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यूरोप में भीषण जंगल की आग का कहर: फ्रांस और स्पेन में बड़े पैमाने पर तबाही, हजारों लोगों को सुरक्षित निकाला गया

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पेरिस/मैड्रिड- यूरोप में लगातार बढ़ती भीषण गर्मी और शुष्क मौसम के बीच फ्रांस और स्पेन के कई हिस्सों में जंगल की आग तेजी से फैल रही है। आग की चपेट में आने से लाखों हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ है, जबकि हजारों लोगों को एहतियातन अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है।

दमकल विभाग, आपदा राहत एजेंसियां और सुरक्षा बल दिन-रात आग पर काबू पाने में जुटे हैं। कई इलाकों में तेज हवाओं और अत्यधिक तापमान के कारण आग तेजी से फैल रही है, जिससे राहत एवं बचाव कार्यों में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

जंगल की आग का असर केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे स्थानीय आबादी, वन्यजीव, कृषि और पर्यटन क्षेत्र भी गंभीर रूप से प्रभावित हुए हैं। कई प्रमुख सड़क मार्ग बंद कर दिए गए हैं और प्रभावित क्षेत्रों में आपातकालीन सेवाएं लगातार सक्रिय हैं।

संयुक्त राष्ट्र और जलवायु विशेषज्ञों ने इस घटना को जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों का गंभीर संकेत बताया है। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ता तापमान, लंबे समय तक पड़ने वाला सूखा और चरम मौसम की घटनाएं भविष्य में ऐसी प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता को और बढ़ा सकती हैं।

प्रशासन ने लोगों से प्रभावित क्षेत्रों में अनावश्यक यात्रा से बचने, स्थानीय प्रशासन के निर्देशों का पालन करने और किसी भी आपात स्थिति में तुरंत राहत एजेंसियों से संपर्क करने की अपील की है।

मजुली द्वीप पर 4,000 वर्षों के जलवायु और वनस्पति इतिहास का खुलासा

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मजुली द्वीप पर किए गए एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने लगभग 4,000 वर्षों के जलवायु, वनस्पति और बाढ़ संबंधी इतिहास का पुनर्निर्माण किया है। यह द्वीप विश्व का सबसे बड़ा आबाद नदी द्वीप है और कई जनजातियों तथा नव-वैष्णव संस्कृति का प्रमुख केंद्र माना जाता है।



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अध्ययन की प्रमुख बातें

  • यह शोध Birbal Sahni Institute of Palaeosciences (BSIP) के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया।

  • वैज्ञानिकों ने मजुली के सकाली आर्द्रभूमि (Sakali Wetland) से 150 सेमी गहरे अवसाद (Sediment Core) एकत्र किए।

  • परागकण (Pollen) और अवसाद कणों (Grain-size) के विश्लेषण के माध्यम से द्वीप के पर्यावरणीय इतिहास का अध्ययन किया गया।

  • अध्ययन ने 4040 से 500 वर्ष पूर्व तक की जलवायु और वनस्पति में हुए परिवर्तनों का आकलन किया।

प्रमुख निष्कर्ष

1. प्रारंभिक गर्म और आर्द्र काल (4040–2260 वर्ष पूर्व)

  • घने जंगलों का विस्तार था।

  • क्षेत्र में पर्याप्त वर्षा और अनुकूल जलवायु मौजूद थी।

  • 4.2 हजार वर्ष पूर्व के वैश्विक शुष्क जलवायु संकट के दौरान भी पारिस्थितिकी तंत्र अपेक्षाकृत स्थिर रहा।

2. मानसून और बाढ़ में उतार-चढ़ाव

  • समय के साथ मानसूनी गतिविधियों और बाढ़ के पैटर्न में बदलाव देखने को मिला।

  • 1100–500 वर्ष पूर्व का काल अपेक्षाकृत अधिक नम रहा, जो वैश्विक Medieval Climatic Anomaly से मेल खाता है।

3. पिछले 500 वर्षों में बदलाव

  • तापमान और वर्षा में कमी दर्ज की गई।

  • यह परिवर्तन वैश्विक Little Ice Age अवधि के अनुरूप पाया गया।

  • मानव गतिविधियों का प्रभाव बढ़ा और प्राकृतिक वनस्पति का विस्तार घटा।

नदी और बाढ़ संबंधी निष्कर्ष

  • अध्ययन में पाया गया कि ब्रह्मपुत्र नदी तथा उसकी सहायक नदियों की प्रवाह प्रक्रियाओं ने मजुली के भू-आकृतिक विकास को प्रभावित किया।

  • अवसाद विश्लेषण से पता चला कि समय के साथ नदी तंत्र अधिक अस्थिर और ऊर्जावान हुआ।

  • इससे बाढ़, कटाव और भूमि क्षरण की तीव्रता बढ़ी।

अध्ययन का महत्व

  • बाढ़ और नदी कटाव से प्रभावित समुदायों के लिए बेहतर अनुकूलन (Adaptation) रणनीतियाँ तैयार करने में सहायता।

  • आर्द्रभूमि संरक्षण, जैव विविधता संरक्षण और सतत भूमि उपयोग योजना के लिए वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है।

  • ब्रह्मपुत्र बेसिन में आपदा प्रबंधन और नदी प्रबंधन नीतियों को मजबूत बनाने में मदद करेगा।

