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जलवाष्प और एरोसोल की संयुक्त भूमिका से जलवायु परिवर्तन की नई समझ सामने आई

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नए शोध से यह सामने आया है कि एरोसोल (सूक्ष्म कण) और जलवाष्प (Water Vapour) की संयुक्त भूमिका जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने और भविष्य के जलवायु अनुमानों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। अध्ययन के अनुसार, यदि जलवायु के प्रभावों और भविष्य की सटीक भविष्यवाणी करनी है, तो एरोसोल और जलवाष्प—दोनों को एक साथ ध्यान में रखना आवश्यक है, क्योंकि इनके आपसी अंतःक्रिया (इंटरैक्शन) क्षेत्रीय वायुमंडलीय गतिकी और भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून को गहराई से प्रभावित करती है।

एरोसोल और जलवाष्प के विकिरणीय प्रभाव (Radiative Effects) पृथ्वी के विकिरण संतुलन को समझने और उसका पूर्वानुमान लगाने में अहम भूमिका निभाते हैं। ये प्रभाव यह स्पष्ट करते हैं कि किस प्रकार एरोसोल, जलवाष्पीय बादल और ग्रीनहाउस गैसें सूर्य से आने वाले विकिरण और पृथ्वी से बाहर जाने वाले तापीय विकिरण को अवशोषित एवं प्रकीर्णित (Scattering) करती हैं, जिससे वैश्विक तापमान, मौसम प्रतिरूप और जलवायु स्थिरता प्रभावित होती है।

इंडो-गंगा मैदानी क्षेत्र: एरोसोल का वैश्विक हॉटस्पॉट

इंडो-गंगा मैदानी क्षेत्र (IGP) को एरोसोल लोडिंग का एक वैश्विक हॉटस्पॉट माना जाता है। यहां एरोसोल और जलवाष्प की मात्रा में स्थानिक और कालिक (Spatio-Temporal) रूप से अत्यधिक परिवर्तनशीलता पाई जाती है, जिससे इनके जलवायु प्रभावों का सटीक आकलन करना चुनौतीपूर्ण और अनिश्चित हो जाता है। इस क्षेत्र की जलवायु गतिकी पर वायुमंडलीय संरचना में होने वाले परिवर्तनों के प्रभावों को समझने के लिए एरोसोल लोडिंग और जलवाष्प विकिरणीय प्रभाव (WVRE) के संबंध का विश्लेषण आवश्यक है।

DST संस्थानों द्वारा किया गया व्यापक अध्ययन

यह अध्ययन आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्ज़र्वेशनल साइंसेज़ (ARIES), नैनीताल और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिज़िक्स (IIA), बेंगलुरु—जो दोनों ही भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के स्वायत्त संस्थान हैं—द्वारा किया गया। इस शोध में ग्रीस के यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न मैसेडोनिया और जापान की सोका यूनिवर्सिटी के अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों ने भी सहयोग किया।

शोध का नेतृत्व डॉ. उमेश चंद्र दुमका (ARIES) और डॉ. शांतकुमार एस. निंगोम्बम (IIA) ने किया। शोधकर्ताओं ने IGP क्षेत्र में स्थित छह AERONET (एरोसोल रोबोटिक नेटवर्क) स्थलों से प्राप्त आंकड़ों का उपयोग किया और SBDART रेडिएटिव ट्रांसफर मॉडल के माध्यम से वायुमंडलीय विकिरणीय सिमुलेशन किए।

एरोसोल के गुणधर्मों और वर्षणीय जलवाष्प (प्रेसिपिटेबल वाटर वेपर) की जलवायुगत स्थिति (क्लाइमेटोलॉजी)।

मुख्य निष्कर्ष

अध्ययन में यह पाया गया कि:

  • जलवाष्प वायुमंडलीय ताप को एरोसोल की तुलना में अधिक प्रभावित करता है।

  • जलवाष्प के विकिरणीय प्रभाव एरोसोल की उपस्थिति से गहराई से प्रभावित होते हैं।

  • एरोसोल-जलवाष्प अंतःक्रिया वायुमंडल के विकिरण बजट को महत्वपूर्ण रूप से नियंत्रित करती है।

  • एरोसोल-मुक्त वातावरण में जलवाष्प का विकिरणीय प्रभाव अधिक तीव्र होता है, जबकि एरोसोल की उपस्थिति में यह प्रभाव अपेक्षाकृत कम हो जाता है।

  • स्वच्छ वायुमंडल में पृथ्वी की सतह और वायुमंडल—दोनों पर ये प्रभाव अधिक स्पष्ट होते हैं।

  • एरोसोल की मौजूदगी में जलवाष्प का प्रभाव वायुमंडल के ऊपरी हिस्से (Top of the Atmosphere) पर अधिक प्रमुख हो जाता है।

जलवायु पर व्यापक प्रभाव

अध्ययन यह भी दर्शाता है कि जलवाष्प वायुमंडल को एरोसोल की तुलना में कहीं अधिक गर्म करता है, जिससे इंडो-गंगा मैदानी क्षेत्र की जलवायु को आकार देने में इसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। परिणाम यह भी दिखाते हैं कि ये प्रभाव सूर्य की स्थिति और एरोसोल अवशोषण से जुड़े वायुमंडलीय कारकों पर अत्यधिक निर्भर करते हैं।

यह शोध Atmospheric Research जर्नल में प्रकाशित हुआ है और यह स्पष्ट करता है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने के लिए एरोसोल और जलवाष्प—दोनों की संयुक्त भूमिका को अनदेखा नहीं किया जा सकता।


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