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आंबेडकर जयंती पर संसद परिसर में श्रद्धांजलि, नेताओं ने बाबासाहेब के विचारों को बताया प्रेरणास्रोत

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नई दिल्ली- सी. पी. राधाकृष्णन,नरेंद्र मोदीऔर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने आज संसद भवन परिसर स्थित प्रेरणा स्थल में डॉ. बी. आर. आंबेडकर की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी।

इस अवसर पर कई केंद्रीय मंत्री, राज्यसभा में नेता प्रतिपक्षमल्लिकार्जुन खड़गे, राज्यसभा के उपसभापति  हरिवंश, सांसद, पूर्व सांसद तथा अन्य गणमान्य व्यक्ति भी उपस्थित रहे और उन्होंने बाबासाहेब को नमन किया।

इसके बाद संविधान सदन के केंद्रीय कक्ष में भी डॉ. आंबेडकर के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की गई। इस अवसर पर लोकसभा सचिवालय के महासचिव उत्पल कुमार सिंह सहित कई वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे।

 “Know Your Leader” कार्यक्रम में युवाओं को संदेश

संविधान सदन के केंद्रीय कक्ष में आयोजित “Know Your Leader” कार्यक्रम के दौरान लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने अपने जीवन की हर चुनौती को अवसर में बदल दिया। उनका जीवन, विचार और राष्ट्र निर्माण में योगदान हम सभी के लिए प्रेरणास्रोत है।

उन्होंने कहा कि संविधान में समानता का अधिकार और बिना भेदभाव के मतदान का अधिकार जैसे प्रावधानों ने एक मजबूत और प्रगतिशील भारत की नींव रखी है, जो आज विश्व के लोकतंत्रों को भी प्रेरित कर रहा है।

 युवाओं को “Nation First” का संदेश

लोकसभा अध्यक्ष ने युवाओं को देश के भविष्य का सच्चा प्रतिनिधि बताते हुए कहा कि उन्हें हमेशा “Nation First” की भावना के साथ कार्य करना चाहिए। उन्होंने कहा कि युवाओं की प्रतिभा, कौशल और नवाचार भारत को एक मजबूत और विकसित राष्ट्र बनाएंगे।

सोशल मीडिया पर भी साझा किया संदेश

ओम बिरला ने सोशल मीडिया मंच X पर अपने संदेश में कहा कि डॉ. आंबेडकर का जीवन संघर्ष, साहस और समर्पण की प्रेरणादायक गाथा है। उन्होंने विषम परिस्थितियों में भी शिक्षा और कड़ी मेहनत के बल पर सफलता हासिल की और करोड़ों वंचितों के लिए आशा की किरण बने।

उन्होंने कहा कि बाबासाहेब ने समानता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व के मूल्यों को अपने जीवन का आधार बनाया और इन्हें संविधान में शामिल कर देश को एक मजबूत दिशा दी।

निष्कर्ष

आंबेडकर जयंती के अवसर पर संसद परिसर में आयोजित इस कार्यक्रम ने बाबासाहेब के विचारों और उनके योगदान को पुनः स्मरण कराया। नेताओं ने एक स्वर में कहा कि डॉ. आंबेडकर के आदर्श आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं और एक समावेशी, न्यायपूर्ण और सशक्त भारत के निर्माण में मार्गदर्शक बने रहेंगे।

उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने ‘Tides of Time’ पुस्तक का किया विमोचन, संसद के भित्ति चित्रों में भारत की सभ्यतागत यात्रा का वर्णन

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भारत के उपराष्ट्रपति एवं राज्यसभा के सभापति सी. पी. राधाकृष्णन ने आज नई दिल्ली के संविधान सदन में ‘Tides of Time: Bharat’s History through Murals in Parliament’ नामक पुस्तक का विमोचन किया। यह लोकसभा सचिवालय का प्रकाशन है, जिसकी लेखिका राज्यसभा सांसद सुधा मूर्ति हैं।