शोध दल

इस अध्ययन का नेतृत्व आर्या पांडेय और डॉ. स्वाति त्रिपाठी ने किया। इसमें बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय  सहित विभिन्न संस्थानों के वैज्ञानिकों ने सहयोग किया।


भारत में भीषण गर्मी का कहर, दुनिया के सबसे गर्म शहरों में भारत का दबदबा

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देशभर में इस समय भीषण गर्मी और हीटवेव का असर देखने को मिल रहा है। मौसम विभाग के अनुसार भारत के कई शहरों का तापमान 45 से 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक आज दुनिया के सबसे गर्म 50 शहरों में सभी भारत के हैं।

उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश और ओडिशा सबसे ज्यादा प्रभावित राज्यों में शामिल हैं। महाराष्ट्र के ब्रम्हापुरी में तापमान 47.2°C दर्ज किया गया, जबकि उत्तर प्रदेश के बांदा में पारा 48°C के करीब पहुंच गया।

भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने कई राज्यों में रेड अलर्ट जारी किया है। दिल्ली, यूपी, राजस्थान, हरियाणा और विदर्भ क्षेत्र में अगले कुछ दिनों तक गंभीर हीटवेव जारी रहने की चेतावनी दी गई है। 

भीषण गर्मी के कारण बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। कई शहरों में बिजली कटौती की समस्या भी बढ़ रही है, जिससे लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

विशेषज्ञों ने लोगों को दोपहर में घर से बाहर न निकलने, ज्यादा पानी पीने और धूप से बचने की सलाह दी है। मौसम विभाग के अनुसार राहत मिलने में अभी कुछ दिन लग सकते हैं।

IITM पुणे में WISE-2026 के तहत मौसम और जलवायु स्टार्टअप्स के लिए इन्क्यूबेशन सेंटर का शुभारंभ

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भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM), पुणे, जो पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (MoES) के अंतर्गत आता है, ने आज मौसम और जलवायु से संबंधित स्टार्टअप्स के लिए अपना समर्पित इन्क्यूबेशन सेंटर औपचारिक रूप से शुरू किया। इस ऐतिहासिक अवसर को एक दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन “Weather and Climate Innovation Meet for Startups and Entrepreneurs (WISE-2026)” के साथ मनाया गया, जो भारत में मौसम सेवाओं में निजी क्षेत्र की भागीदारी के एक नए युग की शुरुआत का संकेत देता है।

इस केंद्र का उद्घाटन मुख्य अतिथि के रूप में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव डॉ. एम. रविचंद्रन ने किया। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. शैलेश नाइक (निदेशक, NIAS एवं पूर्व सचिव, MoES), डॉ. सूर्यचंद्र राव (निदेशक, IITM) तथा अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। यह इन्क्यूबेशन सेंटर “नेशनल एंटरप्राइज फॉर एटमॉस्फेरिक टेक्नोलॉजी (NEAT)” का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो “मिशन मौसम” के अंतर्गत एक महत्वाकांक्षी पहल है और सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से तकनीकी विकास को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया है।

मौसम और जलवायु चुनौतियों से निपटने में सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर जोर देते हुए डॉ. एम. रविचंद्रन ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम की जटिलता बढ़ रही है, इसलिए पारंपरिक शोध से आगे बढ़कर एक समावेशी और बहु-हितधारक प्रणाली विकसित करनी होगी। उन्होंने कहा कि “मिशन मौसम” एक मौसम-स्मार्ट और जलवायु-स्मार्ट राष्ट्र बनाने की दिशा में एक आधारभूत कदम है, जिसमें उन्नत अवलोकन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित मॉडलिंग और स्थानीय स्तर पर जानकारी के प्रसार को शामिल किया गया है।

उन्होंने कहा—

“विभिन्न क्षेत्रों के युवा उद्यमियों को अन्य हितधारकों की जरूरतों की बेहतर समझ होती है, इसलिए हमें मिलकर काम करना होगा। यह सहयोग न केवल आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि जीवन और आजीविका बचाने के लिए भी आवश्यक है।”

प्रगति के चार स्तंभ: सचिव ने मौसम विज्ञान प्रणाली को बेहतर बनाने के लिए चार मुख्य आधार बताए—

  1. अवलोकन (Observations)

  2. मॉडलिंग (Modeling)

  3. उपयोगकर्ता-विशिष्ट अनुप्रयोग (User-specific Applications)

  4. सूचना प्रसार (Dissemination)

मिशन मौसम: इसे पाँच वर्षों की एक योजना के रूप में लागू किया जाएगा, जिसका उद्देश्य मौसम पूर्वानुमान और जलवायु विश्लेषण को विभिन्न मंत्रालयों और स्टार्टअप्स के सहयोग से एक “स्वास्थ्य प्रणाली दृष्टिकोण” के रूप में विकसित करना है।

उन्होंने नवाचारकर्ताओं को मंत्रालय के मुक्त डेटा संसाधनों—जैसे रिमोट सेंसिंग और रिऐनालिसिस डेटा—का उपयोग करने के लिए आमंत्रित किया, ताकि कृषि, विमानन और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में सटीक और स्थानीय समाधान विकसित किए जा सकें।

कार्यक्रम के दौरान एक उच्च स्तरीय पैनल चर्चा भी हुई, जिसमें यह बताया गया कि मौसम और जलवायु विज्ञान अब शोध से आगे बढ़कर स्टार्टअप-आधारित व्यावहारिक समाधानों की ओर बढ़ रहा है। इसमें कृषि, नवीकरणीय ऊर्जा, स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया गया।

