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केंद्रीय तमिलनाडु विश्वविद्यालय के 11वें दीक्षांत समारोह में उपराष्ट्रपति ने विद्यार्थियों को दी शुभकामनाएं

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तिरुवरुर- उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने आज तिरुवरुर स्थित केंद्रीय तमिलनाडु विश्वविद्यालय (CUTN) के 11वें दीक्षांत समारोह में भाग लिया और डिग्री प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को जीवन के महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुंचने के लिए बधाई दी।

दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि दीक्षांत समारोह केवल डिग्री प्रदान करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह शिक्षा की परिवर्तनकारी शक्ति, ज्ञान की खोज तथा विद्यार्थियों की मेहनत, समर्पण, दृढ़ता और संघर्ष का उत्सव है।

उन्होंने स्नातक विद्यार्थियों के माता-पिता और शिक्षकों को भी बधाई दी। उन्होंने कहा कि माता-पिता और शिक्षकों ने अपने बच्चों एवं विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य के लिए अनेक वर्तमान सुख-सुविधाओं का त्याग किया है।

थिरुवरुर ज्ञान, आध्यात्म और कला की धरती

उपराष्ट्रपति ने थिरुवरुर के ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवान त्यागराज के भव्य मंदिर के लिए प्रसिद्ध यह पवित्र नगर सदियों से आध्यात्मिकता, विद्वता और कला की उत्कृष्टता का केंद्र रहा है। उन्होंने कहा कि इस पवित्र भूमि ने संतों, विद्वानों और कर्नाटक संगीत की महान त्रिमूर्ति को जन्म दिया है। जब संस्कृति, शिक्षा और मूल्य एक साथ विकसित होते हैं, तभी वास्तविक महानता का निर्माण होता है।

शिक्षा का उद्देश्य केवल अंक प्राप्त करना नहीं

उपराष्ट्रपति ने कहा कि पिछले 12 वर्षों में उच्च शिक्षा का तेजी से विस्तार हुआ है। उन्होंने कहा कि देशभर में आयोजित दीक्षांत समारोहों में वे अक्सर देखते हैं कि पुरुषों की तुलना में अधिक महिलाएं डिग्री और पदक प्राप्त कर रही हैं। उन्होंने इसे एक स्वागत योग्य बदलाव बताया।

उन्होंने कहा कि आज शिक्षा को केवल परीक्षा और अंकों के आधार पर नहीं मापा जा सकता।

उन्होंने कहा कि शिक्षा का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि व्यक्ति स्वतंत्र रूप से सोचने, प्रभावी ढंग से संवाद करने, मिलकर काम करने और जीवनभर सीखते रहने में कितना सक्षम है।

उपराष्ट्रपति ने केंद्रीय तमिलनाडु विश्वविद्यालय द्वारा बहुविषयक शिक्षा, अनुसंधान, नवाचार और मूल्य आधारित शिक्षा पर दिए जा रहे जोर की सराहना की।

परीक्षाओं में अनुचित साधनों पर रोक जरूरी

संसद द्वारा हाल ही में पारित लोक परीक्षाएं (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि परीक्षाओं में अनुचित साधनों को रोकना और विद्यार्थियों के हितों की रक्षा करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

झारखंड के राज्यपाल के रूप में अपने कार्यकाल को याद करते हुए उन्होंने बताया कि उनके कार्यकाल के दौरान झारखंड सरकार ने भी इसी प्रकार का विधेयक पारित किया था और तत्कालीन राज्यपाल के रूप में उन्होंने उस पर तुरंत हस्ताक्षर किए थे, जिसके बाद वह कानून बन सका।

उन्होंने कहा कि अच्छे लोगों के हितों की रक्षा के लिए समाज में गलत कार्य करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने सार्वजनिक परीक्षाओं की निष्पक्षता और पारदर्शिता बनाए रखने के लिए मजबूत कदम उठाने पर जोर दिया।

विद्यार्थी ज्ञान के उपभोक्ता नहीं, निर्माता बनें

उपराष्ट्रपति ने स्नातक विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे “ज्ञान के उपभोक्ता बनने के बजाय निर्माता, अनुकरण करने वालों के बजाय नवप्रवर्तक और अनुयायी बनने के बजाय नेता बनें।”

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में भारत ‘विकसित भारत @2047’ के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने युवाओं से अपने कार्यों में “राष्ट्र प्रथम—राष्ट्र प्रथम” की भावना को सर्वोच्च स्थान देने और अपने ज्ञान, कौशल एवं नेतृत्व क्षमता का उपयोग राष्ट्र निर्माण में करने का आह्वान किया।

