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चक्रधर समारोह में सजेगी सुर, ताल और संस्कृति की दस दिवसीय महफिल

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कविता कृष्णमूर्ति, अनुज शर्मा, भारती बंधु और इंडियन आइडल फेम कलाकारों समेत देश-प्रदेश की नामचीन प्रतिभाएं बिखेरेंगी संस्कृति के रंग

शास्त्रीय नृत्य, पंडवानी, लोकसंगीत, कबीर भजन, गजल और वाद्य वादन से गुलजार होगा रायगढ़

रायपुर- महाराजा चक्रधर सिंह की कला-साधना और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को समर्पित 41वें अंतर्राष्ट्रीय चक्रधर समारोह-2026 में इस बार कला और संस्कृति के विविध रंग एक साथ देखने को मिलेंगे। रायगढ़ के रामलीला मैदान में 14 से 23 सितम्बर तक आयोजित होने वाले इस दस दिवसीय सांस्कृतिक महाकुंभ में स्थानीय प्रतिभाओं से लेकर देश-प्रदेश के सुप्रसिद्ध कलाकार अपनी कला का जादू बिखेरेंगे। प्रतिदिन शाम 6 बजे से शुरू होने वाली सांस्कृतिक संध्याओं में शास्त्रीय नृत्य, छत्तीसगढ़ी लोककला, पंडवानी, लोकसंगीत, कबीर भजन, गजल और वाद्य प्रस्तुतियों के माध्यम से भारतीय कला एवं संस्कृति की समृद्ध परंपरा जीवंत होगी।

संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल एवं जनसहयोग से जिला प्रशासन द्वारा आयोजित इस प्रतिष्ठित समारोह में पद्मश्री सम्मानित कलाकारों के साथ इंडियन आइडल फेम कलाकार भी अपनी प्रस्तुतियों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध करेंगे। समारोह की खासियत यह होगी कि हर शाम कला की एक अलग विधा और अलग रंग दर्शकों के सामने आएगा। दस दिनों तक रायगढ़ का रामलीला मैदान सुर, ताल, नृत्य और लोक परंपराओं के अनूठे संगम का साक्षी बनेगा।

गणेश वंदना से होगा शुभारंभ, पंडवानी और लोकसंगीत से सजेगी पहली शाम

समारोह का शुभारंभ 14 सितम्बर को वेदमणि सिंह ठाकुर के शिष्यों द्वारा गणेश वंदना की प्रस्तुति से होगा। इसके बाद पद्मश्री सम्मानित अनुज शर्मा लोक कला एवं संगीत की प्रस्तुति देंगे। वहीं पद्मश्री सम्मानित डॉ. उषा बारले अपनी पंडवानी प्रस्तुति से पहली सांस्कृतिक संध्या को यादगार बनाएंगी। लोकधुनों, लोकगाथाओं और पंडवानी की सशक्त परंपरा से समारोह का आगाज होगा।

15 सितम्बर को तबला, कुचिपुड़ी और राजस्थानी लोककला का संगम

15 सितम्बर की शाम में निशित गंगानी का तबला वादन, टी. लक्ष्मी रेड्डी की कुचिपुड़ी प्रस्तुति, स्टार्क सोसाइटी बाड़मेर की राजस्थानी फोक प्रस्तुति और तरुणा साहू एवं समूह की पंडवानी प्रस्तुति होगी। इसके साथ माधवरस बैंड द्वारा भजन गायन की प्रस्तुति सांस्कृतिक संध्या को भक्तिरस से सराबोर करेगी।

16 सितम्बर को कथक और छत्तीसगढ़ी लोकनृत्य की छटा

16 सितम्बर को छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और शास्त्रीय नृत्य की विविधता मंच पर दिखाई देगी। मौमाला नायक कथक की प्रस्तुति देंगी। भूपेन्द्र साहू एवं समूह छत्तीसगढ़ी लोकनृत्य प्रस्तुत करेंगे। डॉ. यास्मीन सिंह एवं समूह तथा विभूति शर्मा द्वारा कथक की प्रस्तुतियां होंगी, जबकि पायल साहू एवं समूह लोककला के रंग बिखेरेंगे।

17 सितम्बर को भरतनाट्यम, ओडिसी और कथक की त्रिवेणी

17 सितम्बर की शाम लोककला एवं संगीत के साथ शास्त्रीय नृत्य की अनेक विधाओं का संगम देखने को मिलेगा। बादल-बस्तर अकादमी ऑफ डांस, आर्ट्स एवं लिटरेचर द्वारा लोक कला एवं संगीत की प्रस्तुति होगी। मधुमिता रॉय मिश्रा कथक और जान्हवी बेहरा ओडिसी नृत्य प्रस्तुत करेंगी। शिवरंजनी हरीश एवं कलार्पणा नृत्य समूह पद्म भूषण शोभना के शिष्यगण भरतनाट्यम की प्रस्तुति देंगे। शिव शक्ति कला संस्थान द्वारा कथक की प्रस्तुति भी होगी।

18 सितम्बर को मणिपुरी, कुचिपुड़ी और कबीर भजनों की सुरमयी शाम

18 सितम्बर को डॉ. मंजू इलंगबम मणिपुरी नृत्य प्रस्तुत करेंगी। पद्मश्री सम्मानित भारती बंधु कबीर भजनों से आध्यात्मिक वातावरण निर्मित करेंगे। श्वेता नायक एवं समूह कुचिपुड़ी तथा अनुराग शर्मा लोकसंगीत की प्रस्तुति देंगे।

काव्य और ओडिसी से सजेगी 19 सितम्बर की शाम

19 सितम्बर कला और साहित्य के प्रेमियों के लिए खास होगी। गौरी शंकर दाश और रीला होता ओडिसी नृत्य की प्रस्तुतियां देंगी। वहीं पद्मश्री सम्मानित सुरेन्द्र शर्मा एवं अन्य कलाकार काव्य संध्या के माध्यम से हास्य और साहित्य का रंग भरेंगे। नृत्य और काव्य का यह संगम समारोह की शाम को विशिष्ट बनाएगा।

20 सितम्बर को गोटीपुआ, गायन और कथक का अनूठा संगम

20 सितम्बर को बी. साहू एवं समूह गोटीपुआ नृत्य प्रस्तुत करेंगे। इंडियन आइडल फेम अमित साना अपनी गायन प्रस्तुति से संगीत प्रेमियों का मनोरंजन करेंगे। वहीं पद्मश्री सम्मानित रामलाल बरेठ के निर्देशन में भूपेन्द्र बरेठ एवं समूह कथक नृत्य प्रस्तुत करेंगे। लोकनृत्य, लोकप्रिय गायन और शास्त्रीय नृत्य का यह संगम दर्शकों के लिए खास आकर्षण रहेगा।

21 सितम्बर को कथक, संतूर-पखावज-तबला और नृत्य नाटिका

21 सितम्बर की शाम बनारस घराने के कथक से लेकर वाद्य संगीत तक विविध प्रस्तुतियों से सजेगी। रूद्रशंकर सिन्हा बनारस घराने का कथक प्रस्तुत करेंगे। सोनू गुप्ता एवं समूह लोकगीत, वांसती वैष्णव एवं समूह कथक प्रस्तुत करेंगे। त्रिवेणी संगम द्वारा संतूर, पखावज और तबला वादन होगा। संस्कार कला संघ नृत्य नाटिका तथा नृत्यांजलि बनारस घराने के कथक की प्रस्तुति देगी।

22 सितम्बर को कथकली, ओडिसी, सितार और सूफियाना अंदाज

समारोह की 22 सितम्बर की शाम शास्त्रीय नृत्य, वाद्य संगीत और सूफियाना अंदाज के नाम रहेगी। गुरु कोट्टक्कल नंदकुमारन नायर कथकली, दीक्षा रथ ओडिसी नृत्य और प्रो. डॉ. लवली शर्मा सितार वादन प्रस्तुत करेंगी। पुनरिक साहू-लहरंगगा लोक संगीत की प्रस्तुति देंगे, जबकि रायगढ़ के राकेश शर्मा सूफी गायन और गजल से शाम को सुरमयी बनाएंगे।

कविता कृष्णमूर्ति और जान कुमार सानू के सुरों से होगा भव्य समापन

दस दिवसीय समारोह का 23 सितम्बर को भव्य समापन होगा। अंतिम शाम देश की सुप्रसिद्ध और पद्मश्री सम्मानित गायिका कविता कृष्णमूर्ति अपनी सुरमयी प्रस्तुति देंगी। उनके साथ जान कुमार सानू भी गायन की प्रस्तुति देंगे। देश के लोकप्रिय कलाकारों के सुरों से सजी यह शाम 41वें चक्रधर समारोह की यादों को लंबे समय तक दर्शकों के दिलों में संजोए रखेगी।

रायगढ़ बनेगा कला और संस्कृति का केंद्र

41वां चक्रधर समारोह केवल सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का आयोजन नहीं, बल्कि महाराजा चक्रधर सिंह की कला-साधना, संगीत और नृत्य के प्रति उनके समर्पण तथा छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं को आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण मंच है। स्थानीय कलाकारों को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के कलाकारों के साथ एक ही मंच पर प्रस्तुति का अवसर मिलना समारोह की विशेष उपलब्धि है।

14 से 23 सितम्बर तक रायगढ़ में होने वाला यह सांस्कृतिक आयोजन कला प्रेमियों के लिए दस दिनों तक उत्सव का माहौल बनाएगा। शास्त्रीय नृत्य की विविध विधाओं से लेकर छत्तीसगढ़ी लोकधुनों, पंडवानी, भजन, गजल और लोकप्रिय गायन तक चक्रधर समारोह में भारतीय संस्कृति की विविधता और समृद्धि का ऐसा रंगारंग संसार देखने को मिलेगा, जो रायगढ़ को दस दिनों तक कला और संस्कृति की राजधानी में बदल देगा।

सरहुल-करमा की थाप पर झूम उठा लोकरंग पर्व, लोकसंस्कृति के रंगों से सजा समापन

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पहली बार लोकरंग पर्व में दिखी सरगुजा-जशपुर अंचल की आदिवासी लोकसंस्कृति की मनमोहक झलक, पंथी और नाचा-गम्मत ने भी मोहा दर्शकों का मन

रायपुर- छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकपरंपराओं, लोककलाओं और सांस्कृतिक विरासत को मंच प्रदान करने वाले तीन दिवसीय ‘लोकरंग पर्व’ का तीसरा एवं अंतिम दिन सरगुजा-जशपुर अंचल की आदिवासी लोकसंस्कृति के नाम रहा। पहली बार लोकरंग पर्व के मंच पर जशपुर अंचल के सरहुल एवं करमा नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति ने दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित किया। पारंपरिक वेशभूषा, लोकधुनों की मधुरता और कलाकारों के ऊर्जावान नृत्य ने पूरे वातावरण को उत्साह और उमंग से भर दिया।

