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बस्तर के 92 गांवों में पहली बार लहराएगा तिरंगा, स्वतंत्रता दिवस पर दिखेगा नया बदलाव

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बस्तर- छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र के लिए इस बार का स्वतंत्रता दिवस बेहद खास होने जा रहा है। पहली बार नक्सल प्रभावित रहे 92 गांवों में स्वतंत्रता दिवस के मौके पर तिरंगा फहराया जाएगा।

इन गांवों में लंबे समय से वामपंथी उग्रवाद का प्रभाव रहा है। अब सुरक्षा व्यवस्था में सुधार और प्रशासन की पहुंच बढ़ने के साथ यहां के ग्रामीण 15 अगस्त को राष्ट्रीय ध्वज फहराकर स्वतंत्रता दिवस मनाएंगे।

प्रशासन के अनुसार, इन गांवों में तिरंगा फहराया जाना केवल स्वतंत्रता दिवस का आयोजन नहीं, बल्कि बदलते बस्तर और शांति एवं विकास की दिशा में बढ़ते कदम का प्रतीक माना जा रहा है।

स्थानीय स्तर पर भी इस आयोजन को लेकर उत्साह है। वर्षों तक उग्रवाद से प्रभावित रहे इन इलाकों में तिरंगे का फहराया जाना सुरक्षा, विकास और लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूत होती पहुंच का महत्वपूर्ण संदेश देगा।

आत्मसमर्पित 95 नक्सलियों को 1.40 करोड़ रुपये से अधिक की प्रोत्साहन राशि

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मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की संवेदनशील पहल से पुनर्वास को मिल रही गति

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की संवेदनशील पहल और वन एवं जलवायु मंत्री तथा बीजापुर जिले के प्रभारी मंत्री केदार कश्यप के निर्देशों के अनुरूप छत्तीसगढ़ सरकार की नक्सलवादी आत्मसमर्पण/पीड़ित राहत एवं पुनर्वास नीति 2025 के तहत बीजापुर जिले के 95 आत्मसमर्पित नक्सलियों को 1 करोड़ 40 लाख 86 हजार 700 रुपये की प्रोत्साहन राशि स्वीकृत की गई है।

बीजापुर कलेक्टर विश्वदीप ने नीति के प्रावधानों के अनुसार शस्त्रों के साथ आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को प्रोत्साहन राशि प्रदान करने के लिए राशि के आहरण और वितरण की स्वीकृति दी है।

यह प्रोत्साहन राशि आत्मसमर्पित नक्सलियों को मुख्यधारा से जोड़ने, उन्हें नया जीवन शुरू करने और सम्मानजनक आजीविका के अवसर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से दी जा रही है। राज्य सरकार की पुनर्वास नीति नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शांति, विकास और सामाजिक पुनर्वास को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण और प्रभावी पहल है।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार का उद्देश्य नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के लोगों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है। पुनर्वास नीति के माध्यम से आत्मसमर्पित नक्सलियों को समाज में सम्मानजनक पुनर्स्थापना का अवसर मिल रहा है, जिससे बस्तर अंचल में शांति और विकास को नई गति मिल रही है।

मुस्कुराता बस्तर कार्यशाला में बच्चों की कला ने बिखेरे रंग

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कार्टून और कैरिकेचर के माध्यम से बस्तर की सकारात्मक पहचान को मिलेगी नई दिशा

रायपुर- बस्तर की समृद्ध संस्कृति, प्राकृतिक सुंदरता और सकारात्मक पहचान को कला के माध्यम से नई पहचान देने के उद्देश्य से जगदलपुर में आयोजित ‘मुस्कुराता बस्तर’ कार्टून कैनवास कार्यशाला में स्कूली बच्चों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। बच्चों ने अपनी कल्पनाओं को कैनवास पर उतारकर रचनात्मक प्रतिभा का प्रभावशाली प्रदर्शन किया।

विशेषज्ञों ने सिखाईं कार्टून और कैरिकेचर की तकनीकें

कार्यशाला में देश के विभिन्न राज्यों से आए वरिष्ठ कार्टूनिस्टों और कला विशेषज्ञों ने विद्यार्थियों को कार्टून और कैरिकेचर बनाने की बुनियादी तकनीकें सिखाईं। उन्होंने बताया कि किसी भी चित्र की अच्छी शुरुआत सही सर्किल बनाने से होती है। इसके साथ ही रफ स्केच, आउटलाइन, रंगों के चयन और चेहरे के भावों को प्रभावी ढंग से चित्रित करने के तरीके भी बच्चों को सरल भाषा में समझाए गए।

प्रशिक्षण से बढ़ा बच्चों का आत्मविश्वास

स्वामी आत्मानंद स्कूल के छात्र वंश साहू ने बताया कि इस प्रशिक्षण से उनका आत्मविश्वास बढ़ा है और कला के प्रति उनकी रुचि और मजबूत हुई है।

चरणबद्ध मार्गदर्शन से आसान हुई चित्रकला

सेजेस शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय क्रमांक-2 की छात्राएं भारती पांडे और पूनम ध्रुव ने कहा कि पहले उन्हें चित्र बनाने की सही शुरुआत की जानकारी नहीं थी, लेकिन विशेषज्ञों के मार्गदर्शन से अब वे आसानी से कार्टून और कैरिकेचर बना पा रही हैं।

कल्पनाशीलता को मिली नई दिशा

सेजेस नानगुर की छात्राएं अंजलि नाग और नैना मरकाम तथा सेजेस जगदलपुर की छात्रा अक्षिता बाजपेई ने बताया कि वरिष्ठ कलाकारों का मार्गदर्शन उनकी कल्पनाशीलता को नई दिशा देगा और कला के क्षेत्र में आगे बढ़ने की प्रेरणा देगा।

बस्तर की सकारात्मक छवि को मिलेगा नया मंच

यह कार्यशाला बच्चों की प्रतिभा को निखारने के साथ-साथ कला के माध्यम से बस्तर की शांतिपूर्ण, रचनात्मक और मुस्कुराती हुई पहचान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित हुई। इससे बस्तर की सकारात्मक छवि को व्यापक मंच मिलने की उम्मीद है।


मछली बीज उत्पादन से किसान रयतु राम ने लिखी सफलता की नई कहानी

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बस्तर के किसान ने दो माह में अर्जित किए 30 हजार रूपए, मत्स्यपालन से बढ़ी आय और आत्मनिर्भरता

शासकीय योजनाओं से मिली सहायता और नई पहचान, अब व्यवसाय विस्तार की तैयारी

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों को प्रोत्साहित करने के लिए संचालित विभिन्न योजनाओं का लाभ उठाकर प्रदेश के किसान नवाचारों के माध्यम से अपनी आय में वृद्धि कर रहे हैं। इसी कड़ी में बस्तर जिले के ग्राम पंचायत सिवनी (हिरलाभाटा) निवासी प्रगतिशील किसान रयतु राम ने मछली बीज (स्पॉन) उत्पादन अपनाकर आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश की है। कम समय में बेहतर आय अर्जित कर उन्होंने यह साबित किया है कि आधुनिक तकनीक और विभागीय मार्गदर्शन के साथ मत्स्यपालन किसानों के लिए लाभकारी आजीविका का सशक्त माध्यम बन सकता है।

एक एकड़ तालाब से दो माह में मिली 30 हजार रूपए की आय

रयतु राम ने अपनी कुल 5 एकड़ कृषि भूमि में से लगभग एक एकड़ क्षेत्र में बने तालाब में इस वर्ष मछली बीज उत्पादन का कार्य शुरू किया। उन्होंने बताया कि इस सीजन में तालाब में लगभग 30 पैकेट स्पॉन डाले गए। अब तक वे लगभग 60 किलोग्राम मछली बीज 500 रूपए प्रति किलोग्राम की दर से बेच चुके हैं, जिससे उन्हें 30 हजार रूपए की आय प्राप्त हुई है। तालाब में अभी भी 40 से 50 किलोग्राम मछली बीज उपलब्ध है, जिसकी बिक्री से उन्हें 20 से 25 हजार रूपए अतिरिक्त आय मिलने की उम्मीद है।

संघर्ष के बाद मिली सफलता

रयतु राम ने बताया कि शुरुआती दौर में उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। तालाब में तिलापिया जैसी अवांछित मछलियों की मौजूदगी, बोरवेल की सुविधा का अभाव और तकनीकी जानकारी की कमी के कारण अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी। लेकिन इस बार उन्होंने तालाब की वैज्ञानिक ढंग से सफाई की, समय पर दाना-पानी की व्यवस्था की तथा मत्स्यपालन विभाग के तकनीकी मार्गदर्शन का पालन किया। इसके परिणामस्वरूप उन्हें मछली बीज उत्पादन में उल्लेखनीय सफलता मिली।

अब व्यवसाय विस्तार की तैयारी

इस सीजन की सफलता से उत्साहित रयतु राम अब अपने खेत में एक नया तालाब तैयार कर मछली बीज उत्पादन का विस्तार करने की योजना बना रहे हैं। उनका कहना है कि यदि बाजार में बीज की मांग और विभागीय सहयोग इसी प्रकार मिलता रहा, तो वे इस व्यवसाय को बड़े स्तर पर विकसित करेंगे। इससे उनकी आय में और वृद्धि होगी तथा आसपास के किसानों को भी गांव में ही गुणवत्तापूर्ण मछली बीज आसानी से उपलब्ध हो सकेगा।

अन्य मत्स्यपालकों के लिए भी बनी प्रेरणा

मत्स्यपालन विभाग की स्पॉन संवर्धन योजना के अंतर्गत रयतु राम के गांव के मनकी बघेल, दयमती बघेल और जग्गु मौर्य भी लाभान्वित होकर मछली बीज उत्पादन के माध्यम से अतिरिक्त आय अर्जित कर रहे हैं। इन किसानों की सफलता से क्षेत्र में मत्स्यपालन के प्रति रुचि बढ़ी है और यह गतिविधि ग्रामीणों के लिए आय संवर्धन का प्रभावी माध्यम बनती जा रही है।

छत्तीसगढ़ में बस्तर से सरगुजा तक रेल संपर्क मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम

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मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने छत्तीसगढ़ में  प्रमुख रेल परियोजनाओं को गति देने रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव से की विस्तृत चर्चा

रेल नेटवर्क का विस्तार छत्तीसगढ़ के संतुलित और समावेशी विकास का मजबूत आधार बनेगा : मुख्यमंत्री साय

