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CSIR-NIScPR ने ‘विज्ञान संचार और उभरते रुझान’ पर दो दिवसीय कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया

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सीएसआईआर-राष्ट्रीय विज्ञान संचार एवं नीति अनुसंधान संस्थान (CSIR-NIScPR), नई दिल्ली ने 4–5 अगस्त 2026 को CSIR इंटीग्रेटेड स्किल इनिशिएटिव (फेज-III) के अंतर्गत ‘विज्ञान संचार और उभरते रुझान’ विषय पर दो दिवसीय कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम का सफल आयोजन किया।

संस्थान के प्रशिक्षण प्रभाग द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में देशभर के विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, शैक्षणिक संगठनों, मीडिया और उद्योग जगत से 30 प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। प्रशिक्षण को अनुभव-आधारित (Experiential Learning) बनाया गया, जिसमें विशेषज्ञ व्याख्यान, संवादात्मक चर्चाएं और व्यावहारिक सत्रों के माध्यम से आधुनिक विज्ञान संचार और उभरती प्रौद्योगिकियों की व्यापक जानकारी दी गई।

विज्ञान संचार में जिम्मेदारी और एआई की बढ़ती भूमिका पर जोर

कार्यक्रम का उद्घाटन CSIR-NIScPR की निदेशक डॉ. गीता वाणी रायसम ने किया। उन्होंने प्रतिभागियों को प्रशिक्षण में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करते हुए कहा कि संस्थान लंबे समय से देश में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने और विज्ञान संचार को मजबूत करने के लिए कार्य कर रहा है।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में जिम्मेदार विज्ञान संचार, डिजिटल प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की भूमिका लगातार बढ़ रही है, जिससे वैज्ञानिक जानकारी को अधिक विश्वसनीय, प्रभावी और व्यापक बनाया जा सकता है।

विज्ञान और समाज के बीच सेतु है विज्ञान संचार

CSIR-NIScPR के प्रशिक्षण प्रभाग के प्रमुख मुकेश ए. पुंड ने स्वागत भाषण में कहा कि विज्ञान संचार वैज्ञानिक अनुसंधान और समाज के बीच की दूरी को कम करने का प्रभावी माध्यम बन चुका है।

कार्यक्रम की नोडल प्रधान अन्वेषक (PI) मीताली भारती ने प्रशिक्षण के उद्देश्यों से प्रतिभागियों को अवगत कराया और पूरे कार्यक्रम का संचालन किया। वहीं पाठ्यक्रम समन्वयक डॉ. परमानंद बर्मन ने प्रशिक्षण की रूपरेखा प्रस्तुत की तथा शैक्षणिक सत्रों का संचालन किया।

आधुनिक विज्ञान संचार के विभिन्न पहलुओं पर हुआ प्रशिक्षण

दो दिवसीय प्रशिक्षण में प्रतिभागियों को विज्ञान संचार के विभिन्न समकालीन विषयों पर विस्तृत जानकारी दी गई। इनमें—

  • विज्ञान संचार की मूल अवधारणाएं एवं विभिन्न प्रारूप

  • श्रोताकेंद्रित संचार रणनीतियां

  • व्यवहारिक विज्ञान (Behavioural Insights)

  • सोशल मीडिया प्रबंधन

  • पॉडकास्ट निर्माण

  • इन्फोग्राफिक्स और लघु वीडियो तैयार करना

  • विज्ञान संचार में एआई आधारित ऐप्स का उपयोग

  • नैतिकता एवं पेशेवर जिम्मेदारियां

  • विज्ञान संचार में उभरते करियर अवसर

जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल रहे।

विशेषज्ञों ने साझा किए अनुभव

कार्यक्रम में डॉ. हेमांसी और प्रियंका (अशोका विश्वविद्यालय), डॉ. परमानंद बर्मन, डॉ. वी. वी. बिनॉय (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज़, बेंगलुरु), डॉ. एच. एस. सुधीरा (निदेशक, गुब्बी लैब्स), डॉ. मेहर वान तथा CSIR-NIScPR के संकाय सदस्यों ने विशेषज्ञ व्याख्यान दिए।

प्रशिक्षण की प्रभावशीलता का आकलन करने के लिए प्रतिभागियों की अपेक्षाओं, सीखने के परिणामों और अनुभवों का मूल्यांकन पूर्व एवं पश्चात प्रशिक्षण सर्वेक्षण के माध्यम से किया गया।

प्रतिभागियों को प्रदान किए गए प्रमाणपत्र

समापन सत्र में मुकेश ए. पुंड और मीताली भारती ने प्रतिभागियों को सफलतापूर्वक प्रशिक्षण पूरा करने पर बधाई दी और उनसे अपने-अपने संस्थानों में साक्ष्य-आधारित एवं जिम्मेदार विज्ञान संचार को बढ़ावा देने के लिए अर्जित ज्ञान और कौशल का उपयोग करने का आह्वान किया।

CSIR इंटीग्रेटेड स्किल इनिशिएटिव के सह-प्रधान अन्वेषक सलीम अंसारी ने प्रशिक्षण कार्यक्रम का समन्वय किया। कार्यक्रम के सफल समापन पर सभी प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र प्रदान किए गए।


विधायी प्रारूपण के 36वें बेसिक कोर्स का शुभारंभ, राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के 18 अधिकारी ले रहे हैं प्रशिक्षण

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नई दिल्ली- विधि एवं न्याय मंत्रालय के विधायी विभाग के अंतर्गत इंस्टीट्यूट ऑफ लेजिस्लेटिव ड्राफ्टिंग एंड रिसर्च (ILDR) द्वारा आयोजित विधायी प्रारूपण (Legislative Drafting) के 36वें बेसिक कोर्स का शुभारंभ 22 जुलाई 2026 को नई दिल्ली स्थित विधायी सभागार, कर्तव्य भवन-02 में किया गया। यह प्रशिक्षण कार्यक्रम राज्य सरकारों एवं केंद्रशासित प्रदेशों के अधिकारियों के लिए आयोजित किया जा रहा है।

उद्घाटन सत्र में विधायी विभाग एवं विधिक कार्य विभाग के सचिव डॉ. राजीव मणि, अतिरिक्त सचिव एवं कोर्स निदेशक (ILDR) डॉ. मनोज कुमार तथा विभाग के अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

इस अवसर पर डॉ. राजीव मणि ने पूरे देश में विधायी प्रारूपण में एकरूपता की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि इससे कानूनों में स्पष्टता, समानता और कानूनी निश्चितता सुनिश्चित होगी। उन्होंने कहा कि जमीनी स्तर पर हो रहे विधायी सुधारों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए गुणवत्तापूर्ण और एकसमान प्रारूपण अत्यंत आवश्यक है।

यह प्रशिक्षण कार्यक्रम 22 जुलाई से 25 सितंबर 2026 तक आयोजित किया जाएगा। इसमें 13 राज्य सरकारों और एक केंद्रशासित प्रदेश से आए 18 प्रशिक्षु अधिकारी भाग ले रहे हैं। कार्यक्रम का उद्देश्य प्रतिभागियों को विधायी प्रारूपण के सिद्धांतों की गहन समझ प्रदान करना तथा विधायी दस्तावेजों के मसौदा-निर्माण का व्यावहारिक प्रशिक्षण देकर उन्हें प्रभावी प्रारूपण के लिए आवश्यक ज्ञान एवं कौशल से सुसज्जित करना है।

यह कोर्स देशभर में विधायी प्रारूपण की एकरूपता, सटीकता और उत्कृष्टता को बढ़ावा देने के साथ-साथ राज्य सरकारों एवं केंद्रशासित प्रदेशों की संस्थागत क्षमता को भी मजबूत करेगा।

'विकसित भारत 2047' के लिए क्षमता निर्माण के साथ संस्थागत समन्वय भी आवश्यक : डॉ. जितेंद्र सिंह

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मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत का "समग्र सरकार (Whole of Government)" दृष्टिकोण विभिन्न व्यक्तियों एवं संस्थानों की क्षमताओं के समन्वय पर आधारित है, जहाँ सभी संस्थान और पेशेवर अपनी-अपनी विशेषज्ञता के माध्यम से राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति में योगदान देते हैं।

उन्होंने कहा कि क्षमता निर्माण (Capacity Building) अब केवल व्यक्तिगत दक्षताओं तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि संस्थागत समन्वय (Institutional Synergy) को भी मजबूत करना होगा, ताकि 'विकसित भारत 2047' की आकांक्षाओं के अनुरूप शासन व्यवस्था तैयार की जा सके।

डॉ. जितेंद्र सिंह नई दिल्ली स्थित स्कोप कन्वेंशन सेंटर में क्षमता निर्माण आयोग (Capacity Building Commission - CBC) तथा स्टैंडिंग कॉन्फ्रेंस ऑफ पब्लिक एंटरप्राइजेज (SCOPE) द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित 'दक्ष (DAKSH - Development of Aspiration, Knowledge, Succession and Harmony)' नेतृत्व विकास कार्यक्रम के तीसरे बैच का उद्घाटन कर रहे थे। यह एक वर्ष का नेतृत्व विकास कार्यक्रम है, जिसे इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस (ISB) के सहयोग से केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (CPSEs) के वरिष्ठ अधिकारियों को भविष्य में बोर्ड स्तर की जिम्मेदारियों के लिए तैयार करने के उद्देश्य से संचालित किया जा रहा है।

