाशक दवा से उपचार अवश्य करें और जैव उर्वरकों का भी उपयोग करें। इससे फसल स्वस्थ रहती है और उत्पादन बढ़ता है।

वैज्ञानिकों ने बताया कि धान की सीधी बुआई में खरपतवार (खरपतवार/घास) बड़ी समस्या होती है। यदि समय पर नियंत्रण नहीं किया गया तो उत्पादन में भारी कमी आ सकती है। इसलिए बुआई के बाद पहले 40 दिनों तक खेत को खरपतवार मुक्त रखना जरूरी है। इसके लिए हाथ से निंदाई, पैडी वीडर या कृषि विभाग द्वारा अनुशंसित खरपतवारनाशकों का उपयोग किया जा सकता है।

उर्वरक प्रबंधन को लेकर किसानों को सलाह दी गई है कि प्रति एकड़ अधिकतम दो बोरी यूरिया और एक बोरी डीएपी का ही उपयोग करें। डीएपी की पूरी मात्रा बुआई या रोपाई के समय दें, जबकि यूरिया की पहली खुराक 30 से 35 दिन बाद और दूसरी खुराक 60 से 70 दिन बाद दें। साथ ही हरी खाद और जैव उर्वरकों के उपयोग पर भी जोर दिया गया है।

वैज्ञानिकों ने बताया कि राज्य की प्राथमिक कृषि साख समितियों में किसानों के लिए यूरिया, डीएपी, एनपीके, सिंगल सुपर फॉस्फेट और पोटाश का पर्याप्त भंडारण उपलब्ध है। किसानों को आवश्यकता के अनुसार उर्वरक उपलब्ध कराया जाएगा।

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के अनुसंधान सेवाओं के संचालक डॉ. विवेक कुमार त्रिपाठी ने किसानों से अपील की है कि खेती से संबंधित किसी भी प्रकार की जानकारी या समस्या के समाधान के लिए अपने निकटतम कृषि विज्ञान केन्द्र, कृषि अनुसंधान केन्द्र, कृषि महाविद्यालय अथवा कृषि विभाग के अधिकारियों से संपर्क करें। विश्वविद्यालय द्वारा समय-समय पर किसानों के लिए आवश्यक तकनीकी सलाह जारी की जा रही है।

धान के बदले वैकल्पिक फसलों पर 15 हजार रुपये प्रति एकड़ मिलेगी आदान सहायता राशि

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दलहन, तिलहन और मोटे अनाज की खेती को मिलेगा बढ़ावा

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार ने किसानों की आय बढ़ाने और कृषि में फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से कृषक उन्नति योजना के नवीन स्वरूप को मंजूरी दी है। योजना के तहत खरीफ सीजन में धान के स्थान पर वैकल्पिक फसलें लगाने वाले किसानों को 15 हजार रुपये प्रति एकड़ की आदान सहायता राशि प्रदान की जाएगी।

योजना के अंतर्गत अरहर, उड़द, मूंग, सोयाबीन, मूंगफली, तिल, मक्का, कपास तथा कोदो, कुटकी और रागी जैसी मोटे अनाज की फसलों को शामिल किया गया है। इसका उद्देश्य धान पर निर्भरता कम करना, दलहन-तिलहन उत्पादन बढ़ाना, जल संरक्षण को बढ़ावा देना तथा भूमि की उर्वरता में सुधार करना है। योजना का लाभ लेने के लिए किसानों को एकीकृत किसान पोर्टल पर पंजीयन कराना अनिवार्य होगा। साथ ही डिजिटल फसल सर्वेक्षण के माध्यम से यह सत्यापित किया जाएगा कि किसान ने धान के स्थान पर स्वीकृत वैकल्पिक फसल की ही खेती की है। विगत खरीफ सीजन में धान की खेती करने वाले और इस वर्ष वैकल्पिक फसल का चयन करने वाले पात्र किसानों को 15 हजार रुपये प्रति एकड़ की सहायता राशि सीधे डीबीटी के माध्यम से उनके बैंक खाते में दी जाएगी।

वहीं जो किसान पहले से खरीफ सीजन में दलहन, तिलहन, मक्का, कोदो, कुटकी, रागी अथवा कपास की खेती कर रहे हैं, उन्हें पूर्ववत 10 हजार रुपये प्रति एकड़ की आदान सहायता राशि मिलेगी। योजना का लाभ ट्रस्ट, निजी कंपनियों, शाला विकास समितियों तथा शासकीय संस्थानों सहित अन्य विधिक संस्थाओं को नहीं मिलेगा। कृषि विभाग ने बताया कि पंजीयन के लिए आधार कार्ड, भूमि संबंधी दस्तावेज (बी-1 एवं पी-2), डीबीटी से लिंक बैंक खाता तथा मोबाइल नंबर आवश्यक होगा। किसान अपनी फसल प्रविष्टि में संशोधन के लिए निकटतम प्राथमिक कृषि सहकारी समिति, ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी अथवा विकासखंड कृषि कार्यालय से संपर्क कर सकते हैं।

जिले में दलहन एवं तिलहन फसलों के विपणन के लिए प्रधानमंत्री आशा योजना भी संचालित है। इसके तहत अरहर, उड़द, मूंग, मूंगफली एवं सोयाबीन की खरीदी न्यूनतम समर्थन मूल्य पर जिले की 13 सहकारी समितियों के माध्यम से की जाएगी। शासन द्वारा अरहर का न्यूनतम समर्थन मूल्य 8,450 रुपये, उड़द 8,200 रुपये, मूंग 8,780 रुपये, मूंगफली 7,517 रुपये तथा सोयाबीन 5,708 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है। विभाग के अनुसार जिले में इस खरीफ सीजन के लिए मक्का 18,200 हेक्टेयर, दलहन 15,270 हेक्टेयर, तिलहन 4,920 हेक्टेयर तथा लघु धान्य फसलों के लिए 1,158 हेक्टेयर क्षेत्र में खेती का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।


मेड़ पर लगाए थे कुछ पौधे... आज हर साल 2.5 लाख की कमाई

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रायगढ़ के किसान अरुण सॉ ने अनानास की खेती से बदली तकदीर, बने प्रेरणा स्रोत

रायपुर- कभी खेत की मेड़ पर शौक से लगाए गए कुछ अनानास के पौधों ने रायगढ़ के एक किसान की जिंदगी बदल दी। सकरबोगा पंचायत के ग्राम साल्हेओना निवासी प्रगतिशील किसान अरुण कुमार सॉ आज दो एकड़ में अनानास की खेती कर सालाना 2 से 2.5 लाख रुपये तक की अतिरिक्त आय कमा रहे हैं। उनकी सफलता अब क्षेत्र में कृषि नवाचार और विविधीकरण की मिसाल बन गई है।

शौक से शुरू हुआ, बना व्यावसायिक मॉडल  

अरुण सॉ पहले धान समेत पारंपरिक फसलें उगाते थे। वर्षों पहले घरेलू उपयोग के लिए उन्होंने मेड़ पर कुछ अनानास के पौधे लगाए। पौधों की अच्छी बढ़वार और फलों की गुणवत्ता देखकर उन्होंने खेती का दायरा बढ़ाया। पौधों से निकलने वाले प्ररोहों को अलग कर दोबारा रोपने का सिलसिला चलता रहा। कृषि विभाग के अधिकारियों से मिले तकनीकी मार्गदर्शन ने उनका हौसला बढ़ाया। धीरे-धीरे यह प्रयोग दो एकड़ के बगीचे में बदल गया। आज उनके खेत में आम और अमरूद के बीच कतारबद्ध अनानास के पौधे बहुफसली खेती का सफल उदाहरण पेश करते हैं।

कम लागत, बेहतर मुनाफा 

अनानास की खेती की सबसे बड़ी खासियत कम लागत है। इसमें खाद, कीटनाशक और सिंचाई की जरूरत कम होती है, जिससे उत्पादन खर्च नियंत्रित रहता है। वहीं बाजार में मांग लगातार बनी रहती है। अरुण सॉ के खेत में तैयार हर फल गुणवत्ता के हिसाब से 40 से 80 रुपये तक बिकता है।