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने आज नई दिल्ली प्रवास के दौरान रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव से सौजन्य भेंट कर छत्तीसगढ़ में रेलवे अधोसंरचना के विस्तार, नई रेल परियोजनाओं तथा लंबित रेल लाइनों की प्रगति के संबंध में विस्तृत चर्चा की। इस अवसर पर केंद्रीय आवासन एवं शहरी कार्य राज्य मंत्री तोखन साहू तथा राजनांदगांव लोकसभा क्षेत्र के सांसद संतोष पांडे उपस्थित थे।

बैठक में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि छत्तीसगढ़ देश के औद्योगिक, खनिज एवं कृषि दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण राज्यों में से एक है। प्रदेश में रेलवे नेटवर्क का विस्तार केवल यातायात सुविधा का विषय नहीं, बल्कि औद्योगिक विकास, व्यापार, पर्यटन, कृषि विपणन, जनजातीय अंचलों के विकास तथा क्षेत्रीय संतुलित प्रगति से भी जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देशभर में रेल अधोसंरचना के अभूतपूर्व विस्तार का लाभ छत्तीसगढ़ को भी मिल रहा है और राज्य सरकार इस दिशा में केंद्र सरकार के साथ पूर्ण समन्वय के साथ कार्य कर रही है।

बैठक में कटघोरा-डोंगरगढ़ नई रेलवे लाइन परियोजना पर विशेष रूप से चर्चा हुई। बैठक में बताया गया कि लगभग 295 किलोमीटर लंबी इस महत्वाकांक्षी रेल परियोजना का विकास रेल मंत्रालय और छत्तीसगढ़ शासन के संयुक्त उपक्रम (ज्वाइंट वेंचर) के माध्यम से किया जाएगा। इसके लिए दोनों संस्थाओं की साझेदारी में एक स्पेशल परपज़ व्हीकल (SPV) का गठन किया जाएगा। यह रेल लाइन कटघोरा से करतला, मुंगेली, कवर्धा और खैरागढ़ होते हुए डोंगरगढ़ तक पहुंचेगी तथा ऐसे अनेक क्षेत्रों को पहली बार रेलवे नेटवर्क से जोड़ेगी, जहां अब तक रेल सुविधा उपलब्ध नहीं है। मुख्यमंत्री ने कहा कि इस परियोजना से क्षेत्रीय विकास को नई गति मिलेगी, उद्योगों को प्रोत्साहन मिलेगा तथा लाखों नागरिकों को बेहतर आवागमन की सुविधा प्राप्त होगी।

बैठक में रावघाट-जगदलपुर रेलवे लाइन परियोजना की भी समीक्षा की गई। मुख्यमंत्री ने कहा कि लगभग 140 किलोमीटर लंबी इस महत्वपूर्ण रेल लाइन के लिए भूमि अधिग्रहण की आवश्यक कार्यवाही पूरी की जा चुकी है तथा रेलवे द्वारा निविदा प्रक्रिया अंतिम चरण में है। उन्होंने अपेक्षा व्यक्त की कि निर्माण कार्य शीघ्र प्रारंभ होने से बस्तर अंचल की कनेक्टिविटी मजबूत होगी और क्षेत्र के सामाजिक एवं आर्थिक विकास को नई दिशा मिलेगी।

मुख्यमंत्री साय ने प्रदेश की तीन अन्य महत्वपूर्ण रेल परियोजनाओं - सरडेगा-पत्थलगांव-अंबिकापुर (244 किलोमीटर), धरमजयगढ़-पत्थलगांव-लोहरदगा (301 किलोमीटर) तथा अंबिकापुर-बरवाडीह (200 किलोमीटर) - को शीघ्र स्वीकृति प्रदान करने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि इन परियोजनाओं से उत्तर छत्तीसगढ़ सहित सीमावर्ती क्षेत्रों की रेल संपर्क व्यवस्था सुदृढ़ होगी तथा व्यापार, पर्यटन, खनिज परिवहन और स्थानीय रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे। इस पर रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इन परियोजनाओं को शीघ्र स्वीकृति प्रदान करने की दिशा में सकारात्मक पहल का आश्वासन दिया।

बैठक के दौरान किरंदुल-कोत्तागुडेम (180 किलोमीटर) तथा गढ़चिरौली-बीजापुर-किरंदुल (बचेली) (490 किलोमीटर) नई रेल लाइन परियोजनाओं के सर्वे कार्य की प्रगति पर भी चर्चा हुई। मुख्यमंत्री ने सर्वे कार्य शीघ्र पूर्ण कर आगामी कार्यवाही प्रारंभ करने का अनुरोध किया, जिससे बस्तर क्षेत्र की कनेक्टिविटी और अधिक मजबूत हो सके तथा विकास एवं सुरक्षा से जुड़े प्रयासों को गति मिले।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि केंद्र सरकार के सहयोग से छत्तीसगढ़ में रेलवे विकास के नए अध्याय लिखे जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि नई रेल परियोजनाएं प्रदेश के औद्योगिक विकास, खनिज परिवहन, कृषि उत्पादों की सुगम आवाजाही, पर्यटन संवर्धन और जनजातीय क्षेत्रों के समग्र विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि केंद्र और राज्य सरकार के समन्वित प्रयासों से छत्तीसगढ़ का रेल नेटवर्क आने वाले वर्षों में और अधिक मजबूत होगा तथा विकसित छत्तीसगढ़ के निर्माण को नई गति मिलेगी।

राष्ट्रपति भवन के विशेष अतिथि बने बस्तर के मांझी-चालकी : बस्तर पंडुम-2026 के विजेताओं और जनजातीय प्रतिनिधियों का हुआ विशेष सम्मान

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बस्तर आज शांति, विकास और समृद्धि की नई दिशा में आगे बढ़ रहा है : राष्ट्रपति  द्रौपदी मुर्मु

राष्ट्रपति भवन में पहली बार बस्तर की जनजातीय संस्कृति का ऐसा वैभव देखने को मिला : केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह

राष्ट्रपति ने स्वयं अतिथियों को भोजन परोसकर किया उनका सम्मान

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने जताई बस्तर दशहरा और बस्तर पंडुम में शामिल होने की इच्छा

मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में पहुँचा 209 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल, राष्ट्रपति को भेंट की 300 वर्ष पुरानी 'झिटकू-मिटकी' की अनुपम कलाकृति

रायपुर- बस्तर की लोकसंस्कृति, जनजातीय परंपराओं और सामाजिक नेतृत्व की गौरवशाली विरासत ने आज राष्ट्रपति भवन में इतिहास रच दिया। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में बस्तर पंडुम-2026 के विजेता प्रतिभागियों, परंपरागत जनजातीय नेतृत्व व्यवस्था के प्रतिनिधियों, पद्मश्री सम्मानित विभूतियों एवं विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधियों सहित 209 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल का राष्ट्रपति भवन में आत्मीय स्वागत किया गया।


इस अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने बस्तर पंडुम-2026 के विजेताओं, परगना मांझी, मांझी, चालकी तथा पद्मश्री सम्मानित विभूतियों के सम्मान में विशेष भोज का आयोजन किया। भारतीय लोकतांत्रिक परंपरा में अत्यंत दुर्लभ और आत्मीय दृश्य तब देखने को मिला, जब राष्ट्रपति ने स्वयं सभी अतिथियों को भोजन परोसकर उनका सम्मान किया। राष्ट्रपति की इस सहज आत्मीयता ने पूरे प्रतिनिधिमंडल को भावविभोर कर दिया।

प्रतिनिधिमंडल में उप मुख्यमंत्री एवं गृहमंत्री विजय शर्मा, संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री राजेश अग्रवाल, बस्तर के पारंपरिक जनजातीय नेतृत्व के प्रतिनिधि, बस्तर पंडुम-2026 के विजेता कलाकार, पद्मश्री सम्मानित विभूतियाँ, जनप्रतिनिधि तथा वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी शामिल रहे।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों से आत्मीय संवाद करते हुए बस्तर की जनजातीय संस्कृति, लोककला, पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था, मांझी-चालकी प्रणाली तथा बस्तर पंडुम के आयोजन के बारे में विस्तार से जानकारी ली। उन्होंने कलाकारों और जनजातीय प्रतिनिधियों के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि बस्तर की सांस्कृतिक विरासत भारत की अमूल्य धरोहर है और उसका संरक्षण पूरे देश का दायित्व है।

राष्ट्रपति ने जताई बस्तर आने की इच्छा

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के आग्रह पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने भविष्य में बस्तर दशहरा एवं बस्तर पंडुम में सम्मिलित होने की इच्छा व्यक्त की। उन्होंने कहा कि बस्तर दशहरा उनके हृदय को विशेष रूप से स्पर्श करता है। राष्ट्रपति ने भगवान जगन्नाथ की काष्ठ निर्मित प्रतिमा तथा बस्तर दशहरा की अद्वितीय परंपराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि उनका बस्तर दशहरा से विशेष आत्मीय संबंध रहा है।

राष्ट्रपति ने कहा कि मांझी उनके परिवार का हिस्सा हैं और उनके पिता भी मांझी थे। उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज की परंपरागत नेतृत्व व्यवस्था सामाजिक एकता, सामुदायिक सहभागिता और सांस्कृतिक संरक्षण की सशक्त आधारशिला है।

बस्तर पंडुम ने संस्कृति को दिलाई नई पहचान

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा कि बस्तर पंडुम  छत्तीसगढ़ की समृद्ध जनजातीय परंपराओं, लोककलाओं और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उत्सव है। उन्होंने कहा कि इस आयोजन ने बस्तर की वास्तविक सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई प्रतिष्ठा प्रदान की है। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के साथ-साथ पर्यटन, स्थानीय रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को भी नई गति प्रदान करते हैं। 

राष्ट्रपति मुर्मु ने विश्वास व्यक्त किया कि बस्तर के कलाकार, शिल्पकार और युवा अपनी सांस्कृतिक अस्मिता को सुरक्षित रखते हुए राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहेंगे।

बस्तर विकास और शांति की नई पहचान बन रहा है

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा कि सरकार के सतत प्रयासों और स्थानीय जनभागीदारी के परिणामस्वरूप बस्तर आज शांति, विकास और समृद्धि की नई दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने शिक्षा, सड़क, बिजली, पेयजल तथा अन्य आधारभूत सुविधाओं के विस्तार की सराहना करते हुए कहा कि बस्तर में आया यह सकारात्मक परिवर्तन पूरे देश के लिए प्रसन्नता और गर्व का विषय है।उन्होंने मांझी एवं चालकी की भूमिका की विशेष प्रशंसा करते हुए कहा कि वे समाज और प्रशासन के बीच प्रभावी सेतु के रूप में कार्य करते हुए सामाजिक समरसता तथा सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण में उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं।

