Media24Media.com: अंधाधुंध रासायनिक खेती और पराली का धुआं: क्या हम अपनी ही मौत का सामान उगा रहे हैं?

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अंधाधुंध रासायनिक खेती और पराली का धुआं: क्या हम अपनी ही मौत का सामान उगा रहे हैं?

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महासमुंद- छत्तीसगढ़ को 'धान का कटोरा' कहा जाता है, लेकिन आज इस कटोरे में लालच और रसायनों का जहर घुलता जा रहा है। केशवा (महासमुंद) के किसान और पर्यावरण चिंतक मोहन चंद्राकर ने खेती की वर्तमान स्थिति और पर्यावरण को लेकर एक गंभीर चेतावनी जारी की है। उन्होंने सरकार से मांग की है कि पर्यावरण की सुरक्षा केवल उद्योगों की नहीं, बल्कि किसानों की भी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

मोहन चंद्राकर

मुनाफे की अंधी दौड़ में खो गई परंपरा 

​मोहन चंद्राकर का कहना है कि ज्यादा पैदावार के लालच में किसान खतरनाक रसायनों और खादों का भारी उपयोग कर रहे हैं। इससे न केवल मिट्टी बंजर हो रही है, बल्कि कैंसर जैसी बीमारियां घर-घर पहुंच रही हैं। गाँव से गाय और पारंपरिक गोबर खाद (घुरवा) गायब हो रहे हैं। आज किसान विदेशी रसायनों पर निर्भर है, जिससे देश की मुद्रा और किसान का स्वास्थ्य दोनों बर्बाद हो रहे हैं।

खेतों में जलता 'पैरा' और मौन पर्यावरणविद 

​उन्होंने सवाल उठाया  है कि जब उद्योग प्रदूषण करते हैं, तो सब आवाज उठाते हैं। लेकिन जब किसान खेतों में पराली (पैरा) जलाते हैं, तो पर्यावरणविद चुप क्यों हो जाते हैं? उन्होंने कहा-

  • ​पैरा जलाना एक 'कुकृत्य' है जो आने वाली पीढ़ी का भविष्य जला रहा है।
  • ​किसान फसल की तरह पराली की जिम्मेदारी भी खुद लें।
  • ​पराली को जलाने के बजाय गौशालाओं को दान करें।

सरकार से सख्त कानून की मांग 

​मोहन चंद्राकर ने प्रदेश सरकार से अपील की है कि जैसे उद्योगों के लिए नियम हैं, वैसे ही किसानों के लिए भी हों। उन्होंने सुझाव दिया कि:-

​ धान खरीदी पर रोक : जो किसान खेत में पैरा जलाते हैं, सरकार उनका धान न खरीदे।

​ मिट्टी की सुरक्षा : खेतों से मिट्टी निकालकर अवैध ईंट भट्ठे चलाने वालों पर कड़ी कार्रवाई हो।

​ निगरानी: गाँवों में ईंट पकाने के लिए लकड़ी और भूसे के अवैध इस्तेमाल को रोका जाए।

​ समाधान: प्राकृतिक और जैविक खेती की ओर वापसी 

​प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है जब हमें कोदो, कुटकी, ज्वार, बाजरा और रागी जैसे मोटे अनाजों की ओर लौटना होगा। प्राकृतिक और औषधीय खेती ही पर्यावरण, परंपरा और भारत के गौरव को बचा सकती है। उन्होंने रसायन मुक्त खेती की ओर लौटने का आग्रह किसान भाइयों से किया है।

"जिस दिन प्रकृति हमारे प्रतिकूल हो गई, उस दिन न किसान बचेगा, न अन्न और न ही मानव सभ्यता।" 

— मोहन चंद्राकर, किसान साथी (केशवा, महासमुंद)

यह लेख हर उस किसान के लिए एक आईना है जो मिट्टी को सिर्फ पैसा कमाने का जरिया समझ रहा है। मिट्टी बचेगी, तभी जीवन बचेगा।

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