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सफलता की कहानी-सफर में भटकी बिहार की महिला को मिला नया सहारा

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सखी वन स्टॉप सेंटर दंतेवाड़ा ने परिवार से कराया सुरक्षित मिलन

रायपुर- महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा संचालित सखी वन स्टॉप सेंटर संकट में फंसी महिलाओं के लिए भरोसेमंद सहारा बनकर सामने आ रहा है। दंतेवाड़ा जिले में इसका एक संवेदनशील उदाहरण देखने को मिला, जहां बिहार की एक महिला को सुरक्षित आश्रय देकर उसके परिवार से मिलाया गया।

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले की रहने वाली सविता देवी अपने मायके से ससुराल जाने के लिए मोतीपुर स्टेशन से ट्रेन में सवार हुई थीं। यात्रा के दौरान वह सो गईं और कई स्टेशनों को पार करते हुए छत्तीसगढ़ के किरंदुल (जिला दंतेवाड़ा) पहुंच गईं। वहां से वह पैदल निकल पड़ीं और भटकते-भटकते भांसी तक पहुंच गईं।

स्थानीय लोगों ने उनकी स्थिति देखकर भांसी थाना को सूचना दी। पुलिस ने उन्हें सुरक्षित रूप से सखी वन स्टॉप सेंटर, दंतेवाड़ा में अस्थायी आश्रय दिलाया।

सखी वन स्टॉप सेंटर की टीम ने तुरंत कार्रवाई करते हुए बिहार के मुजफ्फरपुर स्थित सखी वन स्टॉप सेंटर और थाना काटी से संपर्क किया। महिला का नाम, पता और फोटो भेजकर पहचान की प्रक्रिया शुरू की गई। जांच के बाद यह पुष्टि हुई कि महिला मुजफ्फरपुर जिले की ही निवासी हैं।

इसके बाद महिला के परिवार से संपर्क किया गया और उन्हें पूरी जानकारी दी गई। सूचना मिलते ही उनके पति दंतेवाड़ा पहुंचे और सभी आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद महिला को सुरक्षित उनके सुपुर्द कर दिया गया।

महिला के पति ने बताया कि उनकी पत्नी की मानसिक स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं है और वह पिछले करीब डेढ़ महीने से लापता थीं। परिवार ने उन्हें कई स्थानों पर खोजा, लेकिन उनका कोई पता नहीं चल पाया था। दंतेवाड़ा में पत्नी को सुरक्षित देखकर उन्हें बड़ी राहत मिली।

उन्होंने सखी वन स्टॉप सेंटर, दंतेवाड़ा और महिला एवं बाल विकास विभाग का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि समय पर मिली मदद ने उनके परिवार को फिर से एक कर दिया।

यह घटना दर्शाती है कि सखी वन स्टॉप सेंटर केवल आश्रय देने तक सीमित नहीं है, बल्कि संकट में फंसी महिलाओं को सुरक्षा, परामर्श, समन्वय और परिवार से पुनर्मिलन जैसी महत्वपूर्ण सेवाएं भी उपलब्ध कराता है। यह योजना महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान की दिशा में सरकार की संवेदनशील पहल का प्रभावी उदाहरण है।

बिहार बंद आज: शिक्षा सुधार और पेपर लीक के विरोध में छात्रों का बड़ा आंदोलन, सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम

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पटना- ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) और अन्य छात्र संगठनों के आह्वान पर आज बिहार बंद का आयोजन किया गया है। आंदोलनकारी शिक्षा व्यवस्था में सुधार, परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं।

बंद को देखते हुए पटना समेत कई जिलों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती की गई है। प्रशासन ने लोगों से अनावश्यक यात्रा से बचने और ट्रैफिक संबंधी सलाह का पालन करने की अपील की है। 

प्रदर्शन के चलते कई स्थानों पर यातायात प्रभावित होने की आशंका है। प्रशासन का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाए गए हैं और स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है।

उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने बिहार विधान सभा के 18वें कार्यकाल के सदस्यों के लिए आयोजित अभिमुखीकरण एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्घाटन किया