प्ररोहों की बिक्री से भी आय  

फलों के साथ-साथ पौधों से निकलने वाले प्ररोहों की बिक्री भी उनकी आय का बड़ा जरिया बन गई है। बेहतर कमाई देख आसपास के किसान भी पारंपरिक खेती के साथ उद्यानिकी फसलें अपनाने लगे हैं। इससे कृषि विविधीकरण को बढ़ावा मिल रहा है।

अरुण सॉ कहते हैं कि खेती में सफलता सिर्फ मेहनत से नहीं, सही फसल चुनने, नई तकनीक अपनाने और विशेषज्ञों की सलाह मानने से मिलती है। स्थानीय जलवायु और बाजार की मांग के अनुसार फसल चुनें तो कम जमीन-सीमित संसाधनों में भी अच्छी आमदनी संभव है।

जैविक खेती, आधुनिक तकनीक और बेहतर बाजार व्यवस्था से बढ़ेगी किसानों की आय : मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय

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कुनकुरी में जैविक किसान मेला एवं प्राकृतिक खेती कार्यशाला में शामिल हुए मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय

औषधीय एवं सुगंधित फसलों के विपणन हेतु हुआ महत्वपूर्ण अनुबंध, किसानों को मिलेगा बेहतर बाजार

रायपुर- किसानों की समृद्धि ही विकसित भारत और विकसित छत्तीसगढ़ की आधारशिला है। आधुनिक कृषि तकनीकों, बेहतर फसल चयन, प्राकृतिक एवं जैविक खेती तथा सुदृढ़ बाजार व्यवस्था के माध्यम से किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है। कृषि केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और किसानों को समृद्ध बनाए बिना विकास का लक्ष्य पूर्ण नहीं हो सकता। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने आज जशपुर जिले के कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र, कुनकुरी में आयोजित जैविक किसान मेला एवं खेत बचाओ अभियान अंतर्गत प्राकृतिक एवं जैविक खेती कार्यशाला को संबोधित करते हुए यह बात कही। 

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से भूमि की उर्वरता तथा मानव स्वास्थ्य दोनों प्रभावित होते हैं। उन्होंने किसानों से प्राकृतिक एवं जैविक खेती को अपनाने का आह्वान करते हुए कहा कि पूर्व में गोबर खाद, ढैंचा एवं अन्य हरी खादों के उपयोग से खेती अधिक टिकाऊ और भूमि अधिक उपजाऊ रहती थी। आज आवश्यकता है कि परंपरागत ज्ञान और आधुनिक तकनीक का समन्वय कर कृषि को अधिक लाभकारी बनाया जाए।

उन्होंने कहा कि वैश्विक परिस्थितियों और उर्वरकों के आयात पर निर्भरता को देखते हुए नैनो यूरिया और नैनो डीएपी जैसे विकल्प किसानों के लिए उपयोगी सिद्ध हो रहे हैं। इनके उपयोग से उत्पादन लागत कम होती है और मिट्टी की गुणवत्ता भी संरक्षित रहती है।

किसानों को मिला आधुनिक तकनीकों से जुड़ने का अवसर

कार्यक्रम में किसानों को प्राकृतिक खेती, जैविक कृषि, आधुनिक कृषि यंत्रों, ड्रोन तकनीक, पशुपालन, मत्स्य पालन एवं उन्नत कृषि पद्धतियों की जानकारी दी गई। मुख्यमंत्री ने विभिन्न कृषि प्रदर्शनों का अवलोकन कर विशेषज्ञों से जानकारी प्राप्त की तथा किसानों से संवाद भी किया।

कार्यक्रम में ड्रोन के माध्यम से खेतों में दवा छिड़काव का लाइव प्रदर्शन आकर्षण का केंद्र रहा। किसानों ने आधुनिक कृषि तकनीकों को प्रत्यक्ष रूप से देखा और उनके उपयोग से होने वाले लाभों की जानकारी प्राप्त की। साथ ही कृषि नवाचारों, जैविक खेती, पशुपालन एवं मत्स्य पालन से संबंधित जीवंत प्रदर्शनी भी आयोजित की गई।

उत्कृष्ट किसानों का हुआ सम्मान

कार्यक्रम में आयोजित किसान प्रतियोगिता के अंतर्गत उत्कृष्ट कार्य करने वाले किसानों को मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने सम्मानित किया। ग्राम खोंगा (मनोरा) के किसान महेश सिंह को जैविक खेती के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए सम्मानित किया गया। ग्राम लाखाझार के किसान सुखराम को 33 किलोग्राम वजन के कटहल उत्पादन तथा ठेठेटांगर के किसान विजय भूषण को ढाई किलोग्राम वजन के आम उत्पादन के लिए सम्मानित किया गया। मुख्यमंत्री ने स्वामित्व योजना के तहत कृषक गुप्तेश्वर को भूमि पट्टा भी प्रदान किया।

औषधीय एवं सुगंधित फसलों को मिलेगा बेहतर बाजार

कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री की उपस्थिति में जिला प्रशासन जशपुर एवं सेमिना एग्रो प्राइवेट लिमिटेड के बीच औषधीय एवं सुगंधित फसलों के विपणन के लिए महत्वपूर्ण अनुबंध किया गया। इस पहल से जिले के किसानों को अपने उत्पादों के लिए बेहतर बाजार उपलब्ध होगा तथा मूल्य संवर्धन और विपणन की नई संभावनाएं विकसित होंगी। इससे किसानों की आय में वृद्धि के साथ स्थानीय कृषि अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।

किसानों की खुशहाली सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में किसानों की आय बढ़ाने और कृषि को लाभकारी बनाने के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार किसानों से 3100 रुपये प्रति क्विंटल की दर से धान खरीद रही है तथा 21 क्विंटल प्रति एकड़ धान खरीदी की व्यवस्था लागू की गई है। सरकार बनने के तुरंत बाद किसानों को दो वर्षों का लंबित बोनस प्रदान किया गया तथा शून्य प्रतिशत ब्याज पर कृषि ऋण उपलब्ध कराया जा रहा है।

बगिया दाबयुक्त सिंचाई योजना से बदलेगी खेती की तस्वीरमुख्यमंत्री ने बताया कि प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के अंतर्गत चयनित देश की 100 प्रमुख परियोजनाओं में छत्तीसगढ़ की एकमात्र बगिया दाबयुक्त सिंचाई योजना शामिल है। लगभग 119 करोड़ रुपये की लागत वाली इस योजना से 14 गांवों के लगभग 5 हजार हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचाई सुविधा मिलेगी। पाइपलाइन के माध्यम से खेतों तक पानी पहुंचाने वाली इस योजना से भूमि अधिग्रहण की आवश्यकता भी नहीं होगी।

उन्होंने यह भी बताया कि प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना के लिए देश के चयनित 100 जिलों में छत्तीसगढ़ के केवल तीन जिले—दंतेवाड़ा, कोरबा और जशपुर—शामिल किए गए हैं, जिससे जिले के कृषि विकास को नई गति मिलेगी।

सुशासन और डिजिटल सेवाओं से ग्रामीणों को मिल रही सुविधा

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि प्रदेश में सुशासन को और अधिक मजबूत बनाने के लिए गुड गवर्नेंस एवं अभिसरण विभाग का गठन किया गया है। अधिकांश शासकीय कार्य अब ई-ऑफिस प्रणाली के माध्यम से संचालित हो रहे हैं तथा भ्रष्टाचार के मामलों में दोषियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जा रही है।