कार्यक्रम में विजय कुमार भगत, जशपुर के दल द्वारा सरहुल एवं करमा नृत्य की प्रस्तुति दी गई। आदिवासी लोकजीवन, प्रकृति और सामुदायिक परंपराओं से जुड़े इन लोकनृत्यों ने दर्शकों को छत्तीसगढ़ के जनजातीय अंचलों की सांस्कृतिक विविधता से परिचित कराया। कलाकारों की सामूहिक प्रस्तुति, पारंपरिक लय और आकर्षक वेशभूषा ने कार्यक्रम में विशेष रंग भर दिया।

इसके साथ ही रायपुर के डॉ. रामनारायण नेताम ने आदिवासी लोकगीत एवं नृत्य की प्रस्तुति दी।  नवलदास मानिकपुरी, दुर्ग ने लोकगीत-संगीत से समां बांधा। वहीं आरती बारले, भिलाई ने पंथी नृत्य की ऊर्जापूर्ण प्रस्तुति देकर दर्शकों की खूब तालियां बटोरीं। रमादत्त जोशी, रायपुर की नाचा-गम्मत की प्रस्तुति ने हास्य, मनोरंजन और लोकनाट्य के रंगों से कार्यक्रम को और जीवंत बना दिया।

लोककलाओं को मंच देना हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी : डॉ. कन्नौजे

लोकरंग पर्व के समापन अवसर पर संस्कृति एवं पुरातत्व संचालक डॉ. संजय कन्नौजे ने कहा कि छत्तीसगढ़ के सुदूर जनजातीय अंचलों सहित राज्य के विभिन्न क्षेत्रों से आए स्थानीय कलाकारों ने अपनी-अपनी लोककलाओं की शानदार प्रस्तुतियां दीं। ऐसे आयोजन कलाकारों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने के साथ-साथ प्रोत्साहन और सम्मानजनक मंच उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उन्होंने कहा कि लोकरंग पर्व जैसे सांस्कृतिक आयोजन छत्तीसगढ़ की समृद्ध और सुघर लोकसंस्कृति को सहेजने तथा उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रभावी माध्यम हैं। लोकगीत, लोकनृत्य, लोकनाट्य और पारंपरिक कलाओं के माध्यम से युवा पीढ़ी अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ती है। ऐसे आयोजनों से स्थानीय कलाकारों को मंच मिलने के साथ ही विलुप्त होती लोकविधाओं के संरक्षण एवं संवर्धन को भी प्रोत्साहन मिलता है।

लोकविरासत के विविध रंगों का संगम बना लोकरंग

तीन दिनों तक चले लोकरंग पर्व में छत्तीसगढ़ के विभिन्न अंचलों की लोकसंस्कृति, लोकगायन और लोकनृत्य की विविध परंपराओं को मंच मिला। अंतिम दिन सरहुल, करमा, आदिवासी लोकगीत, पंथी और नाचा-गम्मत जैसी प्रस्तुतियों ने यह संदेश दिया कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान उसकी विविध लोकपरंपराओं में निहित है।

कार्यक्रम में संस्कृति एवं पुरातत्व संचालक डॉ. संजय कन्नौजे, छत्तीसगढ़ के कवि मीर अली मीर, वरिष्ठ पत्रकार एवं छायाकार दीपेंद्र दीवान, साहित्यकार विजय मिश्रा, फिल्म बोर्ड की सदस्य प्रसन्ना अवस्थी तथा समाजसेवी उदयभान चौहान विशेष रूप से उपस्थित रहे।

लोकरंग पर्व का अंतिम दिन दर्शकों के लिए छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति की विविधता और जीवंतता को करीब से अनुभव करने का अवसर बना। कलाकारों की प्रस्तुतियों पर दर्शकों ने तालियों के साथ उत्साहवर्धन किया। आयोजन ने एक ओर जहां लोककलाकारों को सम्मानजनक मंच उपलब्ध कराया, वहीं दूसरी ओर छत्तीसगढ़ की लोकपरंपराओं को सहेजने, संवारने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का सार्थक संदेश दिया।

आस्था, परंपरा और भव्यता के रंग में सजेगा ऐतिहासिक बस्तर दशहरा

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75 दिवसीय पर्व को यूनेस्को की सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल कराने का संकल्प, बलराम मांझी बने दशहरा समिति के नए उपाध्यक्ष

रायपुर- ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का अनूठा संगम विश्वप्रसिद्ध 75 दिवसीय बस्तर दशहरा पर्व 2026 इस वर्ष भी पूरी भव्यता, आस्था और पारंपरिक गरिमा के साथ मनाया जाएगा। पर्व की तैयारियों, पूजा विधान, सुरक्षा व्यवस्था, वित्तीय प्रबंधन और विभिन्न आयोजनों को लेकर मंगलवार को कलेक्टोरेट के प्रेरणा कक्ष में बस्तर दशहरा समिति की महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। बैठक की अध्यक्षता बस्तर सांसद एवं दशहरा समिति के अध्यक्ष महेश कश्यप ने की।

बैठक में बस्तर राजपरिवार के कमलचंद भंजदेव, कलेक्टर आकाश छिकारा, पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा, जिला पंचायत सीईओ तन्मय खन्ना, दंतेवाड़ा से मां दंतेश्वरी के पुजारी जिया बाबा सहित समस्त मांझी-चालकी, मेंबर-मेंबरीन, पुजारी, प्रशासनिक अधिकारी एवं टेम्पल स्टेट समिति के सदस्य उपस्थित रहे।

बलराम मांझी निर्विरोध नहीं, बहुमत से चुने गए नए उपाध्यक्ष

बैठक की शुरुआत औपचारिक प्रक्रियाओं के साथ हुई। इसके बाद बस्तर दशहरा समिति के उपाध्यक्ष पद के लिए निर्वाचन कराया गया। बचेली परगना के बीरो मांझी ने अर्जुन मांझी के नाम का प्रस्ताव रखा, जबकि सोनाबाल परगना के समुन्द मांझी ने बलराम मांझी के नाम का प्रस्ताव किया। सदस्यों द्वारा हाथ उठाकर मतदान की प्रक्रिया अपनाई गई, जिसमें स्पष्ट बहुमत के आधार पर बलराम मांझी को बस्तर दशहरा समिति का नया उपाध्यक्ष निर्वाचित घोषित किया गया।

नवनिर्वाचित उपाध्यक्ष बलराम मांझी ने देवसराय सहित अन्य महत्वपूर्ण स्थलों की व्यवस्थाओं को और बेहतर बनाने के संबंध में सुझाव दिए।

केवल पर्व नहीं, विश्व की अनूठी सांस्कृतिक विरासत

बैठक को संबोधित करते हुए सांसद एवं दशहरा समिति के अध्यक्ष महेश कश्यप ने कहा कि बस्तर दशहरा केवल धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह सामाजिक समरसता, जनभागीदारी और विश्व की अनूठी सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। उन्होंने पर्व की व्यवस्थाओं को और सुदृढ़ बनाने के लिए एनएमडीसी प्रबंधन से सीएसआर मद के अंतर्गत प्रतिवर्ष कम से कम डेढ़ करोड़ रुपये की स्थायी वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने की मांग करने की बात कही।

उन्होंने बताया कि बस्तर दशहरा के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचार-प्रसार को लेकर केंद्रीय मंत्रियों से सकारात्मक चर्चा हुई है। सांसद ने कहा कि 75 दिनों तक चलने वाले इस विशिष्ट पर्व की मौलिकता और परंपरागत स्वरूप को बनाए रखना सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।

उन्होंने पर्व अवधि के दौरान समानांतर आयोजनों की अनुमति नहीं देने, देवस्थलों में आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित करने तथा प्रमुख पूजा विधान स्थलों पर सुरक्षा रेलिंग और पक्की बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने पर जोर दिया।

यूनेस्को की सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल कराने का साझा संकल्प

बस्तर राजपरिवार के सदस्य एवं माटी पुजारी कमलचंद भंजदेव ने बस्तर दशहरा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वर्ष 1423 से निरंतर चली आ रही यह परंपरा मैसूर और कुल्लू दशहरा से भी प्राचीन है। उन्होंने बस्तर दशहरा को यूनेस्को की सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल कराने के लिए सामूहिक प्रयास और साझा संकल्प को दोहराया।

उन्होंने मावली परघाव के लिए संबंधित स्थलों एवं मार्गों की विशेष साफ-सफाई, देवी-देवताओं और आंगा देव के सम्मानपूर्वक आगमन की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित करने पर जोर दिया। साथ ही मांझी-चालकी से पर्व के दौरान पारंपरिक वेशभूषा एवं पगड़ी धारण करने का आग्रह किया।

भंजदेव ने मेंबर-मेंबरीन के योगदान को महत्वपूर्ण बताते हुए मेंबरीन के मासिक मानदेय में वृद्धि करने का प्रस्ताव भी दशहरा समिति के समक्ष रखा।

1.21 करोड़ रुपये का बजट प्रस्तावित

बैठक में दशहरा समिति के सचिव एवं तहसीलदार ने बस्तर दशहरा पर्व के लिए एक करोड़ 21 लाख रुपये का बजट प्रस्तावित किया। उन्होंने पर्व के दौरान संपन्न होने वाले विभिन्न पूजा विधानों और उनसे जुड़ी व्यवस्थाओं की जानकारी समिति के सदस्यों को दी।

बैठक में पूजा स्थलों, मार्गों, देवस्थलों, स्वच्छता, पेयजल, प्रकाश व्यवस्था, सुरक्षा तथा श्रद्धालुओं की सुविधा से जुड़े विषयों पर भी चर्चा हुई। पर्व की विशिष्ट परंपराओं को अक्षुण्ण रखते हुए आधुनिक सुविधाओं और बेहतर प्रशासनिक समन्वय के साथ आयोजन को सफल बनाने पर विशेष जोर दिया गया।

शांतिपूर्ण और सुव्यवस्थित आयोजन के लिए प्रशासन तैयार

कलेक्टर आकाश छिकारा और पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा ने बस्तर दशहरा पर्व को शांतिपूर्ण, सुव्यवस्थित और भव्य रूप से संपन्न कराने के लिए प्रशासनिक तैयारियों और विभिन्न विभागों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर अपने विचार रखे। उन्होंने पर्व से जुड़े सभी प्रमुख स्थलों पर आवश्यक व्यवस्थाएं समय पर पूर्ण करने तथा सुरक्षा और यातायात प्रबंधन को प्रभावी बनाए रखने पर जोर दिया।

