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चरागाहों के संरक्षण और पशुपालक समुदायों के कल्याण पर भारत का जोर

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भारत ने चरागाहों (Rangelands) की महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर देते हुए कहा है कि ये पशुपालक समुदायों की आजीविका बनाए रखने, जैव-विविधता के संरक्षण तथा जल और कार्बन चक्रों के नियमन में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। भारत ने चरागाहों के पुनर्स्थापन के लिए विज्ञान आधारित दृष्टिकोण, सुरक्षित भूमि-अधिकार और समुदायों की भागीदारी पर आधारित प्रयासों का आह्वान किया है।

संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम अभिसमय (UNCCD) के 17वें कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज (CoP17) में “चरागाहों का पुनर्स्थापन और पशुपालक समुदायों का कल्याण” विषय पर आयोजित मंत्रिस्तरीय संवाद को संबोधित करते हुए केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने वैज्ञानिक योजना और सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से घासभूमियों और चरागाहों के पुनर्स्थापन में भारत के अनुभव को साझा किया।

पशुपालकों की केंद्रीय भूमिका पर जोर देते हुए यादव ने कहा, “सफल पुनर्स्थापन की शुरुआत पशुपालकों को केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि संरक्षक मानने से होती है।” उन्होंने कहा कि पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़कर ऐसा पुनर्स्थापन किया जा सकता है जो पारिस्थितिक रूप से टिकाऊ, आर्थिक रूप से व्यवहार्य और सामाजिक रूप से समावेशी हो।

उन्होंने बताया कि भारत के चरागाह विभिन्न प्रकार के भू-दृश्यों में फैले हुए हैं—हिमालयी चरागाहों और मध्य भारत की सवाना घासभूमियों से लेकर शुष्क थार, कच्छ क्षेत्रों और दक्षिणी शोला क्षेत्रों तक। ये क्षेत्र देश के विशाल पशुधन और मानव आबादी की आवश्यकताओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

मंत्री ने यह भी बताया कि उपग्रह आधारित मरुस्थलीकरण एवं भूमि क्षरण एटलस घासभूमियों के मानचित्रण और पुनर्स्थापन की योजना बनाने के लिए वैज्ञानिक आधार प्रदान करते हैं। वहीं, चराई के अधिकारों और सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों की मान्यता स्थानीय समुदायों की भूमिका को मजबूत करती है और उन्हें प्राकृतिक संसाधनों के टिकाऊ प्रबंधन में अधिक अधिकार देती है।

भारत की पारंपरिक सामुदायिक संरक्षण प्रणालियों का उदाहरण देते हुए यादव ने राजस्थान के ओरण (Orans) का उल्लेख किया। ये पवित्र वन क्षेत्र हैं, जिन्हें स्थानीय समुदाय सांस्कृतिक और पारिस्थितिक महत्व के कारण लंबे समय से संरक्षित करते आए हैं। उन्होंने बताया कि देशभर में लगभग 25,000 ऐसे सामुदायिक रूप से संरक्षित पवित्र वन क्षेत्र हैं, जो लगभग 6 लाख हेक्टेयर भूमि में फैले हैं। ये क्षेत्र सामुदायिक संरक्षण का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं और साथ ही पशुपालकों के भूमि अधिकारों को सुरक्षित करने तथा ग्रेट इंडियन बस्टर्ड जैसे महत्वपूर्ण वन्यजीवों के आवासों के संरक्षण में योगदान देते हैं। मंत्री के अनुसार, इनमें से कई पवित्र वन क्षेत्र कानूनी प्रावधानों के तहत भी संरक्षित हैं।

यादव ने खुले वनों और घासभूमि पारिस्थितिकी तंत्रों के पुनर्स्थापन के लिए भारत के प्रयासों को भी रेखांकित किया। इनमें चीता पुनर्स्थापन कार्यक्रम और गुजरात के बन्नी घासभूमि जैसे क्षेत्रों में इसके संभावित विस्तार की योजना शामिल है।

उन्होंने कहा कि गहरी जड़ वाली घासें मिट्टी में कार्बन के भंडारण में योगदान देती हैं, पानी के भूमि में प्रवेश को बढ़ाती हैं और भूजल पुनर्भरण में सहायता करती हैं। भारत में लगभग 1 करोड़ हेक्टेयर स्थायी चरागाह और चराई भूमि इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

यादव ने अपने संबोधन का समापन करते हुए कहा कि भारत का दृष्टिकोण भूदृश्य प्रबंधन, जलग्रहण क्षेत्र विकास, टिकाऊ चराई, चारा विकास और आजीविका सहायता को एकीकृत करता है, जिसमें समुदायों की भागीदारी को केंद्र में रखा गया है।

उन्होंने कहा कि विकासशील देश जब भूमि क्षरण तटस्थता (Land Degradation Neutrality) के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, तब वित्त, प्रौद्योगिकी और ज्ञान तक बेहतर पहुंच आवश्यक है। उन्होंने कहा:

“भारत चरागाहों के पुनर्स्थापन के लिए समर्पित और सुलभ वित्तीय सहायता का स्वागत करता है और दक्षिण-दक्षिण सहयोग के माध्यम से अपने अनुभव और समाधान साझा करने के लिए तैयार है।”

छत्तीसगढ़ को ‘GeM सस्टेनेबल प्रोक्योरमेंट अवार्ड’, शासकीय खरीदी दोगुनी होकर ₹3,935 करोड़ पहुंची

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गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस से राज्य की खरीदी में एक वर्ष में 113 प्रतिशत की वृद्धि, सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों को मिले ₹1,800 करोड़ के ऑर्डर

प्रतिस्पर्धी निविदा प्रक्रिया से वर्ष 2025-26 में राज्य को ₹130 करोड़ की बचत

रायपुर- छत्तीसगढ़ को गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (GeM) के 10वें स्थापना दिवस समारोह में ‘GeM सस्टेनेबल प्रोक्योरमेंट अवार्ड’ से सम्मानित किया गया है। नई दिल्ली में आयोजित समारोह में केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल की गरिमामयी उपस्थिति में यह सम्मान प्रदान किया गया। GeM के एक दशक पूर्ण होने के अवसर पर आयोजित समारोह की थीम ‘GeM 10: A Decade of Exponential Possibilities’ रही।

राज्य सरकारों के लिए निर्धारित ‘प्रीमियर अवार्ड्स – स्टेट गवर्नमेंट फेलिसिटेशन’ श्रेणी के अंतर्गत छत्तीसगढ़ को यह पुरस्कार GeM के प्रभावी उपयोग तथा इसके माध्यम से शासकीय खरीदी के मूल्य और मात्रा में उल्लेखनीय वृद्धि के लिए प्रदान किया गया है।

खुली प्रतिस्पर्धा से ₹130 करोड़ की बचत

GeM प्लेटफॉर्म पर पारदर्शी एवं प्रतिस्पर्धी निविदा प्रक्रिया के कारण वित्तीय वर्ष 2025-26 में छत्तीसगढ़ शासन को ₹130 करोड़ की बचत हुई है। यह बचत विभागों द्वारा खरीदी के लिए अनुमानित लागत और खुली प्रतिस्पर्धी बोली के बाद प्राप्त वास्तविक बाजार मूल्य के अंतर से हुई है।

GeM की खुली बोली प्रक्रिया, मानकीकृत विनिर्देश और प्रत्येक लेन-देन का डिजिटल एवं ऑडिट योग्य रिकॉर्ड शासकीय खरीदी में पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करता है। पिछले तीन वित्तीय वर्षों में प्रतिस्पर्धी खरीदी के माध्यम से राज्य शासन को कुल ₹235 करोड़ की बचत हुई है।

खरीदी प्रक्रिया के प्रत्येक चरण में निर्धारित जांच और निगरानी व्यवस्था लागू है। साथ ही निविदा की शर्तों एवं तकनीकी विनिर्देशों की नियमित समीक्षा की जाती है, जिससे खरीदी की गुणवत्ता सुनिश्चित होने के साथ बदलती आवश्यकताओं के अनुरूप वस्तुओं और सेवाओं की उपलब्धता बनी रहे।

GeM से खरीदी में 113 प्रतिशत की वृद्धि

छत्तीसगढ़ में GeM के माध्यम से शासकीय खरीदी वित्तीय वर्ष 2025-26 में बढ़कर ₹3,935 करोड़ पहुंच गई। यह पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में 113 प्रतिशत की वृद्धि है।

राज्य शासन द्वारा विभागों, निगमों और स्थानीय निकायों की खरीदी को एक साझा एवं पारदर्शी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाने के सुनियोजित प्रयासों से यह वृद्धि संभव हुई है। इससे अधिकाधिक शासकीय खरीदी खुली प्रतिस्पर्धा के दायरे में आई है और प्रत्येक लेन-देन में प्रतिस्पर्धी दर निर्धारण तथा पारदर्शिता सुनिश्चित हुई है।

सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों को ₹1,800 करोड़ के ऑर्डर

GeM के व्यापक उपयोग से शासकीय खरीदी में छोटे उद्यमियों की भागीदारी भी तेजी से बढ़ी है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों (MSEs) से खरीदी 61 प्रतिशत बढ़कर ₹1,800 करोड़ हो गई। यह निर्धारित 25 प्रतिशत MSE खरीद लक्ष्य से काफी अधिक है।

राज्य के प्राथमिकता वाले उद्यमी वर्गों की भागीदारी में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। महिला उद्यमियों से खरीदी में 97 प्रतिशत और अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के उद्यमियों से खरीदी में 108 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वहीं स्टार्टअप से खरीदी में सर्वाधिक 178 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।

GeM ने उद्यमियों के लिए खोले शासकीय बाजार के द्वार : मुख्यमंत्री विष्णु देव साय

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इस उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि GeM ने छत्तीसगढ़ के उद्यमियों को बिना किसी मध्यस्थ के सीधे शासकीय मांग और बाजार से जुड़ने का सशक्त माध्यम उपलब्ध कराया है। महिला उद्यमियों, अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के उद्यमियों और स्टार्टअप की भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि इस पारदर्शी व्यवस्था की सफलता को दर्शाती है।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि खुला और पारदर्शी डिजिटल मार्केटप्लेस प्रत्येक उद्यमी को समान अवसर प्रदान करता है।  हमारी सरकार का प्रयास है कि इस व्यवस्था का लाभ प्रदेश के अधिक से अधिक सूक्ष्म एवं लघु उद्यमियों, महिला उद्यमियों, अनुसूचित जाति-जनजाति के उद्यमियों और स्टार्टअप तक पहुंचे। हम पारदर्शी शासकीय खरीदी के साथ स्थानीय उद्यमिता को सशक्त बनाकर विकसित छत्तीसगढ़ के निर्माण की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहे हैं।

