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गट हेल्थ पर बढ़ी चिंता, प्रोबायोटिक्स और पारंपरिक आहार पर जोर: राजीव गौबा

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नई दिल्ली- गट माइक्रोबायोटा एंड प्रोबायोटिक साइंस फाउंडेशन द्वारा 27–28 मार्च 2026 को “गट माइक्रोबायोम और प्रोबायोटिक्स: शिशु से वृद्ध तक प्रभाव” विषय पर 16वां इंडिया प्रोबायोटिक संगोष्ठी आयोजित की गई। इस कार्यक्रम में नीति आयोग के सदस्य राजीव गौबा मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए।

अपने संबोधन में राजीव गौबा ने गट माइक्रोबायोम (आंतों के सूक्ष्म जीव) की भूमिका को इम्युनिटी, मेटाबॉलिज्म और प्रिवेंटिव हेल्थकेयर के लिए बेहद महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि भारत में बदलती जीवनशैली और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स की बढ़ती खपत लोगों को पारंपरिक और पोषणयुक्त आहार से दूर कर रही है, जो लंबे समय में स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है।

उन्होंने चिंता जताई कि भारत में लगभग 56.4% बीमारियों का कारण असंतुलित आहार है और चेतावनी दी कि यदि इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो “सूक्ष्म जीव (micro-organisms) बड़े परिणाम (macro consequences) पैदा कर सकते हैं।”

राजीव गौबा ने कहा कि स्वास्थ्य क्षेत्र देश के विकास और आर्थिक प्रगति के लिए बेहद अहम है। उन्होंने बताया कि आयुष्मान भारत, पीएम-जय, जनऔषधि योजना और आयुष्मान आरोग्य मंदिर जैसे कार्यक्रमों ने स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत किया है। साथ ही, लोगों के जेब से होने वाला स्वास्थ्य खर्च 62.6% से घटकर 39.4% हो गया है, जिससे परिवारों को बड़ी राहत मिली है।

हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि स्वास्थ्य सेवाओं में सुलभता, गुणवत्ता और प्रशिक्षित मानव संसाधन की चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। उन्होंने डॉक्टरों से सस्ती जेनेरिक दवाओं के उपयोग, टेलीमेडिसिन और AI आधारित तकनीकों को बढ़ावा देने की अपील की।

प्रोबायोटिक्स के क्षेत्र में तेजी से हो रहे विकास का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अब CRISPR और सिंथेटिक बायोलॉजी जैसी तकनीकों के जरिए नई पीढ़ी के उपचार विकसित हो रहे हैं। लेकिन साथ ही उन्होंने भ्रामक विज्ञापनों और गलत जानकारी से सावधान रहने की जरूरत बताई।

भारत की पारंपरिक फर्मेंटेड फूड संस्कृति को देश की ताकत बताते हुए उन्होंने कहा कि भारत वैश्विक स्तर पर प्रोबायोटिक्स के क्षेत्र में नेतृत्व कर सकता है।

कार्यक्रम में युवा वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं की भागीदारी की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि यह संगोष्ठी नई साझेदारियों और नवाचार को बढ़ावा देगी।


निति आयोग के उपाध्यक्ष सुमन बेरी ने “ट्रेड वॉच क्वार्टरली” Q2 FY 25-26 का नवीनतम संस्करण जारी किया

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निति आयोग के उपाध्यक्ष सुमन बेरी ने 13 फरवरी 2026 को नई दिल्ली में वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर 2025) के लिए “Trade Watch Quarterly” का नवीनतम संस्करण जारी किया। इस अवसर पर निति आयोग के सदस्य अरविंद वर्मानी और अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित थे।

इस प्रकाशन में वैश्विक और घरेलू व्यापार रुझानों का विस्तृत विश्लेषण किया गया है। जबकि वैश्विक व्यापार वृद्धि धीमी रही, सेवाओं का प्रदर्शन माल से बेहतर रहा और विकासशील क्षेत्रों ने प्रमुख भूमिका निभाई। इस तिमाही के विशेष अनुभाग में भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स व्यापार पर ध्यान केंद्रित किया गया है, जिसमें मोबाइल फोन, उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स, औद्योगिक इलेक्ट्रॉनिक्स और कंपोनेंट्स में भारत के निर्यात और वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स मूल्य श्रृंखलाओं में भागीदारी का अध्ययन किया गया है।

विश्लेषण में यह पाया गया कि Q2 FY26 में भारत के व्यापार का प्रदर्शन निर्यात-प्रेरित रहा, जिससे वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद व्यापार विस्तार बना रहा। सेवाओं और वस्तुओं के निर्यात में ~8.5% की वृद्धि हुई। विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यापार में वृद्धि, ई-कॉमर्स के बढ़ते महत्व और भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में तेज़ी विशेष रूप से उजागर हुई।

इलेक्ट्रॉनिक्स अब भारत के निर्यात कार्ट में दूसरा सबसे बड़ा उत्पाद बन गया है। मोबाइल फोन निर्यात में तेज़ वृद्धि और उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स व संचार उपकरणों में मजबूती के कारण भारत ने वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स मांग में उल्लेखनीय हिस्सेदारी बनाई है। अब भारत घटक निर्माण और उच्च मूल्य संवर्धन की ओर अग्रसर है, जिसे इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स निर्माण योजना के तहत ₹40,000 करोड़ के आवंटन से मजबूती दी जा रही है।

सुमन बेरी ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक्स आधुनिक विनिर्माण मूल्य श्रृंखलाओं का केंद्र है और इसका निर्यात संतुलन और तकनीकी संप्रभुता पर महत्वपूर्ण प्रभाव है। जबकि भारत ने अंतिम असेंबली में पैमाना हासिल कर लिया है, स्थायी प्रतिस्पर्धात्मकता के लिए संरचनात्मक लागत कम करना, घरेलू घटक पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करना और वैश्विक उत्पादन नेटवर्क में भारतीय फर्मों को शामिल करना आवश्यक है।

अरविंद वर्मानी ने भी टीम की तारीफ़ करते हुए कहा कि वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में गहन एकीकरण, विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स में, भारत के निर्यात गति को बनाए रखने, उत्पादकता बढ़ाने और गुणवत्तापूर्ण रोजगार सृजित करने के लिए महत्वपूर्ण होगा।