बैठक में मौजूद मांझी-चालकी, पुजारी, मेंबर-मेंबरीन और समिति के सदस्यों ने भी विभिन्न पूजा विधान एवं आयोजन से जुड़ी व्यवस्थाओं के संबंध में सुझाव दिए। इस प्रकार बैठक में बस्तर दशहरा की ऐतिहासिक परंपरा, जनभागीदारी, धार्मिक आस्था और आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्थाओं के समन्वय के साथ वर्ष 2026 के पर्व को भव्य एवं गरिमापूर्ण ढंग से आयोजित करने की रूपरेखा पर व्यापक चर्चा हुई।

लोकधुनों और लोकनृत्यों से सजा ‘लोकरंग पर्व’, भरथरी गाथा ने बांधा समां

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तीन दिवसीय आयोजन में छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकपरंपराओं का जीवंत प्रदर्शन, नई पीढ़ी को संस्कृति से जोड़ने का संदेश

रायपुर- छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति, लोकगायन और लोकनृत्य की विविध परंपराओं को संरक्षित करने और कलाकारों को मंच उपलब्ध कराने के उद्देश्य से संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन द्वारा आयोजित तीन दिवसीय ‘लोकरंग पर्व’ का रविवार को रायपुर स्थित मुक्ताकाशी मंच, महंत घासीदास संग्रहालय परिसर में भव्य शुभारंभ हुआ। 6 से 8 सितंबर तक चलने वाले इस आयोजन में प्रदेश की पारंपरिक लोकविधाओं की विविध रंगत देखने को मिल रही है।

कार्यक्रम के पहले दिन मुक्ताकाशी मंच पर छत्तीसगढ़ी लोकधुनों और पारंपरिक लोकगाथाओं ने ऐसा समां बांधा कि दर्शक लोकसंस्कृति की जीवंत दुनिया से जुड़ते नजर आए। आयोजन की शुरुआत भरथरी गाथा की प्रस्तुति से हुई। इसके बाद कलाकारों ने पंडवानी, देवार गीत और भरथरी गाथा सहित विभिन्न लोकविधाओं की प्रभावशाली प्रस्तुतियां दीं।

लोककलाओं की विविधता ने मोहा मन

लोकरंग पर्व में छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोकविधाओं से जुड़े कलाकारों को अपनी कला प्रस्तुत करने का अवसर दिया जा रहा है। आयोजन में भरथरी गाथा, देवार गीत, करमा नृत्य, सरहुल, लोरिक-चंदा, ददरिया, पंडवानी और पंथी जैसी विविध लोककलाओं की प्रस्तुतियां शामिल हैं।

पहले दिन दुर्गा साहू ने पंडवानी, पूनम तिवारी ने देवार गीत तथा अरुणिमा शर्मा ने भरथरी गाथा की भावपूर्ण प्रस्तुति दी। कलाकारों की प्रस्तुतियों में छत्तीसगढ़ की लोकजीवन की संवेदना, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत की झलक दिखाई दी।

स्थानीय कलाकारों को मंच देना आयोजन का प्रमुख उद्देश्य

कार्यक्रम के संचालक एवं संस्कृति एवं पुरातत्व संचालक डॉ. संजय कन्नौजे ने कहा कि स्थानीय मंचों के माध्यम से छत्तीसगढ़ की लोकविधाओं से जुड़े कलाकारों को प्रोत्साहन मिलता है और उन्हें अपनी कला के प्रदर्शन का अवसर मिलता है। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन प्रदेश की ‘सुघर’ संस्कृति, लोकपरंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को जन-जन तक पहुंचाने के साथ युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की लोककलाएं केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं, बल्कि इनमें प्रदेश के इतिहास, सामाजिक जीवन, लोकविश्वास और सामुदायिक परंपराओं की गहरी छाप दिखाई देती है। ऐसे आयोजनों के जरिए इन परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।

कला-संस्कृति प्रेमियों की रही मौजूदगी

लोकरंग पर्व के शुभारंभ अवसर पर संस्कृति एवं पुरातत्व संचालक डॉ. संजय कन्नौजे, उपसंचालक उमेश मिश्रा, छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध कवि मीर अली मीर, बॉलीवुड अभिनेत्री श्वेता पड्डा , वरिष्ठ पत्रकार एवं छायाकार दीपेंद्र दीवान, साहित्यकार विजय मिश्रा सहित अनेक गणमान्य नागरिक एवं कला-संस्कृति प्रेमी उपस्थित रहे।

8 सितंबर तक जारी रहेगा लोकसंस्कृति का उत्सव

तीन दिवसीय लोकरंग पर्व 8 सितंबर तक चलेगा। आगामी दिनों में भी छत्तीसगढ़ की विभिन्न लोकविधाओं से जुड़े कलाकार अपनी प्रस्तुतियां देंगे। आयोजन के माध्यम से रायपुरवासियों को प्रदेश की पारंपरिक लोककलाओं, लोकसंगीत, लोकगाथाओं और लोकनृत्यों की विविधता को करीब से देखने और सुनने का अवसर मिल रहा है।

मुक्ताकाशी मंच पर सजी यह सांस्कृतिक संध्या छत्तीसगढ़ की उस लोकपरंपरा की तस्वीर प्रस्तुत कर रही है, जिसमें माटी की महक, लोकजीवन की सहजता और पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत एक साथ दिखाई देती है।

रंग-तरंग में सजेगा छत्तीसगढ़ का लोक-संगीत, संस्कृति और आधुनिक सुरों का संगम

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1 से 3 सितंबर तक मुक्ताकाशी मंच पर होगा भव्य आयोजन, पारंपरिक लोक वाद्ययंत्रों की प्रस्तुतियों के साथ दिखेगा छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का रंग

रायपुर- छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति, पारंपरिक संगीत और आधुनिक सुरों के अनूठे संगम को मंच प्रदान करने के उद्देश्य से संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन द्वारा ‘रंग तरंग’ कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। यह सांस्कृतिक आयोजन 1, 2 एवं 3 सितंबर 2026 को प्रतिदिन शाम 7 बजे से रायपुर के मुक्ताकाशी मंच, महंत घासीदास संग्रहालय परिसर, सिविल लाइंस में आयोजित होगा।

‘रंग तरंग’ के माध्यम से छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विविधता को नए और आकर्षक अंदाज में प्रस्तुत किया जाएगा। कार्यक्रम में पारंपरिक लोक वाद्ययंत्रों की प्रस्तुतियों के साथ संगीत की विभिन्न विधाओं का संगम देखने-सुनने को मिलेगा। आयोजन का उद्देश्य प्रदेश की लोक परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के साथ-साथ उन्हें समकालीन संगीत के साथ जोड़कर व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचाना है।

लोक वाद्यों की गूंज के साथ सजेगी संगीत की महफिल

‘रंग तरंग’ को संस्कृति, रंगों और सुरों का फ्यूजन के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। आयोजन में छत्तीसगढ़ की लोक परंपराओं से जुड़े वाद्ययंत्रों और कलाकारों की प्रस्तुतियां विशेष आकर्षण का केंद्र रहेंगी। पारंपरिक वाद्यों की धुनों के साथ आधुनिक संगीत का मेल दर्शकों को सांस्कृतिक विरासत का नया अनुभव प्रदान करेगा।

छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को मिलेगा नया मंच

तीन दिवसीय इस आयोजन के जरिए प्रदेश की विविध लोक परंपराओं, संगीत शैलियों और वाद्य संस्कृति को एक मंच पर प्रस्तुत करने का प्रयास किया जाएगा। छत्तीसगढ़ की पहचान उसकी जीवंत लोक कलाओं और संगीत परंपराओं से रही है। ऐसे आयोजनों से स्थानीय कलाकारों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का अवसर मिलने के साथ ही आम लोगों, विशेषकर युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का अवसर मिलता है।

संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित ‘रंग तरंग’ में लोक और आधुनिकता का यह मेल दर्शकों के लिए मनोरंजन के साथ-साथ छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को करीब से जानने का अवसर भी बनेगा।

तीन दिनों तक चलने वाला यह आयोजन रायपुरवासियों और प्रदेश की कला-संस्कृति में रुचि रखने वाले दर्शकों के लिए खास आकर्षण रहेगा। ‘रंग तरंग’ छत्तीसगढ़ की लोकधुनों, पारंपरिक वाद्ययंत्रों और आधुनिक संगीत को एक ही मंच पर लाकर संस्कृति के विविध रंगों को सुरों की तरंगों में पिरोने की पहल है।

छत्तीसगढ़ की कला-संस्कृति के पाठ पढ़ेंगे कक्षा 6वीं से 12वीं तक के विद्यार्थी

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देश का पहला राज्य बनने की दिशा में छत्तीसगढ़, 100 कलाविद लेखक तैयार करेंगे 100 पाठ

रायपुर- छत्तीसगढ़ के स्कूली छात्र कक्षा 6वीं से 12वीं तक स्थानीय कला, संस्कृति, परंपराओं और लोकजीवन से जुड़े विशेष पाठ पढ़ेंगे, जिससे नई पीढ़ी अपनी माटी और संस्कृति से गहरे से जुड़ सकेगी।

छत्तीसगढ़ की समृद्ध कला, संस्कृति, इतिहास, धरोहर, स्थापत्य, लोक परंपराओं, गीत-संगीत, संतों, महापुरुषों और रचनाकारों को नई पीढ़ी से जोड़ने के लिए स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा महत्वपूर्ण पहल की जा रही है। 

इसी उद्देश्य से राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT), शंकर नगर रायपुर में 24 से 26 अगस्त तक त्रि-दिवसीय आवासीय कार्यशाला आयोजित की जा रही है। कार्यशाला में छत्तीसगढ़ की कला एवं संस्कृति पर केंद्रित आर्ट रिपोजिटरी तैयार करने के लिए प्रदेशभर के साहित्यकार, विषय-विशेषज्ञ, संस्कृतिविद, शोधकर्ता एवं जनसंचार विशेषज्ञ सहभागिता कर रहे हैं।

