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अब 'कानून अंधा' नहीं है..., बदली गई न्याय की देवी की मूर्ति, आंखों से पट्टी हटाई गई

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 Supreme Court : सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड के आदेश पर अब अदालतों में दिखने वाली न्याय की देवी की मूर्ति में अहम बदलाव किए गए हैं। ये बदलाव स्पष्ट रूप से बड़े संदेश दे रहे हैं। न्याय की देवी की मूर्ति की आंखों पर पहले पट्टी बंधी रहती थी, लेकिन अब इस पट्टी को खोल दिया गया है, जिससे संभवत: आम लोगों के बीच यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि कानून अंधा नहीं है।


आमतौर पर पहले लोग इसी मूर्ति का हवाला देकर कहा करते थे कि कानून अंधा होता है। हालांकि पहले इस बंधी पट्टी का संदेश यह था कि न्यायिक प्रक्रिया के दौरान अदालत मुंह देखकर फैसला नहीं सुनाती है, बल्कि हर व्यक्ति के लिए समान न्याय होता है। इसके साथ ही पहले न्याय की देवी की मूर्ति के बाएं हाथ में तलवार रहा करती थी, जिसे हटा दिया गया है।

अब तलवार की जगह संविधान रखा गया है, जिससे यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि हर आरोपी के खिलाफ विधि सम्मत कार्रवाई की जाएगी। अदालत में लगी न्याय की देवी की मूर्ति ब्रिटिश काल से ही चलन में है, लेकिन अब इसमें बदलाव करके न्यायपालिका की छवि में समय के अनुरूप बदलाव की सराहनीय पहल की गई है।

मुख्य न्यायाधीश न्यायिक प्रक्रिया में अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही परिपाटी को बदलकर उसमें भारतीयता का रंग घोलने की पहल में जुटे हुए हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए न्याय की मूर्ति में बदलाव के लिए ये कदम उठाए गए हैं। न्याय की मूर्ति में किए गए इन बदलावों के जरिए वह संविधान में समाहित समानता के अधिकार को जमीनी स्तर पर लागू करना चाहते हैं। इन बदलावों का चौतरफा स्वागत किया जा रहा है।

बाबा रामदेव पर फिर भड़का सुप्रीम कोर्ट, माफी स्वीकार नहीं, कार्रवाई के लिए तैयार रहें

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 Supreme Court Hearing on Ramdev : पतंजलि आयुर्वेद के भ्रामक विज्ञापन को लेकर सुप्रीम कोर्ट बुधवार  को सुनवाई के दौरान योगगुरु रामदेव और बालकृष्ण पर भड़क गया। भ्रामक विज्ञापन को लेकर बाबा रामदेव ने सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर बना शर्त माँगी, लेकिन शीर्ष न्यायालय ने माफी से संंबंधित इस याचिका को एक बार फिर से खारिज करते हुए कहा कि ‘हम अंधे नहीं हैं’ और वह इस मामले में ‘उदार नहीं होना चाहता’।


सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोेर्ट की न्यायमूर्ति हिमा कोहली और न्यायमूर्ति ए अमानुल्लाह की पीठ ने कहा, “माफी कागज पर है। यह बेहद खराब हालात है। हम इसे स्वीकार करने से इनकार करते हैं। हम इसे वचन का जानबूझकर उल्लंघन मानते हैं।” अदालत ने यह भी कहा कि वह इस मामले में केंद्र के जवाब से संतुष्ट नहीं है। कोर्ट ने कहा कि हमारे आदेश की 3-3 बार अनदेखी की गई। अब नतीजा भुगताना होगा।

कार्यवाही की शुरुआत में पीठ ने कहा कि रामदेव और बालकृष्ण ने पहले मीडिया से माफी माँगी। न्यायमूर्ति कोहली ने कहा, “जब तक मामला अदालत में नहीं आया, अवमाननाकर्ताओं ने हमें हलफनामा भेजना उचित नहीं समझा। उन्होंने इसे पहले मीडिया को भेजा। कल शाम 7.30 बजे तक यह हमारे लिए अपलोड नहीं किया गया था। वे स्पष्ट रूप से प्रचार में विश्वास करते हैं। यह हलफनामे में धोखाधड़ी है।”

पतंजलि संस्थापकों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि वह रजिस्ट्री की ओर से नहीं बोल सकते और माफी माँगी जा चुकी है। जैसे ही उन्होंने हलफनामे पढ़े न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने कहा, “आप हलफनामे को धोखा दे रहे हैं। इसे किसने तैयार किया? मैं आश्चर्यचकित हूँ।” इसके बाद रोहतगी ने कहा कि एक चूक हुई, जिस पर अदालत ने कहा कि ‘बहुत छोटा शब्द’ है।

न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने पूछा कि क्या माफ़ी दिल से माँगी गई है। इस पर रोहतगी ने उत्तर दिया, “और क्या कहने की ज़रूरत है, माई लॉर्ड्स। वह पेशेवर वादी नहीं हैं। लोग जीवन में गलतियाँ करते हैं!” पीठ ने कहा, “हमारे आदेश के बाद भी? हम इस मामले में इतना उदार नहीं होना चाहते।” अदालत ने कहा कि इसको लेकर समाज में एक संदेश जाना चाहिए।

अदालत ने कहा, “यह सिर्फ एक FMCG के बारे में नहीं है, बल्कि कानून का उल्लंघन है। राज्य प्राधिकरण को दिए गए अपने जवाब को देखिए कि उन्होंने आपसे पीछे हटने के लिए कहा तो आपने कहा कि हाई कोर्ट ने कहा है कि हमारे खिलाफ कोई कठोर कदम नहीं उठाया जाएगा। हम इसे आपके आचरण का हिस्सा बना रहे हैं।”

