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सफलता की कहानी- तेन्दूपत्ता संग्रहण की नई पहल से अबुझमाड़ के 22 गांवों को मिला लाभ

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गांव के पास खुला फड़, 365 संग्राहकों को मिला सीधा आर्थिक लाभ

रायपुर- छत्तीसगढ़ शासन की नई तेन्दूपत्ता संग्रहण नीति अबुझमाड़ के दूरस्थ गांवों के लिए राहत और रोजगार का नया माध्यम बन गई है। वर्ष 2026 में पहली बार असीमांकित क्षेत्रों में नए तेन्दूपत्ता फड़ खोले गए, जिससे ग्रामीणों को अपने गांव के पास ही तेन्दूपत्ता बेचने की सुविधा मिली।

पहले ग्रामीणों को तेन्दूपत्ता बेचने के लिए दूर-दूर तक जाना पड़ता था। अब गांव के पास फड़ खुलने से उनका समय, श्रम और खर्च बचा है। साथ ही स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी बढ़े हैं। ग्रामीणों ने इस पहल पर खुशी जताते हुए कहा कि इससे उनकी आय बढ़ी है और काम करना पहले की तुलना में आसान हुआ है।

राज्य शासन ने वर्ष 2026 के लिए तेन्दूपत्ता की दर 5,500 रुपये प्रति मानक बोरा निर्धारित की है। इससे ग्रामीणों में तेन्दूपत्ता संग्रहण के प्रति उत्साह बढ़ा। ग्रामीणों की मांग पर वन मंत्री केदार कश्यप के निर्देशानुसार अबुझमाड़ क्षेत्र में नए फड़ खोलने की प्रक्रिया तेज की गई। वन विभाग ने सभी आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कर छत्तीसगढ़ राज्य लघु वनोपज संघ से अनुमति प्राप्त की और संग्रहण कार्य शुरू कराया।

इस पहल के तहत कलमानार, ओकपाड़, कुतुल, निरामेटा, कोडकानार, कानागांव, कच्चापाल, टेकानार, बांहकेर और रायनार में कुल 10 नए तेन्दूपत्ता फड़ स्थापित किए गए। इन फड़ों के माध्यम से 22 गांवों के 365 संग्राहकों ने 161.254 मानक बोरा तेन्दूपत्ता का संग्रहण किया।

संग्राहकों को तेन्दूपत्ता के बदले 8 लाख 86 हजार 897 रुपये की राशि डीबीटी (डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर) के माध्यम से सीधे उनके बैंक खातों में भेजी गई। समय पर और पारदर्शी भुगतान मिलने से ग्रामीणों का शासन पर भरोसा और मजबूत हुआ है।


इस योजना से कलमानार, पिड़का, ब्रेहबेड़ा, कंदाड़ी, किशकाल, ओकपाड़, कुतुल, आलबेड़ा, निरामेटा, कोडकानार, कानागांव, कच्चापाल, ताड़ोकुर, टेकानार, नयापारा, मकसोली, हिकपुला, बांहकेर, झोरीगांव, रेंगाबेड़ा, कोकोड़ी और रायनार सहित कुल 22 गांवों के ग्रामीण लाभान्वित हुए हैं।

छत्तीसगढ़ शासन की यह पहल केवल तेन्दूपत्ता संग्रहण तक सीमित नहीं है, बल्कि दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी और ग्रामीण परिवारों को स्थानीय रोजगार, बेहतर आय और आर्थिक सशक्तिकरण से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। अबुझमाड़ के ग्रामीणों के लिए यह पहल आत्मनिर्भरता और विकास की नई उम्मीद बनकर उभरी है।

अबूझमाड़ में कॉफी की खुशबू से बदलेगी तस्वीर: सतत खेती से आदिवासी समुदायों को मिलेगा नया रोजगार

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रायपुर- छत्तीसगढ़ के सबसे दुर्गम और वनाच्छादित क्षेत्रों में शामिल अबूझमाड़ अब विकास की नई दिशा में कदम बढ़ा रहा है। वर्षों तक भौगोलिक दुर्गमता और वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित रहे इस क्षेत्र में अब कॉफी की खेती के माध्यम से स्थानीय आदिवासी समुदायों के लिए रोजगार और आय के नए अवसर तैयार करने की पहल शुरू की गई है।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व वाली राज्य सरकार की दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों में आजीविका बढ़ाने की नीति के तहत नारायणपुर जिला प्रशासन ने अबूझमाड़ के चयनित वन ग्रामों में कॉफी की खेती शुरू करने की तैयारी शुरू कर दी है।