यह प्रकाशन नीति निर्माताओं, उद्योग, शोधकर्ताओं और शैक्षणिक संस्थानों के लिए डेटा-आधारित विश्लेषण और नीति अंतर्दृष्टि प्रदान करता है, जिससे वैश्विक परिदृश्य में भारत की व्यापार प्रतिस्पर्धात्मकता को सुदृढ़ किया जा सके।

NITI Aayog और HUL ने भारत में सर्कुलर इकॉनमी के लिए स्टार्टअप एक्सेलेरेशन प्रोग्राम लॉन्च किया

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निति आयोग की अटल इनोवेशन मिशन (AIM) और हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड (HUL) ने भारत में सर्कुलर इकॉनमी को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय स्तर का स्टार्टअप एक्सेलेरेशन प्रोग्राम लॉन्च किया

यह पहल, HUL के प्रमुख प्रोजेक्ट सर्कुलर भारत के अंतर्गत, अगले तीन वर्षों में 50 उच्च-क्षमता वाले सर्कुलर इकॉनमी स्टार्टअप्स को पहचानने और समर्थन देने के लिए आयोजित की जाएगी। यह प्रोग्राम विशेष रूप से उन स्टार्टअप्स को प्राथमिकता देगा जो प्लास्टिक सर्कुलैरिटी में नवाचार कर रहे हैं, जैसे कि प्लास्टिक रीसाइक्लिंग, रीयूज़ और रिफिल मॉडल, और अगली पीढ़ी की पैकेजिंग सामग्री। प्लास्टिक के अलावा, यह प्रोग्राम उन स्टार्टअप्स का भी समर्थन करेगा जो टेक्सटाइल, ई-वेस्ट जैसी अन्य पोस्ट-कंज्यूमर वेस्ट स्ट्रीम में मटेरियल रिकवरी के समाधान विकसित कर रहे हैं।

प्रोग्राम में चयनित स्टार्टअप्स को बिजनेस लीडर्स, नीति विशेषज्ञों और निवेशकों से क्यूरेटेड मेंटरशिप मिलेगी। चयनित स्टार्टअप्स को अनुदान (ग्रांट) और पायलट अवसर भी प्रदान किए जा सकते हैं ताकि बाजार में उनके समाधानों का मूल्यांकन हो सके। यह साझेदारी AIM और NITI Aayog की नीति और नवाचार पोषण विशेषज्ञता, HUL के व्यापक उद्योग नेटवर्क और Xynteo की रणनीतिक विशेषज्ञता को जोड़कर भारत में सर्कुलर इकॉनमी के लिए तेजी से समाधान विकसित करने का अवसर देती है।

HUL के कार्यकारी निदेशक और चीफ पिपल, ट्रांसफॉर्मेशन और सस्टेनेबिलिटी ऑफिसर, BP बिद्दाप्पा ने कहा:

“NITI Aayog और HUL के बीच यह साझेदारी भारत में प्लास्टिक के लिए सर्कुलर इकॉनमी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह हमारे दृढ़ विश्वास को दर्शाता है कि जो भारत के लिए अच्छा है, वह HUL के लिए भी अच्छा है। सरकार की ताकत, उद्योग विशेषज्ञता और उद्यमिता की ऊर्जा को मिलाकर हम अगली पीढ़ी के सस्टेनेबिलिटी स्टार्टअप्स को सशक्त बनाना और व्यावहारिक समाधानों को तेजी से स्केल करना चाहते हैं।”

AIM, NITI Aayog के मिशन डायरेक्टर डॉ. दीपक बगला ने कहा:

“यह सहयोग उस दृष्टि और मूलभूत विचार पर आधारित है जिसे माननीय प्रधानमंत्री ने व्यक्त किया है, कि ‘हमारे लिए सतत विकास केवल नारा नहीं बल्कि एक प्रतिबद्धता है।’

उन स्टार्टअप्स को सशक्त बनाकर जो भारत में संसाधनों के उपयोग और मूल्यांकन को फिर से परिभाषित कर रहे हैं, हम ऐसे समाधान उत्पन्न कर रहे हैं जो कचरे को कम कर सकते हैं, रीसाइक्लिंग को नए रूप में पेश कर सकते हैं और कल की ग्रीन इंडस्ट्रीज़ का निर्माण कर सकते हैं।”

हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड के बारे में

HUL भारत की सबसे बड़ी फास्ट-मूविंग कंज्यूमर गुड्स (FMCG) कंपनियों में से एक है, जिसके उत्पाद देश के लगभग 9 में से 10 घरों तक पहुँचते हैं। HUL हर दिन एक बेहतर भविष्य बनाने का प्रयास करता है।

अटल इनोवेशन मिशन (AIM), NITI Aayog के बारे में

AIM, NITI Aayog भारत सरकार की प्रमुख पहल है जो देश में नवाचार और उद्यमिता की संस्कृति को बढ़ावा देती है। यह ATL, AIC, ACIC जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रमों के माध्यम से नवाचार को प्रोत्साहित करता है।

नीति आयोग और कर्नाटक सरकार ने जल पुनः उपयोग पर राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित की

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नीति आयोग ने कर्नाटक सरकार और बेंगलुरु जलापूर्ति एवं सीवरेज बोर्ड (BWSSB) के सहयोग से अपने राज्य समर्थन मिशन के अंतर्गत “भारत में उपचारित अपशिष्ट जल के पुनः उपयोग” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन 6–7 नवम्बर 2025 को बेंगलुरु में किया।

कार्यशाला की अध्यक्षता माननीय सदस्य, नीति आयोग डॉ. विनोद के. पॉल एवं मुख्य सचिव, कर्नाटक सरकार डॉ. शालिनी रजनीश ने की। इसमें 18 राज्यों के वरिष्ठ अधिकारी, नीति विशेषज्ञ, थिंक टैंक के प्रतिनिधि, उद्योग जगत के नेता, शोधकर्ता, शिक्षाविद, यूनिसेफ, दक्षिण भारत के लिए इज़राइल सरकार के प्रतिनिधि, सिंगापुर वॉटर एसोसिएशन तथा ज्ञान साझेदारों ने भाग लिया। सभी ने कृषि, घरेलू गैर-पीने योग्य उपयोग और औद्योगिक क्षेत्रों में उपचारित जल के उपयोग को बढ़ाने से संबंधित चुनौतियों, अवसरों और नवाचारों पर विचार-विमर्श किया तथा भारत की परिपत्र जल अर्थव्यवस्था (Circular Water Economy) को सशक्त बनाने और सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की प्राप्ति हेतु ठोस सिफारिशें प्रस्तुत कीं।