इसके बाद अदालत ने उत्तराखंड सरकार की ओर रुख किया और सवाल किया कि लाइसेंसिंग निरीक्षकों ने कार्रवाई क्यों नहीं की। कोर्ट ने यह भी कहा कि तीन अधिकारियों को एक साथ निलंबित कर दिया जाना चाहिए। अदालत ने कहा, “2021 में मंत्रालय ने एक भ्रामक विज्ञापन के खिलाफ उत्तराखंड लाइसेंसिंग प्राधिकरण को लिखा था। जवाब में कंपनी ने लाइसेंसिंग प्राधिकरण को जवाब दिया।”

कोर्ट ने आगे कहा, “हालाँकि, प्राधिकरण ने कंपनी को चेतावनी देकर छोड़ दिया। 1954 के अधिनियम में चेतावनी का प्रावधान नहीं है और ना ही अपराध को कम करने का प्रावधान नहीं है। ऐसा 6 बार हुआ और लाइसेंसिंग इंस्पेक्टर चुप रहे। उनकी ओर से कोई रिपोर्ट नहीं दर्ज कराई गई। बाद में नियुक्त व्यक्ति ने भी यही व्यवहार किया। उन सभी तीन अधिकारियों को अभी निलंबित किया जाना चाहिए।”

बता दें कि मंगलवार  को भी रामदेव और बालकृष्ण ने सुप्रीम कोर्ट में बिना शर्त माफी माँगी थी। इससे पिछली सुनवाई पर कोर्ट ने दोनों पर जमकर फटकार लगाई थी। कोर्ट ने रामदेव से कहा था कि वे खुद को कानून से ऊपर ना समझें। कानून की महिमा सबसे ऊपर है।


चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में CJI जरूरी नहीं, सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार की दलील

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Supreme Court: नरेंद्र मोदी सरकार ने बुधवार को मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 पर रोक लगाने की मांग करने वाली याचिकाओं का विरोध किया, जिसमें चुनाव आयुक्तों का चयन करने वाले पैनल से भारत के मुख्य न्यायाधीश को हटा दिया गया था। इसमें आरोप लगाया गया कि असमर्थित और हानिकारक बयानों के आधार पर राजनीतिक विवाद पैदा करने की कोशिश की गई। 


लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में दायर एक हलफनामे में, सरकार ने याचिकाकर्ताओं के इस आरोप को खारिज कर दिया कि ज्ञानेश कुमार और सुखबीर संधू को शीर्ष अदालत द्वारा पारित किसी भी आदेश को रोकने के लिए 14 मार्च को 'जल्दबाजी' में नियुक्त किया गया था। सरकार ने तर्क दिया कि इतने बड़े पैमाने पर आम चुनाव के कारण एक सीईसी के लिए अकेले अपने कार्यों का निर्वहन करना मानवीय रूप से संभव नहीं होगा।

सरकार ने कांग्रेस नेता जया ठाकुर और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) द्वारा अधिनियम के खिलाफ दायर याचिका के जवाब में दायर किया था। याचिका में कहा गया था कि चुनाव आयोग के सदस्यों की नियुक्ति कार्यपालिका के हाथों में छोड़ना "लोकतंत्र के स्वास्थ्य और स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के संचालन के लिए हानिकारक होगा। न्यायालय ने निर्देश दिया था कि सीईसी और चुनाव आयुक्तों के पदों पर नियुक्तियाँ प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश की सदस्यता वाली एक समिति की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा की जानी चाहिए। 

अपने हलफनामे में, केंद्र ने 2023 अधिनियम का बचाव करते हुए इसे चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में अधिक लोकतांत्रिक, सहयोगात्मक और समावेशी अभ्यास बताया। याचिका का विरोध करते हुए सरकार ने कहा कि याचिकाकर्ताओं का मामला इस 'मौलिक भ्रांति' पर आधारित है कि किसी संस्थान की स्वतंत्रता तभी कायम रहती है जब चयन समिति एक विशेष फॉर्मूलेशन की हो।  


पाकिस्तान को आजादी की बधाईयाँ देना, 370 हटाने को काला दिन कहना गलत नहीं : सुप्रीम कोर्ट

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 नई दिल्‍ली । अनुच्छेद 370 खत्म किए जाने की आलोचना करना और पाकिस्तान को स्वतंत्रता दिवस  की बधाई देना अपराध नहीं माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट  ने गुरुवार को ऐतिहासिक निर्णय दिया और WhatsApp स्टेटस के चलते घिरे एक कॉलेज प्रोफेसर को राहत दे दी। अदालत का कहना है कि किसी को भी कानून के दायरे में रहकर आलोचना करने का अधिकार है।


जस्टिस अभय ओक और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच का कहना है कि हर नागरिक को संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत बात कहने का अधिकार है। कोई भी नागरिक किसी अन्य देश के नागरिक को उनके स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं दे सकता है। इसे अपराध नहीं माना जाएगा।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, कोर्ट ने कहा, ‘अगर भारत का एक नागरिक पाकिस्तान के नागरिकों को 14 अगस्त को उनके स्वतंत्रता दिवस पर बधाई देता है, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है। यह सद्भावना का प्रतीक है। अपीलकर्ता के उद्देश्यों पर सिर्फ इसलिए सवाल नहीं उठाए जा सकते कि क्योंकि वह एक विशेष धर्म से है।’