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भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने आज बिहार के गया स्थित बिहार इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन एंड रूरल डेवलपमेंट (बीआईपीएआरडी) में बिहार विधान सभा के 18वें कार्यकाल के सदस्यों के लिए आयोजित दो दिवसीय अभिमुखीकरण एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्घाटन किया।

बिहार विधान सभा एवं बिहार विधान परिषद के पीठासीन अधिकारियों तथा लोकसभा सचिवालय के संसदीय अनुसंधान एवं लोकतंत्र प्रशिक्षण संस्थान (PRIDE) की इस पहल की सराहना करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि ऐसे कार्यक्रम जनप्रतिनिधियों को अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों का प्रभावी ढंग से निर्वहन करने के लिए सक्षम बनाते हैं और लोकतांत्रिक संस्थाओं को सुदृढ़ करते हैं। उन्होंने गया जी में इस कार्यक्रम के आयोजन के लिए विधानसभा अध्यक्ष का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस पहल ने प्रतीकात्मक रूप से “पटना को गया जी तक पहुँचा दिया है।”

वैशाली की प्राचीन गणतांत्रिक परंपराओं का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि लोकतंत्र की जड़ें भारत में अत्यंत गहरी हैं और इसी कारण भारत को “लोकतंत्र की जननी” कहा जाता है। उन्होंने बिहार को भारत की लोकतांत्रिक यात्रा का “मार्गदर्शक” बताते हुए विधायकों से इसकी गौरवशाली विरासत को बनाए रखने का आह्वान किया। भगवान बुद्ध की इस पावन भूमि से प्रेरणा लेते हुए उन्होंने कहा कि वास्तविक ज्ञान इसी में है कि जनप्रतिनिधि शासन करने के लिए नहीं, बल्कि सेवा करने के लिए चुने जाते हैं। उन्होंने कहा कि विकसित बिहार के बिना विकसित भारत की कल्पना संभव नहीं है और विधायकों से आग्रह किया कि वे बिहार को रोजगार एवं विकास का ऐसा केंद्र बनाने की दिशा में कार्य करें, जहाँ अन्य राज्यों के लोग भी रोजगार के लिए आएँ।

लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले संपूर्ण क्रांति आंदोलन से अपने जुड़ाव का उल्लेख करते हुए सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा कि इसी आंदोलन ने उनके राजनीतिक जीवन की नींव रखी। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन तथा आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की रक्षा के संघर्ष में बिहार की ऐतिहासिक भूमिका को भी स्मरण किया। उन्होंने कहा कि चुनाव भले ही राजनीतिक दलों के आधार पर लड़े जाते हों, लेकिन शासन दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर होना चाहिए। उन्होंने कहा कि चुनाव वोटों से जीते जाते हैं, लेकिन जनता का विश्वास और सम्मान केवल निस्वार्थ सेवा से अर्जित होता है, सत्ता से नहीं। उन्होंने कहा कि प्रत्येक कानून, प्रत्येक प्रश्न और प्रत्येक बहस असंख्य लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने की क्षमता रखती है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन संविधान और जनकल्याण के प्रति प्रतिबद्धता सर्वोपरि होनी चाहिए। उन्होंने कहा, “विधान सभा के भीतर विचार भिन्न हो सकते हैं, लेकिन संविधान हमारा साझा पथप्रदर्शक होना चाहिए।” उन्होंने कहा कि स्वस्थ बहस लोकतंत्र को मजबूत करती है, जबकि रचनात्मक सहयोग राष्ट्र को आगे बढ़ाता है। प्रश्नकाल, शून्यकाल और कार्य मंत्रणा समिति के महत्व पर बल देते हुए उन्होंने सदस्यों से विधानमंडल की कार्यवाही को सुचारु और उत्पादक बनाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि ये संसदीय व्यवस्थाएँ जनप्रतिनिधियों को दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर अपने निर्वाचन क्षेत्रों से जुड़े मुद्दे उठाने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती हैं।