डॉ. विनोद के. पॉल ने उभरते जल संकट के संदर्भ में कहा कि प्रयुक्त जल के पुनः उपयोग की क्षमता का इष्टतम उपयोग, “विकसित भारत 2047” के लिए एक विन–विन रणनीति है। उन्होंने राज्यों में पुनः उपयोग की नीति बनाने, विभिन्न उपयोगों के लिए सामान्य मानक तय करने, डेटा सेंटर जैसे नए क्षेत्रों में प्रयुक्त जल के उपयोग को एकीकृत करने, स्वास्थ्य संबंधी पहलुओं पर ध्यान देने और व्यवहार परिवर्तन की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि उपचारित अपशिष्ट जल के पुनः उपयोग का विस्तार जल सुरक्षा सुनिश्चित करने, ताजे पानी पर निर्भरता घटाने, जलवायु लचीलापन बढ़ाने और संसाधन परिपत्रता के सिद्धांतों को आगे बढ़ाने का एक परिवर्तनकारी अवसर है। साथ ही, उन्होंने इस क्षेत्र में कर्नाटक सरकार के अग्रणी प्रयासों की सराहना की।

मुख्य सचिव, कर्नाटक सरकार डॉ. शालिनी रजनीश ने बताया कि राज्य ने 2024 में आई जल संकट की स्थिति को अवसर में बदलते हुए झीलों के पुनरुद्धार और औद्योगिक मांग को पूरा करने हेतु प्रयुक्त जल के पुनः उपयोग जैसे अभिनव उपाय किए हैं। उन्होंने उपस्थित प्रतिभागियों से राज्य और राष्ट्र दोनों के लिए ठोस रणनीतिक विचार प्रस्तुत करने का आह्वान किया।

प्रतिभागियों ने 2030 तक मजबूत राज्य स्तरीय नीतियों और विभिन्न अंतिम उपयोगों के लिए स्पष्ट सामान्य मानकों की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने जल गुणवत्ता की वास्तविक समय निगरानी प्रणालियों, स्वास्थ्य दृष्टिकोण से सुरक्षा उपायों, और उपयोगिताओं में क्षमता निर्माण को प्रभावी क्रियान्वयन के लिए आवश्यक बताया। विकेन्द्रित शोधन प्रणालियों (decentralised systems) के लिए कम लागत वाली प्रौद्योगिकियाँ और सतत परिचालन एवं रखरखाव ढांचे को प्रमुख सक्षम कारक (enablers) के रूप में पहचाना गया।

कार्यशाला में कई राज्यों के श्रेष्ठ अनुभव साझा किए गए —

  • गुजरात के विस्तार योग्य पुनः उपयोग मॉडल,

  • दिल्ली की राजस्व उत्पन्न करने वाली पहलें,

  • इंदौर का बहु-क्षेत्रीय दृष्टिकोण,

  • कर्नाटक के ग्रामीण-औद्योगिक एकीकृत पुनः उपयोग तंत्र,

  • तमिलनाडु का औद्योगिक उपयोग हेतु तृतीयक उपचारित जल मॉडल,

  • और महाराष्ट्र के प्रौद्योगिकी आधारित ग्रे-वॉटर समाधान।

इन सभी मॉडलों ने अन्य राज्यों के लिए पुनः उपयोग को व्यापक रूप से अपनाने की संभावनाएँ प्रदर्शित कीं।
अंतर्राष्ट्रीय और निजी क्षेत्र के प्रतिनिधियों ने सहयोगी व्यापार मॉडल, नवोन्मेषी वित्तीय ढांचे और तकनीकी साझेदारी के महत्व को रेखांकित किया, ताकि भारत शीघ्र ही परिपत्र जल अर्थव्यवस्था की दिशा में अग्रसर हो सके।

कार्यशाला का समापन 7 नवम्बर को बी.डब्ल्यू.एस.एस.बी. के के & सी वैली सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट तथा कुब्बन पार्क ट्रीटमेंट प्लांट के मैदानी निरीक्षण के साथ हुआ, जहाँ प्रतिभागियों ने उपचार एवं पुनः उपयोग की उन्नत तकनीकों का अवलोकन किया।

कार्यशाला में प्रमुख प्रतिभागी —

कर्नाटक सरकार के अतिरिक्त मुख्य सचिव (शहरी विकास विभाग) तुषार गिरी नाथ, अतिरिक्त सचिव एवं मिशन निदेशक, अमृत, आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय, भारत सरकार, डी. थारा,
ग्रेटर बेंगलुरु महानगर पालिका के मुख्य आयुक्त महेश्वर राव, कार्यक्रम निदेशक, नीति आयोग श्री युगल जोशी, तथा बेंगलुरु जलापूर्ति एवं सीवरेज बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. वी. राम प्रसाथ मनोहर ने कार्यशाला की चर्चाओं में भाग लिया।


नीति आयोग द्वारा “अनुसंधान एवं विकास को सुगम बनाने” पर 8वीं क्षेत्रीय परामर्श बैठक का तिरुवनंतपुरम में सफल आयोजन

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नीति आयोग द्वारा “अनुसंधान एवं विकास को सुगम बनाने” (Ease of Doing Research and Development) विषय पर 8वीं क्षेत्रीय परामर्श बैठक का आयोजन 30–31 अक्टूबर, 2025 को तिरुवनंतपुरम स्थित नेशनल सेंटर फॉर अर्थ साइंस स्टडीज (NCESS) में किया गया। इस दो दिवसीय परामर्श बैठक में विभिन्न संस्थानों के प्रमुखों, कुलपतियों, तथा वैज्ञानिक मंत्रालयों एवं विभागों के प्रतिनिधियों ने भारत के अनुसंधान एवं विकास पारिस्थितिकी तंत्र को सशक्त बनाने पर गहन विचार-विमर्श किया।