पहली बार राष्ट्रपति भवन में दिखा बस्तर का ऐसा वैभव - केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह

इस अवसर पर केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने कहा कि वे अनेक अवसरों पर राष्ट्रपति भवन आए हैं, किंतु पहली बार उन्होंने राष्ट्रपति भवन में बस्तर की पारंपरिक आदिवासी वेशभूषा में इतने बड़े प्रतिनिधिमंडल को एक साथ देखा है। उन्होंने कहा कि यह दृश्य भारत की सांस्कृतिक विविधता और जनजातीय गौरव का अद्भुत प्रतीक है।

मुख्यमंत्री बोले – यह पूरे छत्तीसगढ़ के लिए गौरव का क्षण

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से बस्तर के प्रतिनिधिमंडल की यह आत्मीय भेंट पूरे छत्तीसगढ़, विशेषकर बस्तर अंचल के लिए अत्यंत गौरव और सम्मान का विषय है। उन्होंने कहा कि आज बस्तर की समृद्ध जनजातीय संस्कृति, लोक परंपराएँ और सांस्कृतिक विरासत देश के सर्वोच्च संवैधानिक मंच पर सम्मानित हुई हैं।

मुख्यमंत्री ने कहा कि बस्तर आज शांति, विकास और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की नई पहचान के साथ आगे बढ़ रहा है। बस्तर पंडुम जैसे आयोजनों ने जनजातीय संस्कृति को राष्ट्रीय स्तर पर नई प्रतिष्ठा दिलाई है तथा स्थानीय कलाकारों, लोक परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहर को नया मंच प्रदान किया है।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का जनजातीय समाज और उसकी संस्कृति से गहरा आत्मीय जुड़ाव है। उनके अनुभव, स्नेह और मार्गदर्शन से बस्तर की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन को नई दिशा मिलेगी।

मुख्यमंत्री ने राष्ट्रपति को बस्तर आने का निमंत्रण देते हुए कहा कि उनके आगमन से बस्तर की सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर और व्यापक पहचान मिलेगी तथा जनजातीय समाज का उत्साह और बढ़ेगा।

प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति भवन का भ्रमण भी किया तथा भारत की लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक विरासत से जुड़े विभिन्न ऐतिहासिक स्थलों और महत्वपूर्ण जानकारियों से अवगत हुआ।

राष्ट्रपति को भेंट की गई बस्तर की 300 वर्ष पुरानी 'झिटकू-मिटकी' की अनुपम कलाकृति

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को बस्तर की लगभग 300 वर्ष पुरानी लोकगाथा 'झिटकू-मिटकी' पर आधारित विशेष कलाकृति स्मृति-चिह्न स्वरूप भेंट की। यह कलाकृति बस्तर की जनजातीय संस्कृति, प्रेम, समर्पण, लोकआस्था और सामाजिक सौहार्द का प्रतीक मानी जाती है।

लोकमान्यता के अनुसार कठिन अकाल के समय झिटकू और मिटकी ने अपने प्रेम, त्याग और समर्पण की ऐसी अमिट मिसाल प्रस्तुत की कि उन्हें देवतुल्य सम्मान प्राप्त हुआ। आज भी बस्तर अंचल में झिटकू को 'खोड़िया राजा' तथा मिटकी को 'गप्पा देई' के रूप में श्रद्धापूर्वक पूजा जाता है।

इस अवसर पर मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह, सचिव राहुल भगत, विशेष सचिव रजत बंसल, संस्कृति विभाग के सचिव डॉ. एस. भारतीदासन, बस्तर संभाग के आयुक्त डोमन सिंह, संस्कृति एवं राजभाषा विभाग के संचालक संजय कन्नौजे सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के विजन को रेखांकित करेगी ‘मुस्कुराता बस्तर’ कार्टून कार्यशाला

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'मुस्कुराता बस्तर’ थीम पर जगदलपुर में होगी कार्टून कार्यशाला

स्कूली विद्यार्थियों को मिलेगा वरिष्ठ कार्टूनिस्टों से प्रशिक्षण

बस्तर की संस्कृति, पर्यटन और विकास की सकारात्मक तस्वीर को कार्टून कला के माध्यम से मिलेगी नई अभिव्यक्ति

रायपुर- छत्तीसगढ़ जनसंपर्क विभाग के सहयोग से देश की एकमात्र मासिक कार्टून पत्रिका कार्टून वॉच द्वारा जगदलपुर में स्कूली विद्यार्थियों के लिए ‘मुस्कुराता बस्तर’ थीम पर विशेष कार्टून कार्यशाला आयोजित की जाएगी। कार्यशाला में विद्यार्थियों को कार्टून और कैरिकेचर कला का प्रशिक्षण देने के साथ बस्तर की संस्कृति, पर्यटन और लोकजीवन को रचनात्मक रूप से अभिव्यक्त करने के लिए प्रेरित किया जाएगा।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में बस्तर आज विकास, पर्यटन और सांस्कृतिक पहचान के नए आयाम स्थापित कर रहा है। बस्तर अपनी प्राकृतिक सुंदरता, जनजातीय संस्कृति और पर्यटन स्थलों के कारण देश-दुनिया में नई पहचान बना रहा है। चित्रकोट और तीरथगढ़ जलप्रपात, कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान, बस्तर दशहरा तथा अन्य लोकपर्व बस्तर की समृद्ध विरासत के प्रतीक हैं। कार्टून वॉच के संपादक श्री त्र्यंबक शर्मा ने बताया कि कार्यशाला की थीम ‘मुस्कुराता बस्तर’ इन्हीं सकारात्मक पहलुओं को कार्टून कला के माध्यम से रचनात्मक अभिव्यक्ति देना है।

 इस कार्यशाला में दिल्ली के वरिष्ठ कार्टूनिस्ट माधव जोशी तथा पुणे के प्रसिद्ध कैरिकेचर कलाकार शुभम जिंदे लाइव डेमो के माध्यम से ऑन-द-स्पॉट कार्टून और कैरिकेचर बनाने का प्रशिक्षण देंगे। साथ ही विद्यार्थियों को कार्टून कला के सामाजिक, रचनात्मक और रोजगारपरक पक्षों से भी परिचित कराया जाएगा।

कार्यशाला के माध्यम से स्थानीय प्रतिभाओं को मंच मिलेगा और बस्तर की सकारात्मक पहचान को कला के माध्यम से देशभर तक पहुंचाया जा सके। ‘मुस्कुराता बस्तर’ अभियान नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, लोक परंपराओं और प्राकृतिक धरोहर से जोड़ने का रचनात्मक प्रयास है।a

भारी बारिश से उफान पर चित्रकोट जलप्रपात, 90 फीट की ऊंचाई से गिरते पानी का विहंगम दृश्य

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 जगदलपुर: बस्तर अंचल में पिछले 24 घंटों से हो रही मूसलाधार बारिश के चलते प्रसिद्ध चित्रकोट और तीरथगढ़ जलप्रपात पूरे उफान पर आ गए हैं। भारत के 'नियाग्रा' नाम से विख्यात चित्रकोट जलप्रपात में करीब 90 फीट की ऊंचाई से गिरते पानी की विशाल गर्जना दूर-दूर तक सुनाई दे रही है। बारिश के कारण जलप्रपात का जलस्तर और चौड़ाई काफी बढ़ गई है, जिससे इसका प्राकृतिक सौंदर्य अपने चरम पर पहुँच गया है।


मौसम साफ होने के बाद यहाँ देश-विदेश से भारी संख्या में पर्यटकों के पहुँचने की उम्मीद जताई जा रही है।

सड़कों पर जलभराव, पेड़ गिरने से आवागमन बाधित

एक ओर जहाँ जलप्रपातों की खूबसूरती निखर आई है, वहीं दूसरी ओर लगातार बारिश से आम जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है:

  • अस्पताल मार्ग जलमग्न: शहर के मुख्य महारानी अस्पताल मार्ग पर भारी जलभराव हो जाने से राहगीरों और दोपहिया वाहन चालकों को आवागमन में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

  • पेड़ गिरने से मार्ग अवरुद्ध: करंजी के समीप एक विशालकाय पेड़ मुख्य सड़क पर आ गिरा, जिससे यातायात थम गया। स्थानीय ग्रामीण पेड़ की शाखाओं को काटकर रास्ता साफ करने के प्रयास में जुटे हुए हैं।

  • जगदलपुर-सुकमा मार्ग पर लगा जाम: जगदलपुर-सुकमा मार्ग की घाटी में लोहे का भारी सामान ले जा रहा एक वाहन दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिससे सामान सड़क पर बिखर गया। इसके चलते सड़क के दोनों ओर वाहनों की लंबी कतारें लग गईं।

प्रशासनिक टीम और स्थानीय पुलिस बल मौके पर पहुँचकर यातायात व्यवस्था को बहाल करने और गिरे हुए सामान को हटाने के कार्य में जुटी हुई है।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के विजन को रेखांकित करेगी ‘मुस्कुराता बस्तर’ कार्टून कार्यशाला

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'मुस्कुराता बस्तर’ थीम पर जगदलपुर में होगी कार्टून कार्यशाला

स्कूली विद्यार्थियों को मिलेगा वरिष्ठ कार्टूनिस्टों से प्रशिक्षण

बस्तर की संस्कृति, पर्यटन और विकास की सकारात्मक तस्वीर को कार्टून कला के माध्यम से मिलेगी नई अभिव्यक्ति

रायपुर- छत्तीसगढ़ जनसंपर्क विभाग के सहयोग से देश की एकमात्र मासिक कार्टून पत्रिका कार्टून वॉच द्वारा जगदलपुर में स्कूली विद्यार्थियों के लिए ‘मुस्कुराता बस्तर’ थीम पर विशेष कार्टून कार्यशाला आयोजित की जाएगी। कार्यशाला में विद्यार्थियों को कार्टून और कैरिकेचर कला का प्रशिक्षण देने के साथ बस्तर की संस्कृति, पर्यटन और लोकजीवन को रचनात्मक रूप से अभिव्यक्त करने के लिए प्रेरित किया जाएगा।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में बस्तर आज विकास, पर्यटन और सांस्कृतिक पहचान के नए आयाम स्थापित कर रहा है। बस्तर अपनी प्राकृतिक सुंदरता, जनजातीय संस्कृति और पर्यटन स्थलों के कारण देश-दुनिया में नई पहचान बना रहा है। चित्रकोट और तीरथगढ़ जलप्रपात, कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान, बस्तर दशहरा तथा अन्य लोकपर्व बस्तर की समृद्ध विरासत के प्रतीक हैं। कार्टून वॉच के संपादक त्र्यंबक शर्मा ने बताया कि कार्यशाला की थीम ‘मुस्कुराता बस्तर’ इन्हीं सकारात्मक पहलुओं को कार्टून कला के माध्यम से रचनात्मक अभिव्यक्ति देना है।

