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सोने की नाव, चांदी का पतवार और इंद्रावती तट पर पूजा, बस्तर में दिखी अनोखी लोकपरंपरा

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 जगदलपुर। बस्तर की समृद्ध जनजातीय संस्कृति और प्रकृति से जुड़ी लोक आस्था की अनूठी झलक ग्राम पंचायत घाट कवाली में देखने को मिली। जिला मुख्यालय से करीब 10 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव में नवाखाई यानी ‘नया खानी’ तिहार की तैयारियां शुरू हो गई हैं। पर्व से पहले ग्रामीणों ने पुरखों से चली आ रही परंपरा के अनुसार इंद्रावती नदी के तट पर विशेष पूजा-अनुष्ठान किया।


ग्रामीणों ने इंद्रावती नदी को जीवनदायिनी मानते हुए जल की देवी जलनी आया की विधि-विधान से पूजा की। इस दौरान प्रतीकात्मक रूप से सोने की नाव और चांदी का पतवार अर्पित किया गया। ग्रामीणों ने जलनी आया से गांव में सुख-समृद्धि, अच्छी फसल, उत्तम स्वास्थ्य और नवाखाई तिहार के निर्विघ्न आयोजन की कामना की।


जलनी आया की अनुमति के बाद मनाया जाएगा तिहार

घाट कवाली के ग्रामीणों की मान्यता है कि इंद्रावती नदी और जलनी आया गांव के जीवन का आधार हैं। किसी भी शुभ कार्य से पहले जलनी आया की अनुमति और आशीर्वाद लेना आवश्यक माना जाता है। इसी परंपरा के तहत नदी किनारे विशेष सेवा-अर्जी का आयोजन किया गया।

पूजा में गांव के बैगा, सिरहा, पुजारी और मांझी समेत बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल हुए। पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन के बीच विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद माटी पुजारी और गांव के बुजुर्गों ने सभी ग्रामीणों के कल्याण, भरपूर अन्न-धन और खुशहाली की कामना की।

नई फसल के स्वागत का पर्व है नवाखाई

बस्तर में नवाखाई तिहार का कृषि और लोकजीवन से गहरा संबंध है। नई फसल के घर आने की खुशी में मनाए जाने वाले इस पर्व में खेतों से प्राप्त नई फसल, विशेषकर धान, को सबसे पहले देवी-देवताओं और पूर्वजों को अर्पित करने की परंपरा है। इसके बाद ही ग्रामीण नई फसल का सेवन करते हैं।

घाट कवाली में भी इसी परंपरा के तहत पहले जलनी आया से अनुमति ली गई। पूजा-अनुष्ठान के बाद अब ग्रामीण बुधवार को नवाखाई तिहार मनाने की तैयारी में जुट गए हैं।

आसपास के गांवों से भी पहुंचे ग्रामीण

पारंपरिक घाटजात्रा में घाट कवाली के माटी पुजारी मंगतू कश्यप, ग्राम पटेल लच्छू कश्यप, ग्राम सिरहा सीताराम और श्यामसुंदर कश्यप सहित कुलधर कश्यप, गिरधर कश्यप, लखेश्वर कश्यप, जुगल बघेल, सोनधर निषाद, सोनसाय मौर्य और संपत कश्यप समेत बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे।

इसके अलावा करंजी, भाटपाल, मरलेंगा, केसापुर, सुरीभाटा और किंजोली गांवों से भी ग्रामीण आयोजन में शामिल हुए। इंद्रावती नदी के तट पर हुए इस पारंपरिक अनुष्ठान में बस्तर की उस सांस्कृतिक विरासत की झलक देखने को मिली, जिसमें प्रकृति, कृषि और लोक आस्था का गहरा जुड़ाव है।

सरहुल-करमा की थाप पर झूम उठा लोकरंग पर्व, लोकसंस्कृति के रंगों से सजा समापन

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पहली बार लोकरंग पर्व में दिखी सरगुजा-जशपुर अंचल की आदिवासी लोकसंस्कृति की मनमोहक झलक, पंथी और नाचा-गम्मत ने भी मोहा दर्शकों का मन

रायपुर- छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकपरंपराओं, लोककलाओं और सांस्कृतिक विरासत को मंच प्रदान करने वाले तीन दिवसीय ‘लोकरंग पर्व’ का तीसरा एवं अंतिम दिन सरगुजा-जशपुर अंचल की आदिवासी लोकसंस्कृति के नाम रहा। पहली बार लोकरंग पर्व के मंच पर जशपुर अंचल के सरहुल एवं करमा नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति ने दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित किया। पारंपरिक वेशभूषा, लोकधुनों की मधुरता और कलाकारों के ऊर्जावान नृत्य ने पूरे वातावरण को उत्साह और उमंग से भर दिया।

कार्यक्रम में विजय कुमार भगत, जशपुर के दल द्वारा सरहुल एवं करमा नृत्य की प्रस्तुति दी गई। आदिवासी लोकजीवन, प्रकृति और सामुदायिक परंपराओं से जुड़े इन लोकनृत्यों ने दर्शकों को छत्तीसगढ़ के जनजातीय अंचलों की सांस्कृतिक विविधता से परिचित कराया। कलाकारों की सामूहिक प्रस्तुति, पारंपरिक लय और आकर्षक वेशभूषा ने कार्यक्रम में विशेष रंग भर दिया।

इसके साथ ही रायपुर के डॉ. रामनारायण नेताम ने आदिवासी लोकगीत एवं नृत्य की प्रस्तुति दी।  नवलदास मानिकपुरी, दुर्ग ने लोकगीत-संगीत से समां बांधा। वहीं आरती बारले, भिलाई ने पंथी नृत्य की ऊर्जापूर्ण प्रस्तुति देकर दर्शकों की खूब तालियां बटोरीं। रमादत्त जोशी, रायपुर की नाचा-गम्मत की प्रस्तुति ने हास्य, मनोरंजन और लोकनाट्य के रंगों से कार्यक्रम को और जीवंत बना दिया।

लोककलाओं को मंच देना हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी : डॉ. कन्नौजे

लोकरंग पर्व के समापन अवसर पर संस्कृति एवं पुरातत्व संचालक डॉ. संजय कन्नौजे ने कहा कि छत्तीसगढ़ के सुदूर जनजातीय अंचलों सहित राज्य के विभिन्न क्षेत्रों से आए स्थानीय कलाकारों ने अपनी-अपनी लोककलाओं की शानदार प्रस्तुतियां दीं। ऐसे आयोजन कलाकारों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने के साथ-साथ प्रोत्साहन और सम्मानजनक मंच उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उन्होंने कहा कि लोकरंग पर्व जैसे सांस्कृतिक आयोजन छत्तीसगढ़ की समृद्ध और सुघर लोकसंस्कृति को सहेजने तथा उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रभावी माध्यम हैं। लोकगीत, लोकनृत्य, लोकनाट्य और पारंपरिक कलाओं के माध्यम से युवा पीढ़ी अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ती है। ऐसे आयोजनों से स्थानीय कलाकारों को मंच मिलने के साथ ही विलुप्त होती लोकविधाओं के संरक्षण एवं संवर्धन को भी प्रोत्साहन मिलता है।

लोकविरासत के विविध रंगों का संगम बना लोकरंग

तीन दिनों तक चले लोकरंग पर्व में छत्तीसगढ़ के विभिन्न अंचलों की लोकसंस्कृति, लोकगायन और लोकनृत्य की विविध परंपराओं को मंच मिला। अंतिम दिन सरहुल, करमा, आदिवासी लोकगीत, पंथी और नाचा-गम्मत जैसी प्रस्तुतियों ने यह संदेश दिया कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान उसकी विविध लोकपरंपराओं में निहित है।

कार्यक्रम में संस्कृति एवं पुरातत्व संचालक डॉ. संजय कन्नौजे, छत्तीसगढ़ के कवि मीर अली मीर, वरिष्ठ पत्रकार एवं छायाकार दीपेंद्र दीवान, साहित्यकार विजय मिश्रा, फिल्म बोर्ड की सदस्य प्रसन्ना अवस्थी तथा समाजसेवी उदयभान चौहान विशेष रूप से उपस्थित रहे।

लोकरंग पर्व का अंतिम दिन दर्शकों के लिए छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति की विविधता और जीवंतता को करीब से अनुभव करने का अवसर बना। कलाकारों की प्रस्तुतियों पर दर्शकों ने तालियों के साथ उत्साहवर्धन किया। आयोजन ने एक ओर जहां लोककलाकारों को सम्मानजनक मंच उपलब्ध कराया, वहीं दूसरी ओर छत्तीसगढ़ की लोकपरंपराओं को सहेजने, संवारने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का सार्थक संदेश दिया।

आस्था, परंपरा और भव्यता के रंग में सजेगा ऐतिहासिक बस्तर दशहरा

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75 दिवसीय पर्व को यूनेस्को की सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल कराने का संकल्प, बलराम मांझी बने दशहरा समिति के नए उपाध्यक्ष

रायपुर- ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का अनूठा संगम विश्वप्रसिद्ध 75 दिवसीय बस्तर दशहरा पर्व 2026 इस वर्ष भी पूरी भव्यता, आस्था और पारंपरिक गरिमा के साथ मनाया जाएगा। पर्व की तैयारियों, पूजा विधान, सुरक्षा व्यवस्था, वित्तीय प्रबंधन और विभिन्न आयोजनों को लेकर मंगलवार को कलेक्टोरेट के प्रेरणा कक्ष में बस्तर दशहरा समिति की महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। बैठक की अध्यक्षता बस्तर सांसद एवं दशहरा समिति के अध्यक्ष महेश कश्यप ने की।