निरंतर सीखने की आवश्यकता पर बल देते हुए राधाकृष्णन ने विधायकों से सदन की कार्यवाही में भाग लेने से पहले पर्याप्त तैयारी करने तथा विधायी प्रक्रियाओं, समिति प्रणाली और संसदीय परंपराओं की गहन समझ विकसित करने का आग्रह किया। उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण (NLP) और राष्ट्रीय ई-विधान अनुप्रयोग (NeVA) जैसी डिजिटल विधायी पहलों को अपनाने का भी आह्वान किया, ताकि विधायी कार्य अधिक दक्ष, पारदर्शी और नागरिक-केंद्रित बन सके।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि राजनीति धैर्य और निरंतर प्रयास की मांग करती है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि एक समय उनका पहला कार्यकाल केवल सात दिनों का रहा, लेकिन बाद में वे बिहार के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले मुख्यमंत्री बने। उन्होंने राजनीति की तुलना टेस्ट क्रिकेट से करते हुए कहा कि सफलता धैर्य, दृढ़ता और सही अवसरों का चयन करने से मिलती है।

अपने संबोधन के समापन में उपराष्ट्रपति ने कहा कि एक विचारपूर्ण हस्तक्षेप किसी नीति को बदल सकता है, एक प्रभावी कानून कई पीढ़ियों का भविष्य संवार सकता है और एक संवेदनशील निर्णय असंख्य नागरिकों के जीवन में नई आशा जगा सकता है। उन्होंने कहा, “नेतृत्व का वास्तविक मूल्यांकन सदन के भीतर मिलने वाली तालियों से नहीं, बल्कि सदन के बाहर जनता के मन में उत्पन्न होने वाले विश्वास से होता है।” उन्होंने बिहार विधान सभा के 18वें कार्यकाल के सभी सदस्यों को सफल प्रशिक्षण कार्यक्रम और प्रभावी विधायी कार्यकाल के लिए शुभकामनाएँ दीं।

इस अवसर पर बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन, बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, बिहार विधान सभा के अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार, बिहार विधान परिषद के सभापति अवधेश नारायण सिंह, बिहार के उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी, बिहार विधान सभा के उपाध्यक्ष नरेंद्र नारायण यादव, बिहार विधानमंडल के सदस्य तथा अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

बिहार के मुंगेर का लगभग 700 वर्ष पुराना बरगद वैज्ञानिक रूप से दिनांकित सबसे प्राचीन बरगद घोषित

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बिहार के मुंगेर स्थित लगभग 700 वर्ष पुराने बरगद (Ficus benghalensis) को रेडियोकार्बन डेटिंग के माध्यम से वैज्ञानिक रूप से दिनांकित दुनिया का सबसे प्राचीन बरगद (Oldest Accurately Dated Banyan Tree) माना गया है। यह पहली बार है जब किसी बरगद के वृक्ष की आयु का निर्धारण लोककथाओं या ऐतिहासिक अभिलेखों के बजाय पूर्णतः वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर किया गया है।

बरगद के वृक्ष अपनी विशाल जड़ों और शाखाओं के जटिल तंत्र के कारण पक्षियों, कीटों और अन्य जीवों के लिए महत्वपूर्ण आवास प्रदान करते हैं। भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन में भी इनका विशेष महत्व रहा है। अब तक ऐसे प्राचीन वृक्षों की आयु का अनुमान लोककथाओं, स्थानीय मान्यताओं या ऐतिहासिक संदर्भों के आधार पर लगाया जाता था, जो अक्सर सटीक नहीं होता था। उष्णकटिबंधीय चौड़ी पत्ती वाले अधिकांश वृक्षों में स्पष्ट वार्षिक वृक्ष-वृत्त (Growth Rings) नहीं होने के कारण पारंपरिक डेंड्रोक्रोनोलॉजी (वृक्ष-वर्ष निर्धारण) तकनीकें प्रभावी नहीं थीं। इसलिए उच्च सटीकता वाली रेडियोकार्बन डेटिंग जैसी वैकल्पिक वैज्ञानिक पद्धति की आवश्यकता महसूस की गई।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के स्वायत्त संस्थान बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (Birbal Sahni Institute of Palaeosciences), लखनऊ की वैज्ञानिक डॉ. त्रिणा बोस को बिहार वन विभाग ने मुंगेर के इस ऐतिहासिक बरगद की आयु निर्धारित करने का दायित्व सौंपा। उन्होंने उष्णकटिबंधीय वृक्षों के लिए पारंपरिक विधियों की सीमाओं को देखते हुए एक नई वैज्ञानिक पद्धति विकसित करने की पहल की।