भारत और श्रीलंका ने ऊर्जा सहयोग को नई गति देने पर किया मंथन, बिजली क्षेत्र में कई अहम परियोजनाओं की समीक्षा

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नई दिल्ली- भारत और श्रीलंका ने आज नई दिल्ली में आयोजित उच्चस्तरीय बैठक में बिजली क्षेत्र में द्विपक्षीय सहयोग की व्यापक समीक्षा की। भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व केंद्रीय विद्युत एवं आवास एवं शहरी कार्य मंत्री मनोहर लाल ने किया, जबकि श्रीलंका की ओर से बंदरगाह एवं नागरिक उड्डयन तथा ऊर्जा मंत्री अनुरा करुणाथिलके ने प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया।

बैठक के दौरान दोनों देशों ने भारत–श्रीलंका एचवीडीसी (HVDC) इंटरकनेक्शन परियोजना और संपूर सौर ऊर्जा परियोजना की प्रगति की समीक्षा की। साथ ही सीमा-पार बिजली व्यापार, नवीकरणीय ऊर्जा, ट्रांसमिशन अवसंरचना और क्षमता निर्माण के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की संभावनाओं पर भी विस्तृत चर्चा की गई।

दोनों पक्षों ने क्षेत्रीय ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में परिवर्तन को गति देने के लिए आपसी सहयोग को और विस्तार देने पर सहमति जताई। इस दौरान भारत ने टैरिफ आधारित प्रतिस्पर्धी बोली (TBCB) के माध्यम से सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल के तहत ट्रांसमिशन सिस्टम विकसित करने के अपने अनुभव भी साझा किए।

बैठक में मौजूदा द्विपक्षीय तंत्रों के तहत हुई प्रगति की समीक्षा करते हुए दोनों देशों ने सतत विकास और क्षेत्रीय ऊर्जा सुरक्षा के लिए बिजली क्षेत्र में सहयोग को और मजबूत करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।

केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल ने भारत और श्रीलंका के बीच लंबे समय से चले आ रहे ऊर्जा सहयोग को आगे बढ़ाने की भारत की प्रतिबद्धता दोहराई। वहीं श्रीलंका के ऊर्जा मंत्री अनुरा करुणाथिलके ने भारत के निरंतर सहयोग की सराहना करते हुए ऊर्जा क्षेत्र में द्विपक्षीय साझेदारी को और विस्तार देने की इच्छा व्यक्त की।

बैठक में भारत सरकार की ओर से विद्युत मंत्रालय के सचिव पंकज अग्रवाल सहित वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे। श्रीलंका के प्रतिनिधिमंडल में भारत में श्रीलंका की उच्चायुक्त महिषिणी कोलोन्ने तथा अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल थे।

छत्तीसगढ़ में निराश्रित मवेशियों के संरक्षण के लिए बड़ी पहल,प्रदेश में स्थापित होंगे 1460 गौधाम

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रायपुर- राज्य में घुमंतू और बेसहारा पशुओं को सुरक्षित आश्रय देने, गौ-संरक्षण को बढ़ावा देने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा ‘गौधाम योजना’ को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा रहा है। योजना के अंतर्गत पूरे प्रदेश में कुल 1,460 गौधामों की स्थापना करने का लक्ष्य रखा गया है।

प्रदेश में स्थापित होंगे 1460 गौधाम

घुमन्तू एवं निराश्रित पशुधन के व्यवस्थापन हेतु शासन द्वारा छत्तीसगढ़ राज्य गौ सेवा आयोग रायपुर ने गौधाम योजना के तहत 1460 गौधामों की स्थापना की स्वीकृति प्रदान की गई। प्रत्येक विकासखंड में उत्कृष्ट 10 गौठानों का चयन कर गौधाम विकसित किए जाएंगे। 408 आवेदनों में से 151 आवेदनों को प्रशासकीय स्वीकृति दी जा चुकी है। 88 गौधामों का पंजीयन पूर्ण अब तक किए जा चुके हैं। वर्तमान में संचालित 42 गौधामों में लगभग 5 हजार 109 निराश्रित पशुओं को संरक्षण दिया जा रहा है।

राष्ट्रीय राजमार्गों के पास के गौठानों को प्राथमिकता

संयुक्त संचालक (पशु चिकित्सा सेवाएं) से मिली जानकारी के अनुसार, प्रथम चरण में ऐसे गौठानों का चयन किया गया है जो राष्ट्रीय राजमार्गों के समीप स्थित हैं और जहां सभी आवश्यक अधोसंरचनाएं पूर्ण हैं। गौधामों का संचालन स्वयंसेवी संस्थाओं, पंजीकृत गौशालाओं, एनजीओ, एफपीओ और ट्रस्ट के माध्यम से किया जाएगा। हाल ही में पशुधन विकास विभाग ने नियमों में संशोधन कर ग्राम पंचायतों को गौधाम संचालन में प्राथमिकता दी है। इसके अलावा शहरी गौठानों को भी इस योजना में शामिल किया गया है।

चयन और स्वीकृति की पारदर्शी प्रक्रिया

गौधाम स्थापना के लिए प्रक्रिया को काफी सख्त और पारदर्शी बनाया गया है। जिला स्तरीय समिति और कलेक्टर की अनुशंसा के बाद पंचायत से अनापत्ति प्रमाणपत्र लिया जाता है। भौतिक सत्यापन के बाद आवेदन छत्तीसगढ़ राज्य गौ सेवा आयोग को भेजे जाते हैं। आयोग की क्रियान्वयन समिति हर 3 महीने में होने वाली बैठक में इन आवेदनों की विस्तृत समीक्षा करती है। समीक्षा के पश्चात आवेदनों को अंतिम प्रशासकीय स्वीकृति के लिए शासन को भेजा जाता है, जिसके बाद अनुबंध और पंजीयन की कार्यवाही पूरी की जाती है।

ग्रामीण व कृषि अर्थव्यवस्था को मिलेगा बल

सरकार का मानना है कि गोधन हमारी ग्रामीण संस्कृति और कृषि व्यवस्था का मुख्य आधार है। ग्राम पंचायतों को संचालन का अधिकार मिलने और शहरी गौठानों को योजना में जोड़ने से भविष्य में गौधामों की संख्या में और वृद्धि होगी। वर्तमान में विभिन्न जिलों से नए गौधामों की स्थापना हेतु लगातार आवेदन प्राप्त हो रहे हैं, जिन पर त्वरित कार्यवाही जारी है।

पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की संसदीय परामर्शदात्री समिति की बैठक में मानव–वन्यजीव संघर्ष पर विस्तृत चर्चा

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नई दिल्ली में आज पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की संसदीय परामर्शदात्री समिति की बैठक केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव की अध्यक्षता में आयोजित हुई। बैठक का मुख्य विषय मानव–वन्यजीव संघर्ष (Human–Wildlife Conflict - HWC) तथा इसकी रोकथाम, शमन और मानव एवं वन्यजीवों के बीच दीर्घकालिक सह-अस्तित्व को सुदृढ़ करने के उपायों पर विचार-विमर्श था।

बैठक में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह, समिति के सदस्य सांसद, मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी, विभिन्न राज्यों के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCFs) और मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक (Chief Wildlife Wardens) उपस्थित रहे।

समिति को 18 दिसंबर 2025 को आयोजित पिछली बैठक में दिए गए निर्देशों पर हुई अनुवर्ती कार्रवाई की जानकारी दी गई। इसमें संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों के सांसदों के साथ राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा किए गए परामर्श शामिल थे।

बैठक में बताया गया कि मानव–वन्यजीव संघर्ष का स्वरूप विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग है। कई राज्यों में मानव–हाथी संघर्ष प्रमुख है, जबकि अन्य स्थानों पर बाघ, तेंदुआ, भालू, गैंडा, जंगली सूअर, गौर, बंदर तथा अन्य वन्यजीवों से जुड़े संघर्षों के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग प्रबंधन रणनीतियों की आवश्यकता है।

समिति को बताया गया कि प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की सातवीं बैठक में घोषित मानव–वन्यजीव संघर्ष उत्कृष्टता केंद्र (Centre of Excellence on Human–Wildlife Conflict) की स्थापना तमिलनाडु के कोयंबटूर स्थित SACON, WII South Centre में की गई है। यह केंद्र वैज्ञानिक अनुसंधान, तकनीकी नवाचार, नीति निर्माण, क्षमता विकास तथा समुदाय-केंद्रित उपायों के माध्यम से मानव–वन्यजीव संघर्ष के प्रभावी प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय संस्थान के रूप में कार्य करेगा।

इसके अलावा, 10 जुलाई 2026 को राष्ट्रीय मानव–वन्यजीव संघर्ष पोर्टल शुरू किए जाने की जानकारी दी गई। यह पोर्टल संघर्ष की घटनाओं के रिकॉर्ड, डेटा प्रबंधन, ज्ञान साझा करने तथा निर्णय समर्थन के लिए एकीकृत डिजिटल मंच उपलब्ध कराएगा। साथ ही दक्षिण भारत के लिए हाथी संरक्षण क्षेत्रीय कार्ययोजना (Regional Action Plan on Elephant Conservation) को भी मंजूरी दिए जाने की जानकारी दी गई।

बैठक में असम, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश ने अपने-अपने राज्यों में मानव–वन्यजीव संघर्ष की स्थिति, अपनाए गए समाधान, सामुदायिक भागीदारी, तकनीकी नवाचार तथा भविष्य की रणनीतियों पर प्रस्तुतियां दीं। इन प्रस्तुतियों में परिदृश्य आधारित योजना, त्वरित प्रतिक्रिया प्रणाली, आवास सुधार, वन्यजीव गलियारों का संरक्षण, वैज्ञानिक निगरानी, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, सामुदायिक सहभागिता तथा अंतरराज्यीय समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया गया।