कार्यक्रम में लोक उद्यम विभाग के सचिव के. मोसेस चलाई, क्षमता निर्माण आयोग की अध्यक्ष एस. राधा चौहान, सदस्य (प्रशासन) अलका मित्तल, स्कोप के अध्यक्ष एवं एनबीसीसी के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक के. पी. महादेवस्वामी, इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस के डीन मदन पिल्लुतला, स्कोप के महानिदेशक अतुल सोबती, उपाध्यक्ष एवं गोवा शिपयार्ड लिमिटेड के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक ब्रजेश कुमार उपाध्याय सहित अनेक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी, सार्वजनिक उपक्रमों के प्रतिनिधि तथा कार्यक्रम के प्रतिभागी उपस्थित रहे।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने आयोजकों एवं प्रतिभागियों को बधाई देते हुए कहा कि देश के प्रमुख सार्वजनिक उपक्रमों के वरिष्ठ अधिकारियों की बढ़ती भागीदारी इस कार्यक्रम की विश्वसनीयता और उपयोगिता को दर्शाती है। उन्होंने वर्तमान बैच में महिला अधिकारियों की बढ़ती भागीदारी की भी सराहना करते हुए इसे भारत के बदलते नेतृत्व परिदृश्य का सकारात्मक संकेत बताया।

उन्होंने कहा कि क्षमता निर्माण आयोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूरदर्शी सोच के तहत लागू किए गए सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक सुधारों में से एक है। उन्होंने कहा कि प्रारंभ में यह एक नया संस्थागत प्रयोग था, लेकिन आज यह पूरे सरकारी तंत्र में क्षमता निर्माण का एक सशक्त स्तंभ बन चुका है।

मंत्री ने कहा कि सरकार की कार्यशैली अब 'Whole of Government' से आगे बढ़कर 'Whole of Government and Whole of Nation' की अवधारणा की ओर अग्रसर है। उन्होंने कहा कि यह दृष्टिकोण तभी सार्थक होगा जब विभिन्न संस्थान अलग-अलग कार्य करने के बजाय अपनी विशेषज्ञता और संसाधनों का समन्वित उपयोग करें। इस दिशा में क्षमता निर्माण आयोग विभिन्न श्रेणियों के लोक सेवकों को साझा प्रशिक्षण मंच उपलब्ध कराकर व्यक्तिगत दक्षताओं के साथ-साथ संस्थागत समन्वय को भी सुदृढ़ कर रहा है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने दक्ष (DAKSH) कार्यक्रम को देश के विकसित होते क्षमता निर्माण तंत्र का स्वाभाविक विस्तार बताते हुए कहा कि यह कार्यक्रम सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के लिए भविष्य के नेतृत्व का निर्माण कर रहा है। उन्होंने संतोष व्यक्त किया कि पूर्व बैचों के कई प्रतिभागी अब बोर्ड स्तर के पदों पर पहुँच चुके हैं, जो कार्यक्रम की सफलता का प्रमाण है।

उन्होंने कहा कि सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बीच की पारंपरिक सीमाएँ धीरे-धीरे कम हो रही हैं। इसलिए वरिष्ठ सार्वजनिक क्षेत्र के अधिकारियों को निजी क्षेत्र, वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं और आधुनिक प्रबंधन मॉडल से भी परिचित कराया जाना चाहिए, ताकि वे तेजी से बदलती अर्थव्यवस्था की चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना कर सकें।

प्रौद्योगिकी में तीव्र बदलाव का उल्लेख करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि आज के दौर में नेतृत्व के लिए निरंतर सीखना (Continuous Learning) अनिवार्य हो गया है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में ज्ञान तेजी से बदल रहा है, इसलिए सफल नेतृत्व के लिए अनुकूलन क्षमता और आजीवन सीखने की प्रवृत्ति अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने सुझाव दिया कि नेतृत्व विकास कार्यक्रमों को वरिष्ठ अधिकारियों की बदलती आवश्यकताओं के अनुरूप अधिक अनुकूलित (Customized) बनाया जाना चाहिए।

उन्होंने प्रतिभागियों की सक्रिय भागीदारी पर बल देते हुए सुझाव दिया कि दक्ष जैसे कार्यक्रमों में संरचित एवं गोपनीय फीडबैक प्रणाली विकसित की जाए, जिससे कार्यक्रमों में निरंतर सुधार किया जा सके। साथ ही प्रशिक्षण को एकतरफा व्याख्यानों के बजाय संवाद-आधारित बनाया जाए, ताकि प्रतिभागी अपने व्यावसायिक अनुभव भी साझा कर सकें।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों तथा विषय-विशेष उत्कृष्टता केंद्रों के साथ अधिक सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता पर भी बल दिया, ताकि विभिन्न सार्वजनिक उपक्रमों की विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुरूप नेतृत्व विकास कार्यक्रम तैयार किए जा सकें।

उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि दक्ष (DAKSH) जैसे कार्यक्रम आने वाले वर्षों में भारत के सार्वजनिक उपक्रमों के लिए सक्षम नेतृत्व तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। उन्होंने कहा कि जब भारत वर्ष 2047 में स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे करेगा, तब क्षमता निर्माण आयोग और स्कोप जैसे संस्थान 'विकसित भारत' की यात्रा में अपने महत्वपूर्ण योगदान पर गर्व कर सकेंगे।

इस अवसर पर क्षमता निर्माण आयोग की अध्यक्ष एस. राधा चौहान ने कहा कि आज नेतृत्व विकास केवल व्यक्तिगत दक्षताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि संगठनों और संस्थानों को नई प्रौद्योगिकियों तथा बदलते प्रशासनिक मॉडल के अनुरूप सक्षम बनाने का माध्यम भी है। उन्होंने बताया कि आयोग कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), उभरती प्रौद्योगिकियों और संस्थागत अनुकूलन जैसे भविष्य उन्मुख विषयों को अपने प्रशिक्षण कार्यक्रमों में शामिल कर रहा है तथा प्रतिभागियों के फीडबैक के आधार पर कार्यक्रमों में निरंतर सुधार किया जा रहा है।

क्षमता निर्माण आयोग की सदस्य (प्रशासन) अलका मित्तल ने कहा कि दक्ष (DAKSH) भारत के भावी नेतृत्व में एक रणनीतिक राष्ट्रीय निवेश है। उन्होंने बताया कि यह एक वर्षीय कार्यक्रम व्यवहार विज्ञान, नेतृत्व अनुसंधान तथा रणनीतिक सोच पर आधारित है, जिसका उद्देश्य केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों के वरिष्ठ अधिकारियों को बोर्ड स्तर की जिम्मेदारियों के लिए तैयार करना तथा उन्हें नैतिक नेतृत्व, नवाचार, लचीलापन और राष्ट्रीय दृष्टि के साथ संस्थानों का नेतृत्व करने में सक्षम बनाना है।

राष्ट्रीय एससी-एसटी हब (NSSH) योजना के माध्यम से समावेशी विकास को गति

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राष्ट्रीय एससी-एसटी हब (NSSH) योजना अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के उद्यमियों को सशक्त बनाने के उद्देश्य से शुरू की गई एक विशेष पहल है। यह योजना बाज़ार तक पहुँच, वित्तीय सहायता, प्रौद्योगिकी, क्षमता निर्माण तथा संस्थागत नेटवर्क जैसी चुनौतियों का समाधान कर इन उद्यमों की प्रतिस्पर्धात्मकता और दीर्घकालिक स्थिरता को मजबूत करती है। सरकारी खरीद (Government Procurement) में भागीदारी बढ़ाने के साथ-साथ यह योजना SC/ST उद्यमियों को दीर्घकालिक विकास, आत्मनिर्भरता और व्यापक पहचान प्रदान कर उन्हें मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से जोड़ने तथा देश की आर्थिक प्रगति में सार्थक योगदान देने का अवसर प्रदान कर रही है।

क्षमता निर्माण : उद्यम विकास की मजबूत नींव

इस परिवर्तन का सबसे महत्वपूर्ण आधार क्षमता निर्माण (Capacity Building) है, जिसके माध्यम से SC/ST उद्यमियों को संरचित और अनुपालन-आधारित बाज़ारों में सफल होने के लिए आवश्यक ज्ञान और कौशल प्रदान किए जाते हैं। ये कार्यक्रम केवल पारंपरिक प्रशिक्षण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वित्तीय प्रबंधन, सरकारी निविदाओं (टेंडर) में भागीदारी, मूल्य निर्धारण (Pricing), लागत प्रबंधन तथा नियामकीय आवश्यकताओं की समझ जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर भी विशेष ध्यान देते हैं। यह समग्र दृष्टिकोण उद्यमियों की बाज़ार में भागीदारी की तैयारी को मजबूत करने के साथ-साथ उनमें आत्मविश्वास और व्यावसायिक स्थिरता भी विकसित करता है।

बिज़नेस एक्सेलेरेटर प्रोग्राम (BAP) : बेहतर बाज़ार अवसरों का सेतु

क्षमता निर्माण के इस मजबूत आधार पर बिज़नेस एक्सेलेरेटर प्रोग्राम (Business Accelerator Programme – BAP) उद्यमियों की क्षमताओं को व्यावसायिक सफलता में बदलने का कार्य करता है। यह कार्यक्रम संरचित मार्गदर्शन (Mentorship), उद्योग विशेषज्ञों की सलाह तथा लक्षित व्यावसायिक हस्तक्षेपों के माध्यम से उद्यमियों को व्यवसाय रणनीति, मूल्य निर्धारण, परिचालन दक्षता तथा बाज़ार विस्तार जैसी चुनौतियों से निपटने में सहायता करता है।