डॉ. त्रिणा बोस के नेतृत्व में डॉ. मयंक शेखर और डॉ. अखिलेश के. यादव की शोध टीम ने वृक्ष के द्वितीयक तने तथा प्राचीन प्राथमिक शाखा के केंद्र (Pith) के निकट से लकड़ी के नमूने एकत्र किए। इन नमूनों से पौधों की कोशिका भित्ति के सबसे स्थिर घटक अल्फा-सेलुलोज़ (Alpha-Cellulose) को अलग किया गया।

इसके बाद इन नमूनों की एक्सेलेरेटर मास स्पेक्ट्रोमेट्री (Accelerator Mass Spectrometry–AMS) आधारित उच्च-सटीकता वाली रेडियोकार्बन डेटिंग की गई। प्राप्त परिणामों का नवीनतम IntCal20 कैलिब्रेशन कर्व तथा OxCal सॉफ्टवेयर की सहायता से विश्लेषण कर वृक्ष की आयु लगभग 700 वर्ष निर्धारित की गई।

यह निष्कर्ष उस पूर्व धारणा को भी गलत सिद्ध करता है कि इस बरगद का रोपण ऐतिहासिक 'बड़ा बंगला (Burra Bunglow)' के निर्माण के समय किया गया था। वास्तुशिल्प के आधार पर यह भवन लगभग 300–350 वर्ष पुराना माना जाता है और इसे शासकों एवं आम जनता के संवाद, ग्राम सभाओं तथा सामाजिक एवं धार्मिक आयोजनों के लिए उपयोग किया जाता था।

नए वैज्ञानिक अध्ययन से स्पष्ट हुआ है कि यह लगभग 700 वर्ष पुराना बरगद उस प्राकृतिक वन का अवशेष है, जो कभी इस क्षेत्र में विद्यमान था। अर्थात यह वृक्ष 'बड़ा बंगला' के निर्माण से भी पहले अस्तित्व में था और उसने उसके निर्माण का साक्षी बनने का गौरव प्राप्त किया। इस प्रकार यह अध्ययन क्षेत्र के ऐतिहासिक घटनाक्रम की समयरेखा को नए सिरे से परिभाषित करता है।

यह शोध प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका Quaternary Research में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन में विकसित वैज्ञानिक पद्धति के माध्यम से अब विरासत वृक्षों (Heritage Trees) की आयु का सटीक निर्धारण किया जा सकेगा। इससे सरकारों, वन विभागों और संरक्षण एजेंसियों को सांस्कृतिक एवं पारिस्थितिक दृष्टि से महत्वपूर्ण वृक्षों की पहचान और संरक्षण में सहायता मिलेगी।

शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तकनीक भारत ही नहीं, बल्कि विश्व के अन्य उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के प्राचीन वृक्षों पर भी लागू की जा सकती है। इससे जैव विविधता संरक्षण, प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, पर्यावरण शिक्षा तथा अतीत की जलवायु एवं ऐतिहासिक परिदृश्यों के अध्ययन को नई दिशा मिलेगी।

यह शोध उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के प्राचीन एवं सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण वृक्षों के वैज्ञानिक आयु निर्धारण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, जो दक्षिण एशिया सहित विश्वभर में प्राकृतिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण को सशक्त आधार प्रदान करेगी।


गया में 170 करोड़ रुपये की लागत से स्थापित होगा अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी केंद्र, एमएसएमई क्षेत्र को मिलेगा बड़ा प्रोत्साहन

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गया (बिहार), सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) मंत्रालय के केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी तथा बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बिहार के गया जिले के खिजरसराय में प्रस्तावित प्रौद्योगिकी केंद्र (टेक्नोलॉजी सेंटर) की आधारशिला रखी। इस अवसर पर पारंपरिक भूमि पूजन के साथ परियोजना का शुभारंभ किया गया।