इस कार्यशाला में दिल्ली के वरिष्ठ कार्टूनिस्ट माधव जोशी तथा पुणे के प्रसिद्ध कैरिकेचर कलाकार शुभम जिंदे लाइव डेमो के माध्यम से ऑन-द-स्पॉट कार्टून और कैरिकेचर बनाने का प्रशिक्षण देंगे। साथ ही विद्यार्थियों को कार्टून कला के सामाजिक, रचनात्मक और रोजगारपरक पक्षों से भी परिचित कराया जाएगा।

कार्यशाला के माध्यम से स्थानीय प्रतिभाओं को मंच मिलेगा और बस्तर की सकारात्मक पहचान को कला के माध्यम से देशभर तक पहुंचाया जा सके। ‘मुस्कुराता बस्तर’ अभियान नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, लोक परंपराओं और प्राकृतिक धरोहर से जोड़ने का रचनात्मक प्रयास है।

बस्तर की मनकी बघेल ने स्पान संवर्धन योजना से 2 माह में कमाए 15 हजार रुपये

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अब अंगुलिका उत्पादन से बढ़ाएंगी आमदनी

रायपुर- स्पान संवर्धन योजना छत्तीसगढ़ शासन के मत्स्य पालन विभाग द्वारा चलाई जा रही एक कल्याणकारी योजना है, जिसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में मछली बीज (स्पान) का स्थानीय स्तर पर उत्पादन बढ़ाना, आदिवासी और स्थानीय मत्स्य कृषकों को वैज्ञानिक तरीके से मछली पालन सिखाना और उनकी आय में वृद्धि करना है। योजना के तहत मत्स्य कृषकों को उच्च गुणवत्तायुक्त मछली बीज (स्पान) और नर्सरी जाल बिल्कुल मुफ्त दिए जाते हैं। किसानों को तालाब की तैयारी, स्पान संचयन, नर्सरी प्रबंधन और जल की गुणवत्ता सुरक्षित रखने का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाता है।

छत्तीसगढ़ शासन के मछली पालन विभाग की स्पान संवर्धन योजना बस्तर जिले के ग्रामीण किसानों के लिए आर्थिक स्वावलंबन का एक नया और सशक्त जरिया बन रही है। योजना का लाभ उठाकर बस्तर विकासखंड के ग्राम सिवनी की महिला किसान मनकी बघेल ने महज दो महीने में 15 हजार रुपये की अतिरिक्त कमाई कर क्षेत्र में एक मिसाल कायम की है।

सरकारी मदद और मेहनत से मिली सफलता

मत्स्यपालन विभाग द्वारा मई माह में मनकी बघेल को मिश्रित प्रजाति के लगभग 25 हजार स्पॉन उपलब्ध कराए गए थे। इसके साथ ही तालाब की उर्वरता बढ़ाने के लिए खाद और आहार के रूप में खल्ली दी गई। मनकी ने अपने परिवार के 1 एकड़ में फैले 2 तालाबों में स्पॉन का संवर्धन किया। नियमित आहार, देखभाल और जाल चलाकर की गई निगरानी के बल पर कम समय में उच्च गुणवत्ता की मत्स्य अंगुलिकाएं तैयार हो गईं। विभाग ने तैयार मत्स्य बीज को सुरक्षित बाजार तक पहुंचाने के लिए ऑक्सीजन सिलेंडर, पॉलिथीन बैग, बोरी और जाल निःशुल्क उपलब्ध कराए।

कम समय में बेहतर मुनाफा

मनकी बघेल के भतीजे सुखलाल बघेल ने बताया कि अब तक लगभग 30 किलोग्राम मत्स्य अंगुलिकाएं 500 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बेची जा चुकी हैं, जिससे परिवार को 15 हजार रुपये की सीधी आय हुई है। वर्तमान में तालाब में करीब 50 किलोग्राम अंगुलिकाएं बिक्री के लिए और तैयार हैं, जिनसे आगे भी अच्छी कमाई की उम्मीद है। सुखलाल के अनुसार, अंगुलिका उत्पादन पारंपरिक मछली पालन की तुलना में अधिक लाभदायक साबित हो रहा है।

खेती के साथ मत्स्य पालन से मजबूत होगी आर्थिक स्थिति

बघेल परिवार 7 एकड़ भूमि में खरीफ सीजन के दौरान उन्नत धान और रबी सीजन में नदी किनारे 2 एकड़ में मक्का व सब्जियों की खेती करता है। इस सफल अनुभव से उत्साहित होकर परिवार ने अगले वर्ष अंगुलिका उत्पादन का विस्तार करने का फैसला किया है, जिससे कृषि के साथ-साथ मत्स्य पालन को भी अपनी आय का मुख्य स्तंभ बनाया जा सके।


गोंचा पर्व की तैयारियों में तुपकी निर्माण से बढ़ी आजीविका, सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का भी बन रहा माध्यम

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महतारी वंदन योजना से मिली आर्थिक संबल की राशि, बस्तर की परंपरा और महिलाओं की आत्मनिर्भरता को मिल रही नई ताकत

रायपुर- महतारी वंदन योजना महिलाओं को केवल आर्थिक सहायता ही नहीं दे रही, बल्कि उनकी पारंपरिक आजीविकाओं और स्थानीय संस्कृति को भी नई ऊर्जा प्रदान कर रही है। प्रदेश के बस्तर अंचल में इसका एक प्रेरक उदाहरण देखने को मिला है, जहां बस्तर जिला के जगदलपुर विकासखंड के ग्राम मांझीगुड़ा की चंदा ने योजना से प्राप्त राशि का उपयोग गोंचा पर्व में उपयोग होने वाली पारंपरिक तुपकी के निर्माण में किया है। इससे न केवल उनके परिवार की आय बढ़ने की उम्मीद है, बल्कि बस्तर की सांस्कृतिक धरोहर को भी नई पीढ़ी तक पहुंचाने में मदद मिल रही है।

बस्तर का प्रसिद्ध गोंचा पर्व धार्मिक आस्था, लोक परंपरा और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। पर्व की तैयारियों के बीच चंदा अपने पति चिगडू और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर बड़ी संख्या में तुपकी तैयार कर रही हैं। गोंचा पर्व के दौरान इन तुपकियों की विशेष मांग रहती है, जिससे परिवार को अतिरिक्त आय प्राप्त होती है और आर्थिक स्थिति मजबूत होती है।

तुपकी बांस से बनाया जाने वाला बस्तर का पारंपरिक यंत्र है, जिसमें मलाग्नी वृक्ष के बीज (पेंगू) का उपयोग कर बन्दूक जैसी ध्वनि उत्पन्न की जाती है। भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा के दौरान श्रद्धालु इसी तुपकी से पारंपरिक सलामी देते हैं। यह परंपरा वर्षों से बस्तर की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा रही है और आज भी पूरे उत्साह एवं श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।

चंदा बताती हैं कि महतारी वंदन योजना से प्रत्येक माह मिलने वाली राशि ने उन्हें आर्थिक आत्मविश्वास दिया। इसी सहायता से उन्होंने तुपकी निर्माण के लिए आवश्यक बांस और अन्य सामग्री खरीदी। अब पूरा परिवार इस कार्य में जुटा है और गोंचा पर्व के दौरान अच्छी आय होने की उम्मीद है।

उनका कहना है कि महतारी वंदन योजना महिलाओं के लिए केवल आर्थिक सहयोग नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर बनने और अपनी पारंपरिक कला एवं कौशल को आजीविका से जोड़ने का अवसर भी है। इससे परिवार की आय बढ़ रही है और बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण भी हो रहा है।

गौरतलब है कि योजना के प्रारंभ से अब तक 29 किस्तों के माध्यम से 18 हजार 805 करोड़ रुपये से अधिक की राशि महिलाओं को सीधे उनके खातों में उपलब्ध कराई जा चुकी है। महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण को सर्वाेच्च प्राथमिकता देते हुए राज्य सरकार ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट में योजना के लिए 8,200 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है।

दशकों तक नक्सल हिंसा ने विकास, शिक्षा और जनजीवन को किया प्रभावित, अब बस्तर शांति और विश्वास के नए दौर की ओर अग्रसर-मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय

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सुरक्षा बलों के साहस, स्थानीय जनसहयोग और पुनर्वास नीति से मिली निर्णायक सफलता - मुख्यमंत्री

दूरस्थ अंचलों तक पहुंचीं सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और जनकल्याण की योजनाएं, शासन पर बढ़ा लोगों का विश्वास - मुख्यमंत्री साय

बस्तर को देश का अग्रणी जनजातीय संभाग बनाने की दिशा में तेजी से बढ़ रहे कदम : मुख्यमंत्री

बस्तर रोडमैप 2.0 के माध्यम से पर्यटन, आजीविका, शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत संरचना के समग्र विकास पर विशेष फोकस - मुख्यमंत्री साय

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने आज छत्तीसगढ़ विधानसभा में नक्सलवाद से मुक्ति के लिए केंद्र सरकार के ऐतिहासिक सहयोग के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ ने दशकों तक नक्सल हिंसा के रूप में एक गंभीर चुनौती का सामना किया है। अब केंद्र और राज्य सरकार के समन्वित प्रयासों, सुरक्षा बलों के अदम्य साहस तथा बस्तर की जनता के विश्वास और सहयोग से प्रदेश इस चुनौती से निर्णायक रूप से मुक्त होकर शांति, सुरक्षा और विकास के नए युग में प्रवेश कर चुका है। उन्होंने कहा कि यह सफलता अनेक वर्षों के सतत प्रयासों, सुनियोजित रणनीति, सुरक्षा बलों के पराक्रम तथा आम नागरिकों के सहयोग का परिणाम है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि नक्सलवाद के विरुद्ध संघर्ष में सर्वोच्च बलिदान देने वाले शहीद जवानों को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि उनका त्याग और समर्पण सदैव राष्ट्र को प्रेरित करता रहेगा। उन्होंने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों, छत्तीसगढ़ पुलिस, जिला पुलिस बल, विशेष सुरक्षा इकाइयों तथा अभियान में सहभागी सभी सुरक्षा एजेंसियों के साहस, समर्पण और व्यावसायिक दक्षता की सराहना की।

मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के लिए समन्वित सुरक्षा एवं विकास आधारित रणनीति अपनाई। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के मार्गदर्शन में सुरक्षा अभियानों की सतत समीक्षा, संसाधनों की उपलब्धता तथा केंद्र और राज्य के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित किया गया, जिससे अभियान को अपेक्षित गति मिली।

उन्होंने कहा कि 24 अगस्त 2024 को रायपुर में आयोजित नक्सल प्रभावित राज्यों के पुलिस महानिदेशकों की उच्च स्तरीय बैठक के बाद नक्सलवाद के समूल उन्मूलन के लिए समयबद्ध कार्ययोजना तैयार की गई। इसके अनुरूप सुरक्षा अभियानों को गति देने के साथ-साथ विकास कार्यों का भी समानांतर विस्तार किया गया।

उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने भी अभियान की नियमित समीक्षा की। स्वयं उन्होंने बस्तर क्षेत्र का लगातार दौरा कर सुरक्षा बलों का उत्साहवर्धन किया तथा विभिन्न गांवों में पहुंचकर स्थानीय नागरिकों से संवाद स्थापित किया।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि राज्य सरकार ने सुरक्षा अभियानों के साथ-साथ समाज के उन लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने पर भी विशेष बल दिया, जिन्होंने हिंसा का मार्ग छोड़कर सामान्य जीवन अपनाने की इच्छा व्यक्त की। इसी उद्देश्य से आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के पुनर्वास के लिए व्यापक और मानवीय नीति लागू की गई।

उन्होंने कहा कि पुनर्वास नीति के अंतर्गत आत्मसमर्पित व्यक्तियों को आर्थिक सहायता, भूमि, कौशल विकास प्रशिक्षण, स्वरोजगार तथा सम्मानजनक जीवन के अवसर उपलब्ध कराए गए। इससे बड़ी संख्या में लोगों ने हिंसा का मार्ग छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटने का निर्णय लिया। मुख्यमंत्री ने कहा कि यह नीति केवल पुनर्वास तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज में स्थायी शांति स्थापित करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण पहल है।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने विधानसभा में कहा कि नक्सलवाद से मुक्ति का अभियान केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके साथ-साथ विकास को भी समान प्राथमिकता दी गई। राज्य सरकार ने यह सुनिश्चित किया कि जिन क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत हो रही है, वहां शासन की योजनाएं और बुनियादी सुविधाएं भी तेजी से पहुंचें, ताकि लोगों के जीवन में स्थायी और सकारात्मक परिवर्तन आए।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने  कहा कि नक्सलवाद से मुक्ति के बाद अब राज्य सरकार का पूरा ध्यान बस्तर के समग्र, समावेशी और दीर्घकालिक विकास पर केंद्रित है। इसके लिए 'बस्तर रोडमैप 2.0' तैयार किया गया है, जिसके माध्यम से बस्तर को देश के अग्रणी जनजातीय संभाग के रूप में विकसित करने की दिशा में योजनाबद्ध कार्य किए जा रहे हैं।

उन्होंने बताया कि 'नियद नेल्ला नार 2.0' तथा 'बस्तर मुन्ने अभियान' के अंतर्गत 31 योजनाओं एवं 14 सामुदायिक सुविधाओं का संतृप्तिकरण (सेचुरेशन) मोड में क्रियान्वयन किया जा रहा है। इससे 5 हजार 542 गांवों के 39 लाख से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा और शासन की सेवाएं अंतिम छोर तक पहुंचेंगी।

मुख्यमंत्री ने कहा कि सुरक्षा शिविरों को अब बहुआयामी सेवा केंद्रों के रूप में विकसित किया जा रहा है। इन्हें 'शहीद गुंडाधुर सेवा डेरा' के रूप में विकसित करते हुए नागरिक सुविधाओं, जनसेवाओं और आजीविका गतिविधियों का केंद्र बनाया जा रहा है, ताकि स्थानीय लोगों को अपने ही क्षेत्र में आवश्यक सेवाएं सहज रूप से उपलब्ध हो सकें।

उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री स्वस्थ बस्तर अभियान के तहत बस्तर के 34 लाख से अधिक लोगों का स्वास्थ्य परीक्षण कर उनका डिजिटल हेल्थ प्रोफाइल तैयार किया गया है। इससे नागरिकों को समयबद्ध एवं बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने में सहायता मिलेगी।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि 'नियद नेल्ला नार' योजना इस परिवर्तन का महत्वपूर्ण माध्यम बनी है। इस योजना के अंतर्गत सुरक्षा कैंपों के 10 किलोमीटर के दायरे में आने वाले 525 गांवों में 17 विभागों की 43 व्यक्तिगत एवं सामुदायिक योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन किया गया। इससे ग्रामीणों को शासन की विभिन्न योजनाओं का लाभ एकीकृत रूप से उपलब्ध कराया जा रहा है तथा प्रशासन के प्रति उनका विश्वास और मजबूत हुआ है।

उन्होंने बताया कि बस्तर संभाग में केंद्र एवं राज्य सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं का संतृप्तिकरण (सेचुरेशन) सुनिश्चित करने के लिए विशेष अभियान चलाया गया है। इसके परिणामस्वरूप 6 लाख 79 हजार परिवारों के राशन कार्ड बनाए जा चुके हैं। बस्तर संभाग में 17 लाख लोगों के जनधन खाते खोले जा चुके हैं।  24 लाख 66 हजार लोगों के आधार कार्ड बनाए जा चुके हैं।  22 लाख लोगों के आयुष्मान कार्ड बनाए गए हैं। 1 लाख 18 हजार लोगों को व्यक्तिगत वनाधिकार पत्र प्रदान किए गए हैं। साथ ही 3 लाख 89 हजार किसानों के किसान क्रेडिट कार्ड बनाए जा चुके हैं। 

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी व्यापक कार्य किए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि बस्तर संभाग में 1 लाख 76 हजार प्रधानमंत्री आवास स्वीकृत किए गए हैं। इसके अतिरिक्त नक्सल हिंसा से प्रभावित परिवारों एवं आत्मसमर्पित नक्सलियों के लिए भी 15 हजार आवास स्वीकृत किए गए हैं।

उन्होंने कहा कि  बस्तर संभाग के 240 नक्सल प्रभावित गांवों में पूर्व में बंद पड़े 458 विद्यालयों में से 421 विद्यालयों का पुनः संचालन प्रारंभ किया गया है तथा 36 नए विद्यालय स्वीकृत किए गए हैं।  मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार बस्तर में आधारभूत अधोसंरचना के विस्तार को भी तेज गति से आगे बढ़ा रही है। 3,513 करोड़ रुपये की लागत से जगदलपुर-रावघाट रेल परियोजना पर कार्य जारी है, जिससे बस्तर की रेल संपर्क व्यवस्था को नई मजबूती मिलेगी। उन्होंने बताया कि जगदलपुर में हवाई सेवाओं का भी विस्तार किया गया है, जिससे क्षेत्र की कनेक्टिविटी और बेहतर हुई है।

उन्होंने कहा कि रायपुर-विशाखापट्टनम एक्सप्रेस-वे का निर्माण अंतिम चरण में है। यह परियोजना बस्तर को देश के प्रमुख आर्थिक एवं औद्योगिक क्षेत्रों से जोड़ने के साथ-साथ पर्यटन, व्यापार और निवेश को भी नई गति प्रदान करेगी।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि युवाओं को रोजगारोन्मुख बनाने के लिए बस्तर संभाग के सभी विकासखंडों में कौशल प्रशिक्षण केंद्र संचालित किए जा रहे हैं। 

उन्होंने कहा कि खेल एवं संस्कृति के माध्यम से युवाओं को सकारात्मक दिशा देने के उद्देश्य से बस्तर ओलंपिक तथा बस्तर पंडुम जैसे अभिनव आयोजन किए गए। इन आयोजनों में 4 लाख से अधिक लोगों की सहभागिता हुई, जिससे सामाजिक एकजुटता, सांस्कृतिक गौरव और जनभागीदारी को नई मजबूती मिली।

उन्होंने गृहमंत्री विजय शर्मा, वन मंत्री केदार कश्यप और जगदलपुर विधायक किरण सिंह देव के नक्सल उन्मूलन की लड़ाई में योगदान की सराहना की।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि राज्य सरकार का उद्देश्य केवल आधारभूत सुविधाओं का विस्तार करना नहीं है, बल्कि बस्तर के लोगों के जीवन स्तर में स्थायी सुधार लाना है। सुरक्षा, विकास और जनकल्याण की एकीकृत रणनीति के माध्यम से बस्तर आज विश्वास, अवसर और समृद्धि की नई दिशा में आगे बढ़ रहा है।

नक्सलियों की संरक्षक है कांग्रेस : भाजपा

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 रायपुर। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष नन्दन जैन ने कांग्रेस विधायक अटल श्रीवास्तव द्वारा दुर्दांत नक्सली कमांडर हिड़मा का महिमामण्डन किए जाने पर बेहद कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। सोमवार को यहाँ भाजपा प्रदेश कार्यालय (कुशाभाऊ ठाकरे परिसर) में आहूत पत्रकार वार्ता को सम्बोधित करते हुए जैन ने कांग्रेस को आड़े हाथों लिया और कहा कि यह कोई पहली बार नहीं है जब कांग्रेस का नक्सल प्रेम खुलकर सामने आया है। कांग्रेस का इतिहास हमेशा से नक्सलियों के संरक्षण और उन्हें खाद-पानी देने का रहा है।


भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष नंदन जैन ने कहा कि हजारों निर्दोष आदिवासियों, आम नागरिकों और देश के वीर जवानों के खून से जिसके हाथ रंगे हैं, उस खूँखार नक्सली हिड़मा का महिमामण्डन करना कांग्रेस की विकृत मानसिकता को दर्शाता है। कांग्रेस विधायक अटल श्रीवास्तव का यह कृत्य बस्तर के शहीदों और उनके परिवारों का घोर अपमान है। इसके लिए उन्हें और उनकी पार्टी को देश से बिना शर्त माफी मांगनी चाहिए।