स्थानीय कला-संस्कृति को पाठ्य सामग्री से जोड़ने की पहल

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप छत्तीसगढ़ अपने संसाधनों से ऐसी पूरक पाठ्य एवं दृश्य सामग्री विकसित करने वाला देश का पहला राज्य बनने की दिशा में अग्रसर है, जिसके माध्यम से कक्षा 6वीं से 12वीं तक के विद्यार्थियों के साथ-साथ शिक्षक, प्रशिक्षक, शैक्षिक प्रबंधक एवं पालक समुदाय स्थानीय कला और सांस्कृतिक विरासत से परिचित हो सकेंगे। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों में अपनी स्थानीय धरोहरों के प्रति कलात्मक बोध, संवेदना और गौरव की भावना विकसित करना है।

कार्यशाला का प्रमुख उद्देश्य छत्तीसगढ़ की विविध कला एवं सांस्कृतिक विधाओं पर गुणवत्तापूर्ण पाठ्य सामग्री तैयार करना है। इसके साथ ही विद्यार्थियों के शैक्षणिक विकास को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक विषय से संबंधित 5 से 10 मिनट की लघु फिल्मों के लिए पटकथा भी तैयार की जाएगी।

100 विषयों पर तैयार होगी सामग्री

कार्यशाला में प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों से आए प्रतिष्ठित साहित्यकारों, विषय-विशेषज्ञों, संस्कृतिविदों, शोधकर्ताओं एवं जनसंचार विशेषज्ञों द्वारा छत्तीसगढ़ की संस्कृति, सभ्यता और कला से जुड़े लगभग 100 विषयों पर लेखन एवं मार्गदर्शन किया जा रहा है। इन विषयों को प्रमुख विधाओं में विभाजित कर विषयवार समूह गठित किए गए हैं।

विभूतियों से लेकर लोक परंपराओं तक का समावेश

आर्ट रिपोजिटरी में छत्तीसगढ़ की विभूतियों, संतों एवं महापुरुषों के योगदान को भी स्थान दिया जाएगा। इनमें लोमश ऋषि, वाल्मीकि, वल्लभाचार्य, गुरु घासीदास, नागार्जुन, श्रृंगी ऋषि, गहिरा गुरु, शबरी माता, राजा चक्रधर, पद्मश्री तीजन बाई, विनोद कुमार शुक्ल, तुलसीराम देवांगन, सुरुज बाई खांडे, माधवराव सप्रे, दाऊ कल्याण सिंह, मिनीमाता, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, मुकुटधर पाण्डेय, झाडूराम देवांगन, पं. सुंदरलाल शर्मा, धनी धर्मदास, शहीद वीर नारायण सिंह और गुंडाधुर सहित अनेक विभूतियां शामिल हैं।

स्थापत्य कला एवं तीर्थ स्थलों में कौशल्या मंदिर, सिरपुर, भोरमदेव, दंतेश्वरी मंदिर, बम्लेश्वरी मंदिर, चंद्रहासिनी मंदिर, मां महामाया मंदिर रतनपुर और राजीव लोचन मंदिर राजिम जैसे महत्वपूर्ण स्थलों को शामिल किया गया है।  पंथ एवं परंपराओं के अंतर्गत सतनाम पंथ, कबीर पंथ, रामनामी पंथ, घोटुल, मामा-भांजा, मितान-बदना, लमसेना और मानस मंडली जैसी विशिष्ट परंपराओं पर सामग्री तैयार की जा रही है।

पर्व, लोकनृत्य, संगीत और शिल्प भी होंगे पाठ्य सामग्री का हिस्सा

छत्तीसगढ़ के प्रमुख पर्व एवं उत्सवों में हरेली, नवाखाई, बस्तर दशहरा, गोंचा पर्व, गौरी-गौरा, रथयात्रा, छेरछेरा, तीजा-पोला, भोजली और मड़ई सहित पारंपरिक खेल एवं गतिविधियों को भी शामिल किया गया है। दृश्य कला एवं शिल्प के अंतर्गत डोकरा आर्ट, टेराकोटा, बांस शिल्प, लौह शिल्प, गोदना और रजवार भित्ति चित्रों पर सामग्री तैयार होगी। वहीं लोक संगीत एवं वाद्ययंत्र में कबीर गायन, सुवा, बांस, डंडा, पंथी, भोजली, देवार, ददरिया, फाग, भरथरी, विवाह एवं चंदैनी गीत तथा मांदर, मोहरी, ढोल, बांसुरी, सारंगी, धनकुल और टिमकी जैसे पारंपरिक वाद्यों को स्थान दिया जाएगा।

लोक नृत्य एवं रंगमंच में पंथी, राउत नाचा, गेड़ी, ककसाड़, गौर, शैला, सुवा, सरहुल नृत्य, नाचा, पंडवानी एवं लोककथाओं को शामिल किया जा रहा है। इसके साथ ही छत्तीसगढ़ की पारंपरिक पाक कला को भी विद्यार्थियों तक पहुंचाया जाएगा। ठेठरी, खुरमी, फरा-मुठिया, अंगाकर रोटी, चौसेला, बफौरी, चापड़ा चटनी, माड़िया पेज और पपची जैसे पारंपरिक व्यंजनों पर भी सामग्री तैयार की जाएगी।

तीन दिनों में पाठ्य सामग्री से लेकर लघु फिल्म की पटकथा तक

कार्यशाला के प्रथम दिवस पाठ्य सामग्री का प्रस्तुतीकरण, विषयवार समीक्षा और समूह गठन किया जा रहा है। द्वितीय दिवस 25 अगस्त को सामग्री का संशोधन एवं परिमार्जन, अंतिम ड्राफ्ट का निर्धारण तथा लघु फिल्मों के लिए स्क्रिप्ट लेखन किया जाएगा। तृतीय दिवस 26 अगस्त को लघु फिल्म की स्क्रिप्ट का प्रस्तुतीकरण, अंतिम संपादन, स्वीकृति और समापन सत्र आयोजित होगा।

नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ेगी आर्ट रिपोजिटरी

छत्तीसगढ़ की प्रस्तावित आर्ट रिपोजिटरी केवल पाठ्य सामग्री का संग्रह नहीं होगी, बल्कि यह प्रदेश की सांस्कृतिक स्मृतियों, लोकज्ञान, परंपराओं और कला विधाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम बनेगी। इसके माध्यम से विद्यार्थी अपनी मिट्टी की कला, संस्कृति और विरासत को जानने के साथ-साथ उसके संरक्षण और संवर्धन के प्रति भी जागरूक होंगे। यह पहल छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान को शैक्षणिक व्यवस्था से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगी।

वर्षा ऋतु की मनोहारी छटा से सजेगा ‘पावस प्रसंग’, शास्त्रीय नृत्य-संगीत की प्रस्तुतियां 21 से 25 अगस्त तक

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संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित ‘विभागीय आयोजन 2026’ की श्रृंखला में चार दिवस होगा विशेष सांस्कृतिक कार्यक्रम, मुक्ताकाशी मंच पर सजेगी कला और संगीत की सुरमयी शाम

रायपुर- संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन द्वारा कला, संस्कृति और शास्त्रीय परंपराओं को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से ‘विभागीय आयोजन 2026’ की श्रृंखला के अंतर्गत विशेष सांस्कृतिक कार्यक्रम  ‘पावस प्रसंग’ का आयोजन किया जा रहा है। वर्षा ऋतु की सौंदर्यपूर्ण अनुभूतियों और भारतीय शास्त्रीय कला परंपरा को केंद्र में रखकर आयोजित यह कार्यक्रम  21, 22, 24 एवं 25 अगस्त को रायपुर के मुक्ताकाशी मंच, महंत घासीदास संग्रहालय परिसर, सिविल लाइंस में आयोजित होगा। कार्यक्रम प्रतिदिन  शाम 7 बजे से प्रारंभ होगा।

‘पावस प्रसंग’ में वर्षा ऋतु की प्राकृतिक सुंदरता, उमंग, उल्लास और संवेदनाओं को शास्त्रीय नृत्य एवं संगीत के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाएगा। भारतीय कला परंपरा में वर्षा ऋतु का विशेष महत्व रहा है। बादलों की गड़गड़ाहट, वर्षा की रिमझिम, प्रकृति में नवजीवन का संचार और मन में जागृत होने वाले विविध भावों को कलाकार अपनी नृत्य मुद्राओं, भावाभिव्यक्ति और सुरों के माध्यम से जीवंत करते हैं। इसी समृद्ध सांस्कृतिक भावभूमि को ‘पावस प्रसंग’ के माध्यम से दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा।

संस्कृति विभाग की इस पहल का उद्देश्य शास्त्रीय कला विधाओं को प्रोत्साहित करने के साथ ही आमजन को उच्चस्तरीय सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से जोड़ना है। मुक्ताकाशी मंच का वातावरण इन प्रस्तुतियों को और अधिक प्रभावशाली बनाएगा, जहां दर्शक  भारतीय शास्त्रीय नृत्य और संगीत की मनोहारी प्रस्तुतियों का आनंद ले सकेंगे।

‘पावस प्रसंग’ वर्षा ऋतु की सांस्कृतिक और कलात्मक अनुभूति को केंद्र में रखकर आयोजित होने वाला विशेष आयोजन है। इसमें प्रकृति और मानवीय भावनाओं के बीच के गहरे संबंध को कला के माध्यम से सामने लाने का प्रयास किया जाएगा। शास्त्रीय नृत्य की भावपूर्ण मुद्राओं और संगीत की मधुर स्वर-लहरियों के माध्यम से वर्षा के विभिन्न रंगों और संवेदनाओं को प्रस्तुत किया जाएगा।

संस्कृति विभाग द्वारा वर्ष 2026 में आयोजित की जा रही विभागीय आयोजनों की श्रृंखला का उद्देश्य छत्तीसगढ़ सहित देश की समृद्ध कला एवं सांस्कृतिक परंपराओं को मंच प्रदान करना तथा कलाकारों और दर्शकों के बीच जीवंत  सांस्कृतिक संवाद को बढ़ावा देना है। इसी कड़ी में ‘पावस प्रसंग’ शास्त्रीय कला प्रेमियों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहेगा।

संस्कृति और कला प्रेमियों से सहभागिता का आह्वान

संस्कृति विभाग ने कला एवं संस्कृति प्रेमियों से ‘पावस प्रसंग’ में सहभागी बनने का आह्वान किया है। चार दिनों तक आयोजित होने वाला यह सांस्कृतिक आयोजन रायपुर में वर्षा ऋतु की प्राकृतिक अनुभूति को भारतीय शास्त्रीय नृत्य और संगीत की सौंदर्यपूर्ण अभिव्यक्ति से जोड़ते हुए कला प्रेमियों के लिए यादगार अनुभव प्रस्तुत करेगा।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने प्रदान किए संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप और पुरस्कार

