Media24Media.com: जनपद पंचायत कर्मचारी शासकीय सेवक नहीं, सरकारी पेंशन का वैधानिक अधिकार भी नहीं: हाईकोर्ट

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जनपद पंचायत कर्मचारी शासकीय सेवक नहीं, सरकारी पेंशन का वैधानिक अधिकार भी नहीं: हाईकोर्ट

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बिलासपुर- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जनपद पंचायतों से सेवानिवृत्त कर्मचारियों की पेंशन से जुड़ी याचिकाओं पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जनपद पंचायत के कर्मचारी राज्य सरकार के शासकीय सेवक नहीं हैं और मौजूदा नियमों के तहत उन्हें सरकारी कर्मचारियों के समान पेंशन पाने का स्वतः कोई वैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है। 

जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की एकलपीठ ने सेवानिवृत्त जनपद पंचायत कर्मचारियों की ओर से दायर 21 से अधिक संबंधित याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता पेंशन पाने के लिए ऐसा कोई वैधानिक प्रावधान नहीं दिखा सके, जिसके आधार पर उन्हें राज्य के नियमित कर्मचारियों के समान पेंशन का लाभ दिया जा सके। 

लंबे समय तक सेवा के बाद पेंशन की मांग

मामले में विभिन्न जिलों के जनपद पंचायतों से सेवानिवृत्त कर्मचारियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उन्होंने लंबे समय तक जनपद पंचायतों में सेवा की है और सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें पेंशन का लाभ मिलना चाहिए।

उन्होंने संबंधित अधिकारियों द्वारा उनकी पेंशन संबंधी मांग को खारिज किए जाने के आदेश को चुनौती दी और सरकारी कर्मचारियों की तरह मासिक पेंशन दिए जाने की मांग की थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी दलील दी गई कि कुछ अन्य जनपद पंचायतों के कर्मचारियों को पेंशन का भुगतान किया जा रहा है, इसलिए उन्हें भी समान लाभ मिलना चाहिए। 

हाईकोर्ट ने कहा—पंचायत संस्थाएं स्वायत्त निकाय

अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान जनपद पंचायतों की कानूनी स्थिति और उनके कर्मचारियों की सेवा शर्तों पर विचार किया। कोर्ट ने कहा कि पंचायत संस्थाएं स्वायत्त निकाय हैं और उनके कर्मचारियों की सेवा शर्तें अलग नियमों से निर्धारित होती हैं।

अदालत के अनुसार, केवल इसलिए कि पंचायत कर्मचारी सार्वजनिक कार्य करते हैं, उन्हें राज्य सरकार का कर्मचारी या शासकीय सेवक नहीं माना जा सकता। उनके वेतन और सेवा संबंधी मामलों का संचालन पंचायतों पर लागू अलग नियमों के तहत होता है। 

पेंशन के लिए स्पष्ट वैधानिक प्रावधान जरूरी

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पेंशन का लाभ तभी कानूनी अधिकार के रूप में दावा किया जा सकता है, जब उसके लिए संबंधित सेवा नियमों या कानून में प्रावधान मौजूद हो। अदालत ने माना कि जनपद पंचायत कर्मचारियों के मामले में ऐसा कोई वैधानिक पेंशन प्रावधान याचिकाकर्ता स्थापित नहीं कर सके।

राज्य की ओर से अदालत में यह भी बताया गया कि संबंधित कर्मचारियों की सेवा शर्तों में प्रोविडेंट फंड से जुड़े प्रावधान लागू थे और वे राज्य की नियमित सिविल सेवा के कर्मचारियों पर लागू छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1976 के दायरे में नहीं आते। 

दूसरे पंचायत कर्मचारियों को पेंशन मिलने की दलील भी नहीं मानी

याचिकाकर्ताओं ने यह दलील भी दी थी कि कुछ अन्य जनपद पंचायतों के सेवानिवृत्त कर्मचारियों को पेंशन का भुगतान किया जा रहा है, इसलिए उन्हें भी समानता के आधार पर पेंशन मिलनी चाहिए।

इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी अन्य स्थान पर नियमों के विपरीत या विवादित तरीके से कोई लाभ दिया गया है, तो वह दूसरे कर्मचारियों के लिए स्वतः कानूनी अधिकार पैदा नहीं करता। यानी किसी गलत या विवादित भुगतान को आधार बनाकर समान लाभ की मांग नहीं की जा सकती। 

कुछ जनपद पंचायतों में पेंशन भुगतान की जांच

मामले में यह तथ्य भी सामने आया कि कुछ जनपद पंचायतों में सेवानिवृत्त कर्मचारियों को स्थानीय स्तर पर गठित निधि या निर्णयों के आधार पर पेंशन का भुगतान किया जा रहा था। राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि इन भुगतानों की वैधानिकता की जांच के लिए संबंधित अधिकारियों को 27 अगस्त और 31 अगस्त 2026 को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए थे। 

कोर्ट ने याचिकाएं की खारिज

सभी पक्षों की दलीलों और संबंधित नियमों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता पेंशन प्राप्त करने का कोई स्पष्ट वैधानिक अधिकार स्थापित नहीं कर पाए हैं। इसके आधार पर अदालत ने पेंशन की मांग वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया।

इस फैसले से यह स्पष्ट हुआ है कि जनपद पंचायतों में सेवा करने मात्र से कर्मचारी राज्य सरकार के नियमित शासकीय सेवक नहीं बन जाते और उन्हें सरकारी कर्मचारियों के लिए लागू पेंशन व्यवस्था का लाभ स्वतः नहीं मिल सकता। 

मामला: Urmila Panigrahi बनाम State of Chhattisgarh एवं अन्य तथा संबंधित याचिकाएं
याचिका: WPS No. 11820/2025 एवं अन्य संबंधित मामले
पीठ: जस्टिस बिभु दत्ता गुरु
फैसला: 5 अक्टूबर 2026


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