Media24Media.com: रणनीति, शक्ति और आत्मनिर्भरता: 21वीं सदी के लिए भारत की सुरक्षा दृष्टि

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रणनीति, शक्ति और आत्मनिर्भरता: 21वीं सदी के लिए भारत की सुरक्षा दृष्टि

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रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सशस्त्र बलों से पारंपरिक युद्ध की अवधारणाओं से आगे बढ़कर सूचना, वैचारिक, पारिस्थितिक और जैविक युद्ध जैसी अदृश्य चुनौतियों से निपटने के लिए सतर्क और तैयार रहने का आह्वान किया। 16 सितम्बर 2025 को पश्चिम बंगाल के कोलकाता में आयोजित कंबाइंड कमांडर्स कॉन्फ्रेंस 2025 को संबोधित करते हुए रक्षा मंत्री ने अस्थिर वैश्विक व्यवस्था, क्षेत्रीय अस्थिरता और उभरते सुरक्षा परिदृश्य के मद्देनज़र निरंतर वैश्विक परिवर्तनों का आकलन करने और उनके देश की सुरक्षा प्रणाली पर प्रभाव को समझने की आवश्यकता पर बल दिया।

राजनाथ सिंह ने कहा कि युद्ध की प्रकृति लगातार बदल रही है और हालिया वैश्विक संघर्षों ने “तकनीकी रूप से सक्षम” सैन्य बल की प्रासंगिकता को रेखांकित किया है। उन्होंने कहा, “आज के युद्ध इतने अचानक और अप्रत्याशित होते हैं कि इसकी अवधि का अनुमान लगाना कठिन है। यह दो महीने, एक साल या पाँच साल तक चल सकता है। हमें हर परिस्थिति के लिए तैयार रहना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारी क्षमता पर्याप्त बनी रहे।”

रक्षा मंत्री ने भारत के रक्षा क्षेत्र को आक्रामक और रक्षात्मक क्षमताओं का संगम बताते हुए कमांडरों से सक्रिय दृष्टिकोण अपनाने और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “सुदर्शन चक्र” के विज़न को साकार करने की दिशा में काम करने का आह्वान किया। उन्होंने बताया कि इस परियोजना की समीक्षा और यथार्थवादी कार्य योजना तैयार करने के लिए समिति गठित की गई है। साथ ही उन्होंने पाँच वर्षीय मध्यम अवधि की और दस वर्षीय दीर्घकालिक योजना बनाने का सुझाव दिया।

उन्होंने कहा कि भारत का रक्षा क्षेत्र आधुनिकीकरण, संचालनात्मक तत्परता, तकनीकी श्रेष्ठता और विश्वसनीय प्रतिरोधक क्षमता पर आधारित है। रक्षा मंत्री ने प्रधानमंत्री द्वारा 15 सितम्बर को सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में दिए गए “JAI – संयुक्तता, आत्मनिर्भरता और नवाचार” के मंत्र पर जोर दिया। उन्होंने भविष्य उन्मुख तकनीक विकसित करने में उद्योग और शिक्षाविदों के साथ गहन सहयोग का आह्वान किया और रक्षा नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र में निजी क्षेत्र की भूमिका को बढ़ाने की दिशा में सरकार की प्रतिबद्धता को दोहराया।

रक्षा मंत्री ने कहा कि भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए सशस्त्र बलों के बीच तथा अन्य एजेंसियों के साथ संयुक्तता और तालमेल आवश्यक है। उन्होंने त्रि-सेवा लॉजिस्टिक्स नोड्स और त्रि-सेवा लॉजिस्टिक प्रबंधन एप्लिकेशन के निर्माण का उल्लेख किया, जो रक्षा क्षेत्र में एकीकरण और संयुक्तता को बढ़ावा देंगे। उन्होंने नागरिक-सैन्य सहयोग को भी महत्वपूर्ण बताया।

राजनाथ सिंह ने कहा, “ऑपरेशन सिंदूर ने सिद्ध किया है कि शक्ति, रणनीति और आत्मनिर्भरता – यही तीन स्तंभ हैं जो भारत को 21वीं सदी में आवश्यक शक्ति प्रदान करेंगे। आज हमारे पास स्वदेशी प्लेटफॉर्म और प्रणालियों तथा हमारे सैनिकों के साहस के बल पर किसी भी चुनौती का सामना करने की क्षमता है। यही आत्मनिर्भर भारत की असली ताकत है।” उन्होंने सशस्त्र बलों की “उत्कृष्ट कार्यक्षमता” और “असाधारण पेशेवराना क्षमता” की सराहना की।

रक्षा मंत्री ने आत्मनिर्भर भारत के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दोहराते हुए कहा कि आत्मनिर्भरता कोई नारा नहीं, बल्कि आवश्यकता है और यह सामरिक स्वायत्तता की कुंजी है। उन्होंने कहा कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता आर्थिक विकास को बढ़ावा दे रही है, रोजगार पैदा कर रही है और शिपयार्ड, एयरोस्पेस क्लस्टर तथा डिफेंस कॉरिडोर की क्षमता बढ़ा रही है। यही रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का गुणक प्रभाव है।

उन्होंने रक्षा खरीद मैनुअल 2025 को मंजूरी देने की जानकारी दी, जिसका उद्देश्य खरीद प्रक्रिया को सरल बनाना है। उन्होंने यह भी बताया कि रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया 2020 में संशोधन किया जा रहा है ताकि प्रक्रियाएँ और सरल हों, विलंब कम हो और सशस्त्र बलों को शीघ्र संचालनात्मक ताकत मिल सके।

सम्मेलन में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान, नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी, थल सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी, वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह, रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह, रक्षा उत्पादन सचिव संजीव कुमार, पूर्व सैनिक कल्याण सचिव डॉ. नितेन चंद्र, रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव एवं डीआरडीओ प्रमुख डॉ. समीर वी. कमत, वित्तीय सलाहकार (रक्षा सेवाएँ) डॉ. मयंक शर्मा तथा अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

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