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नई दिल्ली- राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने आज नई दिल्ली में वर्ष 2024 और 2025 के लिए संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप एवं पुरस्कार देश के प्रख्यात कलाकारों को प्रदान किए। इस अवसर पर राष्ट्रपति ने सम्मानित कलाकारों को बधाई देते हुए कहा कि वे भारतीय कला, संस्कृति और परंपरा के संवाहक हैं तथा देश की सामूहिक स्मृति के संरक्षक और भविष्य की सांस्कृतिक दृष्टि के निर्माता हैं।

राष्ट्रपति ने कहा कि आज सम्मानित किए गए कलाकार मिलकर भारत का एक ऐसा सांस्कृतिक मानचित्र प्रस्तुत करते हैं, जो इस मिट्टी से जुड़ी कहानियों और गीतों से बुना गया है। इसमें देश के विभिन्न क्षेत्रों के नृत्य, लोक उत्सव, भाषाएं और बोलियां शामिल हैं, जिन्हें पीढ़ियों ने अपनी कला और परंपराओं के माध्यम से जीवंत रखा है।

उन्होंने कहा कि भारत में संगीत की असंख्य परंपराएं, विभिन्न नृत्य शैलियां और लोक रंगमंच के अनेक रूप मौजूद हैं। भारतीय संस्कृति की जड़ें प्रकृति से गहराई से जुड़ी हुई हैं। देश की विविध पाक परंपराओं, पहनावे, नृत्य और संगीत में प्रकृति की स्पष्ट झलक दिखाई देती है। कलाकार पक्षियों की चहचहाहट, झरनों की कल-कल, पेड़-पौधों, बादलों और नदियों से प्रेरणा लेकर अपनी कला को अभिव्यक्त करते हैं।

गुरु-शिष्य परंपरा का महत्वपूर्ण योगदान

राष्ट्रपति ने भारतीय कला परंपराओं के संरक्षण में गुरु-शिष्य परंपरा की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि कला के क्षेत्र में गुरु सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक के समान होते हैं, जिनसे ज्ञान और अनुभव एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचता है।

उन्होंने चिंता व्यक्त की कि तेजी से बदलते समय में देश की कई लोक कलाएं विलुप्त होने के खतरे का सामना कर रही हैं। ऐसे में केवल इन कलाओं का दस्तावेजीकरण करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें जीवंत बनाए रखने के लिए विशेष प्रयास किए जाने चाहिए।

राष्ट्रपति ने संगीत नाटक अकादमी द्वारा संचालित ‘कला-दीक्षा’ कार्यक्रम का उल्लेख करते हुए प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने वरिष्ठ कलाकारों से आग्रह किया कि वे अगली पीढ़ी के कलाकारों को तैयार करने और पारंपरिक कलाओं के ज्ञान को आगे बढ़ाने के लिए व्यवस्थित प्रयास करें।

लोक और जनजातीय कलाएं भारत की सांस्कृतिक पहचान की आधारशिला

राष्ट्रपति ने कहा कि प्रकृति मानव जीवन को कला के मूल्यों और संवेदनाओं से समृद्ध करने का सबसे स्वाभाविक प्रशिक्षण स्थल है। लोक एवं जनजातीय कलाएं जीवन के प्रति सहज उत्साह और प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव को दर्शाती हैं। इन कलाओं में समुदाय की स्मृतियां और सामूहिक चेतना स्वतः अभिव्यक्त होती हैं। यही कारण है कि लोक कलाएं भारत की सांस्कृतिक पहचान की महत्वपूर्ण आधारशिला हैं।

उन्होंने कहा कि सम्मानित कलाकार भारतीय परंपराओं के वाहक होने के साथ-साथ देश की सामूहिक सांस्कृतिक स्मृति के संरक्षक भी हैं। उनकी कला वर्तमान पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ती है और आने वाली पीढ़ियों के लिए नई सांस्कृतिक दिशा तैयार करती है।

भारत की सॉफ्ट पावर का महत्वपूर्ण केंद्र है संगीत नाटक अकादमी

राष्ट्रपति ने कहा कि संगीत नाटक अकादमी भारत की सॉफ्ट पावर का एक महत्वपूर्ण केंद्र मानी जाती है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि अकादमी आने वाले समय में भी भारतीय कला और संस्कृति की ऊर्जा को पूरी दुनिया तक पहुंचाने तथा समृद्ध करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रहेगी।

राष्ट्रपति ने संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप और पुरस्कार प्राप्त करने वाले सभी कलाकारों को शुभकामनाएं दीं और भारतीय कला एवं संस्कृति के संरक्षण तथा संवर्धन में उनके योगदान की सराहना की।


हरेली त्योहार: छत्तीसगढ़ की हरियाली, संस्कृति और किसान जीवन का उत्सव

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भारत त्योहारों और परंपराओं की भूमि है। यहां मनाया जाने वाला हर त्योहार अपने साथ एक विशेष संस्कृति, परंपरा और जीवन-मूल्य लेकर आता है। छत्तीसगढ़ के प्रमुख लोकपर्वों में हरेली का विशेष स्थान है। हरेली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति, कृषि, पशुधन और किसान जीवन के प्रति सम्मान प्रकट करने वाला पर्व है। यह त्योहार छत्तीसगढ़ की ग्रामीण संस्कृति और लोकजीवन की सुंदर तस्वीर प्रस्तुत करता है।

हरेली का अर्थ और महत्व

‘हरेली’ शब्द का संबंध हरियाली से माना जाता है। सावन के मौसम में जब खेत-खलिहान हरियाली से भर जाते हैं और प्रकृति अपने सुंदरतम रूप में दिखाई देती है, तब हरेली का पर्व मनाया जाता है। यह त्योहार किसानों के लिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि कृषि कार्य में तेजी आने के साथ किसान अच्छी फसल और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

हरेली हमें यह संदेश भी देती है कि मनुष्य का जीवन प्रकृति और कृषि से गहराई से जुड़ा हुआ है। खेतों में लहलहाती फसल, पेड़-पौधे, वर्षा और पशुधन ग्रामीण जीवन के महत्वपूर्ण आधार हैं।

कृषि उपकरणों की पूजा

हरेली के दिन किसान अपने हल, कुदाल, फावड़ा, बैल और अन्य कृषि उपकरणों की पूजा करते हैं। कृषि उपकरणों को साफ करके उनकी विधि-विधान से पूजा की जाती है। माना जाता है कि इन उपकरणों की सहायता से किसान धरती को उपजाऊ बनाता है और पूरे समाज के लिए अन्न पैदा करता है।

इस दिन कई परिवार अपने घरों और कृषि उपकरणों पर नीम की पत्तियां भी लगाते हैं। नीम को पारंपरिक रूप से स्वास्थ्य और प्राकृतिक सुरक्षा से जोड़ा जाता है।

पशुधन का विशेष महत्व

कृषि प्रधान समाज में पशुधन का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इसलिए हरेली के अवसर पर गाय-बैल और अन्य पशुओं की भी देखभाल और पूजा की जाती है। उन्हें नहलाया जाता है, सजाया जाता है और विशेष भोजन दिया जाता है।

यह परंपरा हमें सिखाती है कि मनुष्य को केवल अपने हित के बारे में नहीं सोचना चाहिए, बल्कि उन पशुओं के प्रति भी कृतज्ञ होना चाहिए जो उसके जीवन और आजीविका में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

बच्चों के लिए खास होता है हरेली का उत्सव

हरेली का त्योहार बच्चों और युवाओं के लिए भी बहुत उत्साह लेकर आता है। गांवों में इस अवसर पर गेड़ी चढ़ने की परंपरा विशेष रूप से लोकप्रिय है। बच्चे और युवा गेड़ी पर चढ़कर चलते हैं और अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं।

गेड़ी केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोकसंस्कृति की पहचान भी है। आज भी कई स्थानों पर हरेली के दौरान गेड़ी प्रतियोगिताएं और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

लोकपरंपराओं और व्यंजनों की खुशबू

हरेली के अवसर पर घरों में पारंपरिक पकवान भी बनाए जाते हैं। परिवार के लोग एक-दूसरे से मिलते हैं और त्योहार की खुशियां साझा करते हैं। गांवों में लोकगीत, पारंपरिक खेल और अन्य सांस्कृतिक गतिविधियां वातावरण को उत्सवमय बना देती हैं।

इस प्रकार हरेली केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह परिवार, समाज और समुदाय को एक-दूसरे के करीब लाने का अवसर भी बनती है।

प्रकृति संरक्षण का संदेश

आज के समय में जब पर्यावरण संरक्षण पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण विषय बन चुका है, हरेली का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। यह पर्व हमें पेड़-पौधों, मिट्टी, जल, पशुओं और प्राकृतिक संसाधनों के महत्व की याद दिलाता है।

हरेली हमें प्रेरणा देती है कि हम प्रकृति का सम्मान करें, पेड़ लगाएं, जल बचाएं और पर्यावरण को स्वच्छ एवं सुरक्षित रखने में अपना योगदान दें।

छत्तीसगढ़ की पहचान है हरेली

हरेली छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति की जीवंत पहचान है। इस पर्व में किसान का परिश्रम, प्रकृति की सुंदरता, पशुधन के प्रति सम्मान, पारिवारिक प्रेम और लोकपरंपराओं की झलक दिखाई देती है।

समय के साथ त्योहार मनाने के तरीकों में बदलाव जरूर आया है, लेकिन हरेली की मूल भावना आज भी वही है—धरती, प्रकृति और कृषि के प्रति कृतज्ञता।

निष्कर्ष

हरेली हमें अपनी मिट्टी और अपनी जड़ों से जुड़ने का संदेश देती है। यह पर्व बताता है कि हमारे जीवन की खुशियां प्रकृति और किसान के परिश्रम से गहराई से जुड़ी हैं। इसलिए हरेली केवल छत्तीसगढ़ का एक लोकपर्व नहीं, बल्कि हरियाली, मेहनत, प्रकृति प्रेम और समृद्धि का उत्सव है।

हमें अपनी लोकपरंपराओं को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना चाहिए और हरेली के संदेश—प्रकृति का सम्मान करें, किसान का सम्मान करें और पर्यावरण की रक्षा करें—को अपने जीवन में अपनाना चाहिए।

जब दिल्ली के मंच पर जीवंत हुई छत्तीसगढ़ की पंडवानी परंपरा

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इंडिया हैबिटेट सेंटर में छत्तीसगढ़ की लोक परंपरा का रंग, पांडवानी ने बांधा समां