बैठक की शुरुआत प्रो. एन. वी. चैलपति राव, निदेशक, NCESS द्वारा स्वागत भाषण के साथ हुई। उन्होंने वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करने की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि क्षेत्रीय अनुसंधान संस्थान नवाचार-आधारित विकास को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

इसके बाद प्रो. विवेक कुमार सिंह, नीति आयोग ने बैठक की पृष्ठभूमि प्रस्तुत करते हुए ROPE Framework — Removing Obstacles, Promoting Enablers — का परिचय दिया। उन्होंने बताया कि यह रूपरेखा नीति आयोग की “Ease of Doing R&D” पहल का मार्गदर्शक सिद्धांत है, जिसका उद्देश्य अनुसंधानकर्ताओं के समक्ष आने वाली संस्थागत और नीतिगत चुनौतियों की पहचान कर उन्हें दूर करना तथा सहयोग, लचीलापन और क्षमता निर्माण को बढ़ावा देना है।

डॉ. एम. रवीचंद्रन, सचिव, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने अनुसंधान की प्रभावशीलता और गुणवत्ता बढ़ाने के लिए ठोस सुझाव दिए। उन्होंने कहा कि सेवानिवृत्त वैज्ञानिकों के अनुभव का लाभ लिया जाए, University–Industry–Government (UIG) साझेदारी को मजबूत किया जाए, डेटा-साझाकरण को प्रोत्साहित किया जाए और विज्ञान संचार को अधिक सुलभ व समाज से जुड़ा बनाया जाए।

डॉ. वी. के. सारस्वत, सदस्य, नीति आयोग ने कहा कि Ease of Doing R&D दो प्रमुख आयामों — आंतरिक और बाह्य — पर निर्भर करता है। आंतरिक आयाम संस्थानों की संरचना, शासन और कार्यप्रणाली से जुड़ा है, जबकि बाह्य आयामों में नियामक अड़चनें, वित्त पोषण तंत्र और अंतर-विभागीय समन्वय शामिल हैं। उन्होंने कहा कि दोनों आयामों पर समान रूप से ध्यान देना भारत को वैश्विक अनुसंधान और नवाचार नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ाएगा।

बैठक में केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर ने मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि Ease of Doing R&D का उद्देश्य अंततः Ease of Living यानी नागरिकों के जीवन को सरल और बेहतर बनाना है। उन्होंने कहा कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी को जनकल्याण से जोड़ना आवश्यक है और संस्थानों, उद्योगों तथा सरकार के बीच सहयोगात्मक दृष्टिकोण ही समावेशी विकास की कुंजी है। राज्यपाल ने यह भी कहा कि “राज्य का विकास ही राष्ट्र के विकास का मार्ग प्रशस्त करेगा।”

दो दिवसीय बैठक का समापन अकादमिक संस्थानों, अनुसंधान प्रयोगशालाओं और सरकारी प्रतिनिधियों के बीच हुई विचार-विमर्श सत्रों के साथ हुआ, जिसमें भारत में एक सक्षम, कुशल और सहयोगात्मक R&D पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण के लिए सामूहिक प्रतिबद्धता दोहराई गई।

नीति आयोग द्वारा तिरुवनंतपुरम में “अनुसंधान एवं विकास को सुगम बनाने” पर 8वीं क्षेत्रीय परामर्श बैठक का सफल आयोजन

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“अनुसंधान एवं विकास को सुगम बनाने” पर 8वीं क्षेत्रीय परामर्श बैठक का आयोजन नीति आयोग द्वारा राष्ट्रीय पृथ्वी विज्ञान अध्ययन केंद्र (NCESS), तिरुवनंतपुरम में 30–31 अक्टूबर 2025 को किया गया। इस परामर्श बैठक में संस्थागत प्रमुखों, कुलपतियों तथा विभिन्न वैज्ञानिक मंत्रालयों और विभागों के वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने भारत के अनुसंधान एवं विकास पारिस्थितिकी तंत्र को सशक्त बनाने पर गहन विचार-विमर्श किया।

बैठक की शुरुआत प्रो. एन. वी. चेलापथी राव, निदेशक, NCESS के स्वागत संबोधन से हुई। उन्होंने वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए सक्षम वातावरण की आवश्यकता पर जोर दिया और यह रेखांकित किया कि क्षेत्रीय अनुसंधान संस्थान नवाचार-आधारित विकास को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके बाद प्रो. विवेक कुमार सिंह, नीति आयोग, ने बैठक की पृष्ठभूमि प्रस्तुत की और ROPE Framework – Removing Obstacles, Promoting Enablers का परिचय दिया, जो नीति आयोग की “Ease of Doing R&D” पहल का मार्गदर्शक सिद्धांत है। उन्होंने बताया कि इस रूपरेखा का उद्देश्य अनुसंधानकर्ताओं द्वारा सामना की जाने वाली संस्थागत और नीतिगत चुनौतियों की पहचान करना तथा उन्हें कम करने के लिए लचीलापन, अंतःसंस्थागत सहयोग और क्षमता वृद्धि जैसे सहायक तंत्रों को बढ़ावा देना है।

डॉ. एम. रविचंद्रन, सचिव, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने अनुसंधान की दक्षता और प्रभाव बढ़ाने के लिए कई व्यावहारिक सुझाव दिए। उन्होंने सेवानिवृत्त वैज्ञानिकों के अनुभव का उपयोग करने, विश्वविद्यालय-उद्योग-सरकार (UIG) पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने, संस्थानों के बीच डेटा साझाकरण को प्रोत्साहित करने और विज्ञान संचार को सशक्त बनाने की आवश्यकता पर बल दिया ताकि अनुसंधान के परिणाम समाज के लिए अधिक प्रासंगिक बन सकें।