सभा को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने इस अवसर पर प्रसन्नता व्यक्त की और संसद की भित्ति चित्रों की “शाश्वत सुंदरता और गहन प्रतीकात्मकता” को चित्रित करने तथा इतिहास को पीढ़ियों के लिए सुलभ बनाने के लिए सुधा मूर्ति की सराहना की। उन्होंने कहा कि संविधान सदन में स्थित भित्ति चित्र केवल कला के नमूने नहीं हैं, बल्कि भारत की सभ्यतागत यात्रा को दर्शाने वाले दृश्य कथानक हैं।

उन्होंने कहा कि उत्तर में वैशाली से लेकर दक्षिण में कुडवोलाई प्रणाली तक भारत में लोकतांत्रिक परंपराएं निरंतर, समावेशी और समाज में गहराई से निहित रही हैं। ये परंपराएं संवाद, सहमति और विविध मतों के सम्मान पर आधारित व्यापक सभ्यतागत मूल्यों का हिस्सा हैं, जो भारत को “लोकतंत्र की जननी” बनाते हैं।

महान तमिल कवि सुब्रमण्यम भारती का उद्धरण देते हुए उपराष्ट्रपति ने भारत की बुद्धिमत्ता, गरिमा, उदारता और सांस्कृतिक गहराई की समृद्धि पर प्रकाश डाला और कहा कि ऐसी नींव स्वाभाविक रूप से समावेशिता और सभी मतों के सम्मान को बढ़ावा देती है।

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में संसद भवन में पारंपरिक प्रतीकों के समावेशन की सराहना की। साथ ही, उन्होंने राष्ट्रपति के संयुक्त सत्र संबोधन के दौरान चोल वंश के पवित्र सेंगोल के प्रदर्शन का उल्लेख करते हुए इसे आधुनिक भारत को उसकी सभ्यतागत जड़ों से जोड़ने वाला शक्तिशाली प्रतीक बताया।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि संसद एक जीवंत लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों—संवाद, बहस, असहमति और चर्चा—का प्रतिनिधित्व करती है। उन्होंने जोर दिया कि चर्चा, बहस और असहमति महत्वपूर्ण हैं, लेकिन अंततः उन्हें राष्ट्रीय हित में रचनात्मक निर्णय लेने की दिशा में योगदान देना चाहिए।

उन्होंने इस पुस्तक को भारत की सभ्यतागत यात्रा को समर्पित एक अद्भुत कृति बताया और कहा कि इसमें 124 भित्ति चित्रों के माध्यम से इतिहास को जीवंत रूप दिया गया है। यह पुस्तक सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर महर्षि वाल्मीकि और चाणक्य जैसे महान विचारकों की बुद्धिमत्ता तथा महावीर और गौतम बुद्ध की आध्यात्मिक शिक्षाओं तक की यात्रा को समेटती है। इसमें अशोक और छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे शासकों की उपलब्धियों, कोणार्क सूर्य मंदिर जैसे स्मारकों और भक्ति आंदोलन की सांस्कृतिक समृद्धि को भी दर्शाया गया है।

उन्होंने कहा कि यह पुस्तक भारत के स्वतंत्रता संग्राम को भी श्रद्धांजलि अर्पित करती है, जिसमें दांडी मार्च जैसे आंदोलन और महात्मा गांधी तथा सुभाष चंद्र बोस जैसे महान नेताओं का उल्लेख किया गया है।

प्रधानमंत्री के ‘विकसित भारत @ 2047’ के दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने “विकास भी, विरासत भी” के सिद्धांत को दोहराया और कहा कि विकास और विरासत एक-दूसरे के पूरक हैं। संसद के भित्ति चित्र इस दर्शन को दर्शाते हैं, जो प्रगति को पहचान, मूल्यों और निरंतरता से जोड़ते हैं।