राज्यों की प्रमुख पहलें

1. असम

  • हाथी, बाघ, तेंदुआ, गैंडा, जंगली भैंसा और जंगली सूअर से जुड़े संघर्षों के लिए परिदृश्य आधारित रणनीति प्रस्तुत की।

  • क्षेत्रवार कार्ययोजनाओं के लिए जोनल मानव–वन्यजीव संघर्ष जोखिम न्यूनीकरण समितियों का गठन किया।

  • आवास पुनर्स्थापन, वन्यजीव गलियारों की सुरक्षा, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और वैकल्पिक आजीविका पर विशेष ध्यान दिया।

2. कर्नाटक

  • इंजीनियरिंग उपायों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), कमांड सेंटर, त्वरित प्रतिक्रिया दल, सामुदायिक स्वयंसेवक नेटवर्क और e-Parihara डिजिटल मुआवजा प्रणाली पर आधारित छह-स्तंभीय मॉडल प्रस्तुत किया।

  • राष्ट्रीय मानव–वन्यजीव संघर्ष मिशन, समान एसओपी (SOP), गलियारों की बहाली और अंतरराज्यीय समन्वय का सुझाव दिया।

3. केरल

  • मानव–वन्यजीव संघर्ष को राज्य-विशिष्ट आपदा घोषित करने, त्वरित प्रतिक्रिया दल, 273 संघर्ष प्रभावित पंचायतों की पहचान तथा जना जागरथा समितियों और SARPA स्वयंसेवी कार्यक्रम जैसी सामुदायिक पहलों की जानकारी दी।

  • वन्यजीव गलियारों की बहाली, आवास प्रबंधन, जिम्मेदार पर्यटन और तकनीक आधारित निगरानी पर जोर दिया।

4. मध्य प्रदेश

  • 'प्रिवेंशन फर्स्ट' मॉडल प्रस्तुत किया, जिसमें AI आधारित निगरानी, GPS ट्रैकिंग, ड्रोन, गजरक्षक, त्वरित प्रतिक्रिया दल, प्रजाति-विशिष्ट एसओपी, समयबद्ध मुआवजा तथा बाघ मित्र, हाथी मित्र और इको-डेवलपमेंट समितियों के माध्यम से सामुदायिक भागीदारी शामिल है।

  • संघर्षकारी वन्यजीवों के वैज्ञानिक प्रबंधन और स्थानांतरण (Translocation) पर भी प्रकाश डाला।

5. उत्तराखंड

  • एकीकृत कमांड एवं कंट्रोल सेंटर, 24×7 हेल्पलाइन 1926, ई-निगरानी, GPS ट्रैकिंग, जैविक बाड़, समयबद्ध मुआवजा तथा गांव-स्तरीय स्वयंसेवक नेटवर्क की जानकारी दी।

  • 'लिविंग विद लेपर्ड्स/टाइगर्स' पहल के तहत दीर्घकालिक सह-अस्तित्व रणनीति प्रस्तुत की।

6. उत्तर प्रदेश

  • बताया कि राज्य में अधिकांश मानव–वन्यजीव संघर्ष तेंदुओं से संबंधित हैं और तराई आर्क लैंडस्केप सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र है।

  • त्वरित प्रतिक्रिया दल, चार बचाव केंद्र, सौर बाड़, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, स्वयंसेवी कार्यक्रम तथा वैज्ञानिक निगरानी पर आधारित रणनीति प्रस्तुत की।

बैठक में इस बात पर सहमति बनी कि मानव–वन्यजीव संघर्ष का प्रभावी समाधान पारिस्थितिक संरक्षण, मानव जीवन और आजीविका की सुरक्षा को साथ लेकर चलने वाली समन्वित रणनीति से ही संभव है। आधुनिक तकनीकों जैसे GIS, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), ड्रोन, रेडियो टेलीमेट्री और प्रेडिक्टिव एनालिटिक्स के उपयोग के साथ-साथ वन कर्मियों की क्षमता बढ़ाने, मुआवजा व्यवस्था में सुधार, जनजागरूकता और सामुदायिक भागीदारी को मजबूत करने पर विशेष बल दिया गया।


बैठक के अंत में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने राज्यों द्वारा किए जा रहे प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि मानव–वन्यजीव संघर्ष की चुनौती का समाधान वैज्ञानिक प्रबंधन, संस्थागत समन्वय, तकनीक आधारित निगरानी और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी से ही संभव है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय मानव–वन्यजीव संघर्ष पोर्टल और उत्कृष्टता केंद्र राज्यों को डेटा आधारित रणनीति बनाने, अनुभव साझा करने और सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाने में महत्वपूर्ण सहयोग देंगे।

बैठक की शुरुआत में पर्यावरण राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने सुझाव दिया कि विभिन्न आवास क्षेत्रों की धारण क्षमता (Carrying Capacity) का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाए, ताकि यह पता लगाया जा सके कि संबंधित पारिस्थितिकी तंत्र वन्यजीवों का कितना भार वहन कर सकता है। इससे संसाधनों के बेहतर प्रबंधन और मानव–वन्यजीव संघर्ष को कम करने की रणनीति बनाने में सहायता मिलेगी।

बैठक का समापन सांसदों द्वारा मानव–वन्यजीव संघर्ष को कम करने और भारत की समृद्ध वन्यजीव विरासत के दीर्घकालिक संरक्षण के लिए राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर आवश्यक उपायों पर विस्तृत चर्चा के साथ हुआ।

यदि चाहें, मैं इसका संक्षिप्त हिंदी प्रेस विज्ञप्ति, समाचार शैली या सरल हिंदी सारांश भी तैयार कर सकता हूँ।

महानदी विवाद नहीं, छत्तीसगढ़-ओडिशा की साझा समृद्धि का आधार बने : मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय

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श्रमशक्ति भवन में केंद्रीय जल शक्ति मंत्री की अध्यक्षता में छत्तीसगढ़, ओडिशा की उच्चस्तरीय बैठक

नई दिल्ली- नई दिल्ली स्थित श्रमशक्ति भवन में आज केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल की अध्यक्षता में महानदी जल विवाद के समाधान को लेकर छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच उच्चस्तरीय बैठक आयोजित हुई। बैठक में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, ओडिशा के मुख्यमंत्री  मोहन चरण माझी, केंद्रीय आवासन एवं शहरी कार्य राज्य मंत्री तोखन साहू सहित दोनों राज्यों के वरिष्ठ अधिकारियों एवं जल संसाधन विभाग के अधिकारियों ने भाग लिया।

बैठक में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि महानदी छत्तीसगढ़ और ओडिशा दोनों राज्यों की साझा जीवनरेखा है। यह किसानों, उद्योगों, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा विषय है। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ इस बैठक को विवाद की निरंतरता नहीं, बल्कि समाधान की नई शुरुआत के रूप में देखता है।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि छत्तीसगढ़ ओडिशा की सिंचाई, पेयजल और हीराकुंड परियोजना से जुड़ी चिंताओं का सम्मान करता है। साथ ही उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ के किसानों, आदिवासी क्षेत्रों, सूखा प्रभावित अंचलों और भविष्य की विकास आवश्यकताओं को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए। उन्होंने दोनों राज्यों के हितों को ध्यान में रखते हुए सम्मानजनक, व्यावहारिक और दीर्घकालिक समाधान पर बल दिया।

मुख्यमंत्री ने सुझाव दिया कि दोनों राज्यों के विशेषज्ञ उपलब्ध जल के वैज्ञानिक आकलन, कम वर्षा वाले वर्षों के लिए साझा व्यवस्था तथा भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए स्थायी संस्थागत तंत्र विकसित करें। उन्होंने यह भी कहा कि प्रशासनिक एवं तकनीकी स्तर पर अधिकतम मुद्दों का समाधान किया जाए और केवल नीतिगत विषय ही मंत्रिस्तरीय स्तर पर लाए जाएं।

साय ने केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल और केंद्रीय जल आयोग से निष्पक्ष तकनीकी सहयोग, समयबद्ध कार्ययोजना तथा दोनों राज्यों के बीच दीर्घकालिक समझौते का प्रारूप तैयार कराने में सक्रिय भूमिका निभाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि महानदी विवाद की रेखा नहीं, बल्कि सहयोग, विकास और भाईचारे का सेतु बने।

मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह के नेतृत्व का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि सहकारी संघवाद और संवाद आधारित दृष्टिकोण ने वर्षों पुराने जटिल विषयों के समाधान का सकारात्मक वातावरण तैयार किया है। उन्होंने विश्वास जताया कि इस प्रक्रिया से दोनों राज्यों के किसानों, नागरिकों और भावी पीढ़ियों का जल भविष्य सुरक्षित होगा।

बैठक में छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव विकासशील, मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह सहित अन्य अधिकारी शामिल हुए।

वैश्विक बाघ दिवस पर प्रधानमंत्री मोदी ने दी शुभकामनाएं, बाघ संरक्षण के प्रति दोहराई प्रतिबद्धता

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 प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वैश्विक बाघ दिवस (Global Tiger Day) के अवसर पर सभी वन्यजीव प्रेमियों को शुभकामनाएं दी हैं।

प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत के लोगों के लिए यह गर्व की बात है कि विश्व की लगभग 70 प्रतिशत बाघ आबादी भारत में निवास करती है।

उन्होंने कहा कि भारत के बाघ संरक्षण प्रयास प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन जीने की हमारी सदियों पुरानी संस्कृति से प्रेरित हैं और देशवासियों की सामूहिक इच्छाशक्ति से संचालित होते हैं।

मोदी ने विज्ञान-आधारित संरक्षण, जनभागीदारी तथा सतत विकास के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई, जो बाघ संरक्षण को और अधिक सशक्त बनाते हैं।

प्रधानमंत्री ने बाघों की सुरक्षा में वन कर्मियों, वैज्ञानिकों और संरक्षणवादियों के समर्पण एवं योगदान की सराहना की। उन्होंने कहा कि भारत स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाने तथा मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए भी प्रतिबद्ध है।