जैन ने कांग्रेस पर हमला बोलते हुए कहा कि कांग्रेस और नक्सलियों का 'भाईचारा' दशकों पुराना है। जब-जब देश में नक्सलियों पर कड़ा प्रहार होता है, तब-तब कांग्रेस नेताओं का दर्द छलक उठता है। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और वरिष्ठ नेता राजबब्बर जैसे बड़े कांग्रेसी नेता समय-समय पर नक्सलियों के पक्ष में खुलकर बयानबाजी करते रहे हैं। राजबब्बर ने तो नक्सलियों को 'क्रांतिकारी' तक कह दिया था। खुद लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी भी हिड़मा जैसे राष्ट्रविरोधी तत्वों का महिमामण्डन कर चुके हैं, जो उनके देशविरोधी एजेंडे को साफ उजागर करता है।

जैन ने कहा कि संसद पर हमला करने वाले अफ़ज़ल गुरु के लिए जिनकी सहानुभूति हो, उनके नेताओं के लिए माओवादी और नक्सलवादी “आदर्श” बन जाएँ तो हैरानी कैसी? कांग्रेस का राजनीतिक चरित्र अब किसी से छिपा नहीं है। देश पहले, या वोट बैंक पहले— जवाब जनता अच्छी तरह जानती है।

भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष जैन ने कहा कि कांग्रेस शासनकाल में नक्सलियों के वैचारिक आकाओं को पालने-पोषने का काम किया गया। इसी कड़ी में अमर्त्य सेन जैसे चेहरों को व्यवस्था में ऊँचा ओहदा देकर नवाजा गया, जो नक्सलियों की 'वैचारिक ढाल' बनकर काम करते थे। आज जब केंद्र और राज्य की भाजपा सरकार के नेतृत्व में सुरक्षाबल नक्सलियों को उनके मांद में घुसकर ढेर कर रहे हैं, तो कांग्रेस नेतृत्व पूरी तरह बौखला गया है। अपने अस्तित्व को खतरे में देख कांग्रेस अब हिड़मा जैसे दुर्दांत अपराधियों के सहारे अपनी राजनीति चमकाना चाहती है। श्री जैन ने कहा कि कांग्रेस विधायक अटल श्रीवास्तव अपने इस देशविरोधी और शर्मनाक बयान के लिए तुरंत बस्तर की जनता, जवानों के परिवारों और पूरे देश से बिना शर्त माफी मांगें। साथ ही कांग्रेस आलाकमान स्पष्ट करे कि क्या वह अपने विधायक के इस नक्सल प्रेम का समर्थन करता है? बस्तर में शांति और विकास की राह में रोड़ा अटकाने वाली और नक्सलियों की पैरवी करने वाली कांग्रेस को छत्तीसगढ़ की जनता कभी माफ नहीं करेगी।

भाजपा प्रदेश प्रवक्ता वैभव बैस ने कहा कि जब चरणदास महंत मध्यप्रदेश शासन में गृह मंत्री थे तब एडिशनल एसपी भास्कर दीवान की शहादत हुई थी। तबसे लेकर स्वर्गीय एडिशनल एसपी आकाश गिरिपुंजे की शहादत तक कांग्रेस को नक्सली हिंसा से कोई मतलब नहीं रहा है। सुरक्षा बल के जवान पुलिस के जवान व प्रदेश के माटी पुत्र वहाँ पर अपनी शहादत देते रहे।

बैस ने कांग्रेस से सवाल पूछा है कि क्या कांग्रेसी नेता शहीदों की शहादत का सम्मान करती है? क्या कांग्रेस पार्टी अपने वरिष्ठ नेता जिसमें स्व. विद्याचरण शुक्ला, महेंद्र कर्मा सहित कई बड़े नेताओं की शहादत का सम्मान करती है? उन्होंने झीरम घाटी के हमले में अपनी जान गवाही। अगर कांग्रेस अपने शहीद नेताओं का सम्मान करती है तो अपने विधायक अटल श्रीवास्तव पर कार्रवाई करके दिखाए। सुरक्षा बल के सैकड़ो लोगों, हज़ारों आम नागरिकों की हत्या का जिम्मेदार हिड़मा था, जो कांग्रेसियों के लिए आदर्श है। बस्तर की पावन भूमि ने महाराजा प्रवीरचंद्र भंजदेव जैसे जननायक दिया है उस बस्तर में हिड़मा कभी नायक नहीं हो सकता।

इस दौरान प्रेस वार्ता में भाजपा प्रदेश प्रवक्ता शताब्दी पांडेय, प्रदेश मीडिया सह संयोजक गोविन्दा गुप्ता, प्रदेश सह कार्यालय मंत्री प्रीतेश गांधी मौजूद रहे।

अबूझमाड़ का नया सवेरा: डोंडरीबेड़ा से कटेर की सड़क ने मिटाया दशकों का सन्नाटा

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 रायपुर : छत्तीसगढ़ के बस्तर (Bastar) अंचल में हुए एक विशिष्ट सड़क विकास से दशकों तक कटा रहा l दुर्गम आदिवासी क्षेत्रों (जैसे डोंडरबेड़ा और कटेर) को मुख्य मार्गों से जोड़कर आवागमन की बाधाओं, पलायन और सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन के अंधकार को मिटा रही है।


ये पक्की सड़कें न केवल दशकों का सन्नाटा तोड़ती हैं, बल्कि सुदूर इलाकों में आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा, और बाज़ार तक पहुंच जैसे मौलिक लाभ भी पहुंचाती हैं।

गहरे जंगलों से घिरा अबूझमाड़... एक ऐसा अंचल, जिसका नाम सुनते ही कभी जेहन में दुर्गम रास्ते, कटी हुई जिंदगी और विकास की अंतहीन प्रतीक्षा की तस्वीर उभरती थी। लेकिन आज इस अबूझमाड़ की फिजा बदल रही है। प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महाअभियान (पीएम-जनमन) के तहत नारायणपुर जिले के अतिदुर्गम इलाके में बनी एक नई सड़क ने यहाँ के ग्रामीणों के जीवन में खुशियों का एक नया अध्याय लिख दिया है।

​डोंडरीबेड़ा कैंप से कटेर तक बनी 8.75 किलोमीटर लंबी यह सड़क सिर्फ डामर की पट्टी नहीं है, बल्कि दशकों से मुख्यधारा से कटे जनजातीय गांवों के लिए उम्मीद और भरोसे की एक मजबूत डोर है।

​पगडंडियों का दर्द और बारिश का वो खौफ

​कुछ समय पहले तक, इस इलाके के गांवों तक पहुँचने का एकमात्र जरिया संकरी और पथरीली पगडंडियां थीं। मानसून के आते ही ये रास्ते पूरी तरह बंद हो जाते थे, जिससे ग्रामीण अपने ही घरों में कैद होने को मजबूर थे। बच्चों को स्कूल जाने के लिए मीलों पैदल चलना पड़ता था।एम्बुलेंस का गाँवों तक आना नामुमकिन था। कई बार आपातकालीन परिस्थितियों में समय पर अस्पताल न पहुँच पाने के कारण गर्भवती महिलाओं और गंभीर मरीजों को अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ती थी। ग्रामीण अपनी कड़ी मेहनत से उगाई गई कृषि और वनोपज को हाट-बाजारों तक नहीं ले जा पाते थे, जिससे उन्हें उनके हक़ की सही कीमत नहीं मिलती थी।

​856.19 लाख रुपए की लागत से बदला भूगोल

​प्रशासन की दृढ़ इच्छाशक्ति और 'पीएम-जनमन' योजना की ताकत से 856.19 लाख रुपये की भारी लागत के साथ इस दुर्गम चुनौती को पार किया गया। डोंडरीबेड़ा कैंप से कटेर तक की इस चमचमाती सड़क ने अब इन गांवों की किस्मत बदल दी है। ​पहली बार गाँव की चौखट तक पहुँची एम्बुलेंस और विकास।​सड़क बनने से पूरे अंचल की सामाजिक और आर्थिक तस्वीर में जादुई बदलाव आया है।

सुगम यातायात से शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं का हुआ विस्तार

​ अब 108 एम्बुलेंस, शासकीय वाहन और प्रशासनिक टीमें सीधे ग्रामीणों के घर तक पहुँच रही हैं। रास्तों की सुगमता से अब शिक्षक और विद्यार्थी दोनों नियमित रूप से स्कूल पहुँच रहे हैं, जिससे शिक्षा के स्तर में सुधार हुआ है। स्थानीय किसान अब अपनी उपज को सीधे और आसानी से बड़े बाजारों तक पहुँचा पा रहे हैं। बिचौलियों का खेल खत्म हो रहा है और ग्रामीणों की जेब में सीधे पैसा आ रहा है।

​पक्के मकानों का सपना हुआ सच

सड़क बनते ही प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत पक्के मकान बनाने के लिए सीमेंट, छड़ और रेत जैसी निर्माण सामग्रियां बिना किसी बाधा के गाँवों तक पहुँचने लगी हैं। इसके साथ ही बिजली और पेयजल योजनाओं के काम ने भी रफ्तार पकड़ ली है।

​गाँव के बुजुर्गों और युवाओं के चेहरे पर अब एक अलग ही चमक है। ग्रामीणों का कहना है कि पहले जहाँ नारायणपुर या नजदीकी बाजार जाने के लिए हमें घंटों पैदल चलना पड़ता था और पूरा दिन बर्बाद हो जाता था, वहीं अब गाड़ियां सीधे हमारे घरों के सामने आकर रुकती हैं। बच्चों की पढ़ाई और इलाज की चिंता अब पूरी तरह खत्म हो गई है। ऐसा लगता है जैसे हमें एक नई जिंदगी मिल गई है।

​मुख्यधारा से जुड़ता अबूझमाड़

​पीएम-जनमन योजना के माध्यम से निर्मित यह सड़क इस बात का जीवंत उदाहरण है कि यदि संपर्क (Connectivity) मजबूत हो, तो देश का सबसे दूरस्थ और पिछड़ा क्षेत्र भी सामाजिक और आर्थिक विकास की नई ऊंचाइयों को छू सकता है। डोंडरीबेड़ा से कटेर तक का यह सफर, अबूझमाड़ के आदिवासियों के आत्मनिर्भर और सशक्त बनने का एक ऐतिहासिक गवाह बन चुका है।

अबूझमाड़ में कॉफी की खुशबू से बदलेगी तस्वीर: सतत खेती से आदिवासी समुदायों को मिलेगा नया रोजगार