उपराष्ट्रपति ने सुधा मूर्ति की सराहना करते हुए कहा कि वे ज्ञान, विनम्रता और सामाजिक प्रतिबद्धता का अद्वितीय संगम हैं। उन्होंने कॉर्पोरेट जगत से सामाजिक सेवा और संसद तक की उनकी यात्रा को प्रेरणादायक बताया और कहा कि उनके सभी कार्य व्यापक जनहित से प्रेरित होते हैं। उन्होंने इस प्रकाशन को प्रस्तुत करने के लिए लोकसभा सचिवालय के प्रयासों की भी प्रशंसा की।

सुब्रमण्यम भारती का पुनः उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भाषा, क्षेत्र और संस्कृति की विविधता के बावजूद भारत अपने राष्ट्रीय उद्देश्य में एकजुट है और हमेशा एक रहेगा।

“राष्ट्र प्रथम” की भावना को अपनाने का आह्वान करते हुए उपराष्ट्रपति ने सभी नागरिकों से आग्रह किया कि वे प्रतिबद्धता, ईमानदारी और गर्व के साथ राष्ट्र सेवा के लिए स्वयं को समर्पित करें।

इस अवसर पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, केंद्रीय मंत्री जे. पी. नड्डा और मनोहर लाल, राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश, राज्यसभा सांसद एवं पुस्तक की लेखिका सुधा मूर्ति सहित संसद के दोनों सदनों के सदस्य और वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

उप-सभापति हरिवंश ने एआईपीओसी के पूर्ण सत्र में एआई की भूमिका पर दिया जोर

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लखनऊ- राज्यसभा के माननीय उप-सभापति हरिवंश ने मंगलवार को लखनऊ में आयोजित 86वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन (AIPOC) के पूर्ण सत्र को संबोधित किया। विभिन्न राज्यों से आए पीठासीन अधिकारियों को संबोधित करते हुए उन्होंने विधायिकाओं को अधिक प्रभावी और दक्ष बनाने में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की भूमिका पर प्रकाश डाला, साथ ही इस तकनीक को सटीक और विश्वसनीय बनाने के लिए आवश्यक कदमों की रूपरेखा भी प्रस्तुत की।

अपने संबोधन में हरिवंश ने संसद और राज्य विधानसभाओं के बीच अधिक समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि इससे विधायिकाओं के संस्थागत ज्ञान का प्रभावी उपयोग संसद और राज्य विधानसभाओं—दोनों के लिए संभव हो सकेगा।

नीतियों तक समन्वित पहुंच और सामंजस्यपूर्ण सहयोग की परिकल्पना रखते हुए उन्होंने कहा, “विधायिकाएं सभी आधिकारिक नीति दस्तावेजों की संरक्षक होती हैं, जिनमें विधायी बहसें, बजट और अन्य महत्वपूर्ण अभिलेख शामिल हैं। ये दस्तावेज सदन के पटल पर रखे जाने के बाद सदन का हिस्सा बन जाते हैं। यह जानकारी अक्सर विभिन्न मंत्रालयों में बिखरी रहती है। संसद और राज्य विधानसभाएं एआई का उपयोग कर एक ऐसा मंच विकसित कर सकती हैं, जिससे ये सभी दस्तावेज आसानी से सुलभ हो सकें और विधायिका एक ज्ञान केंद्र के रूप में स्थापित हो सके।”

उन्होंने भारतीय संदर्भ के अनुरूप एआई विकसित करने के लिए एक ‘डेटा लेक’ की आवश्यकता पर भी जोर दिया, जिसमें देशभर की विधायी बहसों की विशिष्ट भाषा, शब्दावली और दस्तावेजों का उपयोग कर तकनीक को प्रशिक्षित किया जा सके।

उप-सभापति ने एआई के उपयोग में मानव निगरानी की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए एक हाइब्रिड तंत्र का आह्वान किया। उन्होंने कहा, “संसदीय उपयोग के लिए एआई को उपयुक्त बनाने वाली बात केवल उसकी एल्गोरिदमिक क्षमता नहीं है, बल्कि वह ज्ञान है, जिस पर उसे प्रशिक्षित किया जाता है। संसदीय एआई को संसद के भीतर ही, सावधानीपूर्वक चयनित संसदीय डेटा से प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। कौशल सीखे या आउटसोर्स किए जा सकते हैं, लेकिन ज्ञान संदर्भ-आधारित होता है और संस्था के भीतर गहराई से निहित रहता है।”