इसी क्रम में नारायणपुर कलेक्टर नम्रता जैन ने कॉफी बोर्ड ऑफ इंडिया के विशेषज्ञों के साथ कुटुल, कच्छपाल, कोडलीयार, इराकभट्टी और टोके जैसे गांवों का दौरा कर वहां की जलवायु, मिट्टी, वर्षा, तापमान और ऊंचाई का वैज्ञानिक अध्ययन कराया।

विशेषज्ञों की प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार, अबूझमाड़ की प्राकृतिक परिस्थितियां कॉफी आधारित कृषि-वनीकरण (Agroforestry) के लिए अनुकूल हैं। परियोजना के पहले चरण में उपयुक्त भूमि की पहचान, पौधशालाओं (नर्सरी) की स्थापना और किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसके बाद चरणबद्ध तरीके से कॉफी के पौधे लगाए जाएंगे।

कॉफी बोर्ड ऑफ इंडिया पूरे प्रोजेक्ट के दौरान तकनीकी मार्गदर्शन देगा, जिसमें नर्सरी विकास, पौधरोपण, फसल प्रबंधन और किसानों का प्रशिक्षण शामिल होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि बस्तर क्षेत्र की जलवायु, पर्याप्त वर्षा, उपजाऊ वन भूमि और प्राकृतिक छायादार वातावरण जैविक (ऑर्गेनिक) कॉफी उत्पादन के लिए बेहद उपयुक्त हैं। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (आईजीकेवी), जगदलपुर द्वारा प्रकाशित तकनीकी अध्ययन में भी बस्तर को कॉफी उत्पादन के लिए संभावनाओं से भरपूर क्षेत्र बताया गया है।

कॉफी आधारित कृषि से पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा। छायादार पेड़ मिट्टी का कटाव रोकने, जैव विविधता बनाए रखने, पोषक तत्वों के संरक्षण और प्राकृतिक पारिस्थितिकी को मजबूत करने में सहायक होंगे।

जिला प्रशासन का मानना है कि लगभग चार वर्षों के बाद कॉफी का व्यावसायिक उत्पादन शुरू हो सकता है। इसके बाद स्थानीय लोगों को कॉफी उत्पादन, नर्सरी, पौधरोपण, रखरखाव, तुड़ाई और प्रसंस्करण जैसे कार्यों में स्थायी रोजगार के अवसर मिलेंगे। स्वयं सहायता समूहों (SHGs) की भी इस परियोजना में महत्वपूर्ण भूमिका होगी।

नारायणपुर कलेक्टर नम्रता जैन ने कहा कि प्रशासन का उद्देश्य अबूझमाड़ की प्राकृतिक संपदा का संरक्षण करते हुए विकास को बढ़ावा देना है। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक योजना और स्थानीय समुदायों की भागीदारी से कॉफी की खेती इस क्षेत्र के लिए दीर्घकालिक और टिकाऊ आजीविका का मजबूत आधार बन सकती है।

इसके अलावा भविष्य में अबूझमाड़ के उपयुक्त क्षेत्रों में चाय की खेती की संभावनाओं का भी अध्ययन किया जाएगा। इसके लिए चरणबद्ध कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं।

यदि यह परियोजना सफल होती है, तो अबूझमाड़ में कॉफी की खेती केवल आर्थिक विकास का माध्यम नहीं बनेगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और आदिवासी समुदायों के सतत विकास का एक नया मॉडल भी स्थापित करेगी।

अबूझमाड़ में फैल रही है शिक्षा की रौशनी

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आज़ादी के बाद पहली बार अबूझमाड़ के अति दूरस्थ गांव कारकाबेड़ा में खुला नया प्राथमिक स्कूल

 नदी-नाले और पहाड़ पार कर 5 घंटे पैदल चलकर अधिकारियों ने कराया दाखिला

रायपुर- देश के गृह मंत्री अमित शाह के कुशल नेतृत्व एवं मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के सुशासन में छत्तीसगढ़ का अबूझमाड़ क्षेत्र अब नक्सलवाद के अंधेरे से निकलकर शिक्षा की नई रोशनी की ओर बढ़ रहा है। इसका सबसे सुखद और ऐतिहासिक परिणाम नारायणपुर जिले के अति दूरस्थ ग्राम कारकाबेड़ा में देखने को मिला है, जहां आजादी के बाद पहली बार किसी स्कूल की स्थापना हुई है। कभी नक्सलियों का गढ़ रहे इस इलाके में अब बच्चों को बंदूक की जगह कलम और किताबें मिल रही हैं।