रायुपर- छत्तीसगढ़ की पंडवानी को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के प्रतिष्ठित सांस्कृतिक मंच इंडिया हैबिटेट सेंटर में अपनी पूरी जीवंतता के साथ प्रस्तुत हुई। महान पांडवानी कलाकार और पद्म विभूषण से सम्मानित स्वर्गीय तीजन बाई की स्मृति को समर्पित विशेष प्रस्तुति के साथ आईएचसी लोक संगीत सम्मेलन 2026 का शुभारंभ हुआ। पंडवानी की इस प्रस्तुति ने छत्तीसगढ़ की लोक परंपरा को दिल्ली के सांस्कृतिक परिदृश्य में एक बार फिर प्रमुखता से सामने रखा।


छत्तीसगढ़ की इस विशिष्ट लोक शैली की ताकत पंडवानी

इंडिया हैबिटेट सेंटर के स्टाइन ऑडिटोरियम में आयोजित कार्यक्रम में पांडवानी कलाकार प्रभा यादव ने पारंपरिक संगीतकारों के साथ प्रस्तुति दी। महाभारत की कथाओं पर आधारित पंडवानी में कथा, गायन, संवाद, लय और अभिनय का ऐसा संयोजन देखने को मिला, जिसने छत्तीसगढ़ की इस विशिष्ट लोक शैली की ताकत और व्यापकता को सामने रखा।

कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ सरकार के प्रतिनिधियों के साथ प्रदेश की कला और संस्कृति से जुड़े प्रमुख व्यक्तित्व भी उपस्थित रहे। वरिष्ठ पत्रकार एवं छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के सलाहकार आर. कृष्ण दास, धरसींवा विधायक एवं प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ी फिल्म कलाकार अनुज शर्मा, प्रबल प्रताप सिंह जूदेव तथा सांस्कृतिक कार्यकर्ता ने कार्यक्रम में भाग लिया। इंडिया हैबिटेट सेंटर के निदेशक प्रो. (डॉ.) के.जी. सुरेश और अन्वेषा कला केंद्र की सचिव अन्वेषा ब्रह्मा भी इस अवसर पर मौजूद रहीं।

तीजन बाई के योगदान को याद किया

इस प्रस्तुति का केंद्र तीजन बाई की कला यात्रा और पांडवानी को मिली राष्ट्रीय पहचान रही। छत्तीसगढ़ की लोक परंपरा से निकली पंडवानी को देश और दुनिया के बड़े मंचों तक पहुंचाने में तीजन बाई का योगदान असाधारण रहा। उन्होंने अपनी विशिष्ट शैली से पंडवानी को नई पहचान दी और इसे भारतीय लोक प्रदर्शन कलाओं की प्रमुख विधाओं में स्थापित किया।


 सांस्कृतिक स्मृतियों और जीवन मूल्यों को आगे बढ़ाने का माध्यम पंडवानी

तीजन बाई को समर्पित प्रस्तुति के जरिए उनके कला जीवन और छत्तीसगढ़ की उस परंपरा को याद किया गया, जिसमें कथावाचन केवल मनोरंजन नहीं बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक स्मृतियों और जीवन मूल्यों को आगे बढ़ाने का माध्यम रहा है। इंडिया हैबिटेट सेंटर के निदेशक प्रो. (डॉ.) के.जी. सुरेश ने कहा कि भारत की लोक कलाएं देश की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनमें पीढ़ियों से चली आ रही कहानियां, परंपराएं और मूल्य सुरक्षित हैं। उन्होंने कहा कि लोक कलाकारों और परंपराओं को राष्ट्रीय राजधानी में मंच देना इन विरासतों को व्यापक दर्शकों तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास है।

भारत की लोक परंपराओं में सदियों का इतिहास पंडवानी

धरसींवा विधायक अनुज शर्मा ने कहा कि पंडवानी छत्तीसगढ़ की पहचान से जुड़ी महत्वपूर्ण लोक कला है। तीजन बाई ने इसे गांवों से निकालकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया। उन्होंने कहा कि दिल्ली में इस परंपरा का सम्मान होना पूरे छत्तीसगढ़ के लिए गौरव का विषय है। अन्वेषा कला केंद्र की सचिव अन्वेषा ब्रह्मा ने कहा कि भारत की लोक परंपराओं में सदियों का इतिहास, सामूहिक स्मृति और जीवन-दर्शन सुरक्षित है। ऐसे आयोजन इन परंपराओं को नए दर्शकों और नई पीढ़ी से जोड़ने का काम करते हैं।


देश की लोक परंपराओं का साझा मंच

आईएचसी लोक संगीत सम्मेलन भारत के अलग-अलग हिस्सों की लोक संगीत, कथावाचन और प्रदर्शन परंपराओं को एक मंच पर लाने वाला वार्षिक आयोजन है। इसका उद्देश्य देश की विविध लोक कलाओं को सामने लाना और पारंपरिक कलाकारों को व्यापक दर्शकों तक पहुंचने का अवसर देना है।

इस वर्ष सम्मेलन की शुरुआत ही छत्तीसगढ़ की पंडवानी और तीजन बाई की स्मृति को समर्पित प्रस्तुति से होना विशेष महत्व रखता है। राजधानी के प्रमुख सांस्कृतिक मंच पर हुई इस प्रस्तुति ने यह संदेश दिया कि भारत की लोक कलाएं केवल अतीत की धरोहर नहीं हैं, बल्कि आज भी देश की सांस्कृतिक पहचान और रचनात्मक ऊर्जा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। अन्वेषा कला केंद्र पिछले 25 वर्षों से अधिक समय से भारत की शास्त्रीय और लोक कलाओं के संरक्षण, संवर्धन, दस्तावेजीकरण, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और शैक्षणिक गतिविधियों के क्षेत्र में कार्य कर रहा है।

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लोक कलाओं के संरक्षण और कलाकारों के आर्थिक सशक्तीकरण की दिशा में संस्कृति विभाग की महत्वपूर्ण पहल

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मुख्यमंत्री लोक कलाकार प्रोत्साहन योजना-2026 के लिए आवेदन आमंत्रित

चयनित कलाकारों को मिलेंगे प्रतिवर्ष 12 से 24 हजार रुपये तक प्रोत्साहन राशि

रायपुर- छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक कला एवं सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, संवर्धन और कलाकारों को आर्थिक संबल प्रदान करने के उद्देश्य से संस्कृति एवं राजभाषा संचालनालय द्वारा मुख्यमंत्री लोक कलाकार प्रोत्साहन योजना-2026 के अंतर्गत प्रदेश के लोक कलाकारों से प्रविष्टियां आमंत्रित की गई हैं। योजना का उद्देश्य पारंपरिक लोक कलाओं को संरक्षित एवं प्रोत्साहित करना, कलाकारों का सम्मान बढ़ाना तथा कला दलों के सतत विकास को नई गति प्रदान करना है।

योजना के अंतर्गत नृत्य-संगीत, लोक नाट्य, लोकगाथा, छत्तीसगढ़ी गीतकार, वाद्ययंत्र वादक, शिल्प कलाकार, छत्तीसगढ़ी पाक कला (पारंपरिक व्यंजन) तथा छत्तीसगढ़ी सौंदर्यकला (श्रृंगार) से जुड़े कलाकार आवेदन कर सकते हैं। आवेदन निर्धारित प्रारूप में पंजीकृत डाक के माध्यम से भेजे जाएंगे। आवेदन प्रपत्र विभाग की वेबसाइट www.cgculture.in पर उपलब्ध हैं तथा संस्कृति एवं राजभाषा संचालनालय, नया रायपुर स्थित कार्यालय से भी प्राप्त किए जा सकते हैं।

योजना के तहत पात्र कलाकारों का चिन्हारी पोर्टल में पंजीयन अनिवार्य होगा। चयनित कलाकारों को प्रतिवर्ष न्यूनतम 12 हजार रुपये से अधिकतम 24 हजार रुपये तक की प्रोत्साहन राशि ई-पेमेंट के माध्यम से प्रदान की जाएगी। यह राशि एक वित्तीय वर्ष में एक बार प्रदान की जाएगी।

योजना का लाभ केवल ऐसे कलाकारों को मिलेगा जिनकी सभी स्रोतों से वार्षिक आय 96 हजार रुपये से अधिक नहीं है। इसके लिए सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी आय प्रमाण-पत्र संलग्न करना अनिवार्य होगा। आवेदन के साथ बैंक खाते का विवरण, आईएफएससी कोड तथा पैन कार्ड की छायाप्रति भी प्रस्तुत करनी होगी।

प्रविष्टियां भेजने का पता –

संचालक, संस्कृति एवं राजभाषा संचालनालय,

छत्तीसगढ़ गृह निर्माण मंडल, व्यावसायिक परिसर,

द्वितीय तल, सेक्टर-27, नया रायपुर, अटल नगर (छत्तीसगढ़) – 492018

प्रविष्टियां प्राप्त होने की अंतिम तिथि 31 अगस्त 2026 निर्धारित की गई है। आवेदन भेजते समय लिफाफे पर "मुख्यमंत्री लोक कलाकार प्रोत्साहन योजना-2026" स्पष्ट रूप से अंकित करना आवश्यक होगा। प्राप्त प्रविष्टियों का परीक्षण समिति द्वारा किया जाएगा तथा समिति का निर्णय अंतिम एवं मान्य होगा।

मुख्यमंत्री लोक कलाकार प्रोत्साहन योजना प्रदेश की समृद्ध लोक कला परंपराओं के संरक्षण, कलाकारों के सम्मान और आर्थिक सशक्तीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। इसके माध्यम से लोक कलाकारों को न केवल आर्थिक सहयोग मिलेगा, बल्कि अपनी कला को व्यापक पहचान दिलाने और सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर भी प्राप्त होगा।

महानदी के तट पर आस्था का महाकुंभ: बनारस की तर्ज पर गूंजे वैदिक मंत्र

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20 करोड़ से दिव्य बनेगा रुद्रेश्वर धाम

​रायपुर- सावन के पहले सोमवार की संध्या धमतरी की चित्रोत्पला महानदी का तट केवल एक जलधारा नहीं, बल्कि भक्ति, संस्कृति और अध्यात्म का सजीव संगम बन गया। काशी की तर्ज पर जब 108 दीपों की स्वर्णिम आभा के बीच पहली बार भव्य ‘महानदी गंगा आरती’ का शुभारंभ हुआ, तो शंखनाद, वैदिक मंत्रों और घंटियों की गूंज से पूरा रुद्री घाट अलौकिक आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठा। धमतरी युवा ब्रिगेड और रुद्रेश्वर महादेव परिवार के इस ऐतिहासिक प्रयास ने नगर की सांस्कृतिक चेतना को नई दिशा दी है। अब जनआस्था का यह पावन पर्व सावन के प्रत्येक सोमवार को महानदी के तट पर सजने जा रहा है।