अपने संबोधन में उन्होंने बताया कि संसद में एआई-सक्षम ट्रांसक्रिप्शन और विभिन्न भाषाओं में एक साथ अनुवाद जैसी सेवाओं का परीक्षण किया जा रहा है। वर्तमान में सांसद सदन के कार्यसूची और प्रशासनिक दस्तावेज अपनी पसंद की भाषा में प्राप्त कर सकते हैं, जो एआई के माध्यम से संभव हुआ है। उन्होंने यह भी बताया कि प्रश्नकाल के लिए प्रश्नों की स्वीकार्यता की जांच, पूर्ववर्ती निर्णयों और मिसालों की खोज जैसे नियमित प्रशासनिक कार्य भी एआई की सहायता से किए जा सकते हैं।

इसके साथ ही हरिवंश ने विधायकों और कर्मचारियों के लिए अधिक जागरूकता और प्रशिक्षण कार्यक्रमों की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि वे अपनी भूमिकाओं का प्रभावी ढंग से निर्वहन कर सकें।

सम्मेलन में डिजिटल उपकरणों के उपयोग के अलावा जवाबदेही को सुदृढ़ करने और विधायकों की क्षमता निर्माण जैसे विषयों पर भी चर्चा की गई। यह सम्मेलन 19 जनवरी को माननीय राज्यपाल आनंदीबेन पटेल और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की उपस्थिति में प्रारंभ हुआ।

शीतकालीन सत्र से पहले PM मोदी का संबोधन: लोकतांत्रिक ऊर्जा, नीति-केन्द्रित बहस और राष्ट्रहित पर जोर

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज संसद परिसर में 2025 के शीतकालीन सत्र की शुरुआत से पहले मीडिया को संबोधित किया। प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि यह सत्र केवल एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि राष्ट्र की तीव्र प्रगति की यात्रा में नई ऊर्जा का महत्वपूर्ण स्रोत है। उन्होंने कहा, “मेरा दृढ़ विश्वास है कि यह सत्र देश की प्रगति को गति देने के लिए चल रहे प्रयासों में नई ऊर्जा का संचार करेगा।”

प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत ने लगातार अपनी लोकतांत्रिक परंपराओं की जीवंतता और भावना को प्रदर्शित किया है। हाल ही में हुए बिहार विधानसभा चुनावों का उल्लेख करते हुए, उन्होंने रिकॉर्ड मतदान को राष्ट्र की लोकतांत्रिक शक्ति का सशक्त प्रमाण बताया। उन्होंने महिला मतदाताओं की बढ़ती भागीदारी को भी अत्यंत उत्साहजनक और प्रेरणादायक बताया, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया में नया विश्वास और नई उम्मीद जगाती है। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे भारत की लोकतांत्रिक संस्थाएं मजबूत हो रही हैं, विश्व यह देख रहा है कि यह लोकतांत्रिक ढांचा देश की आर्थिक क्षमता को भी मजबूत कर रहा है। उन्होंने कहा, “भारत ने सिद्ध किया है कि लोकतंत्र डिलीवर कर सकता है।” मोदी ने जोर देकर कहा, “भारत की आर्थिक प्रगति जिस गति से नए आयाम छू रही है, वह हमें आत्मविश्वास देती है और विकसित भारत के लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए नई शक्ति प्रदान करती है।”