डॉ. वी. के. सारस्वत, सदस्य, नीति आयोग ने अपने संबोधन में कहा कि “Ease of Doing R&D” दो प्रमुख तत्वों — आंतरिक और बाह्य कारकों — पर निर्भर करता है। आंतरिक कारक संस्थानों की संरचना, प्रशासन और कार्यप्रणाली से संबंधित हैं, जबकि बाह्य कारक नियामक अवरोधों, वित्त पोषण तंत्र और अंतःक्षेत्रीय समन्वय से जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि भारत को अनुसंधान और नवाचार के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व प्राप्त करने के लिए इन दोनों पहलुओं को समानांतर रूप से संबोधित करना आवश्यक है।

इस बैठक में केरल के राज्यपाल राजेन्द्र विश्वनाथ आर्लेकर ने मुख्य अतिथि के रूप में भाग लिया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि “Ease of Doing R&D” सीधे तौर पर नागरिकों के “Ease of Living” से जुड़ा हुआ है। उन्होंने रेखांकित किया कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी को जनकेंद्रित विकास के साथ संरेखित होना चाहिए और संस्थानों, उद्योगों तथा सरकारों के बीच सहयोगात्मक दृष्टिकोण ही समावेशी विकास की कुंजी है। राज्यपाल ने कहा कि “राज्य का विकास ही राष्ट्र के विकास का आधार है,” और क्षेत्रीय स्तर पर नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र के सुदृढ़ीकरण की आवश्यकता पर बल दिया।

दो दिवसीय इस बैठक का समापन शैक्षणिक संस्थानों, अनुसंधान प्रयोगशालाओं और सरकारी प्रतिनिधियों के बीच हुई संवादात्मक चर्चाओं और परामर्शों के साथ हुआ, जिसमें सभी ने मिलकर भारत में एक सक्षम, प्रभावी और सहयोगात्मक R&D पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण के लिए अपने सामूहिक संकल्प को दोहराया।

नीति आयोग ने भारत के सेवा क्षेत्र पर प्रारंभिक रिपोर्टें जारी कीं — क्षेत्रीय संतुलन, रोजगार प्रवृत्तियों और विकसित भारत @2047 के लिए रोडमैप पर केंद्रित

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नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बी. वी. आर. सुब्रह्मण्यम ने आज सदस्य डॉ. अरविंद विरमानी और भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार डॉ. वी. अनंथा नागेश्वरन की उपस्थिति में सेवाएं विषयक श्रृंखला (Services Thematic Series) के तहत दो प्रारंभिक रिपोर्टें जारी कीं। इस अवसर पर केंद्र और राज्य सरकारों के वरिष्ठ अधिकारी, उद्योग संघों के प्रतिनिधि तथा शिक्षाविद उपस्थित थे। ये रिपोर्टें सेवाक्षेत्र का व्यापक मूल्यांकन प्रस्तुत करती हैं — उत्पादन और रोजगार के परिप्रेक्ष्य से — जो समग्र प्रवृत्तियों से आगे बढ़कर राज्य-स्तरीय विश्लेषण भी प्रदान करती हैं।

पहली रिपोर्ट, “भारत का सेवाक्षेत्र: सकल मूल्य वर्धन प्रवृत्तियों और राज्य-स्तरीय गतिशीलता से अंतर्दृष्टि”, राष्ट्रीय और राज्य-स्तर की प्रवृत्तियों का अध्ययन करती है ताकि यह समझा जा सके कि सेवाक्षेत्र-आधारित विकास विभिन्न क्षेत्रों में कैसे आगे बढ़ रहा है और क्या अपेक्षाकृत पिछड़े राज्य अग्रणी राज्यों की बराबरी कर रहे हैं — जो संतुलित क्षेत्रीय विकास का एक महत्वपूर्ण संकेतक है।

सेवाक्षेत्र अब भारत की आर्थिक वृद्धि का आधार बन गया है, जिसने वित्त वर्ष 2024–25 में राष्ट्रीय सकल मूल्य वर्धन (GVA) में लगभग 55 प्रतिशत योगदान दिया। रिपोर्ट के अनुसार, सेवाक्षेत्र आधारित विकास अब अधिक क्षेत्रीय रूप से संतुलित हो रहा है। यद्यपि राज्यों के बीच सेवाक्षेत्र के हिस्से में असमानता में थोड़ी वृद्धि हुई है, फिर भी प्रमाण मिलते हैं कि संरचनात्मक रूप से पिछड़े राज्य तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। यह प्रवृत्ति इंगित करती है कि भारत का सेवाक्षेत्र रूपांतरण अब व्यापक और समावेशी होता जा रहा है।

रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि क्षेत्रीय स्तर पर डिजिटल अवसंरचना, लॉजिस्टिक्स, नवाचार, वित्त और कौशल विकास को प्राथमिकता दी जाए, ताकि विविधीकरण और प्रतिस्पर्धात्मकता को गति दी जा सके। राज्य स्तर पर, रिपोर्ट स्थानीय क्षमताओं पर आधारित सेवाक्षेत्र रणनीतियाँ विकसित करने, संस्थागत क्षमता बढ़ाने, उद्योग-सेवा एकीकरण को प्रोत्साहित करने तथा शहरी और क्षेत्रीय सेवा क्लस्टरों को सशक्त बनाने की सिफारिश करती है।

दूसरी रिपोर्ट, “भारत का सेवाक्षेत्र: रोजगार प्रवृत्तियों और राज्य-स्तरीय गतिशीलता से अंतर्दृष्टि”, सेवाक्षेत्र के रोजगार पैटर्न का विश्लेषण करती है। इसमें उप-क्षेत्र, लिंग, क्षेत्र, शिक्षा और व्यवसाय के आधार पर भारत के सेवा कार्यबल की बहुआयामी तस्वीर प्रस्तुत की गई है। रिपोर्ट बताती है कि सेवाक्षेत्र में एक द्वैत संरचना दिखाई देती है — आधुनिक, उच्च उत्पादकता वाले क्षेत्र जो वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी हैं परंतु रोजगार की दृष्टि से सीमित हैं, और पारंपरिक क्षेत्र जो अधिक श्रमिकों को समाहित करते हैं किंतु अधिकतर अनौपचारिक और कम वेतन वाले हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि यद्यपि सेवाक्षेत्र भारत की रोजगार वृद्धि और महामारी के बाद पुनर्प्राप्ति का मुख्य आधार बना हुआ है, फिर भी कई चुनौतियाँ बनी हुई हैं। रोजगार सृजन सभी उप-क्षेत्रों में समान नहीं है, अनौपचारिकता व्यापक है, और रोजगार की गुणवत्ता उत्पादन वृद्धि के अनुरूप नहीं है। लैंगिक असमानता, ग्रामीण-शहरी अंतर और क्षेत्रीय विषमताएँ यह दर्शाती हैं कि रोजगार नीति में औपचारिकता, समावेशन और उत्पादकता वृद्धि को केंद्र में रखना आवश्यक है।