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रायपुर- छत्तीसगढ़ के सबसे दुर्गम और वनाच्छादित क्षेत्रों में शामिल अबूझमाड़ अब विकास की नई दिशा में कदम बढ़ा रहा है। वर्षों तक भौगोलिक दुर्गमता और वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित रहे इस क्षेत्र में अब कॉफी की खेती के माध्यम से स्थानीय आदिवासी समुदायों के लिए रोजगार और आय के नए अवसर तैयार करने की पहल शुरू की गई है।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व वाली राज्य सरकार की दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों में आजीविका बढ़ाने की नीति के तहत नारायणपुर जिला प्रशासन ने अबूझमाड़ के चयनित वन ग्रामों में कॉफी की खेती शुरू करने की तैयारी शुरू कर दी है।

इसी क्रम में नारायणपुर कलेक्टर नम्रता जैन ने कॉफी बोर्ड ऑफ इंडिया के विशेषज्ञों के साथ कुटुल, कच्छपाल, कोडलीयार, इराकभट्टी और टोके जैसे गांवों का दौरा कर वहां की जलवायु, मिट्टी, वर्षा, तापमान और ऊंचाई का वैज्ञानिक अध्ययन कराया।

विशेषज्ञों की प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार, अबूझमाड़ की प्राकृतिक परिस्थितियां कॉफी आधारित कृषि-वनीकरण (Agroforestry) के लिए अनुकूल हैं। परियोजना के पहले चरण में उपयुक्त भूमि की पहचान, पौधशालाओं (नर्सरी) की स्थापना और किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसके बाद चरणबद्ध तरीके से कॉफी के पौधे लगाए जाएंगे।

कॉफी बोर्ड ऑफ इंडिया पूरे प्रोजेक्ट के दौरान तकनीकी मार्गदर्शन देगा, जिसमें नर्सरी विकास, पौधरोपण, फसल प्रबंधन और किसानों का प्रशिक्षण शामिल होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि बस्तर क्षेत्र की जलवायु, पर्याप्त वर्षा, उपजाऊ वन भूमि और प्राकृतिक छायादार वातावरण जैविक (ऑर्गेनिक) कॉफी उत्पादन के लिए बेहद उपयुक्त हैं। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (आईजीकेवी), जगदलपुर द्वारा प्रकाशित तकनीकी अध्ययन में भी बस्तर को कॉफी उत्पादन के लिए संभावनाओं से भरपूर क्षेत्र बताया गया है।

कॉफी आधारित कृषि से पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा। छायादार पेड़ मिट्टी का कटाव रोकने, जैव विविधता बनाए रखने, पोषक तत्वों के संरक्षण और प्राकृतिक पारिस्थितिकी को मजबूत करने में सहायक होंगे।

जिला प्रशासन का मानना है कि लगभग चार वर्षों के बाद कॉफी का व्यावसायिक उत्पादन शुरू हो सकता है। इसके बाद स्थानीय लोगों को कॉफी उत्पादन, नर्सरी, पौधरोपण, रखरखाव, तुड़ाई और प्रसंस्करण जैसे कार्यों में स्थायी रोजगार के अवसर मिलेंगे। स्वयं सहायता समूहों (SHGs) की भी इस परियोजना में महत्वपूर्ण भूमिका होगी।

नारायणपुर कलेक्टर नम्रता जैन ने कहा कि प्रशासन का उद्देश्य अबूझमाड़ की प्राकृतिक संपदा का संरक्षण करते हुए विकास को बढ़ावा देना है। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक योजना और स्थानीय समुदायों की भागीदारी से कॉफी की खेती इस क्षेत्र के लिए दीर्घकालिक और टिकाऊ आजीविका का मजबूत आधार बन सकती है।

इसके अलावा भविष्य में अबूझमाड़ के उपयुक्त क्षेत्रों में चाय की खेती की संभावनाओं का भी अध्ययन किया जाएगा। इसके लिए चरणबद्ध कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं।

यदि यह परियोजना सफल होती है, तो अबूझमाड़ में कॉफी की खेती केवल आर्थिक विकास का माध्यम नहीं बनेगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और आदिवासी समुदायों के सतत विकास का एक नया मॉडल भी स्थापित करेगी।

बस्तर में खाली हुए सुरक्षा कैंप अब बनेंगे स्कूल, वर्षों बाद फिर गूंजेगी बच्चों की पढ़ाई

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छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने और हालात सामान्य होने के बाद एक बड़ी पहल शुरू की गई है। जिन सुरक्षा कैंपों की अब आवश्यकता नहीं रह गई है, उन्हें स्कूलों में परिवर्तित किया जाएगा, ताकि वर्षों से शिक्षा से वंचित बच्चों को फिर से पढ़ाई का अवसर मिल सके।

लंबे समय तक नक्सली हिंसा के कारण कई सरकारी स्कूल बंद हो गए थे या सुरक्षा बलों के अस्थायी कैंप के रूप में उपयोग किए जा रहे थे। इससे हजारों बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हुई और कई गांवों में शिक्षा व्यवस्था लगभग ठप हो गई थी।

अब सुरक्षा स्थिति में सुधार के बाद प्रशासन इन भवनों को दोबारा शिक्षा के लिए तैयार कर रहा है। आवश्यक मरम्मत, फर्नीचर, पेयजल, बिजली और अन्य मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के बाद इन भवनों में नियमित रूप से कक्षाएं संचालित की जाएंगी।

इस पहल का उद्देश्य केवल स्कूलों को फिर से खोलना ही नहीं, बल्कि दूर-दराज के आदिवासी इलाकों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना और उन्हें मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ना भी है। सरकार का मानना है कि शिक्षा के विस्तार से क्षेत्र में विकास को गति मिलेगी और युवाओं के लिए नए अवसर तैयार होंगे।

स्थानीय लोगों ने भी इस निर्णय का स्वागत करते हुए इसे बस्तर में शांति, विकास और शिक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है।

उप मुख्यमंत्री अरुण साव का बस्तर में निर्माण कार्यों का निरीक्षण जारी

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मिशन अमृत के तहत निर्माणाधीन इंटेक-वेल और वाटर ट्रीटमेंट प्लांट का लिया जायजा, स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स का काम भी देखा 

रायपुर- उप मुख्यमंत्री अरुण साव ने अपने बस्तर प्रवास के चौथे दिन आज सुकमा में मिशन अमृत 2.0 के अंतर्गत शहर में पेयजल आपूर्ति की व्यवस्था को मजबूत करने बनाए जा रहे वाटर ट्रीटमेंट प्लांट के कार्यों का निरीक्षण किया। उन्होंने योजना के तहत शबरी नदी पर निर्माणाधीन इंटेक-वेल के कार्यों को भी देखा। उन्होंने पानी टंकी और पाइपलाइन विस्तार के कार्यों को भी तेजी से पूर्ण करते हुए जनवरी-2027 से मिशन अमृत की इस योजना से सुकमा में जल की आपूर्ति प्रारंभ करने के निर्देश दिए।

केंद्र सरकार की मिशन अमृत 2.0 के तहत नगर पालिका द्वारा 86 करोड़ की लागत से सुकमा शहर की पेयजल व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण किया जा रहा है। इसका 54 प्रतिशत काम पूरा कर लिया गया है। उप मुख्यमंत्री साव ने नगरीय प्रशासन विभाग के अधिकारियों से कहा कि सुकमा की आगामी 25 वर्षों की जरूरत को ध्यान में रखकर इसका निर्माण किया जा रहा है। निर्माण और निर्माण सामग्री की गुणवत्ता से किसी प्रकार का समझौता नहीं करना है। काम में तेजी बरकरार रखते हुए नियत समय में इसे पूर्ण करना है। 

उप मुख्यमंत्री साव ने लोक निर्माण विभाग द्वारा सुकमा के कुम्हाररास में 11 करोड़ 62 लाख रुपए की लागत से बनाए जा रहे स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स का भी निरीक्षण किया। उन्होंने कार्यों में तेजी लाते हुए अधिकारियों और निर्माण एजेंसी से दिसम्बर तक इसे पूर्ण करने को कहा।

करीब 10 एकड़ में बन रहे स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में फुटबॉल मैदान, एथलेटिक्स ट्रैक, इंडोर बैडमिंटन कोर्ट, प्रशासनिक भवन, बॉक्स-क्रिकेट, स्वीमिंग-पूल जैसी सुविधाएं विकसित की जा रही हैं। इसके निर्माण से सुकमा की खेल प्रतिभाओं को अपने कौशल को निखारने एक सर्वसुविधायुक्त अधोसंरचना और सुविधाएं मिलेंगी। अब तक इसका 50 प्रतिशत काम पूरा हो गया है।  तीनों कार्यों के निरीक्षण के दौरान कलेक्टर अमित कुमार भी उप मुख्यमंत्री के साथ थे।

दंतेवाड़ा के 17 गांवों में एनएमडीसी के समर कैंप शुरू, 1700 बच्चों को मिलेगा रचनात्मक शिक्षा और खेलों का अवसर

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एनएमडीसी ने आदिवासी समुदायों के बच्चों के समग्र विकास और रचनात्मक प्रतिभा को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से दंतेवाड़ा जिले के 17 गांवों में 20 मई से 15 जून 2026 तक विशेष समर कैंप शुरू किए हैं।

इस अनूठी पहल के तहत लगभग 1700 बच्चों को गर्मी की छुट्टियों के दौरान अनुभवात्मक शिक्षा, रचनात्मक गतिविधियों और खेलों से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है। अधिकांश गांवों में गतिविधियां शुरू हो चुकी हैं, जबकि अधिक बच्चों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए जनजागरूकता और प्रेरणा अभियान भी चलाया जा रहा है। वर्तमान में प्रत्येक गांव में एनएमडीसी समर कैंप में प्रतिदिन 30 से 40 बच्चे भाग ले रहे हैं।

इन शिविरों में बच्चे प्रतिदिन तीन से चार घंटे तक पुस्तक पठन, हस्तशिल्प, संगीत कार्यशालाओं और रचनात्मक गतिविधियों में हिस्सा लेते हैं। इसके बाद वे फ्रिस्बी, कबड्डी और खो-खो जैसे खेलों में उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं तथा दिन का समापन पौष्टिक अल्पाहार के साथ करते हैं।

यह पहल शिक्षा और सामुदायिक विकास के क्षेत्र में कार्यरत संस्था WOSCA के सहयोग से संचालित की जा रही है। समर कैंप बस्तर क्षेत्र के बच्चों के लिए सुरक्षित, प्रेरणादायक और सकारात्मक वातावरण तैयार कर रहे हैं, जिससे वे आत्मविश्वास और नई क्षमताओं के साथ आगे बढ़ सकें।