विभिन्न क्षेत्रों के अनेक उद्यमों ने BAP के माध्यम से पारंपरिक एवं बिखरे हुए कार्य-तरीकों से आगे बढ़कर डेटा-आधारित, सुव्यवस्थित व्यावसायिक रणनीतियाँ अपनाईं। इससे वे बाज़ार की अपेक्षाओं के अनुरूप स्वयं को तैयार कर सके और विशेष रूप से सरकारी खरीद के क्षेत्र में बड़े अवसर प्राप्त करने में सफल हुए।

परिवर्तन की प्रेरक कहानियाँ

1. अनुपालन-आधारित बाज़ार में नई पहचान – M/s Safety & Security Engineering, पश्चिम बंगाल

अग्नि सुरक्षा (Fire Safety) जैसे अत्यधिक विनियमित क्षेत्र में कार्यरत देबाशीष मंडल की कंपनी M/s Safety & Security Engineering प्रारंभिक दौर में मूल्य निर्धारण, बाज़ार में पहचान और प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति जैसी चुनौतियों का सामना कर रही थी। यद्यपि कंपनी गुणवत्तापूर्ण अग्नि सुरक्षा एवं जीवन सुरक्षा उपकरण (Fire Protection & Life Safety Equipment) उपलब्ध करा रही थी, फिर भी स्पष्ट व्यावसायिक रणनीति के अभाव में उसका विस्तार सीमित था।


IIM संबलपुर में आयोजित BAP में भाग लेने के बाद उन्हें लागत एवं मूल्य निर्धारण की वैज्ञानिक समझ प्राप्त हुई। इसके परिणामस्वरूप उन्होंने डेटा-आधारित मूल्य निर्धारण रणनीति अपनाई, जिससे उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता और बाज़ार में स्थिति मजबूत हुई। इसके बाद उन्होंने Power Grid Corporation of India Limited से ₹8.48 लाख का सरकारी टेंडर सफलतापूर्वक प्राप्त किया।


2. स्वच्छ ऊर्जा को नई गति – M/s Renergy Solution Pvt. Ltd., असम

भार्गव देवरी द्वारा स्थापित M/s Renergy Solution Pvt. Ltd. अक्षय ऊर्जा (Renewable Energy) के क्षेत्र में एक सुदृढ़ तकनीकी आधार के साथ कार्यरत थी और सरकारी संस्थानों के लिए सौर ऊर्जा परियोजनाओं में सक्रिय रूप से भाग ले रही थी। हालांकि, दीर्घकालिक विकास के लिए व्यवसाय को अधिक रणनीतिक और व्यवस्थित रूप देने की आवश्यकता महसूस हुई।


BAP के माध्यम से कंपनी ने अनुभव-आधारित संचालन से आगे बढ़कर एक अधिक पेशेवर एवं बाज़ार-उन्मुख कार्यप्रणाली अपनाई। इससे सरकारी खरीद प्लेटफॉर्म पर उसकी उपस्थिति मजबूत हुई, सरकारी निविदाओं में भागीदारी की क्षमता बढ़ी और सार्वजनिक क्षेत्र के खरीदारों के साथ नए अवसरों का प्रभावी ढंग से लाभ उठाने में सहायता मिली।


3. सटीक इंजीनियरिंग से सफलता की उड़ान – Sawalaram Enterprises, महाराष्ट्र

महाराष्ट्र के नासिक स्थित सुनील पोपटराव जगताप द्वारा स्थापित Sawalaram Enterprises हाइड्रोलिक सिलेंडर निर्माण के क्षेत्र में कार्यरत है। एक इंजीनियरिंग कंपनी में 18 वर्षों तक कार्य करने के बाद उन्होंने वर्ष 2010 में अपना स्वयं का विनिर्माण उद्यम स्थापित किया और उच्च गुणवत्ता वाले हाइड्रोलिक सिलेंडर विकसित किए।


अपने व्यवसाय को नई दिशा देने के लिए उन्होंने IIM शिलांग में आयोजित बिज़नेस एक्सेलेरेटर प्रोग्राम में भाग लिया, जहाँ उन्हें व्यवसाय रणनीति और सरकारी निविदाओं की गहन जानकारी प्राप्त हुई। इस प्रशिक्षण के परिणामस्वरूप उन्होंने Steel Authority of India Limited (SAIL) से हाइड्रोलिक सिलेंडरों की आपूर्ति हेतु ₹5.10 लाख का टेंडर सफलतापूर्वक प्राप्त किया। इस उपलब्धि ने उनके व्यवसाय का विस्तार किया, बाज़ार में पहचान बढ़ाई और सतत विकास की दिशा में मजबूत आधार तैयार किया।


आगे की राह : अवसरों का विस्तार, प्रभाव का स्थायी विकास

आज ये सफल उद्यम केवल अपने व्यवसाय का विस्तार नहीं कर रहे हैं, बल्कि समावेशी विकास की एक नई कहानी भी लिख रहे हैं। चुनौतियों पर विजय प्राप्त कर मुख्यधारा की आर्थिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी तक की उनकी यात्रा यह सिद्ध करती है कि सही मार्गदर्शन, क्षमता निर्माण और रणनीतिक सहयोग के माध्यम से देश के प्रत्येक क्षेत्र और समुदाय की क्षमता को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया जा सकता है।

राष्ट्रीय एससी-एसटी हब योजना केवल व्यक्तिगत उद्यमों को सशक्त नहीं बना रही है, बल्कि समावेशिता को वास्तविक आर्थिक प्रगति में बदलने का कार्य भी कर रही है। क्षमता निर्माण, मार्गदर्शन और रणनीतिक सहयोग के माध्यम से यह योजना विकसित भारत @2047 के निर्माण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।


पंचायती राज मंत्रालय की पहल: महिला प्रतिनिधियों के लिए कानूनी सुरक्षा पर तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन

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पंचायती राज मंत्रालय द्वारा 25 से 27 मई 2026 तक नई दिल्ली में तीन दिवसीय प्रशिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम (ToT) का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम “हिंसा से मुक्ति: महिलाओं की सुरक्षा के लिए कानूनी प्रावधानों पर निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की क्षमता निर्माण” विषय पर आधारित था।

यह कार्यक्रम मंत्रालय की निरभय रहो पहल के अंतर्गत आयोजित किया गया, जिसे निर्भया फंड के माध्यम से लागू किया जा रहा है। इसमें महिला एवं बाल विकास मंत्रालय तथा राष्ट्रीय विधि विद्यालय, भारत विश्वविद्यालय का सहयोग भी रहा।

कार्यक्रम का उद्देश्य

इस प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों और पंचायत प्रतिनिधियों की क्षमता को मजबूत करना था, ताकि वे:

  • महिलाओं की सुरक्षा और कानूनी अधिकारों को बेहतर समझ सकें

  • लैंगिक संवेदनशीलता विकसित कर सकें

  • संस्थागत प्रतिक्रिया तंत्र को मजबूत कर सकें

  • ग्रामीण स्तर पर सुरक्षा और सहयोग प्रणाली को बेहतर बना सकें

प्रमुख प्रतिभागी

इस कार्यक्रम में लगभग 50 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया, जिनमें शामिल थे:

  • राज्य ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान (SIRD&PR) के प्रतिनिधि

  • राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान (NIRD&PR) के प्रतिनिधि

  • पिरामल फाउंडेशन

  • ट्रांसफॉर्म रूरल इंडिया फाउंडेशन (TRIF)

उद्घाटन सत्र को सचिव विवेक भारद्वाज और महानिदेशक सुरेंद्रकुमार बागड़े ने संबोधित किया।

‘निरभय रहो’ पहल

सचिव ने बताया कि इस पहल के तहत तीन प्रमुख घटक लागू किए जा रहे हैं:

  • निरभय नेत्री: महिला प्रतिनिधियों का प्रशिक्षण और कानूनी जागरूकता

  • निरभय चेतना: पुरुष प्रतिनिधियों में लैंगिक समानता की जागरूकता

  • निरभय दृष्टि: ग्राम पंचायतों में सीसीटीवी जैसे तकनीकी सुरक्षा उपाय

इस कार्यक्रम का लक्ष्य देशभर में लगभग 14.5 लाख महिला और 17.5 लाख पुरुष पंचायत प्रतिनिधियों तक पहुंच बनाना है।

विशेषज्ञों के विचार

सायराम भट ने अपने संबोधन में कहा कि कानूनी साक्षरता और लैंगिक संवेदनशीलता को जमीनी स्तर पर मजबूत करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि पंचायत प्रतिनिधि महिलाओं के लिए न्याय और सुरक्षा व्यवस्था को सुलभ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

प्रशिक्षण की विशेषताएँ

तीन दिवसीय कार्यक्रम में कई महत्वपूर्ण विषय शामिल रहे:

  • लैंगिक हिंसा और घरेलू हिंसा

  • बाल विवाह और साइबर सुरक्षा

  • पीड़ित सहायता प्रणाली और कानूनी उपचार

  • सामुदायिक भागीदारी और फर्स्ट रिस्पॉन्डर तंत्र

प्रशिक्षण में व्याख्यान, केस स्टडी, समूह चर्चा, मूट कोर्ट और रोल प्ले जैसी गतिविधियों के माध्यम से व्यावहारिक ज्ञान दिया गया।

निष्कर्ष

कार्यक्रम के अंत में प्रतिभागियों से फीडबैक लिया गया और इस पहल को राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में विस्तार देने पर चर्चा हुई। यह पहल ग्रामीण भारत में महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

आईएफएससीए अधिकारियों के लिए आईआईसीए में एक सप्ताह का प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू

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मानेसर: भारतीय कॉर्पोरेट कार्य संस्थान ने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण के सहायक प्रबंधकों के लिए 13 से 18 अप्रैल 2026 तक एक सप्ताह का इंडक्शन प्रशिक्षण कार्यक्रम अपने मानेसर परिसर में शुरू किया है।