प्रधानमंत्री ने सभी राजनीतिक दलों से आग्रह किया कि सत्र का केंद्र राष्ट्रीय हित, रचनात्मक बहस और नीतिगत परिणाम होने चाहिए। उन्होंने कहा कि संसद को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि वह देश के लिए क्या सोच रखती है और क्या देने के लिए प्रतिबद्ध है। विपक्ष से लोकतांत्रिक जिम्मेदारी निभाने का आह्वान करते हुए, उन्होंने सार्थक और गंभीर मुद्दे उठाने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने चेताया कि चुनावी हार की निराशा को संसद की कार्यवाही पर हावी नहीं होने देना चाहिए। वहीं, चुनावी जीत के अहंकार से भी सावधान करते हुए उन्होंने कहा, “शीतकालीन सत्र में संतुलन, जिम्मेदारी और जनप्रतिनिधियों की अपेक्षित गरिमा झलकनी चाहिए।”

प्रधानमंत्री ने सूचित बहस के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि सदस्यों को यह देखना चाहिए कि क्या अच्छा चल रहा है उसे और बेहतर कैसे बनाया जाए, और जहां आवश्यकता हो वहां सही, रचनात्मक आलोचना प्रस्तुत की जाए ताकि नागरिकों को सही जानकारी मिल सके। उन्होंने कहा, “यह काम कठिन है, लेकिन देश के लिए अनिवार्य है।”

पहली बार चुने गए और युवा सांसदों को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि कई सांसदों को — चाहे वे किसी भी दल के हों — अपनी बात रखने और अपने क्षेत्रों के मुद्दे उठाने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल रहा है। उन्होंने सभी दलों से आग्रह किया कि इन सांसदों को उचित मंच उपलब्ध कराया जाए। प्रधानमंत्री ने कहा, “संसद और देश, दोनों को नए भारत की नई पीढ़ी की ऊर्जा और विचारों का लाभ मिलना चाहिए।”

प्रधानमंत्री ने कहा कि संसद नीतियों और डिलीवरी का स्थान है, न कि नाटक या नारेबाज़ी का। “नारे और नाटक के लिए दुनिया में जगहों की कमी नहीं है। लेकिन संसद में हमारा फोकस नीति पर होना चाहिए और हमारी नीयत स्पष्ट होनी चाहिए।”

उन्होंने इस सत्र के विशेष महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि यह सत्र राज्यसभा के नए माननीय सभापति के मार्गदर्शन की शुरुआत का प्रतीक है। उन्होंने सभापति को बधाई देते हुए विश्वास व्यक्त किया कि उनके नेतृत्व में संसदीय प्रक्रियाएं और मजबूत होंगी।

प्रधानमंत्री ने कहा कि जीएसटी सुधारों ने नागरिकों के बीच भरोसे का मजबूत माहौल बनाया है और यह सुधार अब अगली पीढ़ी के सुधारों के रूप में विकसित हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि शीतकालीन सत्र में इस दिशा में कई महत्वपूर्ण पहलों को आगे बढ़ाया जाएगा।

हालिया संसदीय प्रवृत्तियों पर चिंता व्यक्त करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि हाल के समय में संसद को कभी चुनावों की तैयारी के मैदान के रूप में तो कभी चुनावी हार की निराशा निकालने के मंच के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने कहा, “देश ने इन तरीकों को स्वीकार नहीं किया है। अब समय आ गया है कि वे अपनी रणनीति और दृष्टिकोण बदलें। यदि आवश्यकता हो तो मैं उन्हें बेहतर प्रदर्शन करने के टिप्स देने के लिए भी तैयार हूँ।”

उन्होंने कहा, “मैं आशा करता हूँ कि हम सभी इन जिम्मेदारियों को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ेंगे। और मैं देश को आश्वस्त करता हूँ कि भारत प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ रहा है।” उन्होंने पुनः दोहराया कि “देश नई ऊँचाइयों की ओर बढ़ रहा है और इस यात्रा में यह सदन नई ऊर्जा और शक्ति प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।”


उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने संविधान दिवस पर संविधान की मूल भावना और राष्ट्रीय संकल्प को किया रेखांकित

