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केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने असम पुस्तक मेले को बताया “ज्ञान का तीर्थ”

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केंद्रीय पत्तन, पोत परिवहन एवं जलमार्ग मंत्री (MoPSW) सर्बानंद सोनोवाल ने आज गुवाहाटी के खानापारा में आयोजित असम पुस्तक मेले का दौरा किया। इस अवसर पर उन्होंने पुस्तक मेलों को “ज्ञान के तीर्थ” बताते हुए कहा कि ऐसे आयोजन बौद्धिक विकास को बढ़ावा देते हैं और एक विचारशील समाज का निर्माण करते हैं।

पुस्तक मेले में आगंतुकों और प्रकाशकों को संबोधित करते हुए सोनोवाल ने कहा, “पुस्तकें मन को आलोकित करती हैं, विचारों को परिष्कृत करती हैं और पीढ़ियों तक समाज को समृद्ध करती हैं। साहित्य का समग्र संसार किसी समाज की अंतरात्मा, सृजनात्मकता और कल्पनाशीलता को प्रतिबिंबित करता है तथा एक बौद्धिक रूप से प्रगतिशील राष्ट्र के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।”

उन्होंने आगे कहा, “पठन-पाठन को बढ़ावा देने की दिशा में उठाया गया हर कदम जनता के बौद्धिक उत्थान की दिशा में एक सशक्त कदम है।”सोनोवाल ने युवा पीढ़ी से पढ़ने की आदत विकसित करने का आह्वान किया और कहा कि मेले में पाठकों की उत्साहपूर्ण भागीदारी इस बात का प्रमाण है कि असम एक समाज के रूप में सही दिशा में आगे बढ़ रहा है।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि पुस्तकें ऐसे उपहार हैं जिन्हें बार-बार खोला जा सकता है और हर बार वे नई समझ और दृष्टिकोण प्रदान करती हैं। उन्होंने असम के उन महान सांस्कृतिक और साहित्यिक विभूतियों की विरासत को याद किया, जिन्होंने अपने शब्दों और विचारों के माध्यम से असमिया समाज की पहचान को आकार दिया और असम की आवाज़ को विश्व पटल पर पहुँचाया।

दार्शनिक फ्रांसिस बेकन के कथन “पठन मनुष्य को पूर्ण बनाता है” का उल्लेख करते हुए सोनोवाल ने गहन अध्ययन के स्थान पर क्षणिक डिजिटल उपभोग को अपनाने की प्रवृत्ति के प्रति आगाह किया। उन्होंने कहा, “हम चाहे जितना भी सोशल मीडिया कंटेंट देख लें, लेकिन हमें पूर्णता केवल पुस्तकों से ही मिल सकती है। केवल पठन से ही गहराई, कल्पनाशीलता और आलोचनात्मक चिंतन विकसित होता है।”

साथ ही, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि प्रौद्योगिकी ने पठन की आदतों को बदला है। ई-बुक्स, ऑडियोबुक्स और डिजिटल लाइब्रेरी जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पारंपरिक पठन के पूरक बन सकते हैं और ज्ञान को अधिक सुलभ बना सकते हैं। असली चुनौती, उन्होंने कहा, विशेषकर युवाओं के लिए पढ़ने को फिर से आनंददायक बनाना है।

सोनोवाल ने छोटे शहरों में पुस्तकालयों के आधुनिकीकरण की आवश्यकता पर भी बल दिया तथा असमिया साहित्य को समकालीन और पाठक-अनुकूल स्वरूपों में अधिक सुलभ बनाने की बात कही। उन्होंने युवाओं के सामने आधुनिक सफलता की आकांक्षाओं और मातृभाषा से जुड़ाव के बीच चल रहे मौन संघर्ष का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रगति का अर्थ अपनी भाषाई और सांस्कृतिक जड़ों से दूरी बनाना नहीं है।

दौरे के दौरान केंद्रीय मंत्री ने प्रकाशकों और पाठकों से संवाद किया तथा कई पुस्तकें खरीदीं। इनमें बनलता पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित प्रो. भवानी पेगु की मृतो ईश्वर सहित अनुराधा शर्मा पुजारी की भारत रत्न भूपेन हजारिका, हरेन गोगोई की बोधिद्रुम–2, देबजीत भुइयां की मायाबिनी रातिर बुकुत — जुबीनर जीवन आरु गान और बाबुल कुमार बरुआ की मुर जेल यात्रार कहानी शामिल हैं। इन पुस्तकों की खरीद असमिया साहित्य के पठन और प्रचार के प्रति उनकी गहरी आस्था और प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

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