यह कार्यक्रम दोनों संस्थाओं के बीच 20 फरवरी 2026 को गुजरात के गिफ्ट सिटी में हुए समझौता ज्ञापन (MoU) के तहत आयोजित किया जा रहा है। इस समझौते पर आईआईसीए के महानिदेशक एवं सीईओ ज्ञानेश्वर कुमार सिंह और आईएफएससीए के अध्यक्ष के. राजारामन ने हस्ताक्षर किए थे। इसका उद्देश्य भारत के अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा पारिस्थितिकी तंत्र को क्षमता निर्माण, नीति अनुसंधान और ज्ञान साझेदारी के माध्यम से मजबूत करना है।

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्देश्य आईएफएससीए अधिकारियों को कॉर्पोरेट कानून, गवर्नेंस ढांचे, वित्तीय नियमों और सीमा-पार लेनदेन की व्यापक समझ प्रदान करना है।

कार्यक्रम का उद्घाटन आईआईसीए के महानिदेशक ज्ञानेश्वर कुमार सिंह ने किया। उन्होंने अपने संबोधन में आईएफएससीए के गठन को भारत की नियामकीय दूरदर्शिता का उदाहरण बताते हुए इसे एक “चमत्कार” बताया। उन्होंने फिनटेक के माध्यम से नवाचार को बढ़ावा देने और विकसित भारत के विजन में आईएफएससीए की भूमिका पर जोर दिया।

कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों को सेबी और पीएफआरडीए जैसे नियामक संस्थानों से जुड़े विभिन्न कानूनों और ढांचों की जानकारी भी दी जाएगी।

इस अवसर पर डॉ. नीरज गुप्ता ने स्वागत भाषण दिया, जबकि डॉ. पायला नारायण राव ने कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की।

प्रशिक्षण के तहत प्रतिभागी 16 और 17 अप्रैल को “संसद प्राइड” का भी दौरा करेंगे, जिससे उन्हें संसदीय कार्यवाही और विधायी प्रक्रियाओं की व्यावहारिक जानकारी मिल सके।

इस कार्यक्रम में कॉर्पोरेट गवर्नेंस, सिक्योरिटीज रेगुलेशन, कॉर्पोरेट फाइनेंस, वित्तीय रिपोर्टिंग और सीमा-पार दिवालियापन जैसे विषयों पर विशेषज्ञों द्वारा सत्र आयोजित किए जा रहे हैं।

यह पहल आईआईसीए की क्षमता निर्माण और नीति समर्थन के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती है। कार्यक्रम का समापन 18 अप्रैल 2026 को प्रमाणपत्र वितरण के साथ होगा।


उच्च शिक्षा विभाग ने ‘साधना सप्ताह 2026’ के तहत भारतीय ज्ञान प्रणाली पर आयोजित किया इंटरैक्टिव सत्र

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नई दिल्ली- उच्च शिक्षा विभाग ने 2 से 8 अप्रैल 2026 तक मनाए गए ‘साधना सप्ताह 2026’ के अंतर्गत भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) पर एक सफल इंटरैक्टिव सत्र का आयोजन किया। यह सप्ताह क्षमता निर्माण आयोग (CBC) के स्थापना दिवस और ‘मिशन कर्मयोगी’ के पांच वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में मनाया गया, जो नागरिक-केंद्रित शासन की दिशा में भारत की एक महत्वपूर्ण पहल है।

कार्यक्रम की शुरुआत उच्च शिक्षा विभाग के संयुक्त सचिव (प्रशासन) सैयद एकराम रिजवी के स्वागत भाषण से हुई। उन्होंने मिशन कर्मयोगी के तहत क्षमता निर्माण आयोग की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए बताया कि आयोग विभिन्न ऑनलाइन पाठ्यक्रमों के माध्यम से ज्ञान, कौशल और क्षमता विकास को बढ़ावा दे रहा है।

इस सत्र का उद्देश्य समकालीन शिक्षा, अनुसंधान और शासन में भारतीय ज्ञान प्रणाली की प्रासंगिकता पर सार्थक चर्चा और संरचित सह-अधिगम (peer learning) को बढ़ावा देना था। इसमें इस बात पर जोर दिया गया कि भारत की समृद्ध बौद्धिक परंपराएं आधुनिक समस्या-समाधान, नवाचार और नीति-निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं।

कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण IIT हैदराबाद के बायोमेडिकल इंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. मोहन राघवन का संबोधन रहा। उन्होंने अपने अंतःविषय (interdisciplinary) कार्य के अनुभव साझा किए, जिसमें तकनीक, विज्ञान और भारतीय ज्ञान परंपराओं का समन्वय शामिल है।

डॉ. राघवन ने कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) की बाजार संभावनाएं भले ही व्यापक हों, लेकिन इसकी वास्तविक शक्ति उच्च शिक्षा में परिवर्तनकारी भूमिका निभाने में है। उन्होंने जोर दिया कि IKS को एक अलग विषय के रूप में नहीं, बल्कि एक बहुविषयक ढांचे के रूप में देखा जाना चाहिए, जो विज्ञान, इंजीनियरिंग, मानविकी और प्रबंधन जैसे क्षेत्रों को समृद्ध कर सकता है।

उन्होंने बताया कि IKS को उच्च शिक्षा में शामिल करने से रटने की पद्धति से आगे बढ़कर एक समग्र शिक्षा मॉडल विकसित किया जा सकता है, जिसमें ज्ञान, उसके अनुप्रयोग और मूल्यों (धर्म) का संतुलन हो। यह दृष्टिकोण वर्तमान शैक्षिक सुधारों के अनुरूप है, जो अनुसंधान, नवाचार और आलोचनात्मक सोच को बढ़ावा देता है।

कार्यक्रम के अंत में प्रतिभागियों के साथ प्रश्नोत्तर सत्र भी आयोजित किया गया, जिसमें भारतीय ज्ञान प्रणाली की प्रासंगिकता और उसे शासन में शामिल करने की आवश्यकता पर चर्चा हुई।

इस सत्र में शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया। इस पहल के माध्यम से विभाग ने मिशन कर्मयोगी के तहत ज्ञान-आधारित, अनुकूलनशील और मानवीय शासन प्रणाली के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।

वैज्ञानिकों और शिक्षाविदों के लिए प्रशासनिक क्षमता निर्माण कार्यक्रम की शुरुआत

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विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) तथा प्रधानमंत्री कार्यालय, परमाणु ऊर्जा विभाग, अंतरिक्ष विभाग, कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज “वैज्ञानिकों और शिक्षाविदों के लिए प्रशासनिक क्षमता निर्माण” पर पहली बार एक समर्पित कार्यक्रम की शुरुआत की। यह पहल मिशन कर्मयोगी के तहत अकादमिक नेतृत्व को प्रशासनिक कौशल और निर्णय लेने की क्षमता से सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

“SADHANA सप्तह” के विशेष सत्र में इस पहल की घोषणा करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि वैज्ञानिकों और शिक्षाविदों के लिए संरचित प्रशासनिक प्रशिक्षण की कमी लंबे समय से महसूस की जा रही थी, खासकर जब वे नेतृत्व की भूमिकाओं में आते हैं। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक और अकादमिक पृष्ठभूमि के पेशेवरों को अक्सर बिना पूर्व प्रशासनिक अनुभव के संस्थागत जिम्मेदारियां संभालनी पड़ती हैं, और यह कार्यक्रम इस कमी को दूर करेगा।

उन्होंने कहा कि यह पहल वैज्ञानिक नेतृत्व के साथ चर्चा से विकसित हुई है और संस्थागत प्रशिक्षण से “स्व-अध्ययन” पर निर्भरता कम होगी, जो समय लेने वाली और असमान हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि कार्यक्रम को गतिशील बनाए रखना होगा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) जैसी उभरती तकनीकों के साथ तालमेल बैठाना होगा, साथ ही तकनीक और मानवीय निर्णय के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है।

मंत्री ने क्षमता निर्माण आयोग (CBC) के लिए नई दिशा-निर्देशों की भी रूपरेखा प्रस्तुत की, जिसमें विभिन्न प्रशासनिक कार्यों के लिए संरचित मॉड्यूल तैयार करना शामिल है। उन्होंने संसद प्रश्नों के उत्तर देने के लिए विशेष पाठ्यक्रम विकसित करने का सुझाव दिया, ताकि अधिकारियों की प्रक्रियागत समझ मजबूत हो सके। साथ ही, प्रारंभिक स्तर के सिविल सेवकों और असिस्टेंट सेक्रेटरी के लिए छोटे ओरिएंटेशन मॉड्यूल भी तैयार किए जा सकते हैं।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने जोर दिया कि क्षमता निर्माण को नियम-आधारित कार्यप्रणाली से आगे बढ़कर भूमिका-आधारित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, जिससे अधिकारी विभिन्न क्षेत्रों में तेजी से अनुकूलन कर सकें। उन्होंने कहा कि निजी क्षेत्र की कार्यप्रणालियों को भी शासन में शामिल करना जरूरी है, क्योंकि “अब साइलो का युग समाप्त हो चुका है।”

क्षमता निर्माण आयोग की अध्यक्ष एस. राधा चौहान ने कहा कि मिशन कर्मयोगी का अगला चरण सार्वजनिक संस्थानों को “अनुकूलनीय” और “मानवीय” बनाने पर केंद्रित होगा, खासकर तेजी से बदलती तकनीकी परिस्थितियों में। उन्होंने कहा कि AI के बढ़ते उपयोग के साथ प्रशासन में अनुकूलन क्षमता अनिवार्य हो गई है, जबकि नागरिक-केंद्रित दृष्टिकोण सार्वजनिक सेवा का मूल बना रहेगा।