एक्स (X) पर अपने पोस्ट में प्रधानमंत्री ने कहा:

“वैश्विक बाघ दिवस पर सभी वन्यजीव प्रेमियों को हार्दिक शुभकामनाएं। भारत के लोगों को इस बात पर गर्व है कि विश्व के लगभग 70 प्रतिशत बाघ हमारे देश में हैं। भारत के बाघ संरक्षण के प्रयास प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन जीने की हमारी सदियों पुरानी संस्कृति से प्रेरित हैं और हमारे लोगों की सामूहिक इच्छाशक्ति से सशक्त होते हैं। हम विज्ञान-आधारित संरक्षण, जनभागीदारी और सतत विकास के प्रति अपनी प्रतिबद्धता भी दोहराते हैं, जो बाघ संरक्षण को और मजबूत बनाते हैं।”

“हमारे वन कर्मियों, वैज्ञानिकों और संरक्षणवादियों के अथक प्रयास तथा समर्पण ने भी बाघ संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसी भावना के साथ भारत स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाने और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए प्रतिबद्ध है।”

प्रकृति के साथ संतुलन और जल संरक्षण भविष्य की सुरक्षा के लिए आवश्यक – राज्यपाल डेका

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राज्यपाल ने पर्यावरण संरक्षण एवं आपदा प्रबंधन’अभियान का किया शुभारंभ

रायपुर- राज्यपाल रमेन डेका ने कहा कि मनुष्य, पेड़-पौधों और पशु-पक्षियों के बीच संतुलन बनाए रखना पर्यावरण संरक्षण के लिए अत्यंत आवश्यक है। जलवायु परिवर्तन, बढ़ता तापमान, जल संकट और प्रदूषण आज गंभीर चुनौती बनते जा रहे हैं। आने वाले समय में छत्तीसगढ़ को भी जल संकट का सामना करना पड़ सकता है, इसलिए हमें अभी से जल संरक्षण के लिए प्रभावी प्रयास करने होंगे।

पर्यावरण संरक्षण और आपदा प्रबंधन के प्रति जन-जागरूकता का देगा संदेश

राज्यपाल डेका ने आज प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय द्वारा  पर्यावरण संरक्षण एवं आपदा प्रबंधन’के लिए आयोजित राष्ट्रीय अभियान का शुभारंभ करते हुए उक्त विचार व्यक्त किए। उन्होंने अभियान में शामिल ब्रह्माकुमारी बहनों एवं भाइयों को  झंडी दिखाकर रवाना किया। यह अभियान 26 जुलाई से 9 अगस्त 2026 तक रायपुर से जबलपुर की यात्रा करते हुए छत्तीसगढ़ एवं मध्य प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में पर्यावरण संरक्षण और आपदा प्रबंधन के प्रति जन-जागरूकता का संदेश देगा।

वृक्षारोपण, जल संरक्षण, प्लास्टिक मुक्त जीवनशैली के लिए प्रेरित करना

राज्यपाल ने कहा कि ब्रह्माकुमारीज़ संस्थान की यह पहल केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि जन-जागृति का अभियान है। इसके माध्यम से बड़ी संख्या में लोगों को वृक्षारोपण, जल संरक्षण, प्लास्टिक मुक्त जीवनशैली और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार व्यवहार अपनाने के लिए प्रेरित किया जाएगा।  

घने वन, जीवनदायिनी नदियां और समृद्ध जैव-विविधता हमारी अमूल्य धरोहर

 डेका ने कहा कि प्रकृति हमारी मां के समान है और उसका संरक्षण करना हम सभी का दायित्व है। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ के निवासी सौभाग्यशाली हैं। यह प्राकृतिक संपदा से समृद्ध प्रदेश है। यहां के घने वन, जीवनदायिनी नदियां और समृद्ध जैव-विविधता हमारी अमूल्य धरोहर हैं। प्रदेश की जनजातीय संस्कृति भी सदियों से प्रकृति के साथ सामंजस्य और सह-अस्तित्व का संदेश देती आई है। बदलते समय में जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय चुनौतियों से छत्तीसगढ़ भी अछूता नहीं है। इसलिए यहां की हरियाली और प्राकृतिक जल स्रोतों को संरक्षित करना आवश्यक है।

पर्यावरण प्रदूषण कम करने और इको फ्रेंडली तथा नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग को प्रोत्साहन

राज्यपाल ने जल संरक्षण पर विशेष जोर देते हुए कहा कि पानी की उपलब्धता भविष्य की एक बड़ी चुनौती है। जल का विवेकपूर्ण उपयोग करने के साथ वर्षा जल संचयन और परंपरागत जल स्रोतों के संरक्षण को प्राथमिकता देनी होगी। पर्यावरण प्रदूषण कम करने के लिए इको फ्रेंडली व्यवस्थाओं तथा नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग को भी बढ़ावा देना होगा।

सिंगल यूज प्लास्टिक का उपयोग कम करना

राज्यपाल ने माइक्रोप्लास्टिक के बढ़ते दुष्प्रभावों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यह मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बन रहा है। माइक्रोप्लास्टिक का प्रभाव मां के दूध तक में दिखाई देना भविष्य की पीढ़ियों के स्वास्थ्य की दृष्टि से चिंताजनक है। उन्होंने सिंगल यूज प्लास्टिक का उपयोग कम करने और पर्यावरण संरक्षण के अभियान से समाज एवं समुदाय के प्रत्येक वर्ग को जोड़ने पर जोर दिया।

आपदा प्रबंधन से उनके प्रभाव को काफी हद तक कम करना

 राज्यपाल डेका ने कहा कि प्राकृतिक आपदाओं को पूरी तरह रोक पाना संभव नहीं है, लेकिन बेहतर तैयारी, जागरूकता और प्रभावी आपदा प्रबंधन से उनके प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। धरती का बढ़ता तापमान, अनियमित मौसम और प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती घटनाएं हमें प्रकृति के प्रति अपने व्यवहार पर पुनर्विचार करने का संकेत दे रही हैं।

सकारात्मक विचार और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता विकसित करना

डेका ने कहा कि यह अभियान विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय का भी संदेश देता है। राजयोग के माध्यम से सकारात्मक विचार और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता विकसित होती है। भौतिक प्रगति के साथ नैतिक एवं आध्यात्मिक चेतना भी आवश्यक है।

प्रत्येक व्यक्ति कम से कम एक पौधा अवश्य लगाए

राज्यपाल ने सभी नागरिकों से पानी की एक-एक बूंद बचाने, सिंगल यूज प्लास्टिक का त्याग करने और वृक्षारोपण को जन-आंदोलन बनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति कम से कम एक पौधा अवश्य लगाए और उसकी संतान की तरह देखभाल करे। आज पर्यावरण संरक्षण की दिशा में किया गया प्रत्येक छोटा प्रयास आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और खुशहाल भविष्य के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देगा।

 इस अवसर पर ब्रह्माकुमारीज़ संस्थान के पदाधिकारी, ब्रह्माकुमारी बहनें एवं भाई तथा अभियान से जुड़े सदस्य उपस्थित थे।


कैच द रेन अभियान (4 जुलाई–4 अगस्त 2026): नंद्याल जिले में वर्षा जल संरक्षण की दिशा में व्यापक पहल

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कैच द रेन अभियान (4 जुलाई–4 अगस्त 2026) आंध्र प्रदेश के नंद्याल जिले में “जहाँ वर्षा हो, वहीं वर्षा जल को संजोएँ (Catch the Rain, Where it Falls, When it Falls)” के सिद्धांत पर प्रभावी रूप से संचालित किया जा रहा है। इस अभियान का उद्देश्य प्रत्येक बूंद वर्षा जल का संरक्षण करना है। इसके अंतर्गत पारंपरिक जलाशयों का पुनर्जीवन, फीडर एवं सप्लाई चैनलों की गाद निकासी (डी-सिल्टिंग), टैंक प्रणालियों का पुनर्स्थापन तथा अतिरिक्त जल भंडारण क्षमता का निर्माण किया जा रहा है। विभिन्न विभागों के समन्वित प्रयासों, वैज्ञानिक योजना और जनभागीदारी के माध्यम से जिला वर्षा जल संरक्षण अवसंरचना को सुदृढ़ बना रहा है तथा मानसूनी जल के संग्रहण एवं भंडारण की क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि कर रहा है।

वैज्ञानिक योजना एवं जनभागीदारी आधारित क्रियान्वयन

जिले की सभी 489 ग्राम पंचायतों में फील्ड सर्वे, प्राथमिकता वाले जलाशयों, फीडर चैनलों एवं जलग्रहण क्षेत्रों का मानचित्रण तथा संबंधित विभागों द्वारा तकनीकी मूल्यांकन के आधार पर वैज्ञानिक योजना तैयार की गई। स्थानीय समुदायों एवं ग्राम के वरिष्ठ नागरिकों से परामर्श लेकर स्थानीय आवश्यकताओं एवं पारंपरिक ज्ञान के अनुरूप कार्यों की पहचान की गई। प्रस्तावित कार्यों को पारदर्शिता एवं सामुदायिक सहभागिता सुनिश्चित करने के लिए ग्राम सभा के समक्ष प्रस्तुत किया गया।

इस वैज्ञानिक एवं सहभागी योजना प्रक्रिया के आधार पर जिले में 2,103 जल संरक्षण कार्यों की पहचान, स्वीकृति एवं शत-प्रतिशत (100%) ग्राउंडिंग सुनिश्चित की गई। इन कार्यों की रणनीतिक योजना वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण तथा जल भंडारण क्षमता को अधिकतम करने के उद्देश्य से तैयार की गई है, जिससे कैच द रेन अभियान के लक्ष्यों को प्रभावी रूप से साकार किया जा सके।

बड़े पैमाने पर जल संरक्षण कार्य

अभियान के अंतर्गत 2,691 किलोमीटर लंबे फीडर एवं सप्लाई चैनलों की गाद निकासी एवं पुनर्स्थापन किया गया, जिससे वर्षा जल का टैंकों एवं जलाशयों तक सुचारु प्रवाह सुनिश्चित हुआ।

