Media24Media.com: चर्चा चौराहे पर

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Charcha Chaurahe Par : हवा-हवाई सर्वे और बन गई सरकार, सपनों का महल-उम्मीदों का ताज, राजनीति के व्यापारी का क्या होगा, करे कोई-भरे कोई-मरे कोई

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 चर्चा चौराहे पर-10

# हवा-हवाई सर्वे और बन गई सरकार !


राजनीतिक गलियारों में इन दिनों 'भरोसे की सरकार' बन रही है। 'अउ नई सहिबो-बदल के रहिबो' वालों का दावा है, बदलाव की हवा बही है। इस बीच मोबाइल पर एक कॉल रोज आ रहा है। "कांग्रेस को वोट दिया तो 6 दबाएं, भाजपा को वोट दिया तो 7 दबाएं, अन्य के लिए 8 दबाएं।" 



 रोज-रोज के ऐसे हवा हवाई सर्वे से मतदाता दुखी हैं। एक 'टुन्न उस्ताद' को संध्या काल में ऐसा ही कॉल आया। तब तक वह दो पैग चढ़ा चुके थे। जोर-जोर से चिल्लाने लगे-"अरे हम क्यों दबाएं? उनसे दबवाओ न जो पूरा माल दबाए हैं। हमारा हिस्सा भी खाए हैं। पार्टी ने तो फंडिंग अच्छे से किया है। पूरा माल तो बीच के नेताजी दबाए हैं। हम क्यों अपने मोबाइल का बटन दबाएं?" पड़ोसी यह बकबक सुन रहा था। उसने चौराहे पर चर्चा छेड़ दी। ऐसे हवा-हवाई सर्वे के आधार पर ही रोज सरकार बनाई और गिराई जा रही है। अब जरा सोचिए-कोई भी सूझबूझ वाला व्यक्ति क्या इसका जवाब मोबाइल की बटन दबाकर देगा ? उन्होंने किसे वोट दिया, वह बताएगा क्या?

# सपनों का महल, उम्मीदों का ताज


छत्तीसगढ़ में अगली सरकार किसकी बन रही है? यह अभी सबसे ज्यादा पूछा जाने वाला सवाल है। इस बीच 'नेताजी' का महल बनकर तैयार है। सपनों का महल। कहने को तो लोकतंत्र है, हमारे चुने हुए 'राजकुमार' इन महलों में रहेंगे। नवा रायपुर में बनाए गए आलीशान 'हाऊस' किसी राजमहल से कम नहीं है। 'युवा छत्तीसगढ़' कर्ज के बोझ तले दबा जा रहा है। फिर भी सफेदपोश 'कर्ज लेकर घी पीने' में अपनी शान समझ रहे हैं। चाटुकारिता में माहिर नौकरशाह भी कम नहीं हैं। इनके लिए सर्वसुविधायुक्त हवेलियां बनाई गई है। सड़कें बदहाल रहे। बच्चों को पढ़ने के लिए छत भले ही मुहैया न हो। खेतों को पानी मिले-न मिले। इन 'कलयुगी अवतारों' को सत्ता सुख बराबर मिलनी चाहिए। दल कोई भी हो, छत्तीसगढ़ को कर्ज के दलदल में धकेलने से गुरेज नहीं कर रहे हैं। अब देखना होगा कि उम्मीदों का ताज किनके सिर पर सजता है। कौन सत्ता सुख के अधिकारी हैं? इसका जवाब 3 दिसंबर को ही मिल पाएगा।

# राजनीति के व्यापारी का क्या होगा?


एक व्यापारी राजनीति में आ गए। व्यापार तो रग- रग में समाया था। राजनीति को भी व्यापार ही समझ बैठे। चुने गए थे जनसेवा के लिए। पूरे पांच साल जमकर किया व्यापार। हर काम में मेरा क्या फायदा? कहने वाले व्यापारी नेता को 'एकांत वास' की सजा मिल गई है। चाटुकारों से हमेशा घिरे रहते थे। जब से एकांत वास की स्थिति बनी है बीपी और शुगर अनियंत्रित हो गया है। गम भुलाने रोज बीपी की बोतल का सहारा ले रहे हैं। इस बीच  शून्य से शिखर तक पहुंचने वाले सहाराश्री के नहीं रहने की दुखद खबर मिली। उनका इतिहास पढ़कर व्यापारी नेता की जमीन खिसक गई। काली कमाई से जमीन में जमकर इन्वेस्टमेंट करने वाले को अब ईडी का भूत सता रहा है। चौराहे पर चर्चा हो रही थी बस कुछ दिन और ....। आगे-आगे देखिए होता है क्या? व्यापारी नेता का क्या हश्र होने वाला है। यह अभी भविष्य के गर्भ में है। 