उन्होंने बताया कि ई-डिस्ट्रिक्ट पोर्टल के माध्यम से 400 से अधिक नागरिक सेवाएं उपलब्ध हैं, जिनका लाभ लोग घर बैठे प्राप्त कर रहे हैं। प्रदेश की 6 हजार ग्राम पंचायतों में अटल डिजिटल सेवा केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं, जहां ग्रामीणों को बैंकिंग एवं डिजिटल सेवाएं उपलब्ध होंगी।

मुख्यमंत्री ने मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1076 की जानकारी देते हुए कहा कि अब नागरिक अपनी शिकायतें और समस्याएं सीधे दर्ज करा सकते हैं। 24×7 संचालित इस व्यवस्था से 42 विभागों के 8 हजार से अधिक अधिकारी जुड़े हैं और प्रत्येक शिकायत के समयबद्ध निराकरण की निगरानी की जा रही है।

कार्यक्रम में पत्थलगांव विधायक एवं सरगुजा आदिवासी विकास प्राधिकरण की उपाध्यक्ष गोमती साय, जशपुर विधायक रायमुनी भगत, अध्यक्ष छत्तीसगढ़ भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार मंडल रामप्रताप सिंह, छत्तीसगढ़ राज्य अंत्यावसायी सहकारी वित्त एवं विकास निगम के अध्यक्ष सुरेन्द्र कुमार बेसरा, जिला पंचायत अध्यक्ष सालिक साय, जिला पंचायत उपाध्यक्ष शौर्य प्रताप सिंह जूदेव,  नगर पालिका जशपुर के उपाध्यक्ष यशप्रतापसिंह जूदेव सहित बड़ी संख्या में किसान, जनप्रतिनिधि एवं अधिकारी-कर्मचारी उपस्थित थे।

सफलता की कहानी-मिलेट से बढ़ी आय, किसानों के जीवन में आई खुशहाली

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श्री अन्न की खेती बन रही लाभ का नया माध्यम

रायपुर- छत्तीसगढ़ और पूरे भारत में मिलेट्स (मोटा अनाज) की खेती किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है। कम लागत, कम पानी और बंजर भूमि में भी बेहतरीन पैदावार देने के कारण मिलेट्स किसानों की आय बढ़ा रहे हैं और उनके जीवन में खुशहाली ला रहे हैं । कभी पारंपरिक भोजन का हिस्सा रहे रागी (मड़िया), कोदो और कुटकी जैसे मोटे अनाज आज पूरी दुनिया में ‘सुपर फूड’ के रूप में पहचान बना चुके हैं। पौष्टिक गुणों से भरपूर ये अनाज अब घरों के साथ-साथ होटलों और रेस्टोरेंटों में भी पसंद किए जा रहे हैं। बढ़ती मांग और बेहतर बाजार मूल्य ने किसानों के लिए मिलेट (श्री अन्न) की खेती को लाभकारी बना दिया है।

शासन की पहल से बढ़ा श्री अन्न का महत्व

केंद्र और राज्य सरकार द्वारा मिलेट फसलों को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए विभिन्न योजनाओं के माध्यम से सहायता प्रदान की जा रही है। समर्थन मूल्य में वृद्धि और बाजार उपलब्धता के कारण अब अधिक किसान श्री अन्न की खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

कृषि उन्नति योजना से मिली नई दिशा

जिले के ग्राम पोटाली और नहाड़ी के दो युवा किसानों ने कृषक उन्नति योजना का लाभ लेकर मिलेट उत्पादन में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। उनकी मेहनत और योजना से मिली सहायता ने उनकी आय में बड़ा बदलाव लाया है।

दिलीप मरकाम ने कोदो-कुटकी से कमाए डेढ़ लाख रुपये

ग्राम पोटाली के धुरवा पारा निवासी किसान दिलीप मरकाम ने इस वर्ष अपने खेत में कोदो-कुटकी की खेती कर लगभग 1 लाख 50 हजार रुपये का लाभ अर्जित किया। वे अपने 17 हेक्टेयर कृषि क्षेत्र में कोदो-कुटकी के साथ धान और सब्जियों का उत्पादन भी करते हैं। दिलीप ने बताया कि उन्होंने इस वर्ष 88 क्विंटल धान बेचकर लगभग 2 लाख 72 हजार रुपये की आय प्राप्त की। खेती को आधुनिक बनाने के लिए उनके पास पावर टिलर जैसे कृषि यंत्र भी उपलब्ध हैं। वे अपनी आय का एक हिस्सा खेती के विकास और नई तकनीकों को अपनाने में निवेश करना चाहते हैं।

हलदर हेमला की मेहनत भी लाई रंग

ग्राम नहाड़ी के किसान हलदर हेमला ने भी कोदो-कुटकी की खेती से उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की। उन्होंने इस फसल से लगभग 1 लाख 20 हजार रुपये का लाभ कमाया। उनका कहना है कि मिलेट की खेती कम लागत में बेहतर आय देने वाली फसल साबित हो रही है।

किसानों के लिए लाभकारी साबित हो रही योजना

दिलीप मरकाम और हलदर हेमला का मानना है कि कृषक उन्नति योजना मोटे अनाज उत्पादक किसानों के लिए बेहद लाभकारी है। योजना के माध्यम से किसानों को प्रोत्साहन मिलने से श्री अन्न की खेती का रकबा बढ़ रहा है और ग्रामीण परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है।

स्वास्थ्य और समृद्धि का संगम है श्री अन्न

कोदो, कुटकी और रागी जैसे मोटे अनाज कैल्शियम, आयरन और फाइबर से भरपूर होते हैं। ये ग्लूटेन मुक्त होने के कारण आसानी से पच जाते हैं तथा स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी हैं। यही कारण है कि इनकी मांग लगातार बढ़ रही है और किसानों को बेहतर मूल्य प्राप्त हो रहा है।

सफलता की सीख

पारंपरिक फसलों को आधुनिक बाजार से जोड़कर किसान अपनी आय बढ़ा सकते हैं। दिलीप मरकाम और हलदर हेमला की सफलता यह साबित करती है कि शासन की योजनाओं और मेहनत के साथ श्री अन्न की खेती ग्रामीण समृद्धि का मजबूत आधार बन सकती है।

बदलती खेती में नैनो यूरिया और नैनो डीएपी बन रहे किसानों की नई पसंद

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कम लागत, बेहतर उत्पादन और मिट्टी की सुरक्षा का नया विकल्प : नैनो उर्वरक

वैज्ञानिक खेती की ओर बढ़ते कदम, नैनो उर्वरकों से किसानों को मिल रहा फायदा

नैनो यूरिया और नैनो डीएपी से खेती में बचत, उत्पादन और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा

रायपुर- खेती में बढ़ती लागत, मिट्टी की घटती उर्वरा शक्ति और रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से पैदा हो रही चुनौतियों के बीच अब नैनो यूरिया और नैनो डीएपी किसानों के लिए एक उपयोगी और लोकप्रिय विकल्प बन गई है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि किसान संतुलित और वैज्ञानिक तरीके से इनका उपयोग करें तो इससे खेती की लागत कम करने, उत्पादन बेहतर बनाने और मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।


विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले समय में खेती को टिकाऊ और लाभकारी बनाए रखने के लिए उर्वरकों के उपयोग के तौर-तरीकों में बदलाव जरूरी होगा। यही कारण है कि अब किसानों के बीच नैनो उर्वरकों को लेकर रुचि बढ़ रही है।

छत्तीसगढ़ सहित देश के अधिकांश धान उत्पादक क्षेत्रों में सामान्यतः प्रति एकड़ 2 से 3 बोरी यूरिया और 1 बोरी डीएपी का उपयोग किया जाता है।

मौजूदा कीमतों के अनुसार एक बोरी यूरिया की कीमत लगभग 270 रुपये और एक बोरी डीएपी की कीमत लगभग 1350 रुपये है। इस प्रकार केवल यूरिया और डीएपी पर प्रति एकड़ करीब 1900 से 2200 रुपये तक खर्च हो जाता है।