कार्यक्रम के दौरान मंत्री ने UNNATI पोर्टल के उन्नत संस्करण का भी शुभारंभ किया, जिसका उद्देश्य संस्थागत क्षमता निर्माण को मजबूत करना है। साथ ही, कर्मयोगी कर्तव्य कार्यक्रम के राष्ट्रीय स्तर पर क्रियान्वयन के लिए रोडमैप भी प्रस्तुत किया गया। इस अवसर पर क्षमता निर्माण आयोग और रिसर्च एंड इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर डेवलपिंग कंट्रीज़ (RIS) के बीच एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर भी हुए, जिसका उद्देश्य वैश्विक स्तर पर ज्ञान साझेदारी को बढ़ावा देना है।

इस सहयोग के तहत नीति संवाद, विशेषज्ञ आदान-प्रदान और विषयगत प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जिनका फोकस AI, डिजिटल परिवर्तन और सार्वजनिक क्षेत्र में नवाचार जैसे क्षेत्रों पर होगा, जिससे क्षमता निर्माण को वैश्विक सार्वजनिक हित के रूप में स्थापित किया जा सके।

विज्ञान भवन में आयोजित इस कार्यक्रम में पद्मश्री प्रो. अशुतोष शर्मा, प्रो. अभय करंदीकर (सचिव, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग), डॉ. राजेश एस. गोखले (सचिव, जैव प्रौद्योगिकी विभाग), डॉ. एम. रविचंद्रन (सचिव, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय) और अलका मित्तल (सदस्य, प्रशासन, क्षमता निर्माण आयोग) सहित कई वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि मिशन कर्मयोगी के पांच वर्षीय लक्ष्य के तहत एक “भविष्य के लिए तैयार” सिविल सेवा का निर्माण किया जा रहा है, जो निरंतर सीखने, तकनीकी अपनाने और नागरिक-केंद्रित शासन पर आधारित होगी। उन्होंने कहा कि क्षमता निर्माण का प्रभाव सेवा वितरण और संस्थागत प्रदर्शन में स्पष्ट रूप से दिखना चाहिए।


कर्मयोगी साधना सप्ताह का शुभारंभ, जन-केंद्रित शासन को मजबूत बनाने की दिशा में बड़ा कदम

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नई दिल्ली- भारत सरकार ने आज मिशन कर्मयोगी के तहत ‘कर्मयोगी साधना सप्ताह’ की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य देशभर के लोक सेवकों की क्षमता, प्रतिबद्धता और नागरिक-केंद्रित दृष्टिकोण को मजबूत करना है। यह कार्यक्रम 2 अप्रैल से 8 अप्रैल 2026 तक आयोजित किया जा रहा है।

प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में इस पहल का स्वागत करते हुए कहा कि तेजी से बदलती दुनिया में शासन को नागरिकों की आवश्यकताओं के अनुरूप होना चाहिए और “नागरिक देवो भव” की भावना से प्रेरित होना चाहिए। उन्होंने निरंतर सीखने, तकनीक और डेटा के उपयोग तथा कर्तव्य-आधारित सेवा दृष्टिकोण पर जोर दिया।

नई दिल्ली स्थित डॉ. अंबेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र में आयोजित उद्घाटन कार्यक्रम के साथ इस पहल की शुरुआत हुई, जो मिशन कर्मयोगी के पांच वर्ष पूरे होने का भी प्रतीक है। यह कार्यक्रम ‘टेक्नोलॉजी, ट्रेडिशन और टैंजिबल आउटकम्स’ के तीन प्रमुख स्तंभों पर आधारित है।

प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव डॉ. पी.के. मिश्रा ने कहा कि यह पहल एक सक्षम, प्रतिबद्ध और नागरिक-केंद्रित सिविल सेवा के निर्माण को मजबूत करती है। उन्होंने बताया कि अब प्रशिक्षण पारंपरिक तरीके से आगे बढ़कर ‘कभी भी, कहीं भी’ सीखने की दिशा में विकसित हुआ है, जिसे iGOT जैसे प्लेटफॉर्म संभव बना रहे हैं।

क्षमता निर्माण आयोग की अध्यक्ष एस. राधा चौहान ने कहा कि मिशन कर्मयोगी ने सार्वजनिक सेवा में ज्ञान, कौशल और मूल्यों को एकीकृत कर एक नया मॉडल प्रस्तुत किया है। उन्होंने कहा कि ‘कर्मयोगी’ वह है जो ज्ञान और कर्म को जोड़ते हुए सहानुभूति के साथ शासन करता है।

कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग की सचिव रचना शाह ने बताया कि iGOT प्लेटफॉर्म पर 1.5 करोड़ से अधिक उपयोगकर्ता पंजीकृत हैं, 8 करोड़ से अधिक कोर्स पूरे किए जा चुके हैं और 4,600 से अधिक कोर्स उपलब्ध हैं। उन्होंने बताया कि 130 से अधिक क्षमता निर्माण योजनाएं तैयार की गई हैं।

कर्मयोगी भारत के अध्यक्ष सुब्रमण्यम रामदोराई ने कहा कि यह पहल सिविल सेवाओं में निरंतर सीखने और आत्म-विकास की संस्कृति को मजबूत करती है। उन्होंने अधिकारियों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और नई तकनीकों में दक्षता विकसित करने के लिए प्रेरित किया।

इस अवसर पर कई महत्वपूर्ण पहलें भी शुरू की गईं, जिनमें ‘कर्मयोगी गीत’, ‘कर्मयोगी क्षमता कनेक्ट’, ‘कर्मयोगी कर्तव्य कार्यक्रम’ और ‘ट्रस्ट-बेस्ड पीयर असेसमेंट फ्रेमवर्क’ शामिल हैं। साथ ही AI आधारित ‘अमृत ज्ञान कोश’ केस स्टडी सूट भी लॉन्च किया गया।

मिशन कर्मयोगी, जो अब पांच वर्ष पूरे कर चुका है, ने पारंपरिक नियम-आधारित प्रणाली से हटकर एक दक्षता-आधारित ढांचा स्थापित किया है। ‘कर्मयोगी साधना सप्ताह’ इस दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम है, जो 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को साकार करने में सहायक होगा।

इस कार्यक्रम में विभिन्न मंत्रालयों, राज्यों, प्रशिक्षण संस्थानों और अन्य हितधारकों के वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया।

साधना सप्ताह 2026’ की शुरुआत: सिविल सेवाओं में क्षमता निर्माण का राष्ट्रीय अभियान

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क्षमता निर्माण आयोग (Capacity Building Commission) 2 से 8 अप्रैल 2026 तक ‘साधना सप्ताह’ (Sādhana Saptah 2026) की शुरुआत करेगा। यह भारत की सिविल सेवा प्रणाली में अब तक के सबसे बड़े सामूहिक क्षमता निर्माण अभियानों में से एक है। यह पहल आयोग के स्थापना दिवस और मिशन कर्मयोगी के पांच वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर आयोजित की जा रही है।

‘साधना सप्ताह’ का अर्थ है—Strengthening Adaptive Development and Humane Aptitude for National Advancement (राष्ट्रीय उन्नति के लिए अनुकूल विकास और मानवीय क्षमता का सुदृढ़ीकरण)। इस पहल में केंद्र सरकार के मंत्रालय, विभाग, राज्य एवं केंद्र शासित प्रदेश और 250 से अधिक सिविल सेवा प्रशिक्षण संस्थान शामिल होंगे।

राष्ट्रीय स्तर पर क्षमता निर्माण का संगम

पहली बार देशभर में क्षमता निर्माण गतिविधियों को एक साझा थीम के अंतर्गत जोड़ा जा रहा है। इसमें प्रारंभिक स्तर से लेकर वरिष्ठ अधिकारियों तक सभी सिविल सेवक भाग लेंगे। कार्यक्रम का उद्देश्य नागरिक-केंद्रित और प्रभावी शासन के लिए आवश्यक कौशल विकसित करना है।

तीन सूत्रों पर आधारित कार्यक्रम

साधना सप्ताह तीन प्रमुख सूत्रों पर आधारित होगा:

  • टेक्नोलॉजी (3–4 अप्रैल): एआई, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, डेटा आधारित निर्णय

  • परंपरा (5–6 अप्रैल): भारतीय ज्ञान प्रणाली, नैतिक मूल्य, ऐतिहासिक प्रशासनिक परंपराएं

  • परिणाम (7–8 अप्रैल): नीतियों के प्रभाव और नागरिकों तक उनके लाभ सुनिश्चित करना

मिशन कर्मयोगी: नियम से भूमिका की ओर

पिछले पांच वर्षों में मिशन कर्मयोगी ने प्रशिक्षण प्रणाली को ‘रूल-आधारित’ से ‘रोल-आधारित’ दृष्टिकोण में बदलने की दिशा में कार्य किया है। इसमें केवल प्रक्रियाओं पर नहीं, बल्कि समस्या समाधान, नवाचार, सहयोग और संवेदनशीलता जैसे गुणों पर भी जोर दिया गया है।

2 अप्रैल को राष्ट्रीय कॉन्क्लेव से शुरुआत

कार्यक्रम की शुरुआत नई दिल्ली स्थित डॉ. अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में राष्ट्रीय कॉन्क्लेव से होगी। इसमें वरिष्ठ सरकारी अधिकारी, नीति विशेषज्ञ और प्रशिक्षण संस्थानों के प्रतिनिधि शामिल होंगे।

प्रमुख पहलें

इस अवसर पर कई नई पहलों की शुरुआत होगी:

  • कर्मयोगी गीत

  • कर्मयोगी क्षमता कनेक्ट

  • राष्ट्रीय जन सेवा कार्यक्रम का विस्तार

  • ट्रस्ट आधारित मूल्यांकन प्रणाली

  • AI आधारित ‘अमृत ज्ञान कोष’

व्यापक भागीदारी

  • 100+ केंद्रीय मंत्रालय/विभाग

  • 30+ राज्य/केंद्र शासित प्रदेश

  • 250+ प्रशिक्षण संस्थान

  • 7 दिनों का कार्यक्रम

भविष्य के लिए तैयार शासन

‘साधना सप्ताह’ का उद्देश्य सिविल सेवाओं में निरंतर सीखने की संस्कृति को बढ़ावा देना है, ताकि प्रशासनिक तंत्र बदलती चुनौतियों के अनुसार खुद को ढाल सके और ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य को हासिल करने में सक्षम बन सके।

यह पहल संस्थागत सहयोग, ज्ञान साझा करने और आधुनिक तकनीकों के उपयोग के माध्यम से एक सक्षम, उत्तरदायी और नागरिक-केंद्रित शासन प्रणाली के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

DARPG ने आयोजित किया 36वां राष्ट्रीय सुशासन वेबिनार, उत्कृष्ट पहलों के प्रसार पर जोर

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प्रधानमंत्री के निर्देशानुसार प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग (DARPG) को जिला कलेक्टरों और अन्य अधिकारियों के साथ वर्चुअल कॉन्फ्रेंस/वेबिनार आयोजित करने के लिए कहा गया था, जिसमें प्रधानमंत्री पुरस्कार (लोक प्रशासन में उत्कृष्टता) के पूर्व विजेताओं को अपने अनुभव साझा करने के लिए आमंत्रित किया जाए, ताकि इन पहलों का व्यापक प्रसार और दोहराव सुनिश्चित किया जा सके।

इन्हीं निर्देशों के अनुपालन में DARPG ने अप्रैल 2022 से अब तक हर महीने एक वेबिनार आयोजित करते हुए कुल 36 राष्ट्रीय सुशासन वेबिनार आयोजित किए हैं। इन वेबिनारों का उद्देश्य प्रधानमंत्री उत्कृष्टता पुरस्कार के तहत चयनित पहलों के अनुभवों को साझा करना और उन्हें अन्य स्थानों पर लागू करने के लिए प्रोत्साहित करना है। प्रत्येक वेबिनार में विभिन्न विभागों, राज्य सरकारों, जिला कलेक्टरों, राज्य प्रशासनिक प्रशिक्षण संस्थानों और केंद्रीय प्रशिक्षण संस्थानों के लगभग 1000 अधिकारी भाग लेते हैं।

ये वेबिनार न केवल पहलों के संस्थागतकरण और स्थायित्व की वर्तमान स्थिति को प्रस्तुत करते हैं, बल्कि उनके विस्तार और अन्य क्षेत्रों में लागू किए जाने की संभावनाओं पर भी महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं।

27 मार्च 2026 को आयोजित 36वें वेबिनार में ‘जिलों का समग्र विकास’ विषय के अंतर्गत वर्ष 2023 और 2024 के प्रधानमंत्री उत्कृष्टता पुरस्कार से सम्मानित दो पहलों को प्रस्तुत किया गया। इसमें मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले की पहल को डॉ. हरिदास फाटिंग (निदेशक, स्वास्थ्य सेवाएं एवं परियोजना निदेशक, एड्स नियंत्रण सोसायटी) द्वारा तथा ओडिशा के कोरापुट जिले की पहल को वी. कीर्ति वासन (कलेक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट, गंजाम) द्वारा प्रस्तुत किया गया।

यह वेबिनार DARPG के अतिरिक्त सचिव पुनीत यादव की अध्यक्षता में आयोजित हुआ और इसमें विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया। देशभर के 620 से अधिक स्थानों से राज्य एवं केंद्र सरकार के अधिकारी, जिला कलेक्टर और प्रशिक्षण संस्थानों के प्रतिनिधि इस वेबिनार से जुड़े।

यह पहल देश में सुशासन के सफल मॉडलों के प्रसार और उनके व्यापक क्रियान्वयन को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

निर्माण क्षेत्र में कौशल विकास को बढ़ावा: NCB और UltraTech Cement के बीच MoU हस्ताक्षरित

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 भारत के निर्माण क्षेत्र में कौशल विकास और क्षमता निर्माण को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, नेशनल काउंसिल फॉर सीमेंट एंड बिल्डिंग मैटेरियल्स (NCB) ने एक प्रमुख सीमेंट निर्माता कंपनी के साथ समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं।

यह MoU आज एनसीबी, बल्लभगढ़ में एनसीबी के महानिदेशक डॉ. एल. पी. सिंह और अल्ट्राटेक सीमेंट लिमिटेड के तकनीकी सेवाओं के प्रमुख इंजीनियर राहुल गोयल द्वारा हस्ताक्षरित किया गया।

इस अवसर पर डॉ. एल. पी. सिंह ने कहा कि यह सहयोग निर्माण क्षेत्र में क्षमता निर्माण को बढ़ावा देगा। उन्होंने विश्वास जताया कि इस पहल के तहत अगले 3–5 वर्षों में बड़ी संख्या में पेशेवरों और श्रमिकों को प्रशिक्षण दिया जाएगा।

यह साझेदारी देशभर में संरचित प्रशिक्षण और प्रमाणन कार्यक्रमों पर केंद्रित होगी, जिसका उद्देश्य सिविल इंजीनियरों, रेडी-मिक्स कंक्रीट (RMC) पेशेवरों, ठेकेदारों, निर्माण श्रमिकों और राजमिस्त्रियों की क्षमता को बढ़ाना है। प्रशिक्षण में सामग्री गुणवत्ता परीक्षण, कंक्रीट मिश्रण अनुपात, स्थायित्व और सतत निर्माण प्रथाओं जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल होंगे।

इस पहल के अंतर्गत कार्यशालाएं, साइट डेमोंस्ट्रेशन, तकनीकी सेमिनार तथा संयंत्रों और RMC सुविधाओं के दौरे भी आयोजित किए जाएंगे, जिससे व्यावहारिक समझ और तकनीकी कौशल को और मजबूत किया जा सके।

यह सहयोग भारत सरकार की प्रमुख योजनाओं, विशेष रूप से ‘स्किल इंडिया मिशन’ के अनुरूप है और देश के बढ़ते बुनियादी ढांचे और आवास क्षेत्र की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक कुशल कार्यबल के विकास में सहायक सिद्ध होगा।

सीपीएसई के वरिष्ठ अधिकारियों के लिए DAKSH नेतृत्व कार्यक्रम के दूसरे बैच का नई दिल्ली में शुभारंभ

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केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (सीपीएसई) के वरिष्ठ अधिकारियों के लिए प्रमुख नेतृत्व विकास कार्यक्रम DAKSH (Development of Aspiration, Knowledge, Succession and Harmony) के दूसरे बैच के उद्घाटन सत्र का आयोजन आज नई दिल्ली के स्कोप कन्वेंशन सेंटर में किया गया। यह कार्यक्रम क्षमता निर्माण आयोग (CBC) और स्टैंडिंग कॉन्फ्रेंस ऑफ पब्लिक एंटरप्राइजेज (SCOPE) द्वारा संयुक्त रूप से मिशन कर्मयोगी के व्यापक ढांचे के अंतर्गत आयोजित किया जा रहा है।

उद्घाटन समारोह में भारत सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र के वरिष्ठ नेतृत्व ने भाग लिया। कार्यक्रम में उपस्थित प्रमुख गणमान्य व्यक्तियों में डॉ. पी. के. मिश्रा, प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव;  के. मोसेस चालई, सचिव, सार्वजनिक उद्यम विभाग; रचना शाह, सचिव, कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग;  एस. राधा चौहान, अध्यक्ष, क्षमता निर्माण आयोग; के. पी. महादेवस्वामी, अध्यक्ष, स्कोप;अतुल सोबती, महानिदेशक, स्कोप; तथा अलका मित्तल, सदस्य (प्रशासन), क्षमता निर्माण आयोग शामिल थे।

प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए अतुल सोबती, महानिदेशक, स्कोप ने कहा कि DAKSH कार्यक्रम नेताओं को आत्ममंथन, तैयारी और स्वयं के रूपांतरण में सहायता करेगा। उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम नेतृत्व उभरने, रणनीतिक विकास और अंतरराष्ट्रीय अनुभव के अवसर प्रदान करेगा।

कार्यक्रम की पृष्ठभूमि प्रस्तुत करते हुए अलका मित्तल, सदस्य, क्षमता निर्माण आयोग ने DAKSH के डिजाइन और उद्देश्यों पर विस्तृत प्रस्तुति दी। उन्होंने बताया कि यह कार्यक्रम 12 माह की एक परिवर्तनकारी नेतृत्व यात्रा के रूप में संरचित है, जिसमें डिजिटल लर्निंग, प्रमुख संस्थानों में कक्षा आधारित प्रशिक्षण, एक्जीक्यूटिव कोचिंग, लाइव एक्शन लर्निंग प्रोजेक्ट्स और अंतरराष्ट्रीय एक्सपोज़र शामिल हैं। उन्होंने जानकारी दी कि DAKSH के पहले बैच में 73 वरिष्ठ सीपीएसई अधिकारियों को प्रशिक्षित किया गया था, जबकि दूसरे बैच में ऊर्जा, अंतरिक्ष एवं रक्षा, परिवहन एवं लॉजिस्टिक्स, खनन एवं खनिज, विनिर्माण और निर्माण जैसे विविध क्षेत्रों से 72 प्रतिभागी शामिल हैं।