इन चुनौतियों से निपटने के लिए रिपोर्ट चार-स्तरीय नीति मार्गदर्शिका सुझाती है —

  1. गिग, स्वरोजगार और एमएसएमई श्रमिकों के लिए औपचारिकता और सामाजिक सुरक्षा को बढ़ावा देना,

  2. महिलाओं और ग्रामीण युवाओं के लिए लक्षित कौशल प्रशिक्षण और डिजिटल पहुँच का विस्तार,

  3. उभरते और हरित अर्थव्यवस्था क्षेत्रों में कौशल निवेश, और

  4. टियर-2 और टियर-3 शहरों में सेवा हब विकसित कर संतुलित क्षेत्रीय विकास को प्रोत्साहित करना।

रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि सेवाक्षेत्र न केवल उत्पादन और आय का स्रोत है, बल्कि उच्च गुणवत्ता वाले, समावेशी और उत्पादक रोजगार का प्रमुख चालक बन सकता है, जिससे विकसित भारत @2047 के लक्ष्य को साकार करने में सहायता मिलेगी।

ये दोनों रिपोर्टें राज्य सरकारों और उद्योग जगत के लिए एक रणनीतिक मार्गदर्शिका प्रस्तुत करती हैं — जो भारत के सेवाक्षेत्र को अगले चरण के विकास की ओर अग्रसर करने के लिए डिजिटल अवसंरचना, कौशल, नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र और सेवा मूल्य शृंखलाओं के एकीकरण पर बल देती हैं, जिससे भारत को वैश्विक सेवाक्षेत्र में एक विश्वसनीय अग्रणी के रूप में स्थापित किया जा सके।

तीन प्रमुख ग्लोबल इम्पैक्ट चैलेंज के लिए आवेदन शुरू — कुल पुरस्कार राशि ₹5.85 करोड़

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इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव द्वारा सितंबर 2025 में घोषित तीन प्रमुख ग्लोबल इम्पैक्ट चैलेंज के लिए आवेदन प्रक्रिया शुरू हो गई है। इन प्रतियोगिताओं की कुल पुरस्कार राशि ₹5.85 करोड़ रखी गई है। 

ये तीन पहलें —
1️⃣ AI for All: Global Impact Challenge,
2️⃣ AI by HER: Global Impact Challenge, 
3️⃣ YUVAi: Global Youth Challenge —
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित ऐसे परिवर्तनकारी नवाचारों की पहचान, पोषण और प्रदर्शन के लिए शुरू की गई हैं, जिनमें सामाजिक और आर्थिक प्रभाव उत्पन्न करने की अपार क्षमता है।

प्रतियोगिताएं आधिकारिक वेबसाइट https://impact.indiaai.gov.in/ पर लाइव हैं। चयनित विजेताओं को मेंटॉरशिप, निवेशकों तक पहुंच, क्लाउड/कंप्यूट समर्थन और ग्लोबल प्लेटफॉर्म पर अपने विचारों को विस्तार देने का अवसर मिलेगा।

चयनित नवाचारों को इंडिया-एआई इम्पैक्ट समिट 2026 (19–20 फरवरी 2026, नई दिल्ली) में प्रदर्शित किया जाएगा।

🔹 1. AI for All: Global Impact Challenge

यह प्रतियोगिता ऐसे एआई नवाचारों के लिए है जो राष्ट्रीय और वैश्विक जरूरतों को बड़े पैमाने पर पूरा करने में सक्षम हैं।
मुख्य क्षेत्र: कृषि, जलवायु व स्थिरता, शिक्षा, वित्तीय समावेशन, स्वास्थ्य, विनिर्माण, शहरी अवसंरचना व मोबिलिटी, और वाइल्डकार्ड/ओपन इनोवेशन।

पुरस्कार और सहयोग:

  • शीर्ष 10 विजेताओं के लिए ₹2.5 करोड़ तक के पुरस्कार।

  • 20 फाइनलिस्ट को इंडिया-एआई समिट में भाग लेने के लिए यात्रा सहायता।

  • निवेशकों, मेंटर्स और क्लाउड सुविधाओं तक पहुंच।
    पात्रता: विश्वभर के छात्र, शोधकर्ता, पेशेवर, कंपनियां और स्टार्टअप्स जिनके पास पायलट स्तर का या तैयार एआई समाधान हो।

🔹 2. AI by HER: Global Impact Challenge

यह विशेष रूप से महिला-नेतृत्व वाले एआई नवाचारों को प्रोत्साहित करने के लिए प्रतियोगिता है। इसका आयोजन निति आयोग के वुमन एंटरप्रेन्योरशिप प्लेटफॉर्म (WEP) द्वारा किया जा रहा है।

मुख्य क्षेत्र: कृषि, साइबर सुरक्षा, डिजिटल वेलबीइंग, शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा व जलवायु, और वाइल्डकार्ड/ओपन इनोवेशन।

पुरस्कार और सहयोग:

  • शीर्ष 10 विजेताओं को ₹2.5 करोड़ तक के पुरस्कार।

  • 30 फाइनलिस्ट को यात्रा सहायता।

  • जिम्मेदार एआई, निवेश तैयारी और स्टोरीटेलिंग पर वर्चुअल बूटकैंप।

  • निवेशकों के साथ विशेष सत्र और अवसर।
    पात्रता: महिला-नेतृत्व वाली टीमें, छात्र टीमें या महिला-नेतृत्व वाले संस्थान जिनके पास कार्यशील प्रोटोटाइप या एआई समाधान हो।

🔹 3. YUVAi: Global Youth Challenge

यह पहल 13–21 वर्ष के युवा नवाचारकों के लिए है, ताकि वे सार्वजनिक हित में एआई आधारित समाधान विकसित कर सकें।

