Media24Media.com: कावेरी जल विवाद: सुप्रीम कोर्ट में 17 अगस्त को अहम सुनवाई, तमिलनाडु ने मांगा अपने हिस्से का पानी

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कावेरी जल विवाद: सुप्रीम कोर्ट में 17 अगस्त को अहम सुनवाई, तमिलनाडु ने मांगा अपने हिस्से का पानी

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नई दिल्ली- कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच लंबे समय से चले आ रहे कावेरी जल विवाद ने एक बार फिर तूल पकड़ लिया है। कावेरी नदी के पानी के बंटवारे को लेकर तमिलनाडु की ओर से दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में 17 अगस्त को सुनवाई होने वाली है। तमिलनाडु सरकार ने अदालत से कर्नाटक को राज्य के हिस्से का कावेरी जल तत्काल जारी करने का निर्देश देने की मांग की है।

तमिलनाडु का दावा—26.954 TMC पानी की कमी

तमिलनाडु सरकार का आरोप है कि कर्नाटक ने निर्धारित मात्रा के अनुसार कावेरी का पानी जारी नहीं किया है। राज्य ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दावा किया है कि उसके हिस्से में 26.954 TMC (थाउजेंड मिलियन क्यूबिक फीट) पानी की कमी है। इसी आधार पर तमिलनाडु ने अदालत से कर्नाटक को आवश्यक मात्रा में पानी छोड़ने के निर्देश देने की मांग की है।

तमिलनाडु के लिए यह मुद्दा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि कावेरी का पानी राज्य के कृषि क्षेत्र और डेल्टा जिलों की सिंचाई के लिए बेहद अहम है। पानी की कमी का सीधा असर किसानों और फसल उत्पादन पर पड़ सकता है।

कर्नाटक की अपनी दलील

दूसरी ओर, कर्नाटक लगातार यह तर्क देता रहा है कि राज्य को भी अपने पेयजल, सिंचाई और कृषि जरूरतों के लिए पर्याप्त पानी की आवश्यकता है। हालिया घटनाक्रम में कर्नाटक सरकार ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद ही तमिलनाडु के लिए पानी छोड़ने को लेकर आगे का फैसला किया जाएगा।

कर्नाटक के जल संसाधन मंत्री ने यह भी कहा है कि कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण की ओर से तमिलनाडु के लिए 12,000 क्यूसेक पानी प्रतिदिन छोड़ने का निर्देश राज्य के लिए बहुत अधिक है और मौजूदा परिस्थितियों में इसका पालन करना चुनौतीपूर्ण है।

विवाद फिर क्यों बढ़ा?

कावेरी जल विवाद नया नहीं है। दोनों राज्यों के बीच नदी के पानी के बंटवारे को लेकर दशकों से विवाद चला आ रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में कावेरी जल बंटवारे को लेकर महत्वपूर्ण फैसला दिया था और उसके बाद कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) तथा कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) के माध्यम से पानी छोड़ने और उसकी निगरानी की व्यवस्था की गई।

सितंबर 2023 में भी सुप्रीम कोर्ट ने कावेरी जल विनियमन समिति के कर्नाटक को तमिलनाडु के लिए पानी छोड़ने संबंधी आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार किया था। उस समय समिति ने 5,000 क्यूसेक प्रतिदिन पानी छोड़ने का निर्देश दिया था।

किसानों पर पड़ सकता है सीधा असर

कावेरी का पानी दोनों राज्यों के लाखों किसानों के लिए जीवनरेखा माना जाता है। तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा क्षेत्र में सिंचाई के लिए नदी पर बड़ी निर्भरता है। वहीं कर्नाटक में भी कावेरी बेसिन के किसानों और शहरों की पानी की जरूरतें इसी जल संसाधन से जुड़ी हैं।

ऐसे में मानसून, बांधों में जल भंडारण और कृषि जरूरतों के बीच संतुलन बनाना दोनों राज्यों के लिए बड़ी चुनौती है। हाल के दिनों में कावेरी जल को लेकर कर्नाटक में विरोध प्रदर्शन और राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हुई है। 13 अगस्त को कावेरी जल छोड़ने के मुद्दे पर राज्यव्यापी बंद भी आयोजित किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी नजरें

अब सभी की नजरें 17 अगस्त की सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर हैं। तमिलनाडु चाहता है कि उसे उसके हिस्से का पानी जल्द से जल्द मिले, जबकि कर्नाटक अपने जल भंडार और राज्य की जरूरतों को देखते हुए पानी छोड़ने की मात्रा पर आपत्ति जता रहा है।

इस सुनवाई में अदालत का रुख दोनों राज्यों के बीच मौजूदा जल विवाद की दिशा के लिए अहम माना जा रहा है। खासकर 26.954 TMC की कथित कमी और 12,000 क्यूसेक प्रतिदिन पानी छोड़ने के मुद्दे पर होने वाली चर्चा महत्वपूर्ण हो सकती है।

क्या है कावेरी विवाद का मूल मुद्दा?

कावेरी नदी कर्नाटक से निकलकर तमिलनाडु से होते हुए बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इसके पानी के इस्तेमाल और बंटवारे को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच लंबे समय से मतभेद रहे हैं। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने जल बंटवारे को लेकर अपना महत्वपूर्ण फैसला दिया था, जिसके बाद केंद्र सरकार के स्तर पर जल प्रबंधन की संस्थागत व्यवस्था को मजबूत किया गया।

फिलहाल कावेरी जल विवाद एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के सामने है। 17 अगस्त की सुनवाई से यह स्पष्ट हो सकता है कि तमिलनाडु को उसके दावे के अनुसार पानी उपलब्ध कराने और कर्नाटक की जल जरूरतों के बीच अदालत किस तरह संतुलन स्थापित करती है।

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