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार 500 मिलीलीटर नैनो यूरिया की एक बोतल का प्रभाव लगभग एक बोरी पारंपरिक यूरिया के बराबर माना जाता है। फसल में दो चरणों में छिड़काव के जरिए पारंपरिक यूरिया की जरूरत को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

यदि किसान 2 बोरी ठोस यूरिया की जगह 2 बोतल नैनो यूरिया का उपयोग करते हैं तो अनुमानित खर्च 100 रुपये प्रति एकड़ बचत होती है। दो बोरी पारंपरिक यूरिया का मूल्य लगभग 540 रुपये है। इसके स्थान पर 2 बोतल नैनो यूरिया| लगभग 450-500 में आता है। यानि सीधे खाद लागत में बचत के साथ-साथ परिवहन, भंडारण और मजदूरी खर्च में भी कमी आती है।

इसी प्रकार कृषि विशेषज्ञ मानते हैं कि 50 किलो डीएपी की पूरी मात्रा उपयोग करने के बजाय यदि किसान 25 किलो डीएपी के साथ 500 मिली नैनो डीएपी का उपयोग करें तो प्रति एकड़ लगभग 75 से 150 रुपये तक की बचत होती है।

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार पारंपरिक यूरिया का बड़ा हिस्सा मिट्टी, पानी और वातावरण में नष्ट हो जाता है। इसके विपरीत नैनो यूरिया के सूक्ष्म कण सीधे पौधों द्वारा तेजी से अवशोषित किए जाते हैं। इससे पौधों को संतुलित पोषण मिलता है।

विशेषज्ञों के मुताबिक संतुलित उपयोग की स्थिति में इसके कई सकारात्मक परिणाम सामने आए है।फसल की बढ़वार बेहतर होती है। पौधों की हरियाली लंबे समय तक बनी रहती है। दानों का भराव मजबूत होता है।उत्पादन की गुणवत्ता सुधरती है। उर्वरकों की उपयोग दक्षता बढ़ती है। कई कृषि परीक्षणों में 5 से 8 प्रतिशत तक उत्पादन वृद्धि के संकेत भी मिले हैं।

कृषि क्षेत्र के जानकार बताते हैं कि लगातार अधिक मात्रा में रासायनिक खाद के उपयोग से मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरा शक्ति प्रभावित होती है। नैनो उर्वरकों का संतुलित उपयोग मिट्टी में पोषक तत्वों के संतुलन को बनाए रखने में मदद कर सकता है। इसके अलावा रासायनिक अवशेष कम होते हैं।भूजल प्रदूषण घटता है।मिट्टी की जैविक सक्रियता बेहतर बनी रहती है।पर्यावरणीय प्रभाव कम होता है।इसी कारण वैज्ञानिक खेती में अब संतुलित उर्वरक उपयोग पर अधिक जोर दिया जा रहा है ।

वैज्ञानिक सलाह के अनुसार संतुलित रूप से नैनो उर्वरकों का उपयोग बढ़ाते हैं तोआयातित उर्वरकों पर निर्भरता कम होगी है।विदेशी मुद्रा की बचत भी होगी। देश में उर्वरक उद्योग को बढ़ावा मिलेगा। उत्पादन इकाइयों में रोजगार बढ़ेगा। कृषि क्षेत्र आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ेगा।

कृषि विभाग के अनुसार प्रदेश में पारंपरिक उर्वरकों का पर्याप्त भंडारण उपलब्ध है और किसानों को घबराने की जरूरत नहीं है। रायपुर जिले की समितियों में वर्तमान मे यूरिया की उपलब्धता  9,102 मीट्रिक टन और कुल भंडारित यूरिया की मात्रा 10,732 मीट्रिक टन है, जब कि डीएपी की उपलब्धता 3,092 मीट्रिक टन और कुल भंडारित डीएपी की मात्रा 3,927 मीट्रिक टन है। इसके साथ ही कृषि सेवा केंद्रों और समितियों के माध्यम से नैनो यूरिया और नैनो डीएपी की उपलब्धता भी बढ़ाई जा रही है ताकि किसान आवश्यकता और उपयोगिता के आधार पर इन विकल्पों का इस्तेमाल कर सकें।

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में वैज्ञानिक खेती, संतुलित उर्वरक उपयोग और आधुनिक तकनीकों का समन्वय ही खेती को अधिक लाभकारी बनाएगा। नैनो यूरिया और नैनो डीएपी को इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण तकनीकी विकल्प माना जा रहा है, जो कम लागत, बेहतर उत्पादन और मिट्टी की सुरक्षा तीनों मोर्चों पर किसानों के लिए उपयोगी साबित हो सकता है।

खेत बचाओ अभियान को जन आंदोलन बनाने का आह्वान, 1 जून से शुरू होगा माहभर का अभियान

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केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने “खेत बचाओ अभियान” को केवल जागरूकता कार्यक्रम नहीं, बल्कि खेत, किसान और गांवों को जोड़ने वाला व्यापक राष्ट्रीय अभियान बनाने का संदेश दिया है। आज दिल्ली में अभियान की तैयारियों को लेकर आयोजित उच्च स्तरीय बैठक की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने कहा कि अभियान का मुख्य फोकस उर्वरकों के संतुलित एवं विवेकपूर्ण उपयोग, मौसम संबंधी चुनौतियों के अनुसार किसानों को समय पर सलाह, पंचायत स्तर पर सक्रिय भागीदारी तथा सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे गांवों तक पहुंचाने पर रहेगा।

1 जून से शुरू होने वाले इस एक माह के अभियान को प्रभावी और परिणामोन्मुख बनाने के लिए शिवराज सिंह चौहान ने अधिकारियों को खेतों की सुरक्षा, लागत में संतुलन तथा किसानों को सही समय पर उचित मार्गदर्शन देने पर विशेष ध्यान देने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि यह अभियान ऊपर से नीचे (Top-Down) मॉडल पर नहीं चलेगा, बल्कि पंचायत, राज्य और केंद्र की साझेदारी से संचालित होगा।

बैठक में केंद्रीय मंत्री ने कहा कि रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग को कम करना अभियान का प्रमुख उद्देश्य होगा। किसानों को मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरकों और अन्य कृषि आदानों के संतुलित उपयोग के लिए जागरूक किया जाएगा। साथ ही, हरी खाद, जैविक एवं जैव-उत्पादों के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए प्रेरित किया जाएगा। समेकित पोषक तत्व प्रबंधन (INM) के जीवंत प्रदर्शन भी आयोजित किए जाएंगे।

शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि आने वाले दिनों में मौसम संबंधी चुनौतियों को देखते हुए किसानों को व्यावहारिक सलाह दी जाएगी। उन्हें क्या करें और क्या न करें, उपयुक्त फसल चयन, फसल विविधीकरण तथा जल संकट या जोखिम की स्थिति में खेती के बारे में रचनात्मक सुझाव दिए जाएंगे। अभियान का उद्देश्य केवल संदेश देना नहीं, बल्कि खेत स्तर पर परिस्थितियों के अनुरूप सही सलाह पहुंचाना होगा।

उन्होंने पंचायत स्तर पर अभियान की मजबूत नींव रखने पर जोर देते हुए निर्देश दिया कि कृषि यंत्रीकरण उपकरणों के वितरण तथा विभिन्न सरकारी योजनाओं के लाभों को भी इस अभियान के अंतर्गत पंचायत स्तर तक पहुंचाया जाए।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि यह अभियान केवल विभागीय दायरे तक सीमित नहीं रहेगा। राज्यों के मुख्यमंत्रियों से सहयोग का आग्रह किया जाएगा तथा मंत्रियों, सांसदों, विधायकों और अन्य जनप्रतिनिधियों की भागीदारी सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाएगा, ताकि यह प्रशासनिक कार्यक्रम से आगे बढ़कर जनभागीदारी का सशक्त मॉडल बन सके।