यह महत्त्वपूर्ण परियोजना क्षेत्र में एमएसएमई पारिस्थितिकी तंत्र और औद्योगिक आधारभूत संरचना को सुदृढ़ बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है। कार्यक्रम में एमएसएमई मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों, बिहार सरकार के मंत्रियों, उद्योग जगत के प्रतिनिधियों तथा स्थानीय हितधारकों ने भाग लिया।

अपने संबोधन में केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने कहा कि गया का यह प्रौद्योगिकी केंद्र न केवल बिहार बल्कि पड़ोसी राज्यों के एमएसएमई उद्यमों को भी तकनीकी सहायता प्रदान करेगा। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देशभर में प्रौद्योगिकी आधारित केंद्रों की स्थापना की जा रही है, जिससे उद्योगों को आधुनिक तकनीकी सहायता और कौशलयुक्त मानव संसाधन उपलब्ध हो सके।

उन्होंने कहा कि जो कार्य कभी असंभव प्रतीत होता था, वह आज संभव हो रहा है। यह केंद्र प्रतिवर्ष लगभग 7,000 युवाओं को प्रशिक्षण प्रदान करेगा और कौशल विकास तथा रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि देशभर में ऐसे प्रौद्योगिकी केंद्रों की स्थापना का अवसर मिलना गौरव की बात है। उन्होंने कहा कि यह केंद्र कौशल विकास और रोजगार सृजन के क्षेत्र में परिवर्तनकारी भूमिका निभाएगा।

मुख्यमंत्री ने कहा कि एमएसएमई मंत्रालय रोजगार सृजन के साथ-साथ आत्मनिर्भर भारत की मजबूत नींव तैयार कर रहा है। उन्होंने बिहार के युवाओं से तकनीक, नवाचार और कौशल विकास के माध्यम से राज्य को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का आह्वान किया।

एमएसएमई मंत्रालय के सचिव भरत खेड़ा ने बताया कि मंत्रालय देश के विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में प्रौद्योगिकी केंद्र और विस्तार केंद्र स्थापित कर रहा है। हाल ही में पटना में एक प्रौद्योगिकी केंद्र का उद्घाटन किया गया है और अब गया में नया केंद्र स्थापित किया जा रहा है।

एमएसएमई मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव एवं विकास आयुक्त डॉ. रजनीश ने भारत और बिहार में एमएसएमई क्षेत्र की प्रगति तथा गया प्रौद्योगिकी केंद्र की विशेषताओं की जानकारी दी।

खिजरसराय, गया में स्थापित होने वाला यह केंद्र 170 करोड़ रुपये की लागत से विकसित किया जाएगा, जिसमें लगभग 86 करोड़ रुपये सिविल निर्माण कार्यों तथा 84 करोड़ रुपये संयंत्र एवं मशीनरी पर व्यय किए जाएंगे।

यह केंद्र जनरल इंजीनियरिंग, हेवी इंजीनियरिंग और टेक्सटाइल टेस्टिंग जैसे प्रमुख क्षेत्रों को आधुनिक तकनीकी सहायता, परीक्षण सुविधाएं और कौशल विकास सेवाएं उपलब्ध कराएगा। इससे गया, औरंगाबाद, नवादा, नालंदा, जहानाबाद और मुंगेर जिलों के एमएसएमई उद्यमों को लाभ मिलेगा।

प्रस्तावित केंद्र उद्योग की वर्तमान एवं उभरती आवश्यकताओं के अनुरूप अल्पकालिक और दीर्घकालिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से प्रतिवर्ष लगभग 7,000 प्रशिक्षुओं को प्रशिक्षित करेगा। साथ ही, टूलिंग सेवाओं और जॉब वर्क के माध्यम से 1,000 से अधिक स्थानीय एमएसएमई इकाइयों को प्रतिवर्ष सहायता प्रदान करेगा।

दक्षिण बिहार के औद्योगिक विकास के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित होने वाला यह प्रौद्योगिकी केंद्र तकनीकी अंतराल को कम करने, स्थानीय एमएसएमई इकाइयों को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं से जोड़ने तथा ऐतिहासिक मगध क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