क्या था मामला

याचिकाकर्ता जावेद हजाम महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के संजय घोडावत कॉलेज में प्रोफेसर है। इससे पहले वह कश्मीर के बारामूल का निवासी था और रोजगार के लिए महाराष्ट्र आया था। खबर है कि उन्होंने स्टेटस लगाए जिनमें कहा गया, ‘5 अगस्त- जम्मू-कश्मीर ब्लैक डे, 14 अगस्त- पाकिस्तान को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं, अनुच्छेद 370 खत्म किया गया इससे हम खुश नहीं हैं।’

उनके खिलाफ IPC की धारा 153ए के तहत मामला दर्ज किया गया, जिसके बाद उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। उच्च न्यायालय में याचिका खारिज होने के बाद उन्होंने शीर्ष न्यायालय का रुख किया था। सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि इस मामले में कोर्ट ने पाया है कि पहले और दूसरे स्टेटस को पढ़कर यह कहा जा सकता है कि अपीलकर्ता सिर्फ सरकार के फैसले की आलोचना कर रहा था।

क्या बोला कोर्ट

अनुच्छेद 370 खत्म किए जाने की आलोचना पर कोर्ट ने कहा कि हर नागरिक को सरकार के फैसले की आलोचना का अधिकार है। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ सरकार के फैसले की आलोचना करना IPC की धारा 153ए के तहत अपराध नहीं माना जा सकता है।

अदालत ने कहा, ‘यह अपीलकर्ता की तरफ से भारत के संविधान के अनुच्छेद 370 खत्म करने के फैसले और बाद में इस आधार पर उठाए गए कदमों का सिर्फ विरोध है। अनुच्छेद 19(1)(a) बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी देता है। इस गारंटी के तहत हर नागरिक को अनुच्छेद 370 खत्म होने या राज्य के हर फैसले की आलोचना करने का अधिकार है। उनके पास यह कहने का अधिकार है कि वह राज्य के किसी फैसले से खुश नहीं हैं।’

इस कार्रवाई को लेकर अदालत ने पुलिस को भी फटकार लगाई। साथ ही कहा कि समय आ गया है कि पुलिस व्यवस्था को भी अनुच्छेद 19(1)(a) के बारे में और ज्यादा जानकारी दी जाए।

समलैंगिक शादियों को Supreme Court का इनकार, कहा- केंद्र को नहीं दे सकते निर्देश

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 नई दिल्ली: चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने समलैंगिक विवाह को मान्यता देने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा कि ये संसद के अधिकार क्षेत्र का मामला है. उन्होंने समलैंगिकों को बच्चा गोद लेने का अधिकार दिया और केंद्र और राज्य सरकारों को समलैंगिकों के लिए उचित कदम उठाने का आदेश भी दिया.


CJI ने कहा कि एक सामाजिक संस्था के रूप में विवाह को विनियमित करने में राज्य का वैध हित है और अदालत विधायी क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर सकती है और उसे एक कानून के माध्यम से समलैंगिक विवाह को मान्यता देने का निर्देश नहीं दे सकती है.

उधर, जस्टिस संजय किशन कौल ने भी सीजेआई के फैसले से सहमति जताई. उन्होंने कहा कि कोर्ट विशेष विवाह अधिनियम में बदलाव नहीं कर सकता, यह सरकार का काम है. समलैंगिक समुदाय की सुरक्षा के लिए उपयुक्त ढांचा लाने की जरूरत. सरकार, समलैंगिक समुदाय के खिलाफ भेदभाव रोकने के लिए सकारात्मक कदम उठाए. समलैंगिकों से भेदभाव पर अलग कानून बनाने की भी जरूरत है.

केंद्र सरकार को कमेटी बनाने का आदेश

CJI ने केंद्र सरकार को एक कमेटी बनाने का भी निर्देश दिया. यह कमेटी, राशन कार्ड में समलैंगिक जोड़ों को परिवार के रूप में शामिल करने, समलैंगिक जोड़ों को संयुक्त बैंक खाते के लिए नामांकन करने में सक्षम बनाने और उन्हें पेंशन, ग्रेच्युटी आदि से मिलने वाले अधिकार का अध्ययन करेगी.

सीजेआई ने कहा कि अदालत केवल कानून की व्याख्या कर सकती है, कानून नहीं बना सकती. उन्होंने कहा कि अगर अदालत LGBTQIA+ समुदाय के सदस्यों को विवाह का अधिकार देने के लिए विशेष विवाह अधिनियम की धारा 4 को पढ़ती है या इसमें कुछ शब्द जोड़ती है, तो यह विधायी क्षेत्र में प्रवेश कर जाएगा.

Homosexuality सिर्फ शहरी कॉन्सेप्ट नहीं
चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ (CJI DY Chandrachud) ने कहा कि होमोसेक्युअलिटी क्या केवल अर्बन कांसेप्ट है? इस विषय को हमने डील किया है. CJI ने कहा कि ये कहना सही नहीं होगा कि केवल ये अर्बन यानी शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित है. ऐसा नहीं है कि ये केवल अर्बन एलिट तक सीमित है.

 

सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सरकार को दिया झटका, कहा- ED चीफ का कार्यकाल बढ़ाना अवैध

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Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की मोदी सरकार  को बड़ा झटका दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने ED चीफ संजय मिश्रा  को तीसरा एक्सटेंशन देने का आदेश रद्द कर दिया. हालांकि वह 31 जुलाई 2023 तक इस पद पर बने रहेंगे. उसके बाद नए डायरेक्टर की तलाश करनी होगी. कोर्ट ने कहा कि ED चीफ की तीसरी बार नियुक्ती अवैध और कानून में अमान्य है. अब संजय मिश्रा का कार्यकाल 31 जुलाई तक रहेगा जबकि उन्हें 18 नवंबर को रिटायर होना था.


क्या है मामला?