इस अवसर पर यह भी कहा गया कि “मौसम की जानकारी ही आर्थिक जानकारी है”, और वैज्ञानिक डेटा को वास्तविक जीवन के उपयोगी उपकरणों में बदलना आवश्यक है।

WISE 2026 कार्यक्रम में लगभग 400 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया, जिनमें 100 स्टार्टअप संस्थापक शामिल थे। इस कार्यक्रम में NCMRWF, IMD, NCPOR, ICRISAT, IISER पुणे तथा IIT दिल्ली, IIT बॉम्बे और IIT गांधीनगर सहित कई प्रमुख संस्थानों के विशेषज्ञ और शोधकर्ता शामिल हुए।

यह पहल भारत में जलवायु तकनीक (Climate Tech) को बढ़ावा देने और एक मजबूत, स्मार्ट एवं लचीली मौसम प्रणाली विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

अंधाधुंध रासायनिक खेती और पराली का धुआं: क्या हम अपनी ही मौत का सामान उगा रहे हैं?

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महासमुंद- छत्तीसगढ़ को 'धान का कटोरा' कहा जाता है, लेकिन आज इस कटोरे में लालच और रसायनों का जहर घुलता जा रहा है। केशवा (महासमुंद) के किसान और पर्यावरण चिंतक मोहन चंद्राकर ने खेती की वर्तमान स्थिति और पर्यावरण को लेकर एक गंभीर चेतावनी जारी की है। उन्होंने सरकार से मांग की है कि पर्यावरण की सुरक्षा केवल उद्योगों की नहीं, बल्कि किसानों की भी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

मोहन चंद्राकर

मुनाफे की अंधी दौड़ में खो गई परंपरा 

​मोहन चंद्राकर का कहना है कि ज्यादा पैदावार के लालच में किसान खतरनाक रसायनों और खादों का भारी उपयोग कर रहे हैं। इससे न केवल मिट्टी बंजर हो रही है, बल्कि कैंसर जैसी बीमारियां घर-घर पहुंच रही हैं। गाँव से गाय और पारंपरिक गोबर खाद (घुरवा) गायब हो रहे हैं। आज किसान विदेशी रसायनों पर निर्भर है, जिससे देश की मुद्रा और किसान का स्वास्थ्य दोनों बर्बाद हो रहे हैं।

खेतों में जलता 'पैरा' और मौन पर्यावरणविद 

​उन्होंने सवाल उठाया  है कि जब उद्योग प्रदूषण करते हैं, तो सब आवाज उठाते हैं। लेकिन जब किसान खेतों में पराली (पैरा) जलाते हैं, तो पर्यावरणविद चुप क्यों हो जाते हैं? उन्होंने कहा-

  • ​पैरा जलाना एक 'कुकृत्य' है जो आने वाली पीढ़ी का भविष्य जला रहा है।
  • ​किसान फसल की तरह पराली की जिम्मेदारी भी खुद लें।
  • ​पराली को जलाने के बजाय गौशालाओं को दान करें।

सरकार से सख्त कानून की मांग 

​मोहन चंद्राकर ने प्रदेश सरकार से अपील की है कि जैसे उद्योगों के लिए नियम हैं, वैसे ही किसानों के लिए भी हों। उन्होंने सुझाव दिया कि:-

​ धान खरीदी पर रोक : जो किसान खेत में पैरा जलाते हैं, सरकार उनका धान न खरीदे।

​ मिट्टी की सुरक्षा : खेतों से मिट्टी निकालकर अवैध ईंट भट्ठे चलाने वालों पर कड़ी कार्रवाई हो।

​ निगरानी: गाँवों में ईंट पकाने के लिए लकड़ी और भूसे के अवैध इस्तेमाल को रोका जाए।

​ समाधान: प्राकृतिक और जैविक खेती की ओर वापसी 

​प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है जब हमें कोदो, कुटकी, ज्वार, बाजरा और रागी जैसे मोटे अनाजों की ओर लौटना होगा। प्राकृतिक और औषधीय खेती ही पर्यावरण, परंपरा और भारत के गौरव को बचा सकती है। उन्होंने रसायन मुक्त खेती की ओर लौटने का आग्रह किसान भाइयों से किया है।

"जिस दिन प्रकृति हमारे प्रतिकूल हो गई, उस दिन न किसान बचेगा, न अन्न और न ही मानव सभ्यता।" 

— मोहन चंद्राकर, किसान साथी (केशवा, महासमुंद)

यह लेख हर उस किसान के लिए एक आईना है जो मिट्टी को सिर्फ पैसा कमाने का जरिया समझ रहा है। मिट्टी बचेगी, तभी जीवन बचेगा।

जलवायु परिवर्तन कार्य योजना हेतु गठित स्टियरिंग समिति की बैठक सम्पन्न

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ग्रामीण क्षेत्रों को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनाने और ग्राम पंचायतवार कार्ययोजना बनाएं-मुख्य सचिव श्री विकासशील

रायपुर- मुख्य सचिव विकासशील ने कहा कि राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनाने और ग्राम पंचायतवार कार्ययोजना बनाएं। राज्य में जलवायु परिवर्तन कार्यक्रमों के लिए सीएसआर मद की उपलब्ध राशि का उपयोग करना प्रस्तावित करें। छत्तीसगढ़ राज्य की जलवायु परिवर्तन पर कार्य योजना के लिए गठित स्टियरिंग समिति की बैठक आज यहां मंत्रालय महानदी भवन में मुख्य सचिव विकासशील की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई। 

