Media24Media.com: सोने की नाव, चांदी का पतवार और इंद्रावती तट पर पूजा, बस्तर में दिखी अनोखी लोकपरंपरा

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सोने की नाव, चांदी का पतवार और इंद्रावती तट पर पूजा, बस्तर में दिखी अनोखी लोकपरंपरा

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 जगदलपुर। बस्तर की समृद्ध जनजातीय संस्कृति और प्रकृति से जुड़ी लोक आस्था की अनूठी झलक ग्राम पंचायत घाट कवाली में देखने को मिली। जिला मुख्यालय से करीब 10 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव में नवाखाई यानी ‘नया खानी’ तिहार की तैयारियां शुरू हो गई हैं। पर्व से पहले ग्रामीणों ने पुरखों से चली आ रही परंपरा के अनुसार इंद्रावती नदी के तट पर विशेष पूजा-अनुष्ठान किया।


ग्रामीणों ने इंद्रावती नदी को जीवनदायिनी मानते हुए जल की देवी जलनी आया की विधि-विधान से पूजा की। इस दौरान प्रतीकात्मक रूप से सोने की नाव और चांदी का पतवार अर्पित किया गया। ग्रामीणों ने जलनी आया से गांव में सुख-समृद्धि, अच्छी फसल, उत्तम स्वास्थ्य और नवाखाई तिहार के निर्विघ्न आयोजन की कामना की।


जलनी आया की अनुमति के बाद मनाया जाएगा तिहार

घाट कवाली के ग्रामीणों की मान्यता है कि इंद्रावती नदी और जलनी आया गांव के जीवन का आधार हैं। किसी भी शुभ कार्य से पहले जलनी आया की अनुमति और आशीर्वाद लेना आवश्यक माना जाता है। इसी परंपरा के तहत नदी किनारे विशेष सेवा-अर्जी का आयोजन किया गया।

पूजा में गांव के बैगा, सिरहा, पुजारी और मांझी समेत बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल हुए। पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन के बीच विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद माटी पुजारी और गांव के बुजुर्गों ने सभी ग्रामीणों के कल्याण, भरपूर अन्न-धन और खुशहाली की कामना की।

नई फसल के स्वागत का पर्व है नवाखाई

बस्तर में नवाखाई तिहार का कृषि और लोकजीवन से गहरा संबंध है। नई फसल के घर आने की खुशी में मनाए जाने वाले इस पर्व में खेतों से प्राप्त नई फसल, विशेषकर धान, को सबसे पहले देवी-देवताओं और पूर्वजों को अर्पित करने की परंपरा है। इसके बाद ही ग्रामीण नई फसल का सेवन करते हैं।

घाट कवाली में भी इसी परंपरा के तहत पहले जलनी आया से अनुमति ली गई। पूजा-अनुष्ठान के बाद अब ग्रामीण बुधवार को नवाखाई तिहार मनाने की तैयारी में जुट गए हैं।

आसपास के गांवों से भी पहुंचे ग्रामीण

पारंपरिक घाटजात्रा में घाट कवाली के माटी पुजारी मंगतू कश्यप, ग्राम पटेल लच्छू कश्यप, ग्राम सिरहा सीताराम और श्यामसुंदर कश्यप सहित कुलधर कश्यप, गिरधर कश्यप, लखेश्वर कश्यप, जुगल बघेल, सोनधर निषाद, सोनसाय मौर्य और संपत कश्यप समेत बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे।

इसके अलावा करंजी, भाटपाल, मरलेंगा, केसापुर, सुरीभाटा और किंजोली गांवों से भी ग्रामीण आयोजन में शामिल हुए। इंद्रावती नदी के तट पर हुए इस पारंपरिक अनुष्ठान में बस्तर की उस सांस्कृतिक विरासत की झलक देखने को मिली, जिसमें प्रकृति, कृषि और लोक आस्था का गहरा जुड़ाव है।

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