बता दें कि संजय मिश्रा पिछले कुछ सालों से लगातार ED चीफ के पद पर तैनात थे. इसी के खिलाफ देश की सबसे बड़ी अदालत में चुनौती दी गई थी. हालांकि, कोर्ट ने CVC और DSPE एक्ट में किये गए संसोधन की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा. इसका मतलब यह कि CBI और ED निदेशक का कार्यकाल 5 साल तक बढ़ाया जा सकता है.

ईडी के डायरेक्टर संजय मिश्रा के कार्यकाल को दिए गए तीसरे विस्तार को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मई में कहा था कि वह अपने 2021 के फैसले पर फिर से निगाह डाल सकता है कि एक रिटायर ऑफिसर का कार्यकाल केवल असाधारण परिस्थितियों में ही बढ़ाया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल 12 दिसंबर को मिश्रा को दिए गए तीसरे विस्तार को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र और अन्य से जवाब मांगा था. केंद्र सरकार ने पिछले साल नवंबर में संजय कुमार मिश्रा को रिटायर होने से एक दिन पहले एक साल का विस्तार दिया था. यह मिश्रा के कार्यकाल में तीसरा विस्तार था, जिन्हें 18 नवंबर, 2023 तक पद पर रहना था. ईडी प्रमुख के रूप में उनका कुल कार्यकाल पांच साल का था.




राष्ट्रीय पुरुष आयोग की मांग पर SC में होगी सुनवाई, जानें क्या है मामला

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नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट घरेलू हिंसा से पीड़ित विवाहित पुरुषों द्वारा आत्महत्या किए जाने के मामलों से निपटने के लिए दिशा-निर्देश तैयार करने और राष्ट्रीय पुरुष आयोग के गठन का अनुरोध करने वाली एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर तीन जुलाई को सुनवाई करेगा। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट के अनुसार, न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की पीठ ने याचिका को सोमवार को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है।


अधिवक्ता महेश कुमार तिवारी द्वारा दायर याचिका में देश में दुर्घटनावश मौतों के संबंध में 2021 में प्रकाशित राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों का हवाला दिया गया है। इसमें यह उल्लेख किया गया है कि उस वर्ष देशभर में एक लाख 64 हजार 33 लोगों ने आत्महत्या की। याचिका में कहा गया कि इनमें विवाहित पुरुषों की संख्या 81 हजार 63 थी, जबकि 28 हजार 680 विवाहित महिलाएं थीं।

मानवाधिकार आयोग को निर्देश देने का अनुरोध

याचिका में, विवाहित पुरुषों के आत्महत्या करने के मुद्दे से निपटने और घरेलू हिंसा से पीड़ित पुरुषों की शिकायतों पर कार्रवाई करने के लिए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को निर्देश देने का भी अनुरोध किया गया है। याचिका में केंद्र को गृह मंत्रालय के जरिये पुलिस प्राधिकार या प्रत्येक पुलिस थाने के प्रभारी को यह निर्देश देने का अनुरोध भी किया गया कि घरेलू हिंसा के शिकार पुरुषों की शिकायतें तत्काल स्वीकार की जाए।

इसमें कहा गया कि घरेलू हिंसा से पीड़ित या पारिवारिक समस्या या विवाह से जुड़ी समस्याओं का सामना कर रहे विवाहित पुरुषों के आत्महत्या करने के मुद्दे पर शोध कराने के लिए विधि आयोग को एक निर्देश दिया जाए, ताकि राष्ट्रीय पुरुष आयोग जैसा एक मंच गठित करने के लिए आवश्यक रिपोर्ट तैयार की जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की राष्ट्रपति से नई संसद भवन के उद्घाटन की मांग वाली याचिका

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Supreme Court: देश के नए संसद भवन के उद्घाटन की तराखी जैसे-जैसे नजदीक आ रही है। इसको लेकर रोज नए नए ट्वस्टि देखने को मिल रहे हैं। एक तरफ कांग्रेस समेत 21 विपक्षी दलों ने कार्यक्रम के बहिष्कार का ऐलान कर दिया है। वहीं मामाल देश की सर्वोच्च अदालत में भी दस्तक देता दिखा। अब सुप्रीम कोर्ट की तरफ से संसद भवन के उद्घाटन को लेकर दायर की गई याचिका खारिज कर दी है। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को भारत की प्रथम नागरिक और संस्था के प्रमुख राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा नए संसद भवन के उद्घाटन के लिए लोकसभा सचिवालय को निर्देश देने की याचिका खारिज कर दी। सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने कहा कि हम जानते हैं कि आप ऐसी याचिकाएं क्यों दायर करते हैं, हम इस पर विचार करने के इच्छुक नहीं हैं।


बता दें कि गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें यह निर्देश देने की मांग की गई है कि नए संसद भवन का उद्घाटन भारत के राष्ट्रपति द्वारा किया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता ने कहा था कि लोकसभा सचिवालय ने राष्ट्रपति को उद्घाटन के लिए आमंत्रित नहीं करके संविधान का उल्लंघन किया गया। याचिका में कहा गया है कि राष्ट्र के मुखिया राष्ट्रपति को न बुलाना गलत है।

तमिलनाडु के एक वकील ने दाखिल की थी याचिका

याचिकाकर्ता का नाम सी आर जयासुकिन है. पेशे से वकील जयासुकिन तमिलनाडु से हैं. वह लगातार जनहित याचिकाएं दाखिल करते रहते हैं. उनकी इस याचिका में कहा गया था कि देश के संवैधानिक प्रमुख होने के नाते राष्ट्रपति ही प्रधानमंत्री की नियुक्ति करते हैं. सभी बड़े फैसले भी राष्ट्रपति के नाम पर लिए जाते हैं. राष्ट्रपति देश की प्रथम नागरिक हैं. संविधान के अनुच्छेद 79 के मुताबिक राष्ट्रपति संसद का भी अनिवार्य हिस्सा हैं. लोकसभा सचिवालय ने उनसे उद्घाटन न करवाने का जो फैसला लिया है, वह गलत .