बैठक में छत्तीसगढ़ राज्य जलवायु परिवर्तन केन्द्र, राज्य की जलवायु परिवर्तन पर कार्य योजना, राज्य में जलवायु परिवर्तन विषयक कार्यक्रमों के क्रियान्वयन और राज्य जलवायु परिवर्तन प्राधिकरण के गठन और राज्य में कार्बन क्रेडिट आधारित कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के संबंध में विचार-विमर्श किया गया। विभागीय सचिवों से जलवायु परिवर्तन पर कार्ययोजना के क्रियान्वयन से संबंधित विस्तृत चर्चा हुई। बैठक में वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग की अपर मुख्य सचिव ऋचा शर्मा ने जलवायु परिवर्तन की पृष्ठ भूमि, जलवायु परिवर्तन के कारक और छत्तीसगढ़ राज्य में भी जलवायु परिवर्तन के नकारात्मक प्रभाव के संबंध में जानकारी दी। बैठक में पीसीसीएफ श्रीनिवास राव, एपीसीसीएफ सुनील मिश्रा शामिल हुए।

वृक्ष-आवरण में देश में प्रथम स्थान पर रहा छत्तीसगढ 

छत्तीसगढ़ राज्य जलवायु परिवर्तन केन्द्र के अधिकारियों ने बताया कि राज्य में जलवायु परिवर्तन से संबंधित विविध कार्य किये जा रहें हैं। इनमें मुख्यतः वृक्षारोपण कार्य किये जा रहें हैं। एक पेड़ माँ के नाम योजना के तहत् करीब 7 करोड़ पौधारोपण किया जा चुका है। किसान वृ़क्ष मित्र योजना के तहत् 3 करोड़ 68 लाख वृक्षारोपण किया गया। अधिकारियों ने बताया कि आई.एस.एफ.आर. 2025 के अनुसार राज्य के वन एवं वृक्ष-आवरण में सर्वाधिक वृद्धि 683 किलोमीटर किया गया है, जो देश में प्रथम स्थान पर रहा है। राज्य में जलवायु परिवर्तन के तहत ई-वाहनों के चालन के लिए जन-सामान्य को प्रेरित किया जा रहा है। किसानों को सोलर पम्प वितरित किये जा रहे हैं। 

अधिकारियों ने बताया कि राज्य में जैविक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। वर्ष 2025-2026 में लगभग 55 हजार 50 हेक्टेयर भूमि पर जैविक खेती की गई। राज्य में 300 से अधिक बांधों की हाईड्रोलॉजिकल प्लानिंग के साथ 24 वृहद एवं मध्यम जलाशयों का सेडिमेंटेशन सर्वे पूर्ण किया जा चुका है। राज्य में जलवायु परिवर्तन ज्ञान केन्द्र निर्मित किए जाने के लिए अधिकारियों ने अपने विचार रखें।  

बैठक में जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना के क्रियान्वयन के संबंध में कृषि एवं किसान कल्याण, वन एवं जलवायु परिवर्तन, जल संसाधन, नगरीय प्रशासन, परिवहन, वाणिज्य एवं उद्योग, खनिज, ऊर्जा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, राजस्व एवं आपदा प्रबंधन, महिला एवं बाल विकास और पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के अधिकारियों अपने-अपने विभाग की जानकारी प्रस्तुत की।

बैठक में वीडियो कॉन्फ्रेंस से आयोजित इस बैठक में पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग की सचिव  निहारिका बारिक सिंह, विधि एवं विद्यायी विभाग की प्रमुख सचिव सुषमा सावंत, कृषि एवं किसान कल्याण विभाग की प्रमुख सचिव शहला निगार, खनिज संसाधन एवं मुख्यमंत्री के सचिव पी.दयानंद, नगरीय प्रशासन विकास विभाग एवं मुख्यमंत्री के सचिव बसवराजु एस., वाणिज एवं उद्योग विभाग के सचिव रजत कुमार, ऊर्जा विभाग के सचिव डॉ. रोहित यादव, परिवहन विभाग के सचिव एस.प्रकाश, आवास एवं पर्यावरण विभाग के सचिव अंकित आनंद, राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग की विशेष सचिव इफ्फत आरा सहित राज्य योजना आयोग, नाबार्ड, सेंटर फॉर एन्वायरमेंट एजुकेशन, इंडियन इंस्टयूट ऑफ साइंस और कृषि मौसम विज्ञान विभाग, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के अधिकारी सहित राज्य शासन के विभिन्न विभागों के अधिकारी शामिल हुए।

जलवाष्प और एरोसोल की संयुक्त भूमिका से जलवायु परिवर्तन की नई समझ सामने आई

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नए शोध से यह सामने आया है कि एरोसोल (सूक्ष्म कण) और जलवाष्प (Water Vapour) की संयुक्त भूमिका जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने और भविष्य के जलवायु अनुमानों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। अध्ययन के अनुसार, यदि जलवायु के प्रभावों और भविष्य की सटीक भविष्यवाणी करनी है, तो एरोसोल और जलवाष्प—दोनों को एक साथ ध्यान में रखना आवश्यक है, क्योंकि इनके आपसी अंतःक्रिया (इंटरैक्शन) क्षेत्रीय वायुमंडलीय गतिकी और भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून को गहराई से प्रभावित करती है।