बैठक में बताया गया कि कृषि विज्ञान केंद्र (KVKs) को अभियान में भाग लेने वाली सभी संस्थाओं के प्रमुख समन्वयक की भूमिका सौंपी गई है। अभियान के लिए 1600 से अधिक टीमों का गठन किया गया है। उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग वाले 100 जिलों के लिए 500 विशेष टीमें बनाई गई हैं, जिनमें कृषि विज्ञान केंद्रों, Indian Council of Agricultural Research के संस्थानों, एआईसीआरपी केंद्रों तथा कृषि विभाग के अधिकारी शामिल होंगे। इसके अलावा आईसीएआर संस्थानों और कृषि विज्ञान केंद्रों की 1150 से अधिक बहु-विषयक टीमें भी समानांतर रूप से कार्य करेंगी।

शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि अभियान केवल उर्वरक प्रबंधन तक सीमित नहीं रहेगा। इसके माध्यम से विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ भी खेत तक पहुंचाया जाएगा। किसान क्रेडिट कार्ड, PM-KISAN, दलहन-तिलहन मिशन, ऑयल पाम मिशन, कपास मिशन, संतुलित पोषण, मृदा स्वास्थ्य, जल संरक्षण तथा क्षेत्र-विशिष्ट कृषि सलाह जैसी गतिविधियों को एकीकृत कर अभियान को बहुउद्देशीय और प्रभावी बनाया जाएगा।

उन्होंने कहा कि अभियान की सफलता की कुंजी यह है कि इसका संदेश व्यावहारिक हो, जमीनी स्तर पर दिखाई दे और स्थानीय संस्थाओं की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित हो। अभियान के मूल बिंदु हैं—उर्वरकों का संतुलित एवं कम उपयोग, मौसम के अनुसार खेती की सलाह, पंचायत स्तर पर सक्रियता, कृषि यंत्रों एवं योजनाओं का लाभ तथा जनप्रतिनिधियों की सहभागिता। अभियान की स्पष्ट दिशा है—खेत बचाना, लागत नियंत्रित करना, मिट्टी की गुणवत्ता सुधारना, किसानों को जागरूक बनाना और गांव स्तर पर कृषि प्रबंधन की नई संस्कृति विकसित करना।

अंधाधुंध रासायनिक खेती और पराली का धुआं: क्या हम अपनी ही मौत का सामान उगा रहे हैं?

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महासमुंद- छत्तीसगढ़ को 'धान का कटोरा' कहा जाता है, लेकिन आज इस कटोरे में लालच और रसायनों का जहर घुलता जा रहा है। केशवा (महासमुंद) के किसान और पर्यावरण चिंतक मोहन चंद्राकर ने खेती की वर्तमान स्थिति और पर्यावरण को लेकर एक गंभीर चेतावनी जारी की है। उन्होंने सरकार से मांग की है कि पर्यावरण की सुरक्षा केवल उद्योगों की नहीं, बल्कि किसानों की भी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

मोहन चंद्राकर

मुनाफे की अंधी दौड़ में खो गई परंपरा 

​मोहन चंद्राकर का कहना है कि ज्यादा पैदावार के लालच में किसान खतरनाक रसायनों और खादों का भारी उपयोग कर रहे हैं। इससे न केवल मिट्टी बंजर हो रही है, बल्कि कैंसर जैसी बीमारियां घर-घर पहुंच रही हैं। गाँव से गाय और पारंपरिक गोबर खाद (घुरवा) गायब हो रहे हैं। आज किसान विदेशी रसायनों पर निर्भर है, जिससे देश की मुद्रा और किसान का स्वास्थ्य दोनों बर्बाद हो रहे हैं।

खेतों में जलता 'पैरा' और मौन पर्यावरणविद 

​उन्होंने सवाल उठाया  है कि जब उद्योग प्रदूषण करते हैं, तो सब आवाज उठाते हैं। लेकिन जब किसान खेतों में पराली (पैरा) जलाते हैं, तो पर्यावरणविद चुप क्यों हो जाते हैं? उन्होंने कहा-

  • ​पैरा जलाना एक 'कुकृत्य' है जो आने वाली पीढ़ी का भविष्य जला रहा है।
  • ​किसान फसल की तरह पराली की जिम्मेदारी भी खुद लें।
  • ​पराली को जलाने के बजाय गौशालाओं को दान करें।

सरकार से सख्त कानून की मांग 

​मोहन चंद्राकर ने प्रदेश सरकार से अपील की है कि जैसे उद्योगों के लिए नियम हैं, वैसे ही किसानों के लिए भी हों। उन्होंने सुझाव दिया कि:-

​ धान खरीदी पर रोक : जो किसान खेत में पैरा जलाते हैं, सरकार उनका धान न खरीदे।

​ मिट्टी की सुरक्षा : खेतों से मिट्टी निकालकर अवैध ईंट भट्ठे चलाने वालों पर कड़ी कार्रवाई हो।

​ निगरानी: गाँवों में ईंट पकाने के लिए लकड़ी और भूसे के अवैध इस्तेमाल को रोका जाए।

​ समाधान: प्राकृतिक और जैविक खेती की ओर वापसी 

​प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है जब हमें कोदो, कुटकी, ज्वार, बाजरा और रागी जैसे मोटे अनाजों की ओर लौटना होगा। प्राकृतिक और औषधीय खेती ही पर्यावरण, परंपरा और भारत के गौरव को बचा सकती है। उन्होंने रसायन मुक्त खेती की ओर लौटने का आग्रह किसान भाइयों से किया है।

"जिस दिन प्रकृति हमारे प्रतिकूल हो गई, उस दिन न किसान बचेगा, न अन्न और न ही मानव सभ्यता।" 

— मोहन चंद्राकर, किसान साथी (केशवा, महासमुंद)

यह लेख हर उस किसान के लिए एक आईना है जो मिट्टी को सिर्फ पैसा कमाने का जरिया समझ रहा है। मिट्टी बचेगी, तभी जीवन बचेगा।

परंपरागत खेती छोड़ फूलों की खेती अपनाई, कम लागत में मिला ज्यादा मुनाफा

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एक किसान की सफलता बनी प्रेरणा, गांव के अन्य किसान भी बढ़ा रहे कदम

रायपुर- परंपरागत खेती (गेहूं-धान) की तुलना में फूलों की खेती कम लागत में 3-4 गुना तक अधिक मुनाफा दे रही है। गेंदा, गुलाब और गुलदाउदी जैसे फूलों की 12 महीने मांग होने से किसान हर सीजन में बंपर कमाई कर रहे हैं। कम पूंजी से शुरू होकर, यह व्यवसाय प्रति हेक्टेयर लाखों रुपये का शुद्ध लाभ  दे रहा है, जिससे किसान आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रहे हैं।  शादी, पार्टी, त्यौहार और धार्मिक आयोजनों में फूलों की मांग साल भर बनी रहती है, जिससे अच्छी कीमतें मिलती हैं।

राज्य शासन की योजनाओं का लाभ लेकर रायगढ़ जिले के किसान अब परंपरागत खेती से आगे बढ़ते हुए उद्यानिकी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। इसी कड़ी में लैलूंगा विकासखंड के ग्राम गमेकेरा निवासी किसान ईश्वरचरण पैकरा ने राष्ट्रीय बागवानी मिशन से फूलों की खेती अपनाकर अपनी आमदनी में उल्लेखनीय वृद्धि की है। किसान की सफलता आज सबके लिए प्रेरणा का स्रोत बन रही है।