वन रैंक वन पेंश - , किश्तों में पेंशन भुगतान पर सुप्रीम कोर्ट सख्त कहा- आप कानून हाथ में नहीं ले सकते

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सशस्त्र बलों के रिटायर्ड कर्मियों को पेंशन न दिए जाने पर चिंता व्यक्त की है। एक महीने में ये दूसरी बार है जब सुप्रीम कोर्ट की ओर से मामले में संज्ञान लिया है। कोर्ट ने सोमवार को मंत्रालय से 20 जनवरी के अपने संचार को तुरंत वापस लेने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रक्षा मंत्रालय चार किश्तों में वन रैंक, वन पेंशन (ओआरओपी) बकाया के भुगतान पर संचार जारी करके कानून को अपने हाथ में नहीं ले सकता है। केंद्र की ओर से जारी सर्कुलर में कहा गया था कि ओआरओपी एरियर का भुगतान चार किश्तों में किया जाएगा।


केंद्र सरकार की ओर से शीर्ष अदालत को सूचित किया कि उसने पूर्व सैनिकों को बकाया ओआरओपी की एक किस्त का भुगतान कर दिया है, लेकिन बकाया भुगतान को पूरा करने के लिए उसे कुछ और समय चाहिए, मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और जेबी पारदीवाला की पीठ ने कहा कि पहले ओआरओपी बकाया के भुगतान पर अपना 20 जनवरी का पत्र वापस लें, फिर हम आपके आवेदन पर और समय के लिए विचार करेंगे। पीठ ने कहा कि रक्षा मंत्रालय का 20 जनवरी का संचार उसके फैसले के पूरी तरह से विपरीत था और वह एकतरफा यह नहीं कह सकता कि वह चार किश्तों में ओआरओपी का बकाया भुगतान करेगा। इसने अटॉर्नी जनरल को भुगतान किए जाने वाले भुगतान की मात्रा, अपनाए जाने वाले तौर-तरीकों और बकाया भुगतान के लिए प्राथमिकता खंड क्या है, का विवरण देते हुए एक नोट तैयार करने के लिए कहा।

चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा कि हमारे भूतपूर्व सैनिकों और शहीदों की विधवाओं को इस तरह से परेशान नहीं किया जा सकता है. कोर्ट ने रक्षा मंत्रालय से इस संबंध में एक नोट मांगा है. जिसमें ये बताना होगा को वन रैंक वन पेंशन के तहत दिए जाने वाले पेंशन एरियर को लेकर क्या प्रगति हुई है और कौन-कौन से कदम उठाए गए हैं.

सरकार की तरफ से पेश अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने कोर्ट को बताया कि 28 लाख में से 7 लाख आवेदनों को संस्तुति दे दी गई है. उन्होंने कोर्ट से कहा कि इस संबंध में कागजी कार्रवाई में काफी मुश्किलें आ रहे हैं जिनका हल निकालने के लिए रक्षा मंत्रालय लगा हुआ है. उन्होंने कोर्ट को आश्वस्त किया कि पेंशन की पहली किश्त 31 मार्च से पहले रिलीज कर दी जाएगी.


देशद्रोह कानून को लेकर सख्त हुई सुप्रीम कोर्ट, नए केस दर्ज करने पर लगाई रोक

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देशद्रोह कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बहुत ही सख्त फैसला लिया है। कोर्ट ने कहा है कि पुनर्विचार तक राजद्रोह कानून के तहत कोई नया मामला दर्ज न किया जाए। कोर्ट ने पहले से दर्ज मामलों में भी कार्रवाई पर रोक लगा दी है। वहीं इस धारा में जेल में बंद आरोपी भी जमानत के लिए अपील कर सकते हैं। इस मामले की अगली सुनवाई जुलाई के तीसरे हफ्ते में होगी। इधर, कोर्ट के फैसले पर केंद्रीय कानून मंत्री ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है।

कानून मंत्री किरेन रिजीजू ने कहा कि हम कोर्ट और इसकी स्वतंत्रता का सम्मान करते हैं, लेकिन एक लक्ष्मण रेखा है, जिसका सम्मान सभी अंगों द्वारा किया जाना चाहिए। कानून मंत्री ने आगे कहा कि हमने अपनी स्थिति बहुत स्पष्ट कर दी है और PM मोदी के इरादे के बारे में कोर्ट को सूचित किया है। इससे पहले केंद्र सरकार ने बुधवार को 1870 में बने 152 साल पुराने राजद्रोह कानून पर सुप्रीम कोर्ट में जवाब दायर किया। इसके बाद कोर्ट ने केंद्र को इस कानून के प्रावधानों पर फिर से विचार करने की अनुमति दे दी।  

इसके पहले सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि देशद्रोह कानून पर रोक न लगाई जाए। हालांकि उन्होंने ये प्रस्ताव दिया है कि भविष्य में इस कानून के तहत FIR पुलिस अधीक्षक की जांच और सहमति के बाद ही दर्ज की जाए। CJI एनवी रमना, जस्टिस सूर्यकांत त्रिपाठी और जस्टिस हिमा कोहली की बेंच ने ये भी आदेश दिया है कि इसके बाद भी अगर कोई नया केस दर्ज किया जाता है तो पीड़ित पक्ष कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है। 