एरोसोल और जलवाष्प के विकिरणीय प्रभाव (Radiative Effects) पृथ्वी के विकिरण संतुलन को समझने और उसका पूर्वानुमान लगाने में अहम भूमिका निभाते हैं। ये प्रभाव यह स्पष्ट करते हैं कि किस प्रकार एरोसोल, जलवाष्पीय बादल और ग्रीनहाउस गैसें सूर्य से आने वाले विकिरण और पृथ्वी से बाहर जाने वाले तापीय विकिरण को अवशोषित एवं प्रकीर्णित (Scattering) करती हैं, जिससे वैश्विक तापमान, मौसम प्रतिरूप और जलवायु स्थिरता प्रभावित होती है।

इंडो-गंगा मैदानी क्षेत्र: एरोसोल का वैश्विक हॉटस्पॉट

इंडो-गंगा मैदानी क्षेत्र (IGP) को एरोसोल लोडिंग का एक वैश्विक हॉटस्पॉट माना जाता है। यहां एरोसोल और जलवाष्प की मात्रा में स्थानिक और कालिक (Spatio-Temporal) रूप से अत्यधिक परिवर्तनशीलता पाई जाती है, जिससे इनके जलवायु प्रभावों का सटीक आकलन करना चुनौतीपूर्ण और अनिश्चित हो जाता है। इस क्षेत्र की जलवायु गतिकी पर वायुमंडलीय संरचना में होने वाले परिवर्तनों के प्रभावों को समझने के लिए एरोसोल लोडिंग और जलवाष्प विकिरणीय प्रभाव (WVRE) के संबंध का विश्लेषण आवश्यक है।

DST संस्थानों द्वारा किया गया व्यापक अध्ययन

यह अध्ययन आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्ज़र्वेशनल साइंसेज़ (ARIES), नैनीताल और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिज़िक्स (IIA), बेंगलुरु—जो दोनों ही भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के स्वायत्त संस्थान हैं—द्वारा किया गया। इस शोध में ग्रीस के यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न मैसेडोनिया और जापान की सोका यूनिवर्सिटी के अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों ने भी सहयोग किया।

शोध का नेतृत्व डॉ. उमेश चंद्र दुमका (ARIES) और डॉ. शांतकुमार एस. निंगोम्बम (IIA) ने किया। शोधकर्ताओं ने IGP क्षेत्र में स्थित छह AERONET (एरोसोल रोबोटिक नेटवर्क) स्थलों से प्राप्त आंकड़ों का उपयोग किया और SBDART रेडिएटिव ट्रांसफर मॉडल के माध्यम से वायुमंडलीय विकिरणीय सिमुलेशन किए।

एरोसोल के गुणधर्मों और वर्षणीय जलवाष्प (प्रेसिपिटेबल वाटर वेपर) की जलवायुगत स्थिति (क्लाइमेटोलॉजी)।

मुख्य निष्कर्ष

अध्ययन में यह पाया गया कि:

  • जलवाष्प वायुमंडलीय ताप को एरोसोल की तुलना में अधिक प्रभावित करता है।

  • जलवाष्प के विकिरणीय प्रभाव एरोसोल की उपस्थिति से गहराई से प्रभावित होते हैं।

  • एरोसोल-जलवाष्प अंतःक्रिया वायुमंडल के विकिरण बजट को महत्वपूर्ण रूप से नियंत्रित करती है।

  • एरोसोल-मुक्त वातावरण में जलवाष्प का विकिरणीय प्रभाव अधिक तीव्र होता है, जबकि एरोसोल की उपस्थिति में यह प्रभाव अपेक्षाकृत कम हो जाता है।

  • स्वच्छ वायुमंडल में पृथ्वी की सतह और वायुमंडल—दोनों पर ये प्रभाव अधिक स्पष्ट होते हैं।

  • एरोसोल की मौजूदगी में जलवाष्प का प्रभाव वायुमंडल के ऊपरी हिस्से (Top of the Atmosphere) पर अधिक प्रमुख हो जाता है।

जलवायु पर व्यापक प्रभाव

अध्ययन यह भी दर्शाता है कि जलवाष्प वायुमंडल को एरोसोल की तुलना में कहीं अधिक गर्म करता है, जिससे इंडो-गंगा मैदानी क्षेत्र की जलवायु को आकार देने में इसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। परिणाम यह भी दिखाते हैं कि ये प्रभाव सूर्य की स्थिति और एरोसोल अवशोषण से जुड़े वायुमंडलीय कारकों पर अत्यधिक निर्भर करते हैं।

यह शोध Atmospheric Research जर्नल में प्रकाशित हुआ है और यह स्पष्ट करता है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने के लिए एरोसोल और जलवाष्प—दोनों की संयुक्त भूमिका को अनदेखा नहीं किया जा सकता।


हिमालय में वर्टिकल एयर मोशन का अध्ययन: भारतीय वैज्ञानिकों ने मानसून और जलवायु भविष्यवाणी में नई अंतर्दृष्टि प्रदान की

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भारतीय वैज्ञानिकों की एक टीम ने हिमालय में वायु के ऊर्ध्वाधर (वर्टिकल) गति के रहस्यों का पता लगाया है, जिससे भारतीय मानसून की समझ में महत्वपूर्ण योगदान मिला है। यह मानसून दक्षिण एशिया के लिए सदियों से जीवनरेखा रहा है और कृषि, जल प्रबंधन तथा आपदा तैयारी के लिए इसकी सटीक भविष्यवाणी अत्यंत आवश्यक है।