बैठक में बस्तर राजपरिवार के कमलचंद भंजदेव, कलेक्टर आकाश छिकारा, पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा, जिला पंचायत सीईओ तन्मय खन्ना, दंतेवाड़ा से मां दंतेश्वरी के पुजारी जिया बाबा सहित समस्त मांझी-चालकी, मेंबर-मेंबरीन, पुजारी, प्रशासनिक अधिकारी एवं टेम्पल स्टेट समिति के सदस्य उपस्थित रहे।

बलराम मांझी निर्विरोध नहीं, बहुमत से चुने गए नए उपाध्यक्ष

बैठक की शुरुआत औपचारिक प्रक्रियाओं के साथ हुई। इसके बाद बस्तर दशहरा समिति के उपाध्यक्ष पद के लिए निर्वाचन कराया गया। बचेली परगना के बीरो मांझी ने अर्जुन मांझी के नाम का प्रस्ताव रखा, जबकि सोनाबाल परगना के समुन्द मांझी ने बलराम मांझी के नाम का प्रस्ताव किया। सदस्यों द्वारा हाथ उठाकर मतदान की प्रक्रिया अपनाई गई, जिसमें स्पष्ट बहुमत के आधार पर बलराम मांझी को बस्तर दशहरा समिति का नया उपाध्यक्ष निर्वाचित घोषित किया गया।

नवनिर्वाचित उपाध्यक्ष बलराम मांझी ने देवसराय सहित अन्य महत्वपूर्ण स्थलों की व्यवस्थाओं को और बेहतर बनाने के संबंध में सुझाव दिए।

केवल पर्व नहीं, विश्व की अनूठी सांस्कृतिक विरासत

बैठक को संबोधित करते हुए सांसद एवं दशहरा समिति के अध्यक्ष महेश कश्यप ने कहा कि बस्तर दशहरा केवल धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह सामाजिक समरसता, जनभागीदारी और विश्व की अनूठी सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। उन्होंने पर्व की व्यवस्थाओं को और सुदृढ़ बनाने के लिए एनएमडीसी प्रबंधन से सीएसआर मद के अंतर्गत प्रतिवर्ष कम से कम डेढ़ करोड़ रुपये की स्थायी वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने की मांग करने की बात कही।

उन्होंने बताया कि बस्तर दशहरा के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचार-प्रसार को लेकर केंद्रीय मंत्रियों से सकारात्मक चर्चा हुई है। सांसद ने कहा कि 75 दिनों तक चलने वाले इस विशिष्ट पर्व की मौलिकता और परंपरागत स्वरूप को बनाए रखना सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।

उन्होंने पर्व अवधि के दौरान समानांतर आयोजनों की अनुमति नहीं देने, देवस्थलों में आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित करने तथा प्रमुख पूजा विधान स्थलों पर सुरक्षा रेलिंग और पक्की बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने पर जोर दिया।

यूनेस्को की सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल कराने का साझा संकल्प

बस्तर राजपरिवार के सदस्य एवं माटी पुजारी कमलचंद भंजदेव ने बस्तर दशहरा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वर्ष 1423 से निरंतर चली आ रही यह परंपरा मैसूर और कुल्लू दशहरा से भी प्राचीन है। उन्होंने बस्तर दशहरा को यूनेस्को की सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल कराने के लिए सामूहिक प्रयास और साझा संकल्प को दोहराया।

उन्होंने मावली परघाव के लिए संबंधित स्थलों एवं मार्गों की विशेष साफ-सफाई, देवी-देवताओं और आंगा देव के सम्मानपूर्वक आगमन की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित करने पर जोर दिया। साथ ही मांझी-चालकी से पर्व के दौरान पारंपरिक वेशभूषा एवं पगड़ी धारण करने का आग्रह किया।

भंजदेव ने मेंबर-मेंबरीन के योगदान को महत्वपूर्ण बताते हुए मेंबरीन के मासिक मानदेय में वृद्धि करने का प्रस्ताव भी दशहरा समिति के समक्ष रखा।

1.21 करोड़ रुपये का बजट प्रस्तावित

बैठक में दशहरा समिति के सचिव एवं तहसीलदार ने बस्तर दशहरा पर्व के लिए एक करोड़ 21 लाख रुपये का बजट प्रस्तावित किया। उन्होंने पर्व के दौरान संपन्न होने वाले विभिन्न पूजा विधानों और उनसे जुड़ी व्यवस्थाओं की जानकारी समिति के सदस्यों को दी।

बैठक में पूजा स्थलों, मार्गों, देवस्थलों, स्वच्छता, पेयजल, प्रकाश व्यवस्था, सुरक्षा तथा श्रद्धालुओं की सुविधा से जुड़े विषयों पर भी चर्चा हुई। पर्व की विशिष्ट परंपराओं को अक्षुण्ण रखते हुए आधुनिक सुविधाओं और बेहतर प्रशासनिक समन्वय के साथ आयोजन को सफल बनाने पर विशेष जोर दिया गया।

शांतिपूर्ण और सुव्यवस्थित आयोजन के लिए प्रशासन तैयार

कलेक्टर आकाश छिकारा और पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा ने बस्तर दशहरा पर्व को शांतिपूर्ण, सुव्यवस्थित और भव्य रूप से संपन्न कराने के लिए प्रशासनिक तैयारियों और विभिन्न विभागों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर अपने विचार रखे। उन्होंने पर्व से जुड़े सभी प्रमुख स्थलों पर आवश्यक व्यवस्थाएं समय पर पूर्ण करने तथा सुरक्षा और यातायात प्रबंधन को प्रभावी बनाए रखने पर जोर दिया।

बैठक में मौजूद मांझी-चालकी, पुजारी, मेंबर-मेंबरीन और समिति के सदस्यों ने भी विभिन्न पूजा विधान एवं आयोजन से जुड़ी व्यवस्थाओं के संबंध में सुझाव दिए। इस प्रकार बैठक में बस्तर दशहरा की ऐतिहासिक परंपरा, जनभागीदारी, धार्मिक आस्था और आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्थाओं के समन्वय के साथ वर्ष 2026 के पर्व को भव्य एवं गरिमापूर्ण ढंग से आयोजित करने की रूपरेखा पर व्यापक चर्चा हुई।

राष्ट्रपति भवन के विशेष अतिथि बने बस्तर के मांझी-चालकी : बस्तर पंडुम-2026 के विजेताओं और जनजातीय प्रतिनिधियों का हुआ विशेष सम्मान

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बस्तर आज शांति, विकास और समृद्धि की नई दिशा में आगे बढ़ रहा है : राष्ट्रपति  द्रौपदी मुर्मु

राष्ट्रपति भवन में पहली बार बस्तर की जनजातीय संस्कृति का ऐसा वैभव देखने को मिला : केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह

राष्ट्रपति ने स्वयं अतिथियों को भोजन परोसकर किया उनका सम्मान

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने जताई बस्तर दशहरा और बस्तर पंडुम में शामिल होने की इच्छा

मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में पहुँचा 209 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल, राष्ट्रपति को भेंट की 300 वर्ष पुरानी 'झिटकू-मिटकी' की अनुपम कलाकृति

रायपुर- बस्तर की लोकसंस्कृति, जनजातीय परंपराओं और सामाजिक नेतृत्व की गौरवशाली विरासत ने आज राष्ट्रपति भवन में इतिहास रच दिया। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में बस्तर पंडुम-2026 के विजेता प्रतिभागियों, परंपरागत जनजातीय नेतृत्व व्यवस्था के प्रतिनिधियों, पद्मश्री सम्मानित विभूतियों एवं विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधियों सहित 209 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल का राष्ट्रपति भवन में आत्मीय स्वागत किया गया।


इस अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने बस्तर पंडुम-2026 के विजेताओं, परगना मांझी, मांझी, चालकी तथा पद्मश्री सम्मानित विभूतियों के सम्मान में विशेष भोज का आयोजन किया। भारतीय लोकतांत्रिक परंपरा में अत्यंत दुर्लभ और आत्मीय दृश्य तब देखने को मिला, जब राष्ट्रपति ने स्वयं सभी अतिथियों को भोजन परोसकर उनका सम्मान किया। राष्ट्रपति की इस सहज आत्मीयता ने पूरे प्रतिनिधिमंडल को भावविभोर कर दिया।

प्रतिनिधिमंडल में उप मुख्यमंत्री एवं गृहमंत्री विजय शर्मा, संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री राजेश अग्रवाल, बस्तर के पारंपरिक जनजातीय नेतृत्व के प्रतिनिधि, बस्तर पंडुम-2026 के विजेता कलाकार, पद्मश्री सम्मानित विभूतियाँ, जनप्रतिनिधि तथा वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी शामिल रहे।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों से आत्मीय संवाद करते हुए बस्तर की जनजातीय संस्कृति, लोककला, पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था, मांझी-चालकी प्रणाली तथा बस्तर पंडुम के आयोजन के बारे में विस्तार से जानकारी ली। उन्होंने कलाकारों और जनजातीय प्रतिनिधियों के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि बस्तर की सांस्कृतिक विरासत भारत की अमूल्य धरोहर है और उसका संरक्षण पूरे देश का दायित्व है।