# करे कोई-भरे कोई-मरे कोई


जरा गौर फरमाइये जब से छत्तीसगढ़ में मतदान हुआ है, सड़क हादसे यकायक बढ़ गए हैं। दरअसल, 'चुनई तिहार' में कुछ लोग जमकर कमाए हैं। इससे रोज जाम छलकाने का क्रम चल रहा है। नशा करके वाहन चलाने वालों की संख्या बढ़ गई है। जिन्हें यातायात व्यवस्था दुरुस्त करना है वे 'वसूली अभियान' में व्यस्त हैं। बदहाल यातायात, रोज हो रही सड़क दुर्घटनाओं के बीच पुलिस को जनमानस के कोपभाजन का शिकार होना पड़ रहा है। कप्तान की घुड़की के बाद यातायात के जिम्मेदार सड़क में संकेतक बनाकर दुर्घटना रोकने की कोशिश कर रहे हैं। इनके हाथ में कोशिश से ज्यादा कुछ भी नहीं है। "करे कोई, भरे कोई और मरे कोई" ये कर भी क्या सकते हैं? चेतावनी बेअसर है। सख्ती करने पर नेतागिरी होती है। चालान काटने पर बचाव में फोन आते हैं। उगाही करने का आरोप लगाते हैं। कौन आ बैल मुझे मार करें। निरापद बनकर यातायात पुलिस का महासमुंद महकमा चौक चौराहे पर मोबाइल फोन पर व्यस्त नजर आते हैं। 

-: Disclaimer :- 

इस कालम का संपादन वरिष्ठ पत्रकार व 'श्रीपुर एक्सप्रेस' और 'मीडिया24मीडिया' समूह के प्रधान संपादक श्री आनंदराम पत्रकारश्री कर रहे हैं। इसमें उल्लेखित तथ्यों की जानकारी संचार के विभिन्न माध्यमों, जन चर्चा और कानाफूसी पर आधारित है। व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत आलेख से किसी की भी मानहानि नहीं होगी, इसका विशेष ध्यान रखा गया है। आलेख में किसी व्यक्ति विशेष, संस्था अथवा दल विशेष पर कटाक्ष नहीं है। किसी घटना अथवा कड़ी का आपस में जुड़ जाना महज एक संयोग होगा। इस संबंध में कोई दावा-आपत्ति स्वीकार्य नहीं है। 

( हमारा ध्येय स्वस्थ पत्रकारिता को प्रोत्साहित करना है। तथापि यदि संयोगवश किसी विषयवस्तु से किसी की भावना को ठेस पहुंचती है, तो अपनी अभिव्यक्ति सीधे प्रधान संपादक तक मोबाइल नंबर- 9669140004 पर व्हाट्सएप्प करके अथवा anand.media24media@gmail.com पर ई-मेल संदेश भेज सकते हैं। हम सुधि पाठकों के भावनाओं का विशेष ध्यान रखेंगे। )
नोट:- इस नियमित कॉलम का उपयोग विभिन्न समाचार पत्रों और वेबपोर्टल संपादकों द्वारा भी किया जा रहा है। कृपया कंटेंट से छेड़छाड़ कर प्रकाशित न करें। ऐसा करने पर स्वयं जिम्मेदार होंगे।




Charcha Chaurahe Par : छग में किसकी बनेगी सरकार, राजा गुरू और राजनीति में गुरू, महासमुन्द का मायाजाल, धान से धनवान बनने का चक्कर

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चर्चा चौराहे पर-09

# छग में किसकी बनेगी सरकार

छत्तीसगढ़ विधानसभा निर्वाचन के लिए मतदान हो गया है। उम्मीदवारों का भाग्य ईवीएम में कैद है। कौन-कौन बनेंगे विधायक? यह तो भाग्य विधाता जानें। खुद को खुदा समझने वाले अफसरों की धड़कनें ज्यादा तेज हो गई। पूर्वानुमान लगाकर भविष्य तय करने वाले 'गिरगिट प्रजाति' के जीव रात-दिन एक ही सर्वे करा रहे हैं। 



       "कौन किस पर भारी हैं?  
           हम तो किसी के नहीं आभारी हैं। 
               जिसका पलड़ा दिखे भारी,
            हम तो उनसे बढ़ाएंगे अपनी यारी।।"

का राग अलापते हुए नौकरशाह बड़ी चिंता में हैं। छत्तीसगढ़ छोटा राज्य है। राजनीतिक समीकरण बनते-बिगड़ते देर नहीं लगती है। बीते निर्वाचन में चुनाव परिणाम अप्रत्याशित आया था। जितनी सीटें मिली थी, वह वर्तमान सत्तारूढ़ दल की उम्मीद से कहीं ज्यादा थी। विपक्षी दल ने तो सपने में नहीं सोचा था कि उनकी 'दुर्गति पराजय' होगी। "इस बार-75 पार" का नारा देने वाले आर-पार की लड़ाई लड़ रहे हैं। "अउ नई सहिबो-बदल के रहिबो" वाले उलट फेर करने में माहिर बताए जाते हैं। तब सबके जुबां पर बस एक ही सवाल है- 