13 हजार लोग जेल में बंद

निचली अदालतों से भी अपील है वे पारित आदेश को ध्यान में रखते हुए मांगी गई राहत की जांच करें। गौरतलब है कि कपिल सिब्बल ने कोर्ट में जानकारी दी है कि देशद्रोह कानून के तहत देशभर की जेलों में 13 हजार लोग आज तक बंद हैं। केंद्र ने कहा कि जहां तक लंबित मामलों का सवाल है संबंधित अदालतों को आरोपियों की जमानत पर शीघ्रता से विचार करने का निर्देश दिया जा सकता है। देशद्रोह के मामलों में धारा 124-ए से जुड़ी 10 से ज्यादा याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।

कानून के प्रभाव पर रोक लगाना सही नहीं: केंद्र

केंद्र सरकार ने कहा कि संज्ञेय अपराध को दर्ज होने से नहीं रोका जा सकता है। कानून के प्रभाव पर रोक लगाना सही नहीं हो सकता, इसलिए जांच के लिए एक जिम्मेदार अधिकारी होना चाहिए। मामला तभी दर्ज हो, जब वह कानून के तहत तय मानकों के अनुरूप हो। SG तुषार मेहता ने कहा कि देशद्रोह के लंबित मामलों की गंभीरता का पता नहीं है। इनमें शायद आतंकी या मनी लॉन्ड्रिंग का एंगल है। वे कोर्ट में विचाराधीन हैं और हमें उनके फैसलों का इंतजार करना चाहिए।

इन्होंने ने की मामले की सुनवाई

केंद्र ने ये दलील भी दी कि कोर्ट की संविधान पीठ द्वारा बरकरार रखे गए देशद्रोह के प्रावधानों पर रोक लगाने के लिए आदेश देना सही तरीका नहीं हो सकता है। एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया, TMC सांसद महुआ मोइत्रा समेत पांच पक्षों की तरफ से देशद्रोह कानून को चुनौती देने वाली याचिका दायर की गई थी। मामले में याचिकाकर्ताओं का कहना है कि आज के समय में इस कानून की जरूरत नहीं है। इस मामले की सुनवाई CJI एनवी रमना की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच कर रही है। इस बेंच में जस्टिस सूर्यकांत त्रिपाठी और जस्टिस हिमा कोहली भी शामिल हैं।

नए केस दर्ज होंगे या नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार से पूछा था कि क्या इस एक्ट में नए केस दर्ज होंगे या नहीं? कोर्ट ने ये भी पूछा था- देश में अभी तक जितने IPC 124-A एक्ट के तहत केस चल रहे हैं, उनका क्या होगा? वह राज्य सरकारों को निर्देश क्यों नहीं दे रहा है कि जब तक इस कानून को लेकर पुनर्विचार प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक 124ए के तहत मामलों को स्थगित रखा जाए। केंद्र सरकार ने देशद्रोह कानून पर पुनर्विचार करने का फैसला किया है। 

केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में दी थी दलील

केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि देशद्रोह कानून के प्रावधानों पर सरकार दोबारा विचार और जांच करेगी। केंद्र ने कोर्ट में एक हलफनामा दिया है। इसमें कोर्ट से अपील की गई है कि इस मामले पर सुनवाई तब तक न की जाए, जब तक सरकार जांच न कर ले। पिछले गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने देशद्रोह कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की थी। इस दौरान केंद्र की ओर से यह दलील दी गई थी कि इस कानून को खत्म न किया जाए, बल्कि इसके लिए नए दिशा-निर्देश बनाए जाएं।

याचिका दायर करने वालों में ये शामिल 

देशद्रोह कानून पर याचिका दायर करने वालों में पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी, मणिपुर के पत्रकार किशोरचंद्र वांगखेमचा, छत्तीसगढ़ के कन्हैयालाल शुक्ला शामिल हैं। इस कानून में गैर-जमानती प्रावधान हैं। यानी भारत में कानून द्वारा स्थापित सरकार के खिलाफ नफरत, अवमानना, असंतोष फैलाने को अपराध माना जाता है।  देशद्रोह मामले में दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति को 3 साल की जेल से लेकर आजीवन कारावास की सजा हो सकती है। देशद्रोह गैर जमानती अपराध की कैटेगरी में आता है। देशद्रोह का दोषी पाया जाने वाला व्यक्ति सरकारी नौकरी के लिए अप्लाय नहीं कर सकता है। साथ ही उसका पासपोर्ट भी रद्द हो जाता है। जरूरत पड़ने पर उसे कोर्ट में उपस्थित होना पड़ता है।

इस कारण लगता है देशद्रोह

अगर कोई व्यक्ति राष्ट्रीय चिन्हों या संविधान का अपमान या उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश करता है या सरकार विरोधी सामग्री लिखता या बोलता है तो उसके खिलाफ IPC सेक्शन 124A के तहत देशद्रोह का केस दर्ज हो सकता है। इसके अलावा ऐसा कोई भाषण या अभिव्यक्ति जो देश में सरकार के खिलाफ घृणा, उत्तेजना या असंतोष भड़काने का प्रयास करता है, वह भी देशद्रोह में आता है। साथ ही अगर कोई व्यक्ति देश विरोधी संगठनों से जाने या अनजाने संबंध रखता है उन्हें किसी भी तरह का सहयोग देता है, तो भी वह देशद्रोह के दायरे में आता है।