उन्होंने मिशन कर्मयोगी के अंतर्गत प्रमुख उपलब्धियों को भी रेखांकित किया, जिनमें iGOT डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अधिकारियों का बड़े पैमाने पर ऑनबोर्डिंग, कर्मयोगी सप्ताह जैसे पहलों के माध्यम से आजीवन सीखने की संस्कृति का संस्थानीकरण, कर्मयोगी दक्षता मॉडल का विकास, प्रशिक्षण संस्थानों का प्रत्यायन तथा भारत-केंद्रित केस स्टडीज़ के राष्ट्रीय भंडार अमृत ज्ञान कोष का निर्माण शामिल है। सीपीएसई के लिए नेतृत्व विकास, दक्षता आधारित वृद्धि, प्रतिभा गतिशीलता और प्रौद्योगिकी-सक्षम अधिगम को प्राथमिक सुधार क्षेत्रों के रूप में चिन्हित किया गया।

मुख्य संबोधन देते हुए डॉ. पी. के. मिश्रा, प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव ने भारत की विकास यात्रा में सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों की बदलती भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद देश के औद्योगिक और बुनियादी ढांचे के निर्माण में सीपीएसई ने आधारभूत भूमिका निभाई, जिससे आर्थिक वृद्धि, वित्तीय स्थिरता और राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता की नींव पड़ी। उन्होंने कहा कि कई दशकों तक सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम भारत की विकास रणनीति की रीढ़ रहे।

डॉ. मिश्रा ने कहा कि समय के साथ वैश्वीकरण, तकनीकी परिवर्तन और आर्थिक सुधारों ने वैश्विक एवं घरेलू आर्थिक परिदृश्य को बदल दिया है। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक बनाम निजी क्षेत्र के वर्चस्व पर होने वाली बहस अब एक समन्वित दृष्टिकोण में बदल गई है, जहां प्रतिस्पर्धा, दक्षता और नवाचार केंद्र में हैं। इस बदलते परिदृश्य में सीपीएसई से अपेक्षाएँ भी विकसित हुई हैं और उनसे अधिक चुस्ती के साथ राष्ट्रीय प्राथमिकताओं की सेवा करने की अपेक्षा की जाती है।

उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे भारत मुक्त व्यापार समझौतों और रणनीतिक साझेदारियों के माध्यम से वैश्विक अर्थव्यवस्था में गहराई से एकीकृत हो रहा है, सीपीएसई को न केवल घरेलू बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार रहना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम अनिश्चितता के समय में आर्थिक विकास में रणनीतिक भूमिका निभाते रहते हैं।

डॉ. मिश्रा ने वर्ष 2021 की सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम नीति का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें सीपीएसई को रणनीतिक और गैर-रणनीतिक क्षेत्रों में वर्गीकृत किया गया है। उन्होंने कहा कि जहां निजी उद्यमों की भूमिका बढ़ रही है, वहीं ऊर्जा, रक्षा, अवसंरचना और वित्त जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम दीर्घकालिक राष्ट्रीय हित, स्थिरता और लचीलेपन के लिए आवश्यक बने रहेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम उन बाजारों में संतुलनकारी भूमिका निभाते हैं जहां बाजार पूर्ण नहीं होते और जहां सार्वजनिक हित व राष्ट्रीय सुरक्षा के पहलू जुड़े होते हैं।

प्रौद्योगिकी और नवाचार के बढ़ते महत्व को रेखांकित करते हुए डॉ. मिश्रा ने कहा कि सीपीएसई को प्रौद्योगिकी उन्मुख और नवाचार प्रेरित बने रहना होगा। उन्होंने भारत के वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) का उल्लेख करते हुए यूपीआई, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में प्रौद्योगिकी अपनाने में सुधार और स्वच्छ ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में हुई प्रगति के उदाहरण दिए। उन्होंने कहा कि साइबर सुरक्षा, डेटा गवर्नेंस और ऊर्जा परिवर्तन जैसे क्षेत्रों में सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम नेतृत्व करने की बेहतर स्थिति में हैं, जहां राष्ट्रीय विश्वास और दीर्घकालिक प्रतिबद्धता आवश्यक है।

नेतृत्व और मानव संसाधन पर जोर देते हुए डॉ. मिश्रा ने कहा कि किसी भी संस्था की सफलता अंततः उसके नेतृत्व की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। उन्होंने निरंतर सीखने, अनुकूलन क्षमता और रणनीतिक सोच के महत्व पर बल दिया, विशेषकर तीव्र तकनीकी परिवर्तन के इस दौर में। उन्होंने प्रतिभागियों से आग्रह किया कि वे DAKSH कार्यक्रम का उपयोग संगठनात्मक सीमाओं से परे दृष्टिकोण विकसित करने, निर्णय क्षमता मजबूत करने, सहयोगात्मक ढंग से कार्य करने और साझा राष्ट्रीय उद्देश्यों के अनुरूप टीम निर्माण के लिए करें।

इससे पहले के. मोसेस चालई, सचिव, सार्वजनिक उद्यम विभाग ने सीपीएसई के पैमाने और आर्थिक योगदान पर संक्षेप में प्रकाश डाला। उन्होंने जीडीपी में योगदान और केंद्रीय राजकोष में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी का उल्लेख करते हुए कहा कि वैश्विक और घरेलू परिवर्तनों के बीच इस योगदान को बनाए रखने के लिए भविष्य के लिए तैयार नेतृत्व विकसित करना आवश्यक है, और DAKSH इस दिशा में एक समयोचित पहल है।

कार्यक्रम के अंत में जगदीप गुप्ता, सचिव, क्षमता निर्माण आयोग ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया और मिशन कर्मयोगी के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने के लिए आयोग की प्रतिबद्धता दोहराई।

DAKSH नेतृत्व कार्यक्रम को वरिष्ठ अधिकारियों को उच्च नेतृत्व भूमिकाओं के लिए तैयार करने तथा राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और वैश्विक चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना करने में सक्षम बनाने के उद्देश्य से परिकल्पित किया गया है।



आईआईसीए ने आईईएस और आईटीएस अधिकारियों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया

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कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय के अंतर्गत भारतीय कॉरपोरेट कार्य संस्थान (IICA) ने भारतीय आर्थिक सेवा (IES) और भारतीय व्यापार सेवा (ITS) के 21 अधिकारियों के लिए कंपनी अधिनियम, प्रतिस्पर्धा कानून तथा दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC) पर एक विशेषीकृत प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया। यह कार्यक्रम 2 से 6 फरवरी 2026 तक हरियाणा के आईएमटी मानेसर स्थित आईआईसीए परिसर में आयोजित किया गया।

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्देश्य अधिकारी प्रशिक्षुओं को कंपनी अधिनियम, प्रतिस्पर्धा कानून, कॉरपोरेट वित्त और दिवाला कानून जैसे प्रमुख विषयों के प्रति संवेदनशील बनाना तथा उनके पेशेवर दायित्वों के अनुरूप नियामक और नीति संबंधी समझ को सुदृढ़ करना है। कार्यक्रम के माध्यम से प्रतिभागियों को कॉरपोरेट प्रशासन, नियामक ढांचे और व्यावहारिक नीति दृष्टिकोण की गहन जानकारी प्रदान की जा रही है।

कार्यक्रम के दौरान अधिकारियों को कंपनी मामलों के प्रबंधन, भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) की शक्तियों और कार्यों, प्रतिस्पर्धा विरोधी समझौते, प्रभुत्व के दुरुपयोग, कॉरपोरेट वित्त, ऋण और चूक, दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP), एनसीएलटी और एनसीएलएटी की भूमिका, डेटा आधारित निर्णय निर्माण तथा विधायी मंशा जैसे विषयों पर विस्तृत जानकारी दी गई।

प्रशिक्षण कार्यक्रम में देश के प्रतिष्ठित विशेषज्ञों ने सहभागिता की, जिनमें सुधाकर शुक्ला (पूर्व सदस्य, IBBI), ज्ञानेश्वर कुमार सिंह (महानिदेशक एवं सीईओ, IICA), धनेंद्र कुमार (पूर्व अध्यक्ष, CCI), जी.पी. मदान, समीर गांधी, डॉ. एम.एस. साहू, डॉ. ऑगस्टीन पीटर, डॉ. नवीन सिरोही सहित कई वरिष्ठ विधि एवं नीति विशेषज्ञ शामिल रहे।

कार्यक्रम का औपचारिक उद्घाटन आईआईसीए के महानिदेशक एवं सीईओ ज्ञानेश्वर कुमार सिंह ने किया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय देश की सबसे बड़ी नियामक संरचनाओं में से एक का संचालन करता है और ‘ट्रस्ट आधारित विनियमन’ की अवधारणा पर बल दिया।

कार्यक्रम की शुरुआत में सुधाकर शुक्ला ने भारत में ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस के तीन प्रमुख स्तंभ—प्रवेश की स्वतंत्रता, संचालन की स्वतंत्रता और निकास की स्वतंत्रता—पर प्रकाश डाला और इन्हें कंपनी अधिनियम, प्रतिस्पर्धा अधिनियम तथा दिवाला संहिता से जोड़ा।

उद्घाटन सत्र को धनेंद्र कुमार, भारत के पहले प्रतिस्पर्धा आयोग अध्यक्ष, के संबोधन ने और भी समृद्ध बनाया। उन्होंने एमआरटीपी अधिनियम से लेकर आधुनिक प्रतिस्पर्धा कानून तक के विकास की यात्रा साझा की। तकनीकी सत्रों में कॉरपोरेट गवर्नेंस, निदेशकों की जिम्मेदारियों और प्रतिस्पर्धा कानून के व्यावहारिक पहलुओं पर विस्तृत चर्चा हुई।