इसके अतिरिक्त, 251 लघु सिंचाई टैंकों के पुनर्स्थापन का कार्य किया गया, जिनमें से 225 कार्य पूर्ण हो चुके हैं, जबकि शेष कार्य प्रगति पर हैं।

जिले में 22,221 फार्म पॉन्ड, 2,221 चेक डैम तथा 202 परकोलेशन टैंक के नेटवर्क को भी सुदृढ़ किया गया है। इन संरचनाओं से वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण तथा जल उपलब्धता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इससे जल संरक्षण प्रणाली की समग्र दक्षता बढ़ी है और जिले की प्रत्येक संभव वर्षा बूंद को संचित करने की क्षमता और मजबूत हुई है।

अतिरिक्त जल भंडारण क्षमता का सृजन

इन सभी कार्यों से उत्पन्न अतिरिक्त जल भंडारण क्षमता का आकलन संबंधित इंजीनियरिंग विभागों द्वारा तैयार तकनीकी अनुमानों के आधार पर किया गया।

फीडर चैनलों एवं जल संरक्षण संरचनाओं के पुनर्स्थापन से 3.27 टीएमसी टैंक भंडारण क्षमता की पुनर्बहाली का अनुमान है, जबकि नई जल संरक्षण संरचनाओं के निर्माण से 0.03 टीएमसी अतिरिक्त जल भंडारण क्षमता का सृजन हुआ है।

टैंकों एवं अन्य जल निकायों की मानसूनी जल संग्रहण क्षमता में वृद्धि के माध्यम से ये वैज्ञानिक रूप से नियोजित हस्तक्षेप भूजल पुनर्भरण को मजबूत करते हैं तथा कृषि, आजीविका और स्थानीय समुदायों के लिए जल उपलब्धता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

सतत जल सुरक्षा की दिशा में

कैच द रेन अभियान के अंतर्गत नंद्याल जिले में 2,691 किलोमीटर फीडर एवं सप्लाई चैनलों की गाद निकासी, 251 लघु सिंचाई टैंकों का पुनर्स्थापन, 2,103 जल संरक्षण कार्यों का क्रियान्वयन तथा हजारों वर्षा जल संचयन संरचनाओं का पुनर्जीवन जल संरक्षण प्रयासों को नई गति प्रदान कर रहा है।

वैज्ञानिक योजना, तकनीकी मूल्यांकन तथा सक्रिय जनभागीदारी पर आधारित यह समन्वित पहल जिले की वर्षा जल संग्रहण, भंडारण एवं भूजल पुनर्भरण क्षमता को सुदृढ़ करते हुए दीर्घकालिक जल सुरक्षा एवं जलवायु लचीलापन (Climate Resilience) को मजबूत बना रही है।

नंद्याल जिले का यह एकीकृत मॉडल दर्शाता है कि विभिन्न विभागों के समन्वित प्रयासों और सामुदायिक सहभागिता के माध्यम से "जहाँ वर्षा हो, वहीं वर्षा जल को संजोएँ" की अवधारणा को सफलतापूर्वक लागू करते हुए सतत जल संरक्षण एवं जल सुरक्षा के लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल की जा रही हैं।

राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस-2026: वैज्ञानिक सोच और नवाचार से सतत विकास का संकल्प

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33 जिलों के जिला समन्वयकों एवं रिसोर्स शिक्षकों का राज्य स्तरीय उन्मुखीकरण सम्पन्न

'साइंस एंड इनोवेशन फॉर सस्टेनेबिलिटी' विषय पर स्थानीय समस्याओं के वैज्ञानिक समाधान विकसित करने पर जोर

रायपुर- विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, छत्तीसगढ़ शासन तथा छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (सीकॉस्ट) द्वारा राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार के सहयोग से आयोजित 32वीं राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस-2026 के अंतर्गत जिला समन्वयकों एवं रिसोर्स शिक्षकों के लिए एक दिवसीय राज्य स्तरीय उन्मुखीकरण कार्यशाला का आयोजन शुक्रवार को रीजनल साइंस सेंटर, रायपुर में किया गया। 

कार्यशाला का उद्देश्य प्रदेशभर के शिक्षकों एवं जिला समन्वयकों को राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस की नई थीम, परियोजना निर्माण प्रक्रिया, वैज्ञानिक अनुसंधान पद्धति तथा मूल्यांकन प्रणाली से अवगत कराना था, ताकि अधिकाधिक विद्यार्थी स्थानीय समस्याओं पर आधारित वैज्ञानिक परियोजनाएं तैयार कर राष्ट्रीय स्तर तक अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर सकें। कार्यशाला का आयोजन प्रमुख सचिव, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग सोनमणी बोरा तथा महानिदेशक, छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद एवं रीजनल साइंस सेंटर प्रशांत कविश्वर के मार्गदर्शन में किया गया।

विद्यार्थियों को विज्ञान एवं अनुसंधान से जोड़ने का महत्वपूर्ण मंच

राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस देश का एक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक कार्यक्रम है, जो 10 से 17 वर्ष आयु वर्ग के विद्यार्थियों को विज्ञान एवं अनुसंधान से जोड़ने का महत्वपूर्ण मंच प्रदान करता है। इस कार्यक्रम के माध्यम से विद्यार्थी वैज्ञानिक पद्धति अपनाते हुए स्थानीय समस्याओं की पहचान करते हैं, आंकड़ों का संग्रह एवं विश्लेषण करते हैं तथा नवाचार आधारित समाधान प्रस्तुत करते हैं। ब्लॉक, जिला एवं राज्य स्तर पर चयनित बाल वैज्ञानिक राष्ट्रीय स्तर पर अपने राज्य का प्रतिनिधित्व करते हैं।

विद्यार्थियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, अनुसंधान क्षमता और नवाचार आधारित सोच विकसित करना

इस अवसर पर छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के वैज्ञानिक 'ई' एवं राज्य समन्वयक डॉ. जे. के. राय, वैज्ञानिक 'डी' डॉ. ए. के. पाठक, वैज्ञानिक 'डी' डॉ. अमित दुबे, राज्य अकादमिक समन्वयक प्रो. (डॉ.) केशव कांत साहू तथा वनस्पति विज्ञान के वरिष्ठ शिक्षाविद डॉ. वी. के. कानूनगो कार्यक्रम में शामिल हुए। सभी वक्ताओं ने राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस-2026 की थीम "साइंस एंड इनोवेशन फॉर सस्टेनेबिलिटी" की प्रासंगिकता पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि आज की सबसे बड़ी आवश्यकता विद्यार्थियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, अनुसंधान क्षमता और नवाचार आधारित सोच विकसित करना है। उन्होंने शिक्षकों एवं जिला समन्वयकों से आग्रह किया कि वे विद्यार्थियों को अपने आसपास की समस्याओं की वैज्ञानिक पहचान कर व्यावहारिक समाधान विकसित करने के लिए प्रेरित करें।

राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस की रूपरेखा और परियोजना निर्माण की जानकारी

कार्यशाला में राज्य समन्वयक डॉ. जे. के. राय ने राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस-2026 की संपूर्ण रूपरेखा, पात्रता, परियोजना निर्माण की प्रक्रिया, अनुसंधान पद्धति, दस्तावेजीकरण, प्रस्तुतीकरण एवं मूल्यांकन प्रणाली की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वैज्ञानिक परियोजनाएं केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित न रहकर स्थानीय आवश्यकताओं एवं समाजोपयोगी विषयों पर आधारित होनी चाहिए, जिससे विद्यार्थियों में वैज्ञानिक सोच के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व भी विकसित हो।

स्थानीय समस्याओं पर आधारित परियोजनाओं को मिलेगा बढ़ावा

तकनीकी सत्र में विशेषज्ञों ने इस वर्ष की थीम के विभिन्न उपविषयों पर विस्तृत प्रस्तुतियां दीं। इनमें R5 तकनीक (Reduce, Reuse, Recover, Redesign एवं Recycle) के माध्यम से कचरा प्रबंधन, E4 मॉडल (Explore, Experiment, Enhance एवं Evolve) के जरिए ऊर्जा संरक्षण एवं नवाचार, जल संचयन, पुनर्चक्रण एवं संरक्षण, तथा खाद्य, कृषि एवं स्वास्थ्य की स्थिरता के लिए भारतीय ज्ञान प्रणालियों के उपयोग जैसे विषय शामिल रहे। विशेषज्ञों ने बताया कि इन विषयों पर विद्यार्थियों द्वारा स्थानीय समस्याओं के समाधान आधारित उत्कृष्ट वैज्ञानिक परियोजनाएं विकसित की जा सकती हैं।मिशन लाइफ़ की भावना से जोड़ने का आह्वान

राज्य अकादमिक समन्वयक प्रो. (डॉ.) केशव कांत साहू ने राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस की थीम और उसके विभिन्न उपविषयों का विस्तार से परिचय देते हुए कहा कि विद्यार्थियों को केवल वैज्ञानिक जानकारी देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें अनुसंधान, डेटा संग्रहण, विश्लेषण एवं समाधान आधारित सोच के लिए प्रेरित करना भी आवश्यक है। उन्होंने मार्गदर्शकों को वैज्ञानिक लेखन, परियोजना प्रस्तुतीकरण तथा मूल्यांकन के मानकों से अवगत कराते हुए Mission LiFE की भावना के अनुरूप अधिकाधिक विद्यार्थियों की सहभागिता सुनिश्चित करने का आह्वान किया।

R5 तकनीक से पर्यावरण संरक्षण का संदेश

डॉ. वी. के. कानूनगो ने अपने व्याख्यान में R5 सिद्धांतों की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग, अपशिष्ट में कमी, पुनः उपयोग, पुनः डिज़ाइन तथा पुनर्चक्रण की अवधारणा को अपनाकर प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण किया जा सकता है। उन्होंने विद्यार्थियों को पर्यावरण संरक्षण के लिए दैनिक जीवन में इन सिद्धांतों को अपनाने के लिए प्रेरित किया।

ऊर्जा संरक्षण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर विशेष जोर

राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) रायपुर के सहायक प्राध्यापक डॉ. आयुष खरे ने ऊर्जा के क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते उपयोग पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि एआई आधारित तकनीकों के माध्यम से ऊर्जा दक्षता बढ़ाने, संसाधनों के बेहतर प्रबंधन तथा स्वच्छ ऊर्जा प्रणालियों के विकास को नई दिशा मिल रही है। उन्होंने विद्यार्थियों से ऊर्जा क्षेत्र में नवाचार आधारित अनुसंधान करने का आह्वान किया।