कालीचरण और कन्हैया जैसे 13 हजार लोग फंसे 

कालीचरण और JNU के नेता रहे कन्हैया कुमार पर संसद हमले के दोषी अफजल गुरु पर एक विवादास्पद कार्यक्रम के दौरान भारत विरोधी नारे लगाने के लिए देशद्रोह का आरोप है। विनोद दुआ के खिलाफ हिमाचल प्रदेश के एक स्थानीय भाजपा नेता ने उनके यूट्यूब शो को लेकर मामला दर्ज कराया था। 3 जून 2021 को सुप्रीम कोर्ट ने दुआ के खिलाफ दर्ज देशद्रोह के मामले को खारिज कर दिया। साल 2021 की जनवरी में नोएडा पुलिस ने कांग्रेस सांसद शशि थरूर सहित छह पत्रकारों पर राजद्रोह का मामला दर्ज किया था। यह मामला एक शिकायत पर दर्ज किया गया था, जिसमें आरोप लगाया था कि इन लोगों के सोशल मीडिया पोस्ट्स और डिजिटल प्रसारण राष्ट्रीय राजधानी में किसानों की ट्रैक्टर रैली के दौरान हिंसा के लिए जिम्मेदार थे।

जेल में बंद लोगों के बाहर आने की उम्मीद

गुजरात में पाटीदारों के लिए आरक्षण की मांग करने वाले नेता हार्दिक पटेल के खिलाफ देशद्रोह का केस दर्ज हुआ था। 25 अगस्त 2015 को अहमदाबाद में पाटीदार आरक्षण समर्थक रैली के बाद राज्य में तोड़फोड़ और हिंसा हुई थी। पुलिस ने चार्जशीट में हार्दिक पर आरोप लगाया कि उन्होंने राज्य में हिंसा फैलाने और चुनी हुई सरकार को गिराने का षड्यंत्र रचा था। देशद्रोह के मामले में अभी उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे छात्र एक्टिविस्ट, सिद्दीक कप्पन और गौतम नवलखा जैसे पत्रकार, रोना विल्सन और शोमा सेन जैसे एक्टिविस्ट और कई लोग अभी जेल में हैं। जबकि वरवरा राव जैसे बुजुर्ग कवि-एक्टिविस्ट भी हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट  के फैसले के बाद सभी लोगों के जेल से बाहर आने की उम्मीद है। 

अब टीकाकरण के लिए आधार कार्ड जरूरी नहीं, दूसरे दस्तावेज से भी चल जाएगा काम

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कोरोना संक्रमण से बचाव और उससे होने वाली मौतों को रोकने के लिए कोरोना की वैक्सीन ही अभी संजीवनी साबित हो रही है। इसी बीच केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि कोरोना वैक्सीन लगवाने के लिए रजिस्ट्रेशन कराते वक्त आधार कार्ड देना अनिवार्य नहीं है। सोमवार को जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस ए सूर्यकांत की बेंच ने सुनवाई के दौरान सरकार ने ये जवाब दिया। सुप्रीम कोर्ट ने 1 अक्टूबर 2021 को उस याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब देने को कहा था, जिसमें याचिकाकर्ता ने कहा था कि केंद्र को निर्देश दिया जाए कि कोविड वैक्सीनेशन के लिए सिर्फ आधार कार्ड ही न मांगा जाए।


सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने कहा था कि कोविन एप में 9 तरह के पहचान पत्र की बात है, लेकिन वैक्सीनेशन सेंटर पर आधार मांगा जा रहा है और ऐसे में केंद्र को निर्देश जारी करने की जरूरत है। सुनवाई के दौरान बेंच ने सरकार से कहा कि पूरी तरह यह सुनिश्चित करें कि वैक्सीन के लिए आधार कार्ड नहीं मांगा जाए। कोर्ट में सरकार ने बताया कि वैक्सीन रजिस्ट्रेशन के लिए पासपोर्ट, राशन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, पेन कार्ड और वोटर कार्ड जैसे दस्तावेज का ऑप्शन दिया गया है।


87 लाख लोगों को बिना प्रूफ के वैक्सीन 

स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा है कि सरकार की तरफ से अभी तक 87 लाख लोगों को बिना किसी रेजिडेंस प्रूफ के वैक्सीन मुहैया कराई गई है। इनमें भिखारी, जेल में बंद कैदी और सड़कों पर घूमने वाले मानसिक विक्षिप्त भी शामिल हैं। सुनवाई के बाद बेंच ने कहा कि वैक्सीन की सुविधा पाने के लिए आधार कार्ड की जरूरत नहीं है और सभी संबंधित प्राधिकारी सरकार के नियमों का पालन करें।


देश में वैक्सीनेशन का आंकड़ा 170 करोड़ के पार

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के मुताबिक भारत में कोविड वैक्सीनेशन का आंकड़ा 170 करोड़ 18 लाख के पार हो गया है।  देश में अब तक टीके का 95 करोड़ 25 लाख से ज्यादा पहला और 73 करोड़ 47 लाख से ज्यादा दूसरा डोज लगाया गया है। वहीं 1 करोड़ 45 लाख से ज्यादा बूस्टर डोज लगाए गए हैं।

चुनाव आयोग ने मीडिया की टिप्पणियों को बताया ‘अनावश्यक और अपमानजनक’, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई फटकार, कहा - रिपोर्टिंग करने से मीडिया को नहीं रोका जा सकता

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नई दिल्ली। आज प्रेस स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को फटकार लगाई है। जिसमे सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को चुनाव आयोग से साफ कहा है कि उच्च न्यायालयों में सुनवाई के दौरान दी जाने वाली टिप्पणी पर रिपोर्टिंग करने से मीडिया को नहीं रोका जा सकता है। जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ और जस्टिस एम.आर. शाह की पीठ ने कहा कि न्यायाधीशों की मौखिक टिप्पणियों की रिपोर्टिंग करना व्यापक जनहित में है क्योंकि यह जवाबदेही लाती है।





दरअसल, कोरोना के बढ़ते केस के बीच चुनाव कराए जाने पर मद्रास हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग को लेकर टिप्पणी दी थी कि उसपर हत्या का केस चलना चाहिए। चुनाव आयोग ने मद्रास हाईकोर्ट की इस टिप्पणी को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया है।