अध्ययन की प्रमुख विशेषताएँ:

  • संस्थान: Aryabhatta Research Institute of Observational Sciences (ARIES), नैनीताल और ISRO के Space Physics Laboratory (SPL), तिरुवनंतपुरम।

  • प्रयोग: भारतीय निर्मित Stratosphere-Troposphere (ST) रडार का उपयोग कर केंद्रीय हिमालय में एशियाई समर मॉनसून (ASM) महीनों के दौरान ऊर्ध्वाधर वायु गति का प्रत्यक्ष और उच्च-रिज़ॉल्यूशन मापन।

  • नवीन निष्कर्ष:

    • 10–11 किमी ऊँचाई पर लगातार नीचे की ओर गति।

    • 12 किमी से ऊपर वायु का स्थिर और धीमा उठाव।

    • ऊर्ध्वाधर सर्कुलेशन अधिक जटिल, जिसमें उठती और गिरती वायु के वैकल्पिक क्षेत्र मौजूद हैं।

  • महत्त्व:

    • मौसम की सटीक भविष्यवाणी और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली में सुधार।

    • कृषि, जल संसाधन और मानव स्वास्थ्य की सुरक्षा।

    • प्रदूषक और ग्रीनहाउस गैसों के परिवहन के मूल्यांकन में मदद।

    • जलवायु परिवर्तन को कम करने की रणनीतियों को मजबूत करना।

यह अध्ययन American Geophysical Union (AGU) की “Earth and Space Science” में प्रकाशित हुआ।


बटसेरी, हिमाचल प्रदेश में देवदार वृक्षों ने उजागर किया हिमालय में वसंत सूखे और भू-आपदा का इतिहास

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हिमाचल प्रदेश के संगला घाटी के बटसेरी गाँव में स्थित देवदार (Deodar) पेड़ों ने छोटे हिम युग (Little Ice Age, LIA) के दौरान वसंत ऋतु में अधिक वर्षा और 1757 ईस्वी के बाद सुक्खे होते वसंत का इतिहास उजागर किया। हाल के दशकों में वसंत में सूखे की घटनाएँ बढ़ी हैं, जो उनके वृक्ष-छल्लों (Tree Rings) में दर्ज हैं।

यह अध्ययन भू-आपदा गतिविधियों के कारणों का विश्लेषण करता है और भविष्य की आपदा घटनाओं की पूर्वानुमान और चेतावनी प्रणाली के विकास में मदद करता है।

अत्यधिक जलवायु घटनाओं और भू-आपदाओं का संबंध

हिमालय क्षेत्र में सूखा, बाढ़, भूस्खलन, ग्लेशियल झील प्रकोप (GLOFs), चट्टान गिरना और हिम-स्खलन जैसी घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति ने यह स्पष्ट किया कि भूतपूर्व जलवायु और भू-आपदा घटनाओं का अध्ययन आवश्यक है।

वृक्ष-छल्लों का महत्व

वृक्ष-छल्ले प्रत्येक वर्ष बनने वाली लकड़ी की परतें होती हैं, जो पेड़ की उम्र और पर्यावरणीय स्थितियों का रिकॉर्ड देती हैं। देवदार के वृक्ष-छल्लों का अध्ययन (Dendroclimatology और Dendrogeomorphology) हमें वर्तमान और भविष्य के भू-आपदा जोखिमों को समझने और उनके लिए रणनीति बनाने में सक्षम बनाता है।

अध्ययन की पृष्ठभूमि

जुलाई 2021 में बटसेरी गाँव के पास एक भारी चट्टान गिरने की घटना ने बिर्बल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पेलियोसाइंसेज (BSIP), DST के अंतर्गत वृक्ष-छल्लों के माध्यम से भूतपूर्व जलवायु और भू-आपदा अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया।

अध्ययन में देंड्रो-क्लाइमेटोलॉजी और देंड्रो-जियोमोर्फोलॉजी को एकीकृत किया गया ताकि भविष्य के जोखिम मूल्यांकन और न्यूनीकरण रणनीतियाँ तैयार की जा सकें।

मुख्य निष्कर्ष

  • देवदार वृक्ष-छल्लों के अध्ययन से 378 वर्षों (1558-2021 CE) का वसंत ऋतु का नमी इतिहास और 168 वर्षों (1853-2021 CE) का चट्टान गिरने का रिकॉर्ड तैयार किया गया।

  • पेड़ की वृद्धि विशेष रूप से फरवरी से अप्रैल के महीनों की नमी पर निर्भर थी, जो पश्चिमी विक्षेप (Western Disturbances) से प्रभावित होती है।

  • कुल 53 चट्टान गिरने की घटनाओं का पता चला, जिनमें 8 उच्च तीव्रता वाली थीं। ये घटनाएँ विशेष रूप से 1960 के बाद के सूखे वसंत से संबंधित थीं।

  • वसंत में सूखे के कारण ढलानों पर विकसित वनस्पति कमज़ोर हो गई, जिससे जब मानसून में भारी वर्षा हुई, तो ढलान अधिक संवेदनशील बन गए।

स्थानीय और नीति-निर्माण पर प्रभाव

  • अध्ययन ने जलवायु परिवर्तन और भू-आपदाओं के बीच के संबंध को उजागर किया।

  • इससे वन प्रबंधन, जल संसाधन प्रबंधन और ढलान सुरक्षा उपायों में सुधार की आवश्यकता स्पष्ट होती है।