राष्ट्रपति ने जताई बस्तर आने की इच्छा

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के आग्रह पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने भविष्य में बस्तर दशहरा एवं बस्तर पंडुम में सम्मिलित होने की इच्छा व्यक्त की। उन्होंने कहा कि बस्तर दशहरा उनके हृदय को विशेष रूप से स्पर्श करता है। राष्ट्रपति ने भगवान जगन्नाथ की काष्ठ निर्मित प्रतिमा तथा बस्तर दशहरा की अद्वितीय परंपराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि उनका बस्तर दशहरा से विशेष आत्मीय संबंध रहा है।

राष्ट्रपति ने कहा कि मांझी उनके परिवार का हिस्सा हैं और उनके पिता भी मांझी थे। उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज की परंपरागत नेतृत्व व्यवस्था सामाजिक एकता, सामुदायिक सहभागिता और सांस्कृतिक संरक्षण की सशक्त आधारशिला है।

बस्तर पंडुम ने संस्कृति को दिलाई नई पहचान

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा कि बस्तर पंडुम  छत्तीसगढ़ की समृद्ध जनजातीय परंपराओं, लोककलाओं और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उत्सव है। उन्होंने कहा कि इस आयोजन ने बस्तर की वास्तविक सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई प्रतिष्ठा प्रदान की है। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के साथ-साथ पर्यटन, स्थानीय रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को भी नई गति प्रदान करते हैं। 

राष्ट्रपति मुर्मु ने विश्वास व्यक्त किया कि बस्तर के कलाकार, शिल्पकार और युवा अपनी सांस्कृतिक अस्मिता को सुरक्षित रखते हुए राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहेंगे।

बस्तर विकास और शांति की नई पहचान बन रहा है

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा कि सरकार के सतत प्रयासों और स्थानीय जनभागीदारी के परिणामस्वरूप बस्तर आज शांति, विकास और समृद्धि की नई दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने शिक्षा, सड़क, बिजली, पेयजल तथा अन्य आधारभूत सुविधाओं के विस्तार की सराहना करते हुए कहा कि बस्तर में आया यह सकारात्मक परिवर्तन पूरे देश के लिए प्रसन्नता और गर्व का विषय है।उन्होंने मांझी एवं चालकी की भूमिका की विशेष प्रशंसा करते हुए कहा कि वे समाज और प्रशासन के बीच प्रभावी सेतु के रूप में कार्य करते हुए सामाजिक समरसता तथा सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण में उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं।

पहली बार राष्ट्रपति भवन में दिखा बस्तर का ऐसा वैभव - केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह

इस अवसर पर केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने कहा कि वे अनेक अवसरों पर राष्ट्रपति भवन आए हैं, किंतु पहली बार उन्होंने राष्ट्रपति भवन में बस्तर की पारंपरिक आदिवासी वेशभूषा में इतने बड़े प्रतिनिधिमंडल को एक साथ देखा है। उन्होंने कहा कि यह दृश्य भारत की सांस्कृतिक विविधता और जनजातीय गौरव का अद्भुत प्रतीक है।

मुख्यमंत्री बोले – यह पूरे छत्तीसगढ़ के लिए गौरव का क्षण

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से बस्तर के प्रतिनिधिमंडल की यह आत्मीय भेंट पूरे छत्तीसगढ़, विशेषकर बस्तर अंचल के लिए अत्यंत गौरव और सम्मान का विषय है। उन्होंने कहा कि आज बस्तर की समृद्ध जनजातीय संस्कृति, लोक परंपराएँ और सांस्कृतिक विरासत देश के सर्वोच्च संवैधानिक मंच पर सम्मानित हुई हैं।

मुख्यमंत्री ने कहा कि बस्तर आज शांति, विकास और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की नई पहचान के साथ आगे बढ़ रहा है। बस्तर पंडुम जैसे आयोजनों ने जनजातीय संस्कृति को राष्ट्रीय स्तर पर नई प्रतिष्ठा दिलाई है तथा स्थानीय कलाकारों, लोक परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहर को नया मंच प्रदान किया है।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का जनजातीय समाज और उसकी संस्कृति से गहरा आत्मीय जुड़ाव है। उनके अनुभव, स्नेह और मार्गदर्शन से बस्तर की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन को नई दिशा मिलेगी।

मुख्यमंत्री ने राष्ट्रपति को बस्तर आने का निमंत्रण देते हुए कहा कि उनके आगमन से बस्तर की सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर और व्यापक पहचान मिलेगी तथा जनजातीय समाज का उत्साह और बढ़ेगा।

प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति भवन का भ्रमण भी किया तथा भारत की लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक विरासत से जुड़े विभिन्न ऐतिहासिक स्थलों और महत्वपूर्ण जानकारियों से अवगत हुआ।

राष्ट्रपति को भेंट की गई बस्तर की 300 वर्ष पुरानी 'झिटकू-मिटकी' की अनुपम कलाकृति

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को बस्तर की लगभग 300 वर्ष पुरानी लोकगाथा 'झिटकू-मिटकी' पर आधारित विशेष कलाकृति स्मृति-चिह्न स्वरूप भेंट की। यह कलाकृति बस्तर की जनजातीय संस्कृति, प्रेम, समर्पण, लोकआस्था और सामाजिक सौहार्द का प्रतीक मानी जाती है।

लोकमान्यता के अनुसार कठिन अकाल के समय झिटकू और मिटकी ने अपने प्रेम, त्याग और समर्पण की ऐसी अमिट मिसाल प्रस्तुत की कि उन्हें देवतुल्य सम्मान प्राप्त हुआ। आज भी बस्तर अंचल में झिटकू को 'खोड़िया राजा' तथा मिटकी को 'गप्पा देई' के रूप में श्रद्धापूर्वक पूजा जाता है।

इस अवसर पर मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह, सचिव राहुल भगत, विशेष सचिव रजत बंसल, संस्कृति विभाग के सचिव डॉ. एस. भारतीदासन, बस्तर संभाग के आयुक्त डोमन सिंह, संस्कृति एवं राजभाषा विभाग के संचालक संजय कन्नौजे सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

CG NEWS : संस्कृति सहेजने और कर्ज से बचाने बैगा समाज का बड़ा फैसला: शादियों में डीजे और शराब पर पूर्ण प्रतिबंध

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 कबीरधाम : विशेष संरक्षित जनजाति और 'राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र' माने जाने वाले बैगा समाज ने अपनी पारंपरिक संस्कृति को बचाने, फिजूलखर्ची रोकने तथा गरीब परिवारों को कर्ज के बोझ से उबारने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल की है। समाज ने शादी-ब्याह, छठी और अन्य सामाजिक आयोजनों में डीजे बजाने और शराब परोसने पर पूर्ण प्रतिबंध (बैन) लगा दिया है।


कबीरधाम जिले के ग्राम हरमों में आयोजित बैगा समाज (सेक्टर भोरमदेव) की विशेष बैठक में सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया। बैठक में सामाजिक पदाधिकारियों ने कहा कि डीजे और बढ़ते दिखावे के कारण गरीब परिवारों पर अनावश्यक आर्थिक दबाव बढ़ रहा था। कई परिवारों को शादी निपटाने के लिए कर्ज लेना पड़ता था, जिससे आगे चलकर जमीन बिकने और पारिवारिक विवाद जैसी गंभीर स्थितियां पैदा होती थीं।

डीजे की जगह गूंजेगी मांदर और नगाड़े की थाप

समाज ने आधुनिक डीजे संस्कृति को नकारते हुए अपनी पारंपरिक संस्कृति की ओर लौटने का संकल्प लिया है। अब किसी भी मांगलिक या सामाजिक आयोजन में डीजे नहीं बजेगा। इसके स्थान पर बैगा समाज की पारंपरिक पहचान रहे मांदर और नगाड़ा की धुनों को फिर से बढ़ावा दिया जाएगा।

दशगात्र (मृत्यु संस्कार) के लिए सामूहिक सहयोग की नई व्यवस्था

बैगा समाज ने आपसी एकजुटता और शोकाकुल परिवार को संबल देने के लिए दशगात्र संस्कार के नियमों में भी बड़ा बदलाव किया है। नई व्यवस्था के तहत सेक्टर के किसी भी गांव में किसी सदस्य की मृत्यु होने पर:

  • प्रत्येक घर से 20 रुपये नकद और
  • एक पैली (लगभग 4 से 5 किलोग्राम) चावल सहयोग स्वरूप अनिवार्य रूप से दिया जाएगा।

नशामुक्ति की ओर कदम

सामाजिक वातावरण को सुधारने और आर्थिक तंगी से निपटने के लिए किसी भी आयोजन में शराब परोसने पर रोक लगा दी गई है। पदाधिकारियों का मानना है कि नशाखोरी के कारण न केवल परिवारों की आर्थिक स्थिति बदहाल होती है, बल्कि समाज का माहौल भी खराब होता है।

एक नज़र में: बैगा जनजाति

छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले के जंगलों में सर्वाधिक निवास करने वाली बैगा जनजाति को 'राष्ट्रपति का दत्तक पुत्र' का दर्जा प्राप्त है। जिले में इनकी कुल जनसंख्या लगभग 60 हजार के आसपास है।

लाल किला मैदान से गूंजा जनजातीय गौरव का स्वर

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राष्ट्रीय जनजाति सांस्कृतिक समागम में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय बोले – जनजातीय समाज दुनिया को सिखा सकता है प्रकृति संग विकास

भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती वर्ष पर राष्ट्रीय समागम में देशभर से जुटे हजारों जनजातीय प्रतिनिधि

जनजातीय भाषा, संस्कृति और पहचान के संरक्षण पर मुख्यमंत्री ने दिया विशेष जोर

जनजातीय समाज भारत की सांस्कृतिक आत्मा का सबसे प्राचीन और जीवंत स्वरूप - मुख्यमंत्री साय 

नई दिल्ली- देश की राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किला मैदान में रविवार को जनजातीय अस्मिता, सांस्कृतिक गौरव और सामाजिक चेतना का विराट संगम देखने को मिला, जब भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती वर्ष के अवसर पर आयोजित राष्ट्रीय जनजाति सांस्कृतिक समागम में देशभर से हजारों जनजातीय प्रतिनिधि, युवा, सामाजिक कार्यकर्ता तथा पारंपरिक समुदायों के लोग एक मंच पर एकत्र हुए। जनजाति सुरक्षा मंच एवं जनजाति जागृति समिति द्वारा आयोजित इस भव्य कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की उपस्थिति ने कार्यक्रम को विशेष महत्व प्रदान किया। मुख्यमंत्री साय के साथ छत्तीसगढ़ सरकार के मंत्री केदार कश्यप एवं रामविचार नेताम भी उपस्थित थे। 

कार्यक्रम स्थल पर दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय से सौजन्य भेंट की। लाल किले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, पारंपरिक वेशभूषा, लोक वाद्ययंत्रों और जनजातीय संस्कृति के विविध रंगों से सजा यह आयोजन केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारत की मूल सांस्कृतिक चेतना और जनजातीय पहचान के संरक्षण का राष्ट्रीय संदेश बनकर उभरा।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कार्यक्रम में देशभर से आए जनजातीय समाज के प्रतिनिधियों और लोगों से आत्मीय मुलाकात की तथा अपने संबोधन में कहा कि जनजातीय समाज केवल प्रकृति का रक्षक नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा का सबसे प्राचीन और जीवंत स्वरूप है। उन्होंने कहा कि सदियों से जल, जंगल और जमीन की रक्षा करते हुए जनजातीय समाज ने प्रकृति और मानव जीवन के बीच संतुलन बनाए रखने का कार्य किया है। आज जब पूरी दुनिया पर्यावरण संकट और असंतुलित विकास की चुनौतियों से जूझ रही है, तब जनजातीय जीवन दर्शन मानवता को टिकाऊ और प्रकृति-सम्मत विकास का रास्ता दिखा सकता है। मुख्यमंत्री ने कहा कि जनजातीय समाज सदियों से प्रकृति के साथ सहअस्तित्व और संतुलन का जीवन जीता आया है तथा उनकी संस्कृति और परंपराएं भारत की अमूल्य धरोहर हैं।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि छत्तीसगढ़ की पहचान उसकी समृद्ध जनजातीय संस्कृति से गहराई से जुड़ी हुई है। छत्तीसगढ़ में  लगभग 44 प्रतिशत भू-भाग वनाच्छादित है, जो केवल प्राकृतिक संपदा का प्रतीक नहीं, बल्कि जनजातीय जीवन, संस्कृति और परंपरा का जीवंत आधार भी है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर राष्ट्र निर्माण तक जनजातीय समाज का योगदान अतुलनीय रहा है। भगवान बिरसा मुंडा तथा छत्तीसगढ़ के अमर शहीद वीर नारायण सिंह जैसे महानायकों ने अपनी संस्कृति, स्वाभिमान और अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष, साहस और बलिदान का अद्वितीय इतिहास रचा है, जो नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि उनकी सरकार जनजातीय संस्कृति, परंपराओं और जीवन मूल्यों के संरक्षण तथा संवर्धन के लिए निरंतर कार्य कर रही है। उन्होंने बताया कि ‘आदि परब’, बस्तर पंडुम और बस्तर ओलंपिक जैसे आयोजन केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि जनजातीय प्रतिभा, परंपरा, खेलकौशल और पहचान को राष्ट्रीय मंच देने का सशक्त प्रयास हैं। उन्होंने कहा कि इन आयोजनों के माध्यम से जनजातीय समाज की सांस्कृतिक शक्ति, सामूहिकता और प्रतिभा को नई पहचान मिल रही है तथा युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़ने की प्रेरणा भी प्राप्त हो रही है।मुख्यमंत्री साय ने कहा कि किसी भी समाज की संस्कृति उसकी भाषा से जीवित रहती है, इसलिए छत्तीसगढ़ सरकार जनजातीय भाषाओं और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है। उन्होंने बताया कि गोंडी, हल्बी और सादरी जैसी जनजातीय भाषाओं में बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा देने की दिशा में विशेष पहल की जा रही है, ताकि नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा, सांस्कृतिक जड़ों और पारंपरिक ज्ञान से जुड़ी रह सके। उन्होंने कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह किसी समाज की पहचान, इतिहास और सामूहिक स्मृति का आधार भी होती है।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने आगे कहा कि बस्तर से सरगुजा तक देवगुड़ी जैसे पारंपरिक आस्था केंद्रों के संरक्षण और विकास का कार्य तेजी से किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना केवल परंपरा को बचाने का कार्य नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने और उनकी पहचान को मजबूत बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है। राज्य सरकार इस दिशा में संवेदनशीलता और प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रही है।

कार्यक्रम के दौरान देश के विभिन्न राज्यों से आए जनजातीय कलाकारों ने पारंपरिक नृत्य, लोक संगीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से भारत की समृद्ध जनजातीय विरासत की जीवंत झलक प्रस्तुत की। लाल किला मैदान  मांदर, ढोल, पारंपरिक लोकधुनों और सांस्कृतिक उत्साह से गूंजता रहा। विविध जनजातीय परंपराओं, रंगों, वेशभूषाओं और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों से सजा यह आयोजन देश की विविधता में एकता और सांस्कृतिक समृद्धि का प्रभावशाली प्रतीक बनकर सामने आया।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि जनजातीय समाज केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि भारत के भविष्य की भी महत्वपूर्ण शक्ति है। उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज का जीवन दर्शन, प्रकृति के प्रति सम्मान, सामुदायिक जीवन की भावना और सांस्कृतिक अनुशासन आधुनिक विकास मॉडल को मानवीय और संतुलित दिशा दे सकते हैं। लाल किला मैदान में आयोजित यह राष्ट्रीय जनजाति सांस्कृतिक समागम केवल एक आयोजन बनकर सीमित नहीं रहा, बल्कि जनजातीय समाज की एकता, स्वाभिमान, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और प्रकृति-सम्मत विकास के राष्ट्रीय संकल्प का सशक्त घोष बनकर उभरा।

खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स के लिए खिलाड़ियों का छत्तीसगढ़ पहुंचना शुरू

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अरुणाचल के वेटलिफ्टरों का विमानतल पर रंगारंग स्वागत 

रायपुर- खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स में भागीदारी के लिए खिलाड़ियों का छत्तीसगढ़ पहुंचना शुरू हो गया है। आज सवेरे अरुणाचल प्रदेश के वेटलिफ्टरों का 14 सदस्यीय दल रायपुर पहुंचा। इनमें 13 खिलाड़ी और एक सपोर्टिंग स्टॉफ शामिल है।

खिलाड़ियों के छत्तीसगढ़ आगमन पर रायपुर के स्वामी विवेकानंद विमानतल पर राऊत नाचा दल की रंगारंग प्रस्तुतियों के बीच खेल एवं युवा कल्याण विभाग तथा साई (SAI) के अधिकारियों ने गुलाब भेंटकर सभी खिलाड़ियों का हार्दिक स्वागत किया। 23 मार्च को कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के खिलाड़ी बड़ी संख्या में रायपुर पहुंचेंगे।

देश में पहली बार खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स का आयोजन छत्तीसगढ़ के तीन शहरों - रायपुर, अंबिकापुर और जगदलपुर में किया गया है। इसमें देशभर के करीब तीन हजार जनजातीय खिलाड़ी अपनी प्रतिभा दिखाएंगे। 25 मार्च से 3 अप्रैल तक छत्तीसगढ़वासियों को सात खेलों में रोमांचक मुकाबले देखने को मिलेंगे। इस दौरान पुरूष और महिला वर्गों में हॉकी, फुटबॉल, कुश्ती, एथलेटिक्स, तैराकी, तीरंदाजी और वेटलिफ्टिंग की प्रतियोगिताएं होंगी।


सरहुल उत्सव जनजातीय संस्कृति की विशिष्ट धरोहर, इसे संजोकर रखना हम सबकी जिम्मेदारी – मुख्यमंत्री विष्णु देव साय

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रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णु देव साय आज जशपुर के दीपू बगीचा में आयोजित पारंपरिक सरहुल महोत्सव में शामिल हुए। इस अवसर पर उन्होंने धरती माता, सूर्य देव एवं साल वृक्ष की विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर प्रदेश की सुख-समृद्धि, उत्तम वर्षा और समृद्ध फसल की कामना की। सरहुल की पारंपरिक रस्म के तहत पूजा कराने वाले बैगा द्वारा मुख्यमंत्री के कान में सरई (साल) फूल खोंचकर शुभ आशीष प्रदान किया गया।