वैज्ञानिक परियोजनाओं को प्रोत्साहित करने का आग्रह

वहीं, प्रो. नमिता ब्राह्मे ने ऊर्जा संरक्षण, नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों तथा ऊर्जा दक्ष तकनीकों को सतत विकास की आधारशिला बताते हुए शिक्षकों से विद्यालय स्तर पर ऊर्जा ऑडिट, एलईडी अध्ययन, सौर कुकर एवं अन्य वैज्ञानिक परियोजनाओं को प्रोत्साहित करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक विद्यार्थी को "एनर्जी एम्बेसडर" बनकर समाज में ऊर्जा संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलानी चाहिए।

प्रदेशभर के शिक्षक होंगे वैज्ञानिक प्रतिभाओं के मार्गदर्शक

कार्यशाला में प्रदेश के सभी 33 जिलों से जिला समन्वयकों एवं रिसोर्स शिक्षकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। प्रशिक्षण के माध्यम से उन्हें राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस-2026 के सफल आयोजन तथा अधिक से अधिक बाल वैज्ञानिकों को शोध एवं नवाचार आधारित परियोजनाओं से जोड़ने के लिए आवश्यक मार्गदर्शन प्रदान किया गया। आगामी राज्य स्तरीय बाल विज्ञान कांग्रेस में प्रदेशभर से चयनित बाल वैज्ञानिक अपनी शोध परियोजनाओं का प्रदर्शन करेंगे, जिनमें उत्कृष्ट प्रतिभागी राष्ट्रीय स्तर पर छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व करेंगे। कार्यशाला में छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद एवं रीजनल साइंस सेंटर के वैज्ञानिकों एवं अधिकारियों की भी सक्रिय सहभागिता रही।

नई दिल्ली में राष्ट्रीय उत्तरदायी व्यावसायिक आचरण सम्मेलन (NCRBC) 2026 का शुभारंभ

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नई दिल्ली- राष्ट्रीय उत्तरदायी व्यावसायिक आचरण सम्मेलन (National Conference on Responsible Business Conduct - NCRBC) 2026 के चौथे संस्करण का शुभारंभ नई दिल्ली में हुआ। दो दिवसीय इस सम्मेलन का विषय "विकसित भारत के लिए ESG-आधारित परिवर्तन (ESG-led Transformation for Viksit Bharat)" रखा गया है। सम्मेलन का आयोजन भारतीय कॉरपोरेट कार्य संस्थान (IICA) के स्कूल ऑफ बिजनेस एनवायरनमेंट (SBE) द्वारा किया गया है। IICA, कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्थान है।

उत्तरदायी व्यावसायिक आचरण विकसित भारत की आधारशिला : नितिन गुप्ता

सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग प्राधिकरण (NFRA) के अध्यक्ष नितिन गुप्ता ने कहा कि उत्तरदायी व्यावसायिक आचरण (Responsible Business Conduct) विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने, प्रतिस्पर्धी उद्योगों, विश्वसनीय बाजारों, समावेशी विकास और पर्यावरणीय स्थिरता के लिए अत्यंत आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि भारत ने सस्टेनेबिलिटी डिस्क्लोजर को मजबूत करने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन अब इन सूचनाओं की गुणवत्ता, विश्वसनीयता और निर्णय लेने में उपयोगिता बढ़ाने पर ध्यान देना होगा। उन्होंने जोर दिया कि सस्टेनेबिलिटी संबंधी जानकारी प्रासंगिक, तुलनीय, साक्ष्य-आधारित और सत्यापन योग्य होनी चाहिए।

गुप्ता ने कहा कि सस्टेनेबिलिटी रिपोर्टिंग में भी वही अनुशासन और कठोरता अपनाई जानी चाहिए जो वित्तीय रिपोर्टिंग और ऑडिट में अपनाई जाती है। उन्होंने दस्तावेजीकरण, ट्रेसबिलिटी, आंतरिक नियंत्रण, साक्ष्य संरक्षण, पेशेवर जांच और स्वतंत्र सत्यापन को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।

उन्होंने यह भी कहा कि विशेषकर एमएसएमई (MSMEs) और आपूर्ति श्रृंखलाओं में तकनीक के बेहतर उपयोग तथा संस्थागत क्षमता निर्माण के माध्यम से व्यावहारिक और संतुलित सस्टेनेबिलिटी रिपोर्टिंग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

ESG को आर्थिक विकास का अभिन्न हिस्सा बनाना होगा : ज्ञानेश्वर कुमार सिंह

भारतीय कॉरपोरेट कार्य संस्थान (IICA) के महानिदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी ज्ञानेश्वर कुमार सिंह ने स्वागत भाषण में कहा कि वर्ष 2047 तक भारत को 30 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लक्ष्य के लिए ESG (पर्यावरण, सामाजिक और सुशासन) को केवल नियामकीय अनुपालन तक सीमित नहीं रखा जा सकता, बल्कि इसे आर्थिक विकास का अभिन्न हिस्सा बनाना होगा।

उन्होंने कहा कि उत्तरदायी व्यावसायिक आचरण भारत की सांस्कृतिक परंपरा में निहित है। उन्होंने वर्ष 2009 में जारी कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) संबंधी स्वैच्छिक दिशा-निर्देशों से लेकर 2021 में लागू बिजनेस रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड सस्टेनेबिलिटी रिपोर्टिंग (BRSR) ढांचे तक की यात्रा का उल्लेख किया।

उन्होंने बताया कि कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 166(2) में हितधारकों के हितों को प्राथमिकता देने का सिद्धांत पहले ही शामिल कर लिया गया था, जो भारत की दूरदर्शी सोच को दर्शाता है।

सिंह ने कहा कि भारत अब "ESG 1.0" से "ESG 2.0" की ओर बढ़ रहा है, जहां ESG केवल अनुपालन नहीं बल्कि दीर्घकालिक व्यवसायिक मूल्य, जोखिम प्रबंधन और संस्थागत मजबूती का आधार बन चुका है।

उन्होंने बोर्ड स्तर पर ESG को निर्णय प्रक्रिया में शामिल करने, ग्रीनवॉशिंग रोकने के लिए सस्टेनेबिलिटी डेटा के कानूनी ढांचे को मजबूत करने तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) जैसी तकनीकों का उपयोग बढ़ाने पर बल दिया।

व्यवसायिक रणनीति में शामिल हों बाल अधिकार : यूनिसेफ

यूनिसेफ इंडिया के उप-प्रतिनिधि जेस्पर मोलर ने कहा कि बाल अधिकारों को केवल परोपकारी गतिविधि नहीं बल्कि कंपनियों की मुख्य व्यावसायिक रणनीति का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत में 40 करोड़ से अधिक बच्चे भविष्य के कार्यबल और उपभोक्ता हैं।

उन्होंने असम के एक चाय बागान का उदाहरण देते हुए बताया कि मातृत्व अवकाश, कार्यस्थल पर क्रेच और जिम्मेदार आपूर्ति श्रृंखला जैसी नीतियों से बच्चों के कल्याण के साथ-साथ कर्मचारियों की स्थिरता भी बढ़ती है।

भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था का "रॉकेट शिप" : हेलन ब्रांड

ACCA की मुख्य कार्यकारी अधिकारी हेलन ब्रांड ने वर्चुअल माध्यम से संबोधित करते हुए भारत की तेज आर्थिक प्रगति की सराहना की और कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था "चंद्रमा की ओर बढ़ते रॉकेट शिप" की तरह तेजी से आगे बढ़ रही है।

उन्होंने ACCA की ग्लोबल टैलेंट ट्रेंड्स रिपोर्ट 2026 का उल्लेख करते हुए कहा कि दुनिया भर के वित्तीय पेशेवर अब ऐसे संगठनों में काम करना चाहते हैं जो समाज पर सकारात्मक प्रभाव डालते हों तथा मानवाधिकारों के प्रति संवेदनशील हों।

सतत विकास केवल अनुपालन नहीं, विकास की आधारशिला : प्रो. गरिमा दाधीच

स्कूल ऑफ बिजनेस एनवायरनमेंट की प्रमुख प्रो. गरिमा दाधीच ने कहा कि उत्तरदायी व्यावसायिक आचरण विकसित भारत के निर्माण की अनिवार्य शर्त है। उन्होंने कहा कि सस्टेनेबिलिटी को केवल अनुपालन नहीं बल्कि विकास की आधारशिला के रूप में देखा जाना चाहिए।

उन्होंने सम्मेलन के तीन प्रमुख सिद्धांत बताए—

  • पीढ़ियों के प्रति जिम्मेदारी

  • ऋग्वेद का संदेश "संगच्छध्वं संवदध्वं"

  • भारत के G20 मंत्र "एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य" के अनुरूप विकास

उन्होंने कहा कि केंद्रीय बजट 2026-27 में हरित विकास, जलवायु परिवर्तन और सतत अवसंरचना को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है।

उच्चस्तरीय पैनल में ESG पर व्यापक चर्चा

उद्घाटन सत्र के बाद "ESG, गवर्नेंस और बोर्ड-स्तरीय डिस्क्लोजर" विषय पर उच्चस्तरीय पैनल चर्चा आयोजित हुई।

SEBI के पूर्णकालिक सदस्य अमरजीत सिंह ने कहा कि भारत को वैश्विक मानकों की जल्दबाजी में नकल नहीं करनी चाहिए, बल्कि अपनी विकास आवश्यकताओं के अनुरूप ESG का मार्ग तय करना चाहिए।

ONGC के अध्यक्ष अरुण कुमार सिंह ने कहा कि कंपनियों के इरादों और महत्वाकांक्षा को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भरोसा और नीयत ही सुशासन की असली पहचान है।

CEEW के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. अरुणाभ घोष ने कहा कि ESG को अक्सर बोझ समझा जाता है, जबकि भारत की हरित अर्थव्यवस्था में लगभग 4 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश अवसर मौजूद है।

नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के वरिष्ठ सलाहकार शैलेश पाठक ने कहा कि पूंजी वहीं टिकती है जहां भरोसा होता है। उन्होंने सोशल स्टॉक एक्सचेंज को सामाजिक उद्यमों और निवेशकों के बीच एक मजबूत सेतु बताया।

किर्लोस्कर इंडस्ट्रीज लिमिटेड के प्रबंध निदेशक जॉर्ज वर्गीज ने कहा कि कड़े उत्सर्जन मानकों ने उनकी कंपनी के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजारों के नए अवसर खोले।

आईसीएआई (ICAI) के सस्टेनेबिलिटी रिपोर्टिंग स्टैंडर्ड्स बोर्ड के अध्यक्ष सीए प्रमोद जैन ने कहा कि भारत ESG आश्वासन को अनिवार्य बनाने वाले शुरुआती देशों में शामिल हो गया है, जिससे बोर्ड स्तर की रिपोर्टिंग की विश्वसनीयता वित्तीय विवरणों के समान हो गई है।

दूसरे दिन होंगे कई महत्वपूर्ण सत्र

सम्मेलन के दूसरे दिन विभिन्न क्षेत्रों में ESG के प्रभावी क्रियान्वयन, जिम्मेदार आपूर्ति श्रृंखला, MSMEs में ESG को मुख्यधारा में लाने, BRSR से आगे सेक्टर आधारित ESG ढांचे तथा पर्यावरणीय मानकों को मजबूत बनाने जैसे विषयों पर उच्चस्तरीय चर्चा होगी।

यह सम्मेलन यूनिसेफ, पार्टनर्स इन चेंज, ACCA, ICAI, GAIN, UN Women, CEEW, WRI India और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) सहित कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है।

सम्मेलन का उद्देश्य वर्ष 2047 तक विकसित, समावेशी, टिकाऊ और नैतिक भारत के निर्माण में उत्तरदायी व्यावसायिक आचरण को केंद्रीय भूमिका प्रदान करना है।

दिल्ली में गोबर से बनेगी हरित ऊर्जा, एमसीडी और एनडीडीबी के बीच हुआ बड़ा समझौता

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नई दिल्ली- केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में दिल्ली नगर निगम (MCD) और राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) के बीच गोबर के वैज्ञानिक उपयोग के लिए कम्प्रेस्ड बायो-गैस (CBG) प्लांट स्थापित करने हेतु एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए।

इस अवसर पर केंद्रीय पशुपालन एवं डेयरी मंत्री राजीव रंजन सिंह (ललन सिंह), दिल्ली के उपराज्यपाल तरणजीत सिंह संधू, मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता सहित केंद्र और दिल्ली सरकार के कई वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

अमित शाह ने कहा कि यह पहल देश के सभी बड़े शहरों को स्वच्छ और टिकाऊ बनाने की दिशा में एक मॉडल साबित होगी। इससे न केवल पशुपालकों की आय बढ़ेगी, बल्कि स्वच्छता, हरित ऊर्जा (CBG) उत्पादन और जैविक खेती को भी बड़ा बढ़ावा मिलेगा।

उन्होंने कहा कि यमुना नदी की सफाई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संकल्प का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सीवेज, औद्योगिक कचरे और गोबर को नदी में जाने से रोकना बेहद जरूरी है।

अमित शाह ने बताया कि दिल्ली में सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट के शोधन के लिए लगभग 80 ट्रीटमेंट प्लांट पर काम चल रहा है। साथ ही, भविष्य में 1.25 लाख मवेशियों के गोबर का वैज्ञानिक तरीके से निपटान सुनिश्चित किया जाएगा ताकि यमुना में गोबर का एक भी कण न पहुंचे।

उन्होंने कहा कि दिसंबर 2028 तक यमुना में एक भी लीटर गंदा पानी नहीं जाने देने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

गोबर के प्रसंस्करण का कार्य नांगली, घोघा-गोयला और गाजीपुर स्थित संयंत्रों में किया जाएगा। इस परियोजना के तहत पशुपालकों को गोबर के बदले ₹1 प्रति किलोग्राम का भुगतान भी किया जाएगा, जिससे उनकी आय में वृद्धि होगी।

सरकार का मानना है कि यह पहल न केवल दिल्ली बल्कि देश के अन्य महानगरों और ग्रामीण क्षेत्रों में भी स्वच्छता, हरित ऊर्जा उत्पादन और पशुपालकों की आर्थिक मजबूती का नया मॉडल बनेगी।


डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा- पूर्वोत्तर अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (NESAC) राष्ट्रीय रणनीतिक प्राथमिकताओं और पूर्वोत्तर के विकास का महत्वपूर्ण केंद्र बना

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नई दिल्ली- डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि पूर्वोत्तर अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (NESAC) आज राष्ट्रीय रणनीतिक प्राथमिकताओं और पूर्वोत्तर क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक विकास को अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के माध्यम से गति देने वाली एक महत्वपूर्ण संस्था बन चुका है।

मेघालय के उमियाम स्थित NESAC के दौरे के दौरान डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि यह केंद्र भारत-म्यांमार सीमा तथा पूर्वोत्तर के अंतरराज्यीय सीमाक्षेत्रों की जियोस्पेशियल मैपिंग में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। साथ ही कृषि, आपदा प्रबंधन, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, जल संसाधन, सुशासन और अन्य तकनीक आधारित परियोजनाओं के माध्यम से अंतरिक्ष कार्यक्रम के लाभ आम लोगों तक पहुँचा रहा है।

इस अवसर पर NESAC के निदेशक डॉ. एस.पी. अग्रवाल ने केंद्र की उपलब्धियों और वर्तमान कार्यक्रमों पर विस्तृत प्रस्तुति दी। उन्होंने बताया कि केंद्र लगभग 130 परियोजनाओं पर कार्य कर रहा है, जिनमें 50 परियोजनाएँ हाल ही में पूर्ण हुई हैं तथा 78 परियोजनाएँ प्रगति पर हैं। ये परियोजनाएँ कृषि, वानिकी, जल संसाधन, भू-विज्ञान, शहरी एवं क्षेत्रीय नियोजन, भू-सूचना विज्ञान, सूचना प्रौद्योगिकी, उपग्रह संचार, यूएवी (ड्रोन) अनुप्रयोग, अंतरिक्ष एवं वायुमंडलीय विज्ञान, आपदा प्रबंधन तथा क्षमता निर्माण जैसे क्षेत्रों से संबंधित हैं।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि NESAC अत्याधुनिक अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी को व्यावहारिक विकासात्मक समाधानों में बदलने का उत्कृष्ट कार्य कर रहा है। यह संस्था वैज्ञानिक क्षमताओं और पूर्वोत्तर के आठों राज्यों की विकासात्मक आकांक्षाओं के बीच एक प्रभावी सेतु बनकर उभरी है। राज्य सरकारों के साथ बढ़ते सहयोग से अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी योजना निर्माण, प्रशासन, संसाधन प्रबंधन और जनसेवा का प्रभावी माध्यम बन रही है।

उन्होंने पूर्वोत्तर गन्ना एवं बांस विकास परिषद (NECBDC) तथा राज्य सरकारों के साथ NESAC के समन्वय को और मजबूत करने का आह्वान किया ताकि बांस संसाधनों की वैज्ञानिक मैपिंग का अधिकतम लाभ मिल सके। उन्होंने कहा कि इससे बांस मूल्य श्रृंखला सुदृढ़ होगी, संसाधनों की बेहतर योजना बनेगी, मूल्य संवर्धन को बढ़ावा मिलेगा और क्षेत्र में टिकाऊ रोजगार के अवसर सृजित होंगे।

मंत्री ने NESAC की बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणाली को और अधिक सटीक एवं स्थान-विशिष्ट बनाने पर भी जोर दिया, ताकि संवेदनशील क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को समय पर प्रभावी सूचना उपलब्ध कराई जा सके। उन्होंने रामकृष्ण मिशन, चेरापूंजी द्वारा विकसित जल संचयन मॉडल को अन्य राज्यों में भी अपनाने का सुझाव दिया, जिससे क्षेत्र की दीर्घकालिक जल सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि NESAC की जियोस्पेशियल तकनीक रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण सीमावर्ती क्षेत्रों में राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभा रही है। उन्होंने 'मंज़िल-एनई' (GeoTourism ManzilNE) डैशबोर्ड को और सशक्त बनाने तथा निजी पर्यटन क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने का भी आह्वान किया, ताकि पूर्वोत्तर की प्राकृतिक, पारिस्थितिक और सांस्कृतिक विरासत को तकनीक के माध्यम से वैश्विक स्तर पर बढ़ावा मिल सके।

उन्होंने NESAC से केंद्रीय मंत्रालयों, राज्य सरकारों, अनुसंधान संस्थानों, शिक्षण संस्थाओं, स्टार्टअप्स, निजी उद्योगों और अन्य हितधारकों के साथ सहयोग बढ़ाने का आग्रह किया। उनके अनुसार, व्यापक साझेदारी से वैज्ञानिक नवाचारों को बड़े पैमाने पर लागू कर क्षेत्र की विकासात्मक चुनौतियों का प्रभावी समाधान किया जा सकेगा।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पूर्वोत्तर भारत देश के सबसे गतिशील विकास क्षेत्रों में उभरकर सामने आया है, जहाँ विज्ञान और प्रौद्योगिकी समावेशी विकास के प्रमुख साधन बन रहे हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि NESAC अपनी अनुप्रयोग-आधारित परियोजनाओं और रणनीतिक पहलों के माध्यम से सुशासन, आपदा लचीलापन, सतत संसाधन प्रबंधन तथा तकनीक-सक्षम समृद्ध पूर्वोत्तर के निर्माण में भविष्य में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहेगा।

वीबी जी राम जी योजना के अंतर्गत प्रत्येक जिले में तेज़ी से हो रहे रोजगार, जल संरक्षण एवं हरित विकास के कार्य

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एमसीबी जिले में मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने ‘मोर गांव-मोर पानी’ अभियान एवं ‘एक पेड़ मां के नाम’ कार्यक्रम का किया शुभारंभ