ईश्वरचरण पैकरा पहले परंपरागत रूप से धान की खेती किया करते थे, जिसमें मेहनत के मुकाबले आय सीमित थी। वर्ष 2025-26 में उन्होंने उद्यानिकी विभाग के मार्गदर्शन में 0.400 हेक्टेयर भूमि पर गेंदा फूल की खेती शुरू की। विभाग द्वारा तकनीकी सहयोग एवं आवश्यक मार्गदर्शन मिलने से उन्होंने वैज्ञानिक पद्धति से खेती की, जिसका परिणाम बेहद सकारात्मक रहा। जहां पहले धान की खेती से उन्हें लगभग 11 क्विंटल उत्पादन मिलता था और सीमित आय होती थी, वहीं फूलों की खेती से उन्हें करीब 38 क्विंटल उत्पादन प्राप्त हुआ। इस उत्पादन से उनकी कुल आमदनी लगभग 3 लाख 4 हजार रुपये तक पहुंच गई। लागत निकालने के बाद उन्हें लगभग 2 लाख 59 हजार रुपये का शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ, जो पारंपरिक खेती की तुलना में कई गुना अधिक है।

फूलों की खेती में सफलता मिलने के बाद ईश्वरचरण पैकरा का आत्मविश्वास बढ़ा है। वे बताते हैं कि कम समय में अधिक लाभ मिलने के कारण अब वे इस खेती को और विस्तार देने की योजना बना रहे हैं। उनके खेत में खिले गेंदा फूलों की रंगीन पंक्तियां आज उनकी मेहनत और सफलता की कहानी बयां करती हैं। उनकी इस उपलब्धि को देखकर गांव के अन्य किसान भी अब उद्यानिकी फसलों की ओर आकर्षित हो रहे हैं और विभाग से संपर्क कर फूलों की खेती अपनाने के लिए प्रेरित हो रहे हैं। इस प्रकार राज्य शासन की योजनाएं न केवल किसानों की आय बढ़ाने में सहायक हो रही हैं, बल्कि कृषि के स्वरूप में भी सकारात्मक बदलाव ला रही हैं।

उत्तर क्षेत्र कृषि सम्मेलन: किसानों की आय बढ़ाने और क्षेत्रीय कृषि विकास पर जोर

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लखनऊ में कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा आयोजित उत्तर क्षेत्र कृषि सम्मेलन में कृषि क्षेत्र के लिए नई दिशा, ठोस कार्ययोजना और किसान-केंद्रित दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया। सम्मेलन में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित कई राज्यों के कृषि मंत्रियों और अधिकारियों ने भाग लिया।

सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि कृषि विकास का अगला चरण तभी सफल होगा जब वैज्ञानिक शोध सीधे किसानों के खेतों तक पहुंचे और सरकारी योजनाओं का लाभ छोटे किसानों को प्रभावी ढंग से मिले। साथ ही, प्रत्येक राज्य को अपनी भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियों के अनुसार स्पष्ट कृषि रोडमैप तैयार करने की आवश्यकता बताई गई।

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि अब एक ही राष्ट्रीय बैठक के बजाय क्षेत्रीय (जोनल) सम्मेलन आयोजित किए जा रहे हैं, जिससे स्थानीय समस्याओं और संभावनाओं पर गहराई से चर्चा संभव हो रही है। उन्होंने उत्तर भारत के राज्यों की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि पंजाब और हरियाणा हरित क्रांति के अग्रणी रहे हैं, जबकि उत्तर प्रदेश खाद्यान्न उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और पर्वतीय राज्यों में बागवानी की अपार संभावनाएं हैं।

उन्होंने देश के सामने तीन प्रमुख लक्ष्य रखे—खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना, किसानों की आय बढ़ाना और पोषक आहार उपलब्ध कराना। इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए उत्पादन बढ़ाने, लागत घटाने, उचित मूल्य दिलाने और कृषि विविधीकरण को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया।

सम्मेलन में उर्वरकों के बढ़ते उपयोग पर चिंता जताते हुए संतुलित खाद के प्रयोग, मिट्टी की सेहत सुधारने और प्राकृतिक खेती को अपनाने की बात कही गई। साथ ही नकली बीज, उर्वरक और कीटनाशकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की जरूरत पर भी बल दिया गया।

कृषि में गुणवत्ता वाले बीजों के महत्व को रेखांकित करते हुए बदलते मौसम और कम वर्षा की स्थिति के अनुसार खेती की योजना बनाने की आवश्यकता बताई गई। इसके अलावा किसानों के लिए किसान क्रेडिट कार्ड और किसान आईडी को सुविधाजनक साधन बताते हुए इनके विस्तार पर जोर दिया गया।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने क्षेत्रीय कृषि सम्मेलनों को व्यावहारिक और परिणामोन्मुखी पहल बताया। उन्होंने कहा कि कृषि विज्ञान केंद्र के माध्यम से वैज्ञानिकों और किसानों के बीच संवाद बढ़ा है, जिससे नई तकनीकों का बेहतर उपयोग हो रहा है। उन्होंने कृषि को उत्पादन तक सीमित न रखते हुए आय बढ़ाने, लागत घटाने और बाजार से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।

सम्मेलन में एकीकृत खेती (इंटीग्रेटेड फार्मिंग) को छोटे किसानों के लिए लाभकारी बताते हुए पशुपालन, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन और बागवानी जैसे क्षेत्रों में विस्तार की सलाह दी गई। साथ ही कृषि को खाद्य प्रसंस्करण और बाजार से जोड़ने पर भी जोर दिया गया।

यह सम्मेलन खरीफ और रबी सीजन के लिए साझा रणनीति तैयार करने का महत्वपूर्ण मंच साबित हुआ, जिसमें वैज्ञानिकों, प्रगतिशील किसानों और विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों ने मिलकर कृषि विकास के लिए सामूहिक संकल्प व्यक्त किया।

PMMSY के तहत सिरसा में खारे पानी की झींगा पालन क्लस्टर की समीक्षा, किसानों की आय बढ़ाने पर जोर

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सिरसा (हरियाणा)- भारत सरकार के मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय के तहत मत्स्य पालन विभाग के सचिव डॉ. अभिलक्ष लिखी ने आज हरियाणा के सिरसा जिले का दौरा कर प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के अंतर्गत विकसित खारे पानी (Saline Water) एक्वाकल्चर क्लस्टर की प्रगति की समीक्षा की। इस दौरान उन्होंने झींगा (श्रिम्प) और मछली किसानों से संवाद कर जमीनी स्तर पर आने वाली समस्याओं और चुनौतियों को समझा।

डॉ. लिखी ने किसानों को संबोधित करते हुए तकनीक आधारित झींगा पालन, वैज्ञानिक तालाब प्रबंधन और मजबूत बायो-सिक्योरिटी उपायों को अपनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सिरसा जैसे खारे पानी वाले क्षेत्र झींगा पालन के लिए बेहद उपयुक्त हैं और इससे किसानों की आय में विविधता, रोजगार सृजन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सकती है। उन्होंने MPEDA को किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन देने और निर्यात से जोड़ने के निर्देश भी दिए। साथ ही, स्थानीय स्तर पर परीक्षण किट की उपलब्धता सुनिश्चित करने पर बल दिया गया ताकि किसानों को दूर नहीं जाना पड़े।

चौधरी देवी लाल विश्वविद्यालय (CDLU) में आयोजित एक समीक्षा बैठक में PMMSY के तहत क्लस्टर आधारित मत्स्य विकास योजनाओं की प्रगति पर चर्चा की गई। इस बैठक में केंद्र और राज्य सरकार के अधिकारी, ICAR के वैज्ञानिक, NABARD, NFDB, MPEDA, मत्स्य किसान, सहकारी संस्थाएं और देशभर के प्रतिनिधि शामिल हुए। 500 से अधिक प्रतिभागियों ने बैठक में हिस्सा लिया। किसानों ने इस दौरान बिजली की ऊंची लागत, गुणवत्तापूर्ण बीज की कमी और पानी की उपलब्धता जैसी समस्याएं उठाईं और पंचायत भूमि को स्वयं सहायता समूहों को लीज पर देने की मांग की।