ग्रामीण क्षेत्रों में जहां संरचित रचनात्मक शिक्षा के अवसर सीमित हैं, वहां एनएमडीसी की यह पहल बच्चों की प्रतिभा और आकांक्षाओं को नई दिशा देने का कार्य कर रही है। गांवों के विकास के प्रति अपनी व्यापक प्रतिबद्धता के तहत एनएमडीसी बच्चों में सामाजिक और व्यवहारिक कौशल विकसित कर उन्हें आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी युवा बनने में मदद कर रहा है।

जिन गांवों में समर कैंप शुरू किए गए हैं वहां बच्चों, अभिभावकों और स्थानीय समुदाय की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। आने वाले सप्ताहों में इस पहल के विस्तार के साथ एनएमडीसी ने परिवारों और समुदाय के लोगों से इस अभियान में सक्रिय भागीदारी निभाने की अपील की है, ताकि दंतेवाड़ा के बच्चों के लिए यह गर्मी यादगार और प्रेरणादायक बन सके।

अबूझमाड़ में फैल रही है शिक्षा की रौशनी

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आज़ादी के बाद पहली बार अबूझमाड़ के अति दूरस्थ गांव कारकाबेड़ा में खुला नया प्राथमिक स्कूल

 नदी-नाले और पहाड़ पार कर 5 घंटे पैदल चलकर अधिकारियों ने कराया दाखिला

रायपुर- देश के गृह मंत्री अमित शाह के कुशल नेतृत्व एवं मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के सुशासन में छत्तीसगढ़ का अबूझमाड़ क्षेत्र अब नक्सलवाद के अंधेरे से निकलकर शिक्षा की नई रोशनी की ओर बढ़ रहा है। इसका सबसे सुखद और ऐतिहासिक परिणाम नारायणपुर जिले के अति दूरस्थ ग्राम कारकाबेड़ा में देखने को मिला है, जहां आजादी के बाद पहली बार किसी स्कूल की स्थापना हुई है। कभी नक्सलियों का गढ़ रहे इस इलाके में अब बच्चों को बंदूक की जगह कलम और किताबें मिल रही हैं।

जनसमस्या शिविर से खुला विकास का रास्ता

​हाल ही में अबूझमाड़ के सुदूर क्षेत्र कोड़ेनार में एक जनसमस्या निवारण शिविर का आयोजन किया गया था। इस शिविर में कारकाबेड़ा के ग्रामीणों ने अपने बच्चों के भविष्य के लिए गांव में ही स्कूल खोलने की पुरजोर मांग की थी। कलेक्टर  ने मामले की संवेदनशीलता और महत्ता को देखते हुए तत्परता दिखाई और जिला शिक्षा अधिकारी (DEO)  को तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए।

​5 घंटे की पैदल यात्रा और सर्वे

​कलेक्टर के निर्देश पर शिक्षा विभाग की टीम ने सबसे पहले कारकाबेड़ा गांव का सर्वे किया, जिसमें 20 बच्चे प्राथमिक शिक्षा के योग्य पाए गए। इसके बाद खंड शिक्षा अधिकारी,खंड स्रोत समन्वयक, संकुल समन्वयक, सरपंच और शिक्षकों की संयुक्त टीम ने अदम्य साहस का परिचय दिया। यह टीम दुर्गम रास्तों, कई नदी-नालों और पहाड़ियों को पार करते हुए लगभग 5 घंटे की कठिन पैदल यात्रा कर कारकाबेड़ा पहुंची और नवीन प्राथमिक शाला का औपचारिक शुभारंभ किया।

मुफ्त गणवेश और शिक्षण सामग्री का वितरण

​स्कूल के पहले ही दिन बच्चों के चेहरों पर एक अलग ही चमक थी। जिला प्रशासन द्वारा स्कूल प्रारंभ होने के साथ ही सभी 20 बच्चों को ​निःशुल्क गणवेश,​पाठ्यपुस्तकें और स्लेट,पेंसिल, श्यामपट्ट (ब्लैकबोर्ड) तथा अन्य आवश्यक शैक्षणिक सामग्रियां उपलब्ध कराई गईं।

कारकाबेड़ा सरपंच रामूराम वड्डे ने कहा कि गांव में स्कूल खुलना हमारे लिए किसी सपने के सच होने जैसा है। अब हमारे बच्चों को पढ़ने के लिए जान जोखिम में डालकर दूर नहीं जाना पड़ेगा।

अतिथि शिक्षक की व्यवस्था,पड़ोसी गांवों को भी मिलेगा लाभ

​वर्तमान में इस स्कूल के सुचारू संचालन के लिए जिला प्रशासन द्वारा एक स्थानीय अतिथि शिक्षक की व्यवस्था की गई है। अधिकारियों के मुताबिक, आने वाले समय में कारकाबेड़ा के इस स्कूल का लाभ आसपास के अन्य दूरस्थ गांवों, जैसे मरकूड़ के बच्चों को भी मिलेगा।

नक्सलवाद के खात्मे के बाद अबूझमाड़ के इस अंदरूनी इलाके में स्कूल खुलना केवल एक प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि क्षेत्र में शिक्षा के विस्तार और शांति बहाली की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है।

विशेष लेख-नक्सल मुक्त बीजापुर में विकास की नई दस्तक

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चार दशकों बाद फिर सजी पुजारी कांकेर और कोण्डापल्ली की साप्ताहिक बाजारें

बंद पड़े हाट-बाजारों में लौटी रौनक, आदिवासी अंचलों की अर्थव्यवस्था को मिला नया जीवन

रायपुर- कभी माओवाद के आतंक और भय के कारण वीरान पड़े बीजापुर जिले के सुदूर वनांचल अब विकास, विश्वास और नई उम्मीदों की मिसाल बनते जा रहे हैं। नक्सलवाद से मुक्ति के बाद जिले के अंदरूनी क्षेत्रों में सामान्य जनजीवन तेजी से पटरी पर लौट रहा है। इसका सबसे जीवंत उदाहरण उसूर ब्लॉक के आवापल्ली क्षेत्र अंतर्गत पुजारी कांकेर और कोण्डापल्ली के साप्ताहिक बाजार हैं, जहां लगभग चार दशकों बाद फिर से रौनक लौट आई है।

एक समय ऐसा था जब इन क्षेत्रों में भय और असुरक्षा के कारण ग्रामीणों की आवाजाही लगभग बंद हो चुकी थी। माओवाद के प्रभाव के चलते यहां के पारंपरिक साप्ताहिक बाजार पूरी तरह ठप पड़ गए थे। लेकिन अब नक्सल मुक्त वातावरण बनने के बाद बाजारों में फिर से चहल-पहल दिखाई देने लगी है। ग्रामीण, व्यापारी और आदिवासी बड़ी संख्या में यहां पहुंच रहे हैं, जिससे क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों को नई गति मिली है।

बस्तर की पहचान हैं साप्ताहिक हाट-बाजार

बस्तर अंचल केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता और खनिज संपदा के लिए ही नहीं, बल्कि वनोपज आधारित समृद्ध परंपराओं के लिए भी देशभर में जाना जाता है। यहां के साप्ताहिक हाट-बाजार स्थानीय संस्कृति, सामाजिक जीवन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं।

बीजापुर जिला चारों ओर से घने वनांचलों से घिरा हुआ है, जहां आदिवासी समुदाय का जीवन जंगल और वनोपज पर आधारित है। इमली, महुआ, टोरा, चिरौंजी, तेंदू जैसी बहुमूल्य वनोपज यहां के लोगों की आय का प्रमुख स्रोत हैं। ग्रामीण इन उत्पादों का संग्रहण कर साप्ताहिक बाजारों में विक्रय करते हैं तथा बदले में दैनिक जरूरत की वस्तुएं खरीदते हैं।

इन बाजारों का महत्व केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक मेल-मिलाप, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सामुदायिक जीवन का भी केंद्र होते हैं।

चार दशकों तक सन्नाटा, अब लौट रही जीवन की रफ्तार

उसूर ब्लॉक के पुजारी कांकेर और कोण्डापल्ली के साप्ताहिक बाजार कभी आसपास के अनेक गांवों की आर्थिक धुरी हुआ करते थे। लेकिन माओवादी गतिविधियों और असुरक्षा के माहौल ने इन बाजारों की रौनक छीन ली। धीरे-धीरे यहां व्यापार बंद हो गया और क्षेत्र आर्थिक रूप से प्रभावित होने लगा।

अब जब क्षेत्र पूरी तरह नक्सल मुक्त हो चुका है, तब वर्षों से बंद पड़े बाजारों में फिर से दुकानें सजने लगी हैं। ग्रामीण दूर-दराज के गांवों से बाजार पहुंच रहे हैं। महिलाएं वनोपज लेकर आ रही हैं तो छोटे व्यापारी दैनिक उपयोग की सामग्री बेचने पहुंच रहे हैं। बाजारों में फिर से स्थानीय बोली, पारंपरिक वेशभूषा और आदिवासी संस्कृति की जीवंत झलक दिखाई देने लगी है।

आर्थिक आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते कदम

पुनः प्रारंभ हुए ये साप्ताहिक बाजार स्थानीय आदिवासी समुदाय के लिए आर्थिक संबल बनकर उभर रहे हैं। ग्रामीणों को अब अपने उत्पाद बेचने के लिए दूरस्थ क्षेत्रों पर निर्भर नहीं रहना पड़ रहा है। इससे समय और संसाधनों की बचत हो रही है तथा स्थानीय स्तर पर आय के नए अवसर भी बढ़ रहे हैं।

बाजारों के पुनर्जीवित होने से छोटे व्यापारियों, किसानों और वनोपज संग्राहकों को सीधा लाभ मिल रहा है। साथ ही क्षेत्र में परिवहन, छोटे व्यवसाय और अन्य आर्थिक गतिविधियों को भी गति मिल रही है।

शांति और विकास का नया प्रतीक बन रहा बीजापुर

बीजापुर में लौटती बाजार संस्कृति यह दर्शाती है कि शांति स्थापित होने पर विकास की संभावनाएं किस प्रकार तेजी से आकार लेती हैं। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बाजार जैसी मूलभूत सुविधाओं के विस्तार से अब वनांचल के गांव भी मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं।

पुजारी कांकेर और कोण्डापल्ली के बाजारों में लौटती रौनक केवल व्यापार की वापसी नहीं, बल्कि विश्वास, सुरक्षा और समृद्ध भविष्य की वापसी का प्रतीक है। यह बदलता हुआ बीजापुर अब संघर्ष की नहीं, बल्कि विकास और आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रहा है।

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