नालंदा विश्वविद्यालय दीक्षांत समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का संबोधन: ज्ञान, संवाद और वैश्विक विरासत का पुनर्जागरण

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भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने 31 मार्च 2026 को बिहार के राजगीर स्थित नालंदा विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में भाग लेकर उसे संबोधित किया।

अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि यह दीक्षांत समारोह केवल एक शैक्षणिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत संकल्प की पुनर्पुष्टि है—एक ऐसा संकल्प कि ज्ञान सदैव जीवित रहेगा, संवाद कायम रहेगा और शिक्षा मानवता की सेवा करती रहेगी। उन्होंने स्नातक छात्रों को बधाई देते हुए कहा कि उनकी सफलता उनके परिश्रम, अनुशासन और बौद्धिक समर्पण का परिणाम है। यह भी उल्लेखनीय है कि इस वर्ष स्नातक करने वाले छात्रों में आधे से अधिक छात्र 30 से अधिक देशों से आए अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थी हैं।

राष्ट्रपति ने कहा कि प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय लगभग आठ शताब्दियों तक विश्व का प्रसिद्ध ज्ञान केंद्र रहा। इसका पतन केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व के लिए एक बड़ी क्षति थी। फिर भी नालंदा की भावना कभी समाप्त नहीं हुई। आज इसका पुनरुत्थान उस गौरवशाली विरासत को आधुनिक संदर्भ में पुनः स्थापित करने की राष्ट्रीय और वैश्विक प्रतिबद्धता का प्रतीक है। यह विभिन्न देशों के सहयोग, दूरदर्शी नेतृत्व और सतत प्रयासों का परिणाम है।

उन्होंने बताया कि प्राचीन नालंदा में विभिन्न विचारधाराओं का स्वागत किया जाता था और वहाँ वाद-विवाद एवं संवाद की समृद्ध परंपरा थी। ज्ञान को समाज, नैतिकता और मानव कल्याण से जोड़कर देखा जाता था। आज के जटिल वैश्विक परिदृश्य में करुणा पर आधारित स्वतंत्र और आलोचनात्मक सोच की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। उन्होंने विश्वास जताया कि नालंदा विश्वविद्यालय एशिया और विश्व में एक अग्रणी शिक्षण संस्थान के रूप में उभरेगा।

राष्ट्रपति ने भारत और बौद्ध दर्शन के गहरे संबंध पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इस संबंध को गंभीरता से समझते हुए भारत की पारंपरिक ज्ञान परंपराओं के साथ जोड़कर आगे बढ़ाना चाहिए। नालंदा विश्वविद्यालय को बौद्ध अध्ययन के वैश्विक केंद्र के रूप में विकसित होने का प्रयास करना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि प्राचीन नालंदा के पुस्तकालय में लाखों पांडुलिपियाँ थीं। उसी प्रेरणा से आज जो निर्माण हो रहा है, वह भविष्य के लिए एक स्थायी धरोहर बनेगा। भारत के 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य में नालंदा जैसे संस्थानों की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।

बिहार में सहकार से समृद्धि: पैक्स सशक्तिकरण से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती

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सरकार ने सहकारी समितियों को सशक्त बनाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए देशभर में, विशेषकर बिहार में, अनेक कदम उठाए हैं। किसानों को ऋण, भंडारण और विपणन की सुविधाएं सुगम बनाने के उद्देश्य से 2 लाख नई बहुउद्देशीय प्राथमिक कृषि ऋण समितियां (एम-पैक्स), डेयरी और मत्स्य सहकारी समितियां स्थापित करने की योजना को स्वीकृति दी गई है। 15 नवंबर 2025 तक बिहार में 4,518 नई सहकारी समितियों का गठन हो चुका है।