भक्ति के इस आध्यात्मिक वातावरण के बीच धमतरी के लिए एक और बड़ी खुशखबरी की शुरुआत हुई है। प्रदेश सरकार के संस्कृति एवं पर्यटन विभाग ने प्राचीन रुद्रेश्वर महादेव मंदिर परिसर के कायाकल्प के लिए 20 करोड़ रुपये की महत्वाकांक्षी योजना को धरातल पर उतारने का संकल्प लिया है। इस परियोजना के माध्यम से रुद्रेश्वर धाम को एक ऐसे आधुनिक और पर्यावरण-अनुकूल धार्मिक-सांस्कृतिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा, जो छत्तीसगढ़ की धरोहर को राष्ट्रीय पहचान दिलाएगा।

​तीन चरणों में बदलेगा रुद्रेश्वर धाम का स्वरूप

यह मास्टर प्लान प्राचीन स्थापत्य कला और आधुनिक जनसुविधाओं का बेहतरीन संतुलन प्रस्तुत करता है। मंदिर की पारंपरिक भारतीय स्थापत्य शैली को संरक्षित रखते हुए भव्य मुख्य प्रवेश द्वार, आकर्षक शिखर, तोरण, दीप स्तंभ और विशाल नंदी प्रतिमा का निर्माण किया जाएगा।श्रद्धालुओं के लिए चौड़े पैदल मार्ग, विश्राम गृह, प्रसाद व स्मृति केंद्र, फूड कोर्ट, सुरक्षित घाट और डिजिटल सूचना प्रणाली की व्यवस्था होगी। परिसर में स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ एआई (AI) आधारित हेल्थ कियोस्क भी स्थापित किए जाएंगे। इसी तरह परिसर में उद्यान, सांस्कृतिक मंडप, रिवर फ्रंट कॉटेज, ओपन एयर स्टेज और भविष्य की 'मैरीन ड्राइव' की तर्ज पर एक सुरम्य तट विकसित किया जाएगा।पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए सौर ऊर्जा पार्किंग, ईवी (EV) चार्जिंग स्टेशन, वर्षा जल संचयन और वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन लागू किया जाएगा।

विधायकओंकार साहू, महापौर जगदीश रामू रोहरा, कलेक्टर और पूर्व विधायक रंजना साहू सहित कई गणमान्य नागरिकों की गरिमामयी उपस्थिति में शुरू हुआ यह आयोजन धमतरी के सामाजिक और आर्थिक विकास के नए युग का प्रतीक है। महानदी गंगा आरती की अविरल धारा और रुद्रेश्वर धाम का समग्र विकास मिलकर न केवल धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देंगे, बल्कि स्थानीय व्यापार, रोजगार और जनसहभागिता को भी एक नया आयाम देंगे।

शिवालयों की नगरी आरंग में गूंजेगी भक्ति की तान, भव्य शिवभक्ति गीत की शूटिंग पूरी

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​डिजिटल डेस्क, आरंग: "शिवालयों की नगरी" के नाम से सुप्रसिद्ध नगर आरंग अब भक्ति, संगीत और कला के क्षेत्र में अपनी एक नई पहचान बनाने जा रहा है। अंचल के उभरते व सुप्रसिद्ध कलाकारों द्वारा भगवान शिव को समर्पित एक भव्य और अत्यंत मधुर शिवभक्ति गीत का निर्माण किया जा रहा है।

इस भक्ति गीत के बोल "कांशी जैइसे नगरी मोर आरिंग" हैं, जिसे आरंग अंचल के लोकप्रिय लोकगायक गंगा साहू ने कलमबद्ध किया है। इस गीत की परिकल्पना पीपला फाउंडेशन के संयोजक महेन्द्र कुमार पटेल ने की है।

​गीत की प्रमुख विशेषताएँ और टीम वर्क:

​मधुर स्वर: छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध गायक विवेक शर्मा और लोकगायक गंगा साहू ने गीत को अपनी सुरीली आवाज दी है।

​संगीत संयोजन: भिलाई के प्रख्यात संगीतकार देवेंद्र साहू ने इस गीत को मनमोहक संगीत से सजाया है।

​फिल्मांकन व कोरियोग्राफी: प्रख्यात कोरियोग्राफर उत्तम साहू की टीम और कैमरामैन वीरू साहू ने गीत के फिल्मांकन में अहम भूमिका निभाई है।

​नगर के सभी शिवालयों के होंगे एक साथ दर्शन

​इस शिवभक्ति गीत की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें आरंग नगर में स्थापित सभी प्रमुख शिवलिंगों और मंदिरों को प्रमुखता से दिखाया जाएगा। हाल ही में सोमवार को पंचमुखी महादेव मंदिर, बाबा बागेश्वर नाथ मंदिर, बस स्टैंड तथा समलेश्वरी मंदिर परिसर सहित नगर के विभिन्न शिवालयों में गीत के दृश्यों को शूट किया गया।

​शूटिंग के दौरान मंदिरों में श्रद्धालुओं और स्थानीय नागरिकों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी, जो पूरे दिन कौतूहल और आकर्षण का केंद्र बनी रही।

​स्थानीय लोगों में उत्साह

​आरंग के नागरिकों ने इस सांस्कृतिक व धार्मिक पहल की जमकर सराहना की है। लोगों का कहना है कि इस गीत के माध्यम से न केवल देश-प्रदेश के लोग आरंग के पावन शिवालयों के दर्शन कर सकेंगे, बल्कि इससे आरंग की ऐतिहासिक और धार्मिक पहचान भी और अधिक मजबूत होगी।

सावन: शिव भक्ति, हरियाली और भारतीय संस्कृति का उत्सव

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"रिमझिम बरसती फुहारें, मिट्टी की सौंधी खुशबू, पेड़ों पर झूलों की मस्ती और 'हर-हर महादेव' के जयघोष..." यही है सावन की पहचान। श्रावण मास केवल हिंदू धर्म का एक पवित्र महीना नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, प्रकृति और लोकजीवन का जीवंत उत्सव है।


बरसात की पहली बूंद जब धरती को स्पर्श करती है, तो सूखी वसुंधरा हरियाली की चादर ओढ़ लेती है। खेतों में नई फसल की उम्मीद अंकुरित होती है, नदियां और तालाब जीवन से भर उठते हैं और प्रकृति अपनी अनुपम छटा बिखेर देती है। यही कारण है कि सावन को नवजीवन, समृद्धि और उल्लास का प्रतीक माना जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन के समय निकले कालकूट विष को भगवान शिव ने सृष्टि की रक्षा के लिए अपने कंठ में धारण किया था। तब से सावन का महीना भगवान भोलेनाथ की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। श्रद्धालु शिवालयों में जलाभिषेक करते हैं, बेलपत्र, धतूरा और पुष्प अर्पित कर परिवार की सुख-समृद्धि तथा विश्व कल्याण की कामना करते हैं। सावन के सोमवार और कांवड़ यात्रा इस आस्था को और अधिक प्रगाढ़ बनाते हैं।

सावन भारतीय लोक संस्कृति का भी सबसे रंगीन अध्याय है। गांवों में पेड़ों पर झूले पड़ते हैं, महिलाएं और युवतियां हरे परिधानों में सजकर कजरी और सावनी गीत गाती हैं। हरियाली तीज, नाग पंचमी और रक्षाबंधन जैसे पर्व सामाजिक सौहार्द, पारिवारिक प्रेम और सांस्कृतिक परंपराओं को नई ऊर्जा देते हैं। यह महीना रिश्तों में अपनापन और जीवन में सकारात्मकता का संदेश लेकर आता है।

आज जब पर्यावरण संरक्षण पूरी दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है, तब सावन हमें प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा भी देता है। हरियाली तभी बचेगी, जब हम पेड़ लगाएंगे, जल स्रोतों का संरक्षण करेंगे और प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाएंगे। भगवान शिव स्वयं प्रकृति के देवता माने जाते हैं, इसलिए पर्यावरण की रक्षा करना भी उनकी सच्ची आराधना है।

सावन केवल धार्मिक अनुष्ठानों का महीना नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, संयम, सेवा, प्रेम और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर भी है। आइए, इस पावन मास में भगवान शिव से यही प्रार्थना करें कि हमारे जीवन में शांति, समाज में सद्भाव और प्रकृति में सदैव हरियाली बनी रहे।

हर-हर महादेव! जय भोलेनाथ!

गुरु पूर्णिमा: ज्ञान, संस्कार और कृतज्ञता का पावन पर्व

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"गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वरः।

गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥"

भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सर्वोच्च माना गया है। गुरु केवल शिक्षा देने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह जीवन को सही दिशा देने वाला मार्गदर्शक होता है। इसी गुरु-शिष्य परंपरा के सम्मान और कृतज्ञता को व्यक्त करने के लिए प्रत्येक वर्ष आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है।

गुरु पूर्णिमा का संबंध महर्षि वेदव्यास से भी है। इस दिन उनका जन्म हुआ था, इसलिए इसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। महर्षि वेदव्यास ने वेदों का संकलन किया, महाभारत की रचना की तथा अनेक पुराणों की रचना कर भारतीय ज्ञान परंपरा को समृद्ध बनाया। उनके अतुलनीय योगदान के कारण उन्हें 'आदि गुरु' के रूप में सम्मानित किया जाता है।

भारतीय परंपरा में गुरु का अर्थ केवल विद्यालय के शिक्षक तक सीमित नहीं है। माता-पिता, आचार्य, संत, आध्यात्मिक गुरु और वे सभी लोग, जो हमें जीवन में सही मार्ग दिखाते हैं, गुरु के समान हैं। गुरु हमारे भीतर छिपी संभावनाओं को पहचानने, ज्ञान का प्रकाश फैलाने और जीवन के अंधकार को दूर करने का कार्य करते हैं।

आज के आधुनिक और डिजिटल युग में जानकारी प्राप्त करना आसान हो गया है, लेकिन सही ज्ञान, विवेक और नैतिक मूल्यों का मार्गदर्शन आज भी गुरु ही प्रदान करते हैं। तकनीक हमें सूचना दे सकती है, परंतु जीवन जीने की कला, सही निर्णय लेने की क्षमता और मानवीय मूल्यों का बोध गुरु ही कराते हैं।