जनसमस्या शिविर से खुला विकास का रास्ता

​हाल ही में अबूझमाड़ के सुदूर क्षेत्र कोड़ेनार में एक जनसमस्या निवारण शिविर का आयोजन किया गया था। इस शिविर में कारकाबेड़ा के ग्रामीणों ने अपने बच्चों के भविष्य के लिए गांव में ही स्कूल खोलने की पुरजोर मांग की थी। कलेक्टर  ने मामले की संवेदनशीलता और महत्ता को देखते हुए तत्परता दिखाई और जिला शिक्षा अधिकारी (DEO)  को तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए।

​5 घंटे की पैदल यात्रा और सर्वे

​कलेक्टर के निर्देश पर शिक्षा विभाग की टीम ने सबसे पहले कारकाबेड़ा गांव का सर्वे किया, जिसमें 20 बच्चे प्राथमिक शिक्षा के योग्य पाए गए। इसके बाद खंड शिक्षा अधिकारी,खंड स्रोत समन्वयक, संकुल समन्वयक, सरपंच और शिक्षकों की संयुक्त टीम ने अदम्य साहस का परिचय दिया। यह टीम दुर्गम रास्तों, कई नदी-नालों और पहाड़ियों को पार करते हुए लगभग 5 घंटे की कठिन पैदल यात्रा कर कारकाबेड़ा पहुंची और नवीन प्राथमिक शाला का औपचारिक शुभारंभ किया।

मुफ्त गणवेश और शिक्षण सामग्री का वितरण

​स्कूल के पहले ही दिन बच्चों के चेहरों पर एक अलग ही चमक थी। जिला प्रशासन द्वारा स्कूल प्रारंभ होने के साथ ही सभी 20 बच्चों को ​निःशुल्क गणवेश,​पाठ्यपुस्तकें और स्लेट,पेंसिल, श्यामपट्ट (ब्लैकबोर्ड) तथा अन्य आवश्यक शैक्षणिक सामग्रियां उपलब्ध कराई गईं।

कारकाबेड़ा सरपंच रामूराम वड्डे ने कहा कि गांव में स्कूल खुलना हमारे लिए किसी सपने के सच होने जैसा है। अब हमारे बच्चों को पढ़ने के लिए जान जोखिम में डालकर दूर नहीं जाना पड़ेगा।

अतिथि शिक्षक की व्यवस्था,पड़ोसी गांवों को भी मिलेगा लाभ

​वर्तमान में इस स्कूल के सुचारू संचालन के लिए जिला प्रशासन द्वारा एक स्थानीय अतिथि शिक्षक की व्यवस्था की गई है। अधिकारियों के मुताबिक, आने वाले समय में कारकाबेड़ा के इस स्कूल का लाभ आसपास के अन्य दूरस्थ गांवों, जैसे मरकूड़ के बच्चों को भी मिलेगा।

नक्सलवाद के खात्मे के बाद अबूझमाड़ के इस अंदरूनी इलाके में स्कूल खुलना केवल एक प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि क्षेत्र में शिक्षा के विस्तार और शांति बहाली की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है।

दशकों का अँधेरा टूटा, अबूझमाड़ के ईरपानार गाँव में पहली बार पहुँची बिजली

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रायपुर- कभी नक्शे पर नाम भर रह गया ईरपानार आज उम्मीदों की नई पहचान बन गया है। अबूझमाड़ के गहरे जंगलों, ऊंचे पहाड़ों और दुर्गम पगडंडियों के बीच बसे इस छोटे से गांव में पहली बार बिजली पहुँची है। वर्षों तक अंधेरे में जीवन गुजारने वाले ग्रामीणों के घरों में जब पहली बार बल्ब जले, तो गांव ने सिर्फ उजाला नहीं देखा, बल्कि विकास को महसूस किया।

ईरपानार नारायणपुर जिला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर दूर स्थित है, लेकिन यह दूरी सामान्य रास्ते जैसी नहीं है। यहां तक पहुंचने के लिए कच्चे मार्ग, पहाड़ी चढ़ाई, घने वन क्षेत्र और कई स्थानों पर पैदल सफर करना पड़ता है। बरसात के मौसम में संपर्क और भी कठिन हो जाता है।

छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड, नारायणपुर संभाग ने इस चुनौतीपूर्ण कार्य को प्राथमिकता से पूरा किया। कार्यपालन अभियंता सहित विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों ने कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद मिशन मोड में काम कर सफलता हासिल की।

घने जंगलों के बीच चला विकास अभियान 

कलेक्टर नम्रता जैन ने बताया कि ईरपानार तक बिजली पहुंचाना सामान्य तकनीकी कार्य नहीं था। कई हिस्सों में बिजली खंभे, तार और सामग्री पहुंचाने के लिए कठिन श्रम करना पड़ा। टीम को ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी रास्तों, जंगलों और सीमित संसाधनों के बीच काम करना पड़ा। कई स्थानों पर मशीनों की बजाय मानव श्रम और स्थानीय सहयोग से सामग्री पहुंचाई गई।बिजली लाइन विस्तार, पोल स्थापना और कनेक्शन कार्य को समयबद्ध तरीके से पूरा कर विभागीय टीम ने मिसाल पेश की है।

₹56.11 लाख की लागत, लेकिन असर पीढ़ियों तक

ग्राम ईरपानार के विद्युतीकरण कार्य पर कुल ₹56.11 लाख की लागत आई। इस परियोजना के तहत गांव के परिवारों को पहली बार विद्युत कनेक्शन प्रदान किया गया , एवं उस सोच का प्रतीक है जिसमें अंतिम छोर पर बसे परिवार को भी विकास का समान अधिकार दिया जा रहा है।

अब बच्चों के सपनों को मिलेगा उजाला

बिजली आने से अब गांव के बच्चों को रात में पढ़ाई के लिए रोशनी मिलेगी। मोबाइल चार्जिंग जैसी सामान्य सुविधा, जो शहरों में सहज है, अब यहां भी उपलब्ध होगी। पंखे, लाइट और छोटे घरेलू उपकरणों से जीवन आसान होगा।

भविष्य में डिजिटल शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, संचार सुविधाओं और छोटे व्यवसायों के अवसर भी विकसित हो सकते हैं।

ग्रामीणों की आंखों में दिखी खुशी 

जब पहली बार गांव में बल्ब जले, तो बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर चेहरे पर उत्साह दिखाई दिया। कई ग्रामीणों ने कहा कि उन्होंने अपने घरों में पहली बार स्थायी रोशनी देखी है। वर्षों से लालटेन, लकड़ी और सीमित साधनों पर निर्भर जीवन अब बदलने लगा है।

ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन और बिजली विभाग की टीम के प्रति आभार जताया। लोगों ने इसे गांव के लिए ऐतिहासिक दिन बताया।

अबूझमाड़ में बदलाव की नई शुरुआत 

ईरपानार जैसे अन्य दूरस्थ गांवों को भी प्राथमिकता के आधार पर बिजली, सड़क, पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका सुविधाओं से जोड़ा जा रहा है।

अबूझमाड़ की धरती से देश-दुनिया को दिया जा रहा है अमन और शांति का मजबूत संदेश: मुख्यमंत्री साय

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अबूझमाड़ पीस हाफ मैराथन: शांति, विश्वास और विकास का सामूहिक दौड़

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने नारायणपुर में अबूझमाड़ पीस हॉफ मैराथन को दिखाई हरी झंडी

10 हजार से अधिक प्रतिभागियों ने लगाई दौड़, आत्मसमर्पित नक्सली भी बने आयोजन का हिस्सा

रायपुर- अबूझमाड़ की पावन धरती से शांति, सद्भाव और विकास का सशक्त संदेश देते हुए आज अबूझमाड़ पीस हाफ मैराथन 2026 का भव्य एवं ऐतिहासिक आयोजन किया गया। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने आज अलसुबह नारायणपुर के हाईस्कूल परिसर के समीप आयोजित हाफ मैराथन सहभागिता की और धावकों को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया तथा सांकेतिक रूप से स्वयं भी दौड़ लगाई। इस दौरान मुख्यमंत्री ने विजयी प्रतिभागियों को प्रदान किए जाने वाले मैडल का अनावरण भी किया। 