  • यह दृष्टिकोण सड़क और अन्य बुनियादी ढांचे को नुकसान से बचाने, स्थानीय लोगों की आजीविका की रक्षा और आपदा तैयारी बढ़ाने में मदद करता है।

  • साथ ही, यह समुदायों को जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन और जोखिम न्यूनीकरण में सशक्त बनाता है।

निष्कर्ष

यह अध्ययन जर्नल Catena में प्रकाशित हुआ और हिमालय क्षेत्र में वसंत और पूर्व-मॉनसून सूखे के कारण भू-आपदाओं के जोखिम को बेहतर ढंग से समझने में मदद करता है।


मेघालय के 39 में से 25 C&RD ब्लॉक उच्च या अत्यधिक जलवायु संवेदनशीलता श्रेणी में: अध्ययन

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एक नए अध्ययन के अनुसार मेघालय के 39 सामुदायिक एवं ग्रामीण विकास (C&RD) ब्लॉकों में से 25 ब्लॉक उच्च या अत्यधिक जलवायु संवेदनशील (Climate Vulnerable) श्रेणी में आते हैं।

Integrated Vulnerability Assessment के आधार पर ब्लॉकों की श्रेणियाँ दर्शाता मानचित्र।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के CEST डिविजन के अंतर्गत चल रहे क्लाइमेट चेंज प्रोग्राम के तहत देश के 30 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में स्टेट क्लाइमेट चेंज सेल्स (SCCCs) स्थापित की गई हैं ताकि केंद्र और राज्यों तथा राज्यों के बीच जलवायु कार्रवाई में बेहतर समन्वय स्थापित किया जा सके।

इसी क्रम में, मेघालय क्लाइमेट चेंज सेंटर (MCCC) को राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC) के तहत राष्ट्रीय हिमालयी पारिस्थितिकी संरक्षण मिशन (NMSHE) के एक प्रमुख घटक के रूप में स्थापित किया गया है।

भारतीय हिमालय क्षेत्र की पारिस्थितिक नाजुकता को देखते हुए जलवायु परिवर्तन प्राकृतिक व सामाजिक-आर्थिक प्रणालियों के लिए गंभीर खतरा पैदा करता है।

इसी पृष्ठभूमि में, MCCC ने मेघालय के 39 C&RD ब्लॉकों का विस्तृत जलवायु संवेदनशीलता मूल्यांकन किया है। इस अध्ययन में राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत फ्रेमवर्क का उपयोग करते हुए जैव-भौतिक तथा सामाजिक-आर्थिक संकेतकों को एकीकृत किया गया है।

अध्ययन की मुख्य बातें

📍 39 में से 25 ब्लॉक उच्च या अत्यधिक जलवायु संवेदनशील पाए गए।
📍 संवेदनशीलता बढ़ाने वाले प्रमुख कारक:

  • संस्थागत ऋण तक सीमित पहुंच

  • निम्न घरेलू आय

  • स्वास्थ्य एवं पोषण संरचना की कमी (जैसे आंगनवाड़ी केंद्र)

  • सीमित वन संसाधन

  • सिंचाई कवरेज का कम होना

ये कारक इस ओर संकेत करते हैं कि राज्य में अनुकूलन क्षमता बढ़ाने और जलवायु-सहिष्णु आजीविका को बढ़ावा देने के लिए लक्षित नीति हस्तक्षेप की आवश्यकता है।

अध्ययन क्यों महत्वपूर्ण है?

  • यह शोध नीति निर्माताओं को स्थानीय स्तर की कमजोरियों की स्पष्ट समझ प्रदान करता है, जिन्हें जिला-स्तरीय अध्ययन अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

  • ब्लॉक-स्तर के इस मूल्यांकन से मेघालय के विविध भौगोलिक क्षेत्रों और समुदायों के लिए अनुकूल, स्थान-विशिष्ट रणनीतियाँ बनाने में मदद मिलेगी।

  • निष्कर्ष बताते हैं कि ग्रामीण स्तर पर एकीकृत जलवायु अनुकूलन योजना कितनी आवश्यक है, खासकर हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को जलवायु-सहिष्णु बनाने के लिए।

    मेघालय में ब्लॉक स्तर पर एकीकृत संवेदनशीलता (Integrated Vulnerability) में योगदान देने वाले कारक।


अध्ययन का प्रकाशन

इस शोध कार्य “Integrated Climate Vulnerability Assessment of Meghalaya at Block Level” को Discover Sustainability नामक प्रतिष्ठित जर्नल में प्रकाशित किया गया है, जो इसकी वैज्ञानिक एवं नीतिगत महत्व को दर्शाता है।


जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण और सतत विकास पर एशियन कॉन्फ्रेंस में डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा – ‘भारत पर्यावरणीय स्थिरता का वैश्विक अग्रदूत’

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एशियन कॉन्फ्रेंस ऑन ज्योग्राफी (ACG 2025) में केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह का संबोधन — जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण और सतत संसाधन प्रबंधन पर गहन चर्चा