        किसकी बनेगी सरकार? 
             कौन होंगे अगले मुख्यमंत्री? 
               कोई तो बताओ यार,
                      जिया है इनका बेकरार, 
                       75 न सही, 50 ही हो जाए पार।

# राजा गुरू और राजनीति में गुरू


छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में तरह-तरह के मुकाबले हुए। कहीं चाचा-भतीजा, कहीं गुरू- चेला, कहीं खाटी-नवेला आमने-सामने नजर आ रहे हैं। इस बीच कुछ सीटों पर हार-जीत के अपने-अपने दावे हैं। राजनीतिक पंडित तो रोज किसी को हरा-जीता रहे हैं। इस बीच 'विकास के रंग' में रंगे एक विधानसभा सीट पर 'एक-पांच' का दांव चल रहा है। इस क्षेत्र से एक वर्ग विशेष के 'राजा गुरू' का मुकाबला राजनीति में गुरूओं के गुरू कहे जाने वाले नेता से है। जो सड़क से सदन तक बड़े-बड़े लोगों को पानी पिलाते रहे हैं। क्षेत्र विशेष में विकास की गंगा बहाते रहे हैं। यहाँ हार-जीत को लेकर ऐसा जोर चल रहा है कि शिवालयों की नगरी में 'महादेव' का शोर मचा है। दाँव खेलने वाले 'राजनीतिक गुरू' की हार पर एक का पाँच देने को तैयार हैं। 'राजा गुरू' के लिए लोग दाँव लगाने से कतरा रहे हैं। राजनीति में तीन-पांच होने की चर्चा तो खूब सुने थे। चौराहे पर 'एक-पांच' की चर्चा, इस समय खूब चर्चा में है। लोग चुटकी ले रहे हैं- 

  " शिवालयों की नगरी में 'शिव' छा गया, 
   राजनीति के मैदान में 'राजा गुरू' आ गया।
   कौन कहता है कि शिकस्त मिलेगी यहाँ, 
    बाबा बागेश्वर की असीम कृपा है जहाँ ।
   जिनकी चरण वंदना करते थे यहाँ सभी, 
वह हाथ जोड़े खड़े होंगे, सोचे नहीं थे कभी।" 

# महासमुन्द का मायाजाल


महासमुन्द को राजनीति का अखाड़ा कहा जाता है। यहाँ की राजनीतिक जागरूकता की चर्चा दिल्ली तक होती है। यहाँ एक चुनाव ऐसा भी हुआ है। जब एक कलेक्टर नामांकन कराए, दूसरा कलेक्टर मतदान और तीसरे ने कराई मतगणना। यह प्रशासनिक फेरबदल का बहुत बड़ा काला अध्याय है। जिसकी कालिख अब तक नहीं धुल पायी है। 

सोच सकते हैं कि कितना चर्चित जगह है-महासमुन्द। यहाँ का राजनीतिक मायाजाल और पक्ष-विपक्ष की मकड़जाल को अच्छे-अच्छे अफसर समझ नहीं पाए। चुनाव का नया-नया अनुभव ले रहे नौजवान अफसर ने सख्ती से काम लिया। मतदान शान्ति से निपट गया। हाथी निकल गया , बस अब पूंछ बाकी रह गया है। बड़ी राहत महसूस की। नौजवान हैं, प्रेमभाव भी उमड़ना स्वाभाविक है। गलती पर सजा, तो अच्छे काम पर सम्मान क्यों नहीं? जायज है। मतदान कराकर थके-हारे लौटे लोगों की थकान तब मिट गई, जब स्नेह भाव से उनके हाथों में 'जिले के मालिक' ने लाल गुलाब का फूल थमाया। बेहतरीन नवाचार है। जिन्होंने इसकी परिकल्पना की हो, उन्हें चर्चा चौराहे की टीम का सलाम है। उम्मीद की जा सकती है कि 'प्रभात काल' नया सबेरा लेकर आएगा।