मुख्य क्षेत्र: सामुदायिक सशक्तिकरण, प्रमुख क्षेत्रों में परिवर्तन, और स्मार्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर का निर्माण।

पुरस्कार और सहयोग:

  • कुल ₹85 लाख की पुरस्कार राशि।

  • शीर्ष 3 विजेताओं को ₹15 लाख प्रत्येक,

  • अगले 3 को ₹10 लाख प्रत्येक,

  • 2 विशेष मान्यता पुरस्कार ₹5 लाख प्रत्येक।

  • शीर्ष 20 प्रतिभागियों को यात्रा सहायता।

  • 10-दिवसीय वर्चुअल बूटकैंप और निवेशकों के सामने प्रस्तुति का अवसर।
    पात्रता: 13–21 वर्ष के युवा जिनके पास कार्यशील प्रोटोटाइप या एआई समाधान है।

🔹 प्रमुख तिथियां

  • आवेदन प्रारंभ: 10 अक्टूबर 2025

  • अंतिम तिथि: 31 अक्टूबर 2025

  • वर्चुअल बूटकैंप: नवंबर 2025

  • फाइनलिस्ट की घोषणा: 31 दिसंबर 2025

  • ग्रैंड शोकेस: फरवरी 19–20, 2026 (नई दिल्ली)

🔹 आवेदन प्रक्रिया

सभी प्रतियोगिताओं के लिए आवेदन www.impact.indiaai.gov.in पोर्टल पर किए जा सकते हैं।
प्रत्येक चुनौती के पृष्ठ पर पात्रता, समयसीमा, दिशानिर्देश, और सामान्य प्रश्नों से संबंधित विस्तृत जानकारी उपलब्ध है।


नीति आयोग ने हिमालयी क्षेत्रों में हर मौसम में नल से जल आपूर्ति पर आयोजित किया मंथन सत्र, संकलन किया जारी

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नई दिल्ली- नीति आयोग ने आज हिमालय के ऊँचे क्षेत्रों में हर मौसम में नल से जल आपूर्ति सुनिश्चित करने के उद्देश्य से एक मंथन सत्र (Brainstorming Session) का आयोजन किया और इस विषय पर एक संकलन (Compendium) जारी किया।

इस सत्र में जल शक्ति मंत्रालय के पेयजल एवं स्वच्छता विभाग, हिमालयी राज्य लद्दाख और हिमाचल प्रदेश, आईआईटी मंडी जैसे शैक्षणिक संस्थानों तथा विभिन्न राज्यों में कार्यरत जमीनी संगठनों के विशेषज्ञों ने भाग लिया।

सत्र के दौरान विशेषज्ञों ने जल सुरक्षा को सुदृढ़ करने और समुदायों की आजीविका में सुधार के लिए महत्वपूर्ण सुझाव साझा किए। चर्चाओं में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि केंद्र और राज्य सरकारों के हस्तक्षेपों में स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। इससे संपत्तियों पर समुदाय की स्वामित्व भावना बढ़ेगी और जल संसाधनों की दीर्घकालिक सुरक्षा सुनिश्चित होगी।

विशेषज्ञों ने भूगोल, कठोर मौसम, कार्यान्वयन की चुनौतियाँ, तकनीक के उपयोग और डेटा विश्लेषण जैसी बाधाओं से निपटने के उपायों पर भी चर्चा की। उन्होंने सतत कृषि मॉडल, कृषि-वनीकरण (Agro-Forestry), झरनों का पुनर्जीवन, ड्रिप आधारित जल आपूर्ति प्रणालियाँ और नवीन अभियांत्रिकी सामग्री के उपयोग जैसी पहलें अपनाने की सिफारिश की।

सत्र में यह भी बताया गया कि स्थानीय समुदायों की क्षमता निर्माण (Capacity Building) से उनकी सतत भागीदारी सुनिश्चित हुई है। साथ ही, समुदाय के सदस्यों के कौशल की औपचारिक मान्यता (Formal Skill Recognition) की आवश्यकता पर बल दिया गया ताकि उन्हें बेहतर रोजगार और आजीविका के अवसर प्राप्त हो सकें।

विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि झरनों पर एक “Centre of Excellence” स्थापित किया जाए, जिससे सभी हितधारक एक मंच पर आकर झरनों के पुनर्जीवन और दीर्घकालिक स्थायित्व के लिए मिलकर कार्य कर सकें।

जारी किया गया संकलन (Compendium) हिमालयी राज्यों के नवाचारों, सफल अनुभवों और केस स्टडीज़ को प्रस्तुत करता है, जो दर्शाता है कि प्रौद्योगिकी, सामुदायिक भागीदारी और नीतिगत एकीकरण के माध्यम से कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी सतत जल आपूर्ति संभव है।


NITI आयोग ने जारी किया Trade Watch Quarterly Q4 FY 2024-25 का नवीनतम संस्करण

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नई दिल्ली-NITI आयोग के CEO बी.वी.आर. सुब्रह्मण्यम ने आज नई दिल्ली में वित्तीय वर्ष 2024-25 की चौथी तिमाही (जनवरी से मार्च) के लिए Trade Watch Quarterly का नवीनतम संस्करण जारी किया।

सुब्रह्मण्यम ने कहा कि यह रिपोर्ट भारत के व्यापार प्रदर्शन का गहन मूल्यांकन प्रस्तुत करती है, जिसमें वस्त्र और सेवाओं के रुझान, वैश्विक मांग में बदलाव और निर्यात विविधीकरण की संभावनाओं को रेखांकित किया गया है। उन्होंने यह भी बताया कि भारत को उच्च मांग वाले वैश्विक बाजारों में विविधता लाने की आवश्यकता है।

इस संस्करण में विशेष रूप से लेदर और फुटवियर सेक्टर पर ध्यान केंद्रित किया गया है, जिसमें इसके रोजगार सृजन क्षमता, निर्यात संभावनाएँ और वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने की जरूरत को उजागर किया गया है।

Q4 FY’25 में भारत का व्यापार प्रदर्शन:

  • कुल व्यापार: $441 बिलियन, वर्ष-दर-वर्ष 2.2% की वृद्धि।

  • मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट्स में हल्की गिरावट, मुख्य रूप से मिनरल फ्यूल और ऑर्गेनिक केमिकल्स में कमी के कारण।

  • सिक्टर में वृद्धि: इलेक्ट्रिकल मशीनरी, फार्मास्यूटिकल्स और अनाज में स्वस्थ वृद्धि।

  • इंपोर्ट्स: मामूली वृद्धि, मुख्य रूप से न्यूक्लियर रिएक्टर, इलेक्ट्रिकल मशीनरी और इनऑर्गेनिक केमिकल्स की मांग बढ़ने के कारण।

  • क्षेत्रीय रुझान: उत्तर अमेरिका सबसे मजबूत निर्यात बाजार, 25% की वृद्धि, भारत के कुल निर्यात का एक चौथाई; EU, GCC और ASEAN की निर्यात वृद्धि सामान्य रही।

  • आयात: UAE रूस को पीछे छोड़कर भारत का दूसरा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बना, मुख्य रूप से CEPA के तहत सोने के आयात के कारण; चीन से इलेक्ट्रॉनिक्स की मजबूत मांग के कारण आयात बढ़ा।

लेदर और फुटवियर सेक्टर का आकलन:

  • रोजगार: 44 लाख लोग।

  • वैश्विक निर्यात में योगदान: महत्वपूर्ण।

  • वैश्विक बाजार हिस्सेदारी: केवल 1.8% ($296 बिलियन बाजार में)।

  • रुझान: गैर-लेदर और टिकाऊ उत्पादों की मांग बढ़ रही है।

  • अवसर: MSMEs को सशक्त करना, R&D में निवेश, हरित और डिज़ाइन-ड्रिवेन वैल्यू चेन में तालमेल।

सुब्रह्मण्यम ने कहा कि सेवाओं का निर्यात, एयरोस्पेस और उच्च-मूल्य वाले मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर भारत की व्यापार लचीलापन को बढ़ा रहे हैं। उन्होंने जोर दिया कि भारत को बदलती मांग के अनुरूप तेजी से अनुकूलित, निर्यात आधार में विविधता लाना और वैश्विक वैल्यू चेन में प्रतिस्पर्धा बढ़ाना आवश्यक है, साथ ही भू-राजनीतिक बदलावों पर भी सतर्क रहना होगा।

रिपोर्ट डाउनलोड लिंक: Trade Watch Quarterly Q4 FY25


NITI आयोग ने विदेशी निवेशकों के लिए कर निश्चितता बढ़ाने वाला पहला कार्यपत्र जारी किया; FDI आकर्षकता को सुदृढ़ करने का प्रयास

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भारत की निवेश आकर्षकता बढ़ाने के लिए NITI आयोग ने विदेशी निवेशकों के लिए कर निश्चितता पर पहला कार्यपत्र जारी किया

भारत अपनी Vision 2047 की दिशा में आगे बढ़ते हुए, एक पारदर्शी, अनुमानित और कुशल कर ढांचा बनाने पर जोर दे रहा है, जो दीर्घकालिक विकास के लिए आवश्यक है। इसी लक्ष्य के तहत NITI आयोग का Consultative Group on Tax Policy (CGTP), व्यापार में सुगमता (Ease of Doing Business), विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) को बढ़ावा देने, कर कानूनों को सरल बनाने और भविष्य के अनुरूप सिस्टम तैयार करने पर केंद्रित है।

कार्यपत्र का विमोचन

  • आज NITI आयोग ने NITI Tax Policy Working Paper Series–I के तहत पहला कार्यपत्र “Enhancing Tax Certainty in Permanent Establishment and Profit Attribution for Foreign Investors in India” जारी किया।

  • यह कार्यपत्र विदेशी निवेशकों की कर पूर्वानुमान और विवाद समाधान से संबंधित लंबित चिंताओं को संबोधित करता है, ताकि भारत में निवेश वातावरण और अधिक मजबूत और पूर्वानुमेय बनाया जा सके।

प्रमुख बिंदु और उद्देश्य

  • भारत ने पिछले दो दशकों में FDI और FPI में निरंतर वृद्धि देखी है, जो मजबूत आर्थिक नींव को दर्शाता है।

  • Permanent Establishment (PE) और लाभों के वितरण में स्पष्टता प्रदान करने से कर नियमों में अधिक पूर्वानुमेयता आएगी।

  • कार्यपत्र में सार्वजनिक और निजी सहयोग (Public–Private Collaboration) का उदाहरण प्रस्तुत किया गया, जिसमें CBDT, DPIIT, ICAI, CBC और विशेषज्ञ संस्थाओं (Lakshmikumaran & Sridharan, Deloitte, EY) की भागीदारी रही।

विदेशी निवेशकों के लिए कर चुनौतियाँ

  • विदेशी निवेशक अक्सर कर अनिश्चितता और अनुपालन बोझ का सामना करते हैं, विशेषकर PE और लाभ वितरण से संबंधित मामलों में।

  • कार्यपत्र FDI और FPI को भारत की आर्थिक वृद्धि में महत्वपूर्ण उत्प्रेरक मानता है।

प्रस्तावित सुधार और सिफारिशें

  1. वैकल्पिक, उद्योग-विशिष्ट अनुमानित कर प्रणाली (Presumptive Taxation Scheme) विदेशी कंपनियों के लिए।

  2. विस्तृत वैधानिक स्पष्टता और प्रशासनिक दक्षता।

  3. मजबूत विवाद समाधान तंत्र।

  4. अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाओं के साथ रणनीतिक संरेखण।

इन उपायों से विवादों में कमी आएगी, निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा, प्रशासनिक दक्षता सुधरेगी और उच्च गुणवत्ता वाला सतत FDI आकर्षित होगा।

  • कार्यपत्र में सुझाव दिया गया है कि वित्त मंत्रालय इस ढांचे पर विचार करे और भविष्य के वित्त विधेयकों (Finance Bills) में शामिल करे, उद्योग, विशेषज्ञों और संधि भागीदारों से परामर्श के बाद।

यह सुधार भारत को अधिक पूर्वानुमेय और निवेश के अनुकूल गंतव्य बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।

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