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चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि उसके खिलाफ हत्या के आरोपों वाली मद्रास उच्च न्यायालय की टिप्पणी को लेकर मीडिया में लगातार चर्चा हो रही है। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ मामले की सुनवाई कर रही थी। मद्रास हाई कोर्ट ने कोरोना की दूसरी लहर के बीच चुनावी रैलियों को मंजूरी देने पर चुनाव आयोग के खिलाफ टिप्पणी दी थी।





निर्वाचन आयोग ने मद्रास उच्च न्यायालय की आलोचनात्मक टिप्पणियों के खिलाफ शनिवार को शीर्ष अदालत का रुख किया था जिनमें उसे देश में कोविड-19 के मामले बढ़ने के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था। आयोग ने इन टिप्पणियों को ‘अनावश्यक और अपमानजनक’ बताया था।


देश के सभी थानों में लगाएं जाएंगे CCTV कैमरे , SC निर्देश

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उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को केन्द्र को निर्देश दिया कि गिरफ्तार करने और पूछताछ करने का अधिकार रखने वाले केन्द्रीय जांच ब्यूरो, प्रवर्तन निदेशालय और राष्ट्रीय जांच एजेन्सी सहित सभी जांच एजेन्सियों के कार्यालयों में CCTV कैमरे लगाये जायें.





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न्यायमूर्ति रोहिन्टन फली नरिमन, न्यायमूर्ति के एम जोसेफ और न्यायमूर्ति अनिरूद्ध बोस की पीठ ने कहा कि राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रत्येक थाने में प्रवेश और निकासी के स्थान, मुख्य प्रवेश द्वार, हवालात, सभी गलियारों, लॉबी, स्वागत कक्ष क्षेत्र और हवालात कक्ष के बाहर के क्षेत्रों में सीसीटीवी कैमरे अनिवार्य रूप से लगे हों।





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शीर्ष अदालत ने इससे पहले मानव अधिकारों के हनन पर अंकुश लगाने के लिये थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने का आदेश दिया था. न्यायालय ने कहा कि नार्कोटिक कंट्रोल ब्यूरो, राजस्व गुप्तचर निदेशालय और गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालयों सहित सभी जांच एजेन्सियों के उन सारे कार्यलयों में अनिवार्य रूप से सीसीटीवी कैमरे लगाये जायें जिनमे पूछताछ होती है और आरोपियों को रखा जाता है.





न्यायालय ने कहा कि CCTV कैमरे प्रणाली में नाइट विजन सुविधा (Night vision facility)के साथ ही आडियो और वीडियो की फुटेज की व्यवस्था होनी चाहिए और केन्द्र तथा राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों के लिये ऐसी प्रणाली खरीदना अनिवार्य होगा जिनमें कम से कम एक साल और इससे ज्यादा समय तक CCTV कैमरे के आंकड़ों को संग्रहित कर रखने की सुविधा हो.


ऑनलाइन सुनवाई के दौरान बिना शर्ट के दिखा व्यक्ति, कोर्ट ने लगाई फटकार

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सुप्रीम कोर्ट में एक केस की ऑनलाइन सुनवाई (online case hearing news) के दौरान वीडियो-कॉन्फ्रेंस लिंक पर एक व्यक्ति बगैर शर्ट पहने बैठा था। सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कमीज पहने बिना नजर आने पर मंगलवार को नाराजगी जताई.





न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता की पीठ ने कहा, 'वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए सुनवाई करते हुए सात से आठ महीने हो जाने के बावजूद इस प्रकार की चीजें हो रही हैं।' सुनवाई के दौरान स्क्रीन पर एक व्यक्ति के कमीज के बिना नजर आने पर पीठ ने कहा, 'यह सही नहीं है।'





न्यायालय में वीडियो-कॉन्फ्रेंस के जरिए सुनवाई के दौरान इस प्रकार की अप्रिय घटना पहली बार नहीं हुई है। कोविड-19 के कारण न्यायालय वीडियो-कॉन्फ्रेंस के जरिए मामलों की सुनवाई कर रहा है।





पहले भी हो चुकी है ऐसी घटना





इसी प्रकार की घटना 26 अक्टूबर को हुई थी, जब न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पीठ के सामने एक वकील बिना (online case hearing news)कमीज पहने दिखाई दिया था। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा था, 'मुझे किसी पर सख्ती बरतना अच्छा नहीं लगता, लेकिन आप स्क्रीन पर हैं, आपको ध्यान रखना चाहिए।'





टी-शर्ट में पेश हुए थे वकील





न्यायालय में जून में डिजिटल सुनवाई के दौरान एक वकील (Behave during online case hearing) बिस्तर पर लेटे हुए और टी-शर्ट पहनकर पेश हुआ, जिस पर न्यायाधीश ने नाराजगी जताते हुए कहा था कि सुनवाई की जन प्रकृति को ध्यान में रखते हुए 'अदालत के न्यूनतम शिष्टाचार' का पालन किया जाए।





बनियान में पेश हुए थे वकील





उच्चतम न्यायालय ने कहा कि वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए मुकदमों में भाग ले रहे वकील 'पेश होने योग्य' नजर आने चाहिए और ऐसी तस्वीरें दिखाने से बचना चाहिए जो उपयुक्त नहीं हैं। इस साल अप्रैल में भी ऐसी ही घटना सामने आई थी जब वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए हुई सुनवाई में एक वकील बनियान पहनकर पेश हुआ था, जिस पर राजस्थान उच्च न्यायालय ने नाराजगी जताई थी।


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