नशे के खिलाफ सख्त कार्रवाई की अपील

उपराष्ट्रपति ने पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों से नशीले पदार्थों की तस्करी करने वालों तथा नशे के प्रसार में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का आग्रह किया।

उन्होंने कहा कि नशे की लत न केवल व्यक्ति का जीवन बर्बाद करती है, बल्कि परिवार और पूरे समाज पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है। युवाओं को इस खतरे से बचाना सामूहिक जिम्मेदारी है।

उन्होंने विद्यार्थियों से “नशे को ना कहें—Say No to Drugs” का संदेश अपनाने और अपने मित्रों को भी नशे से दूर रहने के लिए प्रेरित करने का आह्वान किया।

1,103 विद्यार्थियों को मिली डिग्री, 50 को स्वर्ण पदक

दीक्षांत समारोह में कुल 1,103 स्नातकों को डिग्री प्रदान की गई, जिनमें शैक्षणिक उत्कृष्टता के लिए 50 विद्यार्थियों को स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया। कुल स्नातकों में 616 छात्राएं शामिल हैं। वहीं 50 स्वर्ण पदकों में से 37 पदक छात्राओं ने हासिल किए।

समारोह में तमिलनाडु के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर, नागपट्टिनम से लोकसभा सांसद थिरु वी. सेल्वराज, कुलाधिपति प्रो. जी. पद्मनाभन, कुलपति सीनियर प्रो. सुलोचना शेखर, विश्वविद्यालय के शिक्षक, अभिभावक और विद्यार्थी उपस्थित रहे।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने केंद्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, आंध्र प्रदेश के प्रथम दीक्षांत समारोह में किया संबोधन

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जनजातीय विश्वविद्यालय शिक्षा के साथ-साथ आजीविका, कौशल विकास और सामाजिक न्याय के केंद्र बनें : राष्ट्रपति

विजयनगरम- राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने आज आंध्र प्रदेश के विजयनगरम में केंद्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, आंध्र प्रदेश के प्रथम दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में भाग लिया।

अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने कहा कि केंद्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय की विशेष जिम्मेदारी है कि वह जनजातीय समाज में आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता और नीति निर्माण की योग्यता विकसित करने का केंद्र बने। उन्होंने कहा कि सामाजिक न्याय के उद्देश्य से स्थापित ऐसे संस्थानों का दायित्व केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें जनजातीय समुदायों के शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास, आजीविका और वन अधिकारों के क्षेत्र में जमीनी स्तर पर भी कार्य करना चाहिए।

उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि आने वाले वर्षों में यह विश्वविद्यालय जनजातीय और वंचित समुदायों के युवाओं के समग्र विकास के साथ-साथ पूरे क्षेत्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देगा।

जनजातीय आजीविका को बढ़ावा देने के लिए नवाचार आवश्यक

राष्ट्रपति ने कहा कि सभी विश्वविद्यालयों, विशेषकर जनजातीय विश्वविद्यालयों को ऐसी नवाचारी व्यवस्थाएं विकसित करनी चाहिए, जो जनजातीय समुदायों की आजीविका को मजबूत करें। उन्होंने कहा कि लघु वनोपज, हस्तशिल्प, मोटे अनाज (मिलेट्स), औषधीय पौधों, इको-टूरिज्म और स्थानीय उद्यमिता जैसे क्षेत्रों में रोजगार और आय के नए अवसर विकसित किए जाने चाहिए।

दीक्षांत समारोह केवल उत्सव नहीं, संकल्प का भी अवसर

राष्ट्रपति ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि दीक्षांत समारोह जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। यह केवल उपलब्धियों का उत्सव नहीं, बल्कि भविष्य के लिए नए संकल्प लेने का अवसर भी है।

उन्होंने विद्यार्थियों को तेजी से बदलते समय के अनुरूप कौशल विकास पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित न रहकर आसपास के सामाजिक और प्राकृतिक परिवेश से भी सीखना चाहिए, ताकि व्यावहारिक कौशल विकसित हो सकें।

उन्होंने विद्यार्थियों से समाज और राष्ट्र के बेहतर भविष्य के निर्माण में योगदान देने के साथ-साथ अपनी समुदाय, संस्कृति और परंपराओं से जुड़े रहने का आह्वान किया।

