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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने फकीर मोहन विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह को संबोधित किया, नए ऑडिटोरियम का उद्घाटन किया

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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने आज (3 फरवरी, 2026) ओडिशा के बालासोर में फकीर मोहन विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह की शोभा बढ़ाई तथा विश्वविद्यालय के नए सभागार (ऑडिटोरियम) का उद्घाटन किया।

इस अवसर पर संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने व्यासकवि फकीर मोहन सेनापति जी को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि अपने छात्र जीवन के दौरान वे उनकी कालजयी कहानी ‘रेवती’ से गहराई से प्रभावित हुई थीं और यह प्रभाव आज भी उनके मन में अंकित है। उन्होंने कहा कि उन्नीसवीं शताब्दी में एक बालिका का शिक्षा प्राप्त करने का दृढ़ संकल्प उसकी अदम्य भावना का प्रमाण है। राष्ट्रपति ने बताया कि उन्होंने स्वयं एक दूरस्थ आदिवासी गाँव में अध्ययन किया और अपने संकल्प के बल पर भुवनेश्वर जाकर हाई स्कूल और कॉलेज की शिक्षा पूरी की। इस प्रकार फकीर मोहन जी उनके लिए प्रेरणा स्रोत रहे हैं।

राष्ट्रपति ने कहा कि फकीर मोहन जी को अपनी मातृभाषा से गहरा प्रेम था। उन्होंने लिखा था— “मेरी मातृभाषा मुझे सर्वोपरि है।” राष्ट्रपति ने कहा कि मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने से विद्यार्थी अपने परिवेश, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक वातावरण को बेहतर ढंग से समझ पाते हैं। इससे वे अपने सभ्यतागत मूल्यों और जीवन पद्धति से परिचित होते हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 मातृभाषा के महत्व पर विशेष बल देती है और विद्यार्थियों को अपनी संस्कृति से जुड़े रहने का मार्गदर्शन करती है।

राष्ट्रपति ने कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा अत्यंत समृद्ध है। हमारे शास्त्र और पांडुलिपियाँ ज्ञान और विवेक से परिपूर्ण हैं। काव्य और साहित्य के अतिरिक्त इनमें विज्ञान, चिकित्सा, खगोल विज्ञान और वास्तुकला जैसे क्षेत्रों का भी गहन ज्ञान निहित है। युवा विद्यार्थी इस प्राचीन ज्ञान परंपरा में अनुसंधान कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि अतीत को समझकर और वर्तमान को आत्मसात कर विद्यार्थी न केवल अपना भविष्य बल्कि देश का भविष्य भी संवार सकते हैं।

राष्ट्रपति ने स्नातक हो रहे विद्यार्थियों को बधाई दी और कहा कि ज्ञान, उत्साह और प्रतिबद्धता की शक्ति से वे समाज में सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि जहाँ भी जाएँ और जो भी करें, हर प्रयास में सफलता की कुंजी समर्पण है। उन्होंने कहा कि सफल जीवन और सार्थक जीवन एक समान नहीं होते। सफल जीवन अच्छा है, लेकिन जीवन को सार्थक बनाना उससे भी बेहतर है। उन्होंने कहा कि यश, प्रतिष्ठा और आर्थिक सुरक्षा प्राप्त करना आवश्यक है, लेकिन साथ ही दूसरों के लिए कुछ करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे उन लोगों की सहायता करें जो विकास की यात्रा में पीछे रह गए हैं, क्योंकि समाज का विकास तभी संभव है जब सभी का विकास हो।

राष्ट्रपति को यह जानकर प्रसन्नता हुई कि फकीर मोहन विश्वविद्यालय शैक्षणिक अध्ययन के साथ-साथ अनुसंधान और आउटरीच कार्यक्रमों को भी महत्व देता है। उन्होंने कहा कि बालासोर-भद्रक क्षेत्र धान, पान और मछली के लिए प्रसिद्ध है और विश्वविद्यालय द्वारा इन क्षेत्रों में किए जा रहे अनुसंधान एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम सराहनीय हैं। उन्होंने विश्वविद्यालय की ‘बैक टू स्कूल’, ‘अर्न व्हाइल लर्न’, ‘ईच वन टीच वन’, पर्यावरण जागरूकता और समुद्र तट स्वच्छता जैसे कार्यक्रमों की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि बालासोर और भद्रक के समुद्र तटों पर नीले केकड़े (ब्लू क्रैब) प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं और ऐसे में ब्लू क्रैब या हॉर्सशू क्रैब पर अनुसंधान केंद्र की स्थापना विश्वविद्यालय की दूरदर्शिता को दर्शाती है।

राष्ट्रपति ने कहा कि समाज के सभी वर्गों की वृद्धि, सुरक्षा और तकनीकी विकास से देश की प्रगति को गति मिलेगी। इस दिशा में देश के सभी विश्वविद्यालयों की महत्वपूर्ण भूमिका है। विश्वविद्यालयों की विशेष जिम्मेदारी है कि वे समावेशी विकास, नवाचार और सामाजिक परिवर्तन के उत्प्रेरक बनें। आलोचनात्मक चिंतन, नैतिक नेतृत्व और स्थानीय व वैश्विक चुनौतियों से जुड़ा अनुसंधान विकसित कर उच्च शिक्षण संस्थान एक ऐसे भविष्य का निर्माण कर सकते हैं जो सतत, न्यायसंगत और मानवीय मूल्यों पर आधारित हो। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि फकीर मोहन विश्वविद्यालय अपनी शैक्षणिक दृष्टि और सामुदायिक सहभागिता के माध्यम से इस दिशा में परिवर्तनकारी भूमिका निभाएगा।




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