गुरु पूर्णिमा केवल धार्मिक या सांस्कृतिक पर्व नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का भी अवसर है। यह दिन हमें अपने जीवन में उन सभी व्यक्तियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की प्रेरणा देता है, जिन्होंने हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। यह पर्व हमें यह भी याद दिलाता है कि सच्चा ज्ञान तभी सार्थक है, जब उसके साथ विनम्रता, अनुशासन और सेवा की भावना जुड़ी हो।

आज के समय में जब समाज अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब गुरु के बताए आदर्श—सत्य, ईमानदारी, करुणा, संयम और सदाचार—पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने गुरु से मिले संस्कारों को जीवन में उतारे, तो एक सशक्त, शिक्षित और नैतिक समाज का निर्माण संभव है।

निष्कर्ष

गुरु पूर्णिमा भारतीय संस्कृति की अमूल्य गुरु-शिष्य परंपरा का उत्सव है। यह पर्व हमें अपने गुरुओं के प्रति सम्मान, श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर देता है। आइए, इस पावन अवसर पर हम अपने सभी गुरुओं को नमन करें और उनके दिखाए मार्ग पर चलकर ज्ञान, संस्कार और मानवता से परिपूर्ण जीवन जीने का संकल्प लें।

"गुरु का सम्मान केवल एक दिन का नहीं, बल्कि जीवनभर की साधना और कृतज्ञता का प्रतीक है।"

आज देवशयनी एकादशी: चातुर्मास का शुभारंभ, भगवान विष्णु की आराधना में लीन हुए श्रद्धालु

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नई दिल्ली- आज देशभर में श्रद्धा और आस्था के साथ देवशयनी एकादशी का पर्व मनाया जा रहा है। हिंदू धर्म में इस एकादशी का विशेष महत्व माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं और इसी के साथ चार माह तक चलने वाले चातुर्मास का शुभारंभ होता है।

मंदिरों में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है। भक्त भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना कर व्रत रख रहे हैं तथा सुख-समृद्धि और परिवार के कल्याण की कामना कर रहे हैं। कई स्थानों पर विशेष भजन-कीर्तन, धार्मिक अनुष्ठान और सत्संग का आयोजन भी किया जा रहा है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवशयनी एकादशी से विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाता है। इसके बाद भगवान विष्णु के देवउठनी एकादशी पर जागृत होने के साथ ही शुभ एवं मांगलिक कार्यों की पुनः शुरुआत होती है।

धर्माचार्यों ने श्रद्धालुओं से विधि-विधान के साथ व्रत और पूजा करने तथा जरूरतमंदों की सहायता एवं दान-पुण्य करने का भी आह्वान किया है।

14 सितंबर से सुर, ताल और घुंघरुओं की झंकार से गूंजेगा 41 वें चक्रधर समारोह का मंच

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स्थानीय प्रतिभाओं और छत्तीसगढ़ी लोक कलाकारों को मिलेगा मंच

रामलीला मैदान में 10 दिनों तक सजेगा शास्त्रीय संगीत, नृत्य और लोक संस्कृति का महाकुंभ

रायगढ़ कलेक्टर की अध्यक्षता में कलाकार चयन समिति की बैठक संपन्न

रायपुर- रायगढ़ जिले की सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक 41वें चक्रधर समारोह-2026 इस वर्ष 14 से 23 सितंबर 2026 तक स्थानीय रामलीला मैदान में आयोजित होगा। दस दिवसीय इस प्रतिष्ठित राष्ट्रीय सांस्कृतिक आयोजन को भव्य, सुव्यवस्थित और यादगार बनाने के लिए आज कलेक्ट्रेट सभाकक्ष में कलाकार चयन समिति की महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। कलेक्टर एवं चक्रधर समारोह आयोजन समिति के अध्यक्ष मयंक चतुर्वेदी की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में कलाकारों के चयन, कार्यक्रम की रूपरेखा तथा आयोजन की प्रशासनिक तैयारियों पर विस्तार से चर्चा की गई।

बैठक में कलेक्टर मयंक चतुर्वेदी ने कहा कि चक्रधर समारोह केवल शास्त्रीय कला का मंच नहीं, बल्कि रायगढ़ और छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने का महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने निर्देश दिए कि इस वर्ष आयोजन में स्थानीय कलाकारों, नवोदित प्रतिभाओं तथा छत्तीसगढ़ की लोक कला एवं लोक संस्कृति को विशेष स्थान दिया जाए, ताकि क्षेत्रीय सांस्कृतिक विरासत का प्रभावी प्रदर्शन हो सके। बैठक में निर्णय लिया गया कि राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित कलाकारों के साथ-साथ रायगढ़ और प्रदेश के लोक कलाकारों को भी पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराया जाएगा। छत्तीसगढ़ी लोकगीत, लोकनृत्य, पारंपरिक सांस्कृतिक विधाओं तथा स्थानीय प्रतिभाओं की प्रस्तुति समारोह का विशेष आकर्षण होगी। इससे प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय मंच पर नई पहचान मिलेगी। समारोह के दौरान शास्त्रीय गायन, वादन, नृत्य, लोक कला और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का संतुलित कार्यक्रम तैयार करने पर समिति ने विस्तार से विचार-विमर्श किया। विशेषज्ञों ने कार्यक्रमों की समय-सारिणी, प्रस्तुति की गुणवत्ता तथा दर्शकों की रुचि को ध्यान में रखते हुए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए, जिन्हें आयोजन की अंतिम रूपरेखा में शामिल किया जाएगा। 

बैठक में मोती महल रायगढ़ (राज परिवार) से देवेन्द्र प्रताप सिंह एवं उर्वशी देवी, जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी अभिजीत बबन पठारे, एडीएम अपूर्व प्रियेश टोप्पो, सहायक कलेक्टर गोकुल आर.के. संयुक्त कलेक्टर पूजा बंसल, प्रो. अम्बिका वर्मा, प्रदेश संयोजक सांस्कृतिक प्रकोष्ठ अनुपम पाल, कलाकार भूपेन्द्र बरेठ तथा प्राचार्य राजेश डेनियल सहित समिति के सदस्य उपस्थित रहे।

आयोजन स्थल पर व्यवस्थाओं को लेकर विभागों को मिले निर्देश

बैठक में रामलीला मैदान में मंच निर्माण, आकर्षक सज्जा, दर्शक दीर्घा, ध्वनि एवं प्रकाश व्यवस्था, सुरक्षा, यातायात प्रबंधन, पार्किंग, पेयजल, स्वच्छता तथा अन्य जनसुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए संबंधित विभागों को विस्तृत कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए गए। आयोजन के प्रत्येक पहलू में विभागीय समन्वय सुनिश्चित करने पर भी विशेष जोर दिया गया।

सांस्कृतिक गरिमा और भव्यता के साथ होगा आयोजन

बैठक में आयोजन समिति ने विश्वास व्यक्त किया कि इस वर्ष का 41वां चक्रधर समारोह सांस्कृतिक गरिमा, उत्कृष्ट व्यवस्थाओं और उच्चस्तरीय प्रस्तुतियों के कारण पहले से अधिक भव्य और ऐतिहासिक होगा। राष्ट्रीय स्तर के कलाकारों के साथ स्थानीय एवं छत्तीसगढ़ी लोक कलाकारों की सहभागिता समारोह को नई पहचान देगी तथा रायगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को देशभर में और अधिक प्रतिष्ठा दिलाएगी।


गोंचा पर्व की तैयारियों में तुपकी निर्माण से बढ़ी आजीविका, सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का भी बन रहा माध्यम

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महतारी वंदन योजना से मिली आर्थिक संबल की राशि, बस्तर की परंपरा और महिलाओं की आत्मनिर्भरता को मिल रही नई ताकत

रायपुर- महतारी वंदन योजना महिलाओं को केवल आर्थिक सहायता ही नहीं दे रही, बल्कि उनकी पारंपरिक आजीविकाओं और स्थानीय संस्कृति को भी नई ऊर्जा प्रदान कर रही है। प्रदेश के बस्तर अंचल में इसका एक प्रेरक उदाहरण देखने को मिला है, जहां बस्तर जिला के जगदलपुर विकासखंड के ग्राम मांझीगुड़ा की चंदा ने योजना से प्राप्त राशि का उपयोग गोंचा पर्व में उपयोग होने वाली पारंपरिक तुपकी के निर्माण में किया है। इससे न केवल उनके परिवार की आय बढ़ने की उम्मीद है, बल्कि बस्तर की सांस्कृतिक धरोहर को भी नई पीढ़ी तक पहुंचाने में मदद मिल रही है।

बस्तर का प्रसिद्ध गोंचा पर्व धार्मिक आस्था, लोक परंपरा और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। पर्व की तैयारियों के बीच चंदा अपने पति चिगडू और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर बड़ी संख्या में तुपकी तैयार कर रही हैं। गोंचा पर्व के दौरान इन तुपकियों की विशेष मांग रहती है, जिससे परिवार को अतिरिक्त आय प्राप्त होती है और आर्थिक स्थिति मजबूत होती है।

तुपकी बांस से बनाया जाने वाला बस्तर का पारंपरिक यंत्र है, जिसमें मलाग्नी वृक्ष के बीज (पेंगू) का उपयोग कर बन्दूक जैसी ध्वनि उत्पन्न की जाती है। भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा के दौरान श्रद्धालु इसी तुपकी से पारंपरिक सलामी देते हैं। यह परंपरा वर्षों से बस्तर की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा रही है और आज भी पूरे उत्साह एवं श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।

चंदा बताती हैं कि महतारी वंदन योजना से प्रत्येक माह मिलने वाली राशि ने उन्हें आर्थिक आत्मविश्वास दिया। इसी सहायता से उन्होंने तुपकी निर्माण के लिए आवश्यक बांस और अन्य सामग्री खरीदी। अब पूरा परिवार इस कार्य में जुटा है और गोंचा पर्व के दौरान अच्छी आय होने की उम्मीद है।

उनका कहना है कि महतारी वंदन योजना महिलाओं के लिए केवल आर्थिक सहयोग नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर बनने और अपनी पारंपरिक कला एवं कौशल को आजीविका से जोड़ने का अवसर भी है। इससे परिवार की आय बढ़ रही है और बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण भी हो रहा है।

गौरतलब है कि योजना के प्रारंभ से अब तक 29 किस्तों के माध्यम से 18 हजार 805 करोड़ रुपये से अधिक की राशि महिलाओं को सीधे उनके खातों में उपलब्ध कराई जा चुकी है। महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण को सर्वाेच्च प्राथमिकता देते हुए राज्य सरकार ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट में योजना के लिए 8,200 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है।

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