विरासत और आधुनिक विज्ञान का समन्वय जरूरी

राष्ट्रपति ने कहा कि तेजी से विकसित हो रहे भारत में अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़े रहते हुए आधुनिक विज्ञान का लाभ समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंचाना आवश्यक है।

उन्होंने बताया कि इसी उद्देश्य से विश्वविद्यालय ने उत्तर आंध्र प्रदेश के जनजातीय समुदायों को सशक्त बनाने के लिए 'विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी हब' की स्थापना की है।

उन्होंने यह भी कहा कि विश्वविद्यालय ने जनजातीय कल्याण, जनस्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन, खाद्य एवं पोषण सुरक्षा तथा ऊर्जा संरक्षण जैसे विषयों पर शैक्षणिक और जमीनी स्तर पर उल्लेखनीय कार्य किए हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि ये प्रयास समानता पर आधारित विकसित भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

विकसित भारत 2047 के लक्ष्य में निभाएगा महत्वपूर्ण योगदान

राष्ट्रपति ने कहा कि भारत का लक्ष्य वर्ष 2047 तक विकसित भारत का निर्माण करना है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि केंद्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय अपनी समावेशी, व्यवहारिक और पर्यावरण संरक्षण आधारित शिक्षा प्रणाली के माध्यम से इस लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण योगदान देगा।

उन्होंने आशा व्यक्त की कि आधुनिक शिक्षा के सकारात्मक पहलुओं को जनजातीय समाज से जोड़कर स्थानीय युवाओं को देश के समावेशी और संतुलित विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का अवसर मिलेगा।

रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के 36वें दीक्षांत समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का संबोधन: शिक्षा, जनजातीय विकास और विकसित भारत पर दिया विशेष जोर

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भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने आज (21 जून 2026) मध्य प्रदेश के जबलपुर स्थित रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के 36वें दीक्षांत समारोह में भाग लिया।

इस अवसर पर राष्ट्रपति ने कहा कि शिक्षा किसी भी व्यक्ति या समुदाय के विकास का सबसे प्रभावी माध्यम है। इसलिए जनजातीय समुदाय की शैक्षिक उन्नति के लिए प्रयास करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। हमें सामूहिक रूप से यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जनजातीय युवाओं को आधुनिक विकास में योगदान देने का अवसर मिले, साथ ही वे अपनी जनजातीय पहचान और विशिष्टता को उसके वास्तविक स्वरूप में सुरक्षित रख सकें। जनजातीय समुदाय के पारंपरिक कौशल और ज्ञान का विभिन्न माध्यमों से प्रसार भी किया जाना चाहिए। जनजातीय ज्ञान एवं शिल्प परंपराओं का व्यापक अध्ययन देश के सभी नागरिकों के लिए लाभकारी होगा। रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जैसे शैक्षणिक संस्थानों को इस दिशा में विशेष प्रयास करने चाहिए।

राष्ट्रपति ने कहा कि विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करने के अलावा उच्च शिक्षण संस्थान नवाचार और अनुसंधान के प्रमुख केंद्र भी होते हैं। छात्रों में रचनात्मक सोच, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और उद्यमशीलता की भावना विकसित करना इन संस्थानों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। साथ ही, छात्रों में भारतीय संस्कृति, परंपराओं और भाषाओं के प्रति गौरव की भावना विकसित करना भी आवश्यक है। आधुनिकता और परंपरा के संतुलित समन्वय से ही देश का समग्र विकास संभव होगा।

राष्ट्रपति ने कहा कि उन अध्ययनों और अनुसंधानों पर विशेष बल दिया जाना चाहिए जो राष्ट्र और समाज के लिए उपयोगी हों। पर्यावरण संरक्षण, महिला सशक्तिकरण, वंचित वर्गों का विकास, स्वच्छता और सामाजिक समरसता जैसे विषयों को पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने से समाज को लाभ होता है। इन विषयों पर अध्ययन और अनुसंधान देश के विकास के लिए योजनाएँ बनाने में भी सहायक होते हैं।

राष्ट्रपति ने कहा कि आज दुनिया तेजी से बदल रही है। हमारी भाषा और जीवनशैली में भी तेज़ी से परिवर्तन हो रहा है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कुछ शाश्वत मूल्य सदैव हमें शक्ति प्रदान करते हैं। उन्होंने विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति के मूल्यों और आदर्शों को अपने जीवन का आधार बनाने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि सत्य, अहिंसा, करुणा, सेवा और ईमानदारी जैसे मूल्य हर युग में हमारी चेतना के मूल तत्व रहे हैं। इन मूल्यों को अपनाकर वे कठिन परिस्थितियों का भी दृढ़ता से सामना कर सकते हैं, आदर्श नागरिक बन सकते हैं और राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।