नई दिल्ली स्थित जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में आयोजित एशियन कॉन्फ्रेंस ऑन ज्योग्राफी (ACG 2025) के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि यह सम्मेलन समयोचित और अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह तीन परस्पर जुड़े वैश्विक मुद्दों—जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण और सतत संसाधन प्रबंधन—पर केंद्रित है, जो हमारे साझा भविष्य की स्थिरता को निर्धारित करते हैं।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत आर्थिक प्रगति और पर्यावरणीय स्थिरता को साथ लेकर चलने वाला वैश्विक पथप्रदर्शक बन गया है। भारत का लक्ष्य 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन प्राप्त करना और “लाइफ–लाइफस्टाइल फॉर एनवायरनमेंट” आंदोलन के माध्यम से प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन शैली को बढ़ावा देना है।

डॉ. सिंह ने जामिया मिलिया इस्लामिया द्वारा इस प्रतिष्ठित सम्मेलन के पहले भारतीय संस्करण की मेजबानी के लिए कुलपति प्रो. मजहर अली और आयोजन टीम की सराहना की, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और छात्रों को एक साझा मंच पर लाकर महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श का अवसर प्रदान किया।

उन्होंने कहा कि एशिया वर्तमान में वैश्विक परिवर्तन का केंद्र है, जो तीव्र औद्योगिक और आर्थिक प्रगति से तो आगे बढ़ रहा है, लेकिन यह क्षेत्र विश्व के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का आधे से अधिक योगदान देता है। आईपीसीसी की छठी मूल्यांकन रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने चेतावनी दी कि यदि उत्सर्जन की वर्तमान गति जारी रही, तो एशिया को अत्यधिक गर्मी, बाढ़ और जल संकट जैसी चरम मौसमी घटनाओं का सामना करना पड़ेगा।

डॉ. सिंह ने कहा कि दक्षिण एशिया के लगभग 75 करोड़ लोग गंभीर जलवायु खतरों से प्रभावित हैं—हिमालयी ग्लेशियर पिघलने से लेकर तटीय बाढ़ और शहरी गर्मी द्वीपों तक। उन्होंने बताया कि दिल्ली, ढाका, बैंकॉक और मनीला 2050 तक सबसे अधिक जलवायु-संवेदनशील महानगरों में शामिल होंगे।

उन्होंने कहा कि शहरीकरण विकास का प्रतीक होने के साथ-साथ चुनौती भी बन गया है, क्योंकि अनियोजित विस्तार, बाढ़ क्षेत्र में अतिक्रमण, भूजल का क्षय और प्रदूषण के बढ़ते स्तर गंभीर चिंता का विषय हैं।

डॉ. सिंह ने अपशिष्ट-से-धन (Waste-to-Wealth) तकनीकों और परिपत्र अर्थव्यवस्था (Circular Economy) को भविष्य की कुंजी बताया, जहां ‘कचरे’ की अवधारणा ही समाप्त हो जाएगी। उन्होंने देहरादून में प्रयुक्त खाद्य तेल पुनर्चक्रण जैसी पहलों का उदाहरण देते हुए कहा कि इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ समुदाय स्तर पर आय सृजन भी होता है।

उन्होंने कहा कि किसी भी सरकारी योजना की सफलता जनभागीदारी पर निर्भर करती है — “जब तक यह सामाजिक आंदोलन नहीं बनता, तब तक कोई भी नीति या संगोष्ठी अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकती।”

डॉ. सिंह ने कहा कि भारत का सतत विकास के प्रति संकल्प विभिन्न सरकारी पहलों में परिलक्षित होता है — जैसे राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC), स्मार्ट सिटी मिशन, अमृत योजना और स्वच्छ भारत अभियान। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के “लाइफ” अभियान की भी प्रशंसा की, जिसने जिम्मेदार उपभोग और पर्यावरणीय जीवनशैली को जनांदोलन का रूप दिया।

उन्होंने कहा कि “भारत की ग्रीन हाइड्रोजन, बायो-इकोनॉमी, परिपत्र अर्थव्यवस्था और डिजिटल इंडिया जैसी पहलें आर्थिक विकास और पारिस्थितिक संतुलन को साथ लेकर चलने का संकल्प दर्शाती हैं।”

डॉ. सिंह ने इस अवसर पर वैज्ञानिक अनुसंधान, प्रौद्योगिकी, और शिक्षा संस्थानों की भूमिका पर भी जोर दिया। उन्होंने एनईपी 2020 का उल्लेख करते हुए कहा कि नई शिक्षा नीति छात्रों को अंतःविषय अध्ययन का अवसर देती है, जिससे वे भूगोल जैसे विषयों के माध्यम से पर्यावरणीय समझ विकसित कर सकें।

उन्होंने कहा कि “जलवायु कार्रवाई की भाषा युवाओं की भाषा होनी चाहिए — डिजिटल, रचनात्मक और प्रेरणादायक।” उन्होंने सुझाव दिया कि सोशल मीडिया और डिजिटल अभियानों के माध्यम से जागरूकता बढ़ाई जानी चाहिए।

डॉ. सिंह ने कहा कि भारत अंतरराष्ट्रीय साझेदारी में भी अग्रणी है — अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) और आपदा-प्रतिरोधी अवसंरचना गठबंधन (CDRI) जैसी पहलें इसका प्रमाण हैं।

सम्मेलन के अंत में उन्होंने कहा, “जलवायु केवल नीति-निर्माताओं या वैज्ञानिकों की चिंता का विषय नहीं है; यह हर नागरिक का व्यक्तिगत विषय है—हमारे स्वास्थ्य, हमारे कल्याण और हमारी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए।”


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