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि आज अबूझमाड़ की धरती से पूरे देश और दुनिया को अमन और शांति का मजबूत संदेश दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यह वही अबूझमाड़ है, जहाँ कभी आम नागरिकों और जवानों का पहुँचना भी कठिन था, लेकिन आज सकारात्मक वातावरण के कारण हजारों लोग यहाँ एकत्रित हुए हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि बस्तर में माओवाद से मुक्ति की दिशा में युवा वर्ग का जोश और उत्साह यह संकेत दे रहा है कि जल्द ही यह क्षेत्र खुशियों से आबाद होगा।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि यह परिवर्तन डबल इंजन सरकार की नीतियों और नेतृत्व का परिणाम है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के संकल्प और दृढ़ इच्छाशक्ति का उल्लेख करते हुए कहा कि 31 मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद के समूल उन्मूलन का लक्ष्य तय किया गया है और बस्तर लाल आतंक से पूरी तरह मुक्त होगा। उन्होंने नक्सलवाद के विरुद्ध संघर्ष में लगे सुरक्षा बलों के अधिकारियों एवं जवानों के अदम्य साहस और पराक्रम को नमन करते हुए कहा कि उन्हीं के बलिदान और समर्पण से आज बस्तर क्षेत्र में शांति और विकास की मजबूत नींव पड़ी है।

मुख्यमंत्री ने जानकारी दी कि हाल ही में बस्तर क्षेत्र में 351 करोड़ रुपये के विकास कार्यों का लोकार्पण एवं भूमिपूजन किया गया है तथा नए विकास कार्यों की घोषणा भी की गई है। उन्होंने कहा कि नक्सलवाद के कारण यह क्षेत्र पिछले चार दशकों से विकास से वंचित रहा, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा और बस्तर में विकास की गंगा निरंतर बहेगी। उन्होंने सम्पूर्ण बस्तर और छत्तीसगढ़ को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के सरकार के संकल्प को दोहराया।

उल्लेखनीय है कि यह 21 किलोमीटर लंबी हाफ मैराथन नारायणपुर से बासिंग तक आयोजित की गई, जिसमें देश-विदेश से आए 60 से अधिक विदेशी प्रतिभागियों सहित बस्तर संभाग, प्रदेश एवं अन्य राज्यों के 10 हजार से अधिक धावकों ने भाग लिया। मैराथन से पूर्व हाईस्कूल परिसर में जुंबा वॉर्मअप कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें हजारों प्रतिभागियों ने एक साथ उत्साहपूर्वक सहभागिता की। 

आत्मसर्पित माओवादी बने मैराथन का हिस्सा

इस आयोजन की सबसे विशेष और ऐतिहासिक बात यह रही कि आत्मसमर्पित माओवादी युवाओं ने भी हथियार छोड़कर शांति और मुख्यधारा में लौटने का संदेश देते हुए मैराथन में हिस्सा लिया। नारायणपुर की अबूझमाड़िया जनजाति सहित स्थानीय समुदाय की सक्रिय भागीदारी ने इस आयोजन को और अधिक प्रभावशाली एवं प्रेरणादायी बनाया।

कार्यक्रम में वन एवं पर्यावरण मंत्री एवं क्षेत्रीय विधायक केदार कश्यप, जिले के प्रभारी मंत्री टंकराम वर्मा, बस्तर सांसद महेश कश्यप, छत्तीसगढ़ राज्य लघु वनोपज संघ के अध्यक्ष रूपसाय सलाम, वैद्यराज पद्मश्री हेमचंद मांझी, मुख्यमंत्री के सचिव राहुल भगत, बस्तर कमिश्नर डोमन सिंह, आईजी पी. सुंदरराज, कलेक्टर नम्रता जैन, पुलिस अधीक्षक राबिनसन गुरिया, जिला सीईओ आकांक्षा शिक्षा खलखो सहित जनप्रतिनिधि, प्रशासनिक अधिकारी एवं बड़ी संख्या में नागरिक उपस्थित रहे।

अबूझमाड़ के जंगलों से निकला सुशासन का उजाला

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कच्चापाल की महिलाओं ने रच दी आत्मनिर्भरता की मिसाल, जैविक बासमती से बदली तकदीर