मुख्यमंत्री साय ने जिलेवासियों को सरहुल उत्सव एवं हिंदू नववर्ष की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि सरहुल महोत्सव सदियों से प्रकृति, धरती और जीवन के संतुलन का प्रतीक रहा है। बैगा, पाहन एवं पुजारी द्वारा की जाने वाली पूजा-अर्चना केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और सामूहिक जीवन मूल्यों की अभिव्यक्ति है। उन्होंने कहा कि यह पर्व जनजातीय समाज की समृद्ध सभ्यता और संस्कृति का जीवंत प्रतीक है, जिसे सहेजकर रखना हम सभी की साझा जिम्मेदारी है। मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर कहा कि राज्य सरकार जनजातीय संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए प्रतिबद्ध है। 

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि राज्य सरकार प्रदेश की जनता से किए गए वादों को तेजी से पूरा कर रही है। प्रधानमंत्री आवास योजना के माध्यम से लाखों परिवारों को आवास उपलब्ध कराए जा रहे हैं। महतारी वंदन योजना के तहत अब तक 25 किश्तों में 16 हजार करोड़ रुपए से अधिक की राशि जारी किए जा चुके हैं, जिससे महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण को नई दिशा मिली है। वहीं 3100 रुपए प्रति क्विंटल की दर से धान खरीदी कर किसानों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य दिया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि विधानसभा में प्रस्तुत धर्म स्वातंत्र्य विधेयक भी सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो अवैध धर्मांतरण पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करेगा।

उल्लेखनीय है कि सरहुल परब चैत्र माह में मनाया जाने वाला उरांव समुदाय का प्रमुख पर्व है, जो प्रकृति के नवजीवन और ऋतु परिवर्तन का प्रतीक है। इस पर्व में धरती माता और सूर्य देव के प्रतीकात्मक विवाह के साथ सामूहिक पूजा की जाती है। सरना स्थल पर पारंपरिक विधि से पूजा-अर्चना, प्रसाद वितरण और लोकनृत्य-गीतों के माध्यम से सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान को सुदृढ़ किया जाता है। घर-घर सरई फूल और पवित्र जल का वितरण कर सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।

कार्यक्रम के दौरान पारंपरिक वेशभूषा में सजी 100 से अधिक महिलाओं एवं युवतियों की टोली ने मनमोहक सरहुल नृत्य प्रस्तुत किया। मांदर की गूंजती थाप और उत्साह से भरे वातावरण ने पूरे परिसर को जनजातीय संस्कृति के रंग में रंग दिया, जहां जनसैलाब उमड़ पड़ा और उत्सव का उल्लास चरम पर रहा।

इस अवसर पर अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के राष्ट्रीय अध्यक्ष सत्येंद्र सिंह, राष्ट्रीय महामंत्री योगेश बापट, विधायक गोमती साय, नगर पालिका अध्यक्ष अरविंद भगत, जिला पंचायत उपाध्यक्ष शौर्य प्रताप सिंह जूदेव सहित अनेक जनप्रतिनिधि, प्रशासनिक अधिकारी और बड़ी संख्या में आमजन उपस्थित थे।

नवा रायपुर में परम्परा से पहचान तक ‘आदि परब-2026’ का भव्य आयोजन

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राज्य के चिन्हांकित 43 जनजातियों और उपजातियों की संस्कृति, परिधान और चित्रकला का प्रदर्शन

छत्तीसगढ़ सहित मध्यप्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, महाराष्ट्र और झारखंड के जनजातीय कलाकार होंगे शामिल,सजेगा आदि रंग, परिधान और हाट

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की परिकल्पना और निर्देश पर 13 और 14 मार्च 2026 को नवा रायपुर स्थित आदिम जाति अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान परिसर में ’परम्परा से पहचान तक’ - आदि परब - 2026 का भव्य आयोजन किया जाएगा। छत्तीसगढ़ की समृद्ध जनजातीय संस्कृति, कला और परंपराओं को राष्ट्रीय मंच देने के उद्देश्य से ‘आदि परब-2026’ का भव्य आयोजन किया जा रहा है। 


भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय के सहयोग से आदिम जाति विकास विभाग के अंतर्गत आदिम जाति अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान द्वारा कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा। उक्त आशय की जानकारी आज टीआरटीआई में आयोजित पत्रकारवार्ता के दौरान आदिम जाति विकास विभाग के प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा और प्रशिक्षण संस्थान के संचालक श्रीमती हिना अनिमेष नेताम ने दी।

आदिम जाति विकास विभाग के प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा और आदिवासी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान के संचालक हिना अनिमेष नेताम ने प्रेसवार्ता में बताया कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की परिकल्पना और निर्देश पर ‘आदि परब-2026’ का आयोजन किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि आदिम जाति विकास मंत्री रामविचार नेताम के मार्गदर्शन में विभाग इस आयोजन को सफल बनाने के लिए निरंतर कार्य कर रहा है।

प्रमुख सचिव बोरा ने बताया कि दो दिवसीय इस आयोजन में छत्तीसगढ़ की 43 जनजातियों के साथ-साथ मध्यप्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, महाराष्ट्र और झारखंड के जनजातीय समुदाय भी शामिल होंगे l आयोजन का उद्देश्य जनजातीय पहचान, सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण तथा पारंपरिक ज्ञान के संवर्धन को बढ़ावा देना है।

पहली बार एक मंच पर दिखेंगी 43 जनजातियों की वेशभूषाएँ

प्रमुख सचिव बोरा ने बताया कि इस कार्यक्रम के अंतर्गत “आदि-परिधान जनजातीय अटायर शो” का आयोजन 13 मार्च को सुबह 10.30 बजे से शाम 8 बजे तक और 14 मार्च को शाम 4 बजे से रात 8 बजे तक किया जाएगा। इस आयोजन में राज्य की 43 जनजातीय समुदायों की पारंपरिक वेशभूषा और सांस्कृतिक विशेषताओं को पहली बार एक ही मंच पर प्रदर्शित किया जाएगा। प्राकृतिक रंगों, स्थानीय संसाधनों और हाथों से बने वस्त्रों से तैयार ये परिधान जनजातीय जीवन शैली और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का संदेश देंगे। इसमें भाग लेने के लिए 120 प्रतिभागियों ने ऑनलाइन पंजीयन कराया है। 

‘आदि रंग’ में चित्रकला के माध्यम से जल-जंगल-जमीन का संदेश

प्रमुख सचिव बोरा ने प्रेसवार्ता में बताया कि आदि परब के तहत “आदि रंग - जनजातीय चित्रकला महोत्सव” भी आयोजित होगा। इस महोत्सव में जनजातीय कलाकार अपनी पारंपरिक चित्रकला के माध्यम से जल, जंगल और जमीन के संरक्षण, जनजातीय जीवन दर्शन और पर्यावरणीय चुनौतियों को प्रस्तुत करेंगे। इस कार्यक्रम में 155 प्रतिभागियों ने ऑनलाइन पंजीयन कराया है। चित्रकला प्रतियोगिता 18-30 वर्ष और 30 वर्ष से अधिक आयु वर्ग की दो श्रेणियों में होगी।

दोनों श्रेणी में प्रथम पुरस्कार 20 हजार रुपये, द्वितीय पुरस्कार 15 हजार रुपये और तृतीय पुरस्कार 10 हजार रुपये दिए जाएंगे। साथ ही दोनों आयु वर्गों के 10-10 प्रतिभागियों को 2000 रुपये का सांत्वना पुरस्कार भी दिया जाएगा।

आदि-हाट में मिलेगा जनजातीय हस्तशिल्प और पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद

प्रमुख सचिव बोरा ने बताया कि आयोजन के दौरान “आदि-हाट जनजातीय शिल्प मेला” भी लगाया जाएगा, जिसमें छत्तीसगढ़ के जनजातीय हस्तशिल्प, वनोपज और पारंपरिक उत्पादों का प्रदर्शन और विक्रय किया जाएगा। यहां 14 समूहों द्वारा हस्तशिल्प और पारंपरिक व्यंजनों के स्टॉल लगाए जाएंगे, जहां आगंतुक प्रदेश के पारंपरिक स्वाद का आनंद ले सकेंगे।

यूपीएससी में चयनित जनजातीय युवाओं का होगा सम्मान

प्रमुख सचिव बोरा ने बताया कि कार्यक्रम के दौरान संघ लोक सेवा आयोग परीक्षा 2025 में छत्तीसगढ़ से आदिम जाति विकास विभाग की योजनाओं के सहयोग से चयनित अनुसूचित जनजाति वर्ग के अभ्यर्थी डायमंड सिंह ध्रुव औरअंकित साकनी का सम्मान किया जाएगा। साथ ही इस मौके पर ‘प्रयास’ संस्थान के विद्यार्थियों को विभागीय योजनाओं के तहत लैपटॉप भी वितरित किए जाएंगे।

भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 9वां अंतर्राष्ट्रीय संताल सम्मेलन में शिरकत की

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दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल, 7 मार्च 2026 – भारत की राष्ट्रपति  द्रौपदी मुर्मू  ने आज दार्जिलिंग में आयोजित 9वें अंतर्राष्ट्रीय संताल सम्मेलन में शिरकत की।

राष्ट्रपति ने इस अवसर पर कहा कि संताल समुदाय के लिए यह गर्व की बात है कि हमारे पूर्वज तिलका मांझी ने लगभग 240 साल पहले शोषण के खिलाफ विद्रोह का झंडा उठाया। उनके विद्रोह के लगभग 60 साल बाद, बहादुर भाइयों सिडो-कन्हू और चंद-भैरव, साथ ही बहादुर बहनों फूलो-झानो ने 1855 में संताल हुल का नेतृत्व किया।