राष्ट्रपति ने विद्यार्थियों से कहा कि वे केवल अपने परिवारों या विश्वविद्यालयों के प्रतिनिधि नहीं हैं, बल्कि राष्ट्र की आकांक्षाओं और उसके भविष्य के निर्माता हैं। उनके ज्ञान, ऊर्जा और संकल्प से ही विकसित भारत का सपना साकार होगा। उन्होंने उनसे आग्रह किया कि वे अपनी शिक्षा और प्रतिभा का उपयोग केवल व्यक्तिगत सफलता के लिए नहीं, बल्कि समाज के व्यापक हित के लिए भी करें। उन्होंने विद्यार्थियों को अपने आसपास के वंचित और ग्रामीण समुदायों की चुनौतियों को समझने, उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप समाधान विकसित करने, उन्हें सशक्त बनाने और विकास की मुख्यधारा से जोड़ने में योगदान देने की सलाह दी।

राष्ट्रपति ने कहा कि देश डिजिटल प्रौद्योगिकी, स्टार्टअप, हरित ऊर्जा, अंतरिक्ष अनुसंधान और आधुनिक अवसंरचना जैसे क्षेत्रों में नई ऊँचाइयाँ प्राप्त कर रहा है। उन्होंने युवाओं को इन अवसरों का लाभ उठाकर वैश्विक मंच पर अपनी पहचान बनाने की सलाह दी। साथ ही उन्होंने पर्यावरण के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करने का भी आह्वान किया। उन्होंने कहा कि जल, वन और भूमि संरक्षण, स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग, जैव विविधता की रक्षा तथा सतत विकास के प्रति प्रतिबद्धता उनके जीवन की यात्रा का अभिन्न हिस्सा होना चाहिए।


IGNOU के 39वें दीक्षांत समारोह में 3.2 लाख विद्यार्थियों को मिली डिग्री, उपराष्ट्रपति ने किया संबोधन

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नई दिल्ली- इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU) के 39वें दीक्षांत समारोह में आज 3.2 लाख से अधिक विद्यार्थियों को डिग्री, डिप्लोमा और प्रमाण पत्र प्रदान किए गए। इस अवसर पर उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

उपराष्ट्रपति ने IGNOU की सराहना करते हुए इसे भारत की ओपन और डिस्टेंस लर्निंग प्रणाली का मजबूत स्तंभ बताया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय ने देशभर में उच्च शिक्षा की पहुंच को व्यापक बनाया है। वर्तमान में IGNOU में 14 लाख से अधिक विद्यार्थी अध्ययनरत हैं, जिनमें 56% महिलाएं और 58% ग्रामीण एवं वंचित वर्ग से हैं।

उन्होंने विद्यार्थियों को आजीवन सीखने की भावना अपनाने, नैतिक मूल्यों को बनाए रखने और राष्ट्र निर्माण में योगदान देने के लिए प्रेरित किया।

कोविड-19 महामारी का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि IGNOU ने अपनी डिजिटल शिक्षा प्रणाली के माध्यम से इस चुनौती का सफलतापूर्वक सामना किया। SWAYAM और e-GyanKosh जैसे प्लेटफॉर्म के जरिए पढ़ाई बिना बाधा जारी रही।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) की सराहना करते हुए उन्होंने बताया कि IGNOU ने चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम और मल्टीपल एग्जिट ऑप्शन शुरू किए हैं, जिससे शिक्षा अधिक लचीली और छात्र-केंद्रित बनी है।

उपराष्ट्रपति ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) जैसी नई तकनीकों को लेकर सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि जैसे कंप्यूटर के आगमन से रोजगार के नए अवसर पैदा हुए, वैसे ही AI भी शिक्षा और विकास में नई संभावनाएं खोलेगा। हालांकि, उन्होंने इन तकनीकों के जिम्मेदार उपयोग पर भी जोर दिया।

उन्होंने कहा कि भारत की सबसे बड़ी ताकत उसके नैतिक मूल्य हैं और आधुनिक विकास को परंपराओं के साथ संतुलित करना आवश्यक है।

कार्यक्रम के अंत में उपराष्ट्रपति ने डिजिलॉकर के माध्यम से प्रमाण पत्र जारी किए और IGNOU एलुमनाई पोर्टल का शुभारंभ किया, जिसमें 50 लाख से अधिक पंजीकरण हैं। साथ ही देशभर के क्षेत्रीय केंद्रों में SWAYAM प्रभा स्टूडियो का भी उद्घाटन किया गया।