रायपुर-कभी नक्सल हिंसा और भय के साये में जीवन जीने वाले नारायणपुर जिले के ओरछा विकासखण्ड के अबूझमाड़ क्षेत्र के ग्राम कच्चापाल में अब सुशासन और आत्मनिर्भरता की किरणें पहुँच चुकी हैं। यह वही इलाका है जहाँ कभी बम धमाकों की गूँज और बंदूकों की आवाज़ें विकास के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा थीं। सड़क, बिजली, पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित यह गांव अब नियद नेल्ला नार योजना के तहत विकास की मुख्यधारा से जुड़ चुका है।

राज्योत्सव के भव्य मंच पर इस परिवर्तन की गूंज सुनाई दी जब कच्चापाल के आश्रित ग्राम ईरकभट्टी की दो महिलाएँ – मांगती गोटा और रेनी पोटाई – अपने हाथों से उगाई गई जैविक बासमती चावल लेकर राजधानी पहुँचीं। ये महिलाएँ राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (बिहान) के लालकुंवर स्व-सहायता समूह से जुड़ी हैं। कभी शहर का नाम तक न जानने वाली ये महिलाएँ आज अपने गाँव की पहचान बन चुकी हैं।

एरिया कोऑर्डिनेटर सोधरा धुर्वे बताती हैं कि पहले इस क्षेत्र में लाल आतंक के कारण कोई सरकारी योजना पहुँच ही नहीं पाती थी। ग्रामीणों के पास बाजार की जानकारी नहीं थी, और बिचौलिए उनके उत्पादों को औने-पौने दामों पर खरीदकर मुनाफा कमा लेते थे। लेकिन सशस्त्र बलों के कैम्प लगने और शासन की सक्रिय पहल से जब ‘नियद नेल्ला नार’ योजना के तहत बिहान समूहों का गठन हुआ, तो हालात बदलने लगे। महिलाओं में बचत की आदत और आत्मनिर्भरता का भाव बढ़ा।

मांगती गोटा बताती हैं, “हम हमेशा से बिना रासायनिक खाद के जैविक तरीके से बासमती चावल उगाते रहे हैं। पहले बिचौलिए हमसे 15–20 रुपये किलो में चावल ले जाते थे। लेकिन बिहान योजना से जुड़ने और प्रशिक्षण मिलने के बाद हमें असली कीमत का पता चला। आज राज्योत्सव में हमारे चावल की कीमत 120 रुपये किलो मिल रही है। लोग इसे शुद्ध और जैविक जानकर बहुत उत्साह से खरीद रहे हैं।”

रेनी पोटाई बताती हैं कि उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा भी हमारे गाँव आये थे तो हमारी समूह की महिलाओं को प्रोत्साहित किया था। “इस बार हमने सिर्फ चावल नहीं, बल्कि बाँस की टोकनी और झाड़ू भी तैयार किए हैं। हमारे समूह ने इस साल 40 क्विंटल जैविक बासमती चावल का उत्पादन किया है,” उन्होंने मुस्कराते हुए बताया।

आज कच्चापाल और उसके आसपास के ग्रामों में महिलाओं की मेहनत और शासन की योजनाओं का फल साफ दिखाई दे रहा है। नक्सल प्रभावित इलाका अब आत्मनिर्भरता, रोजगार और शांति का प्रतीक बन चुका है। कभी अंधेरे में डूबे इन ग्रामों में अब सुशासन का सवेरा सचमुच उतर आया है — और यह कहानी है उस परिवर्तन की, जो भय से विश्वास और गरीबी से समृद्धि तक का सफर तय कर रही है।कच्चापाल की महिलाओं के साहस, स्वावलंबन और नवछत्तीसगढ़ की नई सुबह की यह सच्ची कहानी अन्य महिलाओं को आगे बढ़ने और आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा दे रही है।

उत्तर बस्तर और अबूझमाड़ हुए नक्सलमुक्त — बस्तर में शांति और विकास का नया युग : मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय

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हिंसा की राह देती है अंतहीन दर्द, आत्मसमर्पण देता है जीवन को नई दिशा- मुख्यमंत्री साय

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में नक्सल उन्मूलन अभियान ऐतिहासिक सफलता की ओर