राष्ट्रपति ने कहा कि वर्ष 2003 संताल समुदाय के इतिहास में सदैव याद किया जाएगा, क्योंकि उसी वर्ष संताल भाषा को भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया। पिछले वर्ष, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती पर संताल भाषा में लिखित संविधान, ओल चिकी लिपि में जारी किया गया।

राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि वर्ष 1925 में पंडित रघुनाथ मुर्मू ने ओल चिकी लिपि का आविष्कार किया। हाल ही में इस आविष्कार की शताब्दी समारोह के रूप में मनाई गई। उनके योगदान ने संताल भाषियों को अभिव्यक्ति के नए अवसर प्रदान किए। उन्होंने कई नाटकों की रचना की, जैसे “बिदु चंदन”, “खेड़वाल वीर”, “डालेगे धन” और “सिडो-कन्हू - संताल हुल”, जिनके माध्यम से उन्होंने संताल समुदाय में साहित्य और सामाजिक चेतना का प्रकाश फैलाया। राष्ट्रपति ने कहा कि संताल समुदाय के सदस्य अन्य भाषाओं और लिपियों का अध्ययन करें, लेकिन अपनी भाषा से जुड़े रहें।

राष्ट्रपति ने कहा कि जनजातीय समुदायों ने सदियों से अपनी लोक-संगीत, नृत्य और परंपराओं को संरक्षित किया है। उन्होंने प्राकृतिक वातावरण के प्रति संवेदनशीलता को पीढ़ी दर पीढ़ी बनाए रखा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि प्राकृतिक संरक्षण का पाठ भविष्य की पीढ़ियों तक पहुंचाना आवश्यक है। राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि लोक परंपराओं और पर्यावरण को संरक्षित करने के साथ-साथ हमारे जनजातीय समुदायों को आधुनिक विकास को अपनाते हुए प्रगति की यात्रा पर आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि संताल समुदाय सहित जनजातीय समुदाय प्रगति और प्रकृति के बीच संतुलन का उदाहरण प्रस्तुत करेंगे।

राष्ट्रपति ने कहा कि वर्तमान समय की आवश्यकता शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक सशक्तिकरण पर ध्यान केंद्रित करना है। जनजातीय युवा शिक्षा और कौशल विकास के माध्यम से आगे बढ़ें। लेकिन इन प्रयासों में वे अपनी जड़ों को नहीं भूलें। उन्होंने कहा कि हमें अपनी भाषा और संस्कृति का संरक्षण, शिक्षा को प्राथमिकता देने और समाज में एकता और भाईचारे को बनाए रखने का संकल्प करना चाहिए। यह हमें सशक्त समाज और मजबूत भारत बनाने में मदद करेगा।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय करेंगे 13 फरवरी को मैनपाट महोत्सव का शुभारंभ

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भोजपुरी स्टार मनोज तिवारी और बॉलीवुड सिंगर कनिका कपूर की होगी प्रस्तुति 

एडवेंचर स्पोर्ट्स और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से गुलजार होगा छत्तीसगढ़ का शिमला

रायपुर- छत्तीसगढ़ के शिमला और छोटा तिब्बत के नाम से प्रसिद्ध पर्यटन स्थल मैनपाट में मुख्यमंत्री  विष्णु देव साय मैनपाट महोत्सव का शुभारंभ करेंगे। यह महोत्सव रोपाखार जलाशय के समीप 13 से 15 फरवरी तक आयोजित किया जाएगा। इस महोत्सव का आयोजन राज्य शासन के पर्यटन एवं संस्कृति विभाग और जिला प्रशासन द्वारा किया जा रहा है। शुभारंभ कार्यक्रम की अध्यक्षता पर्यटन मंत्री राजेश अग्रवाल करेंगे। 

मैनपाट महोत्सव में लोक गीत और संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिलेगा। 13 फरवरी को भोजपुरी सुपरस्टार मनोज तिवारी प्रस्तुति देंगे। साथ ही, छत्तीसगढ़ी गायक सुनील सोनी और ओडिशा का प्रसिद्ध छऊ नृत्य की प्रस्तुति होगी। 14 फरवरी को छत्तीसगढ़ की सुप्रसिद्ध लोक गायिका अलका चंद्राकर और इंडियन आइडल फेम वैशाली रायकवार अपनी सुरीली आवाज से शाम को यादगार बनाएंगी। 15 फरवरी को महोत्सव का मुख्य आकर्षण बॉलीवुड की मशहूर सिंगर कनिका कपूर होंगी। इसके साथ ही रायगढ़ घराने की कत्थक नृत्यांगना ज्योतिश्री वैष्णव और गायक आयुष नामदेव भी अपनी प्रस्तुति देंगे। इसके साथ ही स्थानीय कलाकार और स्कूली बच्चों के द्वारा भी सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति दी जाएगी। 

जिला प्रशासन द्वारा मैनपाट महोत्सव की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। इस मौके पर  विभिन्न शासकीय विभागों द्वारा विकास प्रदर्शनी लगाई जा रही है, जहां शासन की योजनाओं और स्थानीय उत्पादों जैसे टाऊ और तिब्बती हस्तशिल्प का प्रदर्शन होगा। महोत्सव स्थल पर एडवेंचर एक्टिविटी में पर्यटकों के लिए बोटिंग, साहसिक खेल और पारंपरिक दंगल का आयोजन किया जाएगा। महोत्सव स्थल पर सुरक्षा, पार्किंग और पर्यटकों की सुविधा के लिए व्यापक इंतजाम किए गए हैं। फूड ज़ोन में सरगुजा के पारंपरिक व्यंजनों का आनंद लिया जा सकेगा। 

मैनपाट के प्रमुख आकर्षण

अंबिकापुर मुख्यालय से लगभग 75 किलोमीटर दूर स्थित मैनपाट एक बेहद खूबसूरत हिल स्टेशन है, जोकि समुद्र तल से 3,781 फीट की ऊंचाई पर है। मैनपाट में बड़ा तिब्बती समुदाय बसा है, जहां का थाकपो शेडुप्लिंग मठ मुख्य आकर्षण है। जलजली- यह एक भूगर्भीय आश्चर्य है जहाँ जमीन दलदली है और कूदने पर स्पंज की तरह हिलती है, इसे म्यूजिकल लैंड भी कहते हैं। उल्टा पानी- यहाँ का पानी ढलान के विपरीत दिशा में बहता है, जो एक अनसुलझा रहस्य है। इसके अलावा टाइगर पॉइंट, मछली पॉइंट, मेहता पॉइंट, सरभंजा जलप्रपात जैसे अनेक दर्शनीय स्थान हैं।

कर्मा पर्व प्रकृति से जुड़ाव और सामूहिक आनंद का उत्सव है: मुख्यमंत्री विष्णु देव साय

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कर्मा महोत्सव में लोक कलाकारों ने दी रंगारंग प्रस्तुतियां

नगर पंचायत भटगांव के विकास के लिए एक करोड़ रुपए की घोषणा

सूरजपुर जिले को दी 172.51 करोड़ रुपये के विकास कार्यों की सौगात

रायपुर- कर्मा महोत्सव को छत्तीसगढ़ की समृद्ध जनजातीय संस्कृति और परंपरा का प्रतीक है। ऐसे आयोजन लोक पर्वों को सहेजने के साथ-साथ नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य करते हैं। कर्मा पर्व प्रकृति से जुड़ाव, आपसी भाईचारा और सामूहिक आनंद का उत्सव है। उक्त आशय के विचार मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने आज सूरजपुर जिले के चुनगुड़ी में आयोजित कर्मा महोत्सव में व्यक्त किए। 

मुख्यमंत्री ने इस मौके पर 172.51 करोड़ रुपये के विकास कार्यों की सौगात दी। उन्होंने चुनगुड़ी के स्कूल मैदान को मिनी स्टेडियम के रूप में विकसित करने तथा नगर पंचायत भटगांव के विकास हेतु एक करोड़ रुपये की घोषणा की। कार्यक्रम में महिला एवं बाल विकास विभाग की मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े और सांसद चिंतामणि महाराज ने भी सम्बोधित किया।

परंपरा, संस्कृति और उल्लास से परिपूर्ण कर्मा महोत्सव में मांदर की थाप और घुंघरुओं की झंकार के बीच पूरा क्षेत्र कर्मा नृत्य की लय में थिरक उठा। सूरजपुर, सरगुजा, जशपुर, बलरामपुर, कोरिया एवं मनेंद्रगढ़ जिलों से आए 33 कर्मा दलों के लोक कलाकारों ने पारंपरिक वेशभूषा में कर्मा नृत्य प्रस्तुत कर सबको लोक संस्कृति के रंगों से भर दिया। 

मुख्यमंत्री ने कार्यक्रम स्थल पर लगायी गई प्रदर्शनी के स्टॉलों का निरीक्षण कर नाव-जाल एवं आइस बॉक्स, आयुष्मान कार्ड, छत्तीसगढ़ महिला कोष से ऋण वितरण और महिला स्व-सहायता समूहों द्वारा संचालित छह रेडी-टू-ईट ईकाइयों का शुभारंभ किया और पोषण वितरण कार्य से जुड़ी महिलाओं को शॉल-श्रीफल भेंटकर सम्मानित किया। इसके अलावा महिलाओं को स्वरोजगार के लिए मुद्रा लोन, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना के अंतर्गत बीमा क्लेम तथा प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत खुशियों की चाबी प्रदान की।