# धान से धनवान बनने का चक्कर


छत्तीसगढ़ से सटा हुआ है ओडिशा। वहाँ मंडी में अभी धान 1800 से 2000 रुपये के बीच बिक रहा है। छत्तीसगढ़ में धान समर्थन मूल्य पर 3100 से 3200 रुपये में खरीदी की तैयारी है। एक नवम्बर से धान खरीदी प्रारंभ हो चुकी है। चुनाव के चक्कर में धान खरीदी की गति धीमी है। पूरा प्रशासनिक अमला चुनाव में व्यस्त है। इसका फायदा उठाकर बिचौलिए और कोचिए ओडिशा का धान सीमावर्ती क्षेत्र में डंप कर रहे हैं। निगरानी समिति की नजर गांधी जी की तस्वीरों पर टिकी है। धान से धनवान बनने का एकाधिकार क्या किसानों के पास सुरक्षित है? भारी-भरकम समर्थन मूल्य वालों को व्यापारियों का भी तो समर्थन है ? उन्हें धान से धनवान बनने का सपना देखने का हक नहीं है? रात-दिन बॉर्डर पर चौकसी करने वालों को भी तो कुछ कमाने का अवसर मिलना चाहिए? यह सवाल चौराहे पर चर्चा का विषय बन गया है। धान से धनवान बनने के चक्कर में कौन-कौन लोग हैं ? कैसे बनेंगे? हमें भी अवश्य बताएं।

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Charcha Chaurahe Par : महादेव की माया से खेला हो गया, मेरे गाँव में मेला हो गया, मुर्गियां बेचारी-किस्मत की मारी, एक वोट-हजार रुपये का नोट

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चर्चा चौराहे पर-08

# लक्ष्मीजी की माया-ज्यादातर जगह फूल छाया

विधानसभा चुनाव संपन्न हो गया। उम्मीदवारों का भाग्य ईवीएम में कैद हो गया है। चौराहे पर अब एक ही चर्चा है-कौन जीत रहे हैं? सबका अपना-अपना तर्क है। एक विश्लेषक कलमकार का कहना है-"लक्ष्मीजी की माया है,ज्यादातर जगह फूल छाया है।" एग्जिट पोल पर रोक है। लोग कानाफूसी कर रहे हैं। जीत-हार के अपने-अपने दावे हैं। कोई भाग्य पर इतरा रहे हैं। किसी के हिस्से में अब बस पछतावा है। 


इस बीच धार्मिक आस्था वाले एक उम्मीदवार कह रहे हैं- 
          "महादेव की 'माया' से सब काम हो रहा,
                    करने वाले स्वयं महादेव हैं,
                          और मेरा नाम हो रहा है।" 
छत्तीसगढ़ विधानसभा के लिए क्षेत्र क्रमांक -42 महासमुन्द में गजब चमत्कार होने के संकेत मिल रहे हैं। बाबाजी की भविष्यवाणी सुफल होने वाली है? बाबा जी ने क्या भविष्यवाणी की थी? इसका खुलासा 3 दिसंबर को दोपहर करीब 3 बजे होगी। तब तक दिल थाम कर बैठिए। राजनीति में भविष्य तलाशने वालों को 'बाबाजी' की तलाश है। बाबाजी को सच्चे मन से तलाशें। बाबाजी आपके आस-पास हैं। एक व्यक्ति ने चुटकी ली-"दाढ़ी वाले बाबा का जादू चल गया ?" जी नहीं, हम किसी और बाबा की बात कर रहे हैं। 

# मुर्गियां बेचारी-किस्मत की मारी,

वर्ष-2023 तिथि-16 और 17 नवम्बर। यह तारीख मुर्गियों की सात पीढ़ी कभी नहीं भूलेंगी। 16 नवम्बर की रात में देशी मुर्गियों की शामत आ गई। ज्यादातर मतदान दल की फरमान थी- 
" चिंता के नईये कोनो बात,
      आज हावे कत्ल के रात।
          पांच साल म ये चुनई तिहार आथे, 
             कतको खुशी के सौगात साथ लाथे।।
                 आज चुरही मुर्गी अउ-भात, 
                  तभेच त याद रही कत्ल के ये रात।।"
प्रायः ज्यादातर बूथ में देशी-बायलर मुर्गे की बलि चढ़ी। तब बूथ मैनेजमेंट हुआ। यही नहीं कोई गांव शेष नहीं रहा, जहाँ कत्ल की रात न मनाई गई हो। लोकतंत्र का त्यौहार यूँ ही चर्चित नहीं है। हर पांच साल में एक बार आता है यह महापर्व। अनेक खट्टे-मीठे अनुभव छोड़ जाता है। सबसे ज्यादा अपनी किस्मत पर मुर्गियां रो रही हैं। 'चुनई तिहार' में न जाने इनके कितने लाल शहीद हो गए हैं। 