कार्यक्रम का समापन आईआईसीए के स्कूल ऑफ कॉरपोरेट लॉ एंड कॉम्पिटिशन लॉ के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. प्याला नारायण राव द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ किया गया।

भारतीय कॉरपोरेट कार्य संस्थान में राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद के उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल का दौरा

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नई दिल्ली- भारतीय कॉरपोरेट कार्य संस्थान (IICA) ने प्रशिक्षण, अनुसंधान, उत्पादकता, सततता और अनुपालन सहयोग के क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाओं पर चर्चा के लिए राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद (NPC) के एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल की मेजबानी की। प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व नीरजा शेखर, महानिदेशक, NPC तथा उमाशंकर प्रसाद, उप महानिदेशक (ग्रुप) ने किया।

प्रतिनिधिमंडल का स्वागत महानिदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी, IICA,ज्ञानेश्वर कुमार सिंह द्वारा किया गया। इस अवसर पर उन्होंने गणमान्य अतिथियों को शॉल एवं स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया।

अपने संबोधन में डीजी एवं सीईओ, IICA ने उद्योग जगत की बढ़ती और बदलती आवश्यकताओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संस्थानों को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप स्वयं को निरंतर प्रासंगिक बनाए रखना होगा। उन्होंने कहा कि भारत के नेतृत्व ने भविष्य के लिए एक स्पष्ट दृष्टि प्रस्तुत की है और ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए संस्थानों को व्यक्तिगत एवं सामूहिक रूप से योगदान देना आवश्यक है।

दौरे के दौरान IICA के विभिन्न स्कूलों और केंद्रों के प्रमुखों द्वारा संस्थान के दायित्वों एवं गतिविधियों पर विस्तृत प्रस्तुतियां दी गईं। इन प्रस्तुतियों में शिक्षा, प्रशिक्षण, अनुसंधान, नीति समर्थन, परामर्श और सलाहकारी सेवाओं में IICA की बहुआयामी भूमिका को रेखांकित किया गया, जो सरकारी एवं निजी क्षेत्र दोनों के लिए सहायक है।

इस अवसर पर बातचीत के दौरान नीरजा शेखर, महानिदेशक, NPC ने बताया कि राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद की स्थापना 1958 में, स्वतंत्रता के तुरंत बाद की गई थी, जब देश के पास सीमित संसाधन थे और उत्पादकता बढ़ाने की तत्काल आवश्यकता थी। उन्होंने जापान गए ऐतिहासिक उत्पादकता प्रतिनिधिमंडल का उल्लेख किया, जिसने भारत में उत्पादकता प्रयासों के संस्थानीकरण की नींव रखी।

उन्होंने बताया कि समय के साथ NPC ने औद्योगिक क्षेत्र से आगे बढ़ते हुए कृषि, सेवा क्षेत्र, एमएसएमई, सतत विकास, हरित उत्पादकता तथा ईएसजी से जुड़े पहलों में भी अपनी गतिविधियों का विस्तार किया है।

नीरजा शेखर ने यह भी बताया कि NPC का एशियन प्रोडक्टिविटी ऑर्गनाइजेशन (APO) के साथ सक्रिय सहयोग है, जिसके माध्यम से अंतरराष्ट्रीय अनुभव, अंतर-देशीय अध्ययन यात्राएं, विशेषज्ञों का आदान-प्रदान और उत्पादकता बेंचमार्किंग फ्रेमवर्क को बढ़ावा दिया जाता है। ये पहल विशेष रूप से एमएसएमई के लिए औद्योगिक तैयारी, संगठनात्मक क्षमता, वित्तीय सुदृढ़ता और विनिर्माण परिपक्वता का आकलन करने में सहायक हैं।

दोनों संस्थानों ने नीति अनुसंधान, प्रशिक्षण और परामर्श में IICA की विशेषज्ञता तथा कार्यान्वयन-आधारित उत्पादकता अनुभव में NPC की क्षमता को एक साथ जोड़ते हुए सहयोग को आगे बढ़ाने की प्रबल इच्छा व्यक्त की। इसका उद्देश्य भारत को एक उच्च आय, प्रतिस्पर्धी, नवोन्मेषी और सतत अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर करना है।

इस कार्यक्रम का समन्वय डॉ. नवीन सिरोही, प्रमुख – स्कूल ऑफ फाइनेंस एंड मैनेजमेंट, IICA द्वारा किया गया।


पीडीयूएनएएसएस में ईपीएफओ अधिकारियों के लिए ‘कानूनी प्रबंधन एवं दिवाला और दिवालियापन संहिता (IBC), 2016’ पर पांच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्घाटन

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नई दिल्ली- पंडित दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा अकादमी (PDUNASS), नई दिल्ली में कल ईपीएफओ (Employees’ Provident Fund Organisation) के अधिकारियों के लिए ‘कानूनी प्रबंधन एवं दिवाला और दिवालियापन संहिता (IBC), 2016’ पर पांच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्घाटन किया गया। यह कार्यक्रम 19 से 23 जनवरी 2026 तक चल रहा है और इसका उद्देश्य ईपीएफओ अधिकारियों की दिवालियापन से संबंधित मामलों और IBC ढांचे के तहत उत्पन्न कानूनी मुद्दों से निपटने की कानूनी तथा संस्थागत क्षमता को मजबूत बनाना है।

उद्घाटन सत्र

उद्घाटन सत्र को PDUNASS के निदेशक कुमार रोहित, दिवाला और दिवालियापन बोर्ड ऑफ इंडिया (IBBI) के महाप्रबंधक राजेश तिवारी, PDUNASS के चीफ लर्निंग ऑफिसर रिजवान उद्दीन और RPFC-I एवं कोर्स डायरेक्टर संजय कुमार राय ने संबोधित किया।

कार्यक्रम का उद्देश्य और महत्व

PDUNASS के निदेशक कुमार रोहित ने कहा कि दिवाला और दिवालियापन संहिता, 2016 ने भारत के कानूनी और आर्थिक ढांचे में महत्वपूर्ण परिवर्तन लाया है। उन्होंने बताया कि ईपीएफओ जैसी वैधानिक संस्थाएं मोराटोरियम प्रावधानों, provident fund देयों की प्राथमिकता, आकलन बनाम वसूली, और IBC प्रणाली के तहत निर्णायक प्राधिकरणों के समक्ष प्रतिनिधित्व जैसे जटिल कानूनी मुद्दों का सामना कर रही हैं।

निदेशक ने यह भी बताया कि दिवालियापन संबंधी न्यायशास्त्र लगातार विकसित हो रहा है, इसलिए ईपीएफओ अधिकारियों को कानूनी रूप से अपडेट, प्रक्रियात्मक रूप से संगठित और संस्थागत रूप से समन्वित रहना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि दिवालियापन मामलों का प्रभावी प्रबंधन श्रमिकों के सामाजिक सुरक्षा हितों की रक्षा और IBC के वैधानिक ढांचे का पालन सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि प्रशिक्षण कार्यक्रम को ईपीएफओ के वैधानिक कार्यों से संबंधित दिवालियापन प्रक्रियाओं की व्यावहारिक और समग्र समझ प्रदान करने के लिए डिजाइन किया गया है।

कार्यक्रम में भागीदारी

कुमार रोहित ने बताया कि RPFC-I, RPFC-II और APFC रैंक के अधिकारी, अनुभवी क्षेत्र अधिकारी और नए भर्ती हुए अधिकारी, इस कार्यक्रम में भाग ले रहे हैं। उन्होंने IBBI द्वारा कार्यक्रम के लिए विशेषज्ञ संसाधन व्यक्तियों की उपलब्धता के लिए समर्थन की सराहना की।

अन्य सत्र और शिक्षण सामग्री

IBBI के महाप्रबंधक राजेश तिवारी ने IBC के उद्देश्य, संस्थागत ढांचा और प्रमुख हितधारकों की भूमिकाओं पर प्रकाश डाला। PDUNASS के चीफ लर्निंग ऑफिसर रिजवान उद्दीन ने कार्यक्रम की शैक्षणिक संरचना और सीखने के उद्देश्यों की जानकारी दी, जबकि कोर्स डायरेक्टर संजय कुमार राय ने कोर्स डिजाइन और अपेक्षित सीखने के परिणामों की व्याख्या की।

कार्यक्रम की मुख्य विशेषताएं

संजय कुमार राय ने बताया कि कार्यक्रम में IBBI के अधिकारी, रेजोल्यूशन प्रोफेशनल, ईपीएफओ के स्टैंडिंग काउंसल, पूर्व NCLT/NCLAT सदस्य और राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों के शिक्षाविद शामिल होंगे। सत्रों में ईपीएफओ में कानूनी प्रबंधन, IBC-संबंधित मामलों का निपटान, provident fund देयों की वसूली और दिवालियापन प्रक्रियाओं पर हालिया न्यायिक निर्णयों पर चर्चा होगी।

यह पहल PDUNASS की क्षमता निर्माण और ईपीएफओ अधिकारियों की कानूनी तत्परता को मजबूत करने की प्रतिबद्धता को दर्शाती है, ताकि वे दिवालियापन समाधान ढांचे में श्रमिकों के सामाजिक सुरक्षा हितों की प्रभावी रक्षा कर सकें।

PDUNASS के बारे में

पंडित दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा अकादमी (PDUNASS) ईपीएफओ की शीर्ष प्रशिक्षण संस्था है, जो श्रम और रोजगार मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत आती है। 1990 में स्थापित PDUNASS सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में प्रशिक्षण, अनुसंधान और परामर्श कार्य करती है।

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