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि उत्तर बस्तर और अबूझमाड़ का नक्सलमुक्त होना यह प्रमाण है कि अब बस्तर भय नहीं, बल्कि विश्वास और विकास की नई पहचान बन चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में भारत आज नक्सलवाद के अंत की दहलीज़ पर खड़ा है।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि बीते दो दिनों में 258 नक्सलियों का आत्मसमर्पण इस बात का प्रतीक है कि बंदूक नहीं, बल्कि विश्वास की शक्ति जीत रही है। उन्होंने कहा कि बीते 22 महीनों में छत्तीसगढ़ में 477 नक्सली मारे गए, 2110 ने आत्मसमर्पण किया और 1785 गिरफ्तार हुए — यह आँकड़े हमारे राज्य को नक्सलमुक्त बनाने के अडिग संकल्प के साक्षी हैं।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि 31 मार्च 2026 तक छत्तीसगढ़ को पूरी तरह नक्सलमुक्त बनाने का लक्ष्य अब बहुत निकट है। यह परिवर्तन राज्य सरकार की “नक्सलवादी आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति 2025” तथा “नियद नेल्ला नार योजना” की सफलता का प्रत्यक्ष परिणाम है। डबल इंजन सरकार की संवेदनशील नीतियों, बस्तर में लगातार स्थापित हो रहे सुरक्षा शिविरों और वनांचलों में शासन के प्रति बढ़ते विश्वास ने इस सकारात्मक परिवर्तन को संभव बनाया है। उन्होंने कहा कि अब तक नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में 64 नए सुरक्षा कैंप स्थापित किए जा चुके हैं, जिससे न केवल सुरक्षा सुदृढ़ हुई है, बल्कि विकास और विश्वास की किरण भी हर गांव तक पहुँची है। 

मुख्यमंत्री साय ने हमारे वीर सुरक्षाबलों के अदम्य साहस और बलिदान को नमन करते हुए कहा कि उनके समर्पण से ही आज बस्तर भयमुक्त हुआ है और शांति की राह पर अग्रसर है।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि अबूझमाड़ और उत्तर बस्तर नक्सल आतंक से पूर्णतः मुक्त हो चुके हैं, जबकि दक्षिण बस्तर में यह लड़ाई अपने निर्णायक चरण में है। “नियद नेल्ला नार” जैसी योजनाओं ने बस्तर में संवाद, विकास और संवेदना की नई धरती तैयार की है।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि सरकार की नीति दो टूक है — हिंसा का कोई स्थान नहीं। जो नक्सली शांति और विकास का मार्ग चुनना चाहते हैं, उनका स्वागत है। लेकिन जो बंदूक उठाकर समाज में आतंक फैलाने की कोशिश करेंगे, उन्हें सुरक्षा बलों की सख़्त कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा।

मुख्यमंत्री ने सभी नक्सलियों से अपील की — “हिंसा की राह अंतहीन पीड़ा देती है, जबकि आत्मसमर्पण जीवन को एक नई दिशा देते हुए एक नई शुरुआत का रास्ता खोलता है। अपनी मातृभूमि के भविष्य और अपने परिवारों के उज्जवल कल के लिए हथियार त्यागें और विकास की रोशनी में कदम रखें।”

उल्लेखनीय है कि  देश में नक्सलवाद के खिलाफ चल रही निर्णायक लड़ाई ने एक ऐतिहासिक मुकाम हासिल किया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सोशल मीडिया हैंडल एक्स पर पोस्ट कर जानकारी  कि छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ और उत्तर बस्तर जैसे क्षेत्र, जो कभी नक्सल आतंक के गढ़ हुआ करते थे, अब पूरी तरह नक्सलमुक्त घोषित किए जा चुके हैं। उन्होंने कहा कि यह न केवल भारत की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था की बड़ी सफलता है, बल्कि विकास, विश्वास और संवेदना की नई कहानी भी है। बीते दो दिनों में देश में कुल 258 नक्सलियों ने हिंसा का रास्ता छोड़कर आत्मसमर्पण किया है। 

केंद्रीय गृह मंत्री शाह ने कहा कि यह परिवर्तन इस बात का प्रमाण है कि बंदूक नहीं, बल्कि संविधान पर विश्वास की शक्ति जीत रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार के निरंतर प्रयासों से नक्सलवाद अब अपने अंतिम चरण में है। 

केंद्रीय गृह मंत्री शाह ने आत्मसमर्पण करने वाले सभी नक्सलियों की सराहना करते हुए कहा कि यह कदम उनके बेहतर भविष्य और देश की एकता के प्रति समर्पण का प्रतीक है। उन्होंने सभी नक्सलियों से अपील की कि वे हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटें और देश की प्रगति में सहभागी बनें।