# एक वोट-हजार रुपये का नोट


छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव ने इस बार 1972 की याद दिला दी। बुजुर्ग बताते हैं- जब एक वर्ग विशेष के खिलाफ मुहिम चला। " ...वाड़ी भगाओ, महासमुन्द बचाओ" का नारा चला। तब सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार की सभा में लोग उमड़ पड़ते थे। चुनाव में एक वोट देने का वादा करते थे और 'एक नोट' भी सभास्थल पर बिछाए गए लाल गमछा में डालते थे। इस तरह 'एक वोट-एक नोट' जन मुहिम बन गया। जनता के खर्चे से एक ईमानदार नेता का उदय हुआ। कहते हैं इतिहास खुद को दोहराता है। चौराहे पर चर्चा है कि 51 साल बाद, एकबार फिर से " कु... हटाओ, विकास कराओ " का मुहिम चल पड़ा है। अंतर केवल इतना है कि तब जनता ने 'एक वोट-एक नोट' दिया था। इस बार उम्मीदवार ने 'एक वोट-हजार रुपये का नोट' दिया है। अब ये मत कहिएगा कि एक हजार का नोट तो प्रचलन में नहीं है। दरअसल, 
      "गांधी जी के जोड़ीदार, 
             आ कर ले करार। 
         अब अउ नई सहिबो, 
               बदल के रहिबो।।" 
का नारा चला। जानकर तो यहाँ तक कहते हैं कि महिला समूहों को एक-एक हजार रुपये देने में 'चार खोखा' भी कम पड़ गया। अब आगे-आगे देखिए होता है क्या ? क्या यह मुहिम सही है ?

# खेला हो गया, मेरे गाँव में मेला हो गया 


कहते हैं कि गांव में आज भी ईमानदारी जिंदा है। वफादारी के लिए सबकुछ न्यौछावर किया जाता है। जिसकी खाते हैं-उसकी गाते हैं। 'गुन-हगरई' नहीं करते हैं। कोई मुर्गा खाया। कोई बकरा भात खाया। कोई भजिया-चटनी खाया। जो कुछ भी नहीं खाया, वह नगदी पाया। दो दिन और एक रात में सब खेला हो गया। लक्ष्मी जी की माया से हर गांव में मेला हो गया।

   "लुटिया किसी की डूबे रे भैया, 
               सबसे बड़ा रुपैया।
                       ददा चिन्हे न भईया, 
                              सबसे बड़ा रुपैया।।"
इसी तर्ज पर यह चुनाव हुआ। लाखों फूंक कर 'हार-जीत' का दांव खेलने वाले अब हारे हुए जुआरी की तरह फिलिंग कर रहे हैं। यह तो तय है कि जीतना किसी एक को ही है। बाकी को तो 'हाथ' मलते हुए 'किस्मत' को कोसना है। मन मसोजकर भीतरघात और दगाबाज का ठीकरा फोड़ना है। यह राजनीति है जनाब! इसका आकर्षण उस बाज़ारू औरत की तरह है, जिसकी बाहों में हो उसकी होती है। अर्थात वह हर किसी की होते हुए भी किसी की नहीं है। 

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इस कालम का संपादन वरिष्ठ पत्रकार व 'श्रीपुर एक्सप्रेस' और 'मीडिया24मीडिया' समूह के प्रधान संपादक श्री आनंदराम पत्रकारश्री कर रहे हैं। इसमें उल्लेखित तथ्यों की जानकारी संचार के विभिन्न माध्यमों, जन चर्चा और कानाफूसी पर आधारित है। व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत आलेख से किसी की भी मानहानि नहीं होगी, इसका विशेष ख्याल रखा गया है। आलेख में किसी व्यक्ति विशेष, संस्था अथवा दल विशेष पर कटाक्ष नहीं है। किसी घटना अथवा कड़ी का आपस में जुड़ जाना महज एक संयोग होगा। इस संबंध में कोई दावा-आपत्ति स्वीकार्य नहीं है। 

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Charcha Chaurahe Par : दागी-बागी बिगाड़ रहे समीकरण, हमें तो अपनों ने लूटा, सरल और चतुर में मुकाबला, खुला घात-भीतरघात, सब पर भारी बकरा-भात

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चर्चा चौराहे पर-07

# दागी-बागी बिगाड़ रहे समीकरण

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के लिए द्वितीय चरण में आज 17 नवम्बर को 70 सीटों के लिए मतदान हो रहा है। सोलह-सत्रह आना ( करीब 75 प्रतिशत से अधिक) वोटिंग होने की उम्मीद की जा रही है। इस बीच चौराहे पर चर्चा चल रही है। मुख्य मुकाबला तो दो राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस और भाजपा के बीच ही है।