डॉ. लिखी ने सिरसा के रघुआना गांव में PMMSY के तहत विकसित एक सफल झींगा फार्म का भी दौरा किया। करीब 3 हेक्टेयर में फैले 7 तालाबों वाले इस फार्म से सालाना 28 टन उत्पादन हो रहा है, जिससे लगभग ₹90 लाख का कारोबार और स्थानीय रोजगार सृजन हो रहा है। उन्होंने कहा कि झींगा पालन के विस्तार के लिए बेहतर बीज, फीड, बुनियादी ढांचा और बाजार तक पहुंच को मजबूत करना जरूरी है।

हरियाणा ने PMMSY के तहत उल्लेखनीय प्रगति की है, जहां ₹760.88 करोड़ का निवेश आकर्षित हुआ है। राज्य में 456 RAS और बायोफ्लॉक सिस्टम स्थापित किए गए हैं, जबकि 3,766 हेक्टेयर तालाब और 2,204 हेक्टेयर खारे क्षेत्र में विकास कार्य किए जा रहे हैं। इसके अलावा, सिरसा में ₹110 करोड़ का एकीकृत एक्वापार्क स्थापित किया जा रहा है और कोल्ड-चेन इंफ्रास्ट्रक्चर भी विकसित किया जा रहा है।

भारत का झींगा निर्यात समुद्री उत्पादों का प्रमुख हिस्सा है, जो कुल निर्यात का लगभग 69% है। देश का समुद्री निर्यात पिछले दशक में दोगुना होकर ₹62,408 करोड़ तक पहुंच गया है, जिसमें झींगा का योगदान ₹43,334 करोड़ है।

देश में 34 मत्स्य क्लस्टर विकसित किए जा रहे हैं, जिनमें सिरसा का खारा पानी क्लस्टर एक प्रमुख उदाहरण है। यह क्लस्टर झींगा, स्कैम्पी और सीबास जैसी उच्च मूल्य वाली प्रजातियों के जरिए किसानों की आय बढ़ाने, रोजगार सृजन और संसाधनों के बेहतर उपयोग को बढ़ावा दे रहा है।

भारत का अंतर्देशीय मत्स्य क्षेत्र तेजी से बढ़ रहा है, जो कुल उत्पादन का 75% योगदान देता है। 2013-14 से 2024-25 के बीच उत्पादन 61 लाख टन से बढ़कर 153 लाख टन हो गया है। देश के विशाल जल संसाधनों को देखते हुए मत्स्य पालन क्षेत्र में विकास की अपार संभावनाएं हैं, जिसे सरकार प्राथमिकता दे रही है।

निष्कर्ष: सिरसा का यह मॉडल दर्शाता है कि सही नीति, तकनीक और सहयोग के जरिए खारे और अनुपयोगी क्षेत्रों को भी आय और रोजगार के मजबूत स्रोत में बदला जा सकता है।

आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ा कदम: ICAR का जलवायु-सहिष्णु कृषि पर जोर, गेहूं-जौ अनुसंधान से मजबूत होगी खाद्य सुरक्षा

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नई दिल्ली/करनाल- आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत @2047 के लक्ष्य को आगे बढ़ाते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) देश में संरक्षण कृषि (Conservation Agriculture) और जलवायु-सहिष्णु गेहूं व जौ प्रणाली पर बड़े स्तर पर शोध कर रही है। इसका उद्देश्य खाद्य सुरक्षा को मजबूत करना, किसानों की आय बढ़ाना और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देना है।

ICAR के महानिदेशक एवं DARE के सचिव डॉ. एम.एल. जाट ने आज करनाल स्थित ICAR–गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान (IIWBR) और मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान (CSSRI) का दौरा कर चल रहे शोध कार्यों की समीक्षा की।

उत्पादन और आत्मनिर्भरता पर फोकस

डॉ. जाट ने कहा कि भारत इस वर्ष गेहूं उत्पादन में बेहतर स्थिति में है और न केवल अपनी जरूरतें पूरी कर सकता है बल्कि वैश्विक स्तर पर भी सहयोग देने में सक्षम है।

उन्होंने बताया कि ICAR का मुख्य लक्ष्य जलवायु-सहिष्णु और पोषक तत्वों से भरपूर फसल किस्में विकसित करना है, जिससे किसानों की आय और लोगों का स्वास्थ्य दोनों बेहतर हो सके।

बड़ी उपलब्धियां (Conservation Agriculture)

करनाल में चल रहे शोध से महत्वपूर्ण परिणाम सामने आए हैं:

  • 85% तक सिंचाई जल की बचत

  • 28% तक उर्वरक की कमी

  • 51% ईंधन की बचत

  • 95% तक पराली जलाने में कमी

  • 46% ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी

  • 33% तक उत्पादन में वृद्धि

  • किसानों की आय लगभग दोगुनी

पर्यावरण और मिट्टी की सेहत में सुधार

  • 15 वर्षों में मिट्टी की गुणवत्ता और जैविक कार्बन दोगुना

  • जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता मजबूत

  • कार्बन न्यूट्रल और “वन हेल्थ” लक्ष्य में योगदान

नई तकनीक: BNI (Biological Nitrification Inhibition)

  • उर्वरक उपयोग में 25% तक कमी संभव

  • उत्पादन पर कोई असर नहीं

  • अगर 25% क्षेत्र में लागू किया जाए तो
     हर साल ₹2000 करोड़ की बचत

गेहूं सुरक्षा और अनुसंधान

  • रस्ट (Rust) बीमारी से बचाव के लिए राष्ट्रीय निगरानी कार्यक्रम

  • 30+ संस्थानों का नेटवर्क, 1 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र कवर

  • हर साल 1000 से ज्यादा नई किस्मों का परीक्षण

जलवायु-सहिष्णु किस्में

  • जंगली प्रजातियों (Aegilops) के जरिए
    सूखा, गर्मी और लवणता सहने वाली नई किस्में विकसित

  • अब तक 55 बायोफोर्टिफाइड गेहूं किस्में जारी

  • 45% क्षेत्र में इनका उपयोग

जौ (Barley) की बढ़ती अहमियत

  • कम पानी और उर्वरक की जरूरत

  • स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद (हाई फाइबर)

  • फूड, फीड और इंडस्ट्री में बढ़ती मांग

आधुनिक खेती तकनीक

  • जीरो टिलेज, मशीन से बुवाई, अवशेष प्रबंधन

  • 6–10% उत्पादन बढ़ोतरी

  • 70–75% समय और ईंधन की बचत

निष्कर्ष

ICAR के ये प्रयास न केवल किसानों को सशक्त बना रहे हैं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सतत और आत्मनिर्भर कृषि प्रणाली की ओर भारत को तेजी से आगे बढ़ा रहे हैं।

BIOFACH 2026 में भारत बना “कंट्री ऑफ द ईयर”, ऑर्गेनिक कृषि क्षेत्र को मिली वैश्विक पहचान

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न्यूरेम्बर्ग, जर्मनी- भारत को दुनिया के सबसे बड़े ऑर्गेनिक उत्पाद व्यापार मेले BIOFACH 2026 में “कंट्री ऑफ द ईयर” घोषित किया गया है। यह प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी 10 से 13 फरवरी 2026 तक जर्मनी के न्यूरेम्बर्ग में आयोजित की जा रही है।

भारत की भागीदारी का आयोजन वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के तहत कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) द्वारा किया जा रहा है। इस आयोजन में भारत अपनी समृद्ध कृषि विरासत और वैश्विक स्तर पर ऑर्गेनिक उत्पादों के प्रमुख आपूर्तिकर्ता के रूप में अपनी मजबूत उपस्थिति प्रदर्शित करेगा।

BIOFACH जर्मनी विश्व का सबसे बड़ा और प्रभावशाली ऑर्गेनिक खाद्य और कृषि प्रदर्शनी मंच है। APEDA पिछले एक दशक से इस आयोजन में लगातार भाग ले रहा है और भारत की मजबूत उपस्थिति दर्ज कराता रहा है।