बिहार, केंद्र प्रायोजित पैक्स कंप्यूटरीकरण परियोजना में भी सक्रिय भागीदारी कर रहा है। राज्य की 4,495 पैक्स में से 4,460 पैक्स को ईआरपी आधारित राष्ट्रीय सॉफ्टवेयर से जोड़ा जा चुका है, जिससे कार्यकुशलता, पारदर्शिता और जिला एवं राज्य सहकारी बैंकों के साथ समन्वय में सुधार हुआ है। पैक्स के लिए मॉडल उपविधियों को अपनाया गया है, जिससे वे कृषि इनपुट आपूर्ति, भंडारण, खरीद, डेयरी, मत्स्य और अन्य ग्रामीण सेवाओं सहित 25 से अधिक विविध व्यावसायिक गतिविधियां कर सकती हैं।

पैक्स को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, प्रधानमंत्री किसान समृद्धि केंद्र, ब्याज अनुदान, उर्वरक-बीज वितरण, पीडीएस, एलपीजी/पेट्रोल/डीजल डीलरशिप, कस्टम हायरिंग, प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र, कॉमन सर्विस सेंटर आदि योजनाओं के लाभ वितरण केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। बिहार में पैक्स को बहु-सेवा केंद्रों में बदलने के लिए कई कदम उठाए गए हैं।

राज्य योजना के तहत बिहार में 7,221 गोदामों का निर्माण कर 17.14 लाख मीट्रिक टन भंडारण क्षमता सृजित की गई है। वर्ष 2025-26 में 278 गोदामों (2.49 लाख मीट्रिक टन क्षमता) को स्वीकृति दी गई है। विश्व की सबसे बड़ी अनाज भंडारण योजना के तहत 36 पैक्स (1.33 लाख मीट्रिक टन क्षमता) चिन्हित की गई हैं। 5,256 पैक्स कॉमन सर्विस सेंटर के रूप में कार्य कर रही हैं। 2,271 पैक्स के पास उर्वरक लाइसेंस है, जिनमें से 1,681 को प्रधानमंत्री किसान समृद्धि केंद्र के रूप में उन्नत किया गया है।

वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने के लिए नाबार्ड और बिहार राज्य सहकारी बैंक द्वारा माइक्रो-एटीएम और वित्तीय साक्षरता कार्यक्रमों हेतु अनुदान स्वीकृत किए गए हैं। राष्ट्रीय सहकारी डाटाबेस के अनुसार, देश में कस्टम हायरिंग सेंटर के रूप में कार्यरत 7,398 पैक्स में से 2,661 बिहार में हैं।

राष्ट्रीय सहकारी प्रशिक्षण परिषद (NCCT) के माध्यम से प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। बिहार में आरआईसीएम, पटना द्वारा अब तक 43,290 प्रतिभागियों को प्रशिक्षित किया गया है। पैक्स सचिवों को सीएससी पोर्टल के माध्यम से 300 ऑनलाइन सेवाएं प्रदान करने हेतु विशेष प्रशिक्षण दिया गया है।

कृषि अवसंरचना निधि, कृषि विपणन अवसंरचना और कृषि यंत्रीकरण उप-मिशन जैसी योजनाओं के तहत दी जा रही सब्सिडी से पैक्स स्तर पर गोदाम, कस्टम हायरिंग सेंटर और प्रसंस्करण इकाइयों का विकास हो रहा है, जिससे अनाज की बर्बादी कम होगी और किसानों को बेहतर मूल्य मिलेगा।

सहकारिता मंत्रालय द्वारा ‘सहकार से समृद्धि’ के विजन के तहत राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 लागू की गई है, जिसमें अगले दस वर्षों के लिए वित्तीय पहुंच, बहु-क्षेत्रीय विस्तार और तकनीक आधारित पारदर्शिता पर जोर दिया गया है। कर रियायतें, पैक्स के लिए लेन-देन सीमाओं में वृद्धि, कंप्यूटरीकरण के लिए 2,925.39 करोड़ रुपये का प्रावधान और एनसीडीसी के माध्यम से वित्तीय सहायता जैसे उपाय किए गए हैं।

इन सभी कदमों से सहकारी समितियों की वित्तीय स्थिरता, पारदर्शिता और दीर्घकालिक स्थायित्व सुनिश्चित करने का लक्ष्य है। यह जानकारी केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में लिखित उत्तर में दी।

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