 कुछ सीटों पर दागी और बागी समीकरण बिगाड़ रहे हैं। दागी वे हैं, जिन्हें पार्टी ने किसी न किसी वजह से दरकिनार कर दिया। बागी वे हैं, जो जिस थाली में खाये-उसी में छेद करके चुनाव मैदान में उतर गए। इनसे इतर कुछ दागी-बागी ऐसे भी हैं, जो अभी तो नहीं , इसके पहले के चुनावों में अपनी रंगत दिखा चुके हैं। इतिहास गवाह है, ऐसे लोगों को जनता नकार देती है। बावजूद, "हम तो डूब रहे हैं सनम, तुम्हें भी साथ ले डूबेंगे" के तर्ज पर ये नेता चुनाव के समय सक्रिय भूमिका में आ जाते हैं। किस सीट पर कितने दागी और कितने बागी हैं? इसकी व्याख्या हमारे सुधि पाठक स्वयं करने में सक्षम हैं। 

जागो मतदाता जागो : अपने मताधिकार का प्रयोग करें। बेचें नही।            

 @ Media24Media द्वारा जनहित में जारी.
जागो मतदाता जागो : अपने मताधिकार का प्रयोग करें। बेचें नही।                                @ Media24Media द्वारा जनहित में जारी.

# हमें तो अपनों ने लूटा

इस विधानसभा चुनाव में टिकट की उम्मीद लगाए बैठे रहे लोगों की सूची लंबी है। टिकट चाहने वाले लोग, न चाहते हुए भी औपचारिक रूप से पार्टी उम्मीदवार के साथ होने का दिखावा कर रहे हैं। इस पर छत्तीसगढ़ी साहित्यकार ने क्या खूब कही है-
     " जेकर देखे जर मरय,
             तेकर जाय बरात ।" 
(अर्थात जिसे देखकर ही जलन होती है, उसी के बारात में शामिल होने की विवशता है।) 
ऐसे लोग पार्टी कार्यालय के इर्द-गिर्द ही घुमकर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। हद तो तब हो गई जब उम्मीदवार को सांस लेने की फुर्सत नहीं है, तब ये लोग इत्मीनान से गुपचुप खा रहे हैं। गुप-चुप और क्या-क्या खा रहे हैं। कितना चूना लगा रहे हैं। यह तो प्रत्याशी भी नहीं जानते। यह भी कहते फिर रहे हैं कि इन्हें तो पड़ोसी वोट नहीं दे रहे हैं। किस्मत के मारे 'बेचारे' राग अलाप रहे हैं-

" हमें तो अपनों ने लूटा,
        गैरों में कहाँ दम था।
             हमारी कस्ती वहाँ डूब रही, 
                 जहाँ गढ्ढा कम था।।" 
मैंने मताधिकार का प्रयोग किया, आपने वोट डाला क्या? मतदान अवश्य करें। यह आपका अधिकार ही नहीं कर्तव्य भी है। 



# खुला घात-भीतरघात, सब पर भारी बकरा-भात


इस विधानसभा चुनाव में खुला घात और भीतरघात जमकर हो रहा है। उम्मीदवार सकते में हैं- क्या होगा परिणाम? होगा बड़ा नाम या हो जाएंगे बदनाम। घात-प्रतिघात के बीच बकरा भात की जमकर चर्चा है। चौराहे पर चर्चा है कि सभी घातों पर 'बकरा भात' भारी पड़ रहा है। बकरा खाने के शौकीन लोगों को चुन-चुनकर पार्टी दिया जा रहा है। जिससे उनका चुनाव सुनिश्चित हो सके। चुनई तिहार में असंख्य बकरों की बलि हो चुकी है। बलि देने 'बदना' बदने का सिलसिला भी जारी है। यह समझ में नहीं आ रहा है कि बकरे की बलि हो रही है या उम्मीदवार को ही बलि का बकरा बनाया जा रहा है। बकरे के शौकीन, बकरा खाने के बाद डकार लेते हुए कहते सुने गए हैं-" बेचारे सीधे-सरल हैं, तभी तो लोग इन्हें राजनीति में बलि का बकरा बनाकर बर्बाद कर रहे हैं।"

# सरल और चतुर में मुकाबला


कहा जाता है कि राजनीति में चतुराई जितना मायने रखता है। सरलता उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। ज्यादा चतुराई करने वाले 'एक नेताजी' का हश्र सबके सामने है। हाईकमान के "नजर में खटकना और दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंकना" राजनीति में कोई नई बात नहीं है। चौराहे पर चर्चा चल रही थी कि एक सहज-सरल और एक चतुर कूटनीतिक के बीच इस बार मुकाबला है। यह समय के गर्भ में है कि ताजपोशी किसकी होती है। एक कलमकार ने चुटकी ली। इन दो शब्दों से मिलते-जुलते नाम की दो महिलाएं महासमुंद जिले की एक सीट पर आमने-सामने हैं। कहीं उनकी ओर इशारा तो नहीं है। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। छत्तीसगढ़ प्रदेश के अनेक सीटों पर आप देखेंगे। तो यह फार्मूला फीट बैठता है। चतुर-सयाने-खाटी उम्मीदवार के सामने सीधे-सहज-सरल उम्मीदवारों को ऐसे उतारा गया है, जैसे शेर के समक्ष बकरी को बांध दिया गया हो। यही भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती है। चुनाव परिणाम बताएगा कि इसके मायने क्या हैं ?