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उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति, सी. पी. राधाकृष्णन ने आज संविधान सदन के केंद्रीय कक्ष में आयोजित संविधान दिवस (संविधान दिवस) समारोह को संबोधित किया। अपने संबोधन में उन्होंने भारत के संविधान की दूरदर्शिता, मूल्यों और उसकी स्थायी विरासत को रेखांकित किया।

संविधान: राष्ट्र की आत्मा का दस्तावेज़

उपराष्ट्रपति ने कहा कि 2015 से हर वर्ष 26 नवंबर को संविधान दिवस मनाया जाता है, जो आज प्रत्येक भारतीय के लिए गर्व का अवसर बन गया है। उन्होंने कहा कि डॉ. भीमराव अम्बेडकर, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, एन. गोपालस्वामी अयंगार, अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर, दुर्गा बाई देशमुख जैसे महान नेताओं ने संविधान का निर्माण इस तरह किया कि उसकी हर पंक्ति में राष्ट्र की आत्मा बसती है।

उन्होंने कहा कि संविधान स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग, सपनों और समष्टिगत बुद्धिमत्ता का दस्तावेज़ है, जिसने भारत को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र बनने की नींव प्रदान की।

तेज़ विकास की मिसाल

राधाकृष्णन ने कहा कि व्यावहारिक और समग्र (saturation-based) दृष्टिकोणों के कारण भारत ने विकास संकेतकों पर उल्लेखनीय प्रगति हासिल की है।

  • उन्होंने बताया कि भारत आज चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और जल्द ही तीसरे स्थान पर पहुंचेगा।

  • पिछले 10 वर्षों में 25 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकाला गया।

  • 100 करोड़ से अधिक नागरिक विभिन्न सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के दायरे में आए हैं।

भारत — प्राचीन काल से लोकतंत्र की जन्मस्थली

उपराष्ट्रपति ने कहा कि लोकतंत्र भारत के लिए नया नहीं है। वैशाली के गणराज्य और दक्षिण भारत के चोलों की “कुडवोलई” प्रणाली इसका प्रमाण हैं। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर और बिहार में हाल के चुनावों में उच्च मतदान लोगों के लोकतंत्र में अटूट विश्वास को दर्शाता है।

महिला शक्ति और जनजातीय योगदान को सलाम

उन्होंने संविधान सभा की महिला सदस्यों का सम्मान करते हुए हंसा मेहता के शब्दों को उद्धृत किया—
“हमने सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की माँग की है।”

उन्होंने कहा कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 उनके योगदान के प्रति उचित सम्मान है, जो महिलाओं की बराबरी की भागीदारी सुनिश्चित करता है।

उन्होंने जनजातीय समुदायों की स्वतंत्रता आंदोलन और संविधान निर्माण में भूमिका को भी याद किया और कहा कि जनजातीय गौरव दिवस (2021 से) उनके सम्मान का प्रतीक है।

न्याय, समानता और सबके लिए अवसर

उपराष्ट्रपति ने कहा कि संविधान में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांत प्रत्येक नागरिक को, चाहे वह किसी भी जाति, क्षेत्र, भाषा या धर्म का हो, समान अधिकार प्रदान करते हैं।

परिवर्तनशील समय में सुधारों की आवश्यकता

उन्होंने कहा कि तेजी से बदलते वैश्विक परिदृश्य में

  • चुनावी,

  • न्यायिक, और

  • वित्तीय प्रणाली में सुधार आवश्यक हैं।

उन्होंने जीएसटी (One Nation–One Tax) और जाम (जन-धन, आधार, मोबाइल) त्रिमूर्ति को सरल शासन और सीधे लाभ वितरण के प्रभावी मॉडल बताया।

विक्सित भारत @2047 का संकल्प

समापन में उपराष्ट्रपति ने कहा कि संविधान को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि उसके मूल्यों को अपने जीवन में उतारें और एक सामर्थ्यवान, समावेशी तथा समृद्ध विक्सित भारत 2047 के निर्माण में अपना योगदान दें।


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