52 एकड़ में विकसित हो रहा समेकित जल संरक्षण मॉडल, लगभग 200 लाख लीटर भू-जल रिचार्ज क्षमता हुई विकसित

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व एवं उपमुख्यमंत्री तथा पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री विजय शर्मा के मार्गदर्शन में विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण) (VB-G RAM-G) के अंतर्गत पूरे प्रदेश में रोजगार सृजन, जल संरक्षण, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन तथा हरित विकास के कार्यों को व्यापक गति मिली है। ‘मोर गांव-मोर पानी’ अभियान के माध्यम से राज्य सरकार जल संरक्षण को जनआंदोलन का स्वरूप दे रही है। अभियान के तहत प्रदेशभर में लाखों मानव-दिवस का रोजगार सृजित होने के साथ-साथ जल संरक्षण संरचनाओं का निर्माण कर भू-जल संवर्धन की दिशा में प्रभावी कार्य किए जा रहे हैं।


इसी क्रम में जिला मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर (एमसीबी) के जनपद पंचायत खड़गवां अंतर्गत ग्राम पंचायत बरदर में जन सम्मेलन, ‘एक पेड़ मां के नाम’ वृहद वृक्षारोपण एवं ‘मोर गांव-मोर पानी’ जनभागीदारी कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा चिकित्सा शिक्षा मंत्री तथा मनेन्द्रगढ़ विधायक श्याम बिहारी जायसवाल ने वृक्षारोपण कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। उन्होंने स्वयं कंटूर ट्रेंच की खुदाई कर जल संरक्षण का संदेश दिया और कहा कि जल संरक्षण केवल आज की आवश्यकता नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। उन्होंने ग्रामीणों से अधिकाधिक जनभागीदारी के साथ जल संरक्षण एवं वृक्षारोपण अभियान को जनआंदोलन बनाने का आह्वान किया।

ग्राम पंचायत बरदर में 52 एकड़ क्षेत्र में समेकित जल संरक्षण एवं हरित विकास मॉडल विकसित किया जा रहा है। इसके अंतर्गत 30 एकड़ क्षेत्र में कंटूर ट्रेंच एवं अन्य जल संरक्षण कार्यों के माध्यम से वर्षाजल के संग्रहण और भू-जल संवर्धन की व्यवस्था विकसित की गई है, जबकि 22 एकड़ क्षेत्र में लगभग 2,000 फलदार एवं अन्य पौधों का रोपण प्रारंभ किया गया है। जल संरक्षण और हरित विकास का यह मॉडल ग्रामीण क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों के सतत प्रबंधन का उत्कृष्ट उदाहरण बनेगा।


‘मोर गांव-मोर पानी’ अभियान के अंतर्गत किए गए कार्यों से इस क्षेत्र में लगभग 200 लाख लीटर भू-जल रिचार्ज क्षमता विकसित हुई है। इससे भविष्य में सिंचाई, पेयजल उपलब्धता, कृषि उत्पादकता तथा पर्यावरण संरक्षण को दीर्घकालिक लाभ मिलेगा।

उल्लेखनीय है कि राज्य शासन द्वारा VB-G RAM-G के माध्यम से प्रदेश के सभी जिलों में जल संरक्षण, वृक्षारोपण, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, ग्रामीण अधोसंरचना निर्माण तथा आजीविका संवर्धन के कार्यों को प्राथमिकता के साथ संचालित किया जा रहा है। सरकार का उद्देश्य जनभागीदारी के माध्यम से प्रत्येक ग्राम पंचायत को जल-सुरक्षित, हरित एवं आत्मनिर्भर बनाना है।

विकसित भारत-जी राम जी योजना से ग्रामीण विकास को मिलेगी नई दिशा

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1 जुलाई 2026 से देशभर में लागू होगी योजना, ग्रामीण परिवारों को मिलेगा 125 दिनों के रोजगार की गारंटी

रायपुर- देशभर में 1 जुलाई 2026 से विकसित भारत-रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण) योजना लागू हो रही है। यह योजना ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका संवर्धन और आधारभूत विकास को नई गति देने के उद्देश्य से प्रारंभ की जा रही है। इस योजना का उद्देश्य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के विकसित भारत -2047 के विज़न को साकार करने की दिशा में ग्रामीण भारत को सशक्त, आत्मनिर्भर एवं समृद्ध बनाना है। योजना के माध्यम से ग्रामीण परिवारों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के साथ-साथ स्थायी परिसंपत्तियों का निर्माण, आजीविका संवर्धन और गांवों के समग्र विकास को बढ़ावा दिया जाएगा।

राज्य के बजट में 4000 करोड़ रुपये का प्रावधान

योजना के अंतर्गत ग्रामीण परिवारों को मांग के आधार पर वर्ष में 125 दिनों तक रोजगार की गारंटी प्रदान की जाएगी। इसके साथ ही जल संरक्षण, ग्रामीण अधोसंरचना विकास, कृषि आधारित कार्य, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और आजीविका संवर्धन जैसे टिकाऊ कार्यों को प्राथमिकता दी जाएगी। विकसित ग्राम की परिकल्पना को साकार करने के लिए योजना में कुल 318 प्रकार के कार्यों को शामिल किया गया है। योजना के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु छत्तीसगढ़ राज्य में वर्ष 2026-27 के बजट में 4000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

2 जुलाई को होगा शुभारंभ

छत्तीसगढ़ में योजना के शुभारंभ एवं क्रियान्वयन को लेकर पूरे प्रदेश में कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। 2 जुलाई 2026 को तिरुपति, आंध्रप्रदेश से केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा कार्यक्रम का शुभारंभ किया जाएगा, जिसमें वे देश के विभिन्न राज्यों से संवाद करेंगे। प्रदेश में यह कार्यक्रम कबीरधाम जिले के बोड़ला विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत गंडईखुर्द में आयोजित किया जाएगा। इस अवसर पर उप मुख्यमंत्री श्री विजय शर्मा ग्रामीणों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से कार्यक्रम से जुड़कर संवाद करेंगे।

ग्राम सभा की भूमिका होगी सशक्त

इस योजना के अंतर्गत ग्रामीण परिवारों को वर्ष में 125 दिनों तक रोजगार की गारंटी मिलेगी, 15 दिवस के भीतर मजदूरी भुगतान की व्यवस्था होगी, कार्य उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में बेरोजगारी भत्ते का भी प्रावधान किया गया है। इसी तरह डिजिटल जॉब कार्ड एवं तकनीक आधारित कार्य प्रबंधन प्रणाली, समयबद्ध एवं पारदर्शी भुगतान व्यवस्था के साथ ग्राम सभा की भूमिका को और अधिक सशक्त बनाया गया है।

ग्राम सभा द्वारा तैयार की जाएगी पंचायतों के विकास कार्यों की कार्ययोजना

वीबी जीरामजी में जल संरक्षण, सिंचाई, ग्रामीण सड़क, वृक्षारोपण एवं टिकाऊ परिसंपत्तियों के निर्माण पर विशेष जोर दिया गया है। इस योजना से ग्रामीण युवाओं के लिए कौशल विकास एवं आजीविका के नए अवसर प्रदान करेगी। सामाजिक अंकेक्षण एवं डिजिटल निगरानी से पारदर्शिता में भी वृद्धि होगी। नई व्यवस्था के तहत ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों की कार्ययोजना ग्राम सभा के माध्यम से तैयार की जाएगी, जिससे स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप कार्यों का चयन किया जा सकेगा।

विकसित भारत-जी राम जी योजना ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने, रोजगार के अवसर बढ़ाने और गांवों में विकास की स्थायी आधारशिला तैयार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। यह योजना ग्रामीण भारत को आत्मनिर्भर और विकसित भारत के संकल्प से जोड़ने का माध्यम बनेगी।

राजस्थान-हरियाणा के बीच यमुना जल परियोजना पर ऐतिहासिक समझौता, तीन दशक पुरानी पेयजल समस्या के समाधान की दिशा में बड़ा कदम

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नई दिल्ली- केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की उपस्थिति में राजस्थान और हरियाणा सरकारों ने यमुना जल परियोजना के निर्माण एवं क्रियान्वयन के लिए एक महत्वपूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस अवसर पर राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी, केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल सहित केंद्र और दोनों राज्यों के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।

प्रमुख बातें

  • लगभग 30 वर्षों से लंबित पेयजल विवाद के समाधान की दिशा में बड़ी सफलता।

  • जुलाई से अक्टूबर तक यमुना नहर से राजस्थान को 580 मिलियन क्यूबिक मीटर (MCM) पानी उपलब्ध कराया जाएगा।

  • पानी की आपूर्ति 3.6 मीटर से अधिक व्यास वाली तीन भूमिगत पाइपलाइनों के माध्यम से की जाएगी।

  • परियोजना से राजस्थान और हरियाणा दोनों राज्यों को पेयजल उपलब्ध होगा।

किन क्षेत्रों को मिलेगा लाभ?

राजस्थान

  • सीकर

  • चूरू

  • झुंझुनूं

हरियाणा

  • भिवानी

  • फतेहाबाद

समझौते की विशेषताएं

  • जल बंटवारा, लागत साझा करने और रखरखाव की स्पष्ट व्यवस्था।

  • आधुनिक निगरानी प्रणाली और पारदर्शी संचालन तंत्र।

  • विवाद समाधान के लिए मजबूत और वैज्ञानिक व्यवस्था।

  • केंद्र सरकार, दोनों राज्य सरकारों और केंद्रीय जल आयोग (CWC) के समन्वय से तैयार व्यापक ढांचा।

अमित शाह ने क्या कहा?

अमित शाह ने कहा कि यह समझौता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के "संवाद से समाधान" और सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) के सिद्धांत का उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने कहा कि वर्षों से व्यर्थ बह रहा पानी अब लोगों की प्यास बुझाएगा, भूजल स्तर को बढ़ाने में मदद करेगा और दोनों राज्यों के विकास को नई गति देगा।

परियोजना का उद्देश्य

यह परियोजना 1994 के अपर यमुना बेसिन जल बंटवारा समझौते के तहत राजस्थान को आवंटित यमुना जल का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करेगी। साथ ही, शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में लाखों लोगों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराकर सामाजिक और आर्थिक विकास को बढ़ावा देगी।

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