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इस कालम का संपादन वरिष्ठ पत्रकार व 'श्रीपुर एक्सप्रेस' और 'मीडिया24मीडिया' समूह के प्रधान संपादक श्री आनंदराम पत्रकारश्री कर रहे हैं। इसमें उल्लेखित तथ्यों की जानकारी संचार के विभिन्न माध्यमों, जन चर्चा और कानाफूसी पर आधारित है। व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत आलेख से किसी की भी मानहानि नहीं होगी, इसका विशेष ख्याल रखा गया है। आलेख में किसी व्यक्ति विशेष, संस्था अथवा दल विशेष पर कटाक्ष नहीं है। किसी घटना अथवा कड़ी का आपस में जुड़ जाना महज एक संयोग होगा। इस संबंध में कोई दावा-आपत्ति स्वीकार्य नहीं है। 

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Charcha Chaurahe Par: जमीन से जुड़े हुए नेताजी-गैस का चक्कर है-लोकतंत्र में राजशाही ठाठ और यहाँ किस्मत का चक्कर है

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छत्तीसगढ़ विधानसभा के लिए हो रहे निर्वाचन-2023 को लेकर चौक-चौराहे पर तरह-तरह की चर्चाएं हो रही है। इस पर मीडिया का नजरिया क्या है? चर्चाओं को रोचक अंदाज में प्रस्तुत करने और सम-सामयिक विषयों पर चुटीले अंदाज में कलम चलाने, कलमकारों को प्रोत्साहित करने के लिए नया कॉलम "चर्चा चौराहे पर" प्रारंभ किया जा रहा है।



इस कालम का संपादन वरिष्ठ पत्रकार व श्रीपुर एक्सप्रेस और मीडिया24मीडिया समूह के प्रधान संपादक श्री आनंदराम पत्रकारश्री कर रहे हैं। इसमें उल्लेखित तथ्यों की जानकारी संचार के विभिन्न माध्यमों, जन चर्चा और कानाफूसी पर आधारित है। व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत आलेख से किसी की भी मानहानि नहीं होगी, इसका विशेष ख्याल रखा गया है। आलेख में किसी व्यक्ति विशेष, संस्था अथवा दल विशेष पर कटाक्ष नहीं है। किसी घटना अथवा कड़ी का आपस में जुड़ जाना महज एक संयोग होगा। इस संबंध में कोई दावा-आपत्ति स्वीकार्य नहीं है। 

(यद्यपि हमारा ध्येय स्वस्थ पत्रकारिता को प्रोत्साहित करना है। तथापि यदि संयोगवश किसी विषयवस्तु से किसी की भावना को ठेस पहुंचती है, तो अपनी अभिव्यक्ति सीधे प्रधान संपादक तक मोबाइल नंबर- 9669140004 पर व्हाट्सएप्प करके अथवा anand.media24media@gmail.com पर ई-मेल संदेश भेज सकते हैं। हम सुधि पाठकों की भावनाओं का विशेष ध्यान रखेंगे। )


जमीन से जुड़े हुए हैं नेताजी


छत्तीसगढ़ का महासमुन्द जिला। यहाँ एक विधानसभा क्षेत्र में दो नए चेहरे चुनाव मैदान में हैं। दोनों खुद को जमीन से जुड़े हुए नेता बता रहे हैं। जनता समझ नहीं पा रही है कि कौन किस तरह से
जमीन से जुड़े हैं। एक नेता तो संगठन में काम करते हुए गांव-गली की खाक छान चुके हैं। जमीनी लीडर होने का उनका दावा समझ में आता है। दूसरा लीडर एकदम नया चेहरा है। ग्रामीण क्षेत्र में लोग उन्हें जानते-पहचानते ही नहीं हैं। तब कैसे जमीन से जुड़े हुए हैं नेता जी ? इस पर राजनीति के गूढ़ रहस्यों के जानकार एक कलमकार ने टिप्पणी की-

 "एक जमीन से जुड़े नेता हैं। दूसरे भी जमीन से जुड़े (जमीन दलाली) से जुड़े हैं। अब देखना होगा कि जनता किसे चुनती है? किसे धराशायी करती है? "

इस पर सबकी निगाहें टिकी हुई है। इतना जरूर है कि जमीन से जुड़े एक नेता की जमीन से प्रतिद्वंदी दल के राष्ट्रीय नेता जनसभा को संबोधित करने वाले हैं। यह बड़ी दरियादिली है कि विपक्षी नेता की आमसभा के लिए अपनी जमीन के उपयोग की सहर्ष सहमति दी गई है। यह वही मैदान है, जहाँ से राष्ट्रीय नेता पहले भी विशाल जनसभा को संबोधित कर चुके हैं। जमीन से जुड़े होने और जनाधार दोनों में जमीन-आसमां का अंतर है।


गैस का चक्कर क्या है ?


