Media24Media.com: जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण और सतत विकास पर एशियन कॉन्फ्रेंस में डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा – ‘भारत पर्यावरणीय स्थिरता का वैश्विक अग्रदूत’

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जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण और सतत विकास पर एशियन कॉन्फ्रेंस में डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा – ‘भारत पर्यावरणीय स्थिरता का वैश्विक अग्रदूत’

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एशियन कॉन्फ्रेंस ऑन ज्योग्राफी (ACG 2025) में केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह का संबोधन — जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण और सतत संसाधन प्रबंधन पर गहन चर्चा

नई दिल्ली स्थित जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में आयोजित एशियन कॉन्फ्रेंस ऑन ज्योग्राफी (ACG 2025) के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि यह सम्मेलन समयोचित और अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह तीन परस्पर जुड़े वैश्विक मुद्दों—जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण और सतत संसाधन प्रबंधन—पर केंद्रित है, जो हमारे साझा भविष्य की स्थिरता को निर्धारित करते हैं।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत आर्थिक प्रगति और पर्यावरणीय स्थिरता को साथ लेकर चलने वाला वैश्विक पथप्रदर्शक बन गया है। भारत का लक्ष्य 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन प्राप्त करना और “लाइफ–लाइफस्टाइल फॉर एनवायरनमेंट” आंदोलन के माध्यम से प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन शैली को बढ़ावा देना है।

डॉ. सिंह ने जामिया मिलिया इस्लामिया द्वारा इस प्रतिष्ठित सम्मेलन के पहले भारतीय संस्करण की मेजबानी के लिए कुलपति प्रो. मजहर अली और आयोजन टीम की सराहना की, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और छात्रों को एक साझा मंच पर लाकर महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श का अवसर प्रदान किया।

उन्होंने कहा कि एशिया वर्तमान में वैश्विक परिवर्तन का केंद्र है, जो तीव्र औद्योगिक और आर्थिक प्रगति से तो आगे बढ़ रहा है, लेकिन यह क्षेत्र विश्व के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का आधे से अधिक योगदान देता है। आईपीसीसी की छठी मूल्यांकन रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने चेतावनी दी कि यदि उत्सर्जन की वर्तमान गति जारी रही, तो एशिया को अत्यधिक गर्मी, बाढ़ और जल संकट जैसी चरम मौसमी घटनाओं का सामना करना पड़ेगा।

डॉ. सिंह ने कहा कि दक्षिण एशिया के लगभग 75 करोड़ लोग गंभीर जलवायु खतरों से प्रभावित हैं—हिमालयी ग्लेशियर पिघलने से लेकर तटीय बाढ़ और शहरी गर्मी द्वीपों तक। उन्होंने बताया कि दिल्ली, ढाका, बैंकॉक और मनीला 2050 तक सबसे अधिक जलवायु-संवेदनशील महानगरों में शामिल होंगे।

उन्होंने कहा कि शहरीकरण विकास का प्रतीक होने के साथ-साथ चुनौती भी बन गया है, क्योंकि अनियोजित विस्तार, बाढ़ क्षेत्र में अतिक्रमण, भूजल का क्षय और प्रदूषण के बढ़ते स्तर गंभीर चिंता का विषय हैं।

डॉ. सिंह ने अपशिष्ट-से-धन (Waste-to-Wealth) तकनीकों और परिपत्र अर्थव्यवस्था (Circular Economy) को भविष्य की कुंजी बताया, जहां ‘कचरे’ की अवधारणा ही समाप्त हो जाएगी। उन्होंने देहरादून में प्रयुक्त खाद्य तेल पुनर्चक्रण जैसी पहलों का उदाहरण देते हुए कहा कि इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ समुदाय स्तर पर आय सृजन भी होता है।

उन्होंने कहा कि किसी भी सरकारी योजना की सफलता जनभागीदारी पर निर्भर करती है — “जब तक यह सामाजिक आंदोलन नहीं बनता, तब तक कोई भी नीति या संगोष्ठी अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकती।”

डॉ. सिंह ने कहा कि भारत का सतत विकास के प्रति संकल्प विभिन्न सरकारी पहलों में परिलक्षित होता है — जैसे राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC), स्मार्ट सिटी मिशन, अमृत योजना और स्वच्छ भारत अभियान। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के “लाइफ” अभियान की भी प्रशंसा की, जिसने जिम्मेदार उपभोग और पर्यावरणीय जीवनशैली को जनांदोलन का रूप दिया।

उन्होंने कहा कि “भारत की ग्रीन हाइड्रोजन, बायो-इकोनॉमी, परिपत्र अर्थव्यवस्था और डिजिटल इंडिया जैसी पहलें आर्थिक विकास और पारिस्थितिक संतुलन को साथ लेकर चलने का संकल्प दर्शाती हैं।”

डॉ. सिंह ने इस अवसर पर वैज्ञानिक अनुसंधान, प्रौद्योगिकी, और शिक्षा संस्थानों की भूमिका पर भी जोर दिया। उन्होंने एनईपी 2020 का उल्लेख करते हुए कहा कि नई शिक्षा नीति छात्रों को अंतःविषय अध्ययन का अवसर देती है, जिससे वे भूगोल जैसे विषयों के माध्यम से पर्यावरणीय समझ विकसित कर सकें।

उन्होंने कहा कि “जलवायु कार्रवाई की भाषा युवाओं की भाषा होनी चाहिए — डिजिटल, रचनात्मक और प्रेरणादायक।” उन्होंने सुझाव दिया कि सोशल मीडिया और डिजिटल अभियानों के माध्यम से जागरूकता बढ़ाई जानी चाहिए।

डॉ. सिंह ने कहा कि भारत अंतरराष्ट्रीय साझेदारी में भी अग्रणी है — अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) और आपदा-प्रतिरोधी अवसंरचना गठबंधन (CDRI) जैसी पहलें इसका प्रमाण हैं।

सम्मेलन के अंत में उन्होंने कहा, “जलवायु केवल नीति-निर्माताओं या वैज्ञानिकों की चिंता का विषय नहीं है; यह हर नागरिक का व्यक्तिगत विषय है—हमारे स्वास्थ्य, हमारे कल्याण और हमारी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए।”


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