कार्यक्रम में विधायक भूलन सिंह मरावी, वन विकास निगम के अध्यक्ष राम सेवक पैकरा, जिला पंचायत अध्यक्ष चंद्रमणि पैकरा, उपाध्यक्ष रेखा राजलाल रजवाड़े सहित अनेक जनप्रतिनिधि सहित समस्त जिलास्तरीय अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित थे।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने जमशेदपुर में 22वें पारसी महोत्सव एवं ओलचिकी शताब्दी समारोह के समापन समारोह को किया संबोधित

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भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने आज (29 दिसंबर, 2025) झारखंड के जमशेदपुर में आयोजित 22वें पारसी महोत्सव (Parsi Maha) एवं ओलचिकी लिपि के शताब्दी समारोह के समापन समारोह में सहभागिता की और उपस्थित जनसमूह को संबोधित किया।

इस अवसर पर राष्ट्रपति ने कहा कि संथाल समुदाय की अपनी विशिष्ट भाषा, साहित्य और संस्कृति है। हालांकि, लगभग एक सदी पहले संथाली भाषा की अपनी कोई लिपि नहीं थी, जिसके कारण इसे रोमन, देवनागरी, ओड़िया और बांग्ला जैसी विभिन्न लिपियों में लिखा जाता था। इन लिपियों में कई संथाली शब्दों का सही उच्चारण संभव नहीं हो पाता था। वर्ष 1925 में पंडित रघुनाथ मुर्मु ने ओलचिकी लिपि का निर्माण किया। तब से यह लिपि संथाल पहचान का एक सशक्त प्रतीक बन गई है।

राष्ट्रपति ने कहा कि उन्हें 25 दिसंबर 2025 को, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती के अवसर पर, ओलचिकी लिपि में लिखित संथाली भाषा में भारत के संविधान का विमोचन करने का अवसर प्राप्त हुआ। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि अब संथाली भाषी लोग अपनी मातृभाषा और ओलचिकी लिपि में लिखे संविधान को पढ़ और समझ सकेंगे।

राष्ट्रपति ने कहा कि किसी अन्य भाषा में शिक्षा प्राप्त करने के साथ-साथ मातृभाषा संथाली को ओलचिकी लिपि में सीखना भी संथाल समुदाय के समग्र विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने यह जानकर प्रसन्नता व्यक्त की कि लेखक और भाषा प्रेमी संथाली भाषा के विकास और प्रचार-प्रसार के लिए निरंतर कार्य कर रहे हैं।

राष्ट्रपति ने लोगों से पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए विकास के पथ पर आगे बढ़ने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली संथाल समुदाय और अन्य जनजातीय समाजों से सीखी जा सकती है।

राष्ट्रपति ने कहा कि संथाली साहित्य को संथाल समुदाय की मौखिक परंपराओं और गीतों से विशेष बल मिलता है। उन्होंने उल्लेख किया कि अनेक लेखक अपने रचनात्मक कार्यों के माध्यम से संथाली साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जनजातीय समुदायों में जागरूकता लाना एक महत्वपूर्ण कार्य है और लेखकों से आग्रह किया कि वे अपनी लेखनी के माध्यम से इस दिशा में योगदान दें।

राष्ट्रपति ने कहा कि भाषा और साहित्य समुदायों को आपस में जोड़ते हैं। विभिन्न भाषाओं के बीच साहित्यिक आदान-प्रदान से भाषाएं और समुदाय दोनों समृद्ध होते हैं, और अनुवाद इस आदान-प्रदान को संभव बनाते हैं। इसलिए संथाली भाषा के विद्यार्थियों को अन्य भाषाओं से परिचित कराना आवश्यक है। इसी प्रकार, संथाली साहित्य को अन्य भाषाओं के विद्यार्थियों के लिए भी सुलभ बनाने के प्रयास किए जाने चाहिए। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि अखिल भारतीय संथाली लेखक संघ इस महत्वपूर्ण दायित्व का प्रभावी ढंग से निर्वहन करेगा।


विशाखापत्तनम में पेसा महोत्सव 2025: आदिवासी लोक संस्कृति और पंचायती राज का राष्ट्रीय उत्सव

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पंचायती राज मंत्रालय 23 एवं 24 दिसंबर 2025 को आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में “पेसा महोत्सव : उत्सव लोक संस्कृति का” नामक दो दिवसीय आयोजन कर रहा है। यह आयोजन पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA) के अधिनियमन को चिह्नित करने के लिए किया जा रहा है। पेसा दिवस अधिनियम की वर्षगांठ के अवसर पर 24 दिसंबर को मनाया जाएगा। महोत्सव का उद्घाटन आंध्र प्रदेश सरकार के उपमुख्यमंत्री तथा पंचायती राज एवं ग्रामीण विकास मंत्री कोनिडाला पवन कल्याण द्वारा किया जाएगा। इस अवसर पर पंचायती राज मंत्रालय के सचिव विवेक भारद्वाज सहित केंद्र और राज्य सरकार के अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित रहेंगे।

इस आयोजन में सभी 10 पेसा राज्यों से लगभग 2,000 प्रतिनिधियों के भाग लेने की संभावना है, जिनमें पंचायत प्रतिनिधि, खिलाड़ी, सांस्कृतिक कलाकार आदि शामिल होंगे। पेसा महोत्सव को पेसा क्षेत्रों से आने वाले आदिवासी समुदायों की सांस्कृतिक और पारंपरिक विरासत को मनाने के लिए एक राष्ट्रीय मंच के रूप में परिकल्पित किया गया है।

24 दिसंबर 2025 को पेसा से संबंधित कई महत्वपूर्ण राष्ट्रीय पहलों का शुभारंभ किया जाएगा। इनमें पेसा के क्रियान्वयन की जानकारी के प्रसार और निगरानी के लिए पेसा पोर्टल, राज्यों में क्रियान्वयन की स्थिति के आकलन हेतु पेसा संकेतक, जनजातीय भाषाओं में पेसा पर प्रशिक्षण मॉड्यूल (जागरूकता और जमीनी स्तर पर क्षमता निर्माण को सुदृढ़ करने के लिए) तथा हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले पर आधारित एक ई-बुक, जिसमें क्षेत्र के पारंपरिक ज्ञान, संस्कृति और विरासत का दस्तावेजीकरण किया गया है, शामिल हैं।

महोत्सव के अंतर्गत आंध्र प्रदेश के पेसा ग्राम पंचायतों में विशेष ग्राम सभाओं का आयोजन किया जाएगा, जिनमें सहभागी राज्यों के निर्वाचित प्रतिनिधि पेसा के दस चिन्हित विषयों पर सहभागिता करेंगे। इसके अतिरिक्त, 24 दिसंबर 2025 को सभी 10 पेसा राज्यों में भी विशेष ग्राम सभाएँ आयोजित की जाएँगी, जिनका उद्देश्य सामुदायिक सहभागिता को सुदृढ़ करना, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, परंपरागत प्रथाओं का संरक्षण, आजीविका और सामाजिक न्याय को बढ़ावा देना है।

महोत्सव के दौरान खेल और सांस्कृतिक गतिविधियों की एक विस्तृत श्रृंखला आयोजित की जाएगी, जो भारत की आदिवासी विरासत की विविधता और जीवंतता को प्रदर्शित करेगी। महोत्सव का मुख्य स्थल विशाखापत्तनम पोर्ट अथॉरिटी परिसर होगा, जबकि गतिविधियाँ रामकृष्ण बीच, इंडोर स्टेडियम, क्रिकेट स्टेडियम और कलावाणी ऑडिटोरियम, विशाखापत्तनम (आंध्र प्रदेश) में आयोजित की जाएँगी।

पेसा अधिनियम, 1996 के बारे में

भारत के संविधान के अनुच्छेद 243M(4)(b) के अंतर्गत संसद ने “पंचायतों के उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996” अर्थात पेसा अधिनियम का अधिनियमन किया, जिसके माध्यम से संविधान के भाग-IX के प्रावधानों को कुछ अपवादों और संशोधनों के साथ अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तारित किया गया।

अनुसूचित क्षेत्र वे क्षेत्र हैं जिन्हें भारत के राष्ट्रपति द्वारा घोषित किया जाता है। संविधान का अनुच्छेद 244(1) तथा पाँचवीं अनुसूची अनुसूचित क्षेत्रों से संबंधित प्रावधानों से संबंधित है। चूँकि ये क्षेत्र संविधान की पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत आते हैं, इसलिए इन्हें पाँचवीं अनुसूची क्षेत्र कहा जाता है। वर्तमान में पाँचवीं अनुसूची क्षेत्र 10 राज्यों—आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान और तेलंगाना—में घोषित हैं।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने 'पंडुम कैफे' का किया शुभारंभ

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पंडुम कैफे का शुभारंभ बस्तर में नक्सल उन्मूलन की दिशा में हो रहे सकारात्मक परिवर्तन का प्रेरक प्रतीक – मुख्यमंत्री साय

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने बस्तर में सामाजिक-आर्थिक बदलाव के नए अध्याय की शुरुआत करते हुए आज जगदलपुर में ‘पंडुम कैफ़े’ का शुभारंभ किया। यह कैफ़े नक्सली हिंसा के पीड़ितों और समर्पण कर चुके सदस्यों के पुनर्वास हेतु छत्तीसगढ़ सरकार की एक महत्वपूर्ण पहल है, जिसने हिंसा का मार्ग छोड़कर मुख्यधारा में लौटने वालों को सम्मानजनक और स्थायी आजीविका प्रदान करने की दिशा में मजबूत कदम बढ़ाया है। यह अनूठी पहल संघर्ष से सहयोग तक के प्रेरणादायक सफर को दर्शाती है।‘पंडुम कैफ़े’ जगदलपुर के पुलिस लाइन परिसर में स्थित है।