महासमुन्द जिले का एक चर्चित विधानसभा क्षेत्र खल्लारी। जहाँ के लिए कहा जाता है कि यहाँ 'बाहरी' को ज्यादा मौका मिलता है। कभी-कभी स्थानीय को भी जनता चुन लेती है। यहाँ गैस के कारोबार से जुड़े एक नेताजी की जमकर चर्चा है। जिस गैस ने अच्छी पहचान दिलाई। जिस गैस की महत्वाकांक्षी योजना में कथित तौर पर अच्छा काम करने से टिकट मिली। वही गैस अब मुसीबत बन रही है। 25 हजार से अधिक  कनेक्शन में गोलमाल किए जाने की अपुष्ट खबरें मिल रही है। ऐन चुनाव के वक़्त विपक्षी नेता-कार्यकर्ता गैस के चक्कर का मसला उठा रहे हैं। गैस को हवा मिली तो नेताजी को बदहजमी होना स्वाभाविक है। गैस की समस्या न हो, इसके लिए 'कायमचूर्ण'  की तलाश शुरू हो गई है। अब देखना होगा कि अफसरों से उगाही कर ज्यादा खाने वाले के पेट में उत्पन्न 'वात रोग' का तारणहार वैधराज कौन साबित होते हैं। चुनावी गलियारे में एक ही चर्चा है- ये गैस का चक्कर क्या है ?


लोकतंत्र में राजशाही ठाठ

महासमुन्द जिले के एक विधानसभा क्षेत्र में महल का खासा प्रभाव माना जाता है। आजाद भारत में भी 'हमर राजा' और 'हमर राजकुमार' की आस्था से लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं। राजतंत्र खत्म हो गया, फिर भी क्षेत्र की जनता 'राजा साहब' के वंशजों को अपना पालनहार मानती है। यही वजह है कि आज भी गांव-गांव में थाल सजाकर, आरती उतारकर एक उम्मीदवार की पूजा की जा रही है। 
वहीं दूसरी ओर 

लक्ष्मी जी की कृपा से सब काम हो रहा है।
 माया से राजनीति में बड़ा नाम हो रहा है।"

जनता दरबार में जनसेवा का संकल्प लेने वाले सख्श के बारे में इन दिनों खूब चर्चा हो रही है। राइस मिलरों को बुलाया गया। चुनाव लड़ने चंदा के रूप में 11-11 लाख रुपये देने का अनुरोध किया गया। मिलरों ने साफ कह दिया कि हम चावल के कारोबारी हैं, चावल एक नम्बर में बनाते हैं। कोयला के कारोबारी नहीं कि हमारे हाथ मे कालिख लगे हैं। हम इतनी मोटी रकम नहीं दे सकते हैं। बेचारे नेताजी अपनी पीड़ा किसी को नहीं बता पा रहे हैं। 


मेरी तो किस्मत ही खराब है !


महासमुन्द जिले का एक श्यामवर्ण नेता जी। यथा नाम तथा गुण। राजनीति में रंग चमकाने हर जतन कर चुके हैं। पर क्या करें-हर बार किस्मत ही साथ नहीं देती है। दल बदल कर देख लिया। चुनाव लड़कर देख लिया। लेकिन, दलाली और ठेकेदारी की पहचान जो बन गई है, वह मिटती नहीं है। अब तो हाईकमान को भी समझ में आ गया है कि अवसरवादी और दलबदलू नेताओं की हैसियत क्या है? अच्छे विचारधारा के लोगों को अब राजनीति में महत्व मिलने लगा है, ऐसा प्रतीत हो रहा है। तभी तो नेताजी को दरकिनार कर दिया गया। 'जाति समाज' का प्रभाव दिखाकर दूसरे दल से टिकट मिलने की उम्मीद में जंप लगाई। यह चतुराई भी काम नहीं आई। वहाँ पहले से पैठ जमाए जो बैठीं थी चातुरी ताई। अब अपनी किस्मत का रोना रो रहे हैं। अपने किए करतूतों का पाप धो रहे हैं। मौका चुके सिकंदर और डाली से झुके बंदर का वजूद खत्म हो जाता है। इसी तर्ज पर राजनीति में किस्मत ही खराब होने का रोना रो रहे हैं। अब तो किस्मत का ही खेल है कि किसकी किस्मत में विधायक बनना लिखा है। 
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