नारायणपुर-अबूझमाड़ को महाराष्ट्र से जोड़ेगा नेशनल हाईवे 130-डी

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कुतुल से नीलांगुर महाराष्ट्र बॉर्डर तक एनएच-130-डी का होगा निर्माण

नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास की गति तेज करने के लिए सरकार सतत प्रयासरत – मुख्यमंत्री साय

रायपुर- बस्तर अंचल को महाराष्ट्र से जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग 130-डी के निर्माण को नई गति मिली है। छत्तीसगढ़ शासन ने कुतुल से नीलांगुर (महाराष्ट्र सीमा) तक 21.5 किलोमीटर हिस्से के निर्माण के लिए टेंडर प्रक्रिया पूरी कर ली है। इस सड़क के निर्माण के लिए न्यूनतम टेंडर देने वाले ठेकेदार से अनुबंध की प्रक्रिया शर्तों सहित पूरी करने के निर्देश लोक निर्माण विभाग मंत्रालय द्वारा प्रमुख अभियंता, राष्ट्रीय राजमार्ग परिक्षेत्र रायपुर को दिए गए हैं। कुल तीन खंडों में निर्मित होने वाले 21.5 किलोमीटर सड़क के निर्माण हेतु लगभग 152 करोड़ रुपए न्यूनतम टेंडर दर प्राप्त हुई है, जिसे छत्तीसगढ़ शासन ने मंजूरी प्रदान कर दी है।

यह उल्लेखनीय है कि कुतुल, नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ क्षेत्र में स्थित है और कुतुल से महाराष्ट्र सीमा पर स्थित नीलांगुर की दूरी 21.5 किलोमीटर है। यह नेशनल हाईवे 130-डी का हिस्सा है। इस सड़क का निर्माण टू-लेन पेव्ड शोल्डर सहित किया जाएगा।

उल्लेखनीय है कि एनएच-130डी राष्ट्रीय राजमार्ग है, जिसकी कुल लंबाई लगभग 195 किलोमीटर है। यह एनएच-30 का शाखा मार्ग (स्पर रूट) है। यह कोण्डागांव से शुरू होकर नारायणपुर, कुतुल होते हुए नीलांगुर (महाराष्ट्र सीमा) तक जाता है। आगे महाराष्ट्र में यह बिंगुंडा, लहरे, धोदराज, भमरगढ़, हेमा, लकासा होते हुए आलापल्ली तक पहुँचता है, जहाँ यह एनएच-353डी से जुड़ जाता है। इस मार्ग के विकसित होने से बस्तर क्षेत्र सीधे राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क से जुड़ जाएगा और व्यापार, पर्यटन एवं सुरक्षा को बड़ी मजबूती प्राप्त होगी।

नेशनल हाईवे 130-डी का कोण्डागांव से नारायणपुर तक का लगभग 50 किमी हिस्सा निर्माणाधीन है। नारायणपुर से कुतुल की दूरी 50 किमी है और वहाँ से महाराष्ट्र सीमा स्थित नीलांगुर तक 21.5 किमी की दूरी है। इस राष्ट्रीय राजमार्ग की कुल लंबाई 195 किमी है, जिसमें से लगभग 122 किमी का हिस्सा कोण्डागांव-नारायणपुर से कुतुल होते हुए नीलांगुर तक छत्तीसगढ़ राज्य में आता है। इस सड़क के बन जाने से बस्तर अंचल को महाराष्ट्र से सीधा और मजबूत सड़क संपर्क मिलेगा तथा नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षित एवं सुगम यातायात सुविधा सुलभ हो सकेगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के सहयोग से इस नेशनल हाईवे के अबूझमाड़ इलाके में स्थित हिस्से के लिए फॉरेस्ट क्लियरेंस और निर्माण की अनुमति प्राप्त हुई, जिससे इस महत्वाकांक्षी परियोजना के निर्माण का रास्ता खुल गया है। राष्ट्रीय राजमार्ग 130-डी केवल सड़क नहीं बल्कि बस्तर अंचल की प्रगति का मार्ग है। हमारी सरकार ने इस परियोजना को तेजी देने के लिए लगातार प्रयास किए हैं। इस सड़क से बस्तर के लोगों को सीधा लाभ मिलेगा। यह सड़क न केवल छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र को जोड़ेगी, बल्कि बस्तर अंचल के सामाजिक एवं आर्थिक विकास में भी अहम भूमिका निभाएगी। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास की गति तेज करने के लिए यह परियोजना मील का पत्थर साबित होगी।

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