Media24Media.com: माटी की महक और आस्था के स्वर: केवल कृष्ण के गीतों ने छेड़ा हृदय का तार

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माटी की महक और आस्था के स्वर: केवल कृष्ण के गीतों ने छेड़ा हृदय का तार

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​रायपुर,छत्तीसगढ़- छत्तीसगढ़ की माटी की सोंधी खुशबू और जनमानस की गहरी संवेदनाएं अब सुरों में ढलकर फिजाओं में तैर रही हैं। वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार केवल कृष्ण की लेखनी से उपजे दो गीतों ने इन दिनों प्रदेश के लोक-मन को झंकृत कर दिया है। जहाँ एक गीत में ममतामयी देवी की करुणा है, वहीं दूसरे में बस्तर की वादियों में लौटती शांति की गूंज।

​ममता की छाँव: 'तोर मया ला कइसे बरनव' 

​छत्तीसगढ़ी लोक-आस्था का केंद्र बिंदु सदैव 'दाई' (माँ) रही है। गीत “तोर मया ला कइसे बरनव वो, दाई अंगार मोती” केवल एक भक्ति गीत नहीं, बल्कि एक आर्त पुकार है।

​इसकी पंक्तियाँ उस आत्मीयता को स्वर देती हैं, जहाँ एक भक्त अपने समस्त सुख-दुख अपनी माँ के चरणों में समर्पित कर देता है।

​सरलता और भक्ति का ऐसा संगम विरल है, जो श्रोता को सीधे अपनी जड़ों और गांव-गली की स्मृतियों से जोड़ देता है।

https://youtu.be/M-BOa2EgnkY?si=OWIn5FpcPwT0jxmf

बस्तर की नई भोर: 'बोलत हावे ना' 

​दूसरा गीत “बोलत हावे ना” उस बदलते बस्तर की कहानी है, जहाँ कभी सन्नाटा पसरा था। यह गीत नक्सलवाद के काले साये से मुक्त होते अंचल की तस्वीर पेश करता है।

​"वर्षों से खामोश रही बस्तर की मैना अब चहकने लगी है। दहशत की जगह अब सुकून और संगीत ने ले ली है।" सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा यह गीत शांति और विकास के नए युग का मधुर उद्घोष बन गया है।

शब्दों में सादगी, सुरों में जादू 

इन रचनाओं की सबसे बड़ी शक्ति इनकी लोकभाषा की मिठास है। इसमें कोई कृत्रिम आडंबर नहीं, बल्कि हृदय की सहज अभिव्यक्ति है। यह डिजिटल युग में छत्तीसगढ़ी लोक-संस्कृति को सहेजने और उसे नई पहचान दिलाने का एक सशक्त माध्यम बनकर उभरा है।

रचनाकार का परिचय 

​इन गीतों के रचयिता केवल कृष्ण मूलतः एक सजग पत्रकार हैं। वे बहुत अच्छे स्क्रिप्ट राइटर भी हैं। अपनी लेखनी के माध्यम से समाज के विभिन्न पहलुओं को उकेरते रहे हैं। इससे पूर्व उनके द्वारा रचित छत्तीसगढ़ी उपन्यास 'बघवा' पाठकों के बीच अपनी गहरी पैठ बना चुका है।

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