इस अवसर पर दिल्ली के उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू, IGNOU की कुलपति प्रो. उमा कंजीलाल सहित कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।

उपराष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कहा कि सभी के सामूहिक प्रयासों से ही 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।


नालंदा विश्वविद्यालय दीक्षांत समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का संबोधन: ज्ञान, संवाद और वैश्विक विरासत का पुनर्जागरण

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भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने 31 मार्च 2026 को बिहार के राजगीर स्थित नालंदा विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में भाग लेकर उसे संबोधित किया।

अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि यह दीक्षांत समारोह केवल एक शैक्षणिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत संकल्प की पुनर्पुष्टि है—एक ऐसा संकल्प कि ज्ञान सदैव जीवित रहेगा, संवाद कायम रहेगा और शिक्षा मानवता की सेवा करती रहेगी। उन्होंने स्नातक छात्रों को बधाई देते हुए कहा कि उनकी सफलता उनके परिश्रम, अनुशासन और बौद्धिक समर्पण का परिणाम है। यह भी उल्लेखनीय है कि इस वर्ष स्नातक करने वाले छात्रों में आधे से अधिक छात्र 30 से अधिक देशों से आए अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थी हैं।

राष्ट्रपति ने कहा कि प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय लगभग आठ शताब्दियों तक विश्व का प्रसिद्ध ज्ञान केंद्र रहा। इसका पतन केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व के लिए एक बड़ी क्षति थी। फिर भी नालंदा की भावना कभी समाप्त नहीं हुई। आज इसका पुनरुत्थान उस गौरवशाली विरासत को आधुनिक संदर्भ में पुनः स्थापित करने की राष्ट्रीय और वैश्विक प्रतिबद्धता का प्रतीक है। यह विभिन्न देशों के सहयोग, दूरदर्शी नेतृत्व और सतत प्रयासों का परिणाम है।

उन्होंने बताया कि प्राचीन नालंदा में विभिन्न विचारधाराओं का स्वागत किया जाता था और वहाँ वाद-विवाद एवं संवाद की समृद्ध परंपरा थी। ज्ञान को समाज, नैतिकता और मानव कल्याण से जोड़कर देखा जाता था। आज के जटिल वैश्विक परिदृश्य में करुणा पर आधारित स्वतंत्र और आलोचनात्मक सोच की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। उन्होंने विश्वास जताया कि नालंदा विश्वविद्यालय एशिया और विश्व में एक अग्रणी शिक्षण संस्थान के रूप में उभरेगा।

राष्ट्रपति ने भारत और बौद्ध दर्शन के गहरे संबंध पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इस संबंध को गंभीरता से समझते हुए भारत की पारंपरिक ज्ञान परंपराओं के साथ जोड़कर आगे बढ़ाना चाहिए। नालंदा विश्वविद्यालय को बौद्ध अध्ययन के वैश्विक केंद्र के रूप में विकसित होने का प्रयास करना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि प्राचीन नालंदा के पुस्तकालय में लाखों पांडुलिपियाँ थीं। उसी प्रेरणा से आज जो निर्माण हो रहा है, वह भविष्य के लिए एक स्थायी धरोहर बनेगा। भारत के 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य में नालंदा जैसे संस्थानों की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।

नागालैंड विश्वविद्यालय के 8वें दीक्षांत समारोह में उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन शामिल, युवाओं से राष्ट्र निर्माण में योगदान का आह्वान

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भारत के उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने आज नागालैंड विश्वविद्यालय के लुमामी परिसर में आयोजित 8वें दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में भाग लिया।

समारोह को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि पद संभालने के बाद उत्तर-पूर्व की यह उनकी पहली यात्रा है और नागालैंड आकर उन्हें अत्यंत प्रसन्नता हो रही है। उन्होंने कहा कि नागालैंड वह स्थान है जहाँ प्रकृति, संस्कृति और साहस का अद्भुत संगम देखने को मिलता है और राज्य की वास्तविक शक्ति उसके लोगों और उनकी समृद्ध परंपराओं में निहित है।

उन्होंने कहा कि भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता में एकता है। हमारे देश की शक्ति मतभेदों में नहीं, बल्कि उस एकता में है जो हम सभी को जोड़कर रखती है।