BIOFACH 2026 में भारत की भागीदारी पिछले वर्षों की तुलना में काफी बड़े स्तर पर हो रही है, जो भारतीय ऑर्गेनिक उत्पादों के बढ़ते निर्यात, वैश्विक मांग और निर्यातकों तथा किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) की बढ़ती भागीदारी को दर्शाती है। 14 वर्षों के बाद एक बार फिर भारत का ऑर्गेनिक कृषि क्षेत्र इस मंच पर केंद्र में रहेगा।

इंडिया कंट्री पवेलियन की खासियत

APEDA द्वारा स्थापित इंडिया कंट्री पवेलियन 1,074 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैला होगा, जिसमें 67 सह-प्रदर्शक भाग लेंगे। इनमें ऑर्गेनिक उत्पाद निर्यातक, किसान उत्पादक संगठन, सहकारी संस्थाएं, ऑर्गेनिक लैब, राज्य सरकारी संस्थाएं और कमोडिटी बोर्ड शामिल हैं।

पवेलियन में चावल, तिलहन, जड़ी-बूटियां, मसाले, दालें, काजू, अदरक, हल्दी, बड़ी इलायची, दालचीनी, आम प्यूरी और आवश्यक तेल जैसे कई ऑर्गेनिक उत्पाद प्रदर्शित किए जाएंगे।

देश के 20 से अधिक राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से प्रदर्शक भाग ले रहे हैं, जिनमें असम, मेघालय, मणिपुर, दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, केरल, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, अरुणाचल प्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड शामिल हैं।

भारतीय स्वाद और GI टैग चावल की प्रस्तुति

इंडिया पवेलियन में आगंतुकों को भारतीय ऑर्गेनिक उत्पादों का स्वाद चखाया जाएगा। ऑर्गेनिक बासमती चावल और मसालों से बनी खुशबूदार बिरयानी का लाइव टेस्टिंग भी आयोजित होगी। इसके अलावा इंड्रायणी चावल, नवारा चावल, गोबिंदभोग चावल, रेड राइस और चक-हाओ (ब्लैक राइस) जैसे GI टैग प्राप्त चावल भी प्रस्तुत किए जाएंगे।

वैश्विक ऑर्गेनिक बाजार में भारत की मजबूत स्थिति

BIOFACH 2026 में कंट्री ऑफ द ईयर बनने से वैश्विक स्तर पर ऑर्गेनिक कृषि में भारत की अग्रणी भूमिका और मजबूत हुई है। APEDA भारतीय निर्यातकों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ाने और भारत को दुनिया का ऑर्गेनिक फूड बास्केट बनाने के लिए लगातार सहयोग कर रहा है।


उद्यानिकी खेती से बदली किसान की आर्थिक तस्वीर

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धान की तुलना में स्ट्रॉबेरी की खेती में डबल मुनाफा

तकनीकी मार्गदर्शन, शासन की सब्सिडी से घटा खर्च, बढ़ी आमदनी

रायपुर- जिले में शासन की उद्यानिकी प्रोत्साहन योजनाओं से किसान अब परंपरागत खेती की सीमाओं को तोड़कर नई संभावनाओं की ओर आगे बढ़ रहे हैं। अब किसान केवल धान पर निर्भर न रहकर अधिक लाभ देने वाली  फसलों को अपना रहे हैं। किसान लाल बहादुर सिंह बताया कि ढाई एकड़ में स्ट्रॉबेरी की खेती करने में लगभग 2 लाख रुपये की लागत आई है। इससे उन्हें करीब 9 लाख रुपये की आमदनी होने का अनुमान है।

सरगुजा जिले के भगवानपुरखुर्द निवासी किसान लाल बहादुर सिंह ने भी इसी सोच के साथ खेती में नवाचार अपनाया और आज वे एक सशक्त, आत्मनिर्भर एवं उन्नत किसान के रूप में अपनी पहचान बना चुके हैं।

धान से उद्यानिकी की ओर किया सफल बदलाव

कृषक लाल बहादुर सिंह ने बताया कि वर्षों से धान की खेती करने के बाद भी अपेक्षाकृत सीमित लाभ ही मिल पाता था। लागत बढ़ने और मौसम पर निर्भरता के कारण मुनाफा कम हो जाता था। इसी बीच उद्यानिकी विभाग के अधिकारियों ने उन्हें स्ट्रॉबेरी जैसी उच्च मूल्य वाली फसल की जानकारी दी और इसके फायदे समझाए। इससे उन्हें अपनी खेती में बदलाव करने की प्रेरणा मिली।

छोटे क्षेत्र से शुरुआत, बड़े रकबे तक विस्तार

उन्होंने बताया कि स्ट्रॉबेरी की खेती की शुरुआत उन्होंने मात्र 50 डिसमिल क्षेत्र से की थी। लाभ मिलने पर अगले वर्ष एक एकड़ में खेती की और फिर तीसरे व चौथे वर्ष इसे बढ़ाकर ढाई एकड़ तक कर दिया। वर्तमान में वे ढाई एकड़ क्षेत्र में स्ट्रॉबेरी की सफल खेती कर रहे हैं, जिससे उन्हें अच्छी आमदनी प्राप्त हो रही है।

स्ट्रॉबेरी की खेती में लागत कम अधिक मुनाफा

कृषक सिंह ने बताया कि ढाई एकड़ में स्ट्रॉबेरी की खेती करने में लगभग 2 लाख रुपये की लागत आई है। इससे उन्हें करीब 9 लाख रुपये की आमदनी होने का अनुमान है। लागत निकालने के बाद लगभग 7 लाख रुपये का शुद्ध लाभ प्राप्त हो रहा है। उन्होंने बताया कि यही ढाई एकड़ यदि धान की खेती में लगाया जाता, तो लगभग 90 क्विंटल उत्पादन होता, जिससे शासकीय उपार्जन केन्द्र में बेचने पर करीब 3 लाख रुपये की आमदनी होती। धान की खेती में लगभग 1 लाख रुपये की लागत आने के बाद शुद्ध लाभ मात्र 2 लाख रुपये के आसपास ही रहता।

उद्यानिकी में सब्सिडी से घटा खर्च, बढ़ा लाभ

किसान लाल बहादुर सिंह ने बताया कि उद्यानिकी विभाग की इस योजना के अंतर्गत पौध, खाद और बीज की राशि डीबीटी के माध्यम से वापस कर दी जाती है। उन्हें लगभग 80 से 85 हजार रुपये तक की सब्सिडी प्राप्त होगी। विभाग द्वारा समय-समय पर तकनीकी मार्गदर्शन भी दिया जाता है, जिससे खेती और अधिक सफल हो रही है।

अधिकारियों का मार्गदर्शन बना सफलता की कुंजी

लाल बहादुर सिंह ने बताया कि वे पौधे स्वयं मंगवाते हैं और उद्यानिकी विभाग द्वारा निर्धारित मापदंडों के अनुसार खेती करते हैं। विभागीय अधिकारियों द्वारा खेत का निरीक्षण कर आवश्यक सलाह दी जाती है, जिससे उत्पादन की गुणवत्ता और मात्रा दोनों में सुधार होता है और बाजार में अच्छी कीमत मिल जाती है।

अन्य किसानों के लिए प्रेरणा बने लाल बहादुर सिंह

लाल बहादुर सिंह ने कहा कि शासन की उद्यानिकी योजना से अन्य किसान भी लाभ ले सकते हैं। धान जैसी पारंपरिक फसलों के साथ-साथ उद्यानिकी फसलों को अपनाकर किसान अपनी आमदनी कई गुना बढ़ा सकते हैं। आज वे स्वयं उद्यानिकी खेती से सशक्त और आत्मनिर्भर बने हैं तथा अन्य किसानों को भी इस दिशा में प्रेरित कर रहे हैं।

उद्यानिकी प्रोत्साहन के लिए शासन का जताया आभार

किसान लाल बहादुर सिंह ने उद्यानिकी खेती को प्रोत्साहित करने के लिए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि शासन की योजनाओं से प्रदेश का किसान आज सशक्त, आत्मनिर्भर और उन्नत कृषक बन रहा है।

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