मुख्यमंत्री साय ने ‘पंडुम कैफे’   में कार्यरत नारायणपुर की फगनी, सुकमा की पुष्पा ठाकुर, बीरेंद्र ठाकुर, बस्तर की आशमती और प्रेमिला बघेल के साथ सौहार्दपूर्ण बातचीत की। उन्होंने नई शुरुआत के लिए उनका हौसला बढ़ाया और ‘पंडुम कैफ़े’ के बेहतर संचालन के लिए बधाई एवं शुभकामनाएं भी दीं।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा कि पंडुम कैफ़े का शुभारंभ बस्तर क्षेत्र में नक्सलवाद के उन्मूलन की दिशा में हो रहे सकारात्मक परिवर्तन का एक प्रेरक प्रतीक है। मुख्यमंत्री साय ने कहा कि पंडुम कैफे आशा, प्रगति और शांति का उज्ज्वल प्रतीक है। कैफे में कार्यरत युवा, जो नक्सली हिंसा के पीड़ित तथा हिंसा का मार्ग छोड़ चुके सदस्य हैं, अब शांति के पथ पर अग्रसर हो चुके हैं। जिला प्रशासन और पुलिस के सहयोग से उन्हें आतिथ्य सेवाओं, कैफ़े प्रबंधन, ग्राहक सेवा, स्वच्छता मानकों, खाद्य सुरक्षा और उद्यमिता कौशल का गहन प्रशिक्षण प्रदान किया गया है।

हिंसा का मार्ग छोड़कर शांति के पथ पर लौटे और कैफ़े में कार्यरत एक महिला ने इस अवसर पर भावुक होकर इस पुनर्वास पहल से हुए बदलाव की बात दोहराई। एक पूर्व माओवादी कैडर ने कहा कि,“हमने अपने अतीत में अंधेरा देखा था। आज हमें समाज की सेवा करने का यह अवसर मिला है, यह हमारे लिए एक नया जन्म है। बारूद की जगह कॉफी परोसना और अपनी मेहनत की कमाई से जीना—यह एहसास हमें शांति और सम्मान दे रहा है।”

एक अन्य सहयोगी ने अपनी खुशी व्यक्त करते हुए कहा कि,“पहले हम अपने परिवार को सम्मानजनक जीवन देने का सपना भी नहीं देख सकते थे। अब हम अपनी मेहनत से कमाए पैसों से घर के सदस्यों का भविष्य संवार सकते हैं। यह सब प्रशासन और इस कैफ़े की वजह से संभव हुआ है।”

एक अन्य सदस्य ने समुदाय के सहयोग पर जोर देते हुए कहा कि,“हमें लगा था कि मुख्यधारा में लौटना आसान नहीं होगा, लेकिन पुलिस और जिला प्रशासन ने हमें प्रशिक्षण दिया और हमारा विश्वास जीता। सबसे बड़ी बात यह है कि हम अब पीड़ितों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं, जिससे हमें अपने अतीत के अपराधों को सुधारने और शांति स्थापित करने का अवसर मिला है।”

उन्होंने यह भी बताया कि ‘पंडुम’ बस्तर की सांस्कृतिक जड़ों को दर्शाता है, और इसकी टैगलाइन “जहाँ हर कप एक कहानी कहता है” इस बात का प्रतीक है कि यहाँ परोसी गई कॉफी सिर्फ स्वाद ही नहीं, बल्कि साहस, संघर्ष पर विजय और एक नई शुरुआत की कहानी भी अपने साथ लेकर आती है।

इस अवसर पर वन मंत्री केदार कश्यप, शिक्षा मंत्री  गजेन्द्र यादव, सांसद महेश कश्यप, जगदलपुर विधायक किरण सिंह देव, चित्रकोट विधायक विनायक गोयल, बेवरेज कॉर्पोरेशन के अध्यक्ष श्रीनिवास राव मद्दी, अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष रूपसिंह मंडावी, जगदलपुर महापौर संजय पांडे, जिला पंचायत अध्यक्ष वेदवती कश्यप, संभागायुक्त डोमन सिंह, पुलिस महानिरीक्षक सुन्दरराज पी., कलेक्टर हरिस एस., पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा सहित अन्य जनप्रतिनिधिगण एवं वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारीगण भी उपस्थित थे।


जनजातीय गौरव वर्ष 2025 के तहत देशभर में कार्यक्रम आयोजित

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जनजातीय गौरव वर्ष 2025 के अंतर्गत, आज विभिन्न राज्यों में भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती और राष्ट्रीय गीत ‘वन्दे मातरम्’ के 150 वर्ष की स्मृति में कार्यक्रम आयोजित किए गए। ये आयोजन देशभक्ति, एकता और भारत की जीवंत आदिवासी विरासत को उजागर करने के उद्देश्य से किए गए।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस ऐतिहासिक अवसर को चिह्नित करते हुए आदिवासी सशक्तिकरण और सांस्कृतिक गौरव के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई, जो “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास” के दृष्टिकोण के तहत संचालित है।

माननीय आदिवासी मामलों के मंत्री जूल ओराम के मार्गदर्शन में, आदिवासी मामले मंत्रालय देशभर में कार्यक्रम, जागरूकता अभियान और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित कर रहा है, ताकि भगवान बिरसा मुंडा की विरासत और भारत की आदिवासी समुदायों के योगदान को सम्मानित किया जा सके।


राज्यवार कार्यक्रम

ओडिशा:

  • क्विज़ प्रतियोगिता और छात्र सहभागिता कार्यक्रम आयोजित किए गए।

  • भगवान बिरसा मुंडा की विशेष प्रदर्शनी और आदिवासी कलाकारों की पेंटिंग प्रदर्शनी ओडिशा स्टेट ट्राइबल म्यूज़ियम में आयोजित की गई।

  • छात्रों ने म्यूज़ियम दौरे, क्विज़ प्रतियोगिता और सांस्कृतिक फोटो सत्र में भाग लिया।

आंध्र प्रदेश:

  • ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (TRI) ने वन्दे मातरम् का सामूहिक गायन आयोजित किया, जिससे राष्ट्रीय गर्व और एकता की भावना को बढ़ावा मिला।

तेलंगाना:

  • TRI हैदराबाद ने नेहरू सेंचुरी ट्राइबल म्यूज़ियम में छात्रों के साथ वन्दे मातरम् का सामूहिक गायन आयोजित किया।

जम्मू और कश्मीर:

  • जनजातीय भोजन उत्सव आयोजित किया गया, जिसमें क्षेत्र की पारंपरिक व्यंजनों और सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित किया गया।

  • कार्यक्रम में Chief Education Officer, Kargil मुख्य अतिथि और Indian Army के Commanding Officer अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

झारखंड:

  • भगवान बिरसा मुंडा की जन्मभूमि में PVTG (विशेष रूप से संवेदनशील आदिवासी समूह) वासस्थान पर जंजातीय गौरव वर्ष पखवाड़ा मनाया गया।

  • स्थानीय आदिवासी समुदायों ने परंपरागत कला, संगीत और सांस्कृतिक प्रदर्शनों के माध्यम से बिरसा मुंडा की विरासत का सम्मान किया।

  • छात्रों और आदिवासी प्रतिनिधियों ने वन्दे मातरम् का सामूहिक गायन किया।

बिहार:

  • छात्रों ने निबंध और क्विज़ प्रतियोगिताओं में भाग लिया।

  • EMRS संस्थानों में वित्तीय और डिजिटल साक्षरता कार्यशालाओं का आयोजन किया गया।

गुजरात:

  • मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने जंजातीय गौरव यात्रा का शुभारंभ किया।

  • यात्रा अंबाजी और उमरगाम से शुरू होकर 7–13 नवंबर 2025 तक एकतानगर (स्टैच्यू ऑफ यूनिटी) तक जाएगी।

  • यात्रा का उद्देश्य आदिवासी नायकों के योगदान के बारे में जागरूकता फैलाना और उनके अदम्य साहस और विरासत को सम्मानित करना है।

तमिलनाडु:

  • ड्राइंग प्रतियोगिता आयोजित की गई, जिसमें आदिवासी छात्रों ने रचनात्मक प्रतिभा दिखाई।


सिक्किम:

  • ट्राइबल छात्र खेल प्रतियोगिता और स्वास्थ्य शिविर आयोजित किया गया, जिसमें EMRS छात्रों ने भाग लिया।

नागालैंड:

  • EMRS स्कूलों में कहानियाँ सुनाना और पारंपरिक पोशाक प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं, जिसमें राज्य के विविध आदिवासी समुदायों की धरोहर और लोक परंपराएँ प्रदर्शित हुई।

निष्कर्ष

जनजातीय गौरव वर्ष पखवाड़ा (1–15 नवंबर 2025) के तहत ये गतिविधियाँ आदिवासी पहचान, संस्कृति और उपलब्धियों का सम्मान दर्शाती हैं।

  • ये पहल समावेशी विकास और भारत की समृद्ध आदिवासी विरासत के संरक्षण के प्रति देश की प्रतिबद्धता को दोहराती हैं।

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