उपराष्ट्रपति ने वर्ष 1994 में स्थापित नागालैंड विश्वविद्यालय की उपलब्धियों की सराहना करते हुए कहा कि यह संस्थान उत्तर-पूर्व क्षेत्र में उच्च शिक्षा के विस्तार और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की उपलब्धता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उन्होंने कैंसर अनुसंधान प्रयोगशाला की स्थापना सहित विश्वविद्यालय द्वारा किए गए शोध कार्यों तथा नागा समुदाय की स्वदेशी भाषाओं और पारंपरिक कानूनों के संरक्षण के प्रयासों की भी प्रशंसा की।

दीक्षांत समारोह में स्नातक छात्रों को बधाई देते हुए उन्होंने कहा कि युवा अपने जीवन में उद्देश्यपूर्ण प्रगति करें और विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण के संतुलन को भी बनाए रखें। साथ ही उन्होंने युवाओं से नशे के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए “ड्रग्स को ना” कहने का आह्वान किया।

उन्होंने कहा कि दुनिया तेजी से बदल रही है, इसलिए युवाओं को नई चुनौतियों और अवसरों के अनुरूप अपने ज्ञान और कौशल को लगातार अद्यतन करते रहना चाहिए।

उपराष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में उत्तर-पूर्व क्षेत्र के विकास के लिए केंद्र सरकार की प्रतिबद्धता का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि Prime Minister’s Development Initiative for North East Region (PM-DevINE) जैसी योजनाओं के माध्यम से क्षेत्र में आधारभूत संरचना, सामाजिक विकास और आजीविका से जुड़े कई प्रकल्पों को समर्थन दिया जा रहा है, जिससे युवाओं के लिए नए अवसर पैदा होंगे।

उन्होंने फरवरी 2026 में केंद्र सरकार, नागालैंड सरकार और ईस्टर्न नागालैंड पीपल्स ऑर्गनाइजेशन (ईएनपीओ)के बीच हुए त्रिपक्षीय समझौते का भी उल्लेख किया, जिसका नेतृत्व केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने किया था। उपराष्ट्रपति ने विश्वास जताया कि यह समझौता क्षेत्र की लंबे समय से चली आ रही समस्याओं के समाधान और शांति व विकास को बढ़ावा देने में सहायक होगा।

इस अवसर पर उन्होंने नागालैंड विश्वविद्यालय में HEFA फेज-II भवनों की आधारशिला भी रखी।

कार्यक्रम में नागालैंड के राज्यपालअजय कुमार भल्ला, उपमुख्यमंत्री  टी. आर. ज़ेलियांग, विश्वविद्यालय के कुलाधिपति समुद्र गुप्ता कश्यप, कुलपति जगदीश कुमार पटनायक सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।


देहरादून में स्वामी राम हिमालयन यूनिवर्सिटी के 8वें दीक्षांत समारोह को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा ने संबोधित किया

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केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने आज देहरादून स्थित स्वामी राम हिमालयन यूनिवर्सिटी के 8वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए छात्रों को उनकी शैक्षणिक यात्रा पूरी करने पर बधाई दी। उन्होंने कहा कि दीक्षांत समारोह वर्षों की मेहनत और समर्पण का परिणाम है और यह सेवा व जिम्मेदारी के नए चरण की शुरुआत भी है।

मंत्री नड्डा ने छात्रों से चिकित्सा पेशे के उच्चतम आदर्शों को अपनाने, निरंतर उत्कृष्टता के लिए प्रयास करने और मानवता की सेवा में अपने ज्ञान और कौशल को समर्पित करने का आह्वान किया।

उन्होंने पिछले 11 वर्षों में भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र में हुई बड़ी प्रगति का उल्लेख करते हुए बताया कि देश में AIIMS की संख्या 6 से बढ़कर 23 हो गई है। उन्होंने बताया कि संस्थागत प्रसव दर लगभग 89% तक पहुँच गई है, मातृ मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी आई है, और भारत ने वैश्विक औसत से तेज़ी से पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर में कमी दर्ज की है।

केंद्रीय मंत्री ने कोविड-19 टीकाकरण अभियान, आयुष्मान भारत योजना, आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च में कमी, टीबी और मलेरिया नियंत्रण, तथा 1.82 लाख से अधिक आयुष्मान आरोग्य मंदिरों की स्थापना जैसी उपलब्धियों को भी रेखांकित किया।

उन्होंने कहा कि भारत की स्वास्थ्य प्रणाली की असली ताकत समर्पित और संवेदनशील चिकित्सा पेशेवरों में निहित है।



राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने फकीर मोहन विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह को संबोधित किया, नए ऑडिटोरियम का उद्घाटन किया

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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने आज (3 फरवरी, 2026) ओडिशा के बालासोर में फकीर मोहन विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह की शोभा बढ़ाई तथा विश्वविद्यालय के नए सभागार (ऑडिटोरियम) का उद्घाटन किया।

इस अवसर पर संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने व्यासकवि फकीर मोहन सेनापति जी को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि अपने छात्र जीवन के दौरान वे उनकी कालजयी कहानी ‘रेवती’ से गहराई से प्रभावित हुई थीं और यह प्रभाव आज भी उनके मन में अंकित है। उन्होंने कहा कि उन्नीसवीं शताब्दी में एक बालिका का शिक्षा प्राप्त करने का दृढ़ संकल्प उसकी अदम्य भावना का प्रमाण है। राष्ट्रपति ने बताया कि उन्होंने स्वयं एक दूरस्थ आदिवासी गाँव में अध्ययन किया और अपने संकल्प के बल पर भुवनेश्वर जाकर हाई स्कूल और कॉलेज की शिक्षा पूरी की। इस प्रकार फकीर मोहन जी उनके लिए प्रेरणा स्रोत रहे हैं।

राष्ट्रपति ने कहा कि फकीर मोहन जी को अपनी मातृभाषा से गहरा प्रेम था। उन्होंने लिखा था— “मेरी मातृभाषा मुझे सर्वोपरि है।” राष्ट्रपति ने कहा कि मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने से विद्यार्थी अपने परिवेश, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक वातावरण को बेहतर ढंग से समझ पाते हैं। इससे वे अपने सभ्यतागत मूल्यों और जीवन पद्धति से परिचित होते हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 मातृभाषा के महत्व पर विशेष बल देती है और विद्यार्थियों को अपनी संस्कृति से जुड़े रहने का मार्गदर्शन करती है।

राष्ट्रपति ने कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा अत्यंत समृद्ध है। हमारे शास्त्र और पांडुलिपियाँ ज्ञान और विवेक से परिपूर्ण हैं। काव्य और साहित्य के अतिरिक्त इनमें विज्ञान, चिकित्सा, खगोल विज्ञान और वास्तुकला जैसे क्षेत्रों का भी गहन ज्ञान निहित है। युवा विद्यार्थी इस प्राचीन ज्ञान परंपरा में अनुसंधान कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि अतीत को समझकर और वर्तमान को आत्मसात कर विद्यार्थी न केवल अपना भविष्य बल्कि देश का भविष्य भी संवार सकते हैं।

राष्ट्रपति ने स्नातक हो रहे विद्यार्थियों को बधाई दी और कहा कि ज्ञान, उत्साह और प्रतिबद्धता की शक्ति से वे समाज में सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि जहाँ भी जाएँ और जो भी करें, हर प्रयास में सफलता की कुंजी समर्पण है। उन्होंने कहा कि सफल जीवन और सार्थक जीवन एक समान नहीं होते। सफल जीवन अच्छा है, लेकिन जीवन को सार्थक बनाना उससे भी बेहतर है। उन्होंने कहा कि यश, प्रतिष्ठा और आर्थिक सुरक्षा प्राप्त करना आवश्यक है, लेकिन साथ ही दूसरों के लिए कुछ करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे उन लोगों की सहायता करें जो विकास की यात्रा में पीछे रह गए हैं, क्योंकि समाज का विकास तभी संभव है जब सभी का विकास हो।

राष्ट्रपति को यह जानकर प्रसन्नता हुई कि फकीर मोहन विश्वविद्यालय शैक्षणिक अध्ययन के साथ-साथ अनुसंधान और आउटरीच कार्यक्रमों को भी महत्व देता है। उन्होंने कहा कि बालासोर-भद्रक क्षेत्र धान, पान और मछली के लिए प्रसिद्ध है और विश्वविद्यालय द्वारा इन क्षेत्रों में किए जा रहे अनुसंधान एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम सराहनीय हैं। उन्होंने विश्वविद्यालय की ‘बैक टू स्कूल’, ‘अर्न व्हाइल लर्न’, ‘ईच वन टीच वन’, पर्यावरण जागरूकता और समुद्र तट स्वच्छता जैसे कार्यक्रमों की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि बालासोर और भद्रक के समुद्र तटों पर नीले केकड़े (ब्लू क्रैब) प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं और ऐसे में ब्लू क्रैब या हॉर्सशू क्रैब पर अनुसंधान केंद्र की स्थापना विश्वविद्यालय की दूरदर्शिता को दर्शाती है।

राष्ट्रपति ने कहा कि समाज के सभी वर्गों की वृद्धि, सुरक्षा और तकनीकी विकास से देश की प्रगति को गति मिलेगी। इस दिशा में देश के सभी विश्वविद्यालयों की महत्वपूर्ण भूमिका है। विश्वविद्यालयों की विशेष जिम्मेदारी है कि वे समावेशी विकास, नवाचार और सामाजिक परिवर्तन के उत्प्रेरक बनें। आलोचनात्मक चिंतन, नैतिक नेतृत्व और स्थानीय व वैश्विक चुनौतियों से जुड़ा अनुसंधान विकसित कर उच्च शिक्षण संस्थान एक ऐसे भविष्य का निर्माण कर सकते हैं जो सतत, न्यायसंगत और मानवीय मूल्यों पर आधारित हो। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि फकीर मोहन विश्वविद्यालय अपनी शैक्षणिक दृष्टि और सामुदायिक सहभागिता के माध्यम से इस दिशा में परिवर्तनकारी भूमिका निभाएगा।




उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने डॉ. एम.जी.आर. शैक्षणिक एवं अनुसंधान संस्थान, चेन्नई के 34वें दीक्षांत समारोह को किया संबोधित

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भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने आज डॉ. एम.जी.आर. शैक्षणिक एवं अनुसंधान संस्थान, चेन्नई के 34वें दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित किया।

नववर्ष की शुभकामनाएं देते हुए उपराष्ट्रपति ने स्नातक विद्यार्थियों को बधाई दी और कहा कि दीक्षांत समारोह जीवन के एक नए चरण की शुरुआत है, जिसमें अधिक जिम्मेदारियां और नए अवसर निहित हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि स्नातक अपने पेशेवर कौशल, करुणा और प्रतिबद्धता के माध्यम से समाज में सकारात्मक योगदान देंगे।

तमिलनाडु की ऐतिहासिक भूमिका को रेखांकित करते हुए, राधाकृष्णन ने कहा कि यह राज्य ज्ञान और समुद्री व्यापार का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां के व्यापारियों ने भारत के विचार, नैतिक मूल्य और संस्कृति को विश्व के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचाया, जो भारत की आत्मविश्वासी सभ्यतागत परंपरा और सीखने व आदान-प्रदान के प्रति खुलेपन को दर्शाता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रस्तुत विकसित भारत @2047 के विजन का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रत्येक नागरिक, विशेष रूप से युवाओं की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। उन्होंने विद्यार्थियों से राष्ट्र निर्माण में सार्थक योगदान देने का आह्वान किया।

तेजी से हो रहे तकनीकी परिवर्तनों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और उभरती तकनीकें सभी क्षेत्रों को रूपांतरित कर रही हैं। उन्होंने निरंतर सीखने की आवश्यकता पर बल दिया और छात्रों से नियमित रूप से अपने कौशल को उन्नत करने, आजीवन सीखने की मानसिकता अपनाने तथा अपने मुख्य विषयों से परे नई तकनीकों से जुड़ने का आग्रह किया।

मूल्य-आधारित शिक्षा के महत्व को रेखांकित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि शैक्षणिक उत्कृष्टता का आधार नैतिकता, ईमानदारी और सामाजिक उत्तरदायित्व होना चाहिए।

परिसर से बाहर के जीवन के लिए विद्यार्थियों को सलाह देते हुए उन्होंने कहा कि सफलता और असफलता जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं और दोनों का सामना संतुलन, दृढ़ता और मानसिक शक्ति के साथ करना चाहिए। उन्होंने शॉर्टकट अपनाने और अस्वस्थ तुलना से बचने की सलाह दी तथा स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित कर निरंतर प्रगति करने और अपनी विशिष्ट क्षमताओं को पहचानने के लिए प्रेरित किया।

अपने संबोधन के समापन में उपराष्ट्रपति ने स्नातकों से उद्देश्यपूर्ण और सेवा-भाव से युक्त जीवन जीने तथा व्यक्तिगत उत्कृष्टता के साथ-साथ राष्ट्रीय प्रगति में योगदान देने का आह्वान किया।

इस अवसर पर तमिलनाडु सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री मा. सुब्रमणियन, डॉ. एम.जी.आर. शैक्षणिक एवं अनुसंधान संस्थान के चांसलर डॉ. ए